मंगलवार, 27 सितंबर 2016

जन्मदिन मुबारक गूगल ‘गुरु’...

‘गूगल गुरु’ आज 18 साल के हो गए. वैसे तो 18 साल की आयु को समाज में परिपक्व नहीं माना जाता तभी तो न इस उम्र में आप शादी(पुरुष) कर सकते हैं और न ही शराब पी सकते हैं. यहाँ तक कि देश में चुनाव भी नहीं लड़ सकते,बस अपने जन-प्रतिनिधि का चुनाव कर सकते हैं. इस आयु के युवा औसतन बारहवीं कक्षा की पढाई पूरी कर कालेज में एडमीशन की ज़द्दो-जहद में लगे होते हैं, लेकिन गूगल गुरु की बात ही निराली है. गूगल ने अपने अठारह साल के सफ़र में पूरी दुनिया को अपना मुरीद बना लिया है. जो भी जानकारी चाहिए बस गूगल पर सर्च मारिए और पलक झपकते ही सभी जानकारियां पूरे विस्तार के साथ हाज़िर हो जाती है.
गूगल ने ‘वर्चुअल गुरु’ बनकर वास्तविक गुरुओं को भी पीछे छोड़ दिया है. भले ही इस उम्र में शराब/सेक्स जैसी बातों से परहेज करना होता है लेकिन गूगल इसी आयु में शराब बनाने से लेकर पीने के तरीके तक बता रहा है. और सेक्स को तो इसने घर-घर( इसे मोबाइल-मोबाइल पढ़ें) में उपलब्ध करा दिया है. जैसा की मैंने ऊपर लिखा है कि सामान्य तौर पर इस आयु को परिपक्व नहीं माना जाता इसलिए हम यह मान सकते हैं कि गूगल गुरु पर सर्च भी अभी अपने अपरिपक्व दौर में है और जैसे जैसे इस वर्चुअल गुरु की उम्र बढ़ेगी वह परिपक्व होकर केवल ‘पोर्न’ तलाशने का माध्यम नहीं रह जायेगा बल्कि सच में अपना ज्ञान बढ़ाने और कौशल निखारने का माध्यम बनेगा. अच्छी बात यह भी है कि इस समय गूगल की कमान भारतीय हाथों में हैं और यह उम्मीद की जा सकती है कि सुन्दर पिचाई इसे धीरे धीरे भारतीय रंग में रंग देंगे.
केवल आंकड़ों पर नजर रखने वाले लोगों के लिए यह बताना जरुरी है कि गूगल कि स्थापना 4 सितम्बर 1998 में अमेरिका के कैलिफोर्निया के मेनलो पार्क नामक स्थान पर महज एक रिसर्च प्रोजेक्ट के तौर पर हुई थी और इसके संस्थापक लेरी पेज और सर्गेई ब्रिन थे. गूगल के पिता का नाम (पेरेंट आर्गेनाइजेशन) अब एल्फाबेट इंक है और अभी गूगल गुरु का स्थायी घर कैलिफोर्निया के माउन्टेन व्यू में है. दरअसल गूगल एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी(टेक्नॉलाजी) कम्पनी है और इंटरनेट सेवाओं में इसकी बादशाहत है. अब इसने आनलाइन विज्ञापन,सर्च, क्लाउड कम्प्यूटिंग और साफ्टवेयर के क्षेत्र में भी सफलता के झंडे गाड़ लिए हैं.
गूगल गुरु के परिवार में सदस्यों की संख्या तेजी से बढती जा रही है और अब इसमें जीमेल,गूगल ड्राइव, गूगल प्लस, गूगल क्रोम, हैंगआउट, मोबाइल का सबसे लोकप्रिय एंड्राइड आपरेटिंग सिस्टम, क्रोमबुक और अब ब्राडबैंड सर्विस जैसे नए सदस्य जुड़ते जा रहे हैं. गूगल में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या भी अब 60 हजार के आस पास है और अब यह दुनिया की सबसे नामी कंपनियों में से एक है. ......तो जन्मदिन मुबारक गूगल गुरु.



