वास्तेगुना हुइंया नहीं है ‘पापा की परी’
‘अरे, रहने दो... ये तो पापा की परी है!’ सोशल मीडिया पर यह वाक्य आजकल इतनी बार सुनाई देता है कि लगता है जैसे पापा की परी कोई रिश्ता नहीं, बल्कि मूर्खता का तमगा हो। अब स्थिति यह हो गई है कि सड़क पर किसी लड़की से छोटी-सी लापरवाही हुई या उसने किसी बात पर अधिकार जताया या कोई युवती ज़्यादा भावुक हो गई या फिर उसने थोड़ा सा अपरिपक्व व्यवहार कर दिया…तुरंत ही कोई टिप्पणी आ जाएगी कि ‘पापा की परी है।’ लेकिन पापा की परी कोई ‘वास्तेगुना हुइंया’ नहीं है कि कहीं भी इस्तेमाल कर दिया। पापा की परी संबोधन में पिता का अथाह लाड़-प्यार, स्नेह, गर्व और सुरक्षा का भाव छिपा है जिसे आज इंटरनेट या सोशल मीडिया की भाषा में मूर्खता एवं नासमझी का प्रतीक बना दिया गया है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर पापा की परी जैसा स्नेहिल और आत्मीय संबोधन निगेटिव कैसे बन गया? मैंने गूगल गुरु से लेकर AI के अक्लमंद चैटबॉट से भी पूछा लेकिन वे भी सही सही उत्तर नहीं दे पाए। दरअसल वास्तेगुना हुइंया जैसे भाषा के कई नए मुहावरों की तरह पापा की परी का अर्थ भी धीरे-धीरे सोशल मीडिया की प्रयोगशाला में बदल गया। हालांकि इन दिनो...