गुरुवार, 24 नवंबर 2016

नोटबंदी के बाद मीडिया में आ रही निराशाजनक ख़बरों के बीच रोशनी की किरणें बन रही........ असल किरदारों की सच्ची कहानियां

 एक: रणविजय महज 22 साल के हैं और सिविल इंजीनियर होने के बाद भी पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण सिलचर (असम) में अपने पैतृक फल व्यवसाय में पिता का हाथ बंटाते हैं. जब उन्होंने 8 नवम्बर के बाद आम लोगों को छोटे नोटों के लिए जूझते/मारामारी करते देखा तो खुद के पास मौजूद 10 हज़ार मूल्य के सौ-सौ के नोट लेकर खुद ही बैंक पहुँच गए और बदले में बड़े नोट ले आए. इतना ही नहीं, फिर इन्होने अपने आस-पास के फल व्यवसायियों को समझाना शुरू किया और चार दिन बाद ही स्टेट बैंक की लाइन में नोट बदलने के लिए लगे सैंकड़ों लोगों की तालियों के बीच उन्होंने 50 हज़ार के छोटे नोट बैंक को सौंपे...अब वे इस राशि को और बढ़ाने की योजना में जुटे हैं....सलाम रणविजय 

दो: प्रमोद शर्मा युवा व्यवसायी हैं और सिलचर के व्यापारिक क्षेत्र गोपालगंज में रहते हैं. नोटबंदी/बदलाव के बाद,वे रोज देखते थे कि आम लोग दो हज़ार का नया नोट लेकर छुट्टे पैसे के लिए यहाँ-वहां भटक रहे हैं और अपने लिए जरुरी सामान भी नहीं खरीद पा रहे. उन्होंने राजू वैद्य,शांति सुखानी और अबीर पाल जैसे अपने अन्य दोस्तों से सलाह मशविरा किया और जुट गए आम लोगों को बैंक के अलावा छोटे नोट उपलब्ध कराने में. पहले दिन उन्होंने 1 लाख रुपए के छोटे नोट बांटे लेकिन यह राशि आधे घंटे में ही ख़त्म हो गयी क्योंकि दो हजार के नोट ज्यादा थे और खुल्ले पैसे कम. दूसरे दिन युवा व्यवसाइयों की इस टीम ने 12 लाख के छोटे नोट जुटा लिए और सैकड़ों लोगों की मुश्किल हल कर दी. अब इनका लक्ष्य 20 लाख रुपए जुटाना है. छोटे नोट जुटाने के लिए ये इलाके के अन्य व्यापारियों, बिग बाज़ार- विशाल जैसे बड़े प्रतिष्ठानों की मदद लेते हैं. ‘बूंद बूंद से घड़ा भरता है’ और फिर भरे हुए घड़े का मीठा-ठंडा पानी कई लोगों की प्यास बुझा देता है.

इन युवाओं की कहानियाँ बताती हैं कि मामूली प्रयासों से भी बड़े बदलाव लाये जा सकते हैं और पहाड़ जैसी कठिनाइयों का हल भी समझ-बूझ से निकला जा सकता है. यदि हम भी सोशल मीडिया में दिन-रात व्यवस्था को कोसते रहने के बजाए अपने स्तर पर इसीतरह की पहल करें तो कई लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं. कुछ नहीं, तो बस हमारे आस पास मौजूद ऐसे सच्चे और अच्छे किरदारों को खोज निकाले और उनकी कहानी अन्य लोगों तक पहुंचाए....शायद इससे कुछ और लोगों को प्रेरणा मिले और अच्छाई की इस चेन/श्रृंखला में नई कड़ियाँ जुड़ती जाएँ. बस जरुरत पहल करने की है तो शुरुआत आज और अभी से ही क्यों नहीं..

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

सोचिए, कहीं आप देश विरोधी तत्वों की कठपुतली तो नहीं बन रहे !!

नोट बदलने की प्रक्रिया को आमजन की समस्या से देशव्यापी विकराल मुद्दा बनाने के पीछे कहीं वे लोग तो नहीं है जिनकी करोड़ों की संपत्ति पर चंद घंटों में पानी फिर गया? आम जनता की आड़ में कहीं पेशेवर दिमाग तो काम नहीं कर रहे जो समस्या को हाहाकार में बदलने में जुटे हैं और भविष्य में सरकार के इस अच्छे कदम को बुरे अंजाम में बदलने की साजिश रच रहे हैं ? जैसे कश्मीर में भीड़ की आड़ में आतंकियों के सुरक्षा बलों पर हमला करने की ख़बरें मिली रहती हैं इसीतरह धीरज और स्वेच्छा से नोट बदलने लाइन में लगे आम आदमी के मनोबल को तोड़ने के लिए कहीं राजनीतिक ताकतें और माफिया तो षड्यंत्र में नहीं जुट गए हैं ? और मीडिया महज उनके हाथ की कठपुतली बन रहा हो ? मुझे पता है मेरी इस बात से असहमत लोग मुझे ‘भक्त’ करार दे सकते हैं परन्तु कुछ तो खटक रहा है और कहीं न कहीं कुछ तो पक रहा है !
भीड़ को अराजक बनाने के लिए एक पत्थर ही काफी होता है जबकि यहाँ तो पूरा मसाला मौजूद है. कहीं भीड़ की आड़ में काले धन को सफ़ेद करने का धंधा तो शुरू नहीं हो गया ? सामान्य समझ तो यही कहती है कि कुछ तो गड़बड़ है और शायद सरकार ने भी इसे भांप लिया है तभी नोट बदलने वालों के हाथ पर चुनाव स्याही जैसा कुछ निशान लगाने और उनकी पहचान सुनिश्चित करने की पहल शुरू हो रही है. आखिर क्या कारण है कि सालभर से सूखे पड़े जन-धन एकाउंट एकाएक लबालब भरने लगे है तो वहीँ,वर्षों से बैंक का रुख नहीं करने वाले भी दावा कर रहे हैं कि वे दो बजे रात से लाइन में लगे हैं. मजे की बात तो यह है कि ये सभी किस्से महानगरों और बड़े शहरों में ज्यादा सुनने/देखने को मिल रहे हैं. हालाँकि ये भी हो सकता है कि महानगरों को ही देश मानने वाला और अपनी सुविधा के मुताबिक रिपोर्टिंग करने वाला मीडिया अपने आप ही शहरों की ख़बरों तक सीमित हो परन्तु मेरे सवालों या आशंकाओं को समझने के लिए कुछ बातों पर गौर करना जरुरी है. मसलन जिन महानगरों/शहरों में हाहाकार दिखाया जा रहा है वहां बहुसंख्यक लोग प्लास्टिक मनी( डेबिट/क्रेडिट/एटीएम कार्ड) और आनलाइन बैंकिंग को अपना चुके हैं. वैसे भी शहरों में बिग बाज़ार नुमा खरीद-फरोख्त केन्द्रों की भरमार हैं जहाँ सब कुछ कैशलैस है इसलिए यदि वे दो-चार हफ्ते रुपए न निकाले/बदले तो भी उनकी दिनचर्या पर जरा भी फर्क नहीं पड़ेगा. इसके बाद भी यदि आपने एक बार में दो-चार हजार रुपए भी निकाल लिए तो वह हफ्ते-दो हफ्ते की सब्जी-भाजी-दूध जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए काफी हैं. तब तक स्थिति सामान्य हो जाएगी और बैंकिंग व्यवस्था भी. ऐसे लोग या तो लाइन में नहीं होंगे या एक बार के बाद फिलहाल नहीं आएंगे.
लाइन में लगे लोग अक्सर टीवी का कैमरा देखते ही कहना शुरू कर देते हैं कि घर में आटा नहीं है, बच्चे की फ़ीस नहीं है इत्यादि इत्यादि. आजकल फीस से लेकर दूध तक सब या तो आनलाइन है या फिर प्लास्टिक मनी से मिल जाता है फिर किस बात की जल्दबाजी. इसके अलावा चैक से पेमेंट की व्यवस्था तो कायम है ही. मैं अपने ऐसे कई दोस्तों को जानता हूँ जो कभी भी सब्जी मंडी जाकर सब्जी-फल नहीं खरीदते क्योंकि उनके मुताबिक वहां सब ‘अन-हाइजीनिक’ मिलता है परन्तु इन दिनों वे भी सोशल मीडिया पर ऐसा दिखा रहे हैं मानो नोट बदलने से उनके घर में भी कई दिन से चूल्हा नहीं जला.
अब रही बात वाकई गरीब परिवारों की, तो ऐसे अधिकतर परिवार रोज कमाने-खाने वाले होते हैं और उन्हें मजदूरी में पांच सौ-हजार के नोट नहीं मिलते जिन्हें बदलने के लिए उन्हें दो बजे रात से लाइन में लगना पड़े. हमारे देश में अभी भी असंगठित वर्ग की मजदूरी सौ-पचास के नोटों तक ही केन्द्रित है. इस वर्ग को फिलहाल नोट बदलने की जगह मजदूरी मिलने की समस्या है क्योंकि उनके कथित मालिकों ने सरकार के इस फैसले की आड़ में फिलहाल मजदूरी देना या तो बंद कर दिया है या फिर अपने बड़े नोट निकलने का जरिया बना लिया है. मसलन असम सहित पूर्वोत्तर में चाय श्रमिकों को मजदूरी देने के नाम पर चाय बागानों के मालिकों ने अनाप-सनाप पैसा निकालने की अनुमति सरकार से मांगी और जब सरकार ने इसे मंजूर नहीं किया तो मजदूरी देना बंद कर दिया. हालाँकि सरकार ने सम्बंधित ज़िले के कलेक्टर/डीसी के नाम पर खाता खुलवा कर उनके इरादों पर पानी फेर दिया और अब मजदूरी की प्रक्रिया भी सामान्य होने लगी है. कहने का आशय यह है कि इस वर्ग को भी लाइन में लगने की जरुरत तुलनात्मक रूप से कम ही है.
ऐसे में यह सवाल उठता है कि कहीं भीड़ में गरीबों के नाम पर लगे लोग काला धन रखने वालों के ‘कमीशन एजेंट’ तो नहीं है जो सौ-पांच सौ रुपये के लालच में उनके हाथ की कठपुतली बन गए हैं. यदि एक धन्ना सेठ प्रतिदिन सौ लोगों को लाइन में लगा दे तो वह 4 से 5 लाख रुपए के काले धन को एक दिन में नए नोट में बदल सकता है. अब इसी आंकड़े को हफ्ते भर में तोलिये तो स्थिति साफ़ हो जाती है. ऐसा भी हो सकता है कि अपने दिहाड़ी मजदूरों को नोटों के जमाखोरों ने इसी काम में लगा दिया हो. इसीतरह देश के कुछ राज्यों और समुदायों में तो महिलाओं को सामान्यतौर पर घूँघट में भी घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता परन्तु अब उन्हीं क्षेत्रों में महिलायें आधी रात से लाइन में लगी हैं,पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर, वह भी कम्बल-चादर लेकर, तो बात खटकती है और खटकनी भी चाहिए.
मेरे कहने का यह आशय कतई नहीं है कि देश में नोट बदलने/निकालने को लेकर कोई दिक्कत नहीं है. दिक्कत तो है और बहुत है लेकिन जो कृत्रिम हाहाकार मचाया जा रहा है वह चिंताजनक है. ऐसा न हो ही देश विरोधी तत्व इसका फायदा उठाकर हमारी-आपकी शांति और कानून व्यवस्था को खतरे में डाल दें और हम चंद लोगों के हाथ की कठपुतली बनकर अपना और अपने देश का नुकसान करा बैठे. मीडिया में यह ख़बरें भी आने लगी हैं कि एक तरह पूर्वोत्तर में उल्फा,एनडीएफबी, बोडो जैसे तमाम उग्रवादी संगठनों की अब तक की काली कमाई काग़ज में बदल गयी है और उनकी छटपटाहट बढ़ रही है. देश के अन्य राज्यों में भी विद्रोही संगठनों की कमोवेश यही स्थिति है. दाउद जैसे माफिया सरगना भी बेचैन हैं. वहीँ दूसरी तरफ, कई राजनीतिक दल भी कंगाल हो गए हैं और वे अपनी जमीन बचाने के लिए विरोध के नाम पर किसी भी हद तक जा सकते हैं.
पैसा देकर राजनीतिक सभाओं में भीड़ जुटाना, पैसा देकर दंगे कराना और पत्थर फिंकवाना देश के लिए कोई नई बात नहीं है और जब बात राजनीतिक विरोध की हो,माफिया का पैसा बर्बाद होने की हो या फिर सरकार को गलत साबित करने की तो देश विरोधी तत्वों के लिए सबसे आसान शिकार आम लोग ही हैं इसलिए हमारा भी यह दायित्व बनता है कि हम न तो किसी की कठपुतली बने और न ही किसी को अपने कंधे से बंदूक चलाने दे वरना न केवल काला धन बाहर निकलवाने की यह मुहिम धरी रह जाएगी बल्कि भविष्य में कोई भी सरकार ऐसा कठोर फैसला लेने से भी डरेगी.(picture courtesy :rediff.com)

