गुरुवार, 24 नवंबर 2016

नोटबंदी के बाद मीडिया में आ रही निराशाजनक ख़बरों के बीच रोशनी की किरणें बन रही........ असल किरदारों की सच्ची कहानियां

 एक: रणविजय महज 22 साल के हैं और सिविल इंजीनियर होने के बाद भी पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण सिलचर (असम) में अपने पैतृक फल व्यवसाय में पिता का हाथ बंटाते हैं. जब उन्होंने 8 नवम्बर के बाद आम लोगों को छोटे नोटों के लिए जूझते/मारामारी करते देखा तो खुद के पास मौजूद 10 हज़ार मूल्य के सौ-सौ के नोट लेकर खुद ही बैंक पहुँच गए और बदले में बड़े नोट ले आए. इतना ही नहीं, फिर इन्होने अपने आस-पास के फल व्यवसायियों को समझाना शुरू किया और चार दिन बाद ही स्टेट बैंक की लाइन में नोट बदलने के लिए लगे सैंकड़ों लोगों की तालियों के बीच उन्होंने 50 हज़ार के छोटे नोट बैंक को सौंपे...अब वे इस राशि को और बढ़ाने की योजना में जुटे हैं....सलाम रणविजय 

दो: प्रमोद शर्मा युवा व्यवसायी हैं और सिलचर के व्यापारिक क्षेत्र गोपालगंज में रहते हैं. नोटबंदी/बदलाव के बाद,वे रोज देखते थे कि आम लोग दो हज़ार का नया नोट लेकर छुट्टे पैसे के लिए यहाँ-वहां भटक रहे हैं और अपने लिए जरुरी सामान भी नहीं खरीद पा रहे. उन्होंने राजू वैद्य,शांति सुखानी और अबीर पाल जैसे अपने अन्य दोस्तों से सलाह मशविरा किया और जुट गए आम लोगों को बैंक के अलावा छोटे नोट उपलब्ध कराने में. पहले दिन उन्होंने 1 लाख रुपए के छोटे नोट बांटे लेकिन यह राशि आधे घंटे में ही ख़त्म हो गयी क्योंकि दो हजार के नोट ज्यादा थे और खुल्ले पैसे कम. दूसरे दिन युवा व्यवसाइयों की इस टीम ने 12 लाख के छोटे नोट जुटा लिए और सैकड़ों लोगों की मुश्किल हल कर दी. अब इनका लक्ष्य 20 लाख रुपए जुटाना है. छोटे नोट जुटाने के लिए ये इलाके के अन्य व्यापारियों, बिग बाज़ार- विशाल जैसे बड़े प्रतिष्ठानों की मदद लेते हैं. ‘बूंद बूंद से घड़ा भरता है’ और फिर भरे हुए घड़े का मीठा-ठंडा पानी कई लोगों की प्यास बुझा देता है.

इन युवाओं की कहानियाँ बताती हैं कि मामूली प्रयासों से भी बड़े बदलाव लाये जा सकते हैं और पहाड़ जैसी कठिनाइयों का हल भी समझ-बूझ से निकला जा सकता है. यदि हम भी सोशल मीडिया में दिन-रात व्यवस्था को कोसते रहने के बजाए अपने स्तर पर इसीतरह की पहल करें तो कई लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं. कुछ नहीं, तो बस हमारे आस पास मौजूद ऐसे सच्चे और अच्छे किरदारों को खोज निकाले और उनकी कहानी अन्य लोगों तक पहुंचाए....शायद इससे कुछ और लोगों को प्रेरणा मिले और अच्छाई की इस चेन/श्रृंखला में नई कड़ियाँ जुड़ती जाएँ. बस जरुरत पहल करने की है तो शुरुआत आज और अभी से ही क्यों नहीं..

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

सोचिए, कहीं आप देश विरोधी तत्वों की कठपुतली तो नहीं बन रहे !!

