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दिसंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बकरी...जो बिना पंखे और पलंग के नहीं सोती !!

   चाहे मौसम कोई भी हो पर उसे पंखे के बिना नींद नहीं आती है और सोना पलंग पर ही पसंद है परन्तु अगर चादर में सलवटें पड़ी हो या बिस्तर ठीक नहीं हो तो वो पलंग पर सोना तो दूर चढ़ना भी पसंद नहीं करती। बच्चों को लेकर इसतरह के नखरे हम-आप घर घर में सुनते रहते हैं लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि हम यहाँ किसी बच्चे की नहीं, बल्कि एक बकरी की बात कर रहे हैं। आमतौर पर कुत्ते-बिल्लियों को उनके और उनके मालिकों के अजीब-गरीब शौक के कारण जाना जाता है लेकिन सिलचर की एक बकरी के अपने अलग ही ठाठ हैं और अच्छी बात यह है कि उसकी मालकिन भी उसके शौक पूरे करने में पीछे नहीं रहती। इस बकरी का नाम ‘नशुबाला’ है और यह असम विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक दूर्बा देव की है। खुद दूर्बा बताती हैं कि बिस्तर पर चढ़ने के पहले नशुबाला सिर उठाकर सीलिंग फैन(पंखे) को देखना नहीं भूलती। यदि पंखा चल रहा है तो वो पलंग पर चढ़ जाएगी और यदि बंद है तो तब तक नीचे बैठी रहेगी जब तक कि पंखा चालू न कर दिया जाए। इसके अलावा, उसे बिस्तर भी साफ़-सुथरा चाहिए। यदि चादर अस्त-व्यस्त है तो उसे ठीक कराए बिना नशुबाला को चैन नहीं मिलता। मजे की बात

'शाल के तले' नाटक: प्रकृति और संस्कृति का अनूठा तालमेल

असम में शाल के पेड़ों के तले होने वाला नाट्योत्सव न केवल समकालीन नाट्यकला के अद्वितीय प्रारूप का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है बल्कि प्रकृति के संरक्षण का अनूठा सन्देश भी फैला रहा है । अब तो इस नाट्य समारोह में दर्शकों के साथ साथ देश के बाहर से आने वाले नाटकों की संख्या भी बढ़ने लगी है ।  असम की राजधानी गुवाहाटी से लगभग 150  किमी दूर और जिला मुख्यालय ग्वालपाड़ा से 15 किमी दूर स्थित रामपुर धीरे धीरे देश ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी आकर्षण का केंद्र बन रहा है । इसका कारण है शाल के पेड़ों के नीचे वाला सालाना नाट्य उत्सव । इस अनूठे नाट्य उत्सव का श्रेय रामपुर निवासी शुक्रचर्या राभा को जाता है  जिन्होंने तक़रीबन 10 साल पहले अर्थात् वर्ष 2008 में इस तीन-दिवसीय नाट्योत्सव की नींव रखी थी । अब प्रतिवर्ष मध्य-दिसम्बर में 15 से 18 दिसंबर के बीच शाल के घने जंगल में यह आयोजन होता है । उत्सव के दौरान , प्रतिदिन उमड़ने वाली लोगों की भीड़ इस उत्सव की सफलता की कहानी बताती है । दूर-दराज के गाँवों से आने वाले दर्शकों की संख्या में लगातार वृद्धि होने से स्थानीय लोगों के लिये भी यह एक वार्ष