मंगलवार, 15 मई 2018

कूड़ा नहीं ज़नाब, सोना कहिए सोना...!!!


एक विज्ञापन की चर्चित पंचलाइन हैं- “ जब घर में पड़ा है सोना तो फिर काहे को रोना”,और आज लगभग यही स्थिति हमारे नगरों/महानगरों की है क्योंकि वे भी हर दिन जमा हो रहे टनों की मात्रा में कचरा अर्थात सोना रखकर भी रो रहे हैं। इसका कारण शायद यह है कि या तो उनको ये नहीं पता कि उनके पास जो टनों कचरा है वह दरअसल में कूड़ा नहीं बल्कि कमाऊ सोना है और या फिर वे जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं? अब यह पढ़कर एक सवाल तो आपके दिमाग में भी आ रहा होगा कि बदबूदार/गन्दा और घर के बाहर फेंकने वाला कूड़ा आखिर सोना कैसे हो सकता है?
इस पहेली को सुलझाकर आपका आगे पढ़ने का उत्साह ख़त्म करने से पहले हम इस बात पर चर्चा करते हैं कि सही तरह से निपटान की व्यवस्था नहीं होने के कारण कैसे आज कचरा हमारे नगरों/महानगरों और गांवों के लिए संकट बन रहा है। दिल्ली में रहने वाले लोगों ने तो गाज़ियाबाद जाते समय अक्सर ही कचरे के पहाड़ देखे होंगे। ऊँचे-ऊँचे एवं प्राकृतिक पर्वत मालाओं को भी पीछे छोड़ते कूड़े के ढेर,उनसे निकलता जहरीला धुंआ और उस पर मंडराते चील-कौवे। ये पहाड़ शहर का सौन्दर्य बढ़ाने के स्थान पर काले धब्बे की तरह नज़र आते हैं जो धीरे धीरे हमारी और हमारे बच्चों की सांसों में धीमा ज़हर घोलकर बीमार बना रहें है। देश के अन्य महानगरों और शहरों की हालत भी इससे अलग नहीं है। आलम यह है कि पूर्वोत्तर के असम का दूसरा सबसे बड़ा शहर सिलचर भी प्रतिदिन 90 टन कूड़ा निकाल रहा है तो फिर दिल्ली-मुंबई की तो बात ही अलग है।
कचरा प्रबंधन पर काम करने वाले एक संगठन की वेबसाइट के मुताबिक दिल्ली में प्रतिदिन 9 हजार टन कूड़ा निकलता है जो सालाना तक़रीबन 3.3 मिलियन टन हो जाता है। मुंबई में हर साल 2.7 मिलियन टन,चेन्नई में 1.6 मिलियन टन,हैदराबाद में 1.4 मिलियन टन और कोलकाता में 1.1 मिलियन टन कूड़ा निकल रहा है। जिसतरह से जनसँख्या/भोग-विलास की सुविधाएँ और हमारा आलसीपन बढ़ रहा है उससे तो लगता है कि ये आंकडें अब तक और भी बढ़ चुके होंगे। यह तो सिर्फ चुनिन्दा शहरों की स्थिति है,यदि इसमें देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों को जोड़ दिया जाए तो ऐसा लगेगा मानो हम कूड़े के बीच ही जीवन व्यापन कर रहे हैं।
हमारे देश में सामान्यतया प्रति व्यक्ति 350 ग्राम कूड़ा उत्पन्न करता है परन्तु यह मात्रा 500 ग्राम से 300 ग्राम के बीच हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा देश के कुछ राज्यों के शहरों में कराए गए अध्ययन के अनुसार शहरी ठोस कूड़े का प्रति व्यक्ति दैनिक उत्पादन 330 ग्राम से 420 ग्राम के बीच है। इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि शहरों और कस्बों के अलग--के अलग आकार बावजूद प्रति व्यक्ति उत्पादन में काफी समानता है।
यह तो हुई देश में तेज़ी से बढ़ रहे कचरे की लेकिन अब बात करते हैं इस लेख के मूल विषय अर्थात् कचरे को सोना कहने की। दरअसल तमिलनाडु के वेल्लोर शहर में ‘गारबेज टू गोल्ड’ माडल तैयार किया गया है जो अब धीरे धीरे अन्य शहरों में भी लोकप्रिय हो रहा है। हाल ही में इस माडल के प्रणेता सी श्रीनिवासन ने असम के कछार ज़िला प्रशासन के निमंत्रण पर सिलचर की यात्रा की। यहाँ आयोजित एक कार्यशाला में उन्होंने बताया कि यदि शहरों में निकलने वाले कूड़े का सही तरह से निपटान किया जाए तो वह वाकई कमाई के लिहाज से सोना बन सकता है। श्रीनिवासन के मुताबिक फालतू समझ कर फेंका जाने वाला कूड़ा हमें 10 रुपए प्रति किलो की कीमत तक दे सकता है जो घर में बेचे जाने वाले अख़बारों की रद्दी के भाव के लगभग बराबर है। इसका मतलब यह हुआ जो हम घर-बाज़ार के कूड़े का जितने व्यवस्थित ढंग से निपटान करने में सहयोग करेंगे वह हमें उतनी ही अधिक कमाई देगा। यही नहीं, कूड़े के निपटान के वेल्लोर माडल से बड़ी संख्या में स्थानीय स्तर पर रोज़गार के साधन भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
‘गारबेज टू गोल्ड’ माडल में सबसे ज्यादा प्राथमिकता कूड़े के जल्द से जल्द सटीक निपटान को दी जाती है। इसके अंतर्गत कूड़े को उसके स्त्रोत (सोर्स) पर ही अर्थात् घर, वार्ड,गाँव,नगर पालिका, शिक्षण संस्थान,अस्पताल या मंदिर के स्तर पर ही अलग-अलग कर जैविक और अजैविक कूड़े में विभक्त कर लिया जाता है। फिर इस जैविक कूड़े को  जैविक या प्राकृतिक खाद/उर्वरक के तौर पर परिवर्तित कर इस्तेमाल किया जाता है। इससे न केवल हमें भरपूर मात्रा में प्राकृतिक खाद मिल जाती है बल्कि अपने कूड़े को बेचकर अच्छी-खासी कमाई भी कर सकते हैं और इस सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें/हमारे शहर को कूड़े के बढ़ते ढेरों से छुटकारा मिल जाएगा।
महानगरों में निकलने वाले कूड़े पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक दिल्ली में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले 9 हज़ार टन कूड़े में से लगभग 50 फीसदी कूड़ा जैविक होता है  और इसका उपयोग खाद बनाने में किया जा सकता है। इसके आलावा 30 फीसदी कूड़ा पुनर्चक्रीकरण (रिसाइकिलिंग) के योग्य होता है।इसका तात्पर्य यह है कि महज 20 फीसदी कूड़ा ही ऐसा है जो किसी काम का नहीं है। कमोबेश देश के अधिकतर शहरों में यही स्थिति है इसलिए यदि वेल्लोर माडल की तर्ज़ पर कूड़े को उदगम स्थल पर ही अलग अलग कर लिया जाए तो न केवल देश में गाज़ियाबाद जैसे कचरे के पहाड़ बनने पर रोक लग जाएगी,साथ ही बड़ी संख्या में बेरोज़गार युवकों को इस मुहिम से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सकेगा और देश को भरपूर मात्रा में जैविक खाद मिलने लगेगी।
यदि वेल्लोर या सुदूर पूर्वोत्तर के सिलचर में ‘गारबेज टू गोल्ड’ (कचरे से सोना) जैसी योजना पर अमल किया जा सकता है तो दिल्ली-मुंबई या किसी और शहर में क्यों नहीं? बस इसके लिए इच्छाशक्ति,समर्पण,ईमानदारी जैसे मूलभूत तत्वों की जरुरत है।यदि हमने एक बार यह ‘संकल्प’ ले लिया तो फिर ‘सिद्धि’ हासिल करने से कोई नहीं रोक सकता। प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए ‘संकल्प से सिद्धि’ अभियान का मूल मन्त्र भी तो यही है इसलिए बस आवश्यकता है देश को स्वच्छ बनाने का ‘संकल्प’ लेने की और फिर उसे 2019 में महात्मा गाँधी की जयंती तक ‘सिद्धि’ में बदलने की। एक बार हमने सच्चे मन से अपने आप को इस काम में झोंक दिया तो फिर वाकई में अब तक हमारा सिरदर्द बनने वाला कूड़ा सही मायने में सोना बन जायेगा और हमारा देश फिर से सोने की चिड़िया।

