मंगलवार, 5 नवंबर 2019

हम बड़ी ई वाले हैं...वाकई ई तो बड़ी ही है

हम बड़ी ई वाले हैं' व्यंग्य संग्रह पर विस्तार से चर्चा के पहले यह जानना जरूरी है कि इसे आप कैसे और कहां से खरीद सकते हैं क्योंकि पढ़ेंगे तो तभी न,जब खरीदेंगे... इसके प्रकाशक पल पल इंडिया हैं, कीमत किताब की गुणवत्ता और सामग्री के अनुसार मात्र 100 रुपये है, जो आज के संदर्भों में बहुत कम है। अमेजॉन पर उपलब्ध है, जिसका लिंक नीचे दिया गया है:
https://www.amazon.in/…/…/ref=cm_sw_r_wa_apa_i_d80mDbX3X8KST
अब आप ये सोच रहे होंगे कि पुस्तक समीक्षा का ये कौन सा तरीका है...सीधे खरीदने की बात,तो पुस्तकों और खासकर हिंदी पुस्तकों के सामने सबसे बड़ा संकट खरीददारों की कमी और मुफ़्तखोर पाठकों का है इसलिए अच्छी किताबे असमय दम तोड़ देती हैं इसलिए 'हम बड़ी ई वाले हैं' तत्काल खरीदिए-पढ़िए-पढ़ाइए ताकि लेखक का हौंसला बढ़े और प्रकाशकों का भी।
अब बात इस व्यंग्य संग्रह की...
किसी भी विधा का लेखन तभी सार्थक माना जा सकता है, जब वह अर्थवान हो. ऐसे में जब व्यंग्य लेखन की चर्चा में किसी संग्रह की चर्चा की जाए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है. हर युवा में जो बदलाव की चाहत होती है और जयप्रकाश नारायण की तरह वे क्रांति का बिगुल फूंकना चाहते हैं लेकिन समस्या होती है कि क्रांति करेंगे समाज में तो घर में दाल-रोटी के लिए जो क्रांति होगी, उसका समापन सुखद तो कतई नहीं होगा. मन में सुलगते सवाल और संकटों से घिरी जिंदगी के बीच विकास संचार के अध्येता युवा संजीव परसाई ने व्यंग्य लेखन को इन दो संकटों के बीच एक पाट के रूप में स्थापित कर लिया. जीवन का संकट और मन में बदलाव की चाहत के इस झंझावत में अपने आसपास घटती घटनाओं पर वे कलम से क्रांति करते दिखते हैं. नेताजी के ढोंग हो या तथाकथित सन्यासियों की रासलीला, खुद के प्रचार में रत लोगों की कहानी हो या उन सरकारी दफ्तरों की खाल उतारते हैं संजीव अपने हर एक व्यंग्य में. कोई ऐसा विषय नहीं छोड़ा है. वे मीडिया की नब्ज पर हाथ धरते हैं तो बाबूजी के जरिए उस पत्रकारिता पर भी टिप्पणी करने से गुरेज नहीं करते हैं जो स्वयं कई बार जिया है.
एक व्यंग्यकार की कामयाबी इसी बात को लेकर होती है कि वह स्वयं पर कितना हंस सकता है और संजीव के व्यंग्य का पाठ करते हुए हम पाते हैं कि वे दूसरों पर कम, स्वयं पर ज्यादा चुटकी लेते हैं. यह आसान नहीं है लेकिन जिसने व्यंग्य लेखन की इस बुनियाद को पकड़ लिया, उसकी लेखनी में वह तंज होता है जो भीतर तक जख्मी कर जाए. शायद इसलिए ही कहा गया है कि तीर-तलवार से ज्यादा गहरा घाव कलम करती है. संजीव का यह पहला व्यंग्य संग्रह ‘ई’ बड़ी वाले’ है. चूंकि वे किताब छपाने के लिए व्यंग्य नहीं लिखते हैं इसलिए लेखन का सिलसिला निरंतर जारी है. वे उन लोगों में भी नहीं हैं कि चलो, एक किताब आ जाए और संतुष्ट होकर घर बैठ जाएं. उनका लेखन, सिर्फ लेखन नहीं बल्कि उनके भीतर की पीड़ा है और वे समाज को अपनी पीड़ा से रूबरू कराना चाहते हैं. हमारी कामना होगी कि लेखन और धारदार व्यंग्य लेखन का यह सिलसिला बना रहे. ‘ई’ बड़ी वाले’ का हर पन्ना अर्थवान है और इस अर्थ को समझने के लिए दिमाग से नहीं दिल से पढ़ें।

जापान में लियोनार्डो दा विंची से मुलाकात....!!!!

जापान जैसा मैंने जाना-समापन क़िस्त
लगभग एक माह से आपके सहयोग और उत्साहवर्धन के फलस्वरूप मैं अपनी जी-20 शिखर सम्मेलन के कवरेज के लिए हुई जापान यात्रा को एक श्रृंखला में पिरो पाया।आपने भी हर पोस्ट में अपनी प्रतिक्रियाओं से आगे लिखने का हौंसला दिया। अब तक की सात पोस्ट में हमने जापान के खानपान, संस्कृति,सफाई और प्रबंधन सहित तमाम मसलों पर चर्चा की। इस समापन पोस्ट को शब्दों की जुगलबंदी की बजाए कुछ आकर्षक तस्वीरों के जरिए सजाने के प्रयास कर रहा हूँ। दरअसल जापान सरकार ने इस शिखर सम्मेलन में आये विदेशी मेहमानों के लिए एक अनूठी प्रदर्शनी लगायी थी जिसमें यहां की सांस्कृतिक विरासत से लेकर तकनीकी विकास तक को समाहित किया था। इसमें आप मोनालिजा सहित अनेक कालजयी कृतियों के लिए मशहूर चित्रकार लियोनार्डो दा विंची के सजीव स्टेच्यू से भी रूबरू हो रहे हैं।जापान श्रृंखला फिलहाल समाप्त,अगली यात्रा पर फिर कुछ नई जानकारियों के साथ बातचीत होगी। आइए, नज़र डालते हैं इन रोचक तस्वीरों पर….
#Japan #G20 #Osaka #PrimeMinister #LeonardoDaVinchi #Monalisa

