गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

बकरी...जो बिना पंखे और पलंग के नहीं सोती !!

  चाहे मौसम कोई भी हो पर उसे पंखे के बिना नींद नहीं आती है और सोना पलंग पर ही पसंद है परन्तु अगर चादर में सलवटें पड़ी हो या बिस्तर ठीक नहीं हो तो वो पलंग पर सोना तो दूर चढ़ना भी पसंद नहीं करती। बच्चों को लेकर इसतरह के नखरे हम-आप घर घर में सुनते रहते हैं लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि हम यहाँ किसी बच्चे की नहीं, बल्कि एक बकरी की बात कर रहे हैं।
आमतौर पर कुत्ते-बिल्लियों को उनके और उनके मालिकों के अजीब-गरीब शौक के कारण जाना जाता है लेकिन सिलचर की एक बकरी के अपने अलग ही ठाठ हैं और अच्छी बात यह है कि उसकी मालकिन भी उसके शौक पूरे करने में पीछे नहीं रहती। इस बकरी का नाम ‘नशुबाला’ है और यह असम विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक दूर्बा देव की है। खुद दूर्बा बताती हैं कि बिस्तर पर चढ़ने के पहले नशुबाला सिर उठाकर सीलिंग फैन(पंखे) को देखना नहीं भूलती। यदि पंखा चल रहा है तो वो पलंग पर चढ़ जाएगी और यदि बंद है तो तब तक नीचे बैठी रहेगी जब तक कि पंखा चालू न कर दिया जाए। इसके अलावा, उसे बिस्तर भी साफ़-सुथरा चाहिए। यदि चादर अस्त-व्यस्त है तो उसे ठीक कराए बिना नशुबाला को चैन नहीं मिलता। मजे की बात यह है कि वह दूर्बा के साथ उन्हीं के पलंग पर सोती है और उसे मच्छरदानी के भीतर सोना पसंद नहीं है इसलिए दूर्बा रोज तीन तरफ से मच्छरदानी बंद करती हैं लेकिन एक तरफ से खुली छोड़ देती हैं ताकि उनकी बकरी नशुबाला आराम से सो सके ।
लगभग साढ़े तीन साल की यह बकरी उम्दा खानपान और देखभाल के कारण कद काठी में अपनी उम्र से बड़ी ही नज़र आती है लेकिन एक ही पलंग पर सोने के बाद भी आज तक उसने न तो कभी दूर्बा को पैर मारे और न ही कभी बिस्तर गन्दा किया। सोना ही नहीं,खाने-पीने में भी नशुबाला के अपने मिजाज़ हैं मसलन उसे खाने में ताज़ी हरी सब्जियां ही चाहिए और वह भी पूरे सम्मान के साथ । यदि घर के किसी सदस्य ने यूँ ही जमीन पर उसकी खुराक डाल दी तो वह उसे मुंह भी नहीं लगाती। इसीतरह सब्जियों के डंठल या घर के उपयोग के बाद बाहर फेंकने वाला हिस्सा भी उसकी खुराक में शामिल नहीं होना चाहिए बल्कि उसे ताज़ी और पूरी सब्जी चाहिए। हरे पत्तों में कटहल के पत्ते उसे सबसे प्रिय हैं।
एक और आश्चर्यजनक बात यह है कि नशुबाला ने आज तक किसी अन्य बकरी को नहीं देखा क्योंकि हास्पिटल रोड पर द्वितीय मंजिल पर रहने वाली दूर्बा उसे कभी भी नीचे नहीं उतारती और कभी नीचे ले जाने की जरुरत हुई तो भी उसे अपनी देखरेख में ही लाती-ले जाती हैं। दरअसल नशुबाला, उनके घर में तीसरी पीढ़ी की बकरी है । वे बताती हैं कि नशुबाला की मां की मां एक बरसाती रात में भटककर उनके घर आ गयी थी और फिर यहीं रह गयी लेकिन नशुबाला की मां को जन्म देने के महज चार माह बाद ही उसकी मृत्यु हो गयी। कुछ ऐसा ही किस्सा नशुबाला की मां के साथ भी हुआ और उसने भी नशुबाला को जन्म देने के चार माह बाद प्राण त्याग दिए इसलिए दूर्बा को डर है कि कहीं नशुबाला मां बनी तो वह भी चार माह बाद ही उनका साथ न छोड़ दे इसलिए उन्होंने इसे बकरियों से अब तक दूर ही रखा है। अब तो हाल यह है कि नशुबाला और दूर्बा एक दूसरे के ऐसे साथी की तरह हैं जो किसी भी सूरत में एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहते ।
#silchar #cachar #Goat 

