बुधवार, 25 दिसंबर 2013

कोई घर तोड़ रहा है तो कोई कर रहा है सरेआम अपमान



हाल ही में फिल्म अभिनेता ऋतिक रोशन और उनकी पत्नी सुजैन खान के बीच तलाक़ की ख़बरों ने मुझे एक सरकारी क्षेत्र के बैंक के विज्ञापन की याद दिला दी. यह विज्ञापन आए दिन टीवी पर आता रहता है. इस विज्ञापन में एक युवा जोड़े को सड़क पर छेड़छाड़ करते दिखाया गया है. युवक बार बार युवती से काफी शॉप में या कहीं और मिलने का आग्रह करता है और युवती उससे दूर चलते हुए कभी बाबूजी देख लेंगे तो कभी माँ देख लेगी कहते हुए बचती सी नजर आती है.इसी तरह छेड़छाड़ करते हुए वे एक घर तक पहुँच जाते हैं और फिर घर का दरवाजा खोलते हुए एक बुजुर्ग महिला युवती से पूछती है ‘बहू, आज बहुत देर कर दी’ और युवती के स्थान पर युवक उत्तर देता है ‘हाँ, माँ वो आज देर हो गयी’. तब जाकर दर्शकों को यह समझ में आता है कि वे वास्तव में पति-पत्नी हैं लेकिन इसके पहले कि दर्शकों के चेहरे पर उनकी छेड़छाड़ को लेकर मुस्कान आए विज्ञापन कहता है कि ‘हम समझते हैं कि रिश्तों के लिए अपना घर होना कितना जरुरी है’. ऋतिक और सुजैन के तलाक़ के मामले में भी यह बात कही जा रही है कि सुजैन ने रोशन परिवार से अलग रहने के लिए दवाब बनाया था जबकि वे दोनों पूरी तरह से अलग फ्लोर पर रहते थे. अब यदि इस संदर्भ में बैंक के उस विज्ञापन के सन्देश पर गौर किया जाए तो उसका मतलब तो यही हुआ न कि अगर आपको मस्ती भरी-बेफिक्र जीवन शैली चाहिए तो अपने माँ-बाप/परिवार से दूर अलग घर लेकर रहो. अब जब भारत तो क्या पश्चिमी देश भी संयुक्त परिवार का महत्व समझने लगे हैं तब देशी लोगों को परिवार तोड़ने का सन्देश देना कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता. पहले ही हमारे टीवी सीरियल संयुक्त परिवार तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. ऐसे में इस प्रकार के विज्ञापन निश्चित तौर पर सोच और युवा समझ पर असर डालेंगे ही.
       यह कोई इकलौता विज्ञापन नहीं है बल्कि इन दिनों ऐसे कई विज्ञापन प्रसारित हो रहे हैं जो सीधे नहीं तो अप्रत्यक्ष तौर पर हमारी मानसिकता को नकारात्मक सोच से भर रहे हैं. टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित हो रहा ऐसा ही एक विज्ञापन वाटर हीटर बनाने वाली एक नामी कम्पनी का है. इस विज्ञापन में एक सौम्य महिला से पहले बस में छेड़छाड़ होती है और फिर घर के पास भी कुछ शोहदे सीटी मारकर छेड़ते हैं... जवाब में वह महिला डरी-सहमी सी चुपचाप घर जाकर इस कम्पनी के वाटर हीटर के गर्म पानी से नहाती है और विज्ञापन कहता है-"धो डालिए सभी परेशानियों को." मुझे लगता है विज्ञापन सीधे-सीधे महिलाओं को छेड़ने और छेड़छाड़ को चुपचाप सहते रहने का समर्थन कर रहा है. अरे भैया यह विज्ञापन छेड़छाड़ करने वालों को करारा जवाब देकर भी तो बनाया जा सकता था जैसे वह महिला इसी वाटर हीटर के पानी से नहाकर जब घर से निकलती और बस में धक्का मुक्की करने वाले को ऐसा जोर का धक्का/झटका देती कि उसे अपनी नानी याद आ जाती और घर के पास सीटी मार रहे शोहदों को करारा थप्पड़ रसीद करती और फिर विज्ञापन कहता-"गर्माहट ऐसी की अच्छे-अच्छों को ठंडा कर दे..". इससे प्रचार भी हो जाता और गलत इरादे रखने वालों को सन्देश भी मिलता...!!!
      इसी तरह ठण्ड से बचाव पर केन्द्रित एक अन्य नामी कंपनी के थर्मोवियर(गर्म कपड़ों) के विज्ञापन में कई लोग ठण्ड से बचने के लिए लकड़ियाँ जलाकर आग ताप रहे हैं.लकड़ियाँ कम होने पर वे एक असहाय और चलने-फिरने में असमर्थ बुजुर्ग को नीचे लिटाकर उसकी चारपाई को आग के हवाले कर देते हैं...विज्ञापन की अगली लाइन में वे दूसरे दिन ठण्ड से बचने के जुगाड़ के लिए एक और बुजुर्ग की ओर देखते हैं जो अपाहिज है और चलने-फिरने के लिए लकड़ी की बैसाखियों पर आश्रित है. आग ताप रहे लोग उसकी बैसाखियों की ओर क्रूरता से देखते हैं और वह बुजुर्ग डरकर बैसाखी पीछे छिपा लेता है....अब भला अपने गर्म कपड़े बेचने के लिए किसी असहाय व्यक्ति की शारीरिक कमजोरी का इस्तेमाल करना कैसे उचित माना जा सकता है. यह कैसी रचनात्मकता है जो बुजुर्गो-अपाहिजों का मज़ाक उड़ाती है ? क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर हम कुछ भी दिखा-सुना सकते हैं. इन विज्ञापनों से सीधे प्रभावित होने वाली हमारी युवा और किशोर पीढ़ी क्या सीखेगी ? क्या महज पैसे कमाना ही जीवन का एकमात्र ध्येय रह गया है और पैसे के लिए संस्कार,सभ्यता,शिष्टता जैसे जीवन के मूलभूत सिद्धांत कोई मायने नहीं रह गए हैं. अभी भी यदि हमने इस बारे में नहीं सोचा था तो शायद भविष्य में पछतावे के अलावा हमारे हाथ में कुछ और नहीं रह जाएगा. 

शनिवार, 30 नवंबर 2013

कैसा हो यदि सुरीला हो जाए वाहनों का कर्कस हार्न...!!!


कल्पना कीजिये यदि सड़क पर आपको पीछे आ रही कार से कर्कस और कानफोडू हार्न के स्थान पर गिटार की मधुर धुन सुनाई दे तो कैसा लगेगा? ट्रैफिक जाम को लेकर आपका गुस्सा शायद काफूर हो जाएगा और आप भी उस मधुर धुन का आनंद उठाने लगेंगे. इसीतरह आपकी कार या सड़कों को रौंद रहे तमाम वाहन भी यदि दिल में डर पैदा कर देने वाले विविध प्रकार के हार्न के स्थान पर संतूर, हारमोनियम या फिर बांसुरी की सुरीली तान छेड़ दें तो सड़कों का माहौल ही बदल जाएगा और फिर शायद सड़कों पर आए दिन लगने वाला जाम हमें परेशान करने की बजाए सुकून का अहसास कराएगा. पता नहीं हमारे वाहन निर्माताओं ने अभी तक भारतीय सड़कों को सुरीला बनाने के बारे में क्यों नहीं सोचा? जब हम मोबाइल फोन में अपनी पसंद के मुताबिक संगीत का उपयोग कर स्वयं के साथ-साथ हमें फोन करने वालों को भी मनभावन धुन सुनाने का प्रयास करते हैं तो ऐसा कार या अन्य वाहनों में क्यों नहीं हो सकता. धुन न सही तो लता जी, मुकेश, किशोर दा, भूपेन हजारिका से लेकर पंडित भीमसेन जोशी या गुलाम अली जैसी महान हस्तियों का कोई मुखड़ा, कोई अलाप या कोई अंतरा ही उपयोग में लाया जा सकता है. इससे इन दिग्गजों की कालजयी शैली को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ले जाने में मदद मिलेगी और सड़कों, इनसे गुजर रहे लोगों, यहाँ रहने वालों और दिनभर ट्रैफिक को सँभालने वाले उस अदने से ट्रैफिक हवलदार को भी ध्वनि प्रदूषण से लेकर बहरेपन तक से राहत मिलेगी.
वैसे देखा जाए तो कारों में संगीत का कुछ हद तक इस्तेमाल होने लगा है लेकिन फिलहाल यह कार पीछे करने के लिए बजाए जाने वाले ‘रिवर्स हार्न’ तक सीमित है. यही कारण है कि जब कार बैक होती है तो वह सड़क पर दौडती कार की तरह कर्कस अंदाज में नहीं चीखती बल्कि होले से पीछे से हट जाने की गुजारिश करती है. बस इसी प्रयोग को और परिष्कृत ढंग से इस्तेमाल में लाने की जरुरत है और सड़कों से शोर कम हो जाएगा. हालांकि इसके कुछ खतरे भी हैं क्योंकि कार कंपनियों ने यदि युवाओं की पसंद के मद्देनजर मौजूदा दौर के हनी सिंह मार्का या मुन्नी बदनाम छाप गीतों को ‘हार्न’ में बदल दिया तो समस्या कम होने की बजाए बढ़ भी सकती है. देखा जाए तो सड़क पर गाड़ियों की चिल्लपों से परेशान होना अब हम महानगरों के लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है. जरा आप सड़क पर रुके नहीं कि पीछे से हार्न की कर्कश आवाजें सिरदर्द पैदा कर देती हैं. दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में तो आए दिन जाम की स्थिति बनी रहती है और चाहे आप कार में हो या बस में,आपको कानफोडू और कई बार तो बहरा बना देने की हद तक के शोर को बर्दाश्त करना ही पड़ता है.वैसे अब इस दिशा में कुछ प्रयास शुरू हुए हैं. अभी हाल ही में एक खबर पढ़ने में आई कि भविष्य में सड़कों पर ‘टाकिंग कार’ दौड़ेगी जो न केवल आपस में बात करेंगी बल्कि कार चलाने वाले को भी किसी गलती की स्थिति में सावधान भी करेंगी. इससे दुर्घटनाओं पर तो रोक लगेगी, शोर-गुल कम होगा और हर साल दुनिया भर और खासकर भारत में सड़कों पर मरने वाले लाखों लोगों के प्राण बचाए जा सकेंगे. खास बात यह है कि इस आविष्कार के पीछे भी भारतीय मूल के वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर जगदत्त सिंह का दिमाग है और यह आइडिया भी उन्हें दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में ट्रैफिक से दो-चार होने के बाद आया. डेडिकेटेड शार्ट रेंज कम्युनिकेशन(डीएसआरसी) नामक इस डिवाइस को कार में लगाने के बाद यह तक़रीबन एक किलोमीटर की दूरी तक की कार की हरकतों को भांपकर उसके मुताबिक बचाव का तरीका तलाश लेगी.यही नहीं,वह अपने चालक को भी पहले से आगाह कर देगी.
इस सोच को अमलीजामा पहनाने में तो समय लगेगा क्योंकि इसमें भी सबसे पहले कंपनियां अपना नफा-नुकसान देखेंगी, सरकारी नियम आड़े आएंगे, फिर दफ्तरों में फाइलें रेंगेगी,अदालतों का कीमती वक्त जाया किया जाएगा और तब कहीं जाकर कोई नतीजा सामने आ पाएगा.तब तक आपकी-हमारी पीढ़ी सहित कई पीढियां इसीतरह सड़कों के शोर में बहरी होकर दम तोडती रहेंगी. 

