मंगलवार, 27 जुलाई 2010

यदि महिलाएं डायन हैं तो पुरुष कुछ क्यों नहीं?

पिछले दिनों तमाम अख़बारों में एक दिल दहलाने देने वाली खबर पढ़ने को मिली.इसमें लिखा गया था कि देश में अभी भी महिलाओं को डायन बताकर मारा जा रहा है.दादी-नानी से सुनी कहानियों के मुताबिक डायन वह महिला होती है जो दूसरों के ही नहीं बल्कि अपने बच्चे तक खा जाती है.इन कहानियों के आधार पर बचपन में मेरे मन में डायन कि कुछ ऐसी डरावनी छवि बन गयी थी जैसी कि अंग्रेजी फिल्मों में ड्राकुला की होती है.मसलन लंबे भयानक दांत.कुरूप चेहरा,गंदे व खून से लथपथ नाखून इत्यादि वाली महिला! परन्तु जब भी डायन बताकर मारी गयी महिला की तस्वीर देखता तो वो इस छवि से मेल नहीं खाती थी.कभी दादी-नानी से पूछा तो वे भी संतुष्टिपूर्ण जवाब नहीं दे पायीं.वक्त के साथ समझ आने पर डायन कथाओं और इनके पीछे की हकीकत समझ में आने लगी.
ऊपर मैंने जिस खबर का उल्लेख किया है उसमें एक गैर सरकारी संस्था रूरल लिटिगेशन एंड एनटाइटिलमेंट केंद्र द्वारा किये गए अध्ययन के अनुसार बताया गया था कि देश में हर साल 150-200 महिलाओं को डायन बताकर मार डाला जाता है। इस संस्था ने राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकडों के हवाले से बताया कि इस सूची में झारखंड का स्थान सबसे ऊपर है। वहां 50 से 60 महिलाओं की डायन कहकर हत्या कर दी जाती है। दूसरे नंबर पर पर आंध्रप्रदेश है, जहां करीब 30 महिलाओं की डायन के नाम पर बलि चढ़ा दी जाती है। इसके बाद हरियाणा और उड़ीसा का नंबर आता है। इन दोनों राज्य में भी प्रत्येक वर्ष क्रमश: 25-30 और 24-28 महिलाओं की हत्या कर दी जाती है। इस संगठन के मुताबिक पिछले 15 वर्षों में देश में डायन के नाम पर लगभग 2,500 महिलाओं की हत्या की जा चुकी है।
सवाल यह उठता है कि यदि आज के आधुनिक और तकनीकी संपन्न दौर में भी जब महिला डायन हो सकती है तो पुरुष कुछ क्यों नहीं होता.अब इसे पुरुष सत्तात्मक समाज की विडंबना कहें या पुरुषवादी सोच कि उन्होंने शब्दकोष में डायन के पर्यायवाची शब्द की गुन्जाइश ही नहीं रखी.दरअसल गांवों में फैली अज्ञानता और शिक्षा की कमी के कारण इस तरह की कुप्रथाएं आज भी शान से कायम है. वैसे जानकर डायन बनाने का कारण ज़मीन के झगड़े,महिलाओं के साथ जबरदस्ती करने में मिली नाकामयाबी,पारिवारिक शत्रुता,विधवा हो जाने को भी मानते हैं.खास बात यह है कि डायन सदैव दलित या शोषित समुदाय की ही होती है.ऊंचे तबके की महिलाओं के डायन होने की बात यदा-कदा ही सुनने में आती हैं.इससे भी आश्चर्य की बात यह है कि “ओनर किलिंग” के नाम पर देश को सर पर उठा लेने वाले मीडिया,नेता,समाजसेवी और बड़े गैर सरकारी संगठन डायन के मुद्दे को ज्यादा महत्त्व नहीं दे रहे जबकि यह वास्तव में मानव सभ्यता पर कलंक है और स्त्री जाति का अपमान है.जिस देश में महिलाओं को दुर्गा,काली ,लक्ष्मी,सरस्वती,गंगा,माँ जैसे पवित्र नामों से पूजा जाता है वहीँ उसे डायन बताकर मार भी डाला जाता है?हम कब तक इसीतरह मौन रहकर माँ को डायन बनता देखते रहेगें?कम से कम इसके खिलाफ आवाज़ तो उठा ही सकते हैं..?

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

बेटियों की बात या देह-दर्शन का बहाना ..?