    

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

बड़े बड़े बैंकों पर भारी हैं हमारे भिखारी बैंक

कहते हैं न कि ‘घूरे के भी दिन फिरते हैं’..आज यह बात साबित हो गयी है. नोट बंद करने के फैसले ने देश के ‘भिखारी बैंक” को किसी भी नामी बैंक से ज्यादा बड़ा बना दिया है. वैसे घूरे जैसे सर्वथा जमीनी शब्द से अनजान पीढ़ी की जानकारी के लिए बता देना जरुरी है कि ‘घूरा’ कचरे के ढेर को कहते हैं और उनकी शब्दावली में वे इसे डस्टबिन का बड़ा भाई भी समझ सकते हैं.
अपने देश में यदि सबसे ज्यादा फुटकर/खुल्ले पैसे हैं तो वे भिखारियों की अंटी में, और वहीँ दबे दबे वे नोट पूरा जीवन गुजार देते हैं. एक-दो, दस-पांच और पचास-सौ के नोटों के मामले में हमारे भिखारी आज की स्थिति में किसी भी बैंक की शाखा को मात दे सकते हैं. वैसे भी बीते कुछ सालों से भिखारियों ने एक-दो रुपए छोड़कर भीख को ‘अपग्रेड’ करते हुए 10 रुपए प्रति ‘कस्टमर’ कर दिया था इसलिए छोटे नोटों के मामले में हमारे भिखारी किसी ‘मोबाइल एटीएम’ से कम नहीं है. मैं तो सरकार को सुझाव देना चाहता हूँ कि जब तक नोट बदलने की ‘क्राइसिस’ दूर नहीं हो जाती तब तक भिखारियों को भी चलता फिरता एटीएम मानकर उन्हें भी नोट बदलने का अधिकार दे देना चाहिए. इसका फायदा यह होगा कि बैंकों पर बोझ कम होगा और भिखारियों के पास वर्षों से जमा मुड़े-तुड़े हजारों छोटे नोटों को खुली हवा में सांस लेने का मौका मिल जायेगा.
वैसे कई ‘स्मार्ट भिखारियों’ ने अपने स्तर पर इस योजना को चलाना भी शुरू कर दिया है और 500 के बंद हो गए नोट के बदले 400 से 450 रुपए देने के गोरख धंधे में वे जुट गए हैं. कुछ तो हजार के नोट पर भी हाथ मारने में पीछे नहीं हैं. वैसे भी जब देश के बड़े धंधेबाजों ने काला-पीला रुपया जमा करने में कोई कसर नहीं रखी तो फिर हमारे गरीब भिखारी बेचारे क्यों पीछे रहे. वो तो भला हो  सरकार का कि उसने बाज़ी पलट दी और जो अर्श पर था वो फर्श पर आ गया और ट्रेन-बसों में भीख मांगने वाले बैंकर की भूमिका निभाने लगे.
भिखारियों के पास ‘काले धन’ को लेकर कोई आश्चर्य होना भी चाहिए. वैसे यहाँ भिखारियों के काला धन से मेरा आशय ब्लैक मनी से नहीं बल्कि उनके पास रखे रखे काले पड़ गए, मैले-कुचैले नोटों से हैं. आए दिन हम अख़बारों-न्यूज़ चैनलों पर पढ़ते-सुनते रहते हैं कि फलां शहर में भिखारी के मरने के बाद उसकी अंटी/झोली से हजारों रुपए निकले, तो किसी का उसी शहर में मकान था तो कोई व्यवसायिक अंदाज़ में पूरे शहर में व्यवस्थित तरीके से भीख मांग रहा था और किसी ने तो पूरे परिवार को इस व्यवसाय में लगा रखा था. बड़े शहरों में तो भिखारियों के सिंडीकेट काम कर रहे हैं और कई जगह वे किसी माफिया से कम नहीं है.
भिखारियों की तर्ज पर ही किन्नरों(ट्रांस जेंडर) को भी छोटे नोटों के लिहाज से बड़ा आसामी माना जा सकता है. ट्रेन-बसों में यात्रा करने वाले हर व्यक्ति को इन दिनों इनका सामना करना पड़ता है. बस भिखारी और इनमें फर्क यह है कि भिखारी भगवान/खुदा के नाम पर आपकों दुआओं/आशीर्वाद से नवाजते हुए नम्र भाव से भीख मांगते हैं और किन्नर पूरी दबंगई से धमकाते/डरते हुए. मजे की बात यह भी है कि भिखारी के तमाम अनुनय-विनय के बाद भी जेब से एक रूपया नहीं निकलने वाले सज्जन किन्नरों की धौंस के आगे 10-20 रूपया देने में भी पीछे नहीं रहते.
खैर,यह कहानी तो लम्बी चल सकती है इसलिए मूल बात पर आते हैं कि यदि आप बैंक की कतार में घंटों खड़े रहकर रुपए बदलने से बचना चाहते हैं तो अपने इलाके के भिखारी बैंक या आपके घर के आस-पास मौजूद उनकी किसी भी शाखा मतलब भीख मांगने वाले से संपर्क करिए. वो आपको घर बैठे छोटे नोट उपलब्ध करा देगा और वो भी मामूली से सुविधा शुल्क पर. तो फिर देर किस बात की चलिए इसी बहाने समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति का महत्व जाने और अपने साथ साथ उसका भी भला करें.  


