शनिवार, 3 जून 2017

बिना पंखों के शिखर छूती प्रतिभाएं

प्रतिभाएं कभी सुविधाओं की मोहताज नहीं होती बल्कि वे अवसरों का इंतज़ार करती हैं ताकि वक्त की कसौटी पर स्वयं को कस सकें. असम बोर्ड की इस बार की परीक्षाओं में कई ऐसे मेधावी छात्रों ने अपने परिश्रम का लोहा मनवाया है जिनके घर में पढाई का खर्च निकालना तो दूर, दो वक्त के खाने के भी लाले पड़े रहते हैं. 

सिलचर के राज सरकार के पास रंग और ब्रश खरीदने के पैसे नहीं हैं फिर भी उसने फाइन आर्ट्स में पूरे राज्य में अव्वल स्थान हासिल किया है. राज को 100 में से 100 अंक मिले हैं. आलम यह है कि उसके स्कूल में इस विषय को पढ़ाने-सिखाने वाले शिक्षक तक नहीं है और उसके माता-पिता भी दैनिक मजदूर हैं इसलिए घर में इस कला को समझने वाला कोई नहीं है लेकिन एकलव्य की तरह साधना करते हुए राज ने अपने परिश्रम से ऐसा मुकाम हासिल कर लिया है अब राज्य सरकार से लेकर कई स्थानीय संस्थाएं भी उसकी मदद को आगे आ रही हैं.

राजदीप दास की कहानी तो और भी पीड़ादायक है. बचपन से ही पोलियो के कारण वह चल फिर नहीं सकता था लेकिन पढाई के प्रति लगन देखकर उसके पिता प्रतिदिन गोद में लेकर स्कूल आते थे. ऐन परीक्षा के पहले उसके दाहिने हाथ ने भी काम करना बंद कर दिया. रिक्शा चालक पिता की हैसियत इतनी नहीं थी कि तुरंत इलाज करा सकें. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी राजदीप ने पढाई नहीं छोड़ी और उसने बोर्ड परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर परिवार और स्कूल का नाम रोशन कर दिया. अनपढ़ माता पिता के लिए तो अपने दिव्यांग बेटे की यह सफलता मेरिट लिस्ट में पहला स्थान पाने जैसी है. अब राजदीप प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए बड़ा अधिकारी बनकर न केवल अपने परिवार के आर्थिक संकट को दूर करना चाहता है बल्कि अन्य बच्चों के लिए भी आदर्श बनना चाहता है.  

मजदूर परिवार की दायिता पुष्पा की कहानी तो और भी अनूठी है. असम बोर्ड के 12वीं के नतीजों में उसे फेल दिखाया गया था। छात्रा और उसके स्कूल ने जब बोर्ड से इस संबंध में बात की तो पता चला कि वह फेल नहीं, बल्कि उसने टॉप टेन में शामिल है।

दरअसल बोर्ड की गफलत के चलते दायिता को एक विषय में अनुपस्थित मानकर फेल कर दिया गया । जांच में पता चला कि छात्रा अनुपस्थित नहीं थी बल्कि गलती से उसके अंक जुड़ नहीं पाए थे। बोर्ड ने अपनी गलती मानते हुए तत्काल ही उसका संशोधित रिजल्ट घोषित करते हुए बताया कि दायिता पुष्पा ने टॉप टेन में सातवां स्थान हासिल किया है। उसे कुल 500 में 471 अंक मिले हैं।


लिंटन नामसुद्र, अमन कुर्मी,विक्रम सूत्रधार जैसे कई नाम हैं जिन्होंने इस वर्ष गरीबी, स्कूल से दूरी, संसाधनों का अभाव जैसी तमाम प्रतिकूल स्थितियों में भी अपनी मेहनत से साबित कर दिया है कि यदि किसी भी काम को करने की लगन और उत्साह हो तो सफलता की राह कोई नहीं रोक सकता. 