महात्मा गाँधी से जुड़ा एक मशहूर किस्सा है.उनके पास एक महिला अपने बच्चे को लेकर आई .महिला ने बताया कि उसका बेटा बहुत ज्यादा गुड़ खाता है और वह उसकी इस आदत को छुड़ाना चाहती है.मैंने सुना है कि यदि गांधीजी किसी को समझा दे तो वह एक ही बार में अपनी बुरी आदत छोड़ देता है इसलिए मैं इसे आपके पास लेकर आयीं हूँ.गांधीजी ने उस महिला से कहा कि वह एक हफ्ते बाद आये.बापू की बात मानकर महिला चली गयी और सप्ताह भर बाद पुनः आई.गांधीजी ने उसके बेटे को गुड़ की अच्छाई और बुराइयां दोनों बताई और ज्यादा गुड़ नहीं खाने की सलाह दी.महिला के जाने के बाद उनके एक शिष्य ने पूछा-बापू यह बात तो आप हफ्ते भर पहले भी बता सकते थे तो फिर आपने महिला को सप्ताह भर बाद क्यों बुलाया था?गांधीजी ने उत्तर दिया-दरअसल हफ्तेभर पहले तक मैं खुद भी गुड़ खाता था.जो काम मैं खुद कर रहा हूँ तो दूसरे को कैसे मना कर सकता हूँ.सप्ताह भर में मैंने अपनी गुड़ खाने की आदत को त्याग दिया इसलिए उस बच्चे को भी ऐसा कर पाने की बात आत्मविश्वास के साथ समझा पाया लेकिन हमारा मीडिया बापू की तरह महान नहीं है.वह जो काम खुद करता है वही दूसरों को करने से रोकता है.
आपको याद होगा कि पिछले दिनों एक न्यूज़ चैनल ने एक स्टिंग आपरेशन कर यह साबित किया था कि दिल्ली अब महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं रह गयी है और दिल्ली के पुरुषों के पास महिलाओं-युवतियों को घूरने के अलावा और कोई काम नहीं हैं.चैनल ने अपनी एक रिपोर्टर युवती को माडलों के अंदाज़ में सजा-धजा कर राजधानी के कई इलाकों में खड़ा कर दिया और अपने कैमरे लगाकर आते-जाते लोगों की गतिविधियाँ रिकार्ड की,इसके बाद अपने चैनल पर बताया कि देखो दिल्ली वाले कैसे हैं,युवतियों को कैसे घूर-घूरकर देखते हैं?जहाँ तक मेरी जानकारी है तो दिल्ली को तो दिलवालों का शहर कहा जाता है .अब दिलवाले ही दिल्लगी नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा.खैर यह तो हुई मज़ाक की बात पर हक़ीक़त में सवाल यह है कि आम लोगों में महिलाओं और युवतियों के प्रति खुलेआम आकर्षण के प्रदर्शन की आदत किसने डाली? इसी मीडिया ने और किसने.आप किसी भी दिन का हिंदी-अंग्रेज़ी का समाचार पत्र उठा लीजिये या फिर दिन भर में कोई भी न्यूज़ चैनल देख लीजिये महिलाओं की बेहूदा एवं उल-ज़लूल तस्वीरों के अलावा होता क्या है?अंग्रेज़ी के अखब़ार तो विदेशी समाचार पत्रों की नक़ल अपना अधिकार मानते हैं इसलिए देशी-विदेशी महिलाओं की लगभग नग्न तस्वीरें और सेक्स से जुड़ी गोसिप छापना अपना कर्तव्य मानते हैं.वहीँ हमारे हिंदी के अखब़ार भी अंग्रेज़ी न्यूज़ पेपरों से कमतर नहीं दिखने के लिए उनके पिछलग्गू बने हुए हैं इसलिए मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता परोस रहे हैं.अब समाचार पत्रों के साथ साप्ताहिक आने वाले मनोरंजक परिशिष्ट दैनिक हो गए हैं.जिनमे सिवाय फ़िल्मी चित्रों के कुछ नहीं होता.न्यूज़ चैनलों का तो और भी बुरा हाल है उनका तो अधिकतर वक्त राखी सावंत,मल्लिका सहरावत,सर्लिन चोपड़ा के चुम्बन-नग्नता और फूहड़ कारनामों के बखान में ही बीतता है.कभी डांस शो के नाम पर तो कभी द्विअर्थी कामेडी के नाम पर तो कभी ख़बर के नाम पर वे खुलेआम अश्लीलता परोसते रहते हैं.
मीडिया के महिला प्रेम के नवीनतम उदाहरण माडल विवेका बाबाजी की आत्महत्या और दिल्ली विश्वविध्यालय के एडमिशन हैं.जब विवेका ने आत्महत्या की तब भोपाल गैस कांड के पीड़ितों के साथ अन्याय की बात सुर्ख़ियों में थी लेकिन विवेका की ग्लैमरस स्टोरी हाथ आते ही न्यूज़ चैनल गैस पीड़ितों का दर्द भूल गए और दिन-रात विवेका की माडलिंग वाली अर्धनग्न तस्वीरें दिखाने लगे.वहीँ दिल्ली यूनिवर्सिटी के एडमिशन के दौरान तो ऐसा लगता है मानो यहाँ केवल लड़कियां ही पढने आती हैं.इन दिनों सारे अखब़ार और चैनल युवतियों के चेहरों,कपड़ों,फैशन,बैग,जूतों की समीक्षा में जुट जाते हैं.खासतौर पर उन युवतियों को अखबारी पन्नों और न्यूज़ चैनलों में खूब जगह मिलती है जिन्होंने छोटे कपडे पहने हों.इस दौरान बेचारे लड़के तो गायब ही हो जाते हैं?वे कितनी भी फैशन कर ले पर टीवी कैमरों को अपनी और नहीं खींच पाते और लड़कियां कुछ भी पहन ले अखब़ार में फोटो छपवा लेने में कामयाब हो जाती हैं.जब मीडिया खुद ही इसतरह का पक्षपात कर रहा हो तो फिर उसे यह कहने का क्या हक़ है कि पुरुष बस महिलायों को घूरते रहते हैं?पहले आप अपने गिरेबान में तो झाँकों और अपना खुद 'स्टिंग आपरेशन' करके देखो फिर पूरे पुरुष समाज को कटघरे में खड़ा करो?हो सकता है कुछ मात्रा ऐसे पुरुषों की हो जो वाकई में "छिछोरे" हो पर सभी पुरुषों पर अंगुली उठाना,वह भी जब आप खुद वही काम कर रहे हैं ,तो ठीक नहीं है?