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

अब अख़बारों में संपादक का नाम....ढूंढते रह जाओगे..!!

देश के तमाम समाचार पत्रों में संपादक नाम की सत्ता की ताक़त तो लगभग दशक भर पहले ही छिन गयी थी. अब तो संपादक के नाम का स्थान भी दिन-प्रतिदिन सिकुड़ता जा रहा है. इन दिनों अधिकतर समाचार पत्रों में संपादक का नाम तलाशना किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने या वर्ग पहेली को हल करने जैसा दुष्कर हो गया है. नामी-गिरामी और सालों से प्रकाशित हो रहे समाचार पत्रों से लेकर ख़बरों की दुनिया में ताजा-तरीन उतरे अख़बारों तक का यही हाल है. अख़बारों में आर्थिक नजरिये से देखें तो संपादकों के वेतन-भत्ते और सुविधाएँ तो कई गुना तक बढ़ गयी हैं लेकिन बढते पैसे के साथ  ‘पद और कद’ दोनों का क्षरण होता जा रहा है.
एक दौर था जब अखबार केवल और केवल संपादक के नाम से बिकते थे.संपादकों की प्रतिष्ठा ऐसी थी कि अखबार पर पैसे खर्च करने वाले सेठ की बजाए संपादकों की तूती बोलती थी. माखनलाल चतुर्वेदी,बाल गंगाधर तिलक,मदन मोहन मालवीय,फिरोजशाह मेहता और उनके जैसे तमाम संपादक जिस भी अखबार में रहे हैं उस अखबार को अपना नाम दे देते थे और फिर पाठक अखबार नहीं बल्कि संपादक की प्रतिष्ठा,समझ और विश्वसनीयता को खरीदता था. उसे पता होता था कि इन संपादकों के होते हुए विषय वस्तु से लेकर अखबार की शैली तक पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता. पुराने दौर के संपादकों का जिक्र छोड़ भी दें तब भी आपके–हमारे दौर के राहुल बारपुते,राजेन्द्र माथुर,प्रभाष जोशी,कुलदीप नैय्यर,एन राम,अरुण शौरी और शेखर गुप्ता जैसे संपादकों को न तो किसी नाम की दरकार थी और न ही पहचान की,इसके बाद भी अखबार इनके नाम से अपनी ‘ब्रांडिंग’ करते थे लेकिन अब लगता है कि समाचार पत्र प्रबंधन/मालिकों पर संपादक के साथ-साथ उसका नाम भी बोझ बनता जा रहा है और वे इसे जगह की बर्बादी मानने लगे हैं तभी तो संपादक का नाम छापने के लिए ऐसी जगह और प्वाइंट साइज(शब्दों का आकार) का चयन किया जा रहा है जिससे नाम छापने की खानापूर्ति भी हो जाए और किसी को पता भी न चले कि संपादक कौन है. यहाँ संपादक का नाम से तात्पर्य प्रधान संपादक से लेकर स्थानीय संपादक जैसे विविध पद शामिल है.
   मीडिया में बनी ‘दिल्ली ही देश है की अवधारणा के अनुरूप जब दिल्ली से प्रकाशित सभी प्रमुख हिंदी-अंग्रेजी के अख़बारों का इस सम्बन्ध में अध्ययन और विश्लेषण किया तो मैंने पाया कि संपादक के नाम के साथ सबसे ज्यादा खिलवाड़ टाइम्स समूह के समाचार पत्रों में हुआ है. टाइम्स आफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में इन दिनों संपादक का नाम छटवें पृष्ठ पर इतने छोटे आकार में प्रकाशित किया जा रहा है कि उसे दूरबीन के जरिये ही पढ़ा जा सकता है.यही हाल इस समूह के हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स का है.इसमें संपादक का नाम तो सम्पादकीय पृष्ठ पर छपता है लेकिन उसे तलाशना और पढ़ना बिना मोटे ग्लास वाले चश्मे या दूरबीन के संभव नहीं है.इसी समूह के आर्थिक समाचार पत्र इकामानिक टाइम्स में संपादक के नाम को अंतिम पृष्ठ पर स्थान दिया गया है.यह पठनीय तो है लेकिन इसे कार्टून के ठीक नीचे प्रकाशित करने के कारण इसकी गरिमा जरुर प्रभावित होती है. इंडियन एक्सप्रेस में इसे पारंपरिक ढंग से अंतिम पेज पर बाटम(सबसे नीचे) में स्थान दिया गया है जो पठनीय और दर्शनीय दोनों है. एक अन्य बड़े समाचार पत्र समूह हिंदुस्तान टाइम्स में संपादक को पृष्ठ क्रमांक २१ पर बाटम में स्थान दिया गया है जबकि इसी समूह के हिंदी अखबार हिंदुस्तान ने संपादक के नाम का आकार-प्रकार जरुर कम कर दिया है लेकिन प्रकाशन का तरीका वही पारंपरिक (अंतिम पृष्ठ पर बाटम में) रखा है. इसीतरह दैनिक भास्कर के दिल्ली संस्करण में भी संपादक के नाम को फिलहाल सही जगह और सही आकार-प्रकार हासिल है.

प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक हिंदू में पेज तीन की बाटम में,अमर उजाला में खेल पृष्ठ पर, जनसत्ता में अंतिम पेज पर, नेशनल दुनिया में तीन नंबर पेज पर और दैनिक जागरण में पेज क्रमांक १७ पर संपादक के नाम को स्थान दिया गया है. दैनिक जागरण में नाम को बकायदा बाक्स में सम्मानजनक ढंग से प्रकाशित किया जा रहा है, वहीं जनसत्ता में पेज तो वही रहता है परन्तु विज्ञापनों के दबाव में नाम की जगह बदलती रहती है.नेशनल दुनिया में जब तक आलोक मेहता संपादक थे तब तक उनका नाम काफ़ी बड़ी प्वाइंट साइज में जाता था लेकिन उनके हटते ही संपादक की स्थिति भी बदल गयी. राष्ट्रीय सहारा और पंजाब केसरी में संपादक के नाम को स्थान तो सम्पादकीय पृष्ठ पर दिया जा रहा है लेकिन राष्ट्रीय सहारा में संपादक के नाम के साथ इतनी सारी सूचनाओं का घालमेल कर दिया गया है कि नाम महत्वहीन सा लगता है,वहीं पंजाब केसरी में तो नाम तलाशना और पढ़ना मुश्किल काम है.यही नहीं प्रबंधन दिल्ली-जयपुर संस्करण को मिलाकर एक साथ नाम प्रकाशित कर रहा है इससे भी भ्रम की स्थिति बन जाती है. 

शनिवार, 7 सितंबर 2013

गजानन, अब के बरस तुम मत आना.....!


