संदेश

क्यों घट रही है समानता की प्रतीक साइकिल की लोकप्रियता!!

चित्र
साइकिल केवल एक परिवहन साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, समानता और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक रही है। भारतीय समाज में साइकिल का महत्व अनेक स्तरों पर देखा जा सकता है। साइकिल अमीर-गरीब, जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को कम करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों विद्यार्थियों, विशेषकर लड़कियों के लिए साइकिल शिक्षा तक पहुंच का साधन बनी। साइकिल ने महिलाओं को भी स्वतंत्र आवागमन की सुविधा दी है । साइकिल प्रदूषण नहीं फैलाती और ईंधन की आवश्यकता नहीं होती। बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के दौर में इसका उपयोग सामाजिक जिम्मेदारी का परिचायक माना जाता है। साइकिल चलाने से शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है।  कहने का आशय यह है कि साइकिल केवल दो पहियों का वाहन नहीं, बल्कि समान अवसर, स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। लेकिन पिछले कुछ सालों से साइकिल का चलन घट रहा है। लोग अब साइकिल चलाने में शर्माने लगे हैं। मोटर साइकिल एवं कारों के बढ़ने चलन ने भी साइकिल की लोकप्रियता को कम किया है। हो सकता है कि यह बात कम लोग जानते हो कि साइकिल को लोकप्रिय बनाने के लिए दुनिया भर म...

दो जून की या छह जून की...कौन सी रोटी है अच्छी!!

चित्र
आज दो जून है तो सुबह से शाम तक सोशल मीडिया में ‘दो जून की रोटी’ छाई हुई है। हर कोई दो जून की रोटी का महत्व/संघर्ष गिनवा रहा है लेकिन मेरी समस्या यह है कि बदलते वक्त में किसे सही माने.. दो जून की रोटी को या छह जून की रोटी को। अब आप सोच रहे होंगे कि दो जून तो ठीक है पर ये छह जून क्या बला है? आपको, छह जून की रोटी का मतलब समझाने से पहले हमारे बाद की नई पीढ़ियों और खासकर जेन जी को दो जून की रोटी का मतलब समझाना ज्यादा जरूरी है। दरअसल, दो जून की रोटी एक लोकप्रिय मुहावरा है जिसका सामान्य अर्थ है  दो वक्त की रोटी या दो वक्त का भोजन। हालांकि, यह मुहावरा सिर्फ भूख मिटाने की बात नहीं करता बल्कि यह संतोष का प्रतीक है। इसका अर्थ है मेहनत करके संतोष के साथ दो वक्त की सादी रोटी, सब्ज़ी और दाल जुटाना।  हमारे पूर्वजों के लिए यही जीवन की असली खुशी थी। उनकी दिनचर्या भी इसी के मुताबिक निर्धारित थी..मसलन सुबह जल्दी नाश्ता, शाम को रात का खाना। बीच में कुछ नहीं क्योंकि इससे पेट को भरपूर आराम मिलता है एवं शरीर को काम करने का मौका । अब बात छह जून की रोटी की..तो दो जून की तरह छह जून की रोटी का मतलब है छ...

चांदनी रात में शिमला का सौंदर्य

चित्र
 पूर्णिमा की रात में चंद्रमा के धवल प्रकाश के बीच शिमला की 12 से 15 डिग्री की ठंडी हवा वातावरण में सिहरन घोल रही है। मॉल रोड पर टहलते हुए पर्यटकों की भीड़ के बीच चंद्रमा की सोलह कलाओं से दमकती रात में ऐसा लग रहा है मानो पूरा शहर किसी उत्सव की तैयारी में हो। रात का अंधेरा गहराते ही पूर्ण गोलाई लिए चंद्रमा ने धीरे-धीरे आकाश पर पूरीतरह से अपना अधिकार जमा लिया । मॉल रोड के मध्य खड़ा ऐतिहासिक चर्च अपनी पीली रोशनी में किसी यूरोपीय चित्रकला जैसा प्रतीत हो रहा है। वहीं, चर्च की ऊंची मीनार के पीछे चमकता चंद्रमा ऐसा लग रहा है मानो किसी कलाकार ने आकाश पर चांदी का विशाल दीप टांग दिया हो।  पीली लाइट को अपने घेरे में लिए दूधिया रोशनी में नहाया चर्च और भी भव्य लग रहा है। उधर, दूर जाखू पहाड़ी की चोटी पर विराजमान हनुमान जी की विशाल प्रतिमा भी अद्भुत आभा बिखेर रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे स्वयं बजरंगबली शिमला की रक्षा के लिए रात्रि प्रहरी बनकर खड़े हों। नीचे मॉल रोड पर टहलते लोगों की चहल-पहल, नवयुगलों का मीठा सा कोलाहल, देवदार के वृक्षों की सरसराहट और ऊपर शांत, उज्ज्वल चंद्रमा—इन सबने मिलकर...