शनिवार, 24 सितंबर 2016

ये कैसा देशप्रेम है हमारा…..!!!



हाल ही में कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कर्नाटक के लोग विरोध में सड़कों पर उतर आए. दर्जनों बस जला दी गयी और कई सरकारी भवन/वाहन आग के हवाले के दिए गए. अब तो मानो यह रोजमर्रा की सी बात हो गयी है. जब भी किसी को किसी भी घटना/फिल्म/बयान/सरकार/फैसले से नाराजगी होती है तो वे सड़कों पर निकल पड़ते हैं और विरोध के नाम पर तोड़फोड़ करने लगते हैं. कभी कोई बस जलाएगा तो कभी सरकारी कार्यालय. कोई अपना गुस्सा सरकारी संपत्ति पर निकालेगा तो किसी की नाराजगी वहां खड़े वाहनों पर निकलेगी. मैं आज तक नहीं समझ पाया कि इस तोड़फोड़ से या सरकारी संपत्ति में आग लगाने से कौन सा विरोध जाहिर होता है? विरोध करना/नाराजगी जताना या किसी के खिलाफ प्रदर्शन करना हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार है और जरुरत पड़ने पर ऐसा करना भी चाहिए ताकि किसी को भी निरंकुश होने या लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के खिलाफ जाने की हिम्मत न पड़े लेकिन सरकारी संपत्ति को जलाना या नुकसान पहुँचाना क्या लोकतान्त्रिक विरोध का हिस्सा है?
सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि सरकारी संपत्ति किसकी है- सरकार की? बिलकुल नहीं और वैसे भी सरकार क्या है? क्या यह अंग्रेजों जैसी कोई बाहरी ताकत है जो हम पर थोप दी गयी है या पुराने ज़माने के राजे-महाराजे का दौर है जो दूसरा राजा जब भी उस राज्य पर कब्ज़ा करेगा तो वहां लूटपाट कर सब नष्ट कर देगा. सरकार भी हमारी है और सरकारी संपत्ति भी  क्योंकि अपने मन-मुताबिक सरकार का चयन और चुनाव हम ही करते हैं. हालाँकि हो सकता है कि इस मामले में कुछ लोग यह कुतर्क करने लगे कि हमारे देश में सरकार का गठन बहुमत के आधार पर होता है और आजकल 30 से 40 फीसदी मत हासिल कर कोई भी दल अपनी सरकार आसानी से बना सकता है. ऐसे में लगभग 60 प्रतिशत लोग उसके खिलाफ भी होते हैं इसलिए अब किसी सरकार को पूरी तरह से जनता की सरकार नहीं कहा जा सकता. यदि इन बातों को सही भी मान लिया जाए तो भी इसमें सरकारी संपत्ति का क्या दोष? सरकारी संपत्ति किसी भी सरकार की बपौती नहीं है बल्कि वह आम जनता के गाढ़े खून पसीने की कमाई है, लाखों कर दाताओं के पैसे से बनती है सरकारी संपत्ति. हम जैसे आम लोग दिनभर सेल्स टैक्स से लेकर इनकम टैक्स और सेवा कर से लेकर वैट जैसे तमाम करों का परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जो भी भुगतान करते हैं उससे बनती है सरकारी संपत्ति. इसका मतलब तो यही हुआ न कि सरकारी संपत्ति हमारी ही है क्योंकि यह हमारे ही पैसों से बनी है. तो क्या विरोध के नाम पर अपने ही पैसों को आग लगाना उचित है?