दूसरे मुल्क में भी भारतीय सेना ने चटाई पाकिस्तान को धूल

दुनिया भर के देशों से आयीं चुनिन्दा 121 टीमों के बीच हुए चपलता,सतर्कता,दम-ख़म,मानवीय पहल और मानसिक मजबूती के अंतरराष्ट्रीय कैम्ब्रियन पेट्रोलिंग मुक़ाबले में भारतीय सेना की 8 गोरखा राइफल्स की दूसरी बटालियन ने स्वर्ण पदक जीतकर देश का सिर गौरव से ऊँचा कर दिया. बोलचाल की भाषा में हम इसे सैन्य अभ्यास का ‘मिलिट्री ओलंपिक’ कह सकते हैं. खास बात यह है कि इस मुक़ाबले में पाकिस्तानी सेना ने भी हिस्सा लिया था. 
इस वर्ष कैम्ब्रियन पेट्रोलिंग में लातविया, मैक्सिको, नेपाल, कनाडा, इटली, जोर्जिया, जर्मनी, पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, चेकोस्लोवाकिया, आयरलैंड, बोस्निया, बेल्जियम, चिली, ब्राजील सहित दुनिया के कई जाने-माने देशों की सेनाओं ने हिस्सा लिया था. वैसे 2011 तथा 2014 में भी भारतीय सैनिक इस मुक़ाबले में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं. इसके अलावा 2015 में भी भारतीय टुकड़ी को रजत पदक मिला था.
दरअसल कैम्ब्रियन पेट्रोलिंग ब्रिटेन के वेल्स की कैम्ब्रियन पहाड़ियों में हर साल होने वाला अन्तरराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास है। इसकी शुरुआत 1959 में वेल्स प्रादेशिक सेना के सैनिकों के लिए की गयी थी. बाद में इसमें अन्य देशों की रूचि को देखते हुए इसे सालाना अभ्यास में बदलकर सभी देशों के खोल दिया गया. अब इसका आयोजन 160 इन्फैंट्री और मुख्यालय वेल्स द्वारा किया जा रहा है. इसे विश्व के सबसे कठिन सैन्य अभ्यासों में से एक माना जाता है। अभ्यास में कैम्ब्रियन पहाड़ियों सर्पीली घुमावदार पगडंडियों पर अनवरत पेट्रोलिंग करनी होती है। अभ्यास के दौरान सैनिकों को कई कठिन लक्ष्य भी दिए जाते हैं जिन्हें सैनिकों को निर्धारित समयावधि में पूरा करना पड़ता है।
इस प्रतियोगिता का उद्देश्य किसी भी सेना की नेतृत्व क्षमता, स्व-अनुशासन, शारीरिक दमखम, समर्पण, निर्णय लेने की क्षमता, सैन्य कौशल, मानवीय गुण, परस्पर सहयोग और सहायता की भावना तथा तत्परता जैसे विभिन्न पहलुओं को परखना है इसलिए आमतौर पर इसे प्रतियोगिता की बजाए अभ्यास कहा जाता है ताकि सभी सैन्य दल परस्पर मुक़ाबले में उलझाने के स्थान पर अपने अपने अभ्यास कौशल का परीक्षण करें.
इस दौरान टीम के पास भारी भरकम सैन्य किट और अन्य जरूरी सैन्य साजो-सामान होता है। इस अभ्यास का एक कठिन पहलू यह भी है कि यदि इनमें से कोर्इ सामान खो जाता है तो उसके लिए न केवल उस सैन्य टीम को मिलने वाले अंक काट लिए जाते हैं बल्कि खोए हुए सामान के बदले में समान वजन का दूसरा अनावश्यक सामान लाद दिया जाता है। इसका मतलब यह है कि सैन्य टीम को उतना सामान लेकर ही चलना होगा. इस मुक़ाबले में विजेताओं का निर्णय उस टीम द्वारा तमाम गतिविधियों में हासिल किए गए अंकों के आधार पर होता है और फिर उन्हें स्वर्ण,रजत और कांस्य पदकों से सम्मानित किया जाता  हैं।
सैन्य विशेषज्ञ भी इस बात को मानते हैं कि “ 30-35 किलो का वजन लादकर लगातार 48-72 घंटें तक घुप अँधेरे में अनजाने-अनदेखे दुर्गम पहाड़ी रास्तों और नदी-नालों के बर्फ़ जैसे ठंडे पानी को पार करते हुए महज आठ लोगों की टीम के साथ 55 किलोमीटर में फैले इलाक़े की चौकसी करना किसी भी देश की सेना के लिए आसान नहीं है. यही नहीं, जब आपके सामने यहाँ छिपे दुश्मन का मुकाबला करने की चुनौती हो और खुद के साथ साथ निर्दोष लोगों को भी बचाना हो तो यह काम असंभव सा हो जाता है.” भारतीय सेना तो इसतरह की चुनौतियों का पर्याय मानी जाती है और एक बार फिर उसने कैम्ब्रियन पेट्रोलिंग में यह साबित कर दिखाया है.






बहिष्कार नहीं, बलशाली भारत है चीन का इलाज

इन दिनों सोशल मीडिया पर चीन में बने सामान का बहिष्कार करने की अपील को लेकर होड़ मची है. यहाँ तक परस्पर व्यापार, राजनयिक लोकाचार और आर्थिक ताने-बाने को समझने वाले लोग भी चीनी सामान के बहिष्कार की भेड़चाल में शामिल हैं. बहिष्कार के लिए चीन की बनी लाइट, आतिशबाजी, दिए नुमा मोमबत्ती और दीपावली की सजावट से जुडी सामग्री नहीं खरीदने की अपील की जा रही है. कई राजनीतिक दल, मुख्यमंत्री और इसी कद के तमाम नेता भी अपनी सभाओं में बहिष्कार की बातें जोर-शोर से उठा रहे हैं.
आम तौर पर सभी अपीलों में यही बताया जा रहा है कि चीन ने हर कदम पर पकिस्तान का साथ दिया है और दे भी रहा है इसलिए उसे सबक सिखाने के लिए चीन में बने इन सामानों का बहिष्कार कीजिए जिससे चीन को व्यापारिक नुकसान हो और आर्थिक दबाव में उसे भारत विरोधी रुख छोड़ना पड़े. मैं भी इस बात से पूरी तरह इत्तेफ़ाक रखता हूँ कि कोई भी देश, जो हमारे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम कर रहा है उसे सबक सिखाया जाना जरुरी है. फिर चाहे इसके लिए उस देश में बने सामानों का बहिष्कार करना पड़े या फिर उस देश का ही. इस बात पर दो राय  नहीं हो सकती कि चीन आरम्भ से पकिस्तान को अपनी गोद में बिठाकर भारत विरोध की नीति अपनाता रहा है. उसके इसी रवैये के कारण एक बार युद्ध भी हो चुका है और परिणामस्वरूप आज भी कई जगह सीमा विवाद को लेकर गाहे-बगाहे दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने आ जाते हैं.
चीन के विरोध के कारण ही भारत को अब तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता नहीं मिल पायी है क्योंकि जब भी तमाम देश भारत के पक्ष में एकमत होते हैं चीन अपने वीटो पावर का इस्तेमाल कर इसमें अडंगा लगा देता है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के नियम ही कुछ ऐसे जटिल और मनमाने बनाए गए हैं कि एक भी सदस्य देश आपत्ति कर दे तो फिर वह मामला अगली बैठक तक तो टल ही जाता है. चीन के कारण ही हाफ़िज़ सईद जैसे आतंकी खुले घूम रहे हैं और दुनिया भर के देशों के चाहने के बाद भी केवल चीन के विरोध के कारण अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित नहीं किया जा सका है. ऐसे और भी कई मुद्दे हैं जो चीन के अड़ियल रवैये के कारण परवान नहीं चढ़ पाए हैं और उसका खामियाजा हमारे देश को भुगतना पड रहा है. कहने का आशय है कि ऐसे एक नहीं बल्कि अनेक ठोस कारण है जो हमें चीन के बहिष्कार और उस पर दबाव बनाने के लिए प्रेरित करते हैं और बहिष्कार होना भी चाहिए.
अब सवाल यह है कि आधी-अधूरी तैयारी के साथ बहिष्कार से कहीं हम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहे ? व्यापार-व्यवसाय की मामूली समझ रखने वाले लोग भी जानते हैं कि किसी भी बड़े त्यौहार-पर्व के लिए उपयोगी सामग्री के लिए थोक व्यवसायी सामान्य तौर पर महीनों पहले आर्डर दे देते हैं और यही हाल छोटे खुदरा व्यापारियों का होता है क्योंकि उन्हें भी थोक व्यापारी से माल एडवांस देकर बुक कराना होता है. इसका मतलब है कि चीन या किसी भी देश से खरीददारी के सौदे काफी पहले हो चुके हैं और गाँव-देहात से लेकर शहरों के विक्रेता भी इसी श्रृंखला(चेन) में जुड़कर अपने अपने सामान के लिए आर्डर दे चुके हैं. अब इस सूरत में बहिष्कार का मतलब तो यही होगा कि हम चीन के नाम पर अपने देश/शहर/क़स्बे के व्यापारियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं ? यदि बहिष्कार की मुहिम कामयाब रही तो चीन की कम्पनियां और व्यापारी तो मुनाफ़े में रहेंगे पर हमारे व्यवसायियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है. ऐसे मामलों में बहिष्कार की योजना सही समय पर बनायीं जानी चाहिए ताकि ‘सही वक्त पर सही जगह चोट’ की जा सके. ऐसा न हो कि ‘होम करते समय हम अपने ही हाथ जला’ बैठे.
दूसरी बात, चंद लाइटिंग, मूर्तियों और पटाखों का बहिष्कार कर हम चीन जैसी महाशक्ति को क्या और कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं ? हाँ, इससे हमारे स्थानीय कलाकारों, कुम्हार और स्थानीय स्तर पर सामान बनाने वालों को तो फायदा होगा और यह उनकी माली हालत को देखते हुए अच्छा भी है, वहीँ हम अपने पैरों पर भी कुल्हाड़ी मार लेंगे. बेहतर होता है कि अगले साल के बहिष्कार के लिए अभी से मुहिम चलायी जाती, व्यवसाइयों को भी साथ जोड़ा जाता और फिर एक साथ मिलकर चीनी कम्पनियों को इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा से ही बाहर कर दिया जाता. तब चीन को चोट भी लगती और दिखती भी. दरअसल चीनी सामान के बहिष्कार को लेकर हमारी कथनी और करनी में जमीन आसमान का फर्क है क्योंकि हमें मोबाइल तो चीन का चाहिए परन्तु चीन की बनी सस्ती की लाइट से आपत्ति है. दरअसल हम मध्यम वर्ग के लोग अपनी सुविधा के हिसाब से काम करते हैं. जो चीज हमारे फायदे की है उसे अपना लेते हैं और जिससे हमारी आर्थिक सेहत पर ज्यादा असर नहीं पड़ता उसे छोड़ देने की अपील करने में जुट जाते हैं. फिलहाल यही स्थिति है क्योंकि हमें चीन के बने सस्ते और तकनीकी रूप से अव्वल मोबाइल फोन, लैपटाप, कंप्यूटर, टीवी, माइक्रोवेब ओवन, वाशिंग मशीन जैसी सुविधाभोगी वस्तुएं तो चाहिए लेकिन सस्ते दिए,लाइट,मोमबत्ती,लाइट,सजावटी सामग्री से हमारे जेब पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा इसलिए हम उनके पीछे पड़ गए हैं. हम में से कितने लोग है जो देश की खातिर अपनी इन सुविधाओं मसलन टीवी/मोबाइल इत्यादि को घर से बाहर फेंकने के लिए तैयार है? या कितनों ने अब तक इन्हें घर से बाहर निकाल दिया ! आम लोगों की जानकारी के लिए यह बताना जरुरी है कि भारत-चीन के बीच परस्पर व्यापार लगभग 80 लाख बिलियन डालर का है और पिछली यूपीए सरकार ने इसे 100 बिलियन डालर तक पहुँचाने के लिए बाकायदा समझौता किया था. वैसे, इसमें चीन का हिस्सा ही ज्यादा है. चीन से हमारा देश लाखों करोड़ का सामान खरीदता है जिसमें बड़े बिजली संयंत्र से लेकर सौर ऊर्जा यंत्र, टीबी और सफ़ेद दाग जैसे रोगों की दवाइयां और दीवाली के दिए तक शामिल हैं. बाकी संचार उपकरण, ईयर फोन, स्पीकर और ऊपर गिनाई गई टीवी-मोबाइल जैसी चीजों की तो गिनती नहीं है. अब सोचिए, क्या हम इस स्थिति में हैं कि इन जीवनरक्षक दवाओं का बहिष्कार कर सकते हैं. गाँव-गाँव में बिजली का पर्याय बन चुकी चीनी टार्च छोड़ सकते हैं या देश के विकास का आधार बिजली उत्पादन के संयंत्र बंद कर सकते हैं !
असलियत में हमारी/देश/समाज की बेहतरी इसी में है कि हम अपने देश को इतना शक्तिशाली बनाए कि चीन तो क्या अमेरिका/रूस या फिर किसी भी अन्य देश के साथ आँख में आँख डालकर बात कर सकें और कोई भी देश हमारी बात टालने की या हमें अनदेखा करने की सोच भी न सके. यह भी किसी से छिपा नहीं है कि अब दुनिया में वक्त आर्थिक महाशक्तियों का है क्योंकि पैसे की ताक़त है तो बाकी चीजें अपने आप आसन होती जाती हैं. देश को आर्थिक तौर पर शक्तिशाली बनाने के लिए हमें बिल्कुल उसी तरह से सामूहिक प्रयास करने होंगे जैसे हम अभी बहिष्कार के लिए कर रहे हैं. सबसे पहले तो हमें अपने हिस्से का आयकर या जो भी कर बनता है उसे देने की ईमानदार पहल करनी होगी. काला धन और जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई में सरकार का साथ देना होगा. इसीतरह देश के कुटीर उद्योगों को पुनः उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए हस्तशिल्प सामग्री, खादी को जीवन में अपनाना होगा. इसके अलावा तकनीकी कौशल को निखारना और प्रोत्साहन देना भी जरुरी है तभी स्थानीय स्तर पर गुणात्मक उत्पादन कर चीन के उत्पादों के फैलाव को रोका जा सकता है. मुझे लगता है कि अभी चीनी सामान के बहिष्कार से ज्यादा जरुरी है देश में काले धन का बहिष्कार, भ्रष्टाचार का बहिष्कार और आर्थिक तौर पर देश को मजबूत करने के लिए तमाम आर्थिक लेन-देन एक नंबर में करने का अभियान. एक बार भारत आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर चल पड़ा तो फिर चीन खुद सर झुकाए हमारी बात मानेगा और पकिस्तान तो हमारी इस प्रगति में ही झुलस कर नेस्तनाबूद हो जायेगा.  