सलीम ख़ान, July 23, 2010 5:28 PM


sahmat !!

media kii maan ki aankh !!



ज़ाकिर अली ‘रजनीश’, July 23, 2010 5:47 PM

सही कहा आपने, साचने की बात है।

………….

ये ब्लॉगर हैं वीर साहसी, इनको मेरा प्रणाम



anshumala, July 23, 2010 5:51 PM

आपकी बात से सहमत हु
अच्छी पोस्ट



वाणी गीत, July 24, 2010 5:46 AM

Nice Post ..!

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

कहीं हम साज़िश का शिकार तो नहीं बन रहे...?

पिछले कुछ दिनों के दौरान न्यूज़ चैनलों पर आई खबरों से शुरुआत करते हैं:
• क्या आप डबलरोटी की जगह पाँव रोटी खा रहे हैं?
• ज़हरीले ढूध से बनी चाय पी रहे हैं आप?
• आप की लौकी में ज़हर है?
• खोवा और पनीर भी मिलावटी?
• ज़हरीला करेला खा रहे हैं आप?
• ओक्सिटोसिन से पक रहे हैं फल?
ये तो महज बानगी है.ऐसी ही कोई न कोई खबर आप रोज न्यूज़ चैनलों या हिंदी-अंग्रेजी के अखबारों में देखते हैं.अगर आप ध्यान से सोचें तो पता लगेगा कि ऐसी ख़बरों की कुछ दिन से बाढ़ सी आ गयी है.क्या एकाएक मिलावट इतनी ज्यादा बढ़ गयी है? या हमारे पत्रकार ज्यादा ही मुस्तैद हो गए हैं? या फिर हम किसी बड़ी साज़िश के शिकार बन रहे हैं? इन ख़बरों का फायदा किसे हो रहा है?और इन ख़बरों से किसे नुकसान हो रहा है?
आइये अब इन बातों और कारणों का विश्लेषण करें. देश में बेकरी का खुदरा कारोबार घरेलू तौर पर किया जाता है.कई परिवार पुश्तैनी रूप से यह काम कर रहे हैं.इसीतरह सहकारी आधार पर और छोटी घरेलू कंपनियों द्वारा भी बेकरी का काम किया जाता है.इस क्षेत्र में अब नामी ब्रांड और विदेशी कंपनियों का दखल बढ़ रहा है.कुछ यही हाल स्टेशनों पर मिलने वाली चाय का है.इस काम में छोटे-छोटे वेन्डर लगे हैं.देश में खोवा-पनीर बनाने का काम भी कुटीर उद्योग की तर्ज़ पर चल रहा है.यदि आप स्टेशनों पर लगती बड़ी और नामी कंपनियों की चाय-काफी मशीनों की संख्या का विश्लेषण करे तो आसानी से समझ सकते हैं कि हमें छोटे उत्पादकों से क्यों डराया जा रहा है.सीधे सपाट शब्दों में कहे तो देश में छोटे उत्पादकों,सहकारी संस्थाओं,कंपनियों और छोटे व्यापारियों को खत्म करने की साज़िश चल रही है.नेस्ले, ,ब्रिटानिया,कोकाकोला,पेप्सी,मेक्डोनाल्ड,पिज्जा हट जैसी तमाम बड़ी कंपनियों को भारत में चाय,मिठाई,फल-सब्जी और सम्पूर्ण रूप से कहे तो प्रोसेस्ड(प्रसंस्कृत)फ़ूड का बाज़ार और इसमें छिपा अरबों रूपए का मुनाफा नज़र आ गया है इसलिए सबसे पहले छोटे और घरेलू खिलाडियों को मैदान से हटाया जा रहा है,फिर देशी कम्पनियां हटेंगी और फिर हम विदेशी उत्पादों के गुलाम हो जायेंगे.कभी सोचा है इतनी महंगाई के बाद भी मेक्डोनाल्ड का बर्गर बीस रूपए में ही क्यों मिल रहा है जबकि हमारा समोसा तक दोगुना महंगा हो गया?वही ईस्ट इंडिया कंपनी वाली नीति कि पहले आदी बनाओ और फिर मुनाफा कमाओ.इस लेख का यह उद्देश्य यह कतई नहीं है कि आप देशप्रेम के नाम पर सड़ा-गला और ज़हरीला खाते रहे बल्कि आपको यह याद दिलाना है कि कई दशकों से आप के घर दूध दे रहा रामखिलावन एकाएक बेईमान नहीं हो सकता और न ही रहीम बेकरी वाला आपके साथ पीढ़ीगत सम्बन्ध भूलकर मुनाफाखोर हो सकता है.इसीतरह बचपन से स्टेशन पर चाय पिला रहा दशरथ दूध में यूरिया मिलकर अपना ज़मीर नहीं बेच सकता और सबसे खास बात यह है कि न्यूज़ चैनल विज्ञापनों के सहारे चलते हैं और ये विज्ञापन रहीम,रामखिलावन,दशरथ या मुस्कान मिठाई-पनीर वाला नहीं दे सकते ? इसलिए आँख खोलकर चीजे अपनाइए न कि खबरों में देखकर....