     हे गजानन,रिद्धि-सिद्धि और बुद्धि के दाता गणेश आप अगले साल मत आना, भले ही आपके भक्त ‘गणपति बप्पा मोरिया अगले बरस तू जल्दी आ’ जैसे कितने भी जयकारे लगाते रहे. चाहे वे आपको मोदक का कितना भी लालच दें लेकिन आप उनके बहकावे में मत आना. ऐसा नहीं है कि आपके आने से मुझे कोई ख़ुशी नहीं है या फिर मुझे आपकी कृपा की लालसा नहीं है. धन-संपत्ति और प्रसिद्धि भला किसे बुरी लगती हैं लेकिन मैं अपने स्वार्थ के लिए अपनी माँ को कष्ट में नहीं देख सकता. आपको खुश करने के चक्कर में आपके कथित भक्त तमाम विधि-विधान को भूलकर अंध श्रद्धा का ऐसा दिखावा करते हैं कि मेरी माँ तो माँ उनकी सभी छोटी-बड़ी बहनों का सीना छलनी हो जाता है और वे महीनों बाद भी दर्द से कराहती रहती हैं.
     अब तो प्रभु आप भी समझ गए होंगे कि मुझे आप और आपकी आराधना से नहीं बल्कि आपकी वंदना के नाम पर होने वाले दिखावे पर आपत्ति है. मुझे आपकी कई फुट ऊँची रसायनिक रंगों से सजी-संवरी प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की मूर्तियों और उनके नदियों में विसर्जन से शिकायत है. प्लास्टर ऑफ़ पेरिस में जिप्सम, फास्फोरस,सल्फर और मैग्नीशियम जैसे रसायन होते हैं, वहीँ आपकी प्रतिमाओं को सुन्दर दिखाने के लिए लगाए गए लाल,नीले,नारंगी,हरे, पीले जैसे सतरंगी रंग के रसायनिक पेंट तो लेड,कार्बन,मरकरी,जिंक जैसे ख़तरनाक तत्वों के मेल से बनते हैं. जब ये हानिकारक रसायन गंगा माँ और उनकी यमुना,नर्मदा,बेतवा,चम्बल ताप्ती,ब्रम्हपुत्र जैसी बहनों के पवित्र जल में समाते हैं तो इस ज़हर से उनके आँचल में पल रहे निर्दोष जलीय जीव-जंतु तक दम तोड़ देते हैं और यह पानी पीने लायक तो दूर नहाने और छूने लायक भी नहीं रह जाता. इससे आपके भक्तों में ही कैंसर जैसी घातक बीमारियों का खतरा उत्पन्न हो रहा है. पहले ही प्रदूषण के बोझ से बेदम हमारे जल स्रोत हर साल आपकी हज़ारों-लाखों छोटी-बड़ी प्रतिमाओं के विसर्जन से मरणासन्न स्थिति में पहुँच जाते हैं.
    आपके भक्त इतना जानते हैं कि प्लास्टर ऑफ़ पेरिस पानी में आसानी से नहीं घुलता और इससे आपके विसर्जन की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हो पाती फिर भी वे पैसे बचाने और एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर दिखने की होड़ में जान-बूझकर बड़ी,सस्ती और रंग-बिरंगी प्रतिमाएं लेकर आते हैं. केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड का कहना है कि विसर्जन के बाद पूरी तरह से नहीं गलने वाली प्रतिमाओं को इकठ्ठा कर उन पर बुल्डोज़र चलाना पड़ता है. तब जाकर वे किसी तरह मिट्टी में मिल पाती हैं. अब सोचिए,ग्यारह दिन तक भरपूर आराधना करने के बाद क्या ऐसा विसर्जन आपको रास आएगा? क्या यह आपका अपमान नहीं है?
    वेद-पुराणों में तो बताया गया है कि गणेश प्रतिमा को सदैव शुद्ध कच्ची मिट्टी से ही बनाया जाना चाहिए और यदि रंग करना वाकई जरुरी है तो केवल प्राकृतिक रंगों का ही इस्तेमाल होना चाहिए. धार्मिक ग्रंथों में तो आपकी प्रतिमा का आकार भी निर्धारित है फिर भी आज के दौर के कथित भक्तों में ऊँची-ऊँची विशालकाय प्रतिमाएं बनवाने की होड़ मची है. हर साल आपकी नयी प्रतिमा बनवाकर पूजने का क्या तुक है? क्या आपकी स्थायी मूर्ति आशीर्वाद और कृपा नहीं बरसाती? यदि ऐसा होता तो मुंबई में सिद्धिविनायक, उज्जैन के चिंतामन गणेश, इंदौर के खजराना गणेश जैसे तमाम स्थायी प्रतिमाओं वाले आपके दरबार में इतनी भीड़ क्यों जुटती है और भक्त पूरी तरह से संतुष्ट होकर बार-बार क्यों आते हैं? इसलिए प्रभु जब तक लोग पर्यावरण और विधि-विधान का ध्यान रखते हुए आपका आह्वान न करें आप मत आना और यदि फिर भी आना ही पड़े तो ऐसे कथित भक्तों पर जरा भी कृपा मत बरसाना ताकि वे भी आपके सम्मान का सही तरीका सीख सकें.        

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

सिन्धुरक्षक का सच:बस या कार डूबने की तरह नहीं होता पनडुब्बी का डूबना

क्या हमारे देश में इतनी भी क्षमता नहीं है कि हम समंदर में डूबते किसी जहाज़ या पनडुब्बी को खींचकर बाहर निकाल सकें? या उसे फटाफट काटकर उसमें फँसे लोगों को सुरक्षित बचा सकें? इसीतरह के अनेक सवाल मेरी तरह स्वाभाविक रूप से कई लोगों के दिमाग में आए होंगे जब उन्होंने टीवी न्यूज़ चैनलों और समाचार पत्रों में भारतीय नौसेना की पनडुब्बी आईएनएस सिन्धुरक्षक को धमाकों के बाद मुंबई के समुद्री तट पर डूबते देखा होगा. दरअसल हकीकत में यह हादसा इतना सहज नहीं था जितना देखने में लगता है. तकनीकी जानकारी के अभाव और पनडुब्बी की बनावट एवं कार्यप्रणाली की पूरी तरह से समझ नहीं होने के कारण हम इसे भी कार-बस के नदी में डूबने जैसी सामान्य दुर्घटना की तरह ही समझ रहे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि समन्दर में डूब रहे जहाज़ या पनडुब्बी को बिना किसी क्षति के बचा पाने का हुनर और क्षमता तो अभी ढंग से इनके निर्माता देशों के पास भी नहीं है. इसके अलावा यह बचाव अभियान इतना खर्चीला होता है कि किसी भी देश के लिए इस खर्च को बर्दाश्त कर पाना आसान नहीं है.
       यदि हम सिन्धुरक्षक मामले की बात करे तो यह दुर्घटना मुंबई में तट के काफ़ी करीब हुई जहाँ पानी छिछला होता है और कम पानी में किसी ताकतवर जहाज का आ पाना संभव नहीं होता इसलिए सिन्धुरक्षक को खींचकर बाहर लाने का विकल्प ही नहीं था. रही बात पनडुब्बी को सीधे ऊपर उठकर बाहर निकालने की, तो हमारे देश में फ़िलहाल कर्नाटक के कारवार में बने नए नौसेना बेस आईएनएस कदम्ब को छोड़कर किसी भी नेवल बेस में ‘शिप लिफ्टिंग फैसिलिटी’ अर्थात जहाज़ को सीधे उठाकर कहीं और पहुंचा सकने की क्षमता नहीं है. यहाँ भी अभी महज 10 हजार टन वजन वाले जहाज को उठाने की क्षमता है जबकि सामान्य तौर पर युद्धपोत इससे ज्यादा भारी भरकम होते हैं.सिन्धुरक्षक पनडुब्बी ही लगभग ढाई से तीन हजार टन वजन की है और अंदर पानी भर जाने के कारण इसका वजन दोगुना भी मान ले तब भी यदि यह दुर्घटना कारवार में होती तो शायद इसे उठाकर बाहर निकला जा सकता था.चूँकि मुंबई में यह सुविधा नहीं है इसलिए सिन्धुरक्षक को तत्काल बाहर निकाल पाने का भी सवाल नहीं उठता.
        दूसरा रास्ता यह बचता था कि सिन्धुरक्षक को गैस कटर इत्यादि से काटकर इसमें फँसे हुए लोगों को निकला जा सकता था लेकिन यह तरीका और भी ज्यादा कठिन होता है क्योंकि पनडुब्बियां ऐसे खास प्रकार के स्टील से बनाई जाती हैं जिसे काटना तो दूर भेद पाना भी आसान नहीं होता.दरअसल टारपीडो या इसीतरह के अन्य शस्त्रों के हमले से सुरक्षा के लिए पनडुब्बी के बाहरी आवरण(खोल) में ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है जो अभेद हो. हमेशा पानी के अंदर रहने वाली पनडुब्बी की संरचना भी इस प्रकार की होती है कि समन्दर का खारा पानी भी इस पर कोई असर नहीं डाल सकता. इसमें आने-जाने का रास्ता भी ऊपर की ओर तथा बेहद संक्रीर्ण होता है. यही नहीं,पनडुब्बी के अंदर जगह इतनी कम होती है कि सिर उठाकर खड़े रहने तक की गुंजाइश तक नहीं होती. आस-पास लगे संहारक हथियार,अन्य तकनीकी उपकरण,बिजली बनाने से लेकर पानी को साफ़ कर पेयजल में बदलने वाले संयंत्र और समन्दर में लंबे समय तक रहने के लिए आवश्यक खाद्य पदार्थों के भण्डारण के कारण इसके अंदर ढंग से चलने-फिरने का रास्ता भी नहीं बचता.इतनी कम जगह के बाद यदि बच निकालने का एकमात्र रास्ता भी बन्द हो जाए तो फिर जान बचना असंभव ही है.अभी तक की जांच से पता चला है कि सिन्धुरक्षक हादसे में भी यही हुआ.अंदर हुए धमाके के कारण बाहर निकालने का रास्ता बन्द हो गया और भीषण तापमान के कारण अंदर की बनावट तक टेढ़ी-मेढ़ी होकर अपना मूल आकार खो बैठी. ऐसी स्थिति में न तो कोई अंदर से बाहर आ सकता था और न ही बाहर से अंदर जाना संभव था. इसके अलावा पानी में डूबी सिन्धुरक्षक की बिजली गुल हो जाने,अंदर कीचड़-पानी भर जाने और घुप्प अँधेरे ने बचाव दल की मुश्किलें और बढ़ा दी. यही कारण है कि बचाव में इतना समय लग रहा है.

       वैसे इस हादसे से सबक लेते हुए हमारी नौसेना ने डीप सबमर्जड रेस्क्यू व्हीकल(डीएसआरवी) खरीदने का फैसला किया है.अमेरिका में तैयार यह एक ऐसा वाहन है जो समन्दर में 600-1500 मीटर नीचे भी राहत और बचाव कार्यों को बखूबी अंजाम दे सकता है. इसके अलावा इस तरह दुर्घटनाओं के दौरान बचाव कार्यों में निपुण दुनिया भर के विशेषज्ञों की सेवाएं भी ली जा रही हैं. जो भी हो यह हादसा नौसेना के साथ साथ देश के लिए भी किसी बड़े सबक से कम नहीं है. 

रविवार, 18 अगस्त 2013

क्या प्याज इतनी जरुरी है हमारे जीवन के लिए.....?


