सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

हमारी चाय की चुस्कियों पर टिकी उनकी रोजी-रोटी


असम अपनी कड़क और तन-मन में ऊर्जा का संचार कर देने वाली चाय के लिए मशहूर है. राज्य में चाय बागान बेरोज़गारी को कम करने और राज्य की वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. यहाँ चाय उत्पादन में बराक घाटी के नाम से मशहूर दक्षिण असम की अहम भूमिका है. हाल ही में बराक घाटी में सेहत के अनुकूल पर्पल यानि बैंगनी चाय के उत्पादन की संभावनाए भी नजर आई हैं.
ऐतिहासिक रूप से नज़र डाले तो सुरमा घाटी और अब बराक घाटी के नाम से विख्यात दक्षिण असम के चाय बागानों का इतिहास सौ साल से भी ज्यादा पुराना है. यहाँ प्रतिकूल मौसमीय परिस्थितियों के बाद भी चाय उत्पादन में लगभग 3 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है और कछार चाय की कीमत में भी तुलनात्मक रूप से 8 फीसदी से ज्यादा का इज़ाफा हुआ है. जानकारों का कहना है कि यदि परिवहन,बिजली और संचार सुविधाएँ बेहतर हो जाएँ तो कछार चाय देश के कुल चाय उत्पादन में और भी ज्यादा योगदान दे सकती है. जिसका असर पूर्वोत्तर के विकास पर भी स्पष्ट नज़र आएगा.
वैसे,असम में कुल मिलाकर 70 हज़ार से ज्यादा छोटे-बड़े चाय बागान हैं और लाखों परिवारों की रोजी-रोटी इन बागानों के सहारे चल रही है. यही नहीं, राज्य की अर्थव्यवस्था में भी चाय बागानों का महत्वपूर्ण योगदान है इसलिए असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई चाय को स्टेट ड्रिंक अर्थात राजकीय पेय का दर्जा भी दे चुके हैं. हालाँकि बीते कुछ समय से प्रतिकूल मौसम,कम वर्षा और तकनीकी परेशानियों के कारण छोटे चाय बागानों को तमाम समस्याओं का सामना करना पड रहा है. इसके अलावा, तकनीकी प्रगति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने और प्रतिस्पर्धा में बने रहने में छोटे चाय बागानों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में भारतीय स्टेट बैंक की नई पहल उनके लिए राहत बनकर आई है.
 अब स्टेट बैंक ने छोटे चाय बागानों की वित्तीय परेशानियों को दूर करने के लिए आर्थिक सहायता देने की योजना बनायीं है. योजना के अंतर्गत बैंक पहले चरण में 3 हज़ार चाय बागानों को यह सहायता देगा. इसके लिए सौ करोड़ रुपए निर्धारित किये गए हैं. बताया जाता है कि चाय बागानों में स्थित स्टेट बैंक की शाखाएं जल्दी ही सर्वेक्षण का काम शुरू करेंगी और फिर इस सर्वे के आधार पर आर्थिक मदद प्रदान की जाएगी. बैंक के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक वित्तीय सहायता केवल उन्हीं चाय बागानों को दी जाएगी जो भारतीय चाय बोर्ड के मापदंडों पर खरे उतरेंगे.
बैंक असम के साथ साथ पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में स्थित चाय बागानों को भी इस योजना में शामिल करेगा. यही नहीं,स्टेट बैंक ने प्रधानमंत्री जन-धन योजना की तर्ज पर चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों के खाते खोलने की एक अन्य योजना पर भी काम शुरू किया है. इससे उनकी दिहाड़ी का भुगतान सीधे बैंक खाते के जरिये हो सकेगा.
प्रधानमंत्री द्वारा पूर्वोत्तर के विकास के लिए की जा रही पहल में हाथ बटाने के लिए स्टेट बैंक अब इस क्षेत्र के युवाओं को भी वित्तीय मदद के रास्ते तलाश रहा है. प्रारंभिक तौर पर पर्यटन के क्षेत्र में काम करने वाले युवाओं को आर्थिक मदद देकर प्रोत्साहित किया जाएगा ताकि क्षेत्र में पर्यटन विकास के साथ साथ बेरोज़गारी को भी दूर किया जा सके.


बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

पूर्वोत्तर में एक साल...समय का पता ही नहीं चला...!!!