                     

'शाल के तले' नाटक: प्रकृति और संस्कृति का अनूठा तालमेल

असम में शाल के पेड़ों के तले होने वाला नाट्योत्सव न केवल समकालीन नाट्यकला के अद्वितीय प्रारूप का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है बल्कि प्रकृति के संरक्षण का अनूठा सन्देश भी फैला रहा है । अब तो इस नाट्य समारोह में दर्शकों के साथ साथ देश के बाहर से आने वाले नाटकों की संख्या भी बढ़ने लगी है । 

असम की राजधानी गुवाहाटी से लगभग 150  किमी दूर और जिला मुख्यालय ग्वालपाड़ा से 15 किमी दूर स्थित रामपुर धीरे धीरे देश ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी आकर्षण का केंद्र बन रहा है । इसका कारण है शाल के पेड़ों के नीचे वाला सालाना नाट्य उत्सव ।

इस अनूठे नाट्य उत्सव का श्रेय रामपुर निवासी शुक्रचर्या राभा को जाता है  जिन्होंने तक़रीबन 10 साल पहले अर्थात् वर्ष 2008 में इस तीन-दिवसीय नाट्योत्सव की नींव रखी थी । अब प्रतिवर्ष मध्य-दिसम्बर में 15 से 18 दिसंबर के बीच शाल के घने जंगल में यह आयोजन होता है । उत्सव के दौरान, प्रतिदिन उमड़ने वाली लोगों की भीड़ इस उत्सव की सफलता की कहानी बताती है ।
दूर-दराज के गाँवों से आने वाले दर्शकों की संख्या में लगातार वृद्धि होने से स्थानीय लोगों के लिये भी यह एक वार्षिक उत्सव बन गया है, जो अब "शाल के तले"नाम से लोकप्रिय है ।

 इस नाट्य उत्सव की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें अब तक बांग्लादेश,ब्राजील, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और पोलैण्ड जैसे देशों से नाट्य समूह शामिल हो चुके हैं । अब तो संगीत नाटक अकादमी, संस्कृति विभाग एवं असम सरकार से भी इस आयोजन के लिए सहायता मिलने लगी है ।

इस समारोह के लिए, प्रति वर्ष दिसम्बर में, शाल के वृक्षों के नीचे मिट्टी का एक मंच बनाया जाता है । मंच की पृष्ठभूमि में भूसे की बाड़ और मंच के चारों ओर बाँस से दर्शकदीर्घा बनायी जाती है । बाहर से आने वाले कलाकारों को भी पूस के बने घरों में रखा जाता है।  जंगल के भीतर स्थित होने के अतिरिक्त इस नाट्यमंच का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यहाँ कलाकार कृत्रिम ध्वनि एवं प्रकाश का प्रयोग नहीं करते । पार्श्व संगीत सजीव होता है और शाल के वृक्षों से छन कर आती सूर्य की किरणें  स्पॅाटलाइट का काम करती हैं । शाल वृक्ष भी प्राकृतिक पात्र की भाँति ध्वनि संयोजन में मदद करते है ।

इस अनूठे नाट्य उत्सव के शुरू होने के पीछे भी एक कहानी है। दरअसल शाल से घिरे इस इलाके में गाँव वासियों ने रबड़ के पेड़ उगाने के लिये शाल के सभी पुराने जंगलों को काटना शुरू कर दिया । शाल के वृक्ष से लगभग 25 वर्षों के पश्चात पैसे मिलते हैं जबकि रबड़ के वृक्ष से मात्र 7 वर्ष में ही कमाई होने लगती है । यही कारण है कि गाँव के ज्यादातर शाल के वृक्षों के स्थान पर अब रबड़ के वृक्ष दिखाई देते हैं ।


राभा संस्कृति में शाल को पूज्य माना जाता है । यहाँ तक कि मरणोपरान्त, लोगों को इन्हीं वृक्षों के नीचे दफन करने का भी रिवाज है ।  संस्कृति और प्रकृति पर इस आघात ने ही शुक्रचर्या को शाल वृक्षों के तले नाट्य महोत्सव की प्रेरणा दी । उन्हें विश्वास है कि नाट्य महोत्सव की लोकप्रियता से इन वृक्षों की रक्षा हो सकेगी और जंगलों का प्राकृतिक सौन्दर्य वापस पुनः स्थापित हो जायेगा ।

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

असम का नया कानून बदल सकता है देश में बुजुर्गों की स्थिति !!