क्या प्याज इतनी ज़रुरी है कि वह हमारे दैनिक जीवन पर असर डाल सकती है? प्याज के बिना हम हफ्ते भर भी गुजारा नहीं कर सकते? तो फिर प्याज के लिए इतनी हाय-तौबा क्यों? और यदि एसा है तो फिर व्रत/उपवास/रोज़ा/फास्ट या आत्मसंयम का दिखावा क्यों? कहीं हमारी यह प्याज-लोलुपता ही तो इसके दामों को आसमान पर नहीं ले जा रही?
मेरी समझ में मुंह को बदबूदार बनाने वाली प्याज न तो जीवन के लिए अत्यावश्यक ऊर्जा है, न हवा है, न पानी है और न ही भगवान/खुदा/गाड है कि इसके बिना हमारा काम ही न चले. क्या कोई भी सब्ज़ी इतनी अपरिहार्य हो सकती है कि वह हमें ही खाने लगे और हम रोते-पीटते उसके शिकार बनते रहे? यदि ऐसा नहीं है तो फिर कुछ दिन के लिए हम प्याज का बहिष्कार क्यों नहीं कर देते? अपने आप जमाखोरों/कालाबाजारियों के होश ठिकाने आ जायेंगे और इसके साथ ही प्याज की कीमतें भी. बस हमें ज़रा सा साहस दिखाना होगा और वैसे भी प्याज जैसी छोटी-मोटी वस्तुओं के दाम पर नियंत्रण के लिए सरकार का मुंह ताकना कहाँ की समझदारी है. अगर आप ध्यान से देखें तो देश में प्याज के दाम बढ़ने के साथ ही तमाम राष्ट्रीय मुद्दे पीछे छूटने लगे हैं. भ्रष्टाचार के दाग फीके पड़ने लगे हैं और टू-जी स्पेक्ट्रम के घाव भी भरने लगे हैं.हर छोटी सी समस्या को विकराल बनाने में कुशल हमारे न्यूज़ चैनल और समाचार पत्र अब घोटालों के गडबडझाले को भूल गए हैं और खुलकर महंगाई की मार्केटिंग कर रहे है.प्याज की बढती कीमतों को वे दूरदराज और यहाँ तक की प्याज उत्पादक राज्यों में ले जाकर वहां भी इसकी  कीमत बढ़ा रहे हैं. देश और खासकर दिल्ली में बढते अपराधों एवं समस्याओं से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मीडिया के लिए प्याज हो गयी है.अब वे सुबह से शाम तक “राग प्याजअलाप रहे हैं. मीडिया के दबाव में मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सफाई देते नहीं थक रहे हैं. दिल्ली में तो मुख्यमंत्री को सस्ती(पचास रुपये किलो) प्याज बेचनी पड़ रही है. देश में इतनी अफरा-तफरी तो किसानों की आत्महत्या, जमीन घोटालों और पकिस्तान-चीन के उकसावे में भी नहीं मची जितनी प्याज की कीमतों को लेकर मच रही है गोया प्याज न हुई ‘संजीवनी’ हो गई.
शायद यह हमारी जल्दबाजी का ही नतीजा है कि जिस देश में करोड़ों लोग डायबिटीज(मधुमेह) की बीमारी का शिकार हों और पर्याप्त इलाज के अभाव में तिल-तिलकर दम तोड़ रहे हो उसी देश में चीनी की कीमतें आसमान छू रही हैं. कुछ इसीतरह ब्लडप्रेशर(रक्तचाप) के मामले में दुनिया भर में सबसे आगे रहने वाले हम भारतीय, नमक की जरा सी कमी आ जाने पर नासमझों जैसी हरकत करने लगते हैं और अपने घरों में कई गुना दामों पर भी खरीदकर नमक का ढेर लगा लेते हैं जबकि हकीकत यह है कि ज्यादा नमक खाने से लोगों को मरते तो सुना है पर कम नमक खाकर कोई नहीं मरता और वैसे भी तीन तरफ़ समुद्र से घिरे देश में कभी नमक की कमी हो सकती है? कुछ इसीतरह की स्थिति एक बार पहले भी नज़र आई थी जब हमने बूँद-बूँद दूध के लिए तरसते अपने देश के बच्चों को भुलाकर भगवान गणेश को दूध पिलाने के नाम पर देश भर में लाखों लीटर दूध व्यर्थ बहा दिया था.
  प्याज के बारे में जब मैंने इन्टरनेट खंगाला तो कई अहम जानकारियां सामने आई मसलन प्याज को आयुर्वेद में राजसिक और तामसिक गुण का मानते हुए खाने की मनाही की गयी है क्योंकि यह हमारे तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित कर हमें सच्चाई के मार्ग से भटकाता है.यही कारण है कि ज्यादातर हिन्दू परिवारों में प्याज या इससे बने व्यंजन भगवान को भोग में नहीं चढ़ाए जाते. जिस प्याज को हम अपने आराध्य देव को नहीं खिला सकते उसे खरीदने के लिए इतनी बेताबी क्यों? एक पश्चिमी विद्वान का कहना है कि प्याज हमारी जीवन ऊर्जा को घटाती है. यही नहीं प्याज में बैक्टीरिया को खींचने की इतनी जबरदस्त क्षमता होती है कि यदि कटी कच्ची प्याज को दिनभर खुले में तो क्या फ्रिज में भी रख दिया जाए तो यह इतनी जहरीली हो जाती है कि हमारे पेट का बैंड बजा सकती है.
सोचिये, हम एकजुट होकर अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल सकते हैं,भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं पर मामूली सी प्याज को छोड़ने की हिम्मत नहीं दिखा सकते और वह भी महज चंद दिनों के लिए?  देश में गरीबी,अशिक्षा,बीमारी,भ्रष्टाचार,क़ानून-व्यवस्था,कन्या भ्रूण हत्या,दहेज,बाल विवाह जैसी ढेरों समस्याएँ हैं इसलिए प्याज के लिए आंसू बहाना छोड़िये और यह साबित कर दीजिए कि हम प्याज के बिना भी काम चला सकते हैं.....तो नेक काम की शुरुआत आज नहीं बल्कि अभी से क्यों नहीं.

शनिवार, 3 अगस्त 2013

यह प्यार है या फिर क्षणिक वासना का आवेग...!

ये कैसा प्यार है जो अपने सबसे आत्मीय व्यक्ति पर कुल्हाड़ी चलाने का दुस्साहस करने दे? या दुनिया में सबसे प्रिय लगने वाले चेहरे को ही तेज़ाब से विकृत बना दे या फिर जरा सा मनमुटाव होने पर गोली मारकर अपने प्रेमी की जान ले लेने की हिम्मत दे दे? यह प्यार हो ही नहीं सकता.यह तो प्यार के नाम पर छलावा है,दैहिक आकर्षण है या फिर मृग-मरीचिका है. प्यार तो सब-कुछ देने का नाम है, सर्वत्र न्यौछावर कर देने  और हँसते हँसते अपना सब कुछ लुटा देने का नाम है.प्यार बलिदान है,अपने प्रेमी पर खुशी-खुशी कुर्बान हो जाना है और खुद फ़ना होकर प्रेमी की झोली को खुशियों से भर देने का नाम है. यह कैसा प्यार है जो साल दो साल साथ रहकर भी एक-दूसरे पर विश्वास नहीं जमने देता. प्यार तो पहली मुलाक़ात में एक दूसरे को अपने रंग में रंग देता है और फिर कुछ पाने नहीं बल्कि खोने और अपने प्रेमी पर तन-मन-धन लुटा देने की चाहत बढ़ जाती है.प्यार के रंग में रंगे के बाद प्रेमी की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं रह जाता.
मजनूं ने तो लैला पर कभी चाकू-छुरी नहीं चलाई? न ही कभी तेज़ाब फेंका? उलटे जब मजनूं से जमाना रुसवा हुआ तो लैला ढाल बन गई,पत्थरों की बौछार अपने कोमल बदन पर सह गयी.तभी तो उनका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है.इसीतरह न ही कभी महिबाल को सोहिनी पर और न ही हीर-राँझा को एक दूसरे पर कभी शक हुआ और न ही एक-दूसरे को मरने मारने की इच्छा हुई. वे तो बस एक दूसरे पर मर मिटने को तैयार रहते थे.एक दूसरे की खुशी के लिए अपना सुख त्यागने को तत्पर रहते थे. वे कभी एक दूसरे के साथ मुकाबले,प्रतिस्पर्धा,ईर्ष्या,द्वेष और जलन में नहीं पड़े. यह भी उस दौर की बात है जब प्रेमी-प्रेमिका का मिलना-साथ रहना तो दूर एक झलक पा जाना ही किस्मत की बात होती थी.तमाम बंदिशें,बाधाएं,रुकावटें,सामाजिक-सांस्कृतिक बेड़ियों के बाद भी वे एक दूसरे पर कुर्बान हो जाते थे. मीरा ने कृष्ण के प्रेम में हँसते-हँसते जहर का प्याला पी लिया था. प्रेमी का अर्थ ही है एक-दूसरे के हो जाना,एक-दूसरे में खो जाना,एक-दूसरे पर जान देना और दो शरीर एक जान बन जाना, न कि एक दूसरे की जान लेना. प्रेम होता ही ऐसा है जिसमें अपने प्रियजन के सम्बन्ध में सवाल-जवाब की कोई गुंजाइश ही नहीं होती. आज के आधुनिक दौर में जब युवाओं को एकदूसरे के साथ दोस्ती बढ़ाने,घूमने-फिरने,साथ रहने और सारी सीमाओं से परे जाकर एक- दूसरे के हो जाने की छूट हासिल है उसके बाद भी उनमें अविश्वास का यह हाल है कि जरा सी नाराजगी जानलेवा बन जाती है, किसी और के साथ बात करते देख लेना ही  मरने-मारने का कारण बन जाता है. जिससे आप सबसे ज्यादा प्यार करने हैं उस पर तेज़ाब फेंकने की अनुमति आपका दिल कैसे दे सकता है फिर आप चाहे उससे लाख नाराज हो.अब तो लगता है कि इंस्टेंट लवने प्यार की गहराई को वासना में और अपने प्रेमी पर मर मिटने की भावना को मरने-मारने के हिंसक रूप में तब्दील कर दिया है. शिक्षा के सबसे अव्वल मंदिरों में ज्ञान के उच्चतम स्तर पर बैठे युवाओं का यह हाल है कि वे प्रेम के ककहरे को भी नहीं समझ पा रहे और क्षणिक और दैहिक आकर्षण को प्यार समझकर अपना और अपने साथी का जीवन बर्बाद कर रहे हैं. शायद यही कारण है कि इन दिनों समाज में विवाह से ज्यादा तलाक़ और प्रेम से ज्यादा हिंसा बढ़ रही है.मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि समाज एवं परिवार से कटे आत्मकेंद्रित युवाओं में किसी को पाने की इच्छा इतनी प्रबल हो गयी है कि वे इसके लिए बर्बाद होने या बर्बाद करने से भी पीछे नहीं हटते. क्षणिक सुख की यह ज़िद समाज में नैतिक पतन का कारण बन रही है और इससे प्रेम जैसा पवित्र,पावन और संसार का सबसे खूबसूरत रिश्ता भी कलंकित हो रहा है. (चित्र सौजन्य:fanpop.com)  


गुरुवार, 25 जुलाई 2013

हे भगवान,यह क्या सिखा रही है मेट्रो ट्रेन हमें...?

