शुक्रवार, 4 जून 2010

चींटी ने खोली ज़माने की पोल

 कई बार पुरानी दन्त कथाएं और मुहावरे बहुत कुछ कह जाते हैं.कुछ तो इतने सटीक होते हैं कि मौजूदा समय के बिलकुल अनुरूप लगते हैं और गागर में सागर की तरह साफगोई के साथ हकीकत को बयान कर देते हैं.कुछ ऐसी ही एक कथा मेरे एक मित्र ने मेल पर भेजी है. मुझे लगता है कि यह कथा आप सब को भी उतना ही आंदोलित करेगी जितना मुझे किया है.तो जानिये एक चींटी(Ants) के जरिये आज की हकीकत......

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एक छोटी सी चींटी हर दिन दफ्तर में समय से

पहले पहुंच जाती और तुरंत काम शुरू कर देती

थी। अपने काम से वह खुद काफी खुश थी। उसका

आउटपुट काफी ज्यादा था। उसका सर्वोच्च बॉस

, जो एक शेर था, इस बात से चकित रहता था कि

चींटी बिना किसी पर्यवेक्षक के इतना काम

कैसे कर लेती है।

एक दिन उसने सोचा कि चींटी अगर बगैर किसी

पर्यवेक्षक के इतना काम कर रही है तो उसके

ऊपर एक सुपरवाइजर रख दिया जाए तो वह और

ज्यादा काम करेगी। सुपरवाइजर बता सकेगा कि

चींटी का श्रम कहां व्यर्थ जाता है, वह

अपना परफर्मेस और कैसे सुधार सकती है। किस

तरह उसके पोटेंशियल का और बेहतर इस्तेमाल

हो सकता है। इसलिए शेर ने एक तिलचट्टे को

उसका सुपरवाइजर बना दिया।

तिलचट्टे को सुपरवाइजर के काम का काफी

अनुभव था। वह अच्छी रिपोर्ट लिखने और अपने

मातहतों को प्रोत्साहित करने के लिए मशहूर

था। जब उसने जॉइन किया तो पहला निर्णय यह

लिया कि दफ्तर में घड़ी लगाई जाए। समयबद्ध

तरीके से काम करने से आउटपुट बढ़ता है।

अनुशासन किसी भी व्यवस्था की रीढ़ होता

है।

लेकिन यह सब करने और रिपोर्ट तैयार करने के

लिए उसे एक सेक्रेट्री की जरूरत महसूस

हुई। उसने इस काम के लिए एक मकड़े को

नियुक्त कर लिया। वह उसकी क्लिपिंग और

पुरानी फाइलों आदि का हिसाब रखता था और फोन

कॉल (उस समय मोबाइल नहीं थे) आदि देखता था।

तिलचट्टे की रिपोर्ट से शेर बहुत खुश हुआ

और उत्पादन दर बताने के लिए ग्राफ बनाने और

विकास की प्रवृत्तियों के झुकावों आदि का

विश्लेषण करने के लिए कहा ताकि वह खुद भी

बोर्ड मीटिंग में उन आंकड़ों का उपयोग कर

सके। इसके लिए तिलचट्टे को कंप्यूटर और

प्रिंटर की जरूरत हुई। इन सबकी देखभाल

करने के लिए उसने एक मक्खी की नियुक्ति कर

ली।

दूसरी ओर, एक समय खूब काम करने वाली चींटी

इन तमाम नई व्यवस्थाओं से और अक्सर होने

वाली मीटिंगों से परेशान रहने लगी। उसका

ज्यादातर समय इन्हीं सब बातों में गुजर

जाता था। उसे प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार

करने और अपनी उपलब्धियों का ब्यौरा देने

की आदत नहीं थी। उसका आउटपुट घटने लगा।

इन सारी स्थितियों को देखकर शेर इस

निष्कर्ष पर पहुंचा कि चींटी के काम करने

वाले विभाग के लिए एक इंचार्ज बनाए जाने का

समय आ गया है। यह पद एक खरगोश को दे दिया

गया। अब उसे भी कंप्यूटर और सहायक की जरूरत

थी। इन्हें वह अपनी पिछली कंपनी से ले आया।

खरगोश ने काम संभालते ही पहला काम यह किया

कि दफ्तर के लिए एक बढ़िया कालीन और एक