#result #divyang  #fine arts   

रविवार, 12 मार्च 2017

अब नहीं सुनाई देगी ‘बाउल’ के बाज़ीगर की मखमली आवाज़

ढपली, ढोलक और डुगडुगी जैसे वाद्ययंत्र तो बंगाल की प्रसिद्ध लोकशैली ‘बाउल’ में अब भी अपनी मौजूदगी उतनी ही शिद्दत से दर्ज कराएँगे लेकिन शायद उनमें वो चिर-परिचित तान/खनक और जोश नहीं होगा क्योंकि लोक संगीत ‘बाउल’ के बाज़ीगर कालिका प्रसाद भट्टाचार्य की मखमली आवाज़ जो अब हमारे बीच नहीं होगी।
बंगाल के मशहूर लोक गीत गायक कालिका प्रसाद भट्टाचार्य का 7 मार्च 2017 को पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर एक्सप्रेस वे पर एक सड़क हादसे में निधन हो गया था। वे अपने बैंड "दोहार" के सदस्यों के साथ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में पेश करने जा रहे थे। कालिका प्रसाद की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया था।
गायक एवं संगीतकार शांतनु मोइत्रा ने भट्टाचार्य के निधन पर दुख व्यक्त करते हुए कहा था, ‘‘ मैं चाहता हूं कि यह खबर गलत हो।'' वहीँ,संगीतकार देबोज्योति मिश्रा ने कहा, ‘‘ बंगाली संगीत में नए लोक तत्वों को शामिल करने का श्रेय उन्हें ही जाता है और जब भी मैं उनसे मिलता था उनकी रचनात्मक सोच मुझे स्तब्ध कर देती थी।''
ऐसा नहीं है कि असम के सिलचर में जन्मे कालिका प्रसाद से पहले बाउल लोकप्रिय नहीं था या अब इसे गाने वाले नहीं बचे हैं लेकिन बाउल को जीने वाले और लोक संगीत को अपनी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बनाने वाला जरुर चला गया है। कालिका प्रसाद ने हमेशा ही लोक संगीत के साथ अद्भुत प्रयोग किए हैं। उन्होंने फ्यूजन से लेकर गुमनाम वाद्य यंत्रों को खोज निकालने और फिर उनका बाउल में बखूबी इस्तेमाल करने जैसे अनेक अविस्मरणीय काम किए हैं। यही कारण है कि उनकी टीम ‘दोहार’ के प्रदर्शन का लोगों को इंतज़ार रहता था और कालिका प्रसाद भी अपने चाहने वालों को विविधता के मामले में कभी निराशा नहीं करते थे इसलिए नागालैंड के ‘ताती’ से लेकर मिज़ोरम के ‘खुआंग’ तक और त्रिपुरा के ‘सारिन्दा’ से लेकर मणिपुर के ‘पेना’ जैसे वाद्य यंत्र तक उनके इशारों पर नाचते थे। जब वे तल्लीन होकर बाउल में खो जाते थे तो उनके साथ दर्शक भी लय-ताल मिलाने लगते थे।  
कालिका प्रसाद दरअसल ‘अध्येता-गायक’ थे। वे केवल लोकगीत नहीं ढूंढते थे बल्कि उसकी उत्पत्ति, उसमें शुमार शब्दों के अर्थ और लोक संस्कृति में उस गीत के महत्व तक का अध्ययन करते थे। तभी तो उन्हें बंगाली लोक संगीत का ‘एनसाइक्लोपीडिया’ कहा जाता है। टीवी चैनलों पर आने वाले संगीत कार्यक्रमों में उनके इस लोक-ज्ञान से आए दिन नए गायकों और आयोजकों को रूबरू होने का अवसर मिलता रहता था। कालिका प्रसाद के पास भारत से लेकर बंगलादेश देश तक की स्थानीय जीवन शैली से जुड़े 6000 से ज्यादा गीतों का शोधपरक संग्रह था। उन्होंने जत्तीश्वर' (2014), ‘मोनोर मानूष' (2010) और बहुबन माझी' (2017) जैसी फिल्मों में न केवल गीत गाए हैं बल्कि अभिनय भी किया है।
 उनके करीबी लोग जानते हैं कि ‘दोहार’ कलिका प्रसाद के लिए एक लोक गायन समूह भर नहीं था बल्कि उनका सपना था जहाँ वे लोक संगीत की अपनी अलग दुनिया रचते थे और फिर उसमें संगीत रसिकों को शामिल कर उन्हें भाव-विभोर कर देते थे। बांग्ला भाषा के शब्द ‘दोहार’ का मतलब होता है दोहराना जैसे भजन मण्डली में समूह के अन्य सदस्य अपने मुख्य गायक की लाइन दोहराते हैं। जब सड़क दुर्घटना हुई तो उनके साथ ‘दोहार’ के बाकी सदस्य भी थे और बिल्कुल इस ग्रुप की गायन शैली के अंदाज़ में उन सभी ने इस दुर्घटना का एक साथ सामना किया। कालिका तो नहीं रहे परन्तु उनके अन्य साथियों की हालत भी गंभीर हैं जैसे कह रहे हैं कि कालिका तुम जो करोगे हम भी उसका अनुशरण करेंगे। 
कालिका प्रसाद का एक लोकप्रिय गीत है-“तोरे रीत माझारे राखवो छेड़े देवो न..”, इसका तात्पर्य है कि ‘मैं तुम्हें सदैव अपने दिल में रखूँगा कभी भूलूंगा नहीं’, परन्तु कालिका के चाहने वालों को शायद यह पता नहीं था कि यह केवल गीत नहीं बल्कि हक़ीकत है। अब उन्हें कालिका को अपने दिल में सहेज कर रखना होगा और उनके गीतों में जिंदा रखना होगा क्योंकि वे तो अपना वादा तोड़कर चले गए-सबसे दूर..बहुत दूर।   