दिल्ली की जीवन रेखा बन चुकी नए जमाने की मेट्रो ट्रेन में चढ़ते ही एक सन्देश सुनाई देता है इस सन्देश में यात्रियों को सलाह दी जाती है कि किसी भी अनजान व्यक्ति से दोस्ती न करे. जब जब भी मैं यह लाइन सुनता हूँ मेरे दिमाग में यही एक ख्याल आता है कि  क्या नए जमाने की मेट्रो ट्रेन हमें दोस्ती का दायरा सीमित रखने का ज्ञान दे रही है? सीधी और सामान्य समझ तो यही कहती है कि यदि हम अपने साथ यात्रा करने वाले सह यात्रियों या अनजान लोगों से जान-पहचान नहीं बढ़ाएंगे तो फिर परिचय का दायरा कैसे बढ़ेगा और जब परिचय का विस्तार नहीं होगा तो दोस्ती होने का तो सवाल ही नहीं है. तो क्या हमें कूप-मंडूक होकर रह जाना चाहिए? या जितने भी दो-चार दोस्त हैं अपनी दुनिया उन्हीं के इर्द-गिर्द समेट लेनी चाहिए. वैसे भी आभाषी (वर्चुअल) रिश्तों के मौजूदा दौर में मेट्रो क्या, किसी से भी यही अपेक्षा की जा सकती है कि वह आपको यही सलाह दे कि आप कम से कम लोगों से भावनात्मक सम्बन्ध बनाओ और आभाषी दुनिया में अधिक से अधिक समय बिताओ.इससे भले ही घर-परिवार टूट रहे हों परन्तु वेबसाइटों.इंटरनेट और इनके सहारे धंधा करने वालों की तो मौज है.

  अभी तक रेलवे द्वारा संचालित ट्रेनों में और स्टेशनों पर यह जरुर सुनने/पढने को मिलता था कि किसी अनजान व्यक्ति के हाथ से कुछ न खाए.यहाँ तक तो बात फिर भी समझ में आती है कि जिसे आप जानते नहीं है उसके हाथ से कुछ भी खाना-पीना व्यक्तिगत सुरक्षा के लिहाज से उचित नहीं है. ट्रेनों में ज़हरखुरानी या नशीले पदार्थ खिलाकर आम यात्रियों को लूटने की बढ़ती घटनाएं रेलवे की इस नसीहत को उचित भी ठहराती हैं लेकिन किसी से मिले नहीं,मेल-जोल न बढ़ाएं और दोस्ती ही न करें. भला यह कैसी बात हुई? यह तो भारतीय संस्कृति की भावनाओं के खिलाफ उल्टी गंगा बहाने वाली बात हुई. कहाँ तो हमारी संस्कृति मिल-जुलकर रहने,भाईचारे और पंचशील के सिद्धांत की बात करती है,वहीं नए ज़माने की मेट्रो ट्रेन हमें अपने ही लोगों से दूर जाने का पाठ पढ़ा रही है.वैसे दिल्ली मेट्रो कई उलटबांसियों का शिकार है.मसलन मेट्रो में चढ़ते ही सन्देश गूंजने लगता है कि कृपया बुजुर्गों,विकलांगों और महिलाओं को सीट दें,लेकिन उस समय सीट पर बैठकर मोबाइल के दीन दुनिया से परे खिलवाड़ में डूबे लोग आँख बन्द कर सोने का बहाना करके या फिर कानों में ईयर प्लग ठूंसकर इसे आमतौर पर अनसुना करते रहते हैं. इसीतरह एक अन्य सन्देश में आगाह किया जाता है कि मेट्रो ट्रेन में खाना-पीना वर्जित है,परन्तु लोग इस निर्देश को ताक पर रखकर पूरी ठसक के साथ चिप्स,बर्गर और पता नहीं क्या क्या अपने पेट में उतारते रहते हैं. इस मामले में सबसे आगे हमारी नई पीढ़ी और विज्ञापनों की भाषा में ‘जनरेशन एक्स’ है. इस पीढ़ी ने तो मानो  सारे निर्देशों,सलाह और सुझावों को रद्दी की टोकरी में डालने का फैसला कर रखा है तभी तो मेट्रो की बार-बार समझाइश के बाद भी वे ट्रेन के फर्श पर बैठकर मनमानी करते हैं,मेट्रो में प्रतिबन्ध के बाद भी जमकर एक दूसरे के फोटो खींचते हैं,वीडियो बनाते हैं ,जोर से गाना सुनते-सुनाते हैं भले ही आस-पास के लोग परेशान हो जाएँ और अब तो उनके कुछ कारनामे न्यूज़ चैनलों और अश्लील वेबसाइटों तक पर सुर्ख़ियों में हैं.ऐसे में दोस्ती,रिश्ते-नातों और भावनाओं की क्या अहमियत रह जाती है? शायद मेट्रो भी यही कहना चाहती है कि बस अपना उल्लू सीधा करो और सामुदायिक को दरकिनार कर आगे बढते रहो.   

गुरुवार, 23 मई 2013

क्रिकेट की कालिख को अपने पसीने और सपनों से धोता युवा भारत


दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी में दोपहर के तीन बजे इंदिरा गाँधी स्टेडियम के बास्केटबाल कोर्ट में पसीने से लथपथ सातवीं कक्षा की आद्या से लेकर ग्यारहवीं के अखिलेश तक हर एक बच्चे की आँखों में एक ही सपना नजर आता है-पहले स्कूल और फिर देश के लिए खेलना. पैसों,प्रसिद्धि,प्रतिष्ठा और प्रभाव से भरपूर क्रिकेट के सर्वव्यापी आतंक के बीच इन बच्चों का पैंतालीस डिग्री तापमान में घर से बाहर निकलकर दूसरे खेलों में रूचि दिखाना देश के लिए भी उम्मीद की किरण जगाता है. बास्केटबाल ही क्यों बच्चों के ऐसे झुण्ड सुबह सात बजे से लेकर शाम छह बजे तक बैडमिंटन,टेनिस,फ़ुटबाल से लेकर अन्य तमाम खेलों में उत्साह के साथ तल्लीन नजर आते हैं. न उन्हें तपते कोर्ट की चिंता है और न ही आने-जाने में होने वाली परेशानियों की. भोपाल,इंदौर,पटना लखनऊ से लेकर अहमदाबाद तक कमोवेश यही स्थिति है.बस फर्क है तो शायद सुविधाओं का मसलन दिल्ली में भारतीय खेल प्राधिकरण के उम्दा कोचों से लेकर कई निजी प्रशिक्षक बच्चों में खेलने की जिज्ञासा बढ़ा रहे हैं तो दूसरे शहरों में कम सुविधाओं और कम नामी कोच के बाद भी बच्चे जी-जान से जुटे हैं. गर्मी की छुट्टियाँ पड़ते ही बच्चे और उनके अभिभावक भविष्य के लिए नए रास्ते खोलने में जुट गए हैं क्योंकि गलाकाट प्रतिस्पर्धा के दौर में मार्कशीट पर दमकते अंकों भर से गुजारा नहीं है इसलिए कुछ न कुछ तो हटकर आना ही चाहिए.
         यहाँ बात प्रतिस्पर्धा की नहीं बल्कि अन्य खेलों में बच्चों की बढ़ती दिलचस्पी की हो रही है. बच्चे न भी समझे तो भी उनके माता-पिता तो इस बात को बखूबी जानते हैं कि उनका सरदारा सिंह देश के लिए कितनी भी ट्राफियां और तमगे बटोर ले फिर भी विराट कोहली या महेंद्र सिंह धोनी की लप्पेबाजी के बराबर सुर्खियाँ और ऐशोआराम ताउम्र नहीं जुटा पाएगा. मार्के की बात यही है कि यह सब जानने के बाद भी उन्होंने क्रिकेट को अपना धर्म और क्रिकेटरों को अपना भगवान नहीं माना. वे अपने बच्चों को प्रकाश पादुकोण, सानिया मिर्जा ,पीटी उषा और दीपिका कुमारी बनाकर भी खुश हैं. खेल से लेकर सिनेमा में और लेखन से लेकर राजनीति तक में लीक से हटकर काम करने वाला या धारा के विपरीत  चलने वाला यह विद्रोही तबका ही उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद जगाता है. यह विद्रोही प्रवृत्ति नहीं तो क्या है कि निजी ए़वं कारपोरेट सेक्टर में मिल रही मोटी तनख्वाह के बाद भी सैकड़ों युवा सेना में भर्ती होकर देश के लिए कुर्बान होने को तत्पर हैं या फिर प्रबंधन की ऊँची फीस वाली शिक्षा के बाद विदेश में लाखों रुपये महीने के वेतन को त्यागकर नवयुवक देश में ही कुछ कर दिखाने का संकल्प ले लेते हैं. वैसे भी जब लाखों-करोड़ों रुपए के बारे-न्यारे करने वाले क्रिकेट के तथाकथित ‘भगवानों’ के आचरण,नीयत,धनलोलुपता और समर्पण पर ही सवाल खड़े होने लगे हों और मिलीभगत से बने फटाफट क्रिकेट की कालिख गहराने लगी हो तब यह और भी जरुरी हो जाता है कि बच्चे उन वास्तविक खेलों से रूबरू हों जहाँ एक-एक पदक के लिए दुनिया भर के तमाम देशों के सैकड़ों दिग्गज खिलाड़ी जान लड़ा देते हैं न की अँगुलियों पर गिने जा सकने वाले देशों के बीच होने वाले ‘कथित’ मुकाबले में चंद चौके-छक्के लगाकर रातों रात शोहरत बटोरने वाले खेल से. नई पीढ़ी के पसीने की गंध से क्रिकेट के पीछे आँख बन्द कर भागने वाले प्रायोजकों और मीडिया के खबरनवीसों को भी शायद होश आए और वे भी क्रिकेट की मृगतृष्णा से बाहर निकलकर असली खेलों और खिलाड़ियों का महत्व समझ सकें.          

