गुरुवार, 17 जून 2010

हमारी बेटिओं को ‘सेनेटरी नेपकिन’ नहीं, स्कूल-अस्पताल चाहिए

एक मशहूर चुटकुला है:एक बार एक व्यक्ति कपड़े की दुकान पर पहुंचा और बढ़िया सी टाई दिखाने को कहा.दुकानदार ने कई टाईयां दिखाई.ग्राहक को एक टाई पसंद आ गई.कीमत पूछने पर दुकानदार ने कहा-५४० रूपए,तो वह व्यक्ति बोला क्या बात करते हो इतने में तो बढ़िया जूते आ जाते हैं?तो दुकानदार बोला-पर आप जूते तो गले में नहीं लटका सकते न! इस चुटकुले का सार यही है कि जिस चीज़ की ज़रूरत हो उसको खरीदना चाहिए न हर-कुछ. अब हमारी सरकार को ही देख लीजिए उसे आज़ादी के ६० साल बाद भी नहीं पता कि आम जनता को किस चीज़ की दरकार है इसलिए वह ऊल-ज़लूल योजनाए बनाकर करदाताओं के गाढ़े पसीने की कमी को फ़िजूल में उड़ाती रहती है.सरकार की नासमझी का नया उदाहारण देश के गाँवों की बेटियों को सेनेटरी नेपकिन बाँटना है. सरकार ने किशोर लड़कियों में मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य को बढावा देने के लिए 150 करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दी है ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में किशोर लड़कियों के लिए उच्च स्तर के सेनेटरी नेपकिनों की उपलब्धता आसान की जा सके. योजना के अनुसार छ: सेनेटरी नेपकिनों का एक पैकेट गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की लड़कियों को एक रुपया प्रति पैकेट मिलेगा. गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) वर्ग की लड़कियों को सेनेटरी नेपकिन पांच रुपया प्रति पैकेट के हिसाब से मिलेंगे। यह योजना विभिन्न चरणों में चलाई जाएगी। पहले चरण में देश के 150 जिलों या 1500 विकास खंडों को लिया जाएगा और ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। प्रस्ताव में 10-19 वर्ष की आयु समूह की 1.5 करोड़ लड़कियों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। इन 1.5 करोड़ लड़कियों में से गरीबी रेखा से ऊपर की लड़कियां लगभग 70 प्रतिशत और बीपीएल समूह की लड़कियां 30 प्रतिशत होंगी.इस योजना का उद्देश्य किशोरियों में मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य के बारे में जानकारी बढ़ाना है। योजना का एक पहलू यह भी है कि ये नेपकिन गांव में रविवार को बकायदा बैठक बुलाकर बांटे जायेंगे.
योजना के बारे में जानकर तो यही लगता है कि दिल्ली में बैठे सरकारी अफ़सर टीवी चैनलों पर इन दिनों धुँआधार तरीके से आ रहे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेनेटरी नेपकिन के विज्ञापनों के प्रभाव में हैं या किसी कंपनी ने अपना उत्पाद खपाने के लिए यह आइडिया दिया होगा वरना जिस देश में आम जनता महंगाई से जूझ रही है,लोगों को खाने के लाले पड़ रहे हैं, अस्पतालों से ज्यादा बीमार हैं और बच्चों की संख्या से बहुत कम स्कूल....लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट है,नक्सलवाद और आतंकवाद सिरदर्द बने है,बेरोज़गारी बढती जा रही है.गांव में बच्चे कुपोषित है,बेटियां कोख में ही दम तोड़ देती हैं वहाँ की सरकार की प्राथमिकता कभी भी सेनेटरी नेपकिन नहीं हो सकती! भोपाल के गैस पीड़ित २५ साल बाद भी पैसे के अभाव में तिल-तिलकर मर रहे हैं,बुन्देलखंड पानी की बूंद-बूंद को तरस रहा है,विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की आग देश भर में फ़ैल रही है और सरकार को बेटियों की माहवारी की चिंता है. दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों को छोड़ दें तो देश के अधिकतर राज्यों में मासिक धर्म को एक अपराध की तरह समझा जाता है और वहाँ ये तीन से पांच दिन महिलाओं के लिए किसी सज़ा से कम नहीं होते.इस दौरान महिलाओं को अपवित्र तक समझा जाता है,क्या ऐसे वातावरण में गांव की बेटियां सार्वजनिक बैठक में सेनेटरी पैड ले सकती हैं? क्या उनके घरवाले ऐसी बैठक में जाने देंगे? क्या मासिक धर्म सार्वजनिक जानकारी का विषय बनाना महिलाओं का अपमान नहीं है?
अच्छा तो यह होता कि सरकार पैड की बजाय बेटियों को शिक्षित बनाने के लिए बजट और बढ़ा देती क्योंकि बच्चियां पढ़-लिख जाएँगी तो अपने स्वास्थ्य का ध्यान वे खुद ही बेहतर ढंग से रख पाएंगी और अशिक्षित रहेंगी तो पैड मिलने के बाद भी उसका उपयोग नहीं कर पाएंगी. क्या आप मेरी बात से सहमत हैं तो कलम(अब कम्पूटर पर उँगलियाँ)चलाइए....?