आज सिलचर में एक साल हो गया. आज ही के दिन (11 फरवरी 2014) आकाशवाणी, सिलचर में अपना कार्यभार संभाला था. पता ही नहीं चला कैसे इतना वक्त बीत गया. अभी की ही तो बात लगती है जैसे चंद हफ्ते या महीने पहले यहाँ आना हुआ है. इस बारे में दोस्तों का कहना है कि जब काम में मन रम जाए या फिर मनपसंद काम करना हो तो समय कैसे गुजर जाता है इसका पता नहीं चलता. हो सकता है यह भी एक कारण हो या फिर अपनी घुमंतू प्रवृत्ति या फिर परिवार का साथ या फिर सिलचर के लोग,नए दोस्त,आकाशवाणी का स्टाफ,यहाँ का वातावरण....कुछ तो है जिसने सालभर एक अनजान शहर में,अपने घर और अपने जानने वालों से ढाई-तीन हजार किलोमीटर दूर रहने के बाद भी वक्त का अहसास ही नहीं होने दिया.
शायद पूर्वोत्तर के लोगों की सहजता,सरलता,अपनापन और मिलनसारिता ने घर की,अपनों की याद नहीं आने दी. मजे की बात तो यह है कि दिल्ली में पांच दिन काम करने के बाद दो दिन की छुट्टी मिलती थी और आए दिन पड़ने वाले तीज-त्यौहार की छुट्टियाँ अलग मिलती थी,फिर भी कहीं न कहीं एक दबाव सा महसूस होता था..शायद भीड़ का,लाखों की संख्या में वाहनों का,बस से लेकर मेट्रो तक में धक्कामुक्की का और घंटों के जाम का. पर यहाँ न तो उतनी भीड़-भाड है और न ही दिल्ली की तरह की चिल्लपों. न्यूज़ सेक्शन में अकेले पीर-भिश्ती-बाबर्ची (न्यूज़ की भाषा में संपादक, रिपोर्टर, कम्प्यूटर आपरेटर) का दायित्व सँभालने और बिना किसी छुट्टी के सालभर गुजार देना...कुछ तो है जिसने अहसास नहीं होने दिया.
यहाँ जब तबादला हुआ तो अपन ने भी गूगल मेप में जाकर पहली बार सिलचर को जाना था. फिर किसी ने असम के हालात समझाए तो किसी ने रसूख का इस्तेमाल कर तबादला रुकवाने का परामर्श दिया लेकिन रेलवे में आए दिन तबादलों से दो-चार होते रहे पापा(पिताजी) ने जाने का हौंसला दिया और दिल्ली से ऊब रही पत्नी ने मानसिक सहारा,बस फिर क्या था अपन भी निकल पड़े और आज सालभर बाद यह महसूस हो रहा है कि यदि यहाँ नहीं आते तो शायद गलती करते, देश के एक अटूट हिस्से को जानने-समझने से वंचित रह जाते.
यहाँ सब-कुछ नया सा लगा मसलन सुपारी से लेकर अनन्नास(पाइन एप्पल) तक के अनजाने पेड़,चाय के लम्बे-चौड़े बागान,बांस,असम शैली में बने घर,भाषा,खान-पान,सूखी मछलियाँ और बिना जैकेट-रजाई के ठण्ड का मौसम. सुबह की सैर(मार्निंग वाक) के दौरान आधे शहर को देख लेने का उत्साह और बिग बाज़ार,विशाल मेगामार्ट,गोलदिघी,नाहटा,डिजीटल सिनेमा जैसे माल नुमा बाजारों-सिनेमाघरों में मनोरंजन की तलाश. जिन्होंने अब तक साल बीत जाने का अहसास ही नहीं होने दिया.
ऐसा नहीं है कि सिलचर में सभी कुछ ‘हरा-हरा’ है. यहाँ भरपूर काला धुंआ उगलती गाड़ियाँ हैं तो धूल से पटी सड़कें, बेतरतीब चलते वाहन हैं तो सामान्य से कई गुना महँगी दरों पर मिलता सामान, उमस वाली गर्मी है तो नाक में दम कर देने वाली बारिश भी, डाक्टरों को दिखाने के लिए सुबह 4 बजे से लगती लाइनें हैं तो सड़कों पर सरेआम पान-तम्बाखू उगलते और बेशर्मी से मूत्र विसर्जन करते लोग...फिर भी कुछ तो है जिसने सालभर गुजार लेने का अहसास नहीं होने दिया.