नोट बदलने की प्रक्रिया को आमजन की समस्या से देशव्यापी विकराल मुद्दा बनाने के पीछे कहीं वे लोग तो नहीं है जिनकी करोड़ों की संपत्ति पर चंद घंटों में पानी फिर गया? आम जनता की आड़ में कहीं पेशेवर दिमाग तो काम नहीं कर रहे जो समस्या को हाहाकार में बदलने में जुटे हैं और भविष्य में सरकार के इस अच्छे कदम को बुरे अंजाम में बदलने की साजिश रच रहे हैं ? जैसे कश्मीर में भीड़ की आड़ में आतंकियों के सुरक्षा बलों पर हमला करने की ख़बरें मिली रहती हैं इसीतरह धीरज और स्वेच्छा से नोट बदलने लाइन में लगे आम आदमी के मनोबल को तोड़ने के लिए कहीं राजनीतिक ताकतें और माफिया तो षड्यंत्र में नहीं जुट गए हैं ? और मीडिया महज उनके हाथ की कठपुतली बन रहा हो ? मुझे पता है मेरी इस बात से असहमत लोग मुझे ‘भक्त’ करार दे सकते हैं परन्तु कुछ तो खटक रहा है और कहीं न कहीं कुछ तो पक रहा है !
भीड़ को अराजक बनाने के लिए एक पत्थर ही काफी होता है जबकि यहाँ तो पूरा मसाला मौजूद है. कहीं भीड़ की आड़ में काले धन को सफ़ेद करने का धंधा तो शुरू नहीं हो गया ? सामान्य समझ तो यही कहती है कि कुछ तो गड़बड़ है और शायद सरकार ने भी इसे भांप लिया है तभी नोट बदलने वालों के हाथ पर चुनाव स्याही जैसा कुछ निशान लगाने और उनकी पहचान सुनिश्चित करने की पहल शुरू हो रही है. आखिर क्या कारण है कि सालभर से सूखे पड़े जन-धन एकाउंट एकाएक लबालब भरने लगे है तो वहीँ,वर्षों से बैंक का रुख नहीं करने वाले भी दावा कर रहे हैं कि वे दो बजे रात से लाइन में लगे हैं. मजे की बात तो यह है कि ये सभी किस्से महानगरों और बड़े शहरों में ज्यादा सुनने/देखने को मिल रहे हैं. हालाँकि ये भी हो सकता है कि महानगरों को ही देश मानने वाला और अपनी सुविधा के मुताबिक रिपोर्टिंग करने वाला मीडिया अपने आप ही शहरों की ख़बरों तक सीमित हो परन्तु मेरे सवालों या आशंकाओं को समझने के लिए कुछ बातों पर गौर करना जरुरी है. मसलन जिन महानगरों/शहरों में हाहाकार दिखाया जा रहा है वहां बहुसंख्यक लोग प्लास्टिक मनी( डेबिट/क्रेडिट/एटीएम कार्ड) और आनलाइन बैंकिंग को अपना चुके हैं. वैसे भी शहरों में बिग बाज़ार नुमा खरीद-फरोख्त केन्द्रों की भरमार हैं जहाँ सब कुछ कैशलैस है इसलिए यदि वे दो-चार हफ्ते रुपए न निकाले/बदले तो भी उनकी दिनचर्या पर जरा भी फर्क नहीं पड़ेगा. इसके बाद भी यदि आपने एक बार में दो-चार हजार रुपए भी निकाल लिए तो वह हफ्ते-दो हफ्ते की सब्जी-भाजी-दूध जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए काफी हैं. तब तक स्थिति सामान्य हो जाएगी और बैंकिंग व्यवस्था भी. ऐसे लोग या तो लाइन में नहीं होंगे या एक बार के बाद फिलहाल नहीं आएंगे.
लाइन में लगे लोग अक्सर टीवी का कैमरा देखते ही कहना शुरू कर देते हैं कि घर में आटा नहीं है, बच्चे की फ़ीस नहीं है इत्यादि इत्यादि. आजकल फीस से लेकर दूध तक सब या तो आनलाइन है या फिर प्लास्टिक मनी से मिल जाता है फिर किस बात की जल्दबाजी. इसके अलावा चैक से पेमेंट की व्यवस्था तो कायम है ही. मैं अपने ऐसे कई दोस्तों को जानता हूँ जो कभी भी सब्जी मंडी जाकर सब्जी-फल नहीं खरीदते क्योंकि उनके मुताबिक वहां सब ‘अन-हाइजीनिक’ मिलता है परन्तु इन दिनों वे भी सोशल मीडिया पर ऐसा दिखा रहे हैं मानो नोट बदलने से उनके घर में भी कई दिन से चूल्हा नहीं जला.
