शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

‘मुकुटधारी बहुरुपिया’....लेकिन है बड़े काम का

    अन्नानास का नाम लेते ही मुंह में पानी आ जाता है.अपने रसीले और अनूठे स्वाद के अलावा यह अनूठा फल पोषक तत्वों का भण्डार भी है. हम इसे बहुरुपिया और मुकुटधारी भी कह सकते हैं. दरअसल फल बनने से बाजार में बिक्री के लिए आने तक यह लगातार रंग बदलता रहता है और क्रमशः लाल,वैगनी ,हरा और फिर पीला रंग धारण करता है. वहीँ,पत्तों का शानदार मुकुट तो इसके सिर पर सदैव सजा ही रहता है.
    अन्नानास की बात हो और असम का उल्लेख न हो ऐसा हो ही नहीं सकता. बंगाली में अनारस, असमिया में माटी कठल और अंग्रेजी में पाइन एप्पल के नाम से विख्यात इस फल की इन दिनों असम और खासकर राज्य की बराक वैली में बहार आई हुई है. मैग्नीशियम ,पोटेशियम,विटामिन सहित कई उपयोगी तत्व भरपूर अन्नानास के ढेर जून-जुलाई और फिर अक्तूबर-दिसंबर तक यहाँ कि हर गली,बाज़ार और नुक्कड़ पर देखने को मिल सकते है.
   दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में जाकर भले ही इस रसीले फल के भाव आसमान छूने लगते हों परन्तु बराक वैली में यह बेभाव है. यह बात शायद कम ही लोग जानते होंगे कि बराक वैली में अन्नानास को अमूमन जोड़े में बेचा जाता है. वैसे तो पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्यों में पाइन एप्पल का भरपूर उत्पादन होता है परन्तु इसमें असम का योगदान काफी ज्यादा है. आंकड़ों के मुताबिक देश में अन्नानास के कुल उत्पादन में पूर्वोत्तर का योगदान 40 फीसदी है वही सिर्फ असम का योगदान 15 प्रतिशत से ज्यादा है. सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ पैदा होने वाला अधिकतर अन्नानास आर्गनिक होता है और उसमें किसी भी तरह की रासायनिक खादों की मिलावट नहीं होती इसलिए देश ही दुनियाभर में यहाँ के अन्नानास की ज़बरदस्त मांग है. कहते हैं कि लखीपुर के मार क्यूलिन इलाक़े का पाइन एप्पल ब्रिटेन से लेकर अमेरिका तक के प्रथम परिवारों की पहली पसंद है. इस तरह यह ‘फ्रूट डिप्लोमेसी’ में भी अहम भूमिका निभा रहा है. ‘मार क्यूलिन’ का अर्थ है - मार आदिवासियों का क्यूलिन यानी बड़ा गाँव. आज भी यहाँ के उत्पादन का अधिकतर हिस्सा विदेश भेज दिया जाता है. इस इलाक़े में तक़रीबन 20-25 किलोमीटर के दायरे में भरपूर अन्नानास होता है. वैसे असम के कछार, एनसी हिल्स, कर्बी आंगलोंग और नगांव में बहुतायत में अन्नानास का उत्पादन होता है.
  अन्नानास के बारे में एक रोचक तथ्य यह है कि यह शतायु है .एक बार अनानास का पौधा लगाने के बाद वह लगभग 70 से 100 साल तक बिना किसी अतिरिक्त खर्च और परिश्रम के पूरी मुस्तैदी के साथ वर्ष में दो बार फल देता रहता है. मतलब यदि एक बार यह फसल लगा ली तो फिर कई पुश्तें बिना किसी लागत के बस बैठकर खाएँगी. यही नहीं, इसका हर पौधा दूसरे नए पौधों को भी तैयार करता है.

   हम कह सकते हैं कि चाय उत्पादन के अलावा अन्नानास की असम की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका है. जानकारों का कहना है कि यदि राज्य में सरकारी और गैर सरकारी तौर पर अन्नानास उत्पादन को और बेहतर ढंग से प्रोत्साहित किया जाए तो कश्मीर के सेब और नागपुर के संतरों की तरह अन्नानास भी असम की न केवल पहचान बल्कि पर्यटन का प्रमुख आधार भी बन सकता है.

