शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

छी,हम इंसान हैं या हाड़-मांस से बनी मशीनें


हम कैसे समाज में जी रहे हैं?यह इन्सानों की बस्ती है या फिर हाड़-मांस की बनी मशीनों का संसार! यदि समाज में मानवीय सरोकार न हों,मतलबपरस्ती बैखोफ पसरी हो और एक-दूसरे के प्रति संवेदनाएं दम तोड़ चुकी हों तो फिर उसे मानवीय समाज कैसे माना जा सकता है.इंसान तो इंसान जानवर भी किसी अपने की आवाज़ सुनकर उसमें सुर मिलाने लगते हैं,कुत्ते एक दूसरे की रक्षा में दौड़ने लगते हैं और कम ताक़तवर परिंदे भी अपने साथी पर ख़तरा भांपते ही चीत्कार करने लगते हैं और हम महानगरीय सांचे में सर्व-संसाधन प्राप्त लोग अपने से इतर सोचने की कल्पना भी नहीं करते.तभी तो दिल्ली जैसे जीवंत और मीडिया की चौकस नज़रों से घिरे महानगर में दो जीती-जागती,नौकरीपेशा और पारिवारिक युवतियां हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो जाती हैं और हमारे कानों पर जूं भी नहीं रेंगती.वे छह माह तक अपने घर में कैदियों की रहती हैं पर पड़ोसियों को तनिक भी चिंता नहीं होती, उनका अपना सगा भाई उन बहनों की सुध लेना भी गंवारा नहीं समझता जिन्होंने उसको अपने पैरों पर खडा करने के लिए खुद का जीवन होम कर दिया.
                        समाज में आ रही जड़ता की यही एक बानगी भर नहीं है.आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आ रही है जिनसे पता लगता है कि हम कितने असंवेदनशील होते जा रहे हैं. इंसानी जमीर मर जाने का इससे बदतर उदाहरण क्या होगा कि एक युवती के साथ पिता समान पुरुष बलात्कार का प्रयास करता है और जब वह अपनी इज्ज़त बचाने और मदद के लिए भागती है तो लोग रक्षक बनने की बजाए खुद ही भक्षक बनकर बलात्कार करने लगते हैं.तो क्या अब इंसानियत खत्म हो गयी है?हमारे लिए अपने-पराये का अंतर पुरुष-महिला जिस्म बनकर रह गया है?बहन,बेटी,माँ-बाप,भाई,नाते-रिश्तेदार और पड़ोस जैसे तमाम सम्बन्ध भावनाओं को भूलकर शरीर बन गए हैं और हर व्यक्ति को बस शिकार की तलाश है फिर चाहे वह शिकार कोई अपना हो या पराया!
                              हमारा मिज़ाज कितना मशीनी हो गया है इसका एक और उदाहरण पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में देखने को मिला. संवेदनाहीन नियम-कानूनों का मारा एक परिवार सिर्फ इसलिए सामूहिक रूप से ज़हर खाकर आत्महत्या कर लेता है कि हमारा ‘सिस्टम’ उन्हें चंद दिन गुजारने के लिए एक अदद छत तक मुहैया नहीं करा सका.ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने चोरी-छिपे यह दुस्साहसिक कदम उठाया हो,लेकिन यांत्रिक सोच के कारण कोई उनका दर्द समझ ही नहीं सका और सार्वजनिक ऐलान के बाद भी न तो सरकार ने और न ही सामाजिक संगठनों ने उस परिवार को बचाने का कोई प्रयास किया.हाँ सामूहिक मौत के बाद अब ज़रूर अखबार संवेदनाओं से रंग गए हैं और सरकार घड़ियाली पश्चाताप से.कुछ यही हाल लुटेरों का शिकार होकर अपना एक पैर गंवाने वाली राष्ट्रीय खिलाड़ी अरुणिमा सोनू सिन्हा के मामले में देखने को मिला.न तो ठसाठस भरी ट्रेन में कोई उसकी मदद के लिए आया और न ही पटरी पर मरणासन्न पड़ी सोनू को अस्पताल ले जाने की जहमत किसी ने उठाई. क्या ये चंद मामले पूरी मानवता को कलंकित नहीं करते?मानव के मशीन में बदलने,हमारी बेखबरी,घर की चारदीवारी तक सिमट गयी चिंताओं,मरती संवेदनाओं और दरकते रिश्तों की घोषणा नहीं करते? दुनिया भर में अपने संस्कारों,सार्थक चिंतन और गहरे तक पैठी मानवीय परम्पराओं के लिए सराहा जाने वाला भारतीय समाज अब नोट छापने और दूसरे की छाती पर पैर रखकर सफलता हासिल करने की भेड़ चाल में लगा है जहाँ “पैसा संस्कार है,सुविधाएँ नाते-रिश्ते और सफलता जीवन”, फिर इसके लिए अपनों को ही कुर्बान क्यों न करना पड़े.











गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

समाज में फैले इन ‘सुपरबगों’ से कैसे बचेंगे...!


                     इन दिनों सुपरबग ने अखबारी चर्चा में समाजसेवी अन्ना हजारे और घोटालेबाज़ राजा तक को पीछे छोड़ दिया है.सब लोग ‘ईलू-ईलू क्या है...’ की तर्ज़ पर पूछ रहे हैं ‘ये सुपरबग-सुपरबग क्या है?...और यह सुपरबग भी अपनी कथित पापुलर्टी पर ऐसे इठला रहा है जैसे सुपरफ्लाप ‘गुज़ारिश’ हिट हो गयी हो या सरकार ने सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न से भी आगे बढ़कर ‘दुनिया रत्न’ से सम्मानित कर दिया हो.वैसे भारत के स्वास्थ्य पर्यटन या हेल्थ टूरिज्म से जलने वाले देश सुपरबग के डर को फैलाकर वैसे ही आनंदित हो रहे हैं जैसे किसान अपने लहलहाते खेत देखकर,नेता अपना वोट बैंक देखकर और व्यवसायी काले धन का भण्डार देखकर खुश होता है.इस (दुष्)प्रचार से एक बात तो साफ़ हो गयी है कि किसी भी शब्द के आगे ‘सुपर’ लगा दिया जाए तो वह हिट हो जाता है जैसे सुपरस्टार,सुपरहिट,सुपरकंप्यूटर,सुपरफास्ट,सुपरनेचुरल और सुपरबग इत्यादि. मुझे तो लगता है कि विदेशियों ने जान-बूझकर इसका नाम सुपरबग रखा है ताकि यह कुछ इम्प्रेसिव सा लगे.आखिर सुपरबग कहने/सुनने में जो मजा है वह केवल ‘बग’ में कहाँ!ऐसे समय हमें एक बार फिर अपने एक पूर्व प्रधानमंत्री याद आने लगे हैं जो हर मामले में विदेशी हाथ होने की बात करते थे.यदि वे आज होते तो दम के साथ कह पाते कि सुपरबग मामले में विदेशी हाथ है और यह बात उतनी ही सही है जितना कि काले धन के खिलाफ बाबा रामदेव का अभियान और माडल मोनिका पांडे का ‘न्यूड’ होने का एलान.
                            एक बात मेरी समझ के परे है कि इस सुपरबग को लेकर इतनी घबराहट क्यों?अरे हमारे देश के पानी का स्वाद ऐसे कई बग बरसों से बढ़ा रहे हैं...और फिर पानी तो क्या हमारी तो आवोहवा में ऐसे बगों की भरमार है.इनसे भी बच गए तो भ्रष्टाचार के सुपरबग से कैसे बचेंगे? यह सुपरबग तो देश के हर कार्यालय,मंत्रालय,सचिवालय और तमाम प्रकार के ‘लयों’ में मज़बूती से जड़े जमाये बैठा है और हर आमो-खास के भीतर घुसपैठ करता जा रहा है.इस से किसी तरह बच भी गए तो काले धन के सुपरबग से कैसे बचेंगे.यह तो दिन-प्रतिदिन अपना भार और संख्या बढ़ा रहा है.अब तो यह दूसरे मुल्कों में भी तेज़ी से ‘जमा’ होने लगा है.दशकों के परिश्रम के बाद भी हम महंगाई के सुपरबग का इलाज नहीं तलाश पायें हैं.अब तो यह गरीबों के साथ-साथ अन्य वर्गों का भी खून चूसने लगा है.इस सुपरबग की एक विशेषता यह है कि यह अपनी खुराक सरकारी बयानों से हासिल करता है.जब-जब भी हमारे नेता/मंत्री/सन्तरी और प्रधानमंत्री इस पर काबू पा लेने का बयान देते हैं महंगाई नामक यह सुपरबग और भी सेहतमंद हो जाता है.कई बार तो यह नमक,प्याज,टमाटर और दाल जैसी रोजमर्रा में भरपूर मात्रा में उपलब्ध वस्तुओं को संक्रमित कर उन्हें भी आम आदमी की पहुँच से बाहर कर देता है.कन्या भ्रूण ह्त्या और बेटियों को पैदा नहीं होने देने वाला सुपरबग तो भविष्य में महिला-पुरुष का अंतर ही बिगाड़ने पर तुला है और देश के कुंवारों को शायद विवाह-सुख से ही वंचित कर देगा.इस सुपरबग को निरक्षरता,अन्धविश्वास,कुरीतियों और रुढियों के सुपरबगों ने इतना शक्तिशाली बना दिया है कि हम चाहकर भी इसका समूल नाश नहीं कर पा रहे हैं.इसके अलावा जातिवाद,साम्प्रदायिकता,ऊंच-नीच,भेदभाव,बाल विवाह,अशिक्षा,बेरोज़गारी,प्रतिभाओं का पलायन,गरीबी,छुआछूत जैसे अनेक सुपरबग वर्षों से हमारी जड़ों को खोखला बना रहे हैं और हम पानी में मौजूद एक अदने से सुपरबग से घबरा रहे हैं.अरे जब हमारी रग-रग में व्याप्त ये घातक सुपरबग हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाए तो इस नए नवेले एवं अनजान से सुपरबग की क्या बिसात...!