अब रही बात वाकई गरीब परिवारों की, तो ऐसे अधिकतर परिवार रोज कमाने-खाने वाले होते हैं और उन्हें मजदूरी में पांच सौ-हजार के नोट नहीं मिलते जिन्हें बदलने के लिए उन्हें दो बजे रात से लाइन में लगना पड़े. हमारे देश में अभी भी असंगठित वर्ग की मजदूरी सौ-पचास के नोटों तक ही केन्द्रित है. इस वर्ग को फिलहाल नोट बदलने की जगह मजदूरी मिलने की समस्या है क्योंकि उनके कथित मालिकों ने सरकार के इस फैसले की आड़ में फिलहाल मजदूरी देना या तो बंद कर दिया है या फिर अपने बड़े नोट निकलने का जरिया बना लिया है. मसलन असम सहित पूर्वोत्तर में चाय श्रमिकों को मजदूरी देने के नाम पर चाय बागानों के मालिकों ने अनाप-सनाप पैसा निकालने की अनुमति सरकार से मांगी और जब सरकार ने इसे मंजूर नहीं किया तो मजदूरी देना बंद कर दिया. हालाँकि सरकार ने सम्बंधित ज़िले के कलेक्टर/डीसी के नाम पर खाता खुलवा कर उनके इरादों पर पानी फेर दिया और अब मजदूरी की प्रक्रिया भी सामान्य होने लगी है. कहने का आशय यह है कि इस वर्ग को भी लाइन में लगने की जरुरत तुलनात्मक रूप से कम ही है.
ऐसे में यह सवाल उठता है कि कहीं भीड़ में गरीबों के नाम पर लगे लोग काला धन रखने वालों के ‘कमीशन एजेंट’ तो नहीं है जो सौ-पांच सौ रुपये के लालच में उनके हाथ की कठपुतली बन गए हैं. यदि एक धन्ना सेठ प्रतिदिन सौ लोगों को लाइन में लगा दे तो वह 4 से 5 लाख रुपए के काले धन को एक दिन में नए नोट में बदल सकता है. अब इसी आंकड़े को हफ्ते भर में तोलिये तो स्थिति साफ़ हो जाती है. ऐसा भी हो सकता है कि अपने दिहाड़ी मजदूरों को नोटों के जमाखोरों ने इसी काम में लगा दिया हो. इसीतरह देश के कुछ राज्यों और समुदायों में तो महिलाओं को सामान्यतौर पर घूँघट में भी घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता परन्तु अब उन्हीं क्षेत्रों में महिलायें आधी रात से लाइन में लगी हैं,पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर, वह भी कम्बल-चादर लेकर, तो बात खटकती है और खटकनी भी चाहिए.
मेरे कहने का यह आशय कतई नहीं है कि देश में नोट बदलने/निकालने को लेकर कोई दिक्कत नहीं है. दिक्कत तो है और बहुत है लेकिन जो कृत्रिम हाहाकार मचाया जा रहा है वह चिंताजनक है. ऐसा न हो ही देश विरोधी तत्व इसका फायदा उठाकर हमारी-आपकी शांति और कानून व्यवस्था को खतरे में डाल दें और हम चंद लोगों के हाथ की कठपुतली बनकर अपना और अपने देश का नुकसान करा बैठे. मीडिया में यह ख़बरें भी आने लगी हैं कि एक तरह पूर्वोत्तर में उल्फा,एनडीएफबी, बोडो जैसे तमाम उग्रवादी संगठनों की अब तक की काली कमाई काग़ज में बदल गयी है और उनकी छटपटाहट बढ़ रही है. देश के अन्य राज्यों में भी विद्रोही संगठनों की कमोवेश यही स्थिति है. दाउद जैसे माफिया सरगना भी बेचैन हैं. वहीँ दूसरी तरफ, कई राजनीतिक दल भी कंगाल हो गए हैं और वे अपनी जमीन बचाने के लिए विरोध के नाम पर किसी भी हद तक जा सकते हैं.
पैसा देकर राजनीतिक सभाओं में भीड़ जुटाना, पैसा देकर दंगे कराना और पत्थर फिंकवाना देश के लिए कोई नई बात नहीं है और जब बात राजनीतिक विरोध की हो,माफिया का पैसा बर्बाद होने की हो या फिर सरकार को गलत साबित करने की तो देश विरोधी तत्वों के लिए सबसे आसान शिकार आम लोग ही हैं इसलिए हमारा भी यह दायित्व बनता है कि हम न तो किसी की कठपुतली बने और न ही किसी को अपने कंधे से बंदूक चलाने दे वरना न केवल काला धन बाहर निकलवाने की यह मुहिम धरी रह जाएगी बल्कि भविष्य में कोई भी सरकार ऐसा कठोर फैसला लेने से भी डरेगी.(picture courtesy :rediff.com)