ओसाका कैसल: जापानी वास्तुकला का एक सुंदर वसीयतनामा

जापान जैसा मैंने जाना-7

ओसाका कैसल या ओसाका महल निश्चित रूप से जापान में सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है। यह जापान के तीन सबसे प्रमुख महलों में से एक है। ओसाका कैसल के बारे में भले ही आपको मेरी जापान यात्रा की आखिरी कड़ियों में पढ़ने को मिल रहा हो लेकिन हक़ीक़त यह है कि मैंने ओसाका में सबसे पहले ओसाका कैसल ही देखा था। दरअसल जापान में हवाई अड्डे से हमारी सहयोगी (गाइड-दुभाषिया) ने इस महल की इतनी तारीफ़ कर दी थी कि हमने होटल जाने के बजाए पहले इस महल को देखने का फ़ैसला किया और अब मैं दावे से कह सकता हूँ कि हमने सबसे पहले ओसाका कैसल जाकर कोई गलती नहीं की।
लगभग 450 साल पुराना यह पाँच मंजिला महल देश के सबसे अधिक और सबसे प्राचीन दर्शनीय रचनाओं में शामिल है। ओसाका कैसल को हम पारंपरिक जापानी वास्तुकला का एक सुंदर वसीयतनामा कह सकते है। महल के अंदर प्रत्येक मंजिल पर ओसाका के व्यापक इतिहास को कलाकृतियों के माध्यम से प्रतिबिंबित किया गया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक सदियों से यह महल कई उल्लेखनीय ऐतिहासिक घटनाओं का मंच रहा है। ओसाका कैसल अपनी विशाल आकार वाली पत्थर की दीवार के लिए भी प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि इसके निर्माण में लाखों की संख्या में बड़े पत्थरों का उपयोग किया गया है।
यहाँ के इतिहास पर नज़र डाले तो ओसाका कैसल का निर्माण 1583 में जापान में तमाम कबीलों की एकता के पुरोधा टॉयोटोमी हिदेयोशी (Toyotomi Hideyoshi-1536 - 1598) ने किया था लेकिन 1615 के गृह युद्ध के दौरान यह जल गया। इसे तब टोकुगावा बाकुफ़ु (Tokugawa Bakufu-1603 - 1867) के शासनकाल के दौरान फिर से बनाया गया । इस महल और आग के बीच कुछ अज़ीब सा रिश्ता है तभी तो यह महल बार-बार आग का शिकार बनता रहा और फ़ीनिक्स पक्षी की तरह पुनः नवनिर्मित होता रहा है। बताया जाता है कि 1665 में बिजली गिरने के कारण इस महल को फिर काफी नुकसान पहुंचा। इतना ही नहीं, एक बार फिर बने इस महल में 1868 में फिर आग गई। बार बार आग लगने की घटनाओं के कारण इसके फिर से निर्माण का इरादा त्याग दिया गया लेकिन ओसाका के लोगों की प्रबल इच्छाओं के कारण, 1931 में इसे फिर से सजाया-संवारा गया । तब से यह महल बिना किसी क्षति के ओसाका का गौरव गान बन गया है और बार-बार जलने/नष्ट होने के बाद भी यह भव्य महल आज भी अपनी वैभवशाली विरासत को समझाने और दिखाने में कामयाब है। कहा तो यह भी जाता है कि प्रारंभिक काल में लकड़ी से बने इस महल की आंतरिक साज सज्जा सोने की थी।
ओसाका कैसल की सुन्दरता में चार चाँद इसके आसपास बना पार्क लगा देता है । लगभग 10 लाख वर्गमीटर में फैला ओसाका कैसल पार्क भी 1931 में बनाया गया था और यह पार्क चेरी ब्लॉसम फूलने के दौरान दुनियाभर के पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। ओसाका कैसल का एक अन्य आकर्षण,इसके आसपास बनी गहरी खाई है। इसमें चलने वाली रंग-बिरंगी नावों के जरिये भी यहाँ के प्राकृतिक वैभव से रूबरू हुआ जा सकता है। ओसाका कैसल परिसर में नौका विहार के दौरान दिल्ली के पुराने किले ने बोटिंग करने जैसा लगता है,हालाँकि यहाँ वाहनों का शोरगुल नहीं है जो दिल्ली में किसी भी पर्यटन स्थल का सबसे कड़वा सच है।
#Osaka #Japan #G20 #OsakaCastle #ओसाकामहल #फीनिक्स पक्षी #प्रधानमंत्री #PrimeMinister

ऑलंपिक खेलों की मशाल हाथ में.... एक सपना सच हो गया...!!

जापान जैसा मैंने जाना-6

अपन के हाथ में ऑलंपिक मशाल.. टोक्यो में 2020 में होने वाले ऑलंपिक खेलों की मशाल...वह भी वास्तविक,बिना किसी मिलावट के।इन तस्वीरों के गलियारे में थोड़ा और आगे बढ़ेंगे तो इन खेलों के शुभंकर ‘मिराइतोवा’ को भी आप मेरे साथ देख पाएंगे...लगता है मुझे यहाँ के हैप्पीनेस शुभंकर ‘बिलिकेन’की दुआएं मिल गयी हैं तभी तो सालभर पहले और यहाँ तक कि ऑलंपिक खेलों की आधिकारिक तौर पर मशाल यात्रा शुरू होने के पहले ही मशाल को हाथ में लेने का अवसर मिल गया. बिलिकेन को आप भूले तो नहीं न क्योंकि पिछली एफिल टावर वाली कड़ी में ही तो हमने उनकी चर्चा की थी.
बहरहाल,अब से ठीक साल भर बाद दुनिया भर के दिग्गज खिलाड़ी टोक्यो में 2020 में होने वाले ऑलंपिक खेलों में एक-एक पदक के लिए अपनी पूरी ताक़त दांव पर लगा रहे होंगे।...आखिर खेलों के इस महाकुम्भ में अपना जलवा दिखाने और अपने देश के राष्ट्रध्वज-राष्ट्रगान के साथ गर्व से सीना चौड़ा कर, सैकड़ों कैमरों की चकाचौंध का सामना करने के लिए ही तो वे सालों-साल अपनी यह ऊर्जा संजो कर रखते हैं। वहीँ, खिलाडियों ही नहीं,खेलों से दूर रहने वालों के लिए भी ऑलंपिक खेलों की मशाल थामना गौरव की बात होती है। मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे मशाल थामने के साथ साथ ऑलंपिक शुभंकरों के साथ तस्वीर लेने का मौका भी मिल गया। दरअसल, जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान जापान ने यहाँ आने वाले विदेशी मेहमानों के लिए एक विशाल प्रदर्शनी भी लगायी थी। इस प्रदर्शनी में ऑलंपिक मशाल,शुभंकर और खेलों के आयोजन में सहभागी बनने वाले रोबोट सहित तमाम चीजें उनके वास्तविक रूप-रंग-आकार और प्रकार में प्रदर्शित की गयी थीं ।
जापान की राजधानी टोक्यो में 24 जुलाई से 9 अगस्त 2020 तक ऑलंपिक खेल होंगे और इसके ठीक बाद 25 अगस्त से 6 सितम्बर के बीच पैरा ऑलिम्पक खेलों का आयोजन होगा। एकतरह से इन खेलों का काउंट डाउन शुरू हो गया है। आपको जानकर हैरानी होगी कि टोक्यो दो बार ऑलंपिक खेलों की मेजबानी करने वाला एशिया का पहला शहर है। वहीँ, जापान में चौथी बार ऑलंपिक खेलों का आयोजन हो रहा है ।
तस्वीरों में दिख रही इस गुलाबी-सुनहरे रंग की ओलंपिक मशाल को जापान के मशहूर डिजाइनर तोकुजिन योशीओका ने डिजाइन किया है। मशाल की डिजाइन यहाँ बहुतायत में मिलने वाले चेरी फूल से प्रेरित है। चेरी, अब हमारे देश में शिलांग सहित पूर्वोत्तर के कई शहरों में फूलने लगी है। हालाँकि जापान जैसी विविधता अभी हमारे देश में तो नहीं मिलती लेकिन इसके रंग यहाँ जरुर बिखरने लगे हैं और मेघालय की राजधानी शिलांग में तो जापान की तर्ज पर अब बाकायदा ‘चेरी ब्लोसम’ जैसे आयोजन भी होने लगे हैं।
यह मशाल जापान में अगले साल 26 मार्च से अपनी यात्रा शुरू कर 121 दिनों में पूरे देश का चक्कर लगाकर टोक्यो पहुंचेगी। खास बात यह है कि टोक्यो ओलंपिक खेलों की मशाल सिर्फ धावकों के लिए नहीं है, बल्कि हम-आप जैसे लोगों के लिए भी है । मशाल को लेकर दौड़ने के लिए 10 हजार लोगों का चयन किया जा रहा है और इसके लिए जापान ही नहीं दुनिया भर से लोग आवेदन कर रहे हैं। आप भी चाहे तो इसका हिस्सा बन सकते हैं।
इन ऑलंपिक खेलों का आधिकारिक शुभंकर मिराइतोवा है। जापानी कलाकार रियो तानिगुची द्वारा निर्मित इस शुभंकर को दो हजार से ज्यादा शुभंकरों के बीच से एक प्रतियोगिता के माध्यम से चुना गया है । मिराइतोवा का नाम जापानी शब्दों ‘मिराई’ और ‘तोवा’ को मिलाकर रखा गया है जिसका अर्थ ‘उम्मीदों भरा भविष्य’, वहीँ पैरा ऑलंपिक खेलों के शुभंकर का नाम सोमिटी है जिसका अर्थ है ‘शक्तिशाली’।
इन ऑलंपिक खेलों की एक अन्य खूबी यहाँ खेलों में हाथ बंटाने वाले रोबोट होंगे। ये भविष्य केन्द्रित(फ्यूचरिस्टिक) रोबोट न केवल खेलों में एथलीटों और दर्शकों का स्वागत करेंगे बल्कि खेलों के आयोजन स्थलों तक पहुँचने में भी सहायक बनेंगे। जापान इन खेलों के दौरान चार प्रकार के रोबोट की सहायता ले रहा है...तो तैयार हो जाइये, आधुनिकता और तकनीक के मिश्रण के साथ दुनिया के प्राचीनतम और सबसे प्रतिष्ठित खेल आयोजन का साक्षी बनने के लिए।
#japan #G20 #Osaka #TokyoOlympic #OlympicGames #ओलंपिकखेल #मशाल #शुभंकर