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

आम आदमी का दर्द अभिव्यक्त करते गाने

कभी कभी कुछ गाने ऐसे बन जाते हैं जो उस दौर का प्रतिनिधित्व करने लग जाते हैं और आम जनता की आवाज़ बनकर सत्ता प्रतिष्ठान की मुखालफत का माध्यम बनकर लोगों के दिल-ओ-दिमाग में खलबली तक पैदा कर देते हैं.जल्द ही रिलीज होने वाली फिल्म ‘पीपली लाइव’ का यह गीत भी महंगाई के खिलाफ राष्ट्रीय गीत बन गया है.इस गाने के बोल-“सखी सैंया तो खूब ही कमात है,महंगाई डायन खाय जात है.”ने भी लोगों को झकझोर दिया है.आलम यह है कि इस गाने को कांग्रेस विरोध की धुरी बनाने के लिए भाजपा ने बकायदा गीत के कापीराईट हासिल करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं. यदि आप भूले न हो तो चंद साल पहले भी एक गाना जनता ही नहीं सरकार की उपलब्धियों की आवाज़ बन गया था.यह गाना था फिल्म ‘स्लमडोग मिलिनियर’ में ऑस्कर विजेता संगीतकार ए आर रहमान का स्वर और संगीतबद्ध किया गया “जय हो”.तब कांग्रेस ने बकायदा इस गीत के अधिकार लेकर इसे अपने चुनाव प्रचार का मुख्य हथियार बना लिया था.इस गीत ने आम जनता पर भी जादू किया और कांग्रेस की सत्ता में वापसी हो गई. फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ के गीत “आल इज वैल” ने स्कूल-कालेज के छात्रों को स्वर दे दिया था.
ऐसा नहीं है कि आज के दौर में गीतों की लोकप्रियता यह मुकाम हासिल कर रही है.इसके पहले भी फिल्म ‘उपकार' का मशहूर गीत “मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती” तत्कालीन दौर में किसानों के दिल की धड़कन बन गया था.यह वह समय था जब देश में जवाहरलाल नेहरु और लालबहादुर शास्त्री के नाम ईश्वर की तरह लिए जाते थे.यह हरित क्रांति का दौर था एवं हमारे देश की मिटटी वाकई में सोना उगलती थी. इसी फिल्म'पूरव और पश्चिम' का एक  गाना “भारत का रहने वाला हूँ,भारत की बात सुनाता हूँ” ने भी देश को पश्चिमी सभ्यता से हटकर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी.इसीतरह जब देश नवनिर्माण के दौर से गुजर रहा था और आम लोग कंधे-से कंधा मिलाकर देश को बनाने में जुटे थे तब फिल्म ‘नया दौर’ का गीत “साथी हाथ बढ़ाना ,एक अकेला थक जाए तो मिलकर बोझ उठाना” देश की आवाज़ बन गया था.
            इसके अलावा फिल्म नाम के गीत “चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है”, फिल्म परदेश के गीत “ये मेरा इंडिया...”,लताजी की आवाज़ में अमर गीत “जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी” आज भी हमारी आँखों में पानी ला देते है. यदि आपकी स्मृति में भी ऐसे ही कुछ प्रतिनिधित्व गीत हैं तो उन्हें इस लड़ी में पिरोने में सहयोग कीजिये क्योंकि एक-एक मोती से ही तो सुरों की यह माला पूरी होगी और हम मिलजुलकर इस प्रतिनिधि गीतों को एक बार फिर याद कर पाएंगे....

