मंगलवार, 1 मार्च 2016

भगवान कहीं आप भी तो मज़ाक नहीं कर रहे न.....

 “मैसेजबाज़ी कर लो, फीवर है, बोलना मुश्किल है”.....यही आखिरी संवाद था शाहिद भाई के साथ 2 फरवरी को और हम ठहरे निरे मूरख की उनकी बात ही नहीं समझ पाए. सोचा बीमार हैं तो क्यों परेशान करें उन्हें, बाद में बात कर लेंगे और ये सोच ही नहीं पाए कि यह ‘बाद’ अब कभी नहीं आएगा. क्या लिखूं..कैसे लिखूं ..आज वाकई हाथ कांप रहे हैं, दिमाग और हाथों के बीच कोई तालमेल ही नहीं बन रहा. पर यदि शाहिद भाई धुन के पक्के थे तो मैं भी उनसे काम ज़िद्दी नहीं हूँ. कुछ भी हो जाए उनके बारे में लिखूंगा जरुर और आज ही,फिर चाहे वाक्य न बने,व्याकरण गड़बड़ हो या फिर शब्द साथ छोड़ दे.
आसान नहीं है शाहिद अनवर होना...और न ही हम जैसे रोजी-रोटी,निजी स्वार्थ और अपने में सिमटे व्यक्ति उनकी तरह हो सकते हैं. उनकी तरह होना तो दूर शाहिद भाई के पदचिन्हों पर चल भी पाएं तो शायद जीवन धन्य हो जाएगा. क्या नहीं थे शाहिद भाई मेरे लिए....मेरे लिए ही हम सभी के लिए...हम सभी यानि सुदीप्त,चिदंबरम,नलिनी,सुप्रशांति,मनीषा,बुलबुल,अजीत, नीरज और राजीव..नाम लिखने बैठूं तो कागज़ कम पड़ जाएंगे पर शाहिद भाई के मुरीद/चाहने वालों/दीवानों के नाम अधूरे रह जाएंगे. बस एक बार उनसे कोई मिला तो समझो उसे ‘शाहिद संक्रमण’ हुआ और वह भी जीवन भर के लिए.
हिंदी-उर्दू-अंग्रेजी के सिद्धहस्त शाहिद भाई क्या नहीं थे बड़े भाई/ अभिभावक/ दोस्त/ सहकर्मी/ लेखक/ रंगकर्मी/ शिक्षक/ दुनियाभर की सभी अच्छी बातों के अनुवादक/ जाति-धर्म से परे/ सब जानने वाले-समझने वाले फिर भी घमंड से कोसों दूर,सहज,सादगी पसंद,कोई दिखावा नहीं,कोई आडम्बर नहीं और हमेशा मदद को तत्पर. मददगार ऐसे की अपनी कार दूसरे को देकर खुद किराये के ऑटो में और कई बार पैदल घर जाने वाले, ठण्ड में अपना कोट ड्राइवर तक को पहनाकर चल देने वाले और लंच टाइम में अपना टिफिन यह कहकर दे देने वाले कि आज भूख नहीं है और फिर बाद में, चलो फल खाते हैं... यदि वे साथ हैं तो आप जेब में हाथ डालने की जुर्रत भी नहीं कर सकते और ज़ेब ही क्यों वे साथ हैं तो आप बेफिक्र-बेख़ौफ़ हो सकते हैं. सिलचर में दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर रहकर अपने बीबी-बच्चों को दिल्ली में बिना डर के छोड़ सकते हैं क्योंकि शाहिद भाई है न....और शाहिद भाई भी ऐसे कि पूनम भाभी-कासनी बिटिया को किसी ओर के भरोसे छोड़कर आपके बीबी-बच्चों के फिक्रमंद.
क्या इंसान थे शाहिद भाई..आपकी-मेरी-हमारी सोच से परे,बहुत आगे.....राह चलते ऑटो वाले को उसकी बीमार माँ के इलाज के लिए अपने एटीएम से 10 हज़ार रुपये दे देने वाले, वह भी बिना यह जाने कि उसकी बात सच है या झूठ या बिना उसका पता/फोन नंबर पूछे और फिर किसी साथी से उधार लेकर बिटिया के स्कूल की फीस भरते शाहिद भाई..समझाने पर कहते यार छोड़ो पैसा ही तो है पर इसी बहाने उसका अच्छे लोगों पर विस्वास कायम रहेगा.हम में से कौन और कितने यह काम कर सकते हैं...जेएनयू के दसियों विद्यार्थियों के पास ऐसे ही अनेक किस्से मिल जाएंगे...कितनों को वे कलाकार बना गए और कितनों को प्राध्यापक...दूसरों की हर परेशानी का रामबाण नुस्खा रखने वाले परन्तु अपने ही प्रति लापरवाह...वाकई आसान नहीं है शाहिद भाई होना.