बुधवार, 6 अप्रैल 2011

आज ‘भारत रत्न’ तो कल शायद ‘परमवीर चक्र’ भी!



              सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न क्यों? उनसे पहले प्रख्यात समाजसेवी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने वाले अन्ना हजारे को क्यों नहीं? देश में चुनाव सुधारों की नीव रखने वाले टी एन शेषन,योग के जरिए देश-विदेश में भारत का डंका पीटने वाले स्वामी रामदेव, बांसुरी की सुरीली तान से मन मोह लेने वाले पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, अभिनय और फिल्मों से भारतीय सिनेमा की दशा और दिशा तय करने वाले मशहूर अभिनेता राज कपूर-गुरुदत्त, अपनी लेखनी से प्रेम और आग एकसाथ बरसाने वाले गीतकार गुलज़ार,आईटी के क्षेत्र में क्रांति लाकर लाखों नौजवानों को सम्मानजनक दर्ज़ा दिलाने वाले उद्योगपति नारायण मूर्ति-अज़ीम एच प्रेमजी, देश के लिए सर्वत्र न्योछावर कर देने वाले शहीद भगत सिंह-चंद्रशेखर आज़ाद, दुनिया भर में ज्ञान और चेतना का पर्याय स्वामी विवेकानंद,पुलिस से लेकर समाजसेवा तक में सबसे आगे किरण बेदी, विविध स्वरों की सम्राज्ञी आशा भोंसले जैसे तमाम ऐसे नाम हैं जो न केवल इस सम्मान के हक़दार हैं बल्कि इस सम्मान को और भी गौरवान्वित करने का माद्दा रखते हैं.लेकिन इन तमाम नामों के लिए कोई विधानसभा या कोई संगठन प्रस्ताव पारित नहीं कर रहा.
                         दरअसल मीडिया की ‘हल्ला ब्रिगेड’ को दिन भर न्यूज़ चैनलों पर बौद्धिक जुगाली करने के लिए कोई न कोई विषय या विवाद चाहिए.विश्व कप क्रिकेट के बाद बेस्वाद लग रहे न्यूज़ चैनलों पर टीआरपी की आग तापने के लिए उन्हें सचिन को भारत रत्न के रूप में एक नया मुद्दा हाथ लग गया है.आज वे भारत रत्न के नाम पर हो-हल्ला मचा रहे हैं.यदि सरकार दवाब में आ गयी(जिसकी संभावना लग रही है) तो कल शायद किसी क्रिकेटर को ‘परमवीर चक्र’ देने की मांग करने लगे? सचिन तेंदुलकर के नाम पर अपनी दुकान जमाने में लगे इन बाइट-वीरों और मौकापरस्त नेताओं को शायद यह भी नहीं पाता होगा कि भारत रत्न हमारे देश का वह सर्वोच्च नागरिक सम्मान है जो कला,विज्ञान और साहित्य के क्षेत्रों में असाधारण उपलब्धियों और सर्वोत्कृष्ट लोकसेवा के लिए दिया जाता है.इसकी शुरुआत २ जनवरी १९५४ से हुई और अब तक ४१ अतिविशिष्ट हस्तियों को यह सम्मान दिया जा चुका है उनमें से कोई भी खिलाड़ी नहीं है.