भारतीय नौसेना:समुद्री सरहद की अभेद दीवार


किसी भी लोकतान्त्रिक देश के अनवरत विकास और सतत प्रगति के लिए मौजूदा दौर में सामाजिक और आर्थिक मापदंडों के साथ साथ सुरक्षा का पहलू भी एक महत्वपूर्ण कारक है क्योंकि सुरक्षित सीमाओं और मजबूत सरहदों के बिना प्रगति के पथ पर चलना आसान नहीं है. हमारे देश का सुरक्षा ढांचा भूत-वर्तमान और भविष्य की जरूरतों के मद्देनजर तैयार किया गया है इसलिए इसमें ज़मीनी सरहद से लेकर हवा और पानी तक में सुरक्षा के लिए अलग अलग अंगों को दायित्व सौंपे गए हैं. जिन्हें हम मोटे तौर पर  थल सेना,वायु सेना और नौ सेना के नाम से पहचानते हैं.
देश में लगभग चौतरफा फैली सामुद्रिक सीमाओं की सुरक्षा का दायित्व भारतीय नौसेना बखूबी संभाल रही है. दरअसल जमीन पर तो रेखाएं खींचकर और बाड़ इत्यादि लगाकर सरहद की देखभाल की जा सकती है लेकिन समुद्र में तो आसानी से कोई सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती इसलिए हमारी नौसेना का काम सबसे चुनौतीपूर्ण माना जाता है. चूँकि दुनियाभर में समुद्री परिवहन और व्यापार में इजाफा हो रहा है और समद्र अब आर्थिक विकास का माध्यम बन रहे हैं इसलिए देश के जलीय क्षेत्र और विशेष रूप से हिन्द महासागर क्षेत्र में हमारी नौसेना की जिम्मेदारियां पहले से कई गुना बढ़ गयीं हैं.