आरामदेह कुर्सी खरीदी। इन पर बैठकर वह काम

और बजट नियंत्रण की अनुकूल रणनीतिक

योजनाएं बनाने लगा।

इन सारी बातों - कवायदों का नतीजा यह हुआ कि

चींटी के विभाग में अब चींटी समेत सभी काम

करने वाले लोग दुखी रहने लगे। लोगों के

चेहरे से हंसी गायब हो गई। हर कोई परेशान

रहने लगा , इस पर खरगोश ने शेर को यह

विश्वास दिलाया कि दफ्तर के माहौल का

अध्ययन कराना बेहद जरूरी है। चींटी के

विभाग को चलाने में होने वाले खर्च पर

विचार करने - कराने के बाद शेर ने पाया कि

काम तो पहले के मुकाबले काफी कम हो गया है।

सारे मामले की तह में जाने और समाधान

सुझाने के लिए शेर ने एक प्रतिष्ठित और

जाने - माने सलाहकार काक को नियुक्त किया।

वह अपनी बात बहुत ही प्रभावी ढंग से रखता

था। काक ने रिपोर्ट तैयार करने में तीन

महीने लगाए और एक भारी भरकम रिपोर्ट तैयार

करके दी। यह रिपोर्ट कई खंडों में थी। इसका

निष्कर्ष था कि विभाग में कर्मचारियों की

संख्या बहुत ज्यादा है।

शेर बेचारा किसे हटाता , बेशक चींटी को ही ,

क्योंकि उसमें काम के प्रति लगन का अभाव

दिख रहा था। और उसकी सोच भी नकारात्मक हो

गई थी।

6 टिप्‍पणियां:

  1. नवभारत टाइम्स से चुराया हुआ, अक्षरश: !!!
    कोई बात नहीं हो जाता है कभी कभी, उम्मीद है आगे से खुद लिखेंगे
    Learn By Watch Blog

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  2. सब सरकारी विभाग में ऐसा ही होता है।

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  3. आपने पोस्ट को पूरी तन्मयता से शायद नहीं पढ़ा, आप आगरा के हैं इसलिए आपसे ऐसी ही उम्मीद की जा सकती थी. संजीव जी ने पहले ही यह लिखा है कि यह कथा उन्हें उनके एक मित्र ने मेल के ज़रिये भेजी है. यदि किसी सार्थक और नीतिगत बात को प्रसारित किया जाए तो इसमें किसी का पेट नहीं दुखना चाहिए, वैसे भी संजीव जी ने यह दावा कहीं नहीं किया है कि यह कथा उनकी अपनी है. किसी अच्छी कृति के खिलाफ़ मुंह खोलना हिन्दुस्तानियों की आदत सी बन गई है, इसीलिए हम मौलिकता भूल रहे हैं. सार्थकता और धनात्मक सोच को अपनायें, तो दुनिया ज़्यादा सीधी दिखेगी.संजीव जी की प्रोफाइल बताती है कि वे दो दशकों से पत्रकारिता से जुड़े हैं, इसलिए उन्हें मौलिकता की नसीहत दी जाना बेवकूफी है.

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  4. मुझे भी यह कथा ईमेल के जरिये किसी ने भेजी थी. बहुत सटीक बयानी है.

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  5. श्रीमान learn by watch महोदय जी, बहुत बेसबर हो रहे हो, नाम जो रखा है उसी से प्रेरणा ले लो और माफ़ी मांगो जो तुमने लिखा है, और तौबा करो की भविष्य में सोच समझकर कमेन्ट दोगे,और मैं शर्मा जी से विनम्र निवेदन करूँगा की वे इस तथाकथित बुद्धिजिवे की टिप्पडी को डिलीट न करें ताकि हर पाठक इस आदमी के बारे में जान सके......

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  6. बहुत सटीक बयानी है.

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