मंगलवार, 27 सितंबर 2016

जन्मदिन मुबारक गूगल ‘गुरु’...

‘गूगल गुरु’ आज 18 साल के हो गए. वैसे तो 18 साल की आयु को समाज में परिपक्व नहीं माना जाता तभी तो न इस उम्र में आप शादी(पुरुष) कर सकते हैं और न ही शराब पी सकते हैं. यहाँ तक कि देश में चुनाव भी नहीं लड़ सकते,बस अपने जन-प्रतिनिधि का चुनाव कर सकते हैं. इस आयु के युवा औसतन बारहवीं कक्षा की पढाई पूरी कर कालेज में एडमीशन की ज़द्दो-जहद में लगे होते हैं, लेकिन गूगल गुरु की बात ही निराली है. गूगल ने अपने अठारह साल के सफ़र में पूरी दुनिया को अपना मुरीद बना लिया है. जो भी जानकारी चाहिए बस गूगल पर सर्च मारिए और पलक झपकते ही सभी जानकारियां पूरे विस्तार के साथ हाज़िर हो जाती है.
गूगल ने ‘वर्चुअल गुरु’ बनकर वास्तविक गुरुओं को भी पीछे छोड़ दिया है. भले ही इस उम्र में शराब/सेक्स जैसी बातों से परहेज करना होता है लेकिन गूगल इसी आयु में शराब बनाने से लेकर पीने के तरीके तक बता रहा है. और सेक्स को तो इसने घर-घर( इसे मोबाइल-मोबाइल पढ़ें) में उपलब्ध करा दिया है. जैसा की मैंने ऊपर लिखा है कि सामान्य तौर पर इस आयु को परिपक्व नहीं माना जाता इसलिए हम यह मान सकते हैं कि गूगल गुरु पर सर्च भी अभी अपने अपरिपक्व दौर में है और जैसे जैसे इस वर्चुअल गुरु की उम्र बढ़ेगी वह परिपक्व होकर केवल ‘पोर्न’ तलाशने का माध्यम नहीं रह जायेगा बल्कि सच में अपना ज्ञान बढ़ाने और कौशल निखारने का माध्यम बनेगा. अच्छी बात यह भी है कि इस समय गूगल की कमान भारतीय हाथों में हैं और यह उम्मीद की जा सकती है कि सुन्दर पिचाई इसे धीरे धीरे भारतीय रंग में रंग देंगे.
केवल आंकड़ों पर नजर रखने वाले लोगों के लिए यह बताना जरुरी है कि गूगल कि स्थापना 4 सितम्बर 1998 में अमेरिका के कैलिफोर्निया के मेनलो पार्क नामक स्थान पर महज एक रिसर्च प्रोजेक्ट के तौर पर हुई थी और इसके संस्थापक लेरी पेज और सर्गेई ब्रिन थे. गूगल के पिता का नाम (पेरेंट आर्गेनाइजेशन) अब एल्फाबेट इंक है और अभी गूगल गुरु का स्थायी घर कैलिफोर्निया के माउन्टेन व्यू में है. दरअसल गूगल एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी(टेक्नॉलाजी) कम्पनी है और इंटरनेट सेवाओं में इसकी बादशाहत है. अब इसने आनलाइन विज्ञापन,सर्च, क्लाउड कम्प्यूटिंग और साफ्टवेयर के क्षेत्र में भी सफलता के झंडे गाड़ लिए हैं.
गूगल गुरु के परिवार में सदस्यों की संख्या तेजी से बढती जा रही है और अब इसमें जीमेल,गूगल ड्राइव, गूगल प्लस, गूगल क्रोम, हैंगआउट, मोबाइल का सबसे लोकप्रिय एंड्राइड आपरेटिंग सिस्टम, क्रोमबुक और अब ब्राडबैंड सर्विस जैसे नए सदस्य जुड़ते जा रहे हैं. गूगल में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या भी अब 60 हजार के आस पास है और अब यह दुनिया की सबसे नामी कंपनियों में से एक है. ......तो जन्मदिन मुबारक गूगल गुरु.



शनिवार, 24 सितंबर 2016

ये कैसा देशप्रेम है हमारा…..!!!