जापान में एफिल टावर और पेरिस..!!!

जापान जैसा मैंने जाना-5

जापान में एफिल टॉवर या पेरिस और न्यूयार्क का सा नज़ारा... सुनकर आश्चर्य होता है न,मुझे भी हुआ जब बताया गया कि ओसाका, जहां जी- 20 शिखर सम्मेलन हुआ था, में एफ़िल टॉवर है!! बस फिर क्या था हमने ओसाका पहुंचकर सबसे पहला काम एफ़िल टॉवर देखने का किया। जब वहां पहुंचे तो एफ़िल टावर तो नहीं उसकी प्रतिकृति जरूर मिली लेकिन आकर्षण और लोकप्रियता के मामले में उससे एक कदम भी पीछे नहीं। दरअसल,ओसाका का सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ के शिनसेकाई (Shinsekai) इलाक़े में स्थित यह सुटेनक्कु टॉवर (Tsutenkaku Tower) है। इसे ओसाका का एफिल टावर कहा जाता है और हम समझने के लिए इसे दिल्ली के इण्डिया गेट और जनपथ मार्केट का मिला जुला रूप कह सकते हैं। जापानी शब्द सुटेनक्कु का मतलब स्काई रूट टॉवर है और यहाँ सुबह से लेकर रात तक स्थानीय और हम जैसे विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है। इसका कारण इस इलाक़े की रौनक, सुन्दर-रंग बिरंगी बनावट,सस्ता सामान मिलना और जापान से जुड़े स्मृति चिन्ह मिलने का सर्वप्रमुख स्थान होना है।
जब इस टावर के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि मूल टावर का निर्माण 1912 में हुआ था। मूल टॉवर के शीर्ष को पेरिस के एफिल टॉवर के समान ही बनाया गया था। 64 मीटर ऊंचा यह टावर उस समय एशिया की दूसरी सबसे बड़ी संरचना थी । 1943 में आग लगने से यह बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया इसलिए इसे यहाँ से हटा दिया गया था । बाद में, स्थानीय लोगों ने इसी स्थान पर नए टॉवर के निर्माण के लिए अभियान चलाया और तब जाकर 1956 में मौजूदा टावर अस्तित्व में आया। अब 103 मीटर ऊँचें, इस स्मारक को आर्किटेक्ट ताचू नितो ने बनाया था, जिन्होंने टोक्यो टॉवर भी डिजाइन किया था।
टॉवर की 4 और 5 वीं मंजिल तक जाकर पर्यटक ओसाका शहर की स्काई लाइन और पूरे शहर के विहंगम दृश्य का आनंद ले सकते हैं। इसके लिए 500 येन या तक़रीबन 400 रुपए टिकट लगती है। टॉवर में एक संग्रहालय भी है जहाँ ओसाका,इस इलाक़े और जापान की कला संस्कृति पर केन्द्रित भरपूर भंडार है। टॉवर को जब रात में रोशन किया गया है तो यहाँ पूरा इलाक़ा रंगबिरंगी रोशनी से सराबोर हो जाता है। यहाँ लोग बताते हैं कि टावर की रोशनी मौसम के साथ रंग भी बदलती है,साथ ही टॉवर पर लगी घड़ी जापान में सबसे बड़ी है।
शिनसेकाई (Shinsekai) इलाके की भी अपनी एक अलग कहानी है। बताया जाता है कि इसे ओसाका प्रीफेक्चर अर्थात ओसाका संभाग में एक मनोरंजन शहर के रूप में डिजाइन किया गया था, और मूल रूप से इसे न्यूयॉर्क और पेरिस शहरों की रंगीनियत और रूमानियत देने का प्रयास किया गया है। शिनसेकाई का शाब्दिक अर्थ भी है- नई दुनिया और अपनी आधुनिक छवि के कारण यह क्षेत्र वाकई ओसाका के लोकप्रिय स्थानों में से एक है।
शिनसेकाई क्षेत्र के चारों ओर आपको स्थानीय शुभंकर बिलिकेन (Billiken)की मूर्तियाँ और चित्र लगे दिखेंगे और बड़ी संख्या में लोग इन्हें खरीदते भी हैं । बिलिकेन को जापान में गुड लक का प्रतीक या अच्छी किस्मत देने वाला देवता माना जाता है इसलिए कहा जाता है कि बिलिकेन की मूर्ति के पैर छूने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। हमने भी छुए। बहरहाल सच्चाई जो भी हो लेकिन मेरे लिए तो ओसाका जाकर जी-20 जैसे बड़े कार्यक्रम को कवर करना ही किसी गुडलक से कम नहीं था इसलिए बिलिकेन से जुड़ी कहानी पर भरोसा करने में कोई बुराई नहीं है।

इस सोच के साथ कैसे करेंगे हम जापान की बराबरी..!!