क्या आपने आज तक कभी सुना है कि पति और पत्नी के बीच किसी फैसले पर असहमति के कारण उनमें से किसी ने अपने ही घर में आग लगा दी हो या पिता के डांटने पर या बेटे के परीक्षा में असफल होने पर पिता ने अपनी कार जला दी हो. कहने का मतलब यह है कि जब हम घर में कितने भी परस्पर मुटाव के बाद अपनी सम्पत्ति को कोई नुक्सान नहीं पहुंचाते तो फिर देश में ऐसा क्यों करते हैं. आखिर देश है क्या? हम-आप से ही तो मिलकर बना है यह देश. देश में है क्या-हम,हमारे बच्चे,हमारे दोस्त/रिश्तेदार/समाज, हमारे घर,हमारे स्कूल,हमारे कालेज,हमारे कार्यालय, हमारे वाहन,हमारी कम्पनियां, हमारे कल-कारखाने इत्यादि सब कुछ तो हमारा ही है. देश भूगोल की किताब में बना मानचित्र भर नहीं है और न ही पड़ोसी देशों के साथ खिंची विभाजन रेखाएं बल्कि यह जीते जाते लोगों का एक बृहत्तर समाज है जहाँ सुचारू संचालन के लिए प्रशासन/सरकार जैसी अनेक छोटी-बड़ी व्यवस्थाएं कायम की गयी है. कहीं इस व्यवस्था को हम पंचायत कहते हैं तो कहीं नगर पालिका/नगर निगम, कहीं राज्य सरकार या फिर कहीं केंद्र सरकार के नाम से जानते हैं. इस व्यवस्था को और सुचारू बनाने के लिए विभागों का सृजन हुआ जिनमें हम-आप काम करते हैं. विभागों या विकेंद्रीकरण की जरुरत भी इसलिए पड़ी कि हर व्यक्ति तो हर काम कर नहीं सकता इसलिए अपनी-अपनी योग्यता के हिसाब से कोई ट्रेन चलाने लगा तो कोई बैंक और कोई व्यापार करने लगा. समाज के ये सारे अंग भाषा/संस्कृति/ परिवेश और परस्पर अनुकूलता के फलस्वरूप घर/समाज/मोहल्ला/राज्य जैसी तमाम इकाइयों से होते हुए देश बन गए. अब बताइए कि क्या देश कोई बाहर की दुनिया की चीज है?
अब फिर उसी मूल प्रश्न पर आते हैं कि विरोध के नाम पर अपनी ही संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर हम किसको दुःख देते हैं? सरकारी बसें जलाकर या कार्यालयों में तोड़फोड़ करके हम अपने को ही तो क्षति पहुंचाते हैं! अब यदि कावेरी विवाद में 40 से ज्यादा बसें जली और हजारों करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ तो उसका खामियाजा किसको भरना पड़ेगा, हम को ही और किस को. जो पैसा नए स्कूल या अस्पताल बनाने में खर्च होता,युवाओं को कौशल युक्त बनाकर स्वरोजगार के लिए अपने पैरों पर खड़ा करने में होता अब वो ही पैसा फिर से बस खरीदने में होगा या उन सरकारी दफ्तरों की मरम्मत में खर्च होगा जिन्हें हमने अपने क्षणिक आवेश में आग के हवाले कर दिया था. जब हम बड़ी से बड़ी