सोमवार, 12 जुलाई 2010

रसोई और बिस्तर के अलावा भी है औरत

स्त्री पर पुरातन काल से कवियों की कूची चलती रही है.हर कवि/कवियत्री ने स्त्री को अपनी-अपनी आँखों से देखा है और बदलते काल और दौर के साथ स्त्रियों को लेकर अभिव्यक्तियाँ बदलती रही हैं.शायद इसलिए हमें विभिन्न समयों में स्त्री को विविध कोणों से समझने का अवसर मिलता है.पिछले दिनों कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति,बंगलुरु के तत्वावधान में 'समकालीन महिला लेखन' पर एक संगोष्ठी का आयोजन हुआ.इसमें कई जानी-मानी वक्ताओं ने अपने विषय केन्द्रित संबोधनों में स्त्रियों से जुडी अनेक कविताओं/क्षणिकाओं का उल्लेख किया. मैंने कुछ चुनिन्दा कविताओं को आपके लिए बटोरने का प्रयास किया है.जो बदलती स्त्री से रूबरू कराती हैं. खास बात यह है कि ये महिलाएं "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी "वाली परिपाटी से हटकर सोचती हैं.

प्रज्ञा रावत कहती हैं-

जितना सताओगे उतना उठुगीं

जितना दबाओगे उतना उगुगीं

जितना बाँधोगे उतना बहूंगी

जितना बंद करोगे उतना गाऊँगी

जितना अपमान करोगे उतनी निडर हो जाउंगी

जितना सम्मान करोगे उतनी निखर जाउंगी

वहीँ निर्मला पुतुल पूछती हैं-

क्या तुम जानते हो

एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण ?

बता सकते हो तुम

एक स्त्री को स्त्री द्रष्टि से देखते

उसके स्त्रीत्व की परिभाषा ?

अगर नहीं

तो फिर जानते क्या हो तुम

रसोई और बिस्तर के गणित से परे

एक स्त्री के बारे में....?

उधर सविता सिंह ज़माने पर राय रखती हैं-

यह बहुत चालाक सभ्यता है

यहाँ चिड़ियाँ को दाने डाले जाते हैं

यहाँ बलात्कृत स्त्री

अदालत में पुन: एक बार कपडे उतारती है

इस सभ्यता के पास

स्त्री को कोख में ही मार देने की पूरी गारंटी है...

एक समकालीन कवियत्री का कहना है-

ओढ़ता,बिछाता,और भोगता

शरीर को जीता पुरुष

शरीर के अतिरिक्त

कुछ भी नहीं होता

उसका प्यार-दुलार,मनुहार

सभी कुछ शरीर की परिधि से

बंधा होता है...

लेकिन औरत, शरीर के बाहर भी

बहुत कुछ होती है...

वहीँ अमिता शर्मा कहती हैं-

सही है तुम्हारा लौटना

सही है मेरा लौटना

और सबसे सही है

हमारा अलग-अलग लौटना...