26 टिप्‍पणियां:

  1. विकट समस्‍याओं का आसान हल ढूँढ निकालना सबसे मुश्किल काम है।

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  2. जिस देश में सरकारी योजनाओं का उदेश्य समाज हित न होकर सिर्फ येन-केन-प्रकारेण निज स्वार्थ ही हो तो वहाँ किसी सार्थक पहल की उम्मीद करना भी बेमानी है.....

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  3. किसी ज़माने भारत में चाय नहीं पी जाती थी. लिप्टन को चाय का बाज़ार बढ़ाना था. इसके लिए ज़रूरी थी भारतियों को चाय की लत लगे. लिप्टन ने जनता को निःशुल्क चाय पिलानी शुरू कर दी. लोग मुंह बनाकर पीते थे, क्योंकि चाय का स्वाद उन्हें कडुआ लगता था. पर चूँकि यह गोरों का पेय था और भारतीय उच्च वर्ग में भी फैशनेबल हो रहा था, और सबसे बड़ी बात चाय मुफ्त बंट रही थी. लोग जमकर पीने लगे. कुछ सालों बाद जब ज्यादा लोग पीने लगे तब लिप्टन ने फ्री में पिलाना बंद कर दिया.

    किसी ज़माने में भारत में सेनेटरी नैपकीन का मतलब कोई नहीं जानता था........

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  5. नमस्कार कहना भूल गया था
    दर्शन

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  6. @Darshan Lal Baweja,
    Read this first,

    http://www.everywomansblog.com/the-danger-of-sanitary-napkins

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  7. agar kisi company ne apna maal khapane ke liye neta/officers ko pata kar aisa kiya hai to galat hai. magar iski jaroorat to hai hi.
    Paramparik roop se iska kya swasth/healthy alternate hai jo ki locally banaya ja sake aur badi comapany ke uper nirbharta cum ho?

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    1. Main Apki baat se puri tarah sehmat hu. Indian girls ko saste rate pe saintary pads dene ka idea bahut acha hai. Hume iski tarif karni cahiye. Aur baatien bhi jaruri hain but yeh bhi to jaruri hai.

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  9. सिर्फ टम्पन वाला पैराग्राफ ही दिखा? कम्पनियां बिक्री बढ़ने के लिए खतरनाक रसायनों के प्रयोग से बाज़ नहीं आएँगी. एस्बेस्टस आखिर कितना महंगा पड़ता है?

    Because asbestos makes you bleed more, if you bleed more, you’re going to need to use more. Why isn’t this against the law since asbestos is so dangerous? Because the powers that be, in all their wisdom (not), did not consider tampons as being ingested, and, therefore, didn’t consider them illegal or dangerous.

    DO NOT wear the same pad for more than 3 hours of a maximum. After this duration, the genital area is prone to bacterial action and may result in cervical cancer or other complications!

    कितनी महिलाएं इस सलाह पर अमल करेंगी? क्या आपके पास आकड़ें हैं की अभी तक मेनेस्त्रुँल हाइजीन की कमी से कितनी भारतीय लड़कियां यौन रोगों से ग्रसित हुईं? और उनके यौन रोगों की वजह केवल सेनेटरी पैड्स का न होना है? आप विज्ञान के शिक्षक हैं आशा है की आंकड़ों की अहमियत जानते होंगे.

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  10. मैं बावेजा जी से पूरी तरह से सहमत हूँ, स्वास्थ्य कि प्रारंभिक जरूरतें और उसके प्रति जागरूकता उतनी जरूरी है जितनी कि स्कूल और हॉस्पिटल. पर्यावरण और खान पान के अनुसार हारमोंस कि सक्रियता भी अल्पायु में ही आरम्भ होने लगी है और उस छोटी उम्र में यदिसंक्रमण लग जाता है तो ये जीवन भर के लिए नासूर बन जाता है. सिर्फ एक इसी योजना पर बात क्यों उठी? इतने पार्क और मूर्तियाँ करोड़ों रुपये खर्च करवा रही हैं तन क्यों नहीं लगा कि फिजूल खर्च है .
    अच्छी कंपनी न सही, साफ पैड तो बच्चियों को मिलेंगे. गाँव के घरों के साधन कितने स्वच्छ होते हैं ? इसकी जानकारी हमें है. जब उनको जानकारी देने वाली महिलायें होंगी तो गाँव वाले भी इससे लड़कियोंको वंचित नहीं रखेंगे.