शुक्रवार, 10 मार्च 2017

किगाली से सीखिए सफाई क्या होती है..!!!

My visit to Rwanda-Uganda with Vice President: Three 
हमारे देश में भले ही आज भी एक बड़ा वर्ग सरकार के स्वच्छता अभियान को बेमन से स्वीकार कर सफाई के नाम पर ढकोसला कर रहा हो लेकिन पूर्वी अफ़्रीकी देश रवांडा में सफाई ढकोसला नहीं दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा है और हर महीने के आखिरी शनिवार को यह साफ़ नजर भी आता है जब पूरा देश अनिवार्य रूप से साफ़-सफाई में जुट जाता है. रवांडा में 18 साल से लेकर 65 साल तक के हर महिला-पुरुष को सफाई अभियान में शामिल होना अनिवार्य है वरना उसे कठोर सज़ा का सामना करना पड़ता है. यहाँ तक की रवांडा के राष्ट्रपति से लेकर हर आम-ओ-खास को स्वच्छता अभियान में अनिवार्य रूप से शामिल होना पड़ता है तथा वह भी तस्वीर भर खिंचाने के लिए नहीं बल्कि वास्तविक सफाई के लिए और यह रवांडा के हर गली-कूंचे की सफाई को देखकर समझा जा सकता है. यही वजह है कि रवांडा की राजधानी किगाली को अफ्रीका के सबसे साफ़-सुथरे और सुरक्षित शहर का तमगा हासिल है
एक और बात, यहाँ 2008 से किसी भी तरह के प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध है और यह कोई दिखावटी प्रतिबन्ध नहीं है बल्कि इस पर कड़ाई से अमल होता है. नियम तोड़ने वालों के लिए 150 डालर तक का जुर्माना है. रवांडा की मुद्रा यानि रवांडन फ्रेंक में यह राशि करीब 1 लाख 24 हजार फ्रेंक होती है. यह जुर्माना तो प्लास्टिक का इस्तेमाल करने वालों के लिए है लेकिन यदि किसी दुकानदार ने आपको प्लास्टिक के बैग में सामान दे दिया तो समझो वह गया 6 माह से लेकर एक साल तक के लिए जेल. यही कारण है कि यहाँ माल से लेकर मामूली दुकान तक प्लास्टिक का कोई नामलेवा नहीं मिलता और बाहर से आने वाले हम जैसे पर्यटकों को गाइड या होटल संचालक पहले ही आगाह कर देते हैं कि आप अपने साथ लाये प्लास्टिक के बैग बाहर लेकर मत निकलिए.
शायद यही कारण है कि कभी दुनिया के सबसे बड़े नरसंहार (Rwandan Genocide) के लिए बदनाम यह देश आज ‘हंड्रेड्स आफ माउन्टेन्स एंड मिलियंस आफ स्माइल’ अर्थात सैकड़ों पर्वतों और लाखों मुस्कराहटों वाला देश कहलाता है.....शायद हम रवांडा से कुछ सीख पाएं!!!


