बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

राष्ट्रीय राजमार्ग-44: जिस पर आप कर सकते हैं धान की खेती..!!!


  क्या आप सोच सकते हैं कि देश में कोई राष्ट्रीय राजमार्ग ऐसा भी हो सकता है जहाँ सड़क पर बकायदा धान बोई जा सकती है और जहाँ वाहनों को निकालने के लिए हाथियों की मदद ली जाती है. यदि आप इसे व्यंग्य के तौर पर पढ़-समझ रहे हैं क्योंकि राष्ट्रीय राजमार्ग का नाम लेते ही दिमाग में दिल्ली-चंडीगढ़ या दिल्ली-जयपुर जैसी किसी चमचमाती सड़कों की तस्वीर उभर आती है तो यह स्पष्ट कर दें कि यह न केवल सौ टका सच है बल्कि वास्तविक हालात इससे भी बदतर है. फिर भी यदि आपको भरोसा नहीं हो रहा हो तो एक बार असम को त्रिपुरा से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-44 का जायजा ले लीजिए क्योंकि इसे देखने के बाद या तो राष्ट्रीय राजमार्ग को लेकर आपकी परिभाषा बदल जाएगी या फिर आप भविष्य में इस सड़क पर आने का सपना भी नहीं देखेंगे.
राष्ट्रीय राजमार्ग-44 लगभग 630 किमी लम्बा है जो मेघालय की राजधानी शिलांग से शुरू होकर असम होते हुए त्रिपुरा जाता है और यही एकमात्र राजमार्ग है जो त्रिपुरा को पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों से जोड़ता है. मेघालय और त्रिपुरा के हिस्से में आई सड़क तो कुछ ठीक है परन्तु असम से गुजरने वाली सड़क बद से बदतर स्थिति में है. आलम यह है कि असम के करीमगंज ज़िले के लोगों ने इस राष्ट्रीय सड़क को सुधारने की मांग को लेकर 36 घंटे तक राजमार्ग बंद रखा, त्रिपुरा के परिवहन मंत्री भी सदल-बल धरने पर बैठे और यहाँ तक की ट्रक चालकों ने इस मार्ग पर ट्रक चलाने से भी इनकार कर दिया है परन्तु सड़क आज भी ज्यों की त्यों है और शायद आगे भी ऐसे ही बनी रहेगी. त्रिपुरा में अत्यावश्यक सामग्री पहुंचाने का एक मात्र रास्ता होने के कारण इस राजमार्ग पर प्रतिदिन 500 से 600 वाहन फंसे रहते हैं. इस पर भी यदि आमतौर पर पूर्वोत्तर पर मेहरबान इन्द्रदेव ने थोड़ा ज्यादा स्नेह दिखा दिया तो यहाँ फंसे वाहनों की संख्या हजार तक पहुँच जाती है और फिर धान के खेत में बदल चुकी इस सड़क पर इतनी ज्यादा कीचड़ हो जाती है कि कीचड़ में फंसे ट्रकों को हाथियों की सहायता से खींचकर बाहर निकालना पड़ता है. अनेक बार तो हाथियों की ताक़त भी यहाँ के गड्ढों और कीचड़ के सामने पराजित हो जाती है और फिर धूप निकलने तथा मिट्टी के सूखकर कठोर होने तक का इतंजार करना पड़ता है.
राजमार्ग की इस बदतरीन हालत के कारण पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति करने वाले टैंकरों ने तो हाथ खड़े कर लिए हैं. इसके परिणामस्वरूप त्रिपुरा सरकार को पेट्रोलियम पदार्थों की राशनिंग करनी पड़ी है,वहीँ कालाबाजारी करने वाले मौके का फायदा उठाकर पेट्रोल-डीजल को सोने के भाव बेच रहे हैं.रसोई गैस का भी यही हाल है. कुछ यही स्थिति रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली खाने-पीने की वस्तुओं, सब्जियों और फलों की है. आपूर्ति लगभग ठप पड़ जाने से सब्जियों की कीमत फलों के बराबर हो गयी है और फल तो बस देखने की चीज बनकर रह गए हैं.

राष्ट्रीय राजमार्ग की बदहाली का सबसे बड़ा कारण है कि यह पूर्वोत्तर को जोड़ता है जहाँ सरकारों, मीडिया और समीक्षकों की नजर आमतौर पर नहीं जाती. दूसरा यहाँ अलग-अलग दलों की सरकारें हैं जो एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाती हैं मसलन असम में कांग्रेस है तो त्रिपुरा में वामपंथी सरकार है और केंद्र की सत्ता तो भाजपा के हाथ में है ही. केंद्र सरकार कहती है उसने अपनी तरफ से पैसा दे दिया इसलिए अब जिम्मेदारी राज्यों की है.वहीँ त्रिपुरा सरकार का कहना है कि असम तक ही इस राजमार्ग की यह दशा है क्योंकि त्रिपुरा में प्रवेश करते ही यह राजमार्ग देश के बाकी राजमार्गों जैसा ही व्यवस्थित हो जाता है, वहीँ असम केंद्र सरकार के सर ठीकरा फोड़ देता है. वैसे त्रिपुरा सरकार के तर्क में कुछ दम नजर आता है क्योंकि राजमार्ग की यह भयावह स्थिति असम में पाथारकांदी से चोराईबाड़ी के बीच ही सबसे ख़राब है. फिलहाल तो राजनीतिक दलों और सरकारों के घड़ियाली आंसूओं के बीच आम लोगों का धरना-प्रदर्शन एवं बंद जारी है लेकिन छः माह में भी जब सरकारों के कानों में जून नहीं रेंगी तो अब क्या फर्क पड़ जायेगा. बस अब तो मौसम से ही उम्मीद है क्योंकि बरसात ख़त्म होते ही कीचड़ धूल में बदल जाएगी. फिर वाहन चलाते समय भले ही आपको धूल के गुबार से गुजरना पड़े लेकिन कम से कम वाहन तो चलने लगेंगे और आम लोगों के लिए यही काफी है. 

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छी जानकारी दी है संजीव। स्थिति भयावह लगती है। मैंने पहाड़ों में बहुत पहले इस तरह की सड़कें देखी थी जहां बरसात में कीचड़ ही कीचड़ हो जाता था और पहिये धंस जाते थे। लेकिन अब वहां भी चमचमाती सड़कों की संख्या अधिक है। राजनीतिक दलों की आपसी खींचतान के कारण आम जनता पर पड़ने वाले प्रभाव का यह जीवंत उदाहरण है।

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