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  11. हर नयी चीज़ के विरोध मे कोई न कोई आप को खड़ा दिख ही जाता हैं लेकिन विरोध किस चीज़ का हो ये जरुर देखना चाहिये । रेखा कि बात से पूर्ण सहमति

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  12. इसी से जुदा एक अनुभव लिखना चाहूँगा - एक प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी ने भी इसी तरह का निर्णय लिया था जिसका लक्ष्य गाँव की गरीब महिलायें थीं. उस समय इस निर्णय पर बहुत सवाल उठे थे, एक सवाल ये भी था की गाँव की महिलायें आंतरिक वस्त्र नहीं पहनती हैं अतः इसका कोई विशेष मतलब नहीं है,आदि
    खैर प्रश्नों से कुछ भी नहीं हुआ और वे बांटी गयीं, आज ये प्रयोग सफल है और महिलायें अपने स्वस्थ्य खासकर प्रजनन स्वस्थ्य के बारे में जागरूक हो रही हैं ,
    शर्मा जी दरअसल ये मुद्दा ऐसा है जिसने बिलकुल जमीन पर जाकर देखा है वो ही जनता है इसकी सच्चाई क्या है? स्थिति अत्यंत ही विकत है आज गावं की महिलाए हो सकता ही की ये पूरी हो यौन रोगों से ग्रसित हैं इसके कारण-
    १) जानकारी का आभाव, २)पुरुषों में संवेदना का आभाव,३) सामाजिक परम्पराएं, ४)महिलाओं के स्वाथ्य सम्बन्धी ढेरों भ्रांतियां, ५)समाज में पुरुषों में सेक्स के प्रति अधकचरा रवैया,
    आदि
    विषय अच्छा है, शर्मा जी को बधाई इस मुद्दे को छेडने के लिए

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  13. इस तरह कि सारी योजनाए सिर्फ कागजो तक होती है होता बस एक ही कम है और वो है पैसे का बन्दर बाट एक भी सेनेटरी नैपकिन लड़कियों के पास नहीं पहुचेगा और फिर सरकार कितने दिन बाटेगी अच्छा होगा कि उन लड़कियों को जानकारी दी जाय कि वह ऐसे समय में कैसे साफ सफाई रखे और कैसे कपडे को ही साफ सुथरा बना कर प्रयोग करे और बात जहा तक यौन रोगों कि है तो क्या वो सिर्फ सेनेटरी नैपकिन प्रोयोग करने से रुक जायेगा उसके होने कि और भी कई वजहे है उनका क्या होगा अच्छा होगा कि उन्हें उन सब कि शिक्षा दी जाये मतलब कि बात घूम कर वही आ जाती है सेक्स एजुकेशन पर जिसमे सब कुछ सामिल होता है और ये लड़को और लड़कियों दोनों को दी जाये तभी समस्या का समाधान पूरी तरीके से होगा | समझ में नहीं आता कि सेक्स एजुकेशन को लेकर सरकार इतने पेशोपेस में क्यों है जबकि सेनेटरी नेपकिनबाटने जैसे फैसले लेने में उसे जरा भी समय नहीं लगता है

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  14. भई, सेनेटरी नेपकिन बाँटना-न -बाँटना आपकी याँ हमारी मर्जी से नहीं चलेगा. सरकार ने सोचा है तो बंटेगी ही, अब देखना यह है की इनमें से कितने नेपकिन अफसरों की बीवियां बांधकर घूमेंगी? वैसे अच्छा पोस्ट है.

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  15. मै आपकी बात से पूरी तरह सहमत हू. सरकार को शिक्षा व स्वास्थ के लिए कदम उठाना चाहिए.

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  18. जो भी योजना हो, बच्चियों को लाभान्वित करे !!!
    सादर वन्दे!!!

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  19. सरकार अगर इस दिशा में सोच रही है और कोई कदम उठा रही है तो ये तो अच्छी बात है! शिक्षा और अस्पताल के साथ यदि स्वच्छता पूर्ण तरीके लड़कियों को उपलब्ध करा रही है तो इसमें बुरा क्या है?

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  20. jugali ek sarahniya kadam hai ki aaj ham sarkar ki har yojna ko yatharth ke dharatal pe rakhker manan ker sakte hai. Gaouno ke desh me shikshit stri sirf apne pariwar ko hi nahi varan pure desh ko labhanvit karti hai. Yeh purnyataya satya hai ki is yojna ka matra kuch pratishat hi labh janta tak pahunchega,magar shuruat to hogi.aaj se 15 saal pahle tak polio ki dava ko kuch uttar bhartiya ganvo me napunsakta ki dava kaha jata tha, mager jan jgan sarkari prayaso ka hi pratifal hai. aaj bhi baccho ko schoolo me dophar ke khane ke liye kheto per se bheja jata hai. saransh me baccho me school jane ki adat ke chalte bacche parh to rahe hai na.aaj ki pirhi yaon sankraman ke prati jagruk ho gai to aane wale samay me gandi se hone wali kai bimariyon ka bhi samapan ho jayega.

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  21. आज वाकई में इस से जयादा उनका शिक्षित होना जरुरी है और आत्मनिर्भरता उससे भी जयादा

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  22. आज १रुपये में देंगे तभी तो कल ५०रुपये में बेचेंगे सर्कार को बस विजिनेस से मतलब है|

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  25. sanitary napkin toh jaruri hai hi... uske saath behtar siksha or knowledge v must hai...

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