नौसेना दिवस क्यों
दिसंबर के पहले सप्ताह में 4 दिसंबर को भारतीय नौसेना अपना 48 वां स्थापना दिवस मना रही है. ऐसे में यह सवाल दिमाग में आना लाजिमी है कि भारतीय नौसेना 4 दिसंबर को ही नौसेना दिवस क्यों मनाती है इसका कारण यह है कि इसी दिन हमारी नौसेना ने  1971 की जंग में पाकिस्तानी नौसेना पर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी । बताया जाता है कि  भारतीय सेना ने 3 दिसंबर को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था । वहीं, 'ऑपरेशन ट्राइडेंट' के तहत अगले दिन यानि 4 दिसंबर, 1971 को भारतीय नौसेना को पाकिस्तानी नौसेना की लगाम कसने का जिम्मा दिया गया और आदेश मिलते ही भारतीय नौसेना ने पकिस्तान के कराची नौसैनिक अड्डे पर हमला बोल दिया । इस यु्द्ध में पहली बार जहाज पर मार करने वाली एंटी शिप मिसाइल से हमला किया गया था। हमारी नौसेना ने पाकिस्तान के तीन जहाज नष्ट कर दिए थे।
बताया जाता है कि तत्कालीन नौसेना प्रमुख एडमिरल एस एम नंदा के नेतृत्व में ऑपरेशन ट्राइडेंट यानि आपरेशन त्रिशूल का प्लान बनाया गया था। इसकी जिम्मेदारी 25वीं स्कवाड्रन के कमांडर बबरू भान यादव को दी गई थी। 4 दिसंबर, 1971 को भारतीय नौसेना ने कराची स्थित पाकिस्तान नौसेना मुख्यालय  पर पहला हमला किया । युद्ध में रसद आपूर्ति करने वाले जहाज़ समेत पकिस्तान के कई जहाज नेस्तनाबूद कर दिए गए । इस दौरान पकिस्तान के ऑयल टैंकर भी तबाह हो गए। ऑपरेशन ट्राइडेंट में  निपट, निर्घट और वीर मिसाइल बोट्स ने अहम् भूमिका निभाई थी ।

नौसेना संगठन
भारतीय नौसेना को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी और आधुनिक नौसेना के रूप में जाना जाता है. संख्या और शक्ति के लिहाज से अमेरिका,रूस और चीन की नौसेनाएं ही हमारी नौसेना से आगे हैं. भारतीय नौसेना के प्रमुख को नौसेनाध्यक्ष के  पद नाम से जाना जाता है और इस पद पर एडमिरल रैंक के अधिकारी को ही नियुक्त किया जाता है. इसे हम थल सेना में जनरल और वायुसेना में एयर चीफ मार्शल के समतुल्य मान सकते हैं. नौसेनाध्यक्ष के मातहत दिल्ली स्थित मुख्यालय स्तर पर सह नौसेनाध्यक्ष,उप सेनाध्यक्ष, कार्मिक प्रमुख,सामग्री प्रमुख जैसे अन्य पद होते हैं जबकि आपरेशनल स्तर पर नौसेना की तीन प्रमुख कमान-पश्चिमी नौसेना कमान,पूर्वी नौसेना कमान और दक्षिणी नौसेना कमान है. इन कमानों के प्रमुख को फ्लैग आफीसर कमांडिंग-इन-चीफ के पदनाम से जाना जाता है और इन सभी के पास अपने अपने सामुद्रिक क्षेत्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है. इसके अलावा , नौसेना की अंडमान एवं निकोबार कमान जैसी स्वतंत्र कमान भी है.

सामरिक क्षमता
वैसे तो कोई भी सेना कभी भी अपनी सामरिक क्षमताओं की सही सही जानकारी सुरक्षा कारणों से उपलब्ध नहीं कराती फिर भी भारतीय नौसेना के सम्बन्ध में सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक हमारी नौसेना के पास बड़ी संख्या में निगरानी विमान,विमानवाहक पोत,परमाणु पनडुब्बी सहित कई  पनडूब्बियाँ ,अनेक युद्धपोत तथा अन्य साजो सामान है जो किसी भी दुश्मन को नाको चने चबवाने के लिए काफी है. इसके अलावा लगभग 10 हजार अधिकारियों के साथ 70 हजार नौसैनिकों का मजबूत बल किसी भी चुनौती से निपटने में सक्षम है.

नौसेना की भूमिका
वैसे तो सभी नौसेनाओं की मुख्य पहचान उनका सैन्य चरित्र है लेकिन भारतीय नौसेना युद्ध से लेकर मानवीय सहायता और आपदा राहत कार्यों से लेकर अन्य देशों की सहायता जैसे तमाम कार्यों को पूर्ण गरिमा के साथ अंजाम दे रही है ।
भारत के राष्ट्रीय हितों और समुद्री सीमा की रक्षा करने के साथ साथ हमारी नौसेना विदेशी नीति के कूटनीति उद्देश्यों के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने और संभावित प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए परस्पर मैत्री अभ्यासों को भी अंजाम देती है। नौसेना की राजनयिक भूमिका का बड़ा उद्देश्य राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के साथ साथ समुद्री वातावरण को हमारी विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों के अनुरूप बनाना भी है । समुद्र में अपराध की बढ़ती घटनाओं ने नौसेना की भूमिका को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है। इस भूमिका का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि वर्तमान में दुनिया की तमाम नौसेनाओं का  एक बड़ा समय समुद्री अपराधों की रोकथाम में निकल जाता है।

मानवीय भूमिका
युद्धक क्षमताओं के अलावा,भारतीय नौसेना विश्व भर में अपनी मानवीय भूमिका के लिए भी जानी और सराही जाती है. दुनिया के किसी भी हिस्से में फंसे भारतीय लोगों को सहायता प्रदान करनी हो या फिर उन्हें वहां से बाहर निकालना हो या फिर किसी अन्य मामले में मानवीय सहायता की जरुरत हो तो हमारी नौसेना सदैव तत्परता से जुट जाती है. पीड़ितों के बीच भोजन,पानी और राहत सामग्री के वितरण में नौसेना की सबसे सक्रिय भूमिका रहती है. देश में आई भीषण सुनामी से लेकर समंदर में मुसीबत में घिरे अन्य देशों के जहाजों को सुरक्षित ठिकाने तक पहुँचाने और जहाज में मौजूद बीमार लोगों को सकुशल अस्पताल पहुंचाने जैसे तमाम काम बेझिझक करने के कारण ही हमारी नौसेना को दुनिया भर में सराहा जाता है. दरअसल इसतरह के मानवीय और आपदा राहत अभियानों में सैन्य गतिशीलता, विश्वसनीय संचार प्रणाली और समुद्र में दूरदराज तक जाकर सहायता के लिए जरुरी जबरदस्त रणनीतिक समझ-बूझ की आवश्यकता होती है और अपनी इन क्षमताओं को हमारी नौसेना के कई बार साबित किया है. 