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

कब बदलेगा ‘पाल’ और ‘हीरामन तोते’ का फर्क


एक बार स्वामी विवेकानंद को नाराज़ करने के लिए एक विदेशी ने पूछा कि यूरोप के लोग दूध की तरह सफ़ेद हैं तो अफ्रीका के लोग कोयले की तरह काले,फिर इंडिया के लोग क्यों आधे-अधूरे रह गए हैं?इसपर विवेकानंद ने उससे पूछा कि तुमने कभी रोटी को बनते देखा है?जब रोटी सफ़ेद रह जाती है तो उसे कच्चा माना जाता है और हम उसे नहीं खाते.इसीतरह जब रोटी जलकर काली हो जाती है तो उसे भी नहीं खाया जाता लेकिन जो रोटी ठीक ठाक चिट लगी होती है तो उसको सभी चाव के साथ खाते हैं.दरअसल हम भारतीय लोग इस बीच वाली रोटी की तरह हैं बिलकुल संतुलित.....अब दुःख की बात यह है कि स्वामी विवेकानंद जैसे तमाम विद्वान चाहकर भी विदेशियों के दिमाग में हम भारतियों को लेकर बने भेदभाव को नहीं मिटा पाए.यही कारण है कि यदि यूरोप का एक ऑक्टोपस विश्व कप फुटबाल की भविष्वाणी करता है तो दुनिया भर का मीडिया और सेलिब्रिटी उसके मुरीद हो जाते हैं जबकि यही काम हमारा हीरामन तोता सदियों से कर रहा है तो उसे पोंगा-पंडित,रुढिवादिता और पोंगापंथी जैसे तमाम विशेषणों से नवाज़ा जाता है.यहाँ तक कि आज भी वे भारत को तांत्रिकों ,बाबा-बैरागियों और गंवारों का देश मानते हैं.क्या फुटबाल जैसा सूझ-बुझ और परिश्रम से भरे खेल को एक ऑक्टोपस के सहारे जीता जा सकता है?यदि नहीं तो फिर जर्मनी के लोग उस ऑक्टोपस को कच्चा खा जाने कि बात क्यों कर रहे हैं जिसने जर्मनी की हार की भविष्यवाणी कर दी थी?वहीँ स्पेन के लोग इसे अपना भगवान तक मानने लगे हैं.
विडम्बना तो यह है कि हमारे हीरामन की भविष्यवाणियों पर नाक –मुंह सिकोड़ने वाली देशी हस्तियाँ भी ऑक्टोपस के गुणगान कर रही हैं.महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर फरहा खान,अभिषेक,लारा दत्ता मंदिरा बेदी ने इसकी तारीफ के कशीदे काढ दिए हैं.तो क्या हम आज भी गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं? ....यदि ऐसा नहीं होता तो आज भी आकर्षक हीरामन तोते और आठ टांगों वाले बदसूरत ऑक्टोपस के बीच यह फर्क नहीं नज़र आता.
अनुरोध:मेरी बात का कतई यह मतलब न निकला जाए कि मैं तोते,बिल्ली या ऑक्टोपस के ज्योतिष का समर्थक हूँ.मेरा मानना है कि पशु-पक्षियों का इन फालतू के कामों में इस्तेमाल होना ही नहीं चाहिए.

बुधवार, 7 जुलाई 2010

धोनी के घोड़े से एक्सक्लूसिव बातचीत

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के विवाह ने मीडिया जगत में हडकंप मचा दिया है.पत्रकारों और बाईट वीरों(इलेक्ट्रानिक मीडिया) को लग रहा है कि इतना बड़ा स्कूप उनसे छूट कैसे गया?टेस्ट से लेकर वनडे और २०-२० तक में धोनी का धमाल तो समझ में आता है पर शादी में भी उनका खेल दिखाना मीडिया को हजम नहीं हो रहा है.न्यूज़ चैनलों में होड़ मची है कि कौन धोनी के बारे में अन्दर तक की खबरें निकाल पाता है.इसलिए कोई अभिनेत्री विपाशा बासु के घर शादी का जश्न मनवा रहा है तो कोई नृत्य निर्देशक फरहा खान को शादी में भेज रहा है? ये बिचारे रोज इस बात से इन्कार कर रहे है. ऐसे ही एक बाईट वीर 'एक्सक्लूसिव' के चक्कर में उस घोड़े तक पहुँच गए जिसपर बैठकर धोनी ने विवाह रचाया था(हालाँकि कई पत्रकार घोड़े को नकली बता रहे हैं उनका कहना है कि असली घोडा तो विवाह के बाद से घोडा बिरादरी को छोड़कर गायब है.) बाईटवीर ने घोड़े वाले की बजाय सीधे घोड़े से बात कर उसकी पहली प्रतिक्रिया अपने चैनल पर चलाने और उसकी फीलिंग जानने का फैसला किया.पेश हैं बाईट वीर और घोड़े के बीच सवाल-जवाब:
बाईट वीर:कैसा लग रहा है धोनी को अपने ऊपर बिठाकर?
घोडा महज सर हिला देता है...
बाईट वीर उत्साह से चिल्लाकर-देखिये घोडा कितना खुश है ...हम अपने दर्शकों को बताना चाहेंगे कि घोड़े की एक्सक्लूसिव तस्वीरें और उसकी प्रतिक्रिया केवल आप हमारे चैनल पर ही देख पा रहे हैं.
बाईट वीर:धोनी का वजन कितना था?भारी तो नहीं लगा?
घोड़े ने फिर सर हिलाया...
बाईट वीर:घोड़े के चेहरे के भाव साफ़ बता रहे हैं कि धोनी उसे भारी लगे फिर भी वह उन्हें बिठकर खुश है.आखिर ये मौका कितने घोड़ों के जीवन में आता है?
बाईट वीर:बस आखिरी सवाल! धोनी ने आपको कहाँ से पकड़ा था?
घोडा सर झुका लगा लेता है...
बाईट वीर: अच्छा सर से पकड़ा था?मैं अपने कैमरा मेन से अनुरोध करूँगा कि वह दर्शकों को घोड़े की गर्दन और सर करीब से दिखाए...देखिये सिर्फ हमारे चैनल पर कि धोनी के हाथ यहाँ थे.अभी भी उस दिन के निशान साफ़ नज़र आ रहे हैं.
बाईट वीर: अच्छा साक्षी रावत उस दिन कैसी लग रही थी? अच्छा ये बताइए आपको साक्षी कैसी लगी? उस दिन उनका मेकअप कैसा था?
घोडा फिर सर हिलाता है....
बाईट वीर:देखिये धोनी ने घोड़े तक को कुछ भी बताने से रोक रखा है इसलिए वो साक्षी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता. फिर भी हमसे इस एक्सक्लूसिव बातचीत के लिए शुक्रिया...
इसके पहले कि बाईट वीर ऐसे ही किसी अन्य को पकड़कर फिर कोई ताज़ा जानकारी देता हमारे घर कि लाईट चली गयी और पूरे परिवार ने राहत की साँस ली....