हाल ही में कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कर्नाटक के लोग विरोध में सड़कों पर उतर आए. दर्जनों बस जला दी गयी और कई सरकारी भवन/वाहन आग के हवाले के दिए गए. अब तो मानो यह रोजमर्रा की सी बात हो गयी है. जब भी किसी को किसी भी घटना/फिल्म/बयान/सरकार/फैसले से नाराजगी होती है तो वे सड़कों पर निकल पड़ते हैं और विरोध के नाम पर तोड़फोड़ करने लगते हैं. कभी कोई बस जलाएगा तो कभी सरकारी कार्यालय. कोई अपना गुस्सा सरकारी संपत्ति पर निकालेगा तो किसी की नाराजगी वहां खड़े वाहनों पर निकलेगी. मैं आज तक नहीं समझ पाया कि इस तोड़फोड़ से या सरकारी संपत्ति में आग लगाने से कौन सा विरोध जाहिर होता है? विरोध करना/नाराजगी जताना या किसी के खिलाफ प्रदर्शन करना हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार है और जरुरत पड़ने पर ऐसा करना भी चाहिए ताकि किसी को भी निरंकुश होने या लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के खिलाफ जाने की हिम्मत न पड़े लेकिन सरकारी संपत्ति को जलाना या नुकसान पहुँचाना क्या लोकतान्त्रिक विरोध का हिस्सा है?
सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि सरकारी संपत्ति किसकी है- सरकार की? बिलकुल नहीं और वैसे भी सरकार क्या है? क्या यह अंग्रेजों जैसी कोई बाहरी ताकत है जो हम पर थोप दी गयी है या पुराने ज़माने के राजे-महाराजे का दौर है जो दूसरा राजा जब भी उस राज्य पर कब्ज़ा करेगा तो वहां लूटपाट कर सब नष्ट कर देगा. सरकार भी हमारी है और सरकारी संपत्ति भी  क्योंकि अपने मन-मुताबिक सरकार का चयन और चुनाव हम ही करते हैं. हालाँकि हो सकता है कि इस मामले में कुछ लोग यह कुतर्क करने लगे कि हमारे देश में सरकार का गठन बहुमत के आधार पर होता है और आजकल 30 से 40 फीसदी मत हासिल कर कोई भी दल अपनी सरकार आसानी से बना सकता है. ऐसे में लगभग 60 प्रतिशत लोग उसके खिलाफ भी होते हैं इसलिए अब किसी सरकार को पूरी तरह से जनता की सरकार नहीं कहा जा सकता. यदि इन बातों को सही भी मान लिया जाए तो भी इसमें सरकारी संपत्ति का क्या दोष? सरकारी संपत्ति किसी भी सरकार की बपौती नहीं है बल्कि वह आम जनता के गाढ़े खून पसीने की कमाई है, लाखों कर दाताओं के पैसे से बनती है सरकारी संपत्ति. हम जैसे आम लोग दिनभर सेल्स टैक्स से लेकर इनकम टैक्स और सेवा कर से लेकर वैट जैसे तमाम करों का परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जो भी भुगतान करते हैं उससे बनती है सरकारी संपत्ति. इसका मतलब तो यही हुआ न कि सरकारी संपत्ति हमारी ही है क्योंकि यह हमारे ही पैसों से बनी है. तो क्या विरोध के नाम पर अपने ही पैसों को आग लगाना उचित है?
क्या आपने आज तक कभी सुना है कि पति और पत्नी के बीच किसी फैसले पर असहमति के कारण उनमें से किसी ने अपने ही घर में आग लगा दी हो या पिता के डांटने पर या बेटे के परीक्षा में असफल होने पर पिता ने अपनी कार जला दी हो. कहने का मतलब यह है कि जब हम घर में कितने भी परस्पर मुटाव के बाद अपनी सम्पत्ति को कोई नुक्सान नहीं पहुंचाते तो फिर देश में ऐसा क्यों करते हैं. आखिर देश है क्या? हम-आप से ही तो मिलकर बना है यह देश. देश में है क्या-हम,हमारे बच्चे,हमारे दोस्त/रिश्तेदार/समाज, हमारे घर,हमारे स्कूल,हमारे कालेज,हमारे कार्यालय, हमारे वाहन,हमारी कम्पनियां, हमारे कल-कारखाने इत्यादि सब कुछ तो हमारा ही है. देश भूगोल की किताब में बना मानचित्र भर नहीं है और न ही पड़ोसी देशों के साथ खिंची विभाजन रेखाएं बल्कि यह जीते जाते लोगों का एक बृहत्तर समाज है जहाँ सुचारू संचालन के लिए प्रशासन/सरकार जैसी अनेक छोटी-बड़ी व्यवस्थाएं कायम की गयी है. कहीं इस व्यवस्था को हम पंचायत कहते हैं तो कहीं नगर पालिका/नगर निगम, कहीं राज्य सरकार या फिर कहीं केंद्र सरकार के नाम से जानते हैं. इस व्यवस्था को और सुचारू बनाने के लिए विभागों का सृजन हुआ जिनमें हम-आप काम करते हैं. विभागों या विकेंद्रीकरण की जरुरत भी इसलिए पड़ी कि हर व्यक्ति तो हर काम कर नहीं सकता इसलिए अपनी-अपनी योग्यता के हिसाब से कोई ट्रेन चलाने लगा तो कोई बैंक और कोई व्यापार करने लगा. समाज के ये सारे अंग भाषा/संस्कृति/ परिवेश और परस्पर अनुकूलता के फलस्वरूप घर/समाज/मोहल्ला/राज्य जैसी तमाम इकाइयों से होते हुए देश बन गए. अब बताइए कि क्या देश कोई बाहर की दुनिया की चीज है?
अब फिर उसी मूल प्रश्न पर आते हैं कि विरोध के नाम पर अपनी ही संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर हम किसको दुःख देते हैं? सरकारी बसें जलाकर या कार्यालयों में तोड़फोड़ करके हम अपने को ही तो क्षति पहुंचाते हैं! अब यदि कावेरी विवाद में 40 से ज्यादा बसें जली और हजारों करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ तो उसका खामियाजा किसको भरना पड़ेगा, हम को ही और किस को. जो पैसा नए स्कूल या अस्पताल बनाने में खर्च होता,युवाओं को कौशल युक्त बनाकर स्वरोजगार के लिए अपने पैरों पर खड़ा करने में होता अब वो ही पैसा फिर से बस खरीदने में होगा या उन सरकारी दफ्तरों की मरम्मत में खर्च होगा जिन्हें हमने अपने क्षणिक आवेश में आग के हवाले कर दिया था. जब हम बड़ी से बड़ी मुसीबत में भी अपना,अपने परिजनों का और अपने घर का ध्यान रखना नहीं भूलते तो फिर विरोध में सड़क पर उतरते वक्त यह क्यों भूल जाते हैं कि हम गुस्से में जो भी तोड़/जला रहे हैं वह भी पूरी तरह से हमारा ही है और हमारे ही पैसों से बना है तथा इसमें जो भी नुकसान होगा उसकी भरपाई भी हमें ही अपने अन्य खर्चों में कटौती करके करनी होगी. फिर यह कटौती किसी योजना के रूप में हो सकती है या फिर नए या बढे हुए कर के रूप में भी.
दरअसल अपनी ही संपत्ति की तोड़फोड़ या आगजनी की यह बीमारी हमें अंग्रेजों के विरोध के समय से लगी है. उस समय तो फिर भी यह जायज था क्योंकि हमारा सारा मुनाफ़ा बटोरकर अंग्रेज अपने साथ ले जा रहे थे और अपने ही देश में हम गुलामों की तरह रहने को मजबूर थे इसलिए उस समय सरकारी संपत्ति का नुकसान पहुँचाने का उद्देश्य अंग्रेजों को चोट पहुंचाने के लिए किया जाता था. हम अपने इस विरोध में सफल रहे और अंग्रेजों को देश छोड़कर जाना पड़ा. हमने अपना देश तो पा लिया परन्तु उसे अपना आज भी नहीं बना पाए तभी तो आज तक जरा भी कुछ हुआ नहीं कि चल पड़ें अपने ही देश को नुकसान पहुँचाने. आलम यह है कि चाहे आतंकी हमला हो या सैनिकों का शहीद होना, बिजली गुल होना हो या पानी नहीं आना,अस्पताल में परिजन की मौत हो या फिर पुलिस की गोली से, हम गुस्से में अपनी ही संपत्ति बर्बाद करते हैं. सोचो जरा, मुश्किल से तो इलाके में एक अस्पताल बना था अब उसे ही जला दिया तो फिर इलाज के लिए हम आप कहाँ जायेंगे. यहीं नहीं, जिन पैसों से दूसरा अस्पताल बन सकता था उससे अब इसी अस्पताल की मरम्मत होगी. बिलकुल इसी तरह बंगलुरु में जो पैसा परिवहन व्यवस्था को और बेहतर बनाने पर खर्च होता अब उससे इन जलाई गई बसों की भरपाई हो पाएगी और शहर की परिवहन व्यवस्था दस साल पीछे रह जाएगी. 
मसला बंगलुरु,दिल्ली,भोपाल या गुवाहाटी का नहीं है बल्कि देश भर में शहर से लेकर गाँव तक यही हाल है कि हम अपनी सारी नाराजगी देश की संपत्ति पर निकाल देते हैं. विरोध करिए और हर गलत बात के विरोध में एकजुट होना भी चाहिए लेकिन विरोध के तरीके जरुर बदलने होगे. न तो हमें सरकारी (इसे अपनी पढ़े) संपत्ति को क्षति पहुंचानी चाहिए और न ही किसी को ऐसा करने देना चाहिए और यदि कोई ऐसा करते दिखता है तो हमें बिलकुल उसीतरह सतर्क होकर उस व्यक्ति की मुखालफ़त करनी चाहिए जैसे हम अपने घर की सुरक्षा करते हैं.यदि एक बार हम चंद मुट्ठी भर लोगों के हाथ का खिलौना बनकर तोड़फोड़ करने के स्थान पर अपने देश की संपत्ति के संरक्षक बन गए तो फिर आतंकी तो आतंकी दुनिया की कोई ताकत हमारे देश का बाल बांका नहीं कर सकती. 

रविवार, 21 अगस्त 2016

ज़िन्दगी की जंग हारकर भी जीत गया ‘बंग बहादुर’

जिन्दगी और मौत की जंग में मौत भले ही एक बार फिर जीत गयी हो लेकिन बंग बहादुर ने अपनी जीवटता,जीने की लालसा,जिजीविषा और दृढ मनोबल से मौत को बार बार छकाया और पूरे पचास दिन तक वह मौत को अपने मज़बूत इरादों से परास्त करता रहा. उसे इंतज़ार था कि सत्तर के दशक की लोकप्रिय फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ की तर्ज पर कोई इंसान उसे समय रहते बचा लेगा. बंग बहादुर को बचाने के इंसानी प्रयास तो हुए लेकिन वे सरकारी थे और नाकाफ़ी भी, इसलिए शायद कामयाब नहीं हो पाए.
बंग बहादुर ने अपनी हिम्मत, संघर्ष शीलता और जीने की इच्छाशक्ति के फलस्वरूप जीवटता की नई कहानी लिख दी. एक ऐसी कहानी जिसे सालों-साल दोहराया जायेगा. दरअसल बंग बहादुर सुदूर पूर्वोत्तर में असम का एक हाथी था और उसकी जीवटता के कारण ही उसे ‘बंग बहादुर’ नाम दिया गया था.
दरअसल बह्मपुत्र में आई विकराल बाढ़ के चलते लगभग चार टन का यह हाथी असम में अपने झुंड से 27 जून को अलग हो गया था और बाढ़ के पानी में बहते-बहते बांग्लादेश तक पहुंच गया । भीषण बाढ़ के बीच प्रतिकूल परिस्थितियों में करीब 1,700 किलोमीटर बहने के बाद भी उसने हिम्मत नहीं हारी और पानी में फंसा होने के बाद भी स्वयं को बचाने के लिए लगातार संघर्ष करता रहा.
केवल पानी के सहारे तो इतने लम्बे समय तक इंसानी जीवन भी मुश्किल है फिर वह तो चार टन का भारी-भरकम हाथी था. बंग बहादुर नाम मिलने के बाद भी यह शाकाहारी प्राणी अपना स्वभाव नहीं बदल पाया अन्यथा मछलियाँ खाकर अपना पेट भर सकता था. न तो उसे रसीले गन्ने मिले और न ही पेड़ों की पत्तियां क्योंकि बाढ़ की विकरालता में कुछ भी टिक पाया. बस टिका रहा तो बंग बहादुर लेकिन बाढ़ में घिरे होने के कारण बंग बहादुर को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल पाया. भोजन के अभाव में उसकी शक्ति धीरे धीरे कम होती गई और कमजोरी के कारण उसकी हिम्मत जवाब दे गयी।
जब उसकी जीवटता को स्थानीय मीडिया में जगह मिली तो सम्बंधित विभागों की तन्द्रा टूटी और फिर उसे बचने के प्रयास शुर हुए. भारत और बंगलादेश दोनों ही देशों ने संयुक्त रूप से इस हाथी को बचाने के लिए टीम बना दी. यही नहीं, हाथी को बचाने के लिए असम के पूर्व मुख्य वन संरक्षक के नेतृत्व में भारत का एक विशेषज्ञ दल भी बांग्लादेश भेजा गया था.
छह हफ्तों के अथक प्रयास के बाद, 11 अगस्त को किसी तरह पानी से बाहर निकाल लिया गया लेकिन अब तक अपने दम पर अनहोनी और आशंका के बीच संघर्ष कर रहा बंग बहादुर एकाएक अपने इर्द-गिर्द इतने इंसानों को देखकर घबरा गया और कमज़ोरी के बाद भी भाग निकला, लेकिन इस दौरान एक गड्ढे में गिरने से यह अचेत हो गया । वन अधिकारियों और ग्रामीणों ने उसे किसी तरह गड्ढे से बाहर निकाला। ढाका से करीब 200 किलोमीटर दूर उत्तरी जमालपुर जिले के कोयरा गांव से उपचार के लिए सफारी पार्क ले जाने की प्रक्रिया के दौरान 17 अगस्त को बंग बहादुर की मौत हो गई।
बंग बहादुर का पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि हाथी की मौत गर्मी के चलते दिल का दौरा पडऩे से हुई। उधर,बचाव दल के सदस्यों ने भी मान लिया कि भरसक कोशिश के बाद भी वे बंगबहादुर को बचा नहीं पाए परन्तु उसकी मौत का दुख है क्योंकि हम भी इस बहादुर हाथी को खोना नहीं चाहते थे। जो भी हो, दो महीने तक मौत से जंग लड़ने वाला बंग बहादुर तो हारकर भी जीत गया लेकिन हम इंसानों को एक शर्मनाक स्थिति में भी छोड़ गया. आखिर हमने उसके दो माह के संघर्ष पर अपनी बेपरवाही से पानी जो फेर दिया.