मैत्री अभ्यास
नौसेना द्वारा अन्य देशों के साथ संयुक्त रूप से किए जाने वाले नौसैन्य अभ्यासों ने भी दुनिया के अन्य देशों के बीच भारतीय नौसेना की साख को नई गरिमा प्रदान की है. इसके परिणामस्वरूप कई देश ऐसे हैं जिन्होंने हमारी नौसेना के साथ साझा अभ्यासों को नियमित रूप दे दिया है जैसे अमेरिका और जापान के साथ मालाबार अभ्यास,फ़्रांस के साथ वरुण, म्यांमार के साथ कोरपेट, सिंगापुर के साथ सिम्बेक्स, इंडोनेशिया के साथ पासेक्स, ब्रिटेन के साथ कोंकण तथा इसीतरह अन्य देशों के साथ साझा और मैत्री अभ्यासों ने हमारी नौसेना की कार्यकुशलता और दमखम को न केवल समय समय पर साबित किया है बल्कि भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साख और धाक दोनों कायम करने में भी अहम् भूमिका निभाई है.   

स्वर्णिम इतिहास
किसी भी संगठन की ताकत उसका इतिहास और सुनहरी विरासत होती है. खासतौर पर सेनाओं के मामले में इतिहास से जोड़कर वर्तमान को समझने में आसानी होती है. भारतीय नौसेना के इतिहास की कड़ियों को जोड़ा जाए तो इसे 1612 से शुरू माना जा सकता है जब कैप्टन बेस्ट ने पुर्तगालियों को पराजित किया था। यह मुठभेड़ और फिर समुद्री डाकुओं द्वारा आये दिन खड़ी की जाने वाली मुसीबतों  की वजह से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी सूरत (गुजरात) के नजदीक स्वेली में एक छोटे से नौसैन्य बेड़े की स्थापना के लिए मजबूर हो गयी ।  5 सितंबर 1612 में लड़ाकू जहाजों के पहले स्क्वाड्रन का निर्माण हुआ जिसे उस समय  ईस्ट इंडिया कंपनी की समुद्री शाखा( East India Company Marine) कहा जाता था। यह केम्बे की खाड़ी (Gulf of Cambay) और ताप्ती और नर्मदा नदी के मुहानों पर ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार को सुरक्षा प्रदान करती थी। 1668 में इसे मुंबई में कंपनी के  व्यापार की सुरक्षा का जिम्मा भी सौंप दिया गया. 1686 तक, कंपनी का वाणिज्य-व्यापार मुख्य रूप से बंबई में स्थानांतरित होने के साथ, इस बल का नाम बदलकर बॉम्बे मरीन कर दिया गया ।
1830 में, फिर बॉम्बे मरीन का नाम बदलकर हर मेजेस्टी की भारतीय नौसेना (Her Majesty's Indian Marine) कर दिया गया । जैसे जैसे नौसेना की ताकत बढ़ती रही, इसके नाम और आकार में भी बदलाव हुए। उस समय, बॉम्बे मरीन के दो डिवीजन थे पहला कलकत्ता में पूर्वी डिवीजन, और दूसरा मुंबई में पश्चिमी डिवीजन. 1892 में इसे रॉयल इंडियन मरीन नाम दे दिया गया था । रॉयल इंडियन मरीन ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
रॉयल इंडियन मरीन में शामिल होने वाले पहले भारतीय सब लेफ्टिनेंट डीएन मुखर्जी थे जो 1 9 28 में एक अभियंता अधिकारी के रूप में इसका हिस्सा बने । 1 9 34 में, रॉयल इंडियन मरीन को न केवल रॉयल भारतीय नौसेना का नया नाम मिला बल्कि इसकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए इसे राज ध्वज (King's Colour ) से सम्मनित भी किया गया  । द्वितीय विश्व युद्ध में भी इसकी भूमिका को सर्वत्र सराहा गया ।
भारत को स्वतंत्रता मिलने पर, रॉयल भारतीय नौसेना को भारत को सौंप दिया गया. उस वक्त इसके पास  तटीय गश्ती के लिए 32 पुराने जहाज़ और लगभग  11,000 अधिकारी थे। वरिष्ठ अधिकारी रियर एडमिरल आई टी एस हाल को स्वतंत्र भारत का पहला  कमांडर-इन-चीफ बनाया गया।  26 जनवरी 1950 को भारतीय गणतंत्र के गठन के साथ ही इसके नाम से रॉयलशब्द को हटा दिया गया और यह रॉयल इन्डियन नेवी से इन्डियन नेवी (भारतीय नौसेना) हो गयी। भारतीय नौसेना के पहले कमांडर-इन-चीफ एडमिरल सर एडवर्ड पैरी थे। 22 अप्रैल 1 9 58 को वाइस एडमिरल आर डी कटारी ने पहले भारतीय नौसेना प्रमुख के रूप में पद ग्रहण किया। इसके बाद, से भारतीय नौसेना लगातार उपलब्धियां हासिल करते हुए अपनी गौरव गाथा लिखती आ रही है और सफलताओं का यह सफ़र सतत रूप से जारी है.