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

बदल रही है हवा, इसके आंधी बनने से पहले सुधर जाओ मेरे यारो

सूचनार्थ: जुगाली के इसी लेख को 'सादरब्लागस्ते ' द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में राजधानी की प्रतिष्ठित संस्था शोभना वेलफेयर सोसाइटी द्वारा "ब्लाग रत्न" सम्मान से सम्मानित किया गया है....आप सभी सुधी पाठकों के लिए पेश है यह पुरस्कृत  आलेख.....
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महिलाओं के साथ बेअदबी और बदसलूकी से भरे विज्ञापनों के बीच छोटे परदे पर इन दिनों प्रसारित हो रहा एक विज्ञापन बरबस ही अपनी और ध्यान खींच रहा है.वैसे तो यह विज्ञापन किसी पंखे का है लेकिन इसकी पंचलाइन “हवा बदल रही है” चंद शब्दों में ही सामाजिक बदलाव की कहानी कह जाती है. विज्ञापन में एक युवा जोड़ा कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन करता सा नजर आता है और जब वहां मौजूद महिला अधिकारी युवती से पूछती है कि विवाह के बाद उसका सरनेम बदलकर क्या हो जाएगा? तो उसके कोई जवाब देने से पहले ही साथी युवक कहता है कि इनका सरनेम नहीं बदलेगा बल्कि मैं अपना सरनेम इनके सरनेम से बदल रहा हूँ. यह सुनकर महिला अधिकारी के साथ-साथ टीवी के सामने बैठे कई परिवार भी मंद-मंद मुस्कराने लगते हैं. दरअसल भारतीय समाज में विवाह के बाद भी महिला का ‘सरनेम’ बरक़रार रहना या पति द्वारा पत्नी का सरनेम अपनाना हमारी मानसिकता में बड़े बदलाव का परिचायक है.    
वाकई में हवा बदल तो रही है या यों कहें कि बदलाव की बयार सी चल पड़ी है. हवा में मिली परिवर्तन की महक से महानगरों के साथ गाँव-कस्बे भी महकने लगे हैं. अब बस इंतज़ार तो इस बात का है कि देश कब इस बदलाव की खुशबू में शराबोर होता है क्योंकि जैसे जैसे बदलाव की यह हवा जोर पकडेगी इसकी रफ़्तार आंधी में तब्दील हो जाएगी और जब आंधी चलती है तो वह सब-कुछ बदलकर रख देती है. वह पुरानी परिपाटियों,रूढ़ियों,बेड़ियों और सड़ी-गली व्यवस्थाओं को तहस-नहस कर नए जीवन और नई सोच का सृजन करती है. कुछ ऐसा ही बदलाव इन दिनों समाज में महिलाओं के प्रति दिखाई पड़ रहा है. हालांकि समाज में इस परिवर्तन की रफ़्तार बहुत धीमी है लेकिन जैसे शरीर को झुलसा देने वाली तपिश के दौरान मंद-मंद बहने वाली हवा भी राहत पहुंचती है उसी तरह महिलाओं के प्रति समाज में आ रहा यह बदलाव भले ही अभी प्रतीकात्मक है लेकिन आशा और विश्वास से भरपूर है तथा इसने आमूल-चूल परिवर्तन की बुनियाद तो रख ही दी है. 
      परिवर्तन का असर चहुँओर दिखाई दे रहा है. दिल्ली में ‘निर्भया’ के साथ हुए चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार की दुखद घटना के बाद गुस्से से उठ खड़े हुए समाज ने भी बदलाव की विश्वास जगाने वाली तस्वीर पेश की थी. इसके बाद तो मानो देश के कोने-कोने से ‘बदलो-बदलो’ की आवाज़ आने लगी है. महानगरों में ‘स्लटवाक’ जैसे आयोजन, सरकार द्वारा महिलाओं के हित में कानून में किये जा रहे संशोधन, हर क्षेत्र में बेटियों को मिलती सफलता, मलाला युसुफजई और हमारी निर्भया का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित होना, प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के विभिन्न स्तरों पर महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, मेट्रो से लेकर महानगरों की बसों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें, टीवी पर महिलाओं की सशक्त भूमिका वाले धारावाहिक और विज्ञापन, सरकारी स्तर पर महिला बैंक खोलने और महिलाओं की सुरक्षा के लिए ‘निर्भया कोष’ बनाने की घोषणा जैसे तमाम कदम प्रतीकात्मक, मामूली और शायद कुछ लोगों को दिखावे भरे लग सकते हैं लेकिन किसी भी स्तर पर कम से कम शुरुआत तो हो रही है. मीडिया भी टीआरपी के लिए ही सही परन्तु महिला मामलों में सजग हो रहा है. आए दिन सामने आ रहे समाचार बता रहे हैं कि एक दूसरे से प्रेरणा लेकर बेटियाँ बाल विवाह का खुलकर विरोध करने लगी हैं. अपने मजबूर माँ-बाप, रिश्तेदारों और समाज की कथित रुढिवादी परम्पराओं की परवाह नहीं करते हुए वे खूब पढ़ना चाहती हैं,आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं ताकि  किसी बड़ी उम्र के,दहेज लोलुप एवं नशे के आदी पुरुष का सिंदूर अपनी मांग में भरकर जीवन भर की पीड़ा न सहना पड़े. इन सभी बातों का मतलब साफ़ है कि समाज के आईने पर बदलाव की इबारत उभरने लगी है.अब भी यदि हमारे समाज और समाज के कथित रहनुमा इस इबारत का अर्थ नहीं समझ पाए तो नए दौर की यह क्रांति उनका वजूद ही मिटा देगी.  

  

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

क्या किसी समाज का इससे अधिक नैतिक पतन हो सकता है?


अभी हाल ही में दो परस्पर विरोधाभाषी खबरें पढ़ने को मिली. पहली यह कि केरल के कुछ  स्कूलों में पढाने वाली महिला शिक्षकों को प्रबंधन ने साडी या सलवार सूट के ऊपर कोट या एप्रिन नुमा कोई वस्त्र पहनने की हिदायत दी ताकि कक्षा में बच्चों का शिक्षिकाओं की शारीरिक संरचना को देखकर ध्यान भंग न हो, साथ ही वे कैमरे वाले मोबाइल का दुरूपयोग कर चोरी-छिपे महिला शिक्षकों को विभिन्न मुद्राओं में कैद कर उनकी छवि से खिलवाड़ न कर सकें. वहीं दूसरी खबर यह थी कि एक निजी संस्थान ने अपनी एक महिला कर्मचारी को केवल इसलिए नौकरी छोड़ने के निर्देश दे दिए क्योंकि वह यूनिफार्म में निर्धारित स्कर्ट पहनकर आने से इंकार कर रही थी. कितने आश्चर्य की बात है कि संस्कारों की बुनियाद रखने वाले शिक्षा के मंदिर की पुजारी अर्थात शिक्षिका के पारम्परिक भारतीय वस्त्रों के कारण बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा और दूसरी और निजी संस्थान अपनी महिला कर्मचारियों को आदेश दे रहा है कि वे छोटे से छोटे वस्त्र मसलन स्कर्ट पहनकर कार्यालय में आयें ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों का मन शोरूम में लग सके.
जिस पाठशाला में शील,संस्कार, सद्व्यवहार, शालीनता और सच्चाई की सीख दी जाती है वहां बच्चे अपनी आदरणीय शिक्षिकाओं की अशालीन तस्वीर उतारने के लिए बेताब हैं और इन अमर्यादित शिष्यों से बचने के लिए बच्चों को डांटने-डपटने के स्थान पर हम ज्यादा आसान तरीका अपनाकर महिला शिक्षकों को वस्त्रों की परतों में ढककर आने को कह रहे हैं और जहाँ ग्राहक का पूरा ध्यान उस उत्पाद पर होना चाहिए जिसे खरीदने का मन बनाकर वह किसी शोरूम तक आया है वहां की महिला कर्मचारियों को ग्राहकों को रिझाने वाले कपड़े पहनाए जा रहे हैं. क्या किसी समाज का इससे अधिक नैतिक पतन हो सकता है जब गुरु को अपने स्कूल स्तर के शिष्य की वासनात्मक नजरों से डर लगने लगे. क्या बतौर अभिभावक यह हमारा दायित्व नहीं है कि हम बच्चों को मोबाइल फोन की आकस्मिकता से जुडी अहमियत समझाए और किसी भी संभावित दुरूपयोग की स्थिति बनने से पहले ही बच्चे को उसके दुष्परिणामों के बारे में गंभीरता के साथ चेता दें. सबसे बड़ी बात तो यह है कि घर का वातावरण भी इसप्रकार का नहीं होने दें कि हमारा बच्चा स्कूल में पढ़ने की बजाए अपनी गुरुओं की ही अश्लील तस्वीर उतरने की हिम्मत करने लगे. कहां जा रहा है हमारा समाज और हम? ऐसे में तो माँ को अपने बेटे और बहन को अपने भाई के सामने भी बुरका नुमा वस्त्र पहनकर रहने की नौबत आ सकती है. वैसे भी चचेरे,ममेरे और फुफेरे रिश्ते तो कलंकित होने की खबरें आने लगी हैं बस अब शायद खून के रिश्तों की बारी है क्योंकि शिक्षिकाओं को तो हम कोट पहनाकर बचा सकते हैं लेकिन घर में माँ-बहनों,भाभी,बुआ,मामी,चाची और मौसी को घर के ही ‘लालों’ से कितना और कैसे ढककर रखेंगे. क्या ‘एकल परिवार’ में रहने का मतलब सारे रिश्ते-नातों को तिलांजलि दे देना है? देखा जाए तो निगाहों में अशालीनता का पर्दा अभी शुरूआती दौर में है इसलिए ज्यादा कुछ नहीं बिगडा है क्योंकि आज सोच-समझकर खीचीं गयी संस्कारों की लक्ष्मणरेखा भावी पीढी को कुसंस्कारों के रावण के पाले में जाने से रोक सकती है और यदि समय रहते और समाज से मिल रहे तमाम संकेतों को अनदेखा करने की गलती हम इसीतरह करते रहे तो फिर भविष्य में घर घर चीर हरण करने वाले दुर्योधन-दुशासन नजर आएंगे और बेटियों के शरीर पर कपड़ों की तह पर तह लगानी पड़ेगी.   यह कि केरल शिक्षा समिति के अंतर्गत चलने वाले स्कूलों में पढाने वाली महिला शिक्षकों को प्रबंधन ने साडी या सलवार सूट के ऊपर कोट या एप्रिन नुमा कोई वस्त्र पहनने की हिदायत दी ताकि कक्षा में बच्चों का शिक्षिकाओं की शारीरिक संरचना को देखकर ध्यान भंग न हो, साथ ही वे कैमरे वाले मोबाइल का दुरूपयोग कर चोरी-छिपे महिला शिक्षकों को विभिन्न मुद्राओं में कैद कर उनकी छवि से खिलवाड़ न कर सकें. वहीं दूसरी खबर यह थी कि एक निजी संस्थान ने अपनी एक महिला कर्मचारी को केवल इसलिए नौकरी छोड़ने के निर्देश दे दिए क्योंकि वह यूनिफार्म में निर्धारित स्कर्ट पहनकर आने से इंकार कर रही थी. कितने आश्चर्य की बात है कि संस्कारों की बुनियाद रखने वाले शिक्षा के मंदिर की पुजारी अर्थात शिक्षिका के पारम्परिक भारतीय वस्त्रों के कारण बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा और दूसरी और निजी संस्थान अपनी महिला कर्मचारियों को आदेश दे रहा है कि वे छोटे से छोटे वस्त्र मसलन स्कर्ट पहनकर कार्यालय में आयें ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों का मन शोरूम में लग सके.
जिस पाठशाला में शील,संस्कार, सद्व्यवहार, शालीनता और सच्चाई की सीख दी जाती है वहां बच्चे अपनी आदरणीय शिक्षिकाओं की अशालीन तस्वीर उतारने के लिए बेताब हैं और इन अमर्यादित शिष्यों से बचने के लिए बच्चों को डांटने-डपटने के स्थान पर हम ज्यादा आसान तरीका अपनाकर महिला शिक्षकों को वस्त्रों की परतों में ढककर आने को कह रहे हैं और जहाँ ग्राहक का पूरा ध्यान उस उत्पाद पर होना चाहिए जिसे खरीदने का मन बनाकर वह किसी शोरूम तक आया है वहां की महिला कर्मचारियों को ग्राहकों को रिझाने वाले कपड़े पहनाए जा रहे हैं. क्या किसी समाज का इससे अधिक नैतिक पतन हो सकता है जब गुरु को अपने स्कूल स्तर के शिष्य की वासनात्मक नजरों से डर लगने लगे. क्या बतौर अभिभावक यह हमारा दायित्व नहीं है कि हम बच्चों को मोबाइल फोन की आकस्मिकता से जुडी अहमियत समझाए और किसी भी संभावित दुरूपयोग की स्थिति बनने से पहले ही बच्चे को उसके दुष्परिणामों के बारे में गंभीरता के साथ चेता दें. सबसे बड़ी बात तो यह है कि घर का वातावरण भी इसप्रकार का नहीं होने दें कि हमारा बच्चा स्कूल में पढ़ने की बजाए अपनी गुरुओं की ही अश्लील तस्वीर उतरने की हिम्मत करने लगे. कहां जा रहा है हमारा समाज और हम? ऐसे में तो माँ को अपने बेटे और बहन को अपने भाई के सामने भी बुरका नुमा वस्त्र पहनकर रहने की नौबत आ सकती है. वैसे भी चचेरे,ममेरे और फुफेरे रिश्ते तो कलंकित होने की खबरें आने लगी हैं बस अब शायद खून के रिश्तों की बारी है क्योंकि शिक्षिकाओं को तो हम कोट पहनाकर बचा सकते हैं लेकिन घर में माँ-बहनों,भाभी,बुआ,मामी,चाची और मौसी को घर के ही ‘लालों’ से कितना और कैसे ढककर रखेंगे. क्या ‘एकल परिवार’ में रहने का मतलब सारे रिश्ते-नातों को तिलांजलि दे देना है? देखा जाए तो निगाहों में अशालीनता का पर्दा अभी शुरूआती दौर में है इसलिए ज्यादा कुछ नहीं बिगडा है क्योंकि आज सोच-समझकर खीचीं गयी संस्कारों की लक्ष्मणरेखा भावी पीढी को कुसंस्कारों के रावण के पाले में जाने से रोक सकती है और यदि समय रहते और समाज से मिल रहे तमाम संकेतों को अनदेखा करने की गलती हम इसीतरह करते रहे तो फिर भविष्य में घर घर चीर हरण करने वाले दुर्योधन-दुशासन नजर आएंगे और बेटियों के शरीर पर कपड़ों की तह पर तह लगानी पड़ेगी.  