मंगलवार, 16 अगस्त 2016

पूर्वोत्तर में भी सिपाहियों ने की थी मंगल पांडे जैसी बगावत...!!

जब भी देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अर्थात् 1857 में सिपाहियों के विद्रोह (Sepoy Mutiny) की बात चलती है तो हमेशा मेरठ, झाँसी, दिल्ली, ग्वालियर जैसे इलाकों और बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात जैसे कुछ राज्यों तक सीमित होकर रह जाती है. आज़ादी की अलख जगाने वाले इस सबसे पहले विद्रोह को आमतौर पर उत्तर भारत तक सीमित कर दिया गया है. शायद इस बात को कम ही लोग जानते हैं कि विद्रोह की आग पूर्वोत्तर के राज्यों तक भी आई थी और असम-त्रिपुरा जैसे राज्यों के सिपाहियों की इस विद्रोह में अहम् भूमिका भी थी.
जानकारी के अभाव में पूर्वोत्तर में इस आन्दोलन की गूंज इतिहास में स्पष्ट और उल्लेखनीय मौजूदगी दर्ज नहीं करा पायी और इसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर भारत में इस विद्रोह के बाद मंगल पांडे,रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे,नाना साहेब पेशवा,बहादुर शाह ज़फर जैसे तमाम नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज होकर घर-घर में छा गए, वहीँ पूर्वोत्तर में इसी विद्रोह में शामिल सिपाहियों के नाम तक कोई नहीं जानता. यहाँ तक की ऐसा कोई विद्रोह भी हुआ था इस बारे में भी लोगों को ठीक ठीक जानकारी नहीं है. हालाँकि, इस लेख का उद्देश्य न तो सिपाहियों के विद्रोह से शुरू हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्षेत्रवार तुलना करना है और न ही हमारे महान शहीदों के योगदान को कम करके आंकना है. वैसे भी उत्तर भारत में इस आंदोलन की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि उसकी तुलना किसी और क्षेत्र से हो भी नहीं सकती क्योंकि इस विद्रोह से कई जगह अंग्रेजों के पैर उखड़ गए थे और उनकी सत्ता जाने तक की स्थिति बन गयी थी. ऐसा माना जाता है कि यदि उस समय के सभी राजाओं ने साथ दिया होता तो शायद देश तब ही स्वतंत्र हो जाता.
जब भी पूर्वोत्तर और खासकर असम में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े यत्र-तत्र बिखरे पन्नों को सिलसिलेवार जोड़ने का प्रयास होता है तो मनीराम बरुआ, सूबेदार शेख भीकम, निर्मल हजारिका, महेश चन्द्र बरुआ, मधु मलिक, चारु गुहाइन, रस्तम सिंह जमादार, हवलदार राजाबली खान, गौचंदी खान, चौधुरी और मजुमदार परिवार जैसे कई प्रमुख किरदार सामने आते हैं जिन्होंने सिपाहियों के विद्रोह में रणनीति बनाने से लेकर उन्हें हथियार, पैसा, सहयोग, छिपने के ठिकाने इत्यादि मुहैया कराकर इस विद्रोह को सही दशा-दिशा देने में अहम् भूमिका निभाई थी. इसीतरह चटगांव व सिलहट(अब बंगलादेश में), मौजूदा बराक घाटी या दक्षिण असम के चतला, रौटिला, आज के मासिमपुर और अरुणाचल, लातू बाज़ार, हैलाकांदी और करीमगंज जैसे कई जाने-माने इलाके सामने आते हैं जो विद्रोही सिपाहियों और अंग्रेजी सेना के बीच संघर्ष के गवाह रहे हैं.
बराक घाटी में आज भी गाये जाने वाले ‘जंगिया गीतों’ अर्थात जंग से जुड़े लोकगीतों में इन स्थानों और सिपाहियों के विद्रोह के अहम् किरदारों का भरपूर उल्लेख मिलता है. असम विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर सुबीर कार ने भी अपने स्तर पर इन गीतों के माध्यम से इस इतिहास को सिलसिलेवार ढंग से एकसूत्र में पिरोने का प्रयास किया है. इसीतरह कुछ अन्य इतिहासकारों ने भी समय-समय पर इस दौर की उथल-पुथल का उल्लेख किया है. इतिहासकारों के मुताबिक जहाँ उत्तर भारत में सिपाहियों के विद्रोह की शुरुआत मई 1857 में हो गयी थी वहीँ पूर्वोत्तर में विद्रोह का आरम्भ 18 नवम्बर 1857 को 34 वीं नेटिव इन्फैंट्री रेजिमेंट की बगावत से हुआ. बताया जाता है कि इस रेजिमेंट ने बिल्कुल उत्तर भारत के विद्रोह की शुरुआत के नायक मंगल पांडे के अंदाज़ में चटगांव में बगावत का बिगुल बजाते हुए न केवल हथियार और सरकारी खजाना लूट लिया बल्कि यहाँ जेल में बंद कैदियों को भी आज़ाद कर दिया.
उल्लेखनीय बात यह है कि अगस्त 1857 तक इस रेजिमेंट को अंग्रेजों(तत्कालीन ईस्ट इण्डिया कंपनी) का वफादार माना जाता था लेकिन उत्तर भारत से छन-छनकर आ रही ख़बरों ने यहाँ भी बेचैनी उत्पन्न कर दी थी. कहते हैं न कि अफवाहे आंधी-तूफ़ान की गति से फैलती हैं और यही इस मामले में भी हुआ. उस समय आज की तरह समाचार पत्र, न्यूज़ चैनल और इंटरनेट तो था नहीं कि वास्तविक जानकारी मिल पाए इसलिए इसके-उसके मुंह से फैलती बातों और वहां से यहाँ आने वाले लोगों से सुने किस्सों ने इस बेचैनी को विद्रोह में बदलने में प्रमुख भूमिका निभाई. इसी बीच दानापुर और जगदीशपुर जैसे तुलनात्मक करीबी इलाकों में विद्रोह के समाचारों ने बगावत की सोच को और भी हवा दे दी. जैसे वहां विद्रोही सिपाहियों ने अंतिम मुग़ल शासक बहादुर शाह जफ़र को पुनः राजा बनाने का प्रयास किया था कुछ इसी तर्ज पर यहाँ भी अंग्रेजों के हाथ से सत्ता लेकर अहोम राजकुमार कन्दर्पेश्वर सिंघा को सौंपने की योजना थी और इस योजना का मूल रणनीतिकार मनीराम बरुआ को ही माना जाता है. कहीं-कहीं इनका नाम मनीराम दीवान के रूप में भी दर्ज मिलता है.
इतिहासकार रजनीकांत गुप्ता के हवाले से जानकारी मिलती है कि 18 नवम्बर 1857 को चटगांव में विद्रोह के बाद हवलदार राजाबली खान के नेतृत्व में विद्रोही सिपाही त्रिपुरा से मणिपुर होते हुए असम की मौजूदा बराक घाटी की ओर बढ़े. उन्हें उम्मीद थी कि जनता भी उनके साथ आती जाएगी और स्थानीय राजा भी, लेकिन हुआ उल्टा. अव्वल तो जनता खुलकर साथ नहीं आ पाई और अधिकतर स्थानीय राजाओं ने अंग्रेजों का साथ दिया. कई ने तो अंग्रेज अधिकारियों की अपील पर इन विद्रोही सिपाहियों से निपटने के लिए अपनी सेना तक भेज दी. इस दौरान सिलहट के प्रतापगढ़ और हैलाकांदी के लातू में विद्रोही सिपाहियों तथा अंग्रेज समर्थक सेनाओं के बीच भीषण संघर्ष हुआ और दोनों ही पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा. विद्रोही सिपाहियों की ताक़त का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि लातू में सिलहट लाइट इन्फैंट्री के साथ हुई लड़ाई में उन्होंने इस इन्फैंट्री के मुखिया मेजर बियंग तक को मार गिराया था. ऐसा ही एक संघर्ष कछार-मणिपुर सीमा पर भी हुआ था जब तक़रीबन 200 विद्रोही सिपाहियों ने तब की सरकारी सेना के साथ दो घंटे तक मुकाबला किया. विद्रोही सैनिकों की संख्या को लेकर जरुर अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं. कहीं इसे 200 तो कहीं 300 बताया गया है.
एक और मजेदार तथ्य यह भी सामने आता है कि आमने-सामने के संघर्ष के दौरान विद्रोही सिपाहियों ने अंग्रेज समर्थक भारतीय या स्थानीय सिपाहियों को अपने साथ मिलाने के लिए उन्हें जाति-धर्म और खानपान तक का वास्ता देकर समझाने का प्रयास किया जब ये सैनिक, अंग्रेजों के प्रति अपनी वफ़ादारी छोड़ने को तैयार नहीं हुए तो उन्हें ‘क्रिश्चियन का कुत्ता’ जैसे संबोधनों से भी उकसाया गया. उत्तर भारत की क्रांति की तरह पूर्वोत्तर में सैनिकों का यह विद्रोह भी जनता और स्थानीय राजाओं का समर्थन नहीं मिलने के कारण असफल हो गया. इस दौरान अधिकतर विद्रोही सिपाही मारे गए. अंग्रेजों की क्रूरता का आलम यह था कि उन्होंने विद्रोही सिपाहियों को सिलचर तथा अन्य कई शहरों में सार्वजनिक रूप से पेड़ से लटकाकर फांसी दी ताकि भविष्य में कोई और यह हिमाकत करने की हिम्मत भी न कर सके. यदि कछार के तत्कालीन सुपरिटेंडेंट आफ पुलिस कैप्टन स्टीवर्ड की रिपोर्ट पर भरोसा किया जाए तो कछार में घुसते समय 185 विद्रोही सिपाही मारे गए थे इनमें से 14 को फांसी दी गयी जबकि 57 गोली लगने से मारे गए. कुछ सिपाही मृत मिले, वहीँ सौ से ज्यादा को अन्य लोगों की मदद से मारा गया. उनके पास से सैंकड़ों हथियार और तक़रीबन 30 हजार रुपए भी मिले थे. ऐसा नहीं है इन सैनिकों को आम जनता से जरा भी सहयोग नहीं मिला बल्कि कई परिवारों ने विद्रोही सैनिकों को शरण/भोजन और जरुरी संसाधन तक उपलब्ध कराए. फिर भी यह जन समर्थन झाँसी की रानी या उनके जैसे अन्य अमर शहीदों को मिले समर्थन की तुलना में नगण्य था. यदि आम जनता उत्तर भारत की तरह पूर्वोत्तर में भी विद्रोही सिपाहियों के समर्थन में खुलकर सामने आ जाती तो शायद आज यहाँ की कहानी भी कुछ अलग होती और यह क्षेत्र बाकी देश से शायद इतना अलग थलग भी नहीं होता.  (तस्वीर:गूगल से साभार)