    

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

बड़े बड़े बैंकों पर भारी हैं हमारे भिखारी बैंक

कहते हैं न कि ‘घूरे के भी दिन फिरते हैं’..आज यह बात साबित हो गयी है. नोट बंद करने के फैसले ने देश के ‘भिखारी बैंक” को किसी भी नामी बैंक से ज्यादा बड़ा बना दिया है. वैसे घूरे जैसे सर्वथा जमीनी शब्द से अनजान पीढ़ी की जानकारी के लिए बता देना जरुरी है कि ‘घूरा’ कचरे के ढेर को कहते हैं और उनकी शब्दावली में वे इसे डस्टबिन का बड़ा भाई भी समझ सकते हैं.
अपने देश में यदि सबसे ज्यादा फुटकर/खुल्ले पैसे हैं तो वे भिखारियों की अंटी में, और वहीँ दबे दबे वे नोट पूरा जीवन गुजार देते हैं. एक-दो, दस-पांच और पचास-सौ के नोटों के मामले में हमारे भिखारी आज की स्थिति में किसी भी बैंक की शाखा को मात दे सकते हैं. वैसे भी बीते कुछ सालों से भिखारियों ने एक-दो रुपए छोड़कर भीख को ‘अपग्रेड’ करते हुए 10 रुपए प्रति ‘कस्टमर’ कर दिया था इसलिए छोटे नोटों के मामले में हमारे भिखारी किसी ‘मोबाइल एटीएम’ से कम नहीं है. मैं तो सरकार को सुझाव देना चाहता हूँ कि जब तक नोट बदलने की ‘क्राइसिस’ दूर नहीं हो जाती तब तक भिखारियों को भी चलता फिरता एटीएम मानकर उन्हें भी नोट बदलने का अधिकार दे देना चाहिए. इसका फायदा यह होगा कि बैंकों पर बोझ कम होगा और भिखारियों के पास वर्षों से जमा मुड़े-तुड़े हजारों छोटे नोटों को खुली हवा में सांस लेने का मौका मिल जायेगा.
वैसे कई ‘स्मार्ट भिखारियों’ ने अपने स्तर पर इस योजना को चलाना भी शुरू कर दिया है और 500 के बंद हो गए नोट के बदले 400 से 450 रुपए देने के गोरख धंधे में वे जुट गए हैं. कुछ तो हजार के नोट पर भी हाथ मारने में पीछे नहीं हैं. वैसे भी जब देश के बड़े धंधेबाजों ने काला-पीला रुपया जमा करने में कोई कसर नहीं रखी तो फिर हमारे गरीब भिखारी बेचारे क्यों पीछे रहे. वो तो भला हो  सरकार का कि उसने बाज़ी पलट दी और जो अर्श पर था वो फर्श पर आ गया और ट्रेन-बसों में भीख मांगने वाले बैंकर की भूमिका निभाने लगे.
भिखारियों के पास ‘काले धन’ को लेकर कोई आश्चर्य होना भी चाहिए. वैसे यहाँ भिखारियों के काला धन से मेरा आशय ब्लैक मनी से नहीं बल्कि उनके पास रखे रखे काले पड़ गए, मैले-कुचैले नोटों से हैं. आए दिन हम अख़बारों-न्यूज़ चैनलों पर पढ़ते-सुनते रहते हैं कि फलां शहर में भिखारी के मरने के बाद उसकी अंटी/झोली से हजारों रुपए निकले, तो किसी का उसी शहर में मकान था तो कोई व्यवसायिक अंदाज़ में पूरे शहर में व्यवस्थित तरीके से भीख मांग रहा था और किसी ने तो पूरे परिवार को इस व्यवसाय में लगा रखा था. बड़े शहरों में तो भिखारियों के सिंडीकेट काम कर रहे हैं और कई जगह वे किसी माफिया से कम नहीं है.
भिखारियों की तर्ज पर ही किन्नरों(ट्रांस जेंडर) को भी छोटे नोटों के लिहाज से बड़ा आसामी माना जा सकता है. ट्रेन-बसों में यात्रा करने वाले हर व्यक्ति को इन दिनों इनका सामना करना पड़ता है. बस भिखारी और इनमें फर्क यह है कि भिखारी भगवान/खुदा के नाम पर आपकों दुआओं/आशीर्वाद से नवाजते हुए नम्र भाव से भीख मांगते हैं और किन्नर पूरी दबंगई से धमकाते/डरते हुए. मजे की बात यह भी है कि भिखारी के तमाम अनुनय-विनय के बाद भी जेब से एक रूपया नहीं निकलने वाले सज्जन किन्नरों की धौंस के आगे 10-20 रूपया देने में भी पीछे नहीं रहते.
खैर,यह कहानी तो लम्बी चल सकती है इसलिए मूल बात पर आते हैं कि यदि आप बैंक की कतार में घंटों खड़े रहकर रुपए बदलने से बचना चाहते हैं तो अपने इलाके के भिखारी बैंक या आपके घर के आस-पास मौजूद उनकी किसी भी शाखा मतलब भीख मांगने वाले से संपर्क करिए. वो आपको घर बैठे छोटे नोट उपलब्ध करा देगा और वो भी मामूली से सुविधा शुल्क पर. तो फिर देर किस बात की चलिए इसी बहाने समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति का महत्व जाने और अपने साथ साथ उसका भी भला करें.  


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