गुरुवार, 13 सितंबर 2012

पापा, भैया लोग मुझे ऐसी अजीब सी नज़रों से क्यों घूर रहे थे?


ग्यारह बसंत पूरे कर चुकी मेरी बिटिया के एक सवाल ने मुझे न केवल चौंका दिया बल्कि उससे ज्यादा डरा दिया.उसने बताया कि आज ट्यूशन जाते समय कुछ भैया लोग उसे अजीब ढंग से घूर रहे थे.यह बताते हुए हुए उसने पूछा कि-"पापा भैया लोग ऐसे क्यों घूर रहे थे? भैया लोग से उसका मतलब उससे बड़ी उम्र के और उसके भाई जैसे लड़कों से था.खैर मैंने उसकी समझ के मुताबिक उसके सवाल का जवाब तो दे दिया लेकिन एक सवाल मेरे सामने भी आकर खड़ा हो गया कि क्या अब ग्यारह साल की बच्ची भी कथित भैयाओं की नजर में घूरने लायक होने लगी है? साथ ही उसका यह कहना भी चिंतन का विषय था कि वे अजीब निगाह से घूर रहे थे.इसका मतलब यह है कि बिटिया शायद महिलाओं को मिले प्रकृति प्रदत्त 'सेन्स' के कारण यह तो समझ गयी कि वे लड़के उसे सामान्य रूप से नहीं देख रहे थे लेकिन कम उम्र के कारण यह नहीं बता पा रही थी कि 'अजीब' से उसका मतलब क्या है.हाँ इस पहले अनुभव(दुर्घटना) ने उसे चौंका जरुर दिया था. दरअसल सामान्य मध्यमवर्गीय भारतीय परिवारों की तरह उसने भी अभी तक यही सीखा था कि हमउम्र लड़के-लड़कियां उसके दोस्त हैं तो बड़े लड़के-लड़कियां भैया और दीदी. इसके अलावा कोई और रिश्ता न तो उसे अब तक पता है और न ही उसने अभी तक जानने की कोशिश की, लेकिन इतना जरुर है कि इस अजीब सी निगाहों से घूरने की प्रक्रिया ने हमें समय से पहले उसे समाज के अन्य रिश्तों के बारे में समझाने के लिए मजबूर जरुर कर दिया.
     बिटिया के सवाल के जवाब की जद्दोजहद के बीच अखबार में छपी उस खबर ने और भी सहमा दिया जिसमें बताया गया था कि एक नामी स्कूल के बस चालक और कंडक्टर ने छः साल की नन्ही सी बच्ची का दो माह तक यौन शोषण किया और डरी सहमी बच्ची अपनी टीचर की पिटाई की धमकी के डर से यह सहती रही. क्या हो गया है हम पुरुषों को? क्या अब बच्चियों को घर में बंद रखना पड़ेगा ताकि वह उस उम्र में किसी पुरुष की कामुक निगाहों का शिकार न बन जाए जबकि उसके लिए पुरुष पापा,भाई,अंकल,ताऊ,दादा जैसे रिश्तों के अलावा और कुछ नहीं होते और जिनकी गोद में वह स्त्री-पुरुष का भेद किये बिना आराम से बैठ एवं खेल सकती है. यदि अभी से बच्चियों पर इस तरह की पाबन्दी थोपनी पड़ी तो फिर वह भविष्य में लार टपकाते पुरुषों का सामना कैसे करेगी?आखिर कहाँ जा रहा है हमारा समाज! हम बेटियों को कोख में ही मारने का षड्यंत्र रचते हैं,यदि वे किसी तरह बच गयी तो सड़क पर या कूड़ेदान में फेंक दी जाती हैं और यदि यहाँ भी उनमें जीवन की लालसा रह गयी तो फिर हम कामुक निगाहों से घूरते हुए उनके साथ अशालीन हरकतों पर उतर आते हैं.किसी तरह उनकी शादी हुई तो दहेज के नाम पर शोषण और फिर बेटी को जन्म देने के नाम पर तो घर से ही छुट्टी मानो बेटी पैदा करने में उसकी अकेले की भूमिका है? यह सिलसिला चलता आ रहा है और हम चुपचाप देख रहे हैं. क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्यों नहीं हम अपने बेटे को भैया और उसकी निगाहों को शालीन रहने के संस्कार देते?बड़े होने पर उसे लड़कियों का भक्षक बनने की बजाय रक्षक बनने की शिक्षा क्यों नहीं देते?बच्चियों को ताऊ,पिता और भैया की आयु के पुरुषों  और शिक्षक से भी यौन हिंसा का डर सताने लगे तो फिर इस सामाजिक ताने-बाने का क्या होगा? महिला में हमें उपभोग की वस्तु ही क्यों दिखती है? ऐसे कई ज्वलंत प्रश्न हैं जिन पर अभी विचार नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हमारा समाज महिला विहीन हो जायेगा और माँ-बहन-बेटी जैसे रिश्ते पौराणिक कथाओं के पात्र!.         

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही गंभीर समस्या को प्रस्तुत किया आपने!ये बहुत ही गिरी हुई हालत होतो जा रही है सामाजिक चरित्र की,
    सभी इसमें नहीं आते पर क्या करू पुरुष समाज को तो ऐसी दुर्घटनाये कलंकित कर ही रही है!और ये और भी अधिक दुखद है कि जो ऐसी घटनाओ के लिए जिम्मेवार है वो किसी की बाते नहीं सुनते!
    आपकी पोस्ट बहुत ही सार्थक है,गंभीर है और असरकारक भी है!पर ब्लॉगजगत में जो भी इसे पढ़ेगा उनमे से किसी को भी ये बाते बताने की जरूरत नहीं होगी और सब अपनी जिम्मेवारी समाज के प्रति समझते होंगे!समस्या ये है कि जिनको इसकी जरूरत है वो ऐसी बाते सुनने के लिए तैयार ही नहीं होते!उन लम्पट लोगों के लिए खुद की इज्ज़त कोई मायने नहीं रखती होगी औरो की इज्ज़त वो क्या ख़ाक समझेंगे!

    कुँवर जी,

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  2. मुझे लगता है कि हर ऐरे गेरे को भैया, चाचा, मामा नहीं कहलवाना चाहिए. बाहर के लोगों को बाहर का ही मानना सिखाना चाहिए. तभी बच्चे सुरक्षित रह पाएँगे.
    घुघूतीबासूती

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  3. पता नहीं कहाँ जा रहे हैं हम, इस समस्या का एक ही हल है जो आपे लिखा अपने घर के बेटों को भक्षक नहीं रक्षक बनाने की शिक्षा देना जो आज के हालातों को देखते हुए लगता है कि नहीं दी जा रही...सारतहक एवं विचारणीय आलेख।

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  4. jansatta me lekh dekha,kya ab bachchiyon ko ghar me band rkhna padega? yh jankar dukh hua..aap patrakar hain... is aawaj ko tej kijiye ki formal education me school me students ko gender senstive hone ki education di jaye. text books me is par serious chapter rakhe jaye. ladki usi din upbhog ki vastu nahin banegi jab papa use achchhi ladki ki bajay acchhe nagrik ke adhikaron ke prati jagrik banayenge.apne sathi parents ko bhi kahiye ki gender sensitive hokar aapka saath de.

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