बुधवार, 8 मार्च 2017

युगांडा का जिंजा शहर : जहां बसते है गांधी जी के प्राण

  My Rwanda-Uganda visit with Vice President: One       जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कि मुझे उपराष्ट्रपति श्री मो हामिद अंसारी जी के साथ 19-23 फरवरी 2017 तक अफ्रीकी देशों Rwanda और Uganda की यात्रा का सुअवसर मिला।मैं प्रयास करूंगा कि इस यात्रा के किस्सों, इन देशों की खूबसूरती एवं खूबियों से आपको रूबरू कराऊं।फिलहाल शुरुआत जिंजा में महात्मा गांधी की प्रतिमा से।नील नदी के उद्गम स्थल पर 1997 से स्थापित यह प्रतिमा यहां भारतीयता के साथ साथ शांति और सद्भाव की भी परिचायक है। यहां इसकी देखभाल की जिम्मेदारी बैंक आफ बड़ौदा ने संभाल रखी है। खास बात यह है कि यहीं नील नदी के उद्गम स्थल पर महात्मा गांधी की इच्छा के मुताबिक उनकी अस्थियां भीं विसर्जित की गई थी। जिंजा, राजधानी कंपाला से करीब 81किमी दूर है और भारतीय लोगों का गढ़ है। यहां के सबसे धनी लोगों में माधवानी समूह(अभिनेत्री मुमताज वाला),जय मेहता (मिस्टर जूही चावला) और रूपारेलिया समूह है जो तीनों भारतीय हैं।
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स्टेट हाउस यानि युगांडा में सत्ता का शक्तिशाली गढ़

                                 
My Rwanda-Uganda visit with Vice President: Two        ये है युगांडा के राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास यानि स्टेट हाउस (State House) या राष्ट्रपति भवन...वैसा ही जैसा दिल्ली में हमारा राष्ट्रपति भवन है या फिर अमेरिका का व्हाइट हाउस. राजधानी कम्पाला(Kampala) से लगभग 37 किलोमीटर दूर एंटेबे (Entebbe) शहर में बना यह स्टेट हाउस तक़रीबन साढ़े 17 हजार वर्गमीटर में फैला है. अन्य देशों से आने वाले मेहमानों का स्वागत यहीं किया जाता है. हाल ही में 22-23 फरवरी के दौरान हमारे उपराष्ट्रपति श्री मो हामिद अंसारी युगांडा गए थे हमें भी इस स्टेट हाउस को अन्दर से देखने का मौका मिला. इस झक सफेद इमारत का निर्माण हमारे राष्ट्रपति भवन (पहले वाइसराय भवन) की तरह ब्रिटिश हुकूमत ने कराया था. तब एंटेबे  ही युगांडा की राजधानी थी. युगांडा को 1966 में आज़ादी मिली और तब से यह यहाँ के राष्ट्रपति का स्थायी आवास और सत्ता का आधिकारिक केंद्र है. चूँकि एंटेबे में ही युगांडा का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है इसलिए कम्पाला के राजधानी बनने के बाद भी एंटेबे शहर का महत्व बना हुआ है. वैसे युगांडा में एक से ज्यादा स्टेट हाउस हैं लेकिन फिलहाल सत्ता की धुरी यही भवन है.

युगांडा के प्रथम राष्ट्रपति सर एडवर्ड मुतिसा (Sir Edward Muteesa) ने यहाँ रहना पसंद नहीं किया क्योंकि वे अपने महलों का मोह नहीं छोड़ पाए. इसीतरह युगांडा के सबसे चर्चित राष्ट्रपति ईदी अमीन (Idi Amin) ने भी 1971 की शुरुआत में तो इसका इस्तेमाल किया लेकिन बाद सुरक्षा के लिहाज से वे भी 1976 में इस सरकारी आवास को छोड़कर चले गए. बाद के राष्ट्रपतियों ने भी स्टेट हाउस की उतनी कद्र नहीं की लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति योवेरी के मुसेवनी (Yoweri K Museveni) ने न केवल इसको अपना आधिकारिक आवास बनाया बल्कि इसकी साज-संवार भी की. स्टेट हाउस को महज 1584 वर्गमीटर से बढ़ाकर साढ़े 17 हजार वर्गमीटर तक फैलाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. यहाँ के सम्मलेन कक्ष में एक साथ 500 मेहमान बैठ सकते हैं. इसके अलावा, स्टेट हाउस परिसर में प्रथम महिला (First Lady) का निवास, राष्ट्रपति के सलाहकारों के घर, सुरक्षा भवन, संचार भवन, कई सम्मलेन कक्ष, अतिथि कक्ष, मनोरंजन कक्ष और हेल्थ क्लब भी है. यह खूबसूरत भवन अब युगांडा की पहचान और सत्ता का प्रतीक है. स्टेट हाउस हमारे उपराष्ट्रपति के अलावा ब्रिटेन की महारानी सहित कई दिग्गजों की मेजबानी कर चुका है.

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