शनिवार, 3 जुलाई 2010

हमारी जान लेने के नए-नए तरीके -भाग दो

कल मैंने इसी विषय पर एक पोस्ट डाला था,लेकिन हमारे मिलावटी भाइयों की धरपकड़ और हमारे स्वास्थ्य की रक्षा के लिए काम कर रहे स्वयंसेवी संगठनों की सक्रियता के कारण मैं अपनी ही पोस्ट का भाग-दो लिखने के लिए मज़बूर हो गया. मूल उद्देश्य तो हमेशा की तरह अपने ब्लॉगर साथियों को समाज में मौजूद ख़तरों से रूबरू करना है. वैसे देश में इन दिनों 'सिक्वल' बनाने का फैशन चल रहा है. 'गोलमाल' से लेकर 'डोन' तक के दूसरे और तीसरे भाग बन चुके हैं तो फिर ब्लॉग का दूसरा भाग लिखने में क्या बुराई है. खैर अब मुद्दे की बात-दरअसल कल अपना पोस्ट लिखने के बाद जब टीवी पर न्यूज़ चैनल देखे तो पता चला कि पोस्ट में कई ताज़ा जानकारियां डालने से चूक गया इसलिए उस कमी को भाग-दो के जरिये दूर कर रहा हूँ. किसी भी सूरत में पैसा कमाने की भूख ने आदमी को इतना अँधा बना दिया है कि वह यह भी भूल गया है कि जो गड्ढा वह दूसरों के लिए खोद रहा है उसमें उसके अपने भी गिर सकते हैं! दिल्ली में पकड़ा गया नकली कोल्ड ड्रिंक्स बनाने का कारखाना हो या रासायनिक मिलावट के साथ बन रहे सस्ते जेवर,क्या इन्हें बनाने वालों के अपने लोग/परिजन/पत्नी/माँ/बहन/बच्चे नहीं पी सकते या नहीं पहन सकते? इस कारखाने में कई नामी शीतल पेय बनाने वाली कम्पनियों के नकली उत्पाद बनते थे,जिन्हें हम या हमारा परिवार इंडिया गेट पर धड़ल्ले से पीता है जबकि इनसे किडनी को नुकसान पहुँचता है,दांत में पायरिया, हड्डियाँ कमज़ोर होना,मोटापा बढ़ना और ब्लड सेल ख़त्म होने का खतरा होता है. इनमें मिलाये जा रहे गंदे पानी से पेट की बीमारियाँ हो सकती हैं.
इसीतरह माँ-बहनों की सुन्दरता में चार चाँद लगाने वाले गहने उन्हें गंभीर रूप से बीमार बना सकते हैं. "टॉक्सिक लिंक" नामक एक स्वयंसेवी संगठन के मुताबिक देश में बिकने वाली कृत्रिम ज्वेलरी में लेड जैसा घातक रसायन मिला होता है. कई आभूषणों में तो इसकी मात्रा मानक दर से हज़ार गुना तक ज्यादा पाई गई है. यदि इस ज्वेलरी को ज़रा सी देर भी मुंह में डाल लिया गया तो समझो आपकी शामत आ गई, जबकि हमारे घरों में जेवर मुंह में डालना सामान्य सी बात है.लेड इतना खतरनाक है कि दुनिया भर में इसके इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध है.खास बात यह है कि ये आभूषण दिल्ली के मशहूर बाज़ारों से लेकर ही यह जाँच की गई थी.लेड का इस्तेमाल पागल तक बना सकता है. इसके अलावा याददाश्त कम होना,पेट की बीमारियाँ,त्वचा में संक्रमण तो सामान्य बात है.इसलिए अगली बार जब भी बाज़ार जाएँ तो यह ज़रूर सुनिश्चित कर ले कि जो कोल्ड ड्रिंक्स पी रहे हैं वह नकली और सौन्दर्य बढ़ाने वाले जेवर घातक तो नहीं हैं?

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

हमारी जान लेने के नए-नए तरीके...