                               सर्वप्रथम तो खिलाड़ी इस सम्मान के दायरे में ही नहीं आते. हर क्षेत्र के लिए सरकार अलग-अलग सम्मान देती है मसलन खेलों के लिए राजीव गाँधी खेल रत्न है तो सर्वोच्च वीरता के लिए परमवीर चक्र.वैसे भी खेलों केनाम पर पहले ही अनेक पुरूस्कार है.आज यदि सचिन को भारत रत्न दिया गया तो कल कोई परमवीर चक्र भी मांग सकता है या कोई सैनिक भारत रत्न या खेल रत्न की मांग कर सकता है. फिर भी यदि सभी नियम-कानूनों को ताक पर रखकर यदि किसी खिलाड़ी को यह सम्मान दिया जाता है तो उड़न सिख मिल्खा सिंह ,पी टी ऊषा,पहली बार विश्व कप जीतने वाले कपिल देव,हाकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद,टेनिस की सनसनी लिएंडर पेस,बैडमिंटन की दिग्गज सायना नेहवाल या इसीतरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले किसी और खिलाडी से शुरुआत क्यों न की जाए? उसके बाद सचिन का भी नंबर आये. इसमें कोई शक नहीं है कि सचिन बेमिसाल हैं लेकिन देश ने भी उनके लिए पलक-पांवड़े बिछाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.वैसे भी सचिन हो या सहवाग या कोई और क्रिकेटर,उनके प्रदर्शन पर हम सरकारी खज़ाना खोल देते हैं.अभी विश्व कप जीतते ही उन पर नोटों,सुविधाओं और उपहारों की बरसात हो रही है.अब तक हर क्रिकेटर को करोड़ों रूपए अलग-अलग सरकारें बाँट चुकी हैं और जो पीछे छूट गई हैं वे भी आम जनता के खून-पसीने की कमाई को अपनी बपौती समझकर इन पर न्योछावर करने के बहाने तलाश रही हैं.मुद्दे की बात यह है कि हमारे क्रिकेटरों को क्रिकेट खेलने के लिए पहले ही अनुबंध के नाम पर अतुलनीय पैसा मिल रहा है और वे विज्ञापनों,आईपीएल के जरिए भी बेशुमार पैसा कूट रहे हैं सो अलग.
                          दरअसल खामी सचिन में नहीं बल्कि क्रिकेट में है.दर्जन भर से भी कम देशों का यह समय खपाऊ और कामचोरी को बढ़ावा देने वाला खेल अपने पैसों के बल पर दूसरे खेलों को बर्बाद कर रहा है.अब देश की नई पीढ़ी कबड्डी,कुश्ती,मुक्केबाज़ी,बास्केटबाल और फ़ुटबाल जैसे वैश्विक खेलों को छोड़कर क्रिकेट की तरफ भागने लगी है.यदि हम क्रिकेटरों को इसीतरह बढ़-चढ़कर महिमामंडित करते रहे तो ओलिंपिक और एशियाई खेलों के लिए हमें ढंग के खिलाड़ी तक नहीं मिलेंगे और १६१ करोड़ की आबादी में से आधे से ज्यादा लोग टीवी-रेडियो से चिपककर अपना और देश का कीमती समय इसीतरह व्यर्थ लुटाते नज़र आयेंगे.





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