जापान जैसा मैंने जाना-4

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि बढ़िया सूट-बूट पहने कोई व्यक्ति साइकिल चला रहा हो या कोई महिला साल-दो साल के बच्चे को लेकर साइकिल पर बाज़ार करने या ऑफिस जाने को निकली हो,वो भी बेखौफ-बिंदास-बेझिझक!..हमारे देश में कोई ऐसा करेगा तो शायद दूसरे दिन अख़बारों में उसकी फोटो छप जाए लेकिन जापान में यह आम बात है. ओसाका,जहाँ जी-20 देशों का शिखर सम्मेलन हुआ था,वहां बड़ी संख्या में महिला/पुरुष/युवा/बच्चे सभी बड़े आराम से साइकिल पर घूमते नजर आते थे और वहां के लोगों से बातचीत में पता चला कि पूरे जापान में साइकिल के प्रति इसीतरह का प्रेम है.
न गाड़ियों की कर्कश चिल्लपों, न बेतहाशा भागते लोग एवं वाहन और न ही रेड लाइट पर हमारे जैसी चीख-पुकार...सब कुछ सुकून/शांति/आराम और सम्मान से....सम्मान पैदल यात्रियों का और सम्मान साइकिल सवारों का. जापान साइकिल की सवारी के मामले में भले ही दुनिया मे नीदरलैंड,डेनमार्क और जर्मनी जैसे देशों से पीछे हो लेकिन शायद हम से बहुत आगे है. हमारे देश में दुनिया भर में कुल साइकिल उत्पादन का 10 फीसदी हिस्सा बनता है लेकिन साइकिल चलाना हमें गंवारा नहीं है. जापान के सिर्फ ओसाका शहर में ही 10 लाख से ज्यादा साइकिल हैं जबकि आबादी हमारे भोपाल जैसी ही मतलब 18-20 लाख के आसपास है. यदि हम ओसाका की तुलना भोपाल से करें तो साइकिल को लेकर मानसिकता साफ़ जाहिर हो जाती है. भोपाल में साइकिल चलाने के लिए आम लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए स्मार्ट साइकिल सर्विस शुरू की गयी थी. अब तक इसके लिए महज 65 हजार लोगों ने ही रजिस्ट्रेशन कराया है और प्रतिदिन औसतन 1200 लोग ही साइकिल चलाते हैं. वैसे इसमें निजी तौर पर साइकिल चलाने वालों की संख्या शामिल नहीं है लेकिन वो भी कितनी होगी? दरअसल साईकिल चलाने के लिए मानसिकता चाहिए और हमारे यहाँ तो साइकिल गरीबी की पहचान है. अब भले ही मोटापे से मुक्ति,तोंद से छुटकारे और डाक्टर की सलाह पर मन मारकर साइकिल चलाने लगे हैं लेकिन वे भी बस पार्क या घर के आसपास तक ही सीमित हैं तभी तो जब कोई सांसद/विधायक साइकिल पर संसद/विधानसभा पहुँच जाता है तो वह खबर बन जाता है जबकि जापान जैसे देशों में यह सामान्य बात है.
जापान में हर व्यक्ति दिनभर में औसतन 15 प्रतिशत यात्राएँ साइकिल से ही करता है और यक़ीनन जापानियों की छरहरी काया का राज भी यही है। ओसाका में मुझे तो कोई तोंद वाला और बेढब काया वाली महिला नज़र नहीं आयी। अब आप कह सकते हैं सूमो पहलवान भी तो जापानी हैं लेकिन वह एक अलग नस्ल है और यहां हम जापान के सामान्य लोगों की बात कर रहे हैं। हाल के वर्षों में यहां 10 लाख से अधिक बाइक(साइकिल) हर साल बेची जाती हैं। जापान में मोटरसाइकिलों के विकल्प के रूप में साइकिल का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। बहुत सारे लोग ट्रेन स्टेशनों पर सवारी करने के लिए उनका उपयोग करते हैं। आजकल अधिक से अधिक जापानी ट्रैफिक जाम और भीड़ वाली ट्रेनों से बचने के लिए साइकिल चला रहे हैं। हर जगह साइकिल खड़ी करने के लिए बाकायदा साईकिल स्टैंड बने हुए हैं- माल में,ऑफिसों में,आम बाज़ारों में,फुटपाथ पर,बस स्टाप पर सभी जगह आधुनिक साइकिल स्टैंड हैं. लोग नियम से साइकिल पार्क करते हैं और ज़ेबरा क्रासिंग पर लोग लालबत्ती होने का इंतजार नहीं करते बल्कि साइकिल और पैदल यात्रियों को सुकून और शांति से निकलने देते हैं. वाहनों की लाइन होने के बाद भी कोई हार्न बजा-बजाकर पूरे इलाक़े को सर पर नहीं उठाता बल्कि आगे बढ़ने के लिए चुपचाप अपनी बारी का इंतज़ार करता है।
...और अंत में सबसे सुखद अहसास..यहाँ लड़कियां और महिलाएं अपने मन मुताबिक कपड़े पहनकर मन चाहे समय तक पैदल और साइकिल पर घूमती हैं लेकिन उन पर कोई फब्ती नहीं कसता,कोई आंख फाड़ फाड़कर नहीं देखता,कपड़ों की आड़ लेकर कोई बलात्कार नहीं करता और उन्हें नारीत्व को लेकर कोई शर्म का अहसास नहीं कराता...बस यहीं हम बहुत पीछे हैं और शायद कभी जापान की बराबरी भी न कर पाएंगे।
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जब पनीर समझकर सुअर सेंडविच खा गए एक बाईट-वीर...!!!