शनिवार, 30 मार्च 2013

सुशीला,मुनिया और गूंगों का दफ़्तर


कुछ साल पहले की ही बात होगी जब उसने राष्ट्रपति भवन से सटे और आम लोगों के लिए लगभग निषिद्ध हमारे कार्यालय परिसर में कदम रखा था और सरकारी दफ़्तर के विशुद्ध औपचारिक वातावरण में पायल की रुनझुन सुनकर हम सभी चौंक गए थे.चौकना लाजमी था क्योंकि सहकर्मी महिला साथियों के लिए खनकती पायल गुजरे जमाने की बात हो गयी थी और बाहर से पायल की छनछन के साथ किसी महिला का ‘प्रवेश निषेध’ वाले क्षेत्र में आना लगभग नामुमकिन था. हालांकि धीरे धीरे हम सभी इस छनछन के आदी हो गए.वह सुशीला थी बाल विवाह की जीवंत मिसाल, जो मध्यप्रदेश के छतरपुर से अपनी जड़ों को छोड़कर इन भव्य इमारतों के बीच अपने परिवार के साथ ठेके पर मजदूरी करने आई थी.गर्भवती सुशीला जब अपने पति और सास के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बोझा उठाती तो उसकी जीवटता को देखकर मेरे दफ़्तर की सहकर्मी महिलाओं के दिल से भी आह निकल जाती थी. वे गाहे-बेगाहे अपना टिफिन उसे खाने के लिए दे देतीं और इस मानवता के फलस्वरूप उस दिन उन्हें गोल मार्केट के खट्टे-मीठे गोलगप्पों और चाट-पकौड़ी से काम चलाना पड़ता. कुछ हफ्ते बाद ही इस निषेध क्षेत्र में एक नन्ही परी की किलकारियों ने घुसपैठ कर ली. उसका रुदन सुनकर ऐसा लगता मानो वह देश के सबसे संभ्रांत और बुद्धिजीवियों से भरी राजधानी दिल्ली की किस्मत पर रो रही हो जहाँ लक्ष्मी समान कन्या को जन्म लेने के पहले ही ‘स्वर्गवासी’ बना दिया जाता है.
लड़की पैदा होने के बाद भी न तो सुशीला की अनपढ़ सास ने उसे कोसा और न ही पति ने भला-बुरा कहा.वे सभी इस नन्ही मुनिया के साथ खुशियाँ मनाते हुए अपने काम में जुटे रहे.मुनिया भी दफ़्तर के गलियारे में उलटती-पलटती रहती और हम सभी को आते जाते देख टुकुर-टुकुर ताकती. बचपन से ही उसने दिल्ली की सर्दी और गर्मी को सहने की शक्ति हासिल कर ली.शायद ईश्वर भी बेटियों को जमाने से लड़ने के लिए कुछ अतिरिक्त ताकत बख्श देता है.समय बीतने के साथ वह हम सभी के बिस्किट,चाकलेट और आए दिन होने वाली पार्टियों की मिठाई में हिस्सा बांटने लगी.कुछ ही महीनों या यों कहें समय से पहले ही मुनिया अपने नन्हें क़दमों और मीठी सी किलकारी से हमारे कार्यालय की नीरवता और बोरियत को दूर करने का माध्यम बन गयी. हमारे बच्चों के पुराने होते कपड़े उसके लिए रोज नई पोशाख बन गए और कपड़ों से जुड़े अपनेपन ने मुनिया और हमारे दिल के तार और भी गहराई से जोड़ दिए. समय ने उड़ान भरी तो मुनिया के हिस्से के प्यार को बांटने के लिए दबे पाँव उसकी एक बहन और आ गयी. बस फिर क्या था ढंग से चलना भी नहीं सीख पायी मुनिया ने बिना कहे ‘छुटकी’ की आया की जिम्मेदारी भी संभाल ली. अपने घर और परिवार से हजारों किलोमीटर दूर हमारे दफ़्तर में तैनात संतरियों के लिए तो मोटा काजल लगाए दो चोटियों के साथ दिनभर गौरैया सी फुदकती मुनिया खिलौने की तरह थी. कभी कोई उसे गिनती सिखाता तो कोई ए बी सी डी तो कोई ककहरा. यहाँ तक की गेट पर पूरी मुस्तैदी के साथ अपनी ड्यूटी करने के दौरान भी वे मुनिया को देखते ही उससे ‘होमवर्क’ का हिसाब किताब करना नहीं भूलते. अब इतने बहुभाषी गुरुओं के बीच मुनिया भी कहां पीछे रहने वाली थी . हमारे दफ़्तर की ज्यादातर दीवारें मुनिया का ब्लैकबोर्ड बनकर आदिवासी चित्रकला का सा आभास देने लगी.अब तक छुटकी भी गिरते पड़ते उसके पीछे भागने लगी थी और दफ़्तर के कोने-कोने में फैली उसकी पाठशाला में अक्सर व्यवधान डाल देती मगर न तो मुनिया ने हार मानी और न ही हर तरफ फैले उसके सैन्य गुरुओं ने पढाने का कोई मौका छोड़ा. सैनिकों की देखा-देखी जब मुनिया सलामी ठोंकती तो कड़क अनुशासन में पगे सैन्य कर्मियों की भी हंसी छूट जाती.
        आज मुनिया चली गई.ठेकेदार के काम पर आश्रित उसके परिवार को यहाँ का काम समाप्त होते ही शायद नए ठिकाने पर भेज दिया गया था.सुशीला,मुनिया और छुटकी के जाते ही दफ़्तर के विशाल परिसर में फिर मनहूसियत समा गई.अब तक ‘काबुलीवाला’ के अंदाज में मुनिया से नाता जोड़ चुके फौजी साथी तो गमगीन थे ही, हम भी चिंतित और परेशान थे, इसलिए नहीं कि मुनिया क्यों चली गई क्योंकि उसे तो एक न एक दिन यहाँ से जाना ही था  बल्कि इसलिए कि कहीं वो भी अपनी माँ सुशीला की तरह बालिका वधु परंपरा की एक और कड़ी न बन जाए और फिर कुछ साल बाद ऐसे ही किसी दफ़्तर में समय से पहले गोद में बच्चा लिए पत्थर तोडती नजर आए. ईश्वर, मुनिया के बचपन को बचा लेना....प्लीज.(picture curtsy:guardian.co.uk)        