बुधवार, 20 जुलाई 2016


अभिशाप नहीं,सीधे संवाद का सटीक माध्यम है सोशल मीडिया

इन दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया खासकर न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया को खरी-खोटी सुनाना एक फैशन बन गया है. मीडिया की कार्यप्रणाली के बारे में ‘क-ख-ग’ जैसी प्रारंभिक समझ न रखने वाला व्यक्ति भी ज्ञान देने में पीछे नहीं रहता. हालाँकि यह आलोचना कोई एकतरफा भी नहीं है बल्कि टीआरपी/विज्ञापन और कम समय में ज्यादा चर्चित होने की होड़ में कई बार मीडिया भी अपनी सीमाएं लांघता रहता है और निजता और सार्वजनिक जीवन के अंतर तक को भुला देता है. वैसे जन-अभिरुचि की ख़बरों और भ्रष्टाचार को सामने लाने के कारण न्यूज़ चैनल तो फिर भी कई बार तारीफ़ के हक़दार बन जाते हैं लेकिन सोशल मीडिया को तो समय की बर्बादी तथा अफवाहों का गढ़ माना लिया गया है. 
आलम यह है कि सोशल मीडिया पर वायरल होते संदेशों के कारण अब ‘वायरल सच’ जैसे कार्यक्रम तक आने लगे हैं  लेकिन, वास्तविक धरातल पर देखें तो न्यू मीडिया के नाम से सुर्खियाँ बटोर रहे  मीडिया के इस नए स्तम्भ का सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो यह वरदान बन सकता है. कई बार मुसीबत में फंसे लोगों तक सहायता पहुँचाने में फेसबुक,ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के लोकप्रिय प्लेटफार्म ने गज़ब की तेज़ी दिखाते हुए अनुकरणीय उदाहरण पेश किए हैं. बाढ़,भूकंप,आग प्राकृतिक आपदाओं के दौरान इस मीडिया की सकारात्मक भूमिका अब सामने आने लगी है. निजी तौर पर सोशल मीडिया की सक्रियता के तो बेशुमार उदाहरण मौजूद हैं लेकिन सरकारी स्तर पर भी यह मीडिया इन दिनों कारगर भूमिका निभा रहा है. हाल ही में रेलमंत्री और उनके मंत्रालय की ट्विटर पर सक्रियता के कारण मुसीबत में फंसे यात्रियों को समय पर सार्थक मदद मिलने के कई किस्से सामने आ रहे है. यहाँ तक कि इस मीडिया के चलते नवजात बच्चे को ट्रेन में दूध से लेकर डायपर तक उपलब्ध कराने जैसी मानवीय पहल देखने को मिली है. ट्रेन में महिलाओं से छेड़छाड़ रोकने और बदमाशों को मौके पर ही गिरफ्त में लेने में भी इस मीडिया ने अहम् भूमिका निभाई है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया पर सक्रियता किसी से छिपी नहीं है. वे इस मंच का इस्तेमाल आम जनता के संपर्क में रहने के लिए बखूबी करते हैं और शायद यही कारण है कि ‘स्वच्छ भारत’ और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढाओ’ जैसे सामाजिक कल्याण से जुड़े कार्यक्रम शुरू होते ही न केवल आम जनता तक पहुँच जाते हैं बल्कि जन-सामान्य के मन की थाह लेने में भी सहायक बनते हैं. यदि कुछ साल पहले के परिपेक्ष्य में देखे तो यह सब अविश्वसनीय सा लगता है. पहले सामाजिक कल्याण से जुडी सरकारी योजनाएं जन-सामान्य तक तब पहुँच पाती थीं जब कि वे या तो समाप्त होने के कगार पर होती थीं या फिर जन-भागीदारी के अभाव में वे असफल हो जाती थीं. आकाशवाणी से प्रसारित प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में आम लोगों की भागीदारी सोशल मीडिया की वजह से ही संभव हो पायी है. प्रधानमंत्री द्वारा विभिन्न देशों की यात्रा के दौरान सोशल मीडिया के जरिए उस देश की भाषा में सन्देश प्रेषित करने से गर्मजोशी और परस्पर उत्साह का जो माहौल बनता है उससे सुदृढ़ रणनीतिक संबंधों की नींव रखने में भी मदद मिलती है.     
अब तो सरकार के अधिकतर मंत्रालय सोशल मीडिया पर सक्रिय है लेकिन विदेश मंत्रालय की ट्विटर पर सक्रियता से हाल ही में असम के दो परिवारों को नया जीवन मिल गया. चंद शब्दों में अपनी बात को सीधे सम्बंधित व्यक्ति तक तुरंत पहुंचा पाने की कुशलता के कारण इस नए मीडिया ने इन परिवारों के परिजनों को विदेश से सुरक्षित वापस लाने में अनुकरणीय सहायता की.
असम की आराधना बरुआ यूक्रेन में डाक्टरी की पढाई कर रही हैं और सालभर में कम से कम एक बार अपने वतन आना उनके लिए सामान्य बात थी,लेकिन हाल ही में आराधना के लिए यूक्रेन से इन्स्ताबुल होते हुए गुवाहाटी का सफ़र किसी बुरे सपने से कम नहीं था. चूँकि इन्स्ताबुल में विमान को काफी देर तक रुकना था इसलिए आदत के मुताबिक आराधना विमान से बाहर निकलकर चहलकदमी करने लगी. पहले भी वे ऐसा करती रही हैं और यह सामान्य बात थी लेकिन इन्स्ताबुल में हाल ही हुए आतंकी हमले के बाद वहां के सुरक्षा हालात बदल गए थे. इस बार जैसे ही आराधना विमान से बाहर निकली सुरक्षा एजेंसियों ने बिना ट्रांजिट वीसा के बाहर घूमने के आरोप में उसे हिरासत में ले लिया. बिन बुलाए आई इस मुसीबत ने आराधना के होश उड़ा दिए. फिर धीरज से काम लेते हुए उसने किसी तरह असम की बराक घाटी में इन्स्पेक्टर आफ स्कूल के पद पर तैनात अपने पिता को फोन किया. मामले की गंभीरता को समझते हुए बदहवास पिता ने अपने ज़िले हैलाकांदी के डिप्टी कमिश्नर से मदद मांगी. डिप्टी कमिश्नर मलय बोरा ने भी मामले की नजाकत को समझते हुए और सूझ-बूझ का इस्तेमाल कर बिना समय गँवाए तत्काल ट्विटर पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को सन्देश भेजकर सहायता की गुहार लगाई. विदेश मंत्री ने भी बिना देर किए इन्स्ताबुल में भारतीय दूतावास के एक अधिकारी को आराधना को सुरक्षित भारत भेजने का दायित्व सौंप दिया.
सोशल मीडिया की इस सक्रियता का असर दिखा और आराधना के लिए न केवल सभी जरुरी दस्तावेजों का इंतजाम हो गया बल्कि उसे दूसरी फ्लाइट से भारत रवाना भी कर दिया गया. असम में अपने घर पहुंचकर आराधना ने चैन की सांस ली और सरकार की इस मानवीय पहल के प्रति आभार जताया क्योंकि इसके फलस्वरूप ही वह सुरक्षित अपने घर आ पायी.
असम के ही सिलचर के निवासी जायफुल रोंग्मेई की कहानी तो और भी दिल दहलाने वाली है. एक तेल कंपनी के जहाज पर नाविक की नौकरी कर रहे रोंग्मेई को बिना किसी गलती के नाइजीरिया में तेल चोरी के आरोप में बंदी बना लिया गया था जबकि असलियत में उसके जहाज को ईंधन की कमी के कारण मज़बूरी में नाइजीरिया की सीमा में लंगर डालना पड़ा था. किसी तरह रोंग्मेई की परेशानी की कहानी उसके घर तक पहुंची और फिर स्थानीय विधायक और सांसद के जरिए विदेश मंत्री को इस बात का पता चला तो उन्होंने बिना देर किए रोंग्मेई और उनके साथ नाइजीरिया की जेल में बंद उनके ग्यारह अन्य  भारतीय साथियों को छुड़ाने के प्रयास तेज कर दिए. सरकार की मध्यस्तता के फलस्वरूप रोंग्मेई बीते सप्ताह अपनी पत्नी और छह साल के बेटे के पास घर वापस आ गए.
जरा सोचिए, संपर्कों और साधनों के लिहाज से देश के सबसे कमजोर इलाके पूर्वोत्तर के भी दूर दराज के हिस्सों में रहने वाले इन लोगों के न तो कोई बड़े संपर्क थे और न ही इतना पैसा की उन देशों तक जाकर अपने परिजनों की कोई मदद कर पाते लेकिन सोशल मीडिया के विस्तार ने एक के बाद एक कड़ियाँ जोड़ दी और महीनों का सफ़र मिनटों में पूरा हो गया. नए भारत के इस नए मीडिया के इन सकारात्मक पहलुओं से एक बात तो पूरी तरह साफ़ हो जाती है कि यदि सोशल मीडिया का समझदारी से इस्तेमाल किया जाए तो यह मीडिया आम जनता के कल्याण में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और उन इलाकों तक भी अपनी पहुँच बना सकता है जहाँ आज तक ट्रेन जैसी बुनियादी सेवा भी उपलब्ध नहीं है.



मंगलवार, 12 जुलाई 2016

बराक घाटी को चाहिए ही क्या...सिर्फ़ संपर्क और सम्मान !!