जापान जैसा मैंने जाना-3

जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन को कवर करने जापान पहुंचे दुनियाभर के पत्रकारों के लिए ओसाका में बने इंटर-नेशनल मीडिया सेंटर में एप्पल सेंडविच और पाइन-एप्पल पेटिस पर हाथ साफ़ करते हुए हमारे एक पत्रकार साथी ने पनीर-क्रीम सेंडविच का बड़ा सा पीस मुंह में ठूंसते हुए कहा-बहुत ही जोरदार है,आप भी लीजिए! अपन ठहरे लकीर के फ़क़ीर...हर डिश को समझकर-पढ़कर खाने वाले,इसलिए उनकी सलाह पर अमल से पहले एक चक्कर लगाकर उस सेंडविच का नाम तलाशा तो उस पर जो लिखा था उसका मतलब पूछने पर पता चला कि वह सेंडविच सुअर के मांस की है!! अब उन पत्रकार मित्र का हाल मत पूछिये क्योंकि तब तक वे आधी से ज्यादा सेंडविच हलक से नीचे उतार चुके थे और अब न उगलते बन रहा था और न ही निगलते.
हालाँकि, इसमें उस बेचारे की भी कोई गलती नहीं थी क्योंकि यदि मैं आपसे कहूँ कि सुशी, साशिमी, टेम्पुरा,याकीतोरी,उडोन,सोबा,कैसेकी,सुकीआकी, सुकमोनो अचार और मिसो सूप...इन नामों को सुनकर कुछ समझ आया..तो आप भी आश्चर्य से पलकें झपकाते रह जाएंगे क्योंकि जब मुझे जापान जाने के बाद भी समझ नहीं आया तो आप खाली नाम पढ़कर कैसे समझ सकते हैं...चलिए इस पहेली को आसान बनाते हैं..दरअसल ये सभी नाम जापान के सबसे लोकप्रिय और लज़ीज़ व्यंजनों के हैं और बड़ी संख्या में तमाम देशों के लोग इनका स्वाद चखने के लिए जापान जाते हैं. जी-20 देशों के महारथियों को भी ये और इनके साथ दर्जनों अन्य व्यंजन परोसे गए थे. व्यंजन तो छोड़िये, दुनिया के इन सबसे ताकतवर मुल्कों के प्रतिनिधियों के लिए 100 से ज्यादा प्रकार के शेक,24 प्रकार की चाय, 8 प्रकार की काफ़ी, दर्जन भर से ज्यादा प्रकार की बीयर,17 प्रकार की वाइन,12 तरह के साफ्ट ड्रिंक,30 प्रकार की देशी मदिरा-शोचु परोसी गयी. शोचु गन्ना, शकरकंद, ज्वार,चावल जैसे कई अनाज और फलों से बनती है. तक़रीबन दौ सौ से ज्यादा व्यंजनों और ड्रिंक्स की सूची में मुझे बस चावल, दार्जिलिंग टी, आइस टी,काफ़ी जैसे कुछ नाम ही समझ आए.
वैसे, शायद कम ही लोग जानते होंगे कि जापानी भोजन दुनिया में काफी लोकप्रिय है और इसका कारण यह है कि पारंपरिक जापानी खाने में पाँच नियमों को ध्यान में रखकर विविधता और संतुलन पर जोर दिया जाता है। इन नियमों के अंतर्गत खाने में पांच रंगों (काला, सफेद, लाल, पीला और हरा), खाना पकाने की पांच तकनीकों (कच्चा भोजन, ग्रिलिंग, स्टीमिंग, उबालना और तलना) के साथ साथ पांच स्वाद (मीठा, मसालेदार, नमकीन, खट्टा और कड़वा) का खास ध्यान रखा जाता है। यहाँ तक कि सूप और चावल बनाते समय भी इन नियमों का पालन किया जाता है। इसके अलावा ताज़ी और उच्च गुणवत्ता वाली मौसमी कच्ची सामग्री का इस्तेमाल के साथ साथ नफ़ासत के साथ परोसने के कारण भी जापानी खान-पान के मुरीद बढ़ रहे हैं।
अब यदि आप हिन्दू वेजीटेरियन (जैसा कैथी पैसिफिक एयरलाइन्स में पूछा गया था) जैसे किसी खूंटे से नहीं बंधे हैं तो जापान में आपकी जीभ के लिए भरपूर गुंजाइश है जो मछली-मटन-चिकन से आगे बढ़कर सुअर,गाय और सी फूड में ऑक्टोपस-केंकड़े और कई प्रकार के कीड़े मकोड़े का भी स्वाद ले सकती है. ऐसा भी नहीं है कि शाकाहारियों के लिए जापान में भूखे मरने की नौबत आ सकती है क्योंकि ब्रेड-बटर तो सामान्य रूप से हर जगह उपलब्ध है. फिर तमाम नुडल्स,जूस,फल का आनंद भी लिया जा सकता है. अब तो अनेक भारतीय रेस्तरां यहाँ खुल गए हैं जो आपको भारतीय स्वाद में भारतीय खाना परोस रहे हैं और कई जापानी भी इस खाने के दीवाने हैं. यहाँ तक कि कुछ होटलों में पहले से बता दिया जाए तो जैन भोजन भी मिल जाता है इसलिए यदि जापान जाने का मन बना लिया है तो बेख़ौफ़ और बेझिझक जाइए क्योंकि दाल-चावल-रोटी तो घर में मिल ही जाती है लेकिन जब देश से बाहर आये हैं तो सुशी, साशिमी, टेम्पुरा,याकीतोरी का भी लुत्फ़ उठाया जाए क्योंकि ये सब थोड़ी हमारे देश में आसानी से मिलेंगे.
#G20 #Japan #FoodofJapan #Osaka #Sushi #Sashimi #Rice #DalChawal

आर यू सिंपल वेजीटेरियन या हिन्दू वेजीटेरियन?

जापान जैसा मैंने जाना-2

कैथी पैसिफिक एयरलाइन्स के विमान में खाना परोसते हुए एयर होस्टेस ने पूछा- यू आर वेजीटेरियन? मेरे हाँ कहते ही उसने तत्काल दूसरा सवाल दागा- विच टाइप आफ वेजीटेरियन....मीन्स सिंपल वेजीटेरियन या हिन्दू वेजीटेरियन? अपनी लगभग ढाई दशक की नौकरी में यह सवाल चौंकाने वाला था क्योंकि अब तक तो शाकाहारी का एक ही प्रकार अपने को ज्ञात था। अब शाकाहार भी हिन्दू-मुस्लिम टाइप होता है इसकी जानकारी जापान यात्रा के दौरान ही मिली। खैर मैंने बताया कि हिन्दू वेजीटेरियन तो उसने कहा कि आपको 20 मिनट इंतज़ार करना होगा क्योंकि मुझे आपके लिए खाना पकाना पड़ेगा ! अब सोचिए विदेशी विमान में कोई विदेशी व्योमबाला (एयर होस्टेस) कहे कि मैं आपके लिए खाना बनाकर लाती हूँ तो दिल में लड्डू फूटना स्वाभाविक है। लगभग 20-25 मिनट के इंतज़ार के बाद वह बटर में बघारी हुई खिचड़ी,चने की दाल और रोटी के नाम पर ब्रेड के टुकड़े लेकर हाज़िर हुई। उसने भरसक प्रयास किया था कि खाना स्वादिष्ट रहे और अपन ने भी दबाकर खा लिया ताकि उसे भी महसूस हो कि खाना स्वादिष्ट ही था।..खैर इस एक किस्से से यह तो साफ़ हो गया था कि जापान में शाकाहार के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और दूसरा यह कि यात्रा पर रवानगी से पहले इष्ट मित्रों की बात सही लग रही थी जो उन्होंने अपने और अपनों के अनुभव के आधार पर बताई थी कि जापान में तुम्हें उपवास करना पड़ सकता है।
अब जब मैदान में कूद पड़े तो फिर जंग से क्या डरना इसलिए जो जैसा मिलेगा-काम चला लेंगे, के अंदाज़ में मन बना लिया...अब निश्चित ही आप सभी के मन में यह सवाल उछल रहे होंगे कि फिर वहां क्या खाया तो सबसे पहले तो सुन और जान लीजिए कि हमने वहां शाही पनीर, दाल मखनी, रसगुल्ला, गुलाब जामुन, खिचड़ी, सोन-पापड़ी, आलूबंडा, पोहा,उत्पम और इडली सहित वो सब कुछ खाया जो यहाँ भारत में खाने को मिलता है और उतना ही स्वादिष्ट क्योंकि...‘मोदी है तो मुमकिन है।’
जी हाँ,इसमें जरा भी गलत नहीं है क्योंकि जापान में प्रधानमंत्री श्री मोदी के कारण ही यह मुमकिन हुआ। दरअसल हमारे प्रधानमंत्री ठहरे हम से ज्यादा शाकाहारी इसलिए जापान की जिस होटल में हम लोग ठहते थे, उसने भारत से खासतौर पर रसोइए बुलाए थे और जब रसोइए भारतीय थे तो स्वाद भी भारतीय था और अंदाज़ भी, लेकिन जापान में खाने का मामला इतना सीधा भी नहीं था क्योंकि इस कहानी का दूसरा हिस्सा भी है जिसमें ज़रूर जापान में शाकाहारी खाने के संकट का अहसास होता है। दरअसल होटल में तो भारतीय रसोइए की मेहरबानी से शाकाहारी भोजन मिल गया लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया सेंटर में तो दुनियाभर के लोगों का ध्यान रखा गया था इसलिए वहां शाकाहार और विशेष तौर पर हिन्दू शाकाहार(!) कहीं पीछे रह गया। मीडिया सेंटर में अपना खाना तो दूर अपनी चाय (वही दूध-शक्कर और पत्ती की जुगलबंदी से भरपूर खौलने के बाद तैयार) के लिए भी तरसना पड़ा। वैसे तो जापान में वीआईपी मेहमानों को 24 प्रकार की चाय उपलब्ध थी जिसमें कई अबूझ नामों के बीच हमारी दार्जिलिंग चाय और आइस टी जैसे कुछ जाने माने नाम भी शामिल थे लेकिन वही अपनी असल कड़क-खौलती चाय नहीं थी। चाय के अलावा कॉफ़ी के भी दर्जन भर प्रकार थे जिनमें ओसाका के स्थानीय ब्रांड के अलावा ‘20 देशों के 20 दाने’(20 beans of 20 countries) जैसी उत्तम किस्म की कॉफ़ी भी थी लेकिन दिक्क़त यहाँ भी दूध की थी और बिना दूध के कड़वी कॉफ़ी को हलक से नीचे उतारना अपने लिए तो किसी सज़ा की तरह है। हालाँकि यहाँ कॉफ़ी के एक प्रकार कॉफ़ी लैटे ने मदद की क्योंकि इसमें पर्याप्त दूध होता है और इसतरह कुछ हद तक चाय- कॉफ़ी का संकट दूर हुआ।
अगली कड़ी में बात जापान के खान-पान की।

