शनिवार, 16 सितंबर 2017

कड़क चाय नहीं, सफ़ेद चाय पीजिए जनाब !!




सफ़ेद चाय...और कीमत तक़रीबन 12 हजार रुपए किलो !!! हाल ही में  अरुणाचल प्रदेश के पूर्व सियांग जिले में स्थित डोनी पोलो चाय बागान की  सफेद चाय को 12,001 रुपये प्रति किग्रा कीमत मिली। यह तमाम प्रकार की  चायों के लिए सबसे ज्यादा कीमत है। असम के गुवाहाटी  स्थित टी नीलामी केंद्र (जीटीएसी) में पहली बार शुरू हुई सफेद चाय की नीलामी  में इस नई नवेली चाय ने सबसे ज्यादा कीमत हासिल कर यहां के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। मजे की बात तो यह है कि डोनी पोलो उद्यान  के पास भी बिक्री के लिए केवल 5.7किलोग्राम चाय थी और वह भी हाथों हाथ बिक गयी। वह भी तब, जब भारत में सफेद चाय बनाने वाले सबसे अच्छे उद्यान दार्जिलिंग के माने जाते  हैं।
हम यहाँ  ज्यादा दूध और कम पत्ती डालकर बनायीं गयी सफ़ेद चाय की बात नहीं कर रहें है बल्कि हम उस चाय की बात कर रहे हैं जो उत्पादन के स्तर पर ही सफ़ेद चाय कहलाती है । मेरी तरह ही बहुत लोगों कोसफ़ेद चाय सुनकर आश्चर्य होगा। वैसे चाय हमारे देश में किसी पहचान की मोहताज की नहीं है बल्कि यह तोघर-घर की पहचान है मसलन दूध वाली चाय,अदरक-इलायची वाली चाय, मसाला चाय,कट चाय और यदिआप पूर्वोत्तर में हैं तो यहाँ की लोकप्रिय लाल चाय, लिम्बू चाय( नींबू वाली चाय) और इसीतरह की तमामअन्य किस्मों/स्वादों वाली चाय।तो फिर ये जानना लाज़मी है कि आखिर ये सफ़ेद चाय है क्या बला?
सफेद चाय दरअसल में चाय की कई शैलियों में से एक है, जिन्हें हम ताज़ा या कम प्रसंस्कृत पत्तियां कह सकते है। ऐसा माना जाता है कि चाय की कलियों और नई पत्तियों के आसपास सफ़ेद रोएं/रेशे जैसी संरचनाएं होती हैं जो इस चाय के उत्पादन में अहम् भूमिका निभाती हैं इसलिए इसका नाम सफ़ेद चाय पड़ गया।
सफेद चाय को लेकर दुनिया में कोई एक राय या सर्वमान्य परिभाषा अब तक तय नहीं हुई है ।कुछ जगह इसे कम प्रसंस्करण के साथ सुखाई गईं पत्तियां माना जाता है तो कहीं कलियों से बनाई गई चाय और कहीं अपरिपक्व चाय की पत्तियों से कुछ तैयार चाय।
हाँ,इस बात से सभी सहमत हैं कि सफेद चाय का न तो ऑक्सीकरण किया जाता है और न ही इसकी पत्तियों को कूटा-पीटा जाता है इसके परिणामस्वरूप इस चाय का स्वाद और रंग-रूप अपनी बिरादरी की हरी या पारंपरिक काली चाय की तुलना में  हल्का होता है ।
‘गूगल गुरु’ पर छानबीन के दौरान पता चला कि चीन में सोंग वंश (960-1279 एडी) के शासन के दौरान सफेद चाय की खोज की गई और इसे सबसे नाजुक चाय किस्मों में से एक माना जाता है क्योंकि यह कम से कम प्रसंस्कृत होती है। वहां पौधों के पत्तों को पूरी तरह से सफेद बाल द्वारा कवर की गई ताज़ा कली के साथ पूरी तरह से फूलने से पहले  काट लिया जाता था । उस समयआम लोगों को सफेद चाय पीने की इजाजत नहीं थी क्योंकि यह विशेष रूप से सम्राट और उनके दरबारियों के लिए तैयार की जाती थी। वैसे इस चाय की कीमत को देखते हुए आज भी आम लोग इसे पीने के बारे में सोच भी नहीं सकते  
वहीं,कुछ दस्तावेजों में सफ़ेद चाय का उल्लेख 18 वीं सदी के दरम्यान मिलता है लेकिन तब इसे आज के नाम और खूबियों से नहीं जाना जाता था। यह खास चाय मुख्य रूप से चीन के फ़ुज़ियान प्रांत में पैदा होती है, लेकिन अब भारत, ताइवान, थाईलैंड, श्रीलंका और नेपाल में भी इसका उत्पादन शुरू हो गया है।
फिर सवाल वही उठता है कि आखिर ऐसा क्या है इस सफ़ेद चाय में जिसने इसे चाय की महारानी बना दिया है ? इस चाय की अंधाधुंध कीमत का राज़ इसकी खूबियों में ही छिपा है। हम इसे ‘संजीवनी चाय’ या हर मर्ज का इलाज़ भी कह सकते हैं। सफ़ेद चाय हर स्थिति में लाभकारी है चाहे फिर बात वजन घटाने की हो या फिर फिर चेहरे से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता जैसी इच्छा की। यह कैंसर,मधुमेह, रक्तचाप,समय से पहले बुढ़ापे की रोकथाम,पाचन तंत्र को मजबूत करने,दांत-त्वचा को चमकदार बनाने ,वजन घटाने सहित कई मामलों में रामबाण मानी जाती है। मतलब बस एक कप सफ़ेद चाय और सभी शारीरिक परेशानियों की छुट्टी 
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