मुसीबत में भी अपना,अपने परिजनों का और अपने घर का ध्यान रखना नहीं भूलते तो फिर विरोध में सड़क पर उतरते वक्त यह क्यों भूल जाते हैं कि हम गुस्से में जो भी तोड़/जला रहे हैं वह भी पूरी तरह से हमारा ही है और हमारे ही पैसों से बना है तथा इसमें जो भी नुकसान होगा उसकी भरपाई भी हमें ही अपने अन्य खर्चों में कटौती करके करनी होगी. फिर यह कटौती किसी योजना के रूप में हो सकती है या फिर नए या बढे हुए कर के रूप में भी.
दरअसल अपनी ही संपत्ति की तोड़फोड़ या आगजनी की यह बीमारी हमें अंग्रेजों के विरोध के समय से लगी है. उस समय तो फिर भी यह जायज था क्योंकि हमारा सारा मुनाफ़ा बटोरकर अंग्रेज अपने साथ ले जा रहे थे और अपने ही देश में हम गुलामों की तरह रहने को मजबूर थे इसलिए उस समय सरकारी संपत्ति का नुकसान पहुँचाने का उद्देश्य अंग्रेजों को चोट पहुंचाने के लिए किया जाता था. हम अपने इस विरोध में सफल रहे और अंग्रेजों को देश छोड़कर जाना पड़ा. हमने अपना देश तो पा लिया परन्तु उसे अपना आज भी नहीं बना पाए तभी तो आज तक जरा भी कुछ हुआ नहीं कि चल पड़ें अपने ही देश को नुकसान पहुँचाने. आलम यह है कि चाहे आतंकी हमला हो या सैनिकों का शहीद होना, बिजली गुल होना हो या पानी नहीं आना,अस्पताल में परिजन की मौत हो या फिर पुलिस की गोली से, हम गुस्से में अपनी ही संपत्ति बर्बाद करते हैं. सोचो जरा, मुश्किल से तो इलाके में एक अस्पताल बना था अब उसे ही जला दिया तो फिर इलाज के लिए हम आप कहाँ जायेंगे. यहीं नहीं, जिन पैसों से दूसरा अस्पताल बन सकता था उससे अब इसी अस्पताल की मरम्मत होगी. बिलकुल इसी तरह बंगलुरु में जो पैसा परिवहन व्यवस्था को और बेहतर बनाने पर खर्च होता अब उससे इन जलाई गई बसों की भरपाई हो पाएगी और शहर की परिवहन व्यवस्था दस साल पीछे रह जाएगी. 
मसला बंगलुरु,दिल्ली,भोपाल या गुवाहाटी का नहीं है बल्कि देश भर में शहर से लेकर गाँव तक यही हाल है कि हम अपनी सारी नाराजगी देश की संपत्ति पर निकाल देते हैं. विरोध करिए और हर गलत बात के विरोध में एकजुट होना भी चाहिए लेकिन विरोध के तरीके जरुर बदलने होगे. न तो हमें सरकारी (इसे अपनी पढ़े) संपत्ति को क्षति पहुंचानी चाहिए और न ही किसी को ऐसा करने देना चाहिए और यदि कोई ऐसा करते दिखता है तो हमें बिलकुल उसीतरह सतर्क होकर उस व्यक्ति की मुखालफ़त करनी चाहिए जैसे हम अपने घर की सुरक्षा करते हैं.यदि एक बार हम चंद मुट्ठी भर लोगों के हाथ का खिलौना बनकर तोड़फोड़ करने के स्थान पर अपने देश की संपत्ति के संरक्षक बन गए तो फिर आतंकी तो आतंकी दुनिया की कोई ताकत हमारे देश का बाल बांका नहीं कर सकती. 