एक साल बिताने के बाद,मैं,यह बात दावे से कह सकता हूँ कि रसूख का इस्तेमाल कर तबादला रुकवाने की बजाए यहाँ आकर मैंने गलती नहीं की. यदि यहाँ न आता तो शायद छोटे शहर में महानगरों जैसी सुविधाओं को नहीं जान पाता..बस और सालभर बाद शुरू होगी तलाश भविष्य के लिए पूर्वोत्तर जैसे ही देश के किसी दूसरे हिस्से में जाने और उसे जानने की. 
(चित्र परिचय: सिलचर में बराक नदी पर बना सदर घाट पुल)

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

‘खबर’ से ‘बयानबाज़ी’ में बदलती पत्रकारिता


मीडिया और खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया से ‘खबर’ गायब हो गयी है और इसका स्थान ‘बयानबाज़ी’ ने ले लिया है और वह भी ज्यादातर बेफ़िजूल की बयानबाज़ी. नेता,अभिनेता और इसीप्रकार के अन्य कथित ‘सेलिब्रिटी’ आए दिन उट-पटांग बयान देते हैं और मीडिया आगे बढ़कर उन्हें उछालने और ऐसे ही अन्य बयान देने के लिए उकसाता रहता है. टेलीविजन चैनलों पर अपना चेहरा दिखाने और सस्ती लोकप्रियता पाने की प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गयी है या यों कहा जाए कि मीडिया ने इतनी बढ़ा दी है कि अब हर कोई ‘विवादित बयानबाज़ी’ के जरिये कथित तौर पर लोकप्रिय होना चाहता है. यही कारण है कि देश में इन दिनों साधुओं-साध्वियों,मुल्ला-मौलवियों और उनसे भी ज्यादा बदनाम होने को तत्पर गुमनाम नेताओं की मानो बाढ़ सी आ गयी है. हर कोई अपनी भाषा-संस्कृति की गंदगी को उगलने और दूसरों को भी उसकी चपेट में लेने के लिए बेताब है. मीडिया के ‘बाइट-वीर’ तो मानो इसे लपकने के लिए अपनी झोली फैलाए बैठे हैं कि आओ हमारे चैनल पर आप अपनी गन्दी जुबां की प्रतिभा का प्रदर्शन करो और फिर हम उसे ब्रेकिंग न्यूज़ बनाकर पूरे देश में इसे दिनभर महामारी की तरह फैलाते रहेंगे. खेद की बात तो यह है कि हमारे समाचार पत्र भी इलेक्ट्रानिक मीडिया के बिछाए इस जाल में फंस रहे हैं. यहाँ तक कि आकाशवाणी-दूरदर्शन जैसे अपेक्षाकृत संतुलित समाचार माध्यमों में भी इसका असर साफ़ नजर आने लगा है.
देश में दशकों से सैकड़ों की संख्या में संचालित पत्रकारिता संस्थानों की कक्षाओं में संतुलित खबर की पट्टी पढाई जा रही है. संतुलित खबर माने जिसमें सही तथ्य, सभी पक्ष और समाज की बेहतरी छिपी हो. मुझे याद है नब्बे के दशक में जब प्रिंट मीडिया की तूती बोलती थी तो आमतौर पर सभी बड़े अख़बारों में किसी भी समाचार को बिना दूसरे या उस पक्ष की राय जाने बिना प्रकाशित नहीं किया जाता था जो उस समाचार से प्रभावित हो सकता था. कई बार अच्छी एवं महत्वपूर्ण ख़बरों को भी दूसरे पक्ष की राय जानने तक रोक दिया जाता था. यहाँ तक कि सरकार और सत्ता-प्रतिष्ठान के खिलाफ होने वाले समाचारों पर भी सरकार का पक्ष जानना जरुरी होता था और वह भी किसी जिम्मेदार अधिकारी का. लेकिन नई दौर की पत्रकारिता को देखकर तो लगता है कि इसके कर्ता-धर्ताओं ने ‘संतुलित’ के स्थान पर शायद ‘सनसनी’ पढ़ लिया है इसलिए वे खबरों को अधिक से अधिक सनसनीखेज बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते.
 समाचार का सामान्य शिष्टाचार तो यह कहता है कि सर्वप्रथम तो किसी के अनर्गल प्रलाप को मीडिया की सुर्ख़ियों से दूर रखा जाना चाहिए और दूसरा यह कि यदि यह प्रलाप किसी व्यक्ति/संस्था/सरकार से सम्बंधित है तो उस प्रलाप पर उनका पक्ष भी जानने के बाद ही दोनों पक्षों से मिली जानकारी को मिलाकर समाज के हित में होने वाली सूचना को मीडिया में प्रचारित/प्रकाशित/प्रसारित किया जाना चाहिए लेकिन टीआरपी और ब्रेकिंग न्यूज़ की अंधी दौड़ ने समाज का हित तो दूर देशहित को भी दरकिनार कर दिया है और बस सनसनी फैलाकर दर्शक बटोरने और फिर उनके माध्यम से विज्ञापन जैसे माध्यमों से पैसा कमाने की भेडचाल सी चल पड़ी है. यही कारण है कि अब नेता भी अभिनेता बन गए हैं और वे खबर के अनुरूप भाव-भंगिमाओं के साथ अपनी बात को ‘पंचलाइन’ और ‘स्लोगन नुमा’ ढंग से करने लगे हैं क्योंकि अब उन्हें भी यह बात भली-भांति समझ आ गयी है कि सीधे/सपाट/स्पष्ट और संगत ढंग से कही गई बात मीडिया में जगह नहीं बना पायेगी. नए दौर के मीडिया को तो बस तुकबंदी चाहिए और तुकबंदी भी ऐसी जो किसी न किसी की खिल्ली उड़ाती हो फिर चाहे उसका तथ्यों/घटना/सूचना से लेना-देना हो या न हो. मीडिया अब निष्पक्ष समाचार प्रसारक न रहकर भोंपू बनता जा रहा है जिसका काम बस सूचना को बस सनसनी बनाकर पेश करना है. मिनटों में किसी भले आदमी को बलात्कारी या भ्रष्ट बना देना,महज आरोप लगने पर मीडिया की अदालत में सज़ा सुना देना और फिर बिना किसी ‘फालो-अप’ के अगले शिकार की तलाश में जुट जाना. शिकार-दर-शिकार यह भूख बढती जा रही है और इसका दुष्परिणाम आम लोगों को उठाना पड रहा है. ऐसा कितनी बार हुआ है जब मीडिया की अदालत में दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति को देश की अदालत द्वारा निर्दोष करार देने के बाद मीडिया ने फिर अपनी गलती स्वीकार की हो और इस फालो-अप को भी पहले की तरह खबरों में स्थान दिया हो.  