आप भले ही सुबह पांच बजे से उठकर पार्क के कई चक्कर लगते हों या फिर बाबा रामदेव के कहने पर सुबह से शाम तक कपालभाती और अनुलोम-विलोम करते हुए बिताते हों या फिर किसी जिम में जाकर घंटों पसीना बहाते हों लेकिन इन तमाम कोशिशों का आपको उतना फायदा नहीं मिल पायेगा जितना कि आप मानकर चल रहे हैं. मेरे कहने का कतई यह मतलब मत निकालिए कि बाबा रामदेव के योग में या आपके जिम में कोई कमी है और न ही आपका यह मेहनत करना बुरा है बल्कि यह कह सकते हैं कि योग,कसरत,सैर और ऐसे सभी प्रयासों से आप अपने आप को कुछ समय तक स्वस्थ और जिंदा रख सकते हैं क्योंकि बाज़ार में इन दिनों चल रहे कारनामों से तो यही लगता है कि हमारी जान लेने के नए-नए तरीके तलाशे जा रहे हैं. अभी आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा होगा परन्तु जैसे-जैसे आप आगे पढ़ते जायेंगे आपका इस बात पर विश्वास बढ़ता जायेगा कि हमारी जान कितनी फालतू हो गई है और मुनाफ़ा कमाना कितना ज़रुरी..?
हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि टमाटर सूप के नाम पर लोगों को ज़हर दिया जा रहा है। क़न्ज्यूमर एजूकेशन एंड रिसर्च सोसायटी ने हाल ही में छह नामी ब्रांड वाले टोमेटो सूप के 11 नमूनों की जाँच की और पाया कि एक भी ब्रांड में टमाटर जैसी कोई प्राकृतिक चीज नहीं है। जिस नमूने में सबसे अधिक टमाटर की मात्रा पाई गई, उसमें भी महज 10 फीसद टमाटर था। शेष रासायनिक मिलावट थी। अध्ययन में पाया गया कि कंपनियों ने टमाटर के स्थान पर सोडियम और शहद का इस्तेमाल किया है। इसके अलावा सूप को टमाटर की तरह लाल रंग देने के लिए लिकोपेन मिलाया जा रहा है। आप में से अधिकतर लोग जानते होंगे कि लिकोपेन एक एंटीऑक्सिडेंट है। इस अध्ययन से जुड़े लोगों के मुताबिक दिन भर में सात से आठ मिलीग्राम लिकोपेन का सेवन तक घातक हो सकता है।वहीँ ब्रिटेन की यूके फ़ूड स्टेंडर्ड एजेंसी के अनुसार किसी भी पेय पदार्थ में प्रति 100 ग्राम सोडियम की मात्रा 300 से 600 मिलीग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। लेकिन भारत में धड़ल्ले से बेचे जा रहे इन टमाटर सूप में प्रति 100 ग्राम में निर्धारित मात्र से कई गुना ज्यादा तक सोडियम पाया गया है। सोचिये जिस सूप को आप अपनी और अपने बच्चों की सेहत के लिए फायदेमंद मानकर पीते-पिलाते हैं वह कितना खतरनाक हो सकता है। बात सूप की नहीं, बल्कि विश्वास की है क्योंकि किसी भी कंपनी ने यह बताने कि जहमत नहीं उठाई कि वह टमाटर के नाम पर उसका रंग भर दे रही है और उसका सेहत से कई लेना-देना नहीं है? क्या भारत के अलावा किसी यूरोपियन देश में कोई कंपनी खुलेआम इसतरह लोगों की सेहत के साथ खेल सकती है?हमारे तो आम और यहाँ तक की कपड़ों तक को वहाँ बेचने से रोक दिया जाता है किसी अद्रश्य कीटाणु के नाम पर. खैर दूसरों को कोसने से क्या फायदा! हमारी तो रग-रग में मिलावट घुस गई है इसलिए ये सूप हमारा क्या बिगाड़ लेगा?...और सूप ही क्या अपने देश में तो घी चर्बी से,दूध यूरिया जैसे रसायनों से,पनीर सिंथेटिक सामग्री से,घर-घर में लोकप्रिय चाय लाल रंग से बन रही है और धड़ल्ले से बिक रही है. यही नहीं जानवरों का दूध बढ़ाने के काम आने वाला ओक्सिटोसिन से लौकी जैसी सेहतमंद सब्ज़ी का आकर बढाया जा रहा है. स्वास्थ्य के लिए जरुरी फल पकाने के लिए खतरनाक रसायन इस्तेमाल हो रहे हैं.अदरक और सेब को चमकाने के लिए एसिड तक का खुलेआम उपयोग आम बात है. मसालों में घोड़े की लीद,गेरू,मिट्टी और सस्ते रंग मिल रहे हैं.जब हम इन सब को सालों से खाते हुए भी सेहतमंद हैं तो फिर इस सूप की क्या औकात...?

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