अपना सा ही लगता है जापान

जापान जैसा मैंने जाना -1
भोपाल के श्यामला और अरेरा हिल्स और दिल्ली में रायसीना हिल्स की तरह के पहाड़ी इलाक़े,सफाई में हमारे इंदौर से भी आगे और परिवहन व्यवस्था में मुंबई से कई गुना बेहतर व्यवस्थित मेट्रो-बस-टैक्सियां, सड़कों पर सुकून से साइकिल चलाते महिला-पुरुष और हर अजनबी का हल्की मुस्कराहट से स्वागत करते लोग...ये ओसाका है-जापान का दूसरा सबसे बड़ा शहर और 28-29 जून को हुए दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी- 20 शिखर सम्मेलन का मेजबान शहर।
ओसाका (Osaka) का अर्थ ही है ‘बड़ी सी पहाड़ी और ढलान’। जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि अपने इन्हीं उतार चढाव के कारण ओसाका हमें भोपाल और दिल्ली का सा आभाष देता है।
अपनी जापान यात्रा पर कुछ लिखने की शुरुआत किसी शहर के परिचयात्मक उल्लेख से ? यह बात कई लोगों को शायद रास न आए लेकिन ऐसा करने का उद्देश्य यह है कि कम से कम वे लोग भी जापान के ओसाका शहर को और इसके महत्व को समझ सकें जिनके लिए जापान का मतलब बस टोकियो है और वह भी हमारी ‘लव इन टोकियो’ मार्का फिल्मों के जरिये मिले ज्ञान से या फिर हिरोशिमा-नागासाकी बमबारी की घटना के सन्दर्भ में…. जापान को पहचानते हैं।
खुद सोचिए, जापान जैसा तकनीकी संपन्न और विकसित देश यदि दुनिया की 20 महाशक्तियों की मेजबानी का गौरव टोकियो से इतर अपने किसी शहर को देता है तो ज़ाहिर सी बात है कि वह शहर अपने आप में खास होगा और जब बात ओसाका शहर की हो तो मामला खासमखास हो जाता है।
ओसाका वास्तव में जापान का एक बड़ा बंदरगाह शहर और वाणिज्यिक केंद्र है। जब हम जापान के कंसाई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से बाहर निकले तो एक ओर जापानियों के स्वभाव की तरह शांत और विशाल समुद्र था तो दूसरी ओर घर और कल- कारखाने। हवाई अड्डे की लंबाई चौड़ाई का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ एक गेट से दूसरे गेट तक जाने के लिए भी ट्रेन का सहारा लेना पड़ता है। एक और खास बात यह है कि हवाई अड्डे से ओसाका शहर तक का लगभग पूरा सफर समुद्र के ऊपर बने फ्लाईओवर पर ही करना पड़ता है। इसे मानव निर्मित सबसे बड़ा द्वीप भी कहते हैं क्योंकि इसके जरिये यहाँ समुद्र का बेहतर उपयोग भी हो रहा है।
यह अपनी आधुनिक वास्तुकला, नाइट-लाइफ़, ऊँची-ऊँची इमारतों,रौशनी से नहाई सड़कों और लज़ीज़ स्ट्रीट फूड के लिए भी जाना जाता है। ओसाका दुनिया के अग्रणी शहरों में शामिल है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैसे तो ओसाका जापान के केंद्र में स्थित है और यहाँ के अहम महानगरों और जिलों में से एक है। लेकिन यह अपने आप में एक प्रान्त है जो लगभग 33 शहरों तथा 9 क़स्बों में विभाजित है। ओसाका प्रान्त की आबादी लगभग 80 लाख है और यहाँ तक़रीबन 2 लाख विदेशी नागरिक है जिनमें लगभग 3 हजार भारतीय हैं। वैसे ओसाका शहर की आबादी भी तक़रीबन 18 लाख है।
हम यहाँ जून माह के आखिरी दिनों में थे और तब भी यहाँ के लोग गर्मीं से बचने के लिए हाथ में बैटरी से चलने वाला छोटा सा पंखा लेकर घर से निकलने लगे थे। हालाँकि तापमान 26 से 27 डिग्री के बीच था और जापानियों के हिसाब से गर्मी शुरू हो रही थी । उन्हें क्या पता कि हम 45 डिग्री तापमान में भी घर से बाहर रहने वाले देश से आये हैं और 27-28 डिग्री तापमान तो हमारे लिए ठण्ड में रहता है। वैसे यहाँ लोग बताते हैं कि ओसाका में ठंड आम तौर पर कम पड़ती है और जनवरी के सबसे ठंडे महीने में भी तापमान 9.3 डिग्री सेल्सियस रहता है। बारिश का मौसम जून से जुलाई तक और गर्मियों में अधिकतम तापमान 33 डिग्री सेल्सियस तक जाता है। कुल मिलाकर ओसाका के जरिये हम जापान की जीवनशैली,आधुनिकता,विकास और विरासत को काफी हद तक समझ सकते हैं।
अगली किस्तों में बात करेंगे जापान की कुछ और जानी-अनजानी खूबियों की।
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दोनों हाथ नहीं, फिर भी किया मतदान...!!!