नौसेना में महिलाओं ने लगाए चार चाँद


‘नविका सागर परिक्रमा’ भारतीय नौसेना का एक ऐसा अद्भुत नौ-परिभ्रमण  अभियान है जिसमें सभी महिला सदस्य शामिल हैं.  यह दुनिया में अपनी तरह का पहला रोमांचक  नौकायन अभियान है. नौसेना में  रोमांच और साहस की भावना को बढ़ावा देने के लिए शुरू हुआ यह अभियान लगभग 165 दिनों में दुनिया भर का चक्कर लगाकर अप्रैल 2018 में गोवा वापस लौटेगा. रक्षा मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने 10 सितंबर, 2017 को गोवा से इस अभियान को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था ।
आईएनएसवी तरिणी पर विश्‍व भ्रमण पर निकले इस दल की कैप्‍टन लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी है और इसके चालक दल में लेफ्टिनेंट कमांडर प्रतिभा जामवल, पी. स्‍वाति और लेफ्टिनेंट एस विजया देवी, वी ऐश्‍वर्या तथा पायल गुप्‍ता शामिल हैं। स्‍वदेश में निर्मित आईएनएसवी तरिणी 55 फीट का नौकायन पोत है, जिसे इस वर्ष की शुरूआत में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। इससे अंतर्राष्‍ट्रीय मंच पर मेक इन इंडियापहल को दर्शाया जा रहा है।

नविका सागर परिक्रमानाम का यह अभियान महिलाओं की अंतर्निहित ताकत के जरिए उनके सशक्तिकरण की राष्‍ट्रीय नीति के अनुरूप है। इसका उद्देश्‍य विश्‍व मंच पर नारी शक्तिको प्रदर्शित करना और चुनौतीपूर्ण वातावरण में उनकी सहभागिता बढ़ाकर देश में महिलाओं के प्रति सामाजिक व्‍यवहार तथा मानसिकता में क्रांतिकारी बदलाव लाना है।

यह पोत अपनी यात्रा समाप्‍त कर अप्रैल, 2018 में गोवा लौटेगा। यह अभियान पांच चरणों में पूरा होगा। इस दौरान यह चार बंदरगाहों- फ्रीमैन्‍टल (आस्‍ट्रेलिया), लिटिलटन (न्‍यूजीलैंड), पोर्ट स्‍टेंली (फॉकलैंड) और कैपटाउन (दक्षिण अफ्रीका) पर रूकेगा।

यह साहसिक दल मौसम विज्ञान, समुद्र और लहरों के बारे में नियमित रूप से आंकड़े एकत्रित करेगा और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) को नई जानकारी भी उपलब्‍ध कराएगा, ताकि वि‍भाग मौसम के पूर्वानुमान की सही जानकारी प्रदान कर सके। यह समुद्री प्रदूषण की भी जांच करेगा। समुद्री यात्रा और साहसिक भावना को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रवास के दौरान यह दल स्‍थानीय लोगों विशेष रूप से बच्‍चों के साथ व्‍यापक बातचीत करेगा
इसके अलावा, नौसेना में महिलाओं की उपलब्धियों पर गौर किया जाए तो शुभांगी स्वरूप भारतीय नौसेना में शामिल होने वाली पहली महिला पायलट बन गईं। वह जल्द ही समुद्री निगरानी  विमान को उड़ाती नज़र आएँगी । उत्तर प्रदेश में बरेली की रहने वाली शिवांगी जल्दी ही  कोच्चि में आईएनएस गरुड़ जरुरी प्रशिक्षण हासिल करेंगी.
वहीँ,नई दिल्ली की  आस्था सेगल, पुडुचेरी की रूपा ए और केरल की शक्ति माया एस ने नौसेना के नेवल आर्ममेंट इंस्पेक्शन (एनएआई) शाखा में देश में पहली बार  महिला अधिकारी बनकर इतिहास बनाया। एनएआई शाखा देश के नौसैनिक बल के हथियारों के निरीक्षण और मूल्यांकन का काम देखती है .

आसान नहीं है पूर्वोत्तर में पीआर..!!


पूर्वोत्तर का नाम लेते ही हमारे सामने हरियाली से भरपूर और वरुण देवता की मेहरबानी से सराबोर ऐसे क्षेत्र की तस्वीर सामने आ जाती है जिसे शायद प्रकृति का सबसे अधिक लाड़ एवं दुलार मिला है । यहाँ आसमान छूने की होड़ करते बांस के जंगल हैं तो घर-घर में फैले तालाबों में अठखेलियाँ करती मछलियाँ । देश के दूसरे राज्यों से यह ‘अष्टलक्ष्मी’ इस मामले में अलग है कि यहाँ धरती के सीने पर गेंहू और चने की फसलें नहीं बल्कि कड़कदार चाय की पत्तियां लहलहाती है और ऊँचे ऊँचे बांस के जंगल इठलाते हैं । यहाँ की धरती कभी अपनी बांहों में पानी समेटकर धान सींचती है तो कहीं मछलियों के लिए तालाब बन जाती है । पूर्वोत्तर अपनी अद्भुत कला और हस्तशिल्प की एक समृद्ध विरासत के लिए भी जाना जाता है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी यहाँ अब तक निखर रही है ।