               
 जाति-धर्म-सम्प्रदाय,बाबा,साध्वी और नेताओं के विवादित बोल से लेकर न जाने कैसे-कैसे फ़िजूल विषयों पर आँखें तरेरने वाला हमारा कथित ‘जन-सरोकारी मीडिया’ अमूमन ऐसे विषयों पर चुप्पी साध लेता है जो वास्तव में जन सामान्य के लिए उपयोगी होते हैं।  हाल ही  में मीडिया के एक बड़े तबके ने एक बार फिर एक ऐसे विषय की अनदेखी कर दी जिसे सरकारों और समाज के हर आम-ओ-खास को जानना चाहिए।  न तो किसी चैनल ने इसे ब्रेकिंग न्यूज़ के लायक समझा और न ही बड़ी बहस,हल्ला बोल या मुक़ाबला नुमा कार्यक्रमों के लिए जरुरी । किसी ने टिकर यानि टीवी स्क्रीन में नीचे की ओर चलने वाली ख़बरों में शामिल किया तो किसी ने 5 मिनट में 50 ख़बरों टाइप हड़बड़ी वाली न्यूज़ का हिस्सा बनाकर इतिश्री कर ली। टीवी स्क्रीन पर देश-समाज की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले तमाम सेलिब्रिटी एंकर भी इस विषय से कन्नी काट गए। हाँ, प्रिंट मीडिया ने ज़रूर जिम्मेदारी निभाई और कम से कम दो कालम की ख़बरें कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में देखने को मिली। पूर्वोत्तर में आतंकवाद को छोड़कर किसी और विषय को इतनी जगह मिलना भी कम उपलब्धि नहीं है।
          अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसी कौन सी खबर है जिसके लिए इतनी फ़िक्र करने की जरुरत पड़ रही है तो वह खबर है असम में बना वह कानून जिसमें अपने बुजुर्ग माँ-बाप की देखभाल नहीं करने वाले सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह काटने का प्रावधान है। इसतरह का कानून बनाने वाला असम देश में संभवतः पहला और एकमात्र राज्य है।
         हालाँकि तक़रीबन 10 साल पहले 2007 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने अभिभावक और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण पर केन्द्रित एक अधिनियम बनाया था जो अभिभावकों और वरिष्ठ नागरिक की जरूरत के मुताबिक उनका भरण-पोषण और कल्याण सुनिश्चित करता है। अधिनियम में अभिभावकों और वरिष्ठ नागरिकों को उनके बच्चों/संबंधियों द्वारा भरण-पोषण को अनिवार्य एवं कानूनी बनाया गया है। वरिष्ठ नागरिकों की उनके संबंधियों द्वारा अनदेखी करने पर उनकी संपत्ति का हस्तांतरण करा लिये जाने, निर्धन वरिष्ठ नागरिकों के लिए वृद्धा आश्रम बनाने, वरिष्ठ नागरिकों को उचित चिकित्सा सुविधा और सुरक्षा उपलब्ध कराने का भी प्रावधान इस अधिनियम में है। कुछ राज्यों ने इसे गंभीरता से लागू किया है तो किसी ने औपचारिक रूप से।
         लेकिन, असम सरकार द्वारा हाल ही बनाए गए नए कानून ने अपने बुजुर्ग अभिभावकों और दिव्यांग भाई-बहनों की देखभाल को अनिवार्य बना दिया है. इस कानून के मुताबिक बुजुर्ग मां-बाप की जिम्मेदारी उठाने से भागने वाले सरकारी कर्मचारियों के वेतन से पैसे काटे जाएंगे। ‘असम एम्पलॉयीज पैरंट्स रेस्पॉन्सिबिलिटी एंड नॉर्म्स फॉर अकाउंटैबिलिटी एंड मॉनिटरिंग बिल-2017 नाम के इस कानून को असम एम्पलॉयीज प्रणाम बिल के नाम से जाना जा रहा है। कानून के मुताबिक अगर राज्य सरकार का कोई कर्मचारी अपने माता-पिता की जिम्मेदारी उठाने से भागता है तो सरकार उसके वेतन का 10 प्रतिशत हिस्सा काट लेगी और उसे मां-बाप के खाते में जमा कर देगी। अगर कर्मचारी का कोई भाई या बहन दिव्यांग है तो फिर उस कर्मचारी के वेतन से 5 प्रतिशत अतिरिक्त कटौती होगी। राज्य के वित्त मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा का कहना है कि आगे चलकर प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों को भी इस कानून के दायरे में लाया जाएगा।