दोनों हाथ न होने के बावजूद दृढ़ इच्छाशक्ति और एक-एक वोट का महत्व समझते हुए मप्र में संस्कारधानी के नाम से मशहूर जबलपुर की एक बेटी ने अपने संस्कारों से न केवल शहर का नाम रोशन कर दिया बल्कि हम जैसे हाथ-आँख-कान वाले लोगों को लोकतंत्र के महापर्व का महत्त्व भी समझा दिया।
लोकतंत्र की सच्ची पहरेदार बिटिया भवानी ने दोनों हाथ नहीं होने के बाद भी मतदान कर एक बेहतरीन मिसाल पेश की है।
ज़ाहिर है यह हमारे लोकतंत्र का सुखद, अविस्मरणीय और खूबसूरत पहलू है। जबलपुर के श्री राम इंजीनियरिंग कालेज की छात्रा भवानी यादव, जिसके दोनों हाथ नहीं है, ने आज अपनी माँ के साथ अन्जुमन स्कूल के पोलिंग बूथ में पहुँचकर मतदान किया। जहां पीठासीन अधिकारी ने तमाम सरकारी औपचारिकताओं को पीछे छोड़कर जमीन पर बैठ कर भवानी के पैर की उंगली में अमिट स्याही का निशान लगा कर ऐसे गर्व की अनुभूति की जो उन्हें ताउम्र अपने इस कार्य के लिए गौरवान्वित करती रहेगी । इसके बाद, अपने नाम को चरितार्थ कर लोकतंत्र की इस दुर्गा (भवानी) ने अपनी पसंद का सांसद चुनने के लिए मां के सहयोग से अपना अमूल्य मतदान किया।
इसे केवल एक चित्र के तौर पर न देखे बल्कि अपने लिए एक सबक/नसीहत और सीख समझे और अपनी नई पीढ़ी को भी दिखाएं-समझाएं कि हमारा लोकतंत्र ऐसी ही वीरांगनाओं के कारण मजबूत हो रहा है,संवर है तो क्यों न हम भी भवानी की ताक़त बने,लोकतंत्र की शक्ति बने और मिल जुलकर ऐसे ही जीवंत लोकतंत्र की नई कहानी के सूत्रधार बने।

सिर ही सिर..हजारों से करोड़ों में बदलते सिर

प्रयागराज कुंभ: जैसा मैंने देखा (6)

10 लाख, 20 लाख,50 लाख,1 करोड़, 5 करोड़, 10 करोड़, 15 करोड़, 20 करोड़......हम-आप गिनते गए और यह संख्या बढती गयी...हमारी-आपकी कल्पना से परे,प्रशासन की गणना से बहुत आगे एवं बीते कुम्भों से अलहदा।..और जब 49 दिन का सफ़र पूरा हुआ तो यह संख्या बढ़कर 24 करोड़ हो गयी....चौबीस करोड़ का मतलब है दुनिया के तक़रीबन सवा दो सौ देशों में आधे से ज्यादा देशों की जनसँख्या से ज्यादा। स्विट्ज़रलैंड और सिंगापुर जैसे देशों से तीन गुना तथा श्रीलंका, सीरिया, रोमानिया, क्यूबा, स्वीडन और बेल्जियम जैसे देशों की जनसँख्या से कहीं ज्यादा। मकर संक्रांति से लेकर महाशिवरात्रि के बीच करोड़ों की इस संख्या का प्रबंधन वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं है। मैं आमतौर पर ‘महा’ विशेषण से परहेज करता हूँ लेकिन मैंने अपनी आँखों से अर्ध कुंभ को महाकुंभ में बदलते देखा....दिव्य-भव्य महाकुंभ और वह भी सबसे सुरक्षित और सबसे स्वच्छ।
महाकुंभ में जुटी भीड़ के लिए कोई शब्द तलाशा जाए तो ‘जनसैलाब’ शब्द भी प्रयागराज में उमड़ी भीड़ के सामने लाचार लगा। यदि इससे भी बड़ा कोई शब्द इस्तेमाल किया जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। चारों ओर बस सिर ही सिर नजर आते थे। सभी ओर बस जनसमूह था- प्रयाग आने वाली सभी ट्रेनों में,प्लेटफार्म पर, स्टेशन से आने वाली सड़क पर, बसों में,कार से,पैदल, बस सिर ही सिर ,पोटली लेकर चलते,बैग लादे,बच्चे संवारते, संगम की ओर बढ़ते, गंगा की तेज़ धार से,निर्मल-आस्थावान-सच्चे और सरल लोग। ऐसा लगता था जैसे प्रयाग की सारी सड़कें एक ही दिशा में मोड़ दी गयी हों। बूढ़े, बच्चे, महिलाएं और मोबाइल कैमरों से लैस नयी पीढ़ी, परिवार के परिवार। पूरा देश उमड़ आया था वह भी बिना किसी दबाव या लालच के, अपने आप, स्व-प्रेरणा से...और देश ही क्या विदेशी भी कहाँ पीछे थे। मैंने तो आज तक अपने जीवन में कभी किसी मेले में इतनी भीड़ नहीं देखी। इस कुम्भ का आकर्षण इतना जबरदस्त था कि दुनिया भर से 8 से 10 लाख विदेशी सैलानी भी खिंचे चले आए।इसमें लगभग सवा लाख तो सिर्फ अमेरिका और एक लाख आस्ट्रेलिया से थे।
यह कुंभ कई मायनों में अलग था-महाकुंभ था मसलन कुंभ के इतिहास में संभवतः पहली बार राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कई केंद्रीय मंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और विभिन्न राज्य सरकारों के मंत्रियों सहित देश में संवैधानिक पदों पर बैठे लगभग सभी प्रमुख लोगों ने न केवल कुंभ का दौरा किया, बल्कि संगम पर डुबकी भी लगाईं।
आमतौर पर कुंभ में स्नान के खास दिनों जैसे मकर संक्रांति, पौष पूर्णिमा, मौनी अमावस्या, वसंत पंचमी, माघी पूर्णिमा और महा शिवरात्रि पर ही भीड़ देखी जाती थी लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि आम दिनों में भी श्रद्धालुओं की भीड़ खास दिनों की तरह बनी रही। पहली बार किसी कुंभ ने तीन विश्व रिकार्ड अपने नाम दर्ज किये और स्वच्छता और सफाई, ट्रैफिक योजना और भीड़ प्रबंधन सहित तीन क्षेत्रों में सफलतापूर्वक अपना नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करवा लिया।
महाकुंभ तो था ही यह क्योंकि इसका दायरा पिछले कुम्भ के 1600 हेक्टेयर की तुलना में दोगुना यानी 3200 हेक्टेयर से अधिक था। कुंभ 20 क्षेत्रों में विभाजित तो 40 से ज्यादा स्नान घाट 8 किमी के दायरे में फैले थे। विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने और तीर्थयात्रियों को संगम तक पहुंचने के लिए गंगा नदी पर 20 पोंटून पुल अर्थात नाव के अस्थायी पुल बनाए गए थे। । केंद्र और राज्य सरकारों ने कुल मिलाकर महाकुंभ के आयोजन पर 7 हजार करोड़ रुपये खर्च किये थे।वैसे तो यह आंकड़ा भी कुम्भ को महाकुंभ बनाने की कहानी बयान कर देता है क्योंकि 2013 में पिछले कुम्भ पर करीबन 13 सौ करोड़ रुपये खर्च हुए थे।
प्रयाग कुम्भ वास्तव में इसलिए भी महाकुंभ था क्योंकि इसने 6 लाख से ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार दिया। भारतीय उद्योग परिसंघ के अध्ययन के मुताबिक प्रयाग कुम्भ से उप्र को लगभग 1.2 लाख करोड़ का राजस्व मिला जो उत्तरप्रदेश के सालाना बजट 4.28 लाख करोड़ का एक चौथाई है। सबसे ज्यादा कमाई होटल,खानपान,टूर आपरेटर और परिवहन के क्षेत्रों में हुई है...तो आइए इस सफल और सुरक्षित आयोजन के लिए आयोजकों से ज्यादा हम-आप जैसी आम जनता की पीठ थपथपाएं क्योंकि उसके अनुशासन, जिजीविषा, संयम और सहनशीलता ने कोई हादसे का कलंक इस महाकुंभ पर नहीं लगने दिया और तमाम रिकार्डों के बीच यह आयोजन वास्तव में अपने उद्देश्यों पर खरा उतरा।
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मुलाक़ात एक अनूठे-अद्भुत और सबसे अलग महामंडलेश्वर से