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

‘महालेखन’ पर महाबातचीत की महाशैली का महाज्ञान


महाबहस,महाकवरेज, महास्नान,महारैली,महाशतक,महाजीत और महाबंद जैसे शब्द इन दिनों हमारे न्यूज़ टीवी चैनलों  पर खूब गूंज रहे हैं.लगता है हमारे मीडिया को महा शब्द से कुछ ज्यादा ही प्रेम हो गया है. यही कारण है कि आजकल तमाम न्यूज़ चैनल इस शब्द का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर हैं लेकिन कई बार यह प्रयोग इतने अटपटे होते हैं कि एक तो उनका कोई अर्थ नहीं होता उल्टा कोई पूछ बैठे तो उसे समझाना मुश्किल हो जाता है कि यहाँ ‘महा’ लगाने की जरुरत क्या आन पड़ी थी. मसलन न्यूज़ चैनलों पर रोजमर्रा होने वाली बहस को महाबहस कहने का क्या तुक है? क्या बहस में दर्जनों विशेषज्ञों का पैनल है? या फिर चैनल पहली बार ऐसा कुछ करने जा रहा है जो ‘महा’ की श्रेणी में आता है. रोज के वही चिर-परिचित चार चेहरों को लेकर किसी अर्थहीन और चीख पुकार भारी बहस आखिर महाबहस कैसे हो सकती है? इसीतरह किसी राजनीतिक दल की रैली को महारैली या चंद शहरों तक केंद्रित बंद को महाबंद कहने का क्या मतलब है. यदि मामूली सा बंद महाबंद हो जायेगा तो वाकई भारत बंद जैसी स्थिति का बखान करने के लिए क्या नया शब्द गढ़ेंगे? महाकुम्भ तक तो ठीक है लेकिन महास्नान का क्या मतलब है? इस महा शब्द के प्रति मीडिया का लगाव इतना बढ़ गया है कि हाल ही धोनी के लगाए शतक को भी कुछ न्यूज़ चैनलों ने ‘महाशतक’ बता दिया. यदि दो सौ रन बनाना महाशतक की श्रेणी में आता है तो फिर अब तक सहवाग का तिहरा शतक ,ब्रायन लारा का चौहरा शतक या फिर उनके द्वारा एक पारी में बनाये गए पांच सौ रन क्या कहलायेंगे? इसीतरह सचिन,लक्ष्मण,द्रविण और गावस्कर की वे महान परियां क्या कहलाएंगी जो देश की जीत या हार से बचाने का आधार बनी.धोनी का दोहरा शतक महान हो सकता है और रिकार्ड के पन्नों पर अमिट स्थान बना सकता है लेकिन ‘महा’ तो नहीं कहा जा सकता. देश में हर साल बजट पेश होता है तो फिर किसी बजट को महाबजट और उसका रुटीन कवरेज ‘महाकवरेज’ कैसे कहलायेगा.
यदि हम किसी शब्दकोष या डिक्शनरी में तांक-झाँक करें तो ‘महा’ के लिए अत्यधिकहद से अधिकहद से ज़्यादा प्रबलशक्तिमान,  अति महानप्रचुर जैसे तमाम पर्याय मिलते हैं. अब यदि कोई भी काम पहली ही बार में हद से ज्यादा हो जायेगा तो फिर उससे बड़े कामों को हम क्या कहेंगे? न्यूज़ चैनलों पर चल रहे इस प्रयोग से मुझे दशक भर से ज्यादा पुरानी एक विज्ञापन श्रृंखला याद आ रही है जो दिल्ली के करोलबाग के पास रैगरपुरा से शुरू हुई थी. ’रिश्ते ही रिश्ते’ नामक इस विज्ञापन को देश के अधिकतर रेलवे स्टेशनों के करीबी इलाकों में देखा जा सकता था और उस दौर में जब न तो टीवी था और न ही प्रचार-प्रसार का मौजूदा चमकीला-भड़कीला अंदाज़, तब भी ‘रिश्ते ही रिश्ते’ ने धूम मचा दी थी. इसका परिणाम यह हुआ कि अब देश के तमाम बाजारों में इसी तर्ज पर ‘ही’ लगाकर खूब शब्द गढे और बुने जा रहे हैं मसलन बिस्तर ही बिस्तर, मकान ही मकान या फिर पुस्तकें ही पुस्तकें,लेकिन रचनात्मकता में नक़ल अभी भी असल का मुकाबला नहीं कर सकती इसलिए बाकी ‘ही’ उतने लोकप्रिय नहीं हो पाए. खासतौर पर दिल्ली में ऐसा ही एक प्रयोग ‘प्राचीन’ शब्द के साथ देखने को मिलता है. इस शब्द का उपयोग मंदिरों के नाम के साथ जमकर हो रहा है जैसे प्राचीन शिव मंदिर,प्राचीन दुर्गा मंदिर. हो सकता है वह मंदिर चंद साल पहले ही बना हो लेकिन प्राचीन शब्द जोड़कर उसे भक्तों के लिए प्राचीन बना देना सामान्य बात हो गयी है. दिल्ली वाले ‘पुरानी दिल्ली की मशहूर कचौड़ी’ जैसी पंचलाइन से भी अनजान नहीं है. आलम यह है कि किसी गली-कूचे में आजकल में खुली दुकान भी पुरानी दिल्ली की मशहूर दुकान हो जाती है फिर चाहे उस पर चार दिनों में ताला ही क्यों न लग जाए. कहने का आशय यह है कि किसी शब्द की लोकप्रियता को भुनाने के लिए हमारे यहाँ भेड़चाल शुरू हो जाती है फिर चाहे वह नक़ल निरर्थक,भोंडी और बेमतलब की ही क्यों न हो. 

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

महाकुंभ से कम नहीं है बंगलुरु का हवाई जहाजों का कुंभ


प्रयाग में गंगा के तट पर लगे आस्था के महाकुंभ  और दिल्ली में ज्ञान कुंभ 'राष्ट्रीय  पुस्तक मेले' के साथ साथ देश की सिलिकान सिटी बंगलुरु में भी एक अनूठा महाकुंभ  लगा। इस कुंभ का नाम था एयरो इंडिया  इस कुम्भ का आस्था से तो कोई सरोकार नहीं था लेकिन ज्ञान के लिहाज से यह सर्वथा उपयोगी था क्योंकि यहाँ  पिद्दी से ज़ेफायर विमान से लेकर तेजतर्रार तेजस और भीमकाय ग्लोबमास्टर विमान  तक   केवल मौजूद थे बल्कि हवा में अपने करतब भी दिखा रहे थे। जेफायर देखने में तो नन्हा सा है परन्तु यह दुश्मन के इलाके में अन्दर तक जाकर जासूसी कर सेनाओं के लिए आँख कान का काम करता है। ग्लोबमास्टर को तो हम चलती फिरती सेना कह सकते हैं।इस विशालकाय विमान में सैनिक,टैंक,टॉप और मिसाइल तक समा जाती हैं। तेजस तो हमारा अपना अर्थात देश में बना लाडला लड़ाकू विमान है जो हमारे वैज्ञानिकों की तकनीकी प्रगति का सशक्त उदाहरण है। इनके अलावा एफ -16, राफेल एवं सुखोई जैसे हवाई जहाज भी थे जिनकी गडगडाहट से दुश्मन का कलेजा थरथराने लगता है। इन विमानों  के कारनामे इतने खतरनाक थे कि  देखने वालों की साँसे थम जाए। आश्चर्यजनक,अद्भुत ,अद्वितीय ,अनूठा,अनमोल जैसे तमाम शब्द भी इन विमानों के खौफनाक कारनामों के सामने छोटे लगते हैं। हेलिकाप्टरों की बात करें तो यहाँ सरल-सौम्य  ध्रुव और इसका लड़ाकू संस्करण रूद्र से लेकर धनुष तक अपनी कलाबाजियां दिखा रहे  थे  इसके अलावा भारतीय वायुसेना की हेलीकाप्टर टीम सारंग,चेक गणराज्य से आई फ्लाइंग बुल्स और रूस की रसियन नाइट्स जैसी दिग्गज टीम भी थी जो आकाश में जब अपने जौहर दिखाती हैं तो देखने वालों की रूह तक काँप जाती है। आसमान में इनकी अठखेलियाँ,हैरतअंगेज़ करतब और अदभुत  संतुलन को देखकर लगता है कि  वास्तव में जीवन-मरण के बीच मामूली सा अंतर होता है। पांच दिनों का यह आयोजन देखने वालों के लिए जीवन भर की उपलब्धि से कम नहीं होता। इस दौरान आसमान में अलग-अलग आकार-प्रकार और इन्द्रधनुषी रंगों  के इतने सारे विमान वैसे ही  नजर रहे थे  जैसे मकर संक्रान्ति,लोहड़ी और गणतंत्र दिवस पर देश के तमाम हिस्सों में उड़ती पतंगे दिखती हैं। विमानों के अलावा विमानों से जुड़े कलपुर्जे,नवीनतम प्रौद्योगिकी,वायुसेनाओं के काम आने वाले सहायक उपकरणों सहित देश की तकनीकी कार्य-कुशलता का आइना  भी यहाँ दिखाई दिया  एयरो इंडिया का आयोजन 1996 से हो रहा है और हर दो साल बाद एशिया का यह सबसे बड़ा मेला  बंगलुरु के करीब यलहंका एयरबेस  में लगता है। इस साल फरवरी के दूसरे हफ्ते में दुनिया भर से रोमांच की तलाश में आये लोगों, हवाई जहाज बनाने वाली कम्पनियों और विमानों की खरीद-फरोख्त से जुड़े व्यवसाइयों का यहाँ जमावड़ा हुआ और जमकर व्यवसाय भी हुआ। आम लोगों के लिए तो यह किसी सपने के पूरा होने जैसा है क्योंकि एक साथ दुनिया भर के हवाई जहाजों को कारगुजारियां करते हुए करीब से देखना वाकई  दिलचस्प और अविस्मरणीय  अनुभव होता  है और मुझे इन  नितांत अलग नजारों का आनंद उठाने का मौका मिला।

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