         असम सरकार ने यह भी साफ़ किया है कि यह कानून किसी के निजी जीवन में हस्तक्षेप नहीं है बल्कि इस कानून का मकसद घर में उपेक्षित बुजुर्गों को संबंधित कर्मचारी के खिलाफ शिकायत का अधिकार देना है।' कानून में कहा गया है कि किसी कर्मचारी के खिलाफ ऐसी शिकायत मिलने के बाद विभागीय प्रमुख दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद वेतन में कटौती का फैसला करेंगे।
      अक्सर देखा जाता है कि जब माता पिता उम्र के अंतिम पडाव पर पहुंच जाते हैं और इस समय उन्हें सबसे अधिक सहारे की जरूरत होती है उनकी संताने या उत्तराधिकारी देखभाल करने से कन्नी काटने लगते हैं कई लोग तो ऐसे होते हैं जो बुजुर्ग मां बाप को वृद्धाश्रम तक में छोड देते है। अब यह कोई अनजान तथ्य नहीं है कि हमारे देश में वृद्ध लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 1951 में 60 से ज्यादा उम्र के लोगों की जनसंख्या 20 मिलियन थी। तीन दशक बाद 1981 में यह संख्या 43 मिलियन तक पहुंच गई और वहीं आगे के दशकों, 1991 में यह 55.30 मिलियन तक पहुंच गई। 2001 में यह संख्या बढ़कर 76.5 मिलियन तक और वर्ष 2011 में 103.2 मिलियन तक पहुंच गयी।
      बुजुर्गों के लिए काम करने वाले संगठन 'हेल्पएज इंडिया' की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर तीन में से एक बुजुर्ग अपनी ही संतान की उपेक्षा व अत्याचारों का शिकार है। अत्याचार के ज्यादातर मामलों की जड़ में संपत्ति का विवाद होता है। ऐसे ज्यादातर मामलों में बेटियां नहीं बल्कि बेटे ही मां-बाप पर अत्याचार करते हैं। चिंता की बात यह है कि बुजुर्गों की उपेक्षा का यह सिलसिला महज शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है। देश के ग्रामीण इलाकों में भी ऐसे मामले बढ़ रहे हैं। ग्रामीण इलाके में अब युवक प्रायः अपने परिवार के साथ नौकरी या रोजगार के लिए शहरों में जाकर बसने लगे हैं। गांव में अकेले रह गए मां-बाप को उनकी किस्मत और दूरदराज के रिश्तेदारों के सहारे छोड़ दिया जाता है। ऐसे युवक कभी-कभार कुछ रुपये भेज कर ही अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं लेकिन वे इस बात से अनजान बने रहते हैं कि बुजुर्गों को पैसे के साथ मानसिक देखभाल की भी उतनी ही जरुरत है। वे चाहते हैं कि कोई उनसे बात करने वाला हो,उनकी भावनात्मक देखभाल करने वाला हो बिलकुल वैसे ही जैसे वे बचपन में अपने बच्चों की करते थे। पैसा आवश्यकताएं तो पूरी कर सकता है परन्तु मानसिक संबल नहीं बन सकता।ये काम तो अपने ही कर सकते हैं जो साथ रहें,साथ बैठे, बतियाएं और साथ खाएं।  
      उम्मीद है कि असम सरकार ने इस दिशा में जो पहल की है उसका दूसरे राज्य भी अनुसरण करेंगे और न केवल ऐसे कानून बनाएंगे बल्कि उनका अनुपालन भी सुनिश्चित करेंगे। हमारे अभिभावक या समाज के बुजुर्ग हमारा गौरव हैं, मान हैं और हमारी जिम्मेदारी हैं इनसे मुंह मोड़कर हम तात्कालिक तौर पर तो शायद स्वयं को सुखी दिखा सकते हैं लेकिन इससे हमें वह मानसिक सुख नहीं मिल सकता जो परिवार के साथ मिलता है।  हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यदि हम आज अपनी बुजुर्ग पीढ़ी को गड्ढे में ढकेल कर खुश हैं तो भविष्य में उससे भी ज्यादा गहरा गड्ढा हमारा इंतजार कर रहा है क्योंकि यदि ‘बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से पाएं’ ।  



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