भौगोलिक-सामाजिक परिदृश्य
दरअसल किसी भी क्षेत्र में जनसंपर्क की संभावनाएं,स्थिति और चुनौतियों को समझने के लिए उस क्षेत्र की भौगोलिक,सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को जानना भी उतना ही जरुरी है ताकि विषय को समझने में आसानी हो । ऐतिहासिक और समकालीन आयामों की समग्र समझ हासिल करने के बाद ही जनसंपर्क से जुड़ी समस्याओं के विभिन्न पहलुओं का आकलन किया जा सकता हैं । दुर्भाग्य से, इस क्षेत्र के बारे में अब तक पर्याप्त रूप से विश्लेषण नहीं हुआ है।
भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में आठ राज्य असम, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा और सिक्किम  शामिल हैं और यह पूरा क्षेत्र एक गलियारे के जरिए देश की मुख्य धारा से जुड़ा है । पूर्वोत्तर क्षेत्र के अधिकतर राज्य भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश और चीन जैसे देशों के साथ अपनी सीमा साझा करते हैं । कुछ समय पहले तक  अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम को छोड़कर इस क्षेत्र में अधिकांश राज्य किसी न किसी तरह के संघर्ष से प्रभावित थे इन संघर्षों के कारणों पर नज़र डाली जाए तो इनमें अलगाववादी आंदोलनों से लेकर अंतर-सामुदायिक, सांप्रदायिक और अंतर जातीय संघर्ष जैसे विभिन्न मुद्दे शामिल रहे हैं लेकिन अब स्थिति में आशानुरूप बदलाव आया है जिससे इस क्षेत्र में स्थिरता, शांति, सद्भाव और सौहार्द्रता बढ़ी है । वैसे भी,यह इलाक़ा जातीय, भाषायी और सांस्कृतिक रूप से भारत के अन्य राज्यों से बहुत अलग है ।
जानकारों की माने तो अब तक आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह के विकास के संदर्भ में पूर्वोत्तर की उपेक्षा हुई है । दशकों तक, पूर्वोत्तर को व्यवसाय और उद्यम के अनुकूल नहीं माना गया । निरंतर संघर्ष, आंतरिक कलह और भौगोलिक अलगाव जैसे तमाम मुद्दों ने यहाँ निवेश के सूखेपन को बनाए रखा और इसके फलस्वरूप इस क्षेत्र में आर्थिक और सामाजिक विकास की कमी बरक़रार रही । हालाँकि यह क्षेत्र अपने प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि की वजह से निवेश और इस क्षेत्र में उद्यम की वृद्धि के लिए एक बड़ा अवसर पेश करता रहा है ।

पूर्वोत्तर में जनसंपर्क विभाग
देश के अन्य राज्यों की भांति पूर्वोत्तर में भी जनसंपर्क विभागों को मोटे तौर पर ‘सूचना और जनसंपर्क निदेशालय’ के नाम से जाना जाता  है । यहाँ के सभी राज्यों ने अपने अपने सूचना और जनसंपर्क निदेशालय बनाए हुए हैं और प्रदेश सरकार के क्रियाकलापों के प्रचार- प्रसार की जिम्मेदारी इन्हीं विभागों के पास है । पूर्वोत्तर के आठों राज्यों में तुलनात्मक रूप से देखें तो सबसे पहले असम में जनसंपर्क विभाग की नींव पड़ी । वैसे भी स्वतन्त्रता पूर्व और उसके बाद भी लम्बे समय तक असम ही एकमात्र बड़ा राज्य रहा है और तब यहाँ के कई राज्यों का पृथक अस्तित्व भी नहीं था और उनका गठन बाद में समय समय पर हुए क्षेत्रीय आन्दोलनों तथा भौगोलिक परिस्थितियों के मद्देनजर हुआ है ।

असम में जनसंपर्क विभाग
असम में जनसंपर्क विभाग की स्थापना जून 1940 में राज्य की तत्कालीन राजधानी शिलाँग में हुई थी । स्थापना के समय में इसे प्रचार और ग्रामीण विकास विभाग का नाम दिया गया था । विभाग की स्थापना के पीछे मुख्य उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के मद्देनजर मौजूदा सरकार के समर्थन में प्रचार करना और सार्वजनिक मनोबल को बनाए रखना था । उस समय प्रचार विभाग के प्रमुख को प्रचार अधिकारी कहा जाता था और उनके मातहत दो सहायक प्रचार अधिकारी थे इनमें से एक सहायक प्रचार अधिकारी असम घाटी के लिए और दूसरा सुरमा घाटी (अब बांग्लादेश) के लिए था । विभाग के पहले प्रचार अधिकारी असम सिविल सेवा के अधिकारी याहिया खान चौधरी थे । उस समय के विभाग का मुख्य कार्य प्रेस नोट, लेख और पुस्तिकाओं के माध्यम से युद्ध संबंधी समाचारों और सूचनाओं पर ध्यान केंद्रित करना था । स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, जनसंपर्क निदेशालय की जिम्मेदारी, कद और महत्व कई गुना बढ़ गया । विभाग प्रत्येक पखवाड़े में नियमित रूप से दो रिपोर्ट,एक,  भारत-पाकिस्तान संबंधों के बारे में और दूसरी,राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री को जनता की राय के बारे में भेजता था । बाद में, निदेशालय के अंतर्गत प्रदर्शनी, सांस्कृतिक और फिल्म प्रभाग जैसे अलग-अलग विभाग भी बनाए गए ।