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

पैरों की जादूगर अर्थात ‘सॉकर क्वीन आफ रानी’

विश्व कप फ़ुटबाल का जुनून देश भर में साफ़ नज़र आ रहा है  तो फिर सुदूर पूर्वोत्तर में असम इससे अछूता कैसे रह सकता है. फ़ुटबाल का खुमार पूरे असम में समान रूप से छाया हुआ है. यहाँ बच्चों से लेकर बड़े तक फ़ुटबाल के रंग में रंग गए हैं. असल बात यह है कि लड़कियां भी इस मामले में पीछे नहीं है. अब तो वे कई लोगों की प्रेरणा का स्त्रोत बन गयी हैं.
गुवाहाटी के पास रानी क्षेत्र की लड़कियां अपनी लगन,निष्ठा और कुछ कर दिखाने की ललक के फलस्वरूप इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में हैं. अत्यधिक गरीब किसान और मजदूर परिवारों की इन लड़कियों के लिए फ़ुटबाल सिर्फ एक खेल न होकर अपनी ज़लालत भरी ज़िन्दगी से बाहर निकलने का एक माध्यम भी है. लड़कियों को उम्मीद है कि इस खेल से वे समाज में सम्मान हासिल कर सकती हैं और फिर इसके जरिए अपने बेहतर भविष्य की नींव रख सकती हैं. गर्मी,उमस और बरसात के बाद भी वे फ़ुटबाल खेलने के लिए अपने गाँव से प्रतिदिन कई किलोमीटर पैदल चलकर गुवाहाटी आती हैं. जो इस खेल के प्रति उनके समर्पण,ललक और जिजीविषा को साबित करता है. खास बात यह है कि वे स्कूल की पढाई और घर के काम-काज के बाद भी फ़ुटबाल के लिए समय निकाल लेती हैं. उनके गाँव की ख़राब स्थिति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां आज तक बिजली नहीं पहुंची लेकिन कहते हैं न ‘जहाँ चाह-वहां राह; इन लड़कियों ने इसे अपनी नई जिन्दगी का मूलमंत्र बना लिया और अपने गाँव से रोज गुवाहाटी आकर इस खेल के हुनर सीखने शुरू किए.उनके जोश को देखकर जाने-माने कोच हेम दास आगे आए और उन्होंने इन लड़कियों को उनकी मंजिल तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया.फ़ुटबाल के प्रति हेम दास का जुनून भी ऐसा है कि वे ‘घर फूंककर तमाशा देखने’ जैसे मुहावरे को चरितार्थ करते हैं. वे आमतौर पर अपनी जेब से पैसा खर्च कर इन लड़कियों को प्रशिक्षित करते हैं. यही नहीं, वे गाँव जाकर लड़कियों के परिजनों को समझाने में भी पीछे नहीं रहते ताकि इन ‘सॉकर क्वीन’ को अपने पैरों का जादू दिखने में कोई बाधा नहीं आए. इसी का नतीजा है फिल्म ‘सॉकर क्वीन आफ रानी’. इस फिल्म के जरिए गुरु-शिष्याओं की  मिली-जुली मेहनत को दर्शाया गया है जो छोटे परदे के माध्यम से जमकर सराहना बटोर रही है. दरअसल इन लड़कियों के खेल पर केन्द्रित 26 मिनट की इस फिल्म को राज्यसभा टीवी ने आधुनिक भारत की विकासात्मक और प्रेरणात्मक कहानियां श्रृंखला के तहत प्रसारित किया. फिल्म के प्रसारण के बाद तो ये लड़कियां वास्तव में सॉकर क्वीन बन गयी हैं और उन्हें सरकारी और निजी क्षेत्रों से आर्थिक मदद की उम्मीद भी जगी है. वैसे भी यह फिल्म पूर्वोत्तर भारत में फ़ुटबाल की लोकप्रियता को भी प्रदर्शित करती है क्योंकि यहाँ फुटबाल शौक भी है, जोश भी और पेशा भी.


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