आप सब में आदर्श थे लेकिन असमय साथ छोड़कर आपने अच्छा नहीं किया शाहिद भैया, आप क्या सोचते हैं आप हमसे दूर जा सकते हैं..आप मन लग जाएगा और आप मन लगा भी ले तो हम क्या करेंगे..किससे मांगेंगे सलाह, कौन संभालेगा हमें...काश कोई ये कह दे कि अरे संजीव कुछ नहीं हुआ शाहिद भाई ठीक हैं वो खबर झूठी थी..ऐसे ही किसी ने मज़ाक किया था...भगवान कहीं आप भी तो मज़ाक नहीं कर रहे न.....         

2 टिप्‍पणियां:

  1. मलाल-- ऐसी सख्सियत के बारे बारे में तब जानने को मिला जब वो इस दुनिया में नहीं हैं। नमन आपको एवं आपकी सख्सियत को। वाकई भगवान बहुत मजाक करते हैं, अब तो विराम लो प्रभू

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  2. शाहिद भाई को मैं भी जानता हूं। साल 1997 के अगस्त-सितंबर महीने की शाम, जगह जेएनयू का टेफ्लाज़, बहुरूप नाटक ग्रुप का वर्कशॉप चल रहा था। मेरे दोस्त ने उनसे मेरा परिचय क्या करवाया, मैंने कहा- मैं भी नाटक में दिलचस्पी रखता हूं...मैट्रीक के फौरन बाद बच्चों से एक नुक्कड़ करवाया था। लेकिन उसके बाद टाइम ही नहीं मिला उसे निखारने का...आपसे मुलाक़ात होती रहे तो शायद वो कमी पूरी हो जाएगी। शाहिद भाई -आईए, शाम में एक घंटे का टाइम निकालिए, यहीं तो हम रोज़ आते हैं, टेफलाज़ में। मैंने कहा- नहीं अब कहां टाइम है, करियर की उलझन ने क्रिएटीव सोच को दफ्न कर दिया है। शाहिद भाई- करियर से आपकी क्या मुराद है, आईएएस बनना है, आईएएस बनके अपने किस पड़ोसी पर रोब जमाना चाहते हैं। अपने गरीब रिश्तेदारों पर जो अपने बच्चों को जेएनयू नहीं भेज पाए हैं। (मेरा दिमाग घूम गया)मैं (गंभीर होकर)- शाहिद भाई, अब तक की ज़िदगी में सिर्फ लोगों को राहत पहुंचाने का काम किया है। मेरे इलाके में मेरी पहचान समाज सेवा से ही है। मैं आईएएस भी बनूंगा तो मेरा मकसद लोगों के दुखों को कम करना है। शाहिद भाई- तो लोगों की मद करने के और भी तरीक़े हैं, कोई ज़रूरी है आईएएस, आईपीएस ही बना जाए। सच पूछिए तो शाहिद भाई की बातें बहुत तीखी लगी थीं मुझे, लेकिन उसका असर इतना गहरा था कि उस रात मुझे ख़ूब गहरी नींद आई। उसके बाद जितनी भी मुलाक़ातें हुईं शाहिद भाई उतने ज़्यादा क़रीब होते गए। हालांकि शाहिद भाई से दो-चार बार ही मुलाक़ातें हुईं। लेकिन, किसी अपने के होने का अहसास हमेशा मेरे साथ रहा। जो आज किसी के नहीं होने के अहसास में बदल गया है। वाक़ई ऐसे लोग दुनिया में बहुत कम दिन रहते हैं। ...मौत हो ऐसी कि दुनिया देर तक मातम करे।

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