मिजोरम में जनसंपर्क विभाग
मिज़ोरम के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद में 1972 में यहाँ सूचना विभाग अस्तित्व में आया । विभाग के पहले निदेशक पु आर एल थानजावना थे जो असम सिविल सेवा के अधिकारी थे । उन्होंने 1 मई 1972 को इस विभाग का प्रभार संभाला । उस समय पर्यटन भी इसी विभाग में शामिल था। विभाग ने अपना प्रेस भी शुरू किया गया था जो उस समय शायद बड़ी बात थी । बाद के वर्षों में, पर्यटन और मुद्रण और स्टेशनरी अलग विभाग बन गए और मूल विभाग अंततः सूचना एवं जन संपर्क विभाग बन गया ।

नागालैंड में जनसंपर्क विभाग
नागालैंड में  प्रचार शाखा को अगस्त 1963 में एक पूर्ण निदेशालय का दर्जा दिया गया । सबसे अचरज की बात यह है कि यह काम नागालैंड को राज्य का दर्जा प्राप्त होने के तीन महीने ही कर दिया गया । पहले इसे सूचना और प्रचार विभाग  के रूप में जाना जाता था 1984 में इस विभाग का नामकरण सूचना और जनसंपर्क विभाग के रूप में किया गया ताकि इसे प्रचार से जुड़े कार्यों के अधिक से अधिक अवसर मिल सके ।
इसीतरह एक-एक कर पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों मेघालय,मणिपुर,त्रिपुरा,अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में जनसंपर्क विभाग की नींव पड़ी और इन विभागों ने अपनी अपनी राज्य सरकारों और कई बार केंद्र सरकार से राज्य के दौरे पर आने वाले मंत्रियों के दौरों से जुड़ी सूचनाओं के प्रचार-प्रसार में कोई कमी नहीं रहने दी ।

जनसंपर्क विभाग के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
पूर्वोत्तर में जनसंपर्क विभाग का काम देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी चुनौतीपूर्ण और खतरों से भरा भी कहा जा सकता है । यहाँ काम करने वाले जनसंपर्क अधिकारियों को पल पल पर किसी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ता है ।

उग्रवाद
अगर हम विषयवार चुनौतियों की चर्चा करें तो यहाँ जनसंपर्क कर्मियों को सबसे ज्यादा उग्रवाद या हिंसक गतिविधियों का मुकाबला करना पड़ता है । कुछ राज्यों को छोड़ दिया जाए तो आज भी पूर्वोत्तर के अधिकतर अशहरी इलाके कम या ज्यादा मात्रा में उग्रवाद की चपेट में हैं । अलग अलग जातीय-जनजातीय समूहों,भाषागत समूहों और इन सबसे बढ़कर अपने लिए कभी अलग प्रदेश तो कभी स्वायत्तशासी परिषद तो कभी ज्यादा अधिकार की मांग को लेकर हिंसक गतिविधियों में शामिल समूह जनसंपर्क गतिविधियों में बाधक बनते रहते हैं । उदाहरण के तौर पर जब मिजोरम में उग्रवादी गतिविधियाँ शबाव पर थीं उस दौरान विभाग के पहले निदेशक पु आर एल थानजावना उग्रवादियों के घात लगाकर किए गए हमले का शिकार बन गए थे । दरअसल वे उस क्षेत्र में तत्कालीन राज्यपाल  लेफ्टिनेंट गवर्नर श्री एस पी मुखर्जी के काफ़िले का हिस्सा थे और अपने कर्तव्य का निर्वाहन कर रहे थे लेकिन भाग्य ने उनका साथ दिया और वे बाल बाल बच गए । हालाँकि श्री थानजावना के विभागीय प्रमुख होने के कारण यह किस्सा मीडिया में आ गया वरना निचले स्तर के कर्मचारियों के साथ ऐसे हादसे आए दिन होते रहते हैं लेकिन वे उतनी सुर्खियाँ नहीं बटोर पाते । इनमें जनसंपर्क विभाग के कर्मी भी शामिल होते हैं ।
हालाँकि काबिलेतारीफ बात यह है कि मिजोरम में उग्रवाद की आग को शांत करने के लिए जनसंपर्क विभाग ने इन हादसों की परवाह नहीं करते हुए अनेक अनुकरणीय काम किए जिनमें कार्यालयीन कार्यों के अलावा सांस्कृतिक आदान-प्रदान, प्रदर्शनियों, अध्ययन यात्राओं, शीतकालीन एवं क्रिसमस मेलों सहित ऐसे कई कार्यक्रम शामिल थे जिनके आयोजन से समाज में समरसता बढ़ने में मदद मिली और आज मिजोरम पूर्वोत्तर के सबसे शांतिप्रिय राज्यों में शामिल है ।
मिजोरम ही क्यों मणिपुर,नागालैंड,त्रिपुरा और असम में भी हिंसक विद्रोह की अवधि के दौरान, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने लोगों के दिल-ओ-दिमाग पर विजय प्राप्त करने के लिए अनेक अभियान सफलतापूर्वक संचालित किए, जो धीरे-धीरे भूमिगत तत्वों और सरकार के बीच बातचीत का माहौल बनाने में सहभागी बने । विभाग ने प्रभावित इलाकों में चर्च के प्रमुखों और आम लोगों पर गहरा असर रखने वाले स्वैच्छिक संगठनों सहित समाज के प्रभावशाली तबकों  को शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनाया और फिर इसे स्थायी शांति में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । शांति स्थापित होने से इन राज्यों में विकास के लिए अनुकूल वातावरण बना और फिर इससे देश के अन्य प्रदेशों की तरह खुशहाली के नए द्वार खुले । जनसंपर्क विभाग के इन प्रयासों के परिणामस्वरूपयहाँ के कई राज्यों शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए । सूचना एवं जनसंपर्क विभाग का काम बस यहीं ख़त्म नहीं हुआ बल्कि उसने शांति स्थापना और परस्पर शांति समझौतों के बाद लगातार विभिन्न मीडिया के माध्यम से लोगों तक अपनी पहुंच कायम रखी ताकि समाज विरोधी तत्वों को फिर सर उठाने का मौका न मिले ।