देश के कई राज्यों के बराबर होने के बाद भी महज तीन जिलों में लगभग 40 लाख लोगों को समेटे बराक घाटी की समस्याओं के बारे में यदि यहाँ किसी से भी पूछा जाए तो पूरा पिटारा खुल जाता है  लेकिन वास्तविक और व्यावहारिक धरातल पर विचार किया जाए तो इस इलाके के लोगों को ज्यादा कुछ नहीं चाहिए. यहाँ के लोगों, सैंकड़ों गैर सरकारी सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षणिक संगठनों, राजनीतिक दलों सहित अन्य छोटे-बड़े तमाम समूहों के संघर्ष का प्रमुख लक्ष्य बस सम्मानजनक जीवन और देश के अन्य हिस्सों के साथ नियमित संपर्क तक सीमित है. संपर्क तथा सम्मान की यह लड़ाई सालों से चली आ रही है और आज भी जारी है. इस लिहाज से बराक घाटी के वाशिंदों को देश के सबसे सहनशील,धैर्यवान और अमन पसंद नागरिक कहा जा सकता है. सम्मान और संपर्क की यह जद्दोजहद बीते दिनों राज्य के नए मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के सामने भी खुलकर महसूस की गयी.
दरअसल,हाल ही में राज्य के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल पदभार सँभालने के बाद पहली बार बराक घाटी के दौरे पर आए. चूँकि बतौर मुख्यमंत्री यह उनका पहला दौरा था इसलिए बराक वासियों की उम्मीदें परवान पर थी और वैसे भी बराक घाटी ने इस बार परिवर्तन और विकास के लिए मतदान किया था तो उम्मीदें पालना गलत भी नहीं है. कछार ज़िले ने तो सात में से छह सीटें भाजपा की झोली में डालकर बदलाव की आहट को उद्घोष में बदल दिया था. बहरहाल, उम्मीद के अनुरूप सर्बानंद सोनोवाल ने बराक वासियों को भरपूर वक्त दिया और बंग भवन में आयोजित कार्यक्रम को तो हम ‘बराक जनसंवाद’ कह सकते हैं. यहाँ उन्होंने बराक घाटी के बुद्धिजीवियों,प्रबुद्ध नागरिकों,शिक्षा शास्त्रियों,पत्रकारों सहित समाज के विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों के साथ बैठकर बराक घाटी के विकास की रुपरेखा और यहाँ की समस्याओं को समझा. नागरिकों में यहाँ की परेशानियाँ बताने को लेकर इतनी उत्कंठा थी कि लगभग ढाई घंटे के कार्यक्रम के दौरान बमुश्किल 20-25 मिनट ही मुख्यमंत्री के हिस्से में आए और शेष वक्त में सभाकक्ष में मौजूद लोग यहाँ की समस्याएं, परेशानियाँ, कमियां और अब तक हुए भेदभाव की बातें बताते रहे. आलम यह था कि कार्यक्रम के संचालक बार बार  यह अनुरोध करते रह गए कि संक्षेप में समस्या बताएं, किसी समस्या के दोहराव से बचे, केवल सुझाव दें इत्यादि, परन्तु जब बात सालों से दबे गुबार को निकालने की हो या फिर पुरानी पीड़ा को अभिव्यक्त करने की या फिर मन की भड़ास निकालना हो तो समय कम हो सकता है शब्द नहीं. यही वजह रही कि लोग बोले और खूब बोले, माइक छीन-छीनकर बोले, संचालक के अनुरोध को दरकिनार कर बोले और यहाँ तक की मंच पर मौजूद वरिष्ठ भाजपा नेताओं के इशारों की अनदेखी करके बोले.
लोग बोलते रहे और बोलते क्या रहे अधिकतर लोग हर बार एक ही बात को अपने अपने ढंग से दोहराते रहे, सुझाव कम समस्या अधिक बताते रहे और मुख्यमंत्री भी चुपचाप सुनते रहे, पूरे धीरज के साथ, शांत भाव से और हल्की मुस्कराहट के साथ. शायद वे भी इस बात को समझ रहे थे कि दशक भर से ज्यादा की पीड़ा निकालने देनी चाहिए क्योंकि दिल का दर्द कम होगा तभी तो बदलाव की बात आगे बढ़ेगी. समय गुजरता जा रहा था परन्तु न तो अपनी बात रखने को आतुर लोगों की संख्या घट रही थी और न ही शिकायतों का सिलसिला कम होने का नाम ले रहा था. घड़ी की सुइयां आगे बढ़ती देख, कभी विधानसभा उपाध्यक्ष और स्थानीय विधायक दिलीप पाल को मोर्चा संभालना पड़ा तो कभी राजदीप रॉय को क्योंकि मुख्यमंत्री के सिलसिलेवार कार्यक्रमों के गड़बड़ाने का खतरा था इसलिए स्थिति यहाँ तक आ गयी कि माइक बंद कर दिया गया फिर भी लोग बिना माइक के मंच के पास आकर अपनी बात रखते रहे. कहने का आशय यह है कि सुनने-सुनाने का यह सिलसिला अबाध रूप से चलता रहा. बहुत देर बाद और कई बार आग्रह के बाद लोग यह समझ पाए कि उन्हें सुनाना भर नहीं है बल्कि मुख्यमंत्री का जवाब सुनना भी है. आखिर ऐसे सवाल का फायदा ही क्या जिसका उत्तर न मिले. आखिरकार आयोजकों के इस आश्वासन कि मुख्यमंत्री यहाँ आते रहेंगे और सोनोवाल को शिकायतों का प्रतिउत्तर देने के समय देने के नाम पर यह सिलसिला थमा. मुख्यमंत्री ने उत्तर में जो कहा वह तो दूसरे दिन सभी समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर लीड बना इसलिए यहाँ उसे दोहराना उचित नहीं है. 
इस कार्यक्रम में एक निरपेक्ष श्रोता के तौर पर उपस्थित होने के कारण मुझे भी यहाँ की पीड़ा और परिस्थितियों को भलीभांति समझने का अवसर मिला. मैंने देखा कि इस पूरे कार्यक्रम के दौरान दो दर्जन से ज्यादा लोगों को सुझाव देने का मौका मिल पाया क्योंकि मौका मिलने पर हर व्यक्ति ने पूरी तल्लीनता से अपनी बात रखी. हाँ यदि सभी लोगों ने सवाल और सुझाव की समय सीमा का पालन किया होता तो शायद और दर्जन भर लोग अपनी बात मुख्यमंत्री तक पहुंचा पाते. फिर यह भी लगा कि यदि और दस-बारह लोगों को बात रखने का मौका मिल भी गया होता तो क्या होता. वे भी तो उन्हों बातों को दोहराते जो दूसरे वक्ताओं ने कहीं थी क्योंकि सभी की मूल चिंता सम्मान और संपर्क ही तो थी.
जहाँ तक संपर्क की बात है तो सभी सुझाव बराक घाटी की खस्ताहाल सड़कों की तत्काल मरम्मत, महासड़क जल्द शुरू करने, राष्ट्रीय राजमार्गों की स्थिति सुधारने, डांवाडोल ब्राडगेज को फिर से पटरी पर लाने, गुवाहाटी और कोलकाता तक के मंहगे हवाई सफ़र को आम लोगों कि जेब के अनुकूल करने के इर्द-गिर्द ही केन्द्रित थे. यह चिंता जायज भी है क्योंकि दशक भर बाद भी महासड़क यानि सिलचर को सौराष्ट्र से जोड़ने का सपना अधूरा है तो दो दशक के इंतज़ार के बाद शुरू हुई ब्राडगेज अभी से हांफने लगी है. राष्ट्रीय राजमार्ग से लेकर शहरों के अन्दर-बाहर की सड़कों का यह हाल है कि कई सड़के तो धान की खेती करने लायक हो गयी हैं और कुछ अपनी पहचान खो बैठी हैं. हवाई सफ़र तो यहाँ के आम आदमी के लिए बस सपने जैसा है क्योंकि वह न तो इतना किराया दे सकता है और न ही छोटे से जहाज में समय पर सीट का जुगाड़ कर सकता है.
सम्मान का मसला जरुर गंभीर है और यहाँ की सबसे अहम प्राथमिकता भी. सम्मान यानि अपने ही राज्य में बेख़ौफ़ रहने का अधिकार, विदेशी-घुसपैठिए-डी वोटर जैसे असम्मानजनक तमगों से छुटकारा, अपनी भाषा में बोलने/पढ़ने/काम करने की पूरी आज़ादी और इस सम्मान की लड़ाई में अब तक कुर्बान होने वाले लोगों का सरकारी तौर पर सम्मान चाहे फिर वह रेलवे स्टेशन का नाम बदलने से हो या फिर उन्हें आधिकारिक रूप से शहीद का दर्जा देने से. अपने ही देश में, अपनी ही ज़मीन और बाप - दादाओं की विरासत पर अधिकार छोड़कर ‘बाहरी’ का लेबल किसी भी समाज को भावनात्मक रूप से तोड़ सकता है. यहाँ देश की भौगोलिक सीमाएं क्या बदली दिल में ही दरार पड़ गयी और अपने ही पराया कहने लगे. यह दर्द लेकर हजारों-लाखों परिवार सालों से यहाँ डर डरकर जी रहे हैं. हमेशा यह चिंता सालती रहती है कि कहीं उन्हें अपनी मिट्टी से पराया न होना पड़ जाए इसलिए राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) से लेकर डी वोटर तक और स्थायी नागरिकता से लेकर सारा कामकाज बंगाली भाषा में करने के हक़ का मुद्दा इस कार्यक्रम में प्रमुखता से छाया रहा.

कुल मिलाकर बात फिर वहीँ पहुँच गयी है जहाँ से शुरू हुई थी कि क्या चालीस लाख की आबादी को उनका अपना देश महज संपर्क की सुविधा, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन व्यापन की व्यवस्था नहीं दे सकता? क्यों आज़ादी के सत्तर साल बाद भी नागरिकों को यह साबित करना पड़ रहा है कि वे बाहरी नहीं है ? शायद अब तक सत्ता के गलियारों में इन विषयों को गंभीरता से महसूस नहीं किया गया या फिर साल दर साल वोटों की फसल काटने का फार्मूला समझा गया. जो भी हो, पर अब बदली परिस्थितियों, सोशल मीडिया की सक्रियता और अधिकारों को लेकर जागरूक होती नयी पीढ़ी के कारण इन विषयों को लम्बे समय तक दरकिनार नहीं किया जा सकता. वैसे भी सत्ता परिवर्तन ने बराक घाटी के लोगों की आशाओं को पंख लगा दे दिए हैं. बस अब यह देखना बाकी है कि कब ये पंख खुले आकाश में उड़ने का सामर्थ्य भी पैदा करते हैं.     

Ratings and Recommendations by outbrain