रविवार, 21 अगस्त 2016

ज़िन्दगी की जंग हारकर भी जीत गया ‘बंग बहादुर’

जिन्दगी और मौत की जंग में मौत भले ही एक बार फिर जीत गयी हो लेकिन बंग बहादुर ने अपनी जीवटता,जीने की लालसा,जिजीविषा और दृढ मनोबल से मौत को बार बार छकाया और पूरे पचास दिन तक वह मौत को अपने मज़बूत इरादों से परास्त करता रहा. उसे इंतज़ार था कि सत्तर के दशक की लोकप्रिय फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ की तर्ज पर कोई इंसान उसे समय रहते बचा लेगा. बंग बहादुर को बचाने के इंसानी प्रयास तो हुए लेकिन वे सरकारी थे और नाकाफ़ी भी, इसलिए शायद कामयाब नहीं हो पाए.
बंग बहादुर ने अपनी हिम्मत, संघर्ष शीलता और जीने की इच्छाशक्ति के फलस्वरूप जीवटता की नई कहानी लिख दी. एक ऐसी कहानी जिसे सालों-साल दोहराया जायेगा. दरअसल बंग बहादुर सुदूर पूर्वोत्तर में असम का एक हाथी था और उसकी जीवटता के कारण ही उसे ‘बंग बहादुर’ नाम दिया गया था.
दरअसल बह्मपुत्र में आई विकराल बाढ़ के चलते लगभग चार टन का यह हाथी असम में अपने झुंड से 27 जून को अलग हो गया था और बाढ़ के पानी में बहते-बहते बांग्लादेश तक पहुंच गया । भीषण बाढ़ के बीच प्रतिकूल परिस्थितियों में करीब 1,700 किलोमीटर बहने के बाद भी उसने हिम्मत नहीं हारी और पानी में फंसा होने के बाद भी स्वयं को बचाने के लिए लगातार संघर्ष करता रहा.
केवल पानी के सहारे तो इतने लम्बे समय तक इंसानी जीवन भी मुश्किल है फिर वह तो चार टन का भारी-भरकम हाथी था. बंग बहादुर नाम मिलने के बाद भी यह शाकाहारी प्राणी अपना स्वभाव नहीं बदल पाया अन्यथा मछलियाँ खाकर अपना पेट भर सकता था. न तो उसे रसीले गन्ने मिले और न ही पेड़ों की पत्तियां क्योंकि बाढ़ की विकरालता में कुछ भी टिक पाया. बस टिका रहा तो बंग बहादुर लेकिन बाढ़ में घिरे होने के कारण बंग बहादुर को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल पाया. भोजन के अभाव में उसकी शक्ति धीरे धीरे कम होती गई और कमजोरी के कारण उसकी हिम्मत जवाब दे गयी।
जब उसकी जीवटता को स्थानीय मीडिया में जगह मिली तो सम्बंधित विभागों की तन्द्रा टूटी और फिर उसे बचने के प्रयास शुर हुए. भारत और बंगलादेश दोनों ही देशों ने संयुक्त रूप से इस हाथी को बचाने के लिए टीम बना दी. यही नहीं, हाथी को बचाने के लिए असम के पूर्व मुख्य वन संरक्षक के नेतृत्व में भारत का एक विशेषज्ञ दल भी बांग्लादेश भेजा गया था.
छह हफ्तों के अथक प्रयास के बाद, 11 अगस्त को किसी तरह पानी से बाहर निकाल लिया गया लेकिन अब तक अपने दम पर अनहोनी और आशंका के बीच संघर्ष कर रहा बंग बहादुर एकाएक अपने इर्द-गिर्द इतने इंसानों को देखकर घबरा गया और कमज़ोरी के बाद भी भाग निकला, लेकिन इस दौरान एक गड्ढे में गिरने से यह अचेत हो गया । वन अधिकारियों और ग्रामीणों ने उसे किसी तरह गड्ढे से बाहर निकाला। ढाका से करीब 200 किलोमीटर दूर उत्तरी जमालपुर जिले के कोयरा गांव से उपचार के लिए सफारी पार्क ले जाने की प्रक्रिया के दौरान 17 अगस्त को बंग बहादुर की मौत हो गई।
बंग बहादुर का पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि हाथी की मौत गर्मी के चलते दिल का दौरा पडऩे से हुई। उधर,बचाव दल के सदस्यों ने भी मान लिया कि भरसक कोशिश के बाद भी वे बंगबहादुर को बचा नहीं पाए परन्तु उसकी मौत का दुख है क्योंकि हम भी इस बहादुर हाथी को खोना नहीं चाहते थे। जो भी हो, दो महीने तक मौत से जंग लड़ने वाला बंग बहादुर तो हारकर भी जीत गया लेकिन हम इंसानों को एक शर्मनाक स्थिति में भी छोड़ गया. आखिर हमने उसके दो माह के संघर्ष पर अपनी बेपरवाही से पानी जो फेर दिया.




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