इंटरनेट कनेक्टिविटी
पूर्वोत्तर के जनसंपर्क अधिकारियों के समक्ष दूसरी बड़ी समस्या इंटरनेट कनेक्टिविटी की है। आमतौर पर यहाँ नेट की गति कछुए जैसी रहती है और उस पर भी बीच बीच में एकाएक गायब ही हो जाती है । समाचार या समाचार परक सूचनाओं के साथ सबसे अहम् बात उनकी तात्कालिकता ही होती है और यदि नेट कनेक्टिविटी नहीं होने के कारण ये सूचनाएं मीडिया हॉउस तक देर से पहुचेंगी तो उनका महत्व और सार्थकता निश्चित ही कम हो जाएगी । इसीतरह बिजली आपूर्ति में कमी के कारण मोबाइल चार्ज करना भी कठिन हो जाता है । जब शहरों में यह हाल है तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जिला स्तर पर कम करने वाले अधिकारियों को और कितने मुश्किल हालात से जूझना पड़ता होगा । वैसे आजकल मोबाइल चार्जिंग के लिए बैटरी बैकअप जैसे विकल्प उपलब्ध हैं लेकिन इंटरनेट की कनेक्टिविटी तो समस्या है ही और यह कई अन्य समस्याओं की जननी भी है ।

सुव्यवस्थित परिवहन व्यवस्था का अभाव
यहाँ जनसंपर्क करने के मार्ग में एक बाधा सुव्यवस्थित परिवहन व्यवस्था का अभाव भी हैं । इसके परिणामस्वरूप किसी भी कवरेज के लिए कार्यक्रम स्थल पर समय से पहुंचना और फिर समय पर ही वापस आकर उसकी रिपोर्ट समाचार माध्यमों तक भेजना वाकई मुश्किल हो जाता है । यदि समय पर समाचार पत्र-पत्रिकाओं तक वांछित जानकारी जानकारी नहीं पहुँचती है तो अनेक बार आधी अधूरी या भरक जानकारी के आधार पर समाचार प्रकाशित होने का खतरा बढ़ जाता है जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं ।

बंद से काम में बाधा
सड़क,बिजली,नेट जैसी आधारभूत और संरचनात्मक समस्याओं के अलावा यहाँ आए दिन होने वाले बंद भी एक प्रमुख समस्या हैं । हो सकता है देश के अन्य राज्यों के लोगों के लिए यह आश्चर्यजनक हो परन्तु पूर्वोत्तर में शहर या राज्य बंद होना आम बात है और आए दिन कोई भी छोटा-बड़ा संगठन अपनी समस्या को लेकर बंद करता रहता है । खास बात यह है कि यह बंद केवल शहर तक नहीं बल्कि रेल रोको तक व्याप्त है इससे परिवहन की समस्या और बढ़ जाती है ।

अन्य कारण
इसके अलावा भाषाई समस्या,वित्तीय संसाधनों की कमी,कुशल मानव संसाधन का अभाव,भौगोलिक परिस्थितियां,मौसमीय कारक जैसे अत्यधिक वर्षा,बाढ़, आए दिन होने वाले भूस्खलन,भूकंप,दूरदराज के गांवों तक पहुँच की समस्या,जागरूकता की कमी जैसे तमाम कारण हैं जिनके कारण पूर्वोत्तर में पीआर(पब्लिक रिलेशंस) करना आसान नहीं है ।

जनसंपर्क विभाग की उल्लेखनीय भूमिका
  हालाँकि,इन सभी समस्याओं,बाधाओं और कमियों के बाद भी पूर्वोत्तर में अधिकतर सरकारी-गैर सरकारी जनसंपर्क विभागों ने अब तक सराहनीय भूमिका निभाई है चाहे फिर वह असम में एनआरसी (नेशनल रजिस्टर पर सिटिज़न्स/राष्ट्रीय नागरिकता पंजीयन) जैसा वृहद् अभियान हो या फिर नागा/मार/उल्फा या फिर किसी अन्य उग्रवादी संगठन के साथ समझौते की कवायद । जनसंपर्क विभागों ने सदैव ही जनता के लिए उत्तरदायी, मूल्य आधारित जानकारी प्रदान करने और जनता को हरसंभव सहायता देने में कोई कसर नहीं छोड़ी । विभाग ने सरकार से संबंधित सूचनाओं पर मीडिया के सहयोग से आम जनता या विशेष समूहों, सरकार के अनुकूल पक्षों और प्रतिक्रियाओं को स्थापित करने, दृष्टिकोणों का विश्लेषण करने , प्रक्रियाओं और नीतियों के मूल्यांकन और लोगों तक सरकार के उद्देश्यों को पहुँचाने में सक्रिय भूमिका निभाई  है । वास्तविकता में जवाबदेही और पारदर्शिता का सिद्धांत सुशासन का एक अनिवार्य मानदंड है और पूर्वोत्तर में जनसंपर्क विभाग इस कसौटी पर खरा उतरता नज़र आ रहा है ।




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