 प्रयागराज कुंभ: जैसा मैंने देखा (5)                     
प्रथम गेट से लेकर मुख्य पंडाल तक श्रद्धालुओं की भीड़ लगी है, कुछ बाहुबली लोग भीड़ को सँभालने में जुटे हैं. मुख्य पंडाल भी खचाखच भरा है- नेता,अभिनेता,मीडिया और साधु-संतों सहित तमाम लोगों को महामंडलेश्वर का इंतज़ार है. किसी तरह जुगाड़ लगाकर अन्दर तक पहुंचकर हमने भी पूछा तो बताया गया कि महामंडलेश्वर तैयार हो रहे हैं तथा अभी उन्हें डेढ़ घंटा और लगेगा...यह सुनकर हमारा चौंकना लाज़िमी था. आखिर किसी संत को तैयार होने में इतना समय कैसे लग सकता है ! लेकिन जब बात किन्नर अखाड़े के श्री अनंत विभूषित आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी लक्ष्मी नारायण जी त्रिपाठी (जैसा उनके भक्त कहते हैं) की हो तो फिर इतना समय तो लगना वाजिब है.
ऐसा भी नहीं है कि महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी(वहीँ जिन्हें अब तक हम सभी लक्ष्मी के नाम से पहचानते थे) पंडाल में उतावले लोगों से अनजान हैं. वे अन्दर से ही हस्तक्षेप कर लोगों को अनावश्यक चर्चा से बचने की सलाह देती हैं. बीच बीच में, उनके खांसने की आवाज़ भी आती है और उनके प्रबंधक बताते हैं कि स्वामी जी की तबियत ठीक नहीं हैं.
बहरहाल, लम्बे इंतज़ार और भारी भीड़ के कारण उमस और गर्मी से हो रही उकताहट को ख़त्म कर महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी हमारे बीच आती हैं. वे पहले से सज्जित एक सिंहासन नुमा आसन पर बैठकर मिलना शुरू करती हैं. उनके श्रृंगार से पता लग जाता है कि उन्हें इतना समय क्यों लगा. हम चूँकि मीडिया से थे इसलिए हमें तुलनात्मक रूप से पहले मिलने का मौका मिल जाता है और प्रसाद के रूप में कुछ सिक्के,रुद्राक्ष भी. हमारे एक साथी बताते हैं कि बुधवार(जिस दिन हम मिले) को किसी भी किन्नर से यह प्रसाद मिलना बड़ा फलदायक होता है. पत्रकारीय आदत के चलते मैंने आग्रह किया कि एक फोटो खींच लें तो लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने मोबाइल तुरंत अपने हाथ में ले लिया और फिर मंझे हुए अंदाज में शानदार सेल्फी ले डाली. इसी बीच स्थानीय के अलावा कई विदेशी चैनल भी उनसे बातचीत के लिए आतुर थे और उनके मुरीदों की भीड़ भी कम होने का नाम नहीं ले रही थी इसलिए हम भी वहां से निकलकर उनके अखाड़े का जायजा लेने में जुट गए. अन्य अखाड़ों की तरह किन्नर अखाड़े में भी एक यज्ञशाला और श्रद्धालुओं के लिए स्वादिष्ट भोजन का प्रबंध था और पूरे परिसर में अखाड़े के अन्य संत-महंतों के टेंट और महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के अलग अलग आकर्षक पोस्टर थे.
ट्रांसजेंडर (थर्ड जेंडर) अधिकारों के लिए काम करने वाली लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को उज्जैन सिंहस्थ में किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर घोषित किया गया. बताया जाता है कि देश के लगभग 20 लाख किन्नरों की सर्वसम्मति से उन्हें इस पद के लिए चुना गया है. इस बार भी वे तमाम विरोध के बाद भी न केवल प्रयाग कुंभ में अपना अखाड़ा ज़माने में कामयाब रहीं बल्कि उनके अखाड़े में बढ़ती भीड़ ने उन्हें यहाँ रुकने पर मजबूर कर दिया. आमतौर पर सभी अखाड़े अंतिम शाही स्नान के बाद कुम्भ से विदा हो गए थे लेकिन किन्नर अखाड़ा महाशिवरात्रि तक यहीं था.
लक्ष्मी पहले भी बताती रहीं है कि किन्नर अखाड़े को महाकुंभ का हिस्सा बनाने के पीछे उनकी मंशा किन्नरों को समाज में एक सम्मानजनक स्थान दिलाने की है.उनका मानना है कि जब हर कोई हमसे आशीर्वाद और दुआ लेता है तो समाज में किन्नरों के लिए सम्मानजनक स्थान क्यों नहीं होना चाहिए ? अपने समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली तेजतर्रार लक्ष्मी को अपने किन्नर होने पर गर्व है ।
लक्ष्मी पहली किन्नर हैं जो संयुक्त राष्ट्र में एशिया प्रशांत क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं और अपने समुदाय और भारत का प्रतिनिधित्व टोरंटो में विश्व एड्स सम्मेलन जैसे अनेक मंचों पर कर चुकी हैं । वह इस समुदाय के समर्थन और विकास के लिए अस्तित्व नाम का संगठन भी चलाती है । लक्ष्मी बिगबॉस सीजन 5 की प्रतिभागी भी रह चुकी हैं । टीवी शो "सच का सामना", "दस का दम" और "राज पिछले जनम का" में भी उन्हें देखा गया था ।
लक्ष्मी आम किन्नरों की तरह नहीं हैं जो मज़बूरी के कारण इस समुदाय का हिस्सा हैं बल्कि वे बिलकुल अलग हैं. लक्ष्मी का जन्म महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उन्होंने मीठीबाई कॉलेज से आर्ट्स में डिग्री ली और भरतनाट्यम में स्नातकोत्तर भी किया है. वे कुशल वक्ता,अभिनय और नृत्य में निपुण, अपने अधिकारों को लेकर जागरूक मुखिया और शून्य से शिखर तक पहुँचने वाली योद्धा हैं जिन्होंने अपने बलबूते यह मक़ाम हासिल किया है साथ ही अपने परिवार और समुदाय को भी समाज में प्रतिष्ठा दिलाई है. उनकी यही खूबियाँ हम जैसे कई लोगों को उनका प्रशंसक बनाती हैं और यही प्रशंसा उन तक खीच ले जाती है, फिर चाहे मिलने के लिए दो घंटे इंतज़ार ही क्यों न करना पड़े ....तो आइए हम भी उनके आसपास जमा सैकड़ों श्रद्धालुओं के साथ सम्मान से कहें- श्री अनंत विभूषित आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी लक्ष्मी नारायण जी त्रिपाठी, आपका स्वागत है और आपके ज़ज्बे को हमारा सलाम.
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