यदि यह बात इलेक्ट्रानिक मीडिया तक सीमित होती तब भी समझा जा सकता था लेकिन अब तो समाचार पत्र भी अपनी पठनीयता और तथ्यात्मक विश्लेषण करने की मूल प्रवृत्ति को छोड़कर इलेक्ट्रानिक मीडिया के पिछलग्गू और उसकी प्रतिकृति बनने को बेताब हैं. इलेक्ट्रानिक मीडिया में सुर्खियाँ बटोरने वाले किसी भी ऐरे गैरे नत्थू खैरे का बयान दूसरे दिन समाचार पत्रों में भी उसी के अनुपात में स्थान बनाने में कामयाब हो जाता है.जबकि होना यह चाहिए कि अख़बार के संपादकों को किसी भी बयान के दूरगामी परिणामों के मद्देनजर उसे न्यायोचित स्थान देना चाहिए. दरअसल न्यूज़ चैनलों पर तो सुर्खियाँ दिनभर में कई बार बनती-बिगडती हैं लेकिन समाचार पत्रों में प्रकाशित बात लम्बे समय तक वजूद में रहती है और प्रायः घरों/पुस्तकालयों में संग्रहित तक हो जाती है इसलिए उसका असर भी गहरा तथा दीर्घकालीन होता है.इसलिए अब जरुरी हो गया है कि मीडिया स्व-नियंत्रण या आत्मनियंत्रण की नीति का गंभीरता से पालन करे और तत्काल इस दिशा में कड़े कदम उठाये वरना मीडिया तो अपनी गरिमा खो ही देगा साथ में देश को भी जाने-अनजाने में खासा नुकसान पहुंचता रहेगा जो भारत जैसे विकासशील देश की प्रगति और लोकतान्त्रिक ताने-बाने की मजबूती के लिए निश्चित तौर पर बाधक है.     

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