उदन्त मार्त्तण्ड' से लेकर आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस तक हिंदी पत्रकारिता

चित्र
  हिंदी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की यात्रा केवल समाचारों के प्रसार की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति और तकनीकी विकास का जीवंत दस्तावेज भी है। 1826 में 'उदन्त मार्तण्ड' के प्रकाशन से लेकर आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित मीडिया युग तक, हिंदी पत्रकारिता ने अनेक उतार-चढ़ाव, संघर्ष, प्रयोग और नवाचार देखे हैं। यह यात्रा परंपरा और आधुनिकता के संगम की ऐसी गाथा है, जिसने न केवल पत्रकारिता को समृद्ध किया बल्कि जनमानस को भी जागरूक और सशक्त बनाया। कोलकाता के कोलूटोला इलाके की अमरतल्ला गली से कानपुर निवासी वकील, पंडित युगल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 को साप्ताहिक पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' पहला अंक प्रकाशित किया। 'उदन्त मार्त्तण्ड' न केवल भारत का पहला हिन्दी समाचार पत्र था, बल्कि यह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक साहसिक भाषाई और सांस्कृतिक प्रयोग भी था। इसका पूरा श्रेय पंडित युगल किशोर शुक्ल को जाता है। उस दौर में जब अंग्रेजी, बांग्ला और फारसी का बोलबाला था, इसने देवनागरी लिपि में छपाई कर हिन्दी भाषियों को अपनी पहचान और आवाज दी। पंडित युगल किशोर...

कहाँ से लाते हो इतना तेज़, सौंदर्य और अहसास...अमलतास !!!!

चित्र
  गर्मी से दहक रहे मैदानी इलाकों में सुनहरी आभा से जगमगाता यह पेड़ बरबस ही/ बार बार अपनी ओर खींच रहा था..और फिर क्या था हम भी खुद को रोक न सके और उससे जान पहचान बढ़ाने के लिए उसके पास जाने के लिए विवश हो गए… वैसे इश्क़ भी तो यही करता है..अपनी ओर खींचता है और आप बेबस से खिंचे चले जाते हैं। मैंने पहले कभी इतने ध्यान से इस पेड़ को फूलते नहीं देखा था क्योंकि प्रकृति से थोड़ा सा भी प्यार करने वाले हर शहर/इलाक़े में चटक केसरिया-लाल फूलों से लदे गुलमोहर और रंग बिरंगे तितलियों से फूलों से भरे बोगनबेलिया आपको कुछ और देखने ही नहीं देते या फिर शाम ढलते ही मधुमालती की महक हमारा आपका ध्यान भटका देती है लेकिन जब तपती दोपहर में 45 डिग्री तापमान में सूरज से निडर होकर नैन मटक्का करते इन फूलों को देखा तो फिर न मन माना और न ही मोबाइल का कैमरा।..आख़िर सूरज की तपिश से उसी का रंग लेकर मनमोहक नजारों वाले इस ‘अमलतास’ के पेड़ में कुछ तो अलग है,जो इसे खास और बहुत खास बनाता है।  अमलतास की खास बात यह भी है कि गर्मियों की तपती दोपहर में जब अधिकांश पेड़ मुरझाए से दिखाई देते हैं, तब पीले फूलों से लदा यह पेड़ मानो...

क्या, अपने देखा है मोमबत्तियों का पेड़!!

चित्र
कोई इसे मोमबत्तियों का पेड़ (कैंडल्स ट्री) कहता है तो किसी को इसमें गंगा घाट पर होने वाली आरती में इस्तेमाल होने वाली आरतियां नज़र आती हैं। किसी को यह क्रिसमस ट्री का गुलदस्ता लगता है और हमने इसमें दीपावली के रोशनी से जगमगाते दीपक देख लिए..। यह अपने अपने नजरिए की बात है और इसलिए यह ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’ वाले भाव से सभी अलग,अनूठा पर आकर्षक नजर आता है। यह संभवतः इकलौता पेड़ होगा जो अपने फूलों का रस चूसने के लिए मधुमक्खियों को सिग्नल देता है और फिर यह भी बताता है कि कौन से फूल में रस बचा है और कौन फूल रसहीन हो गया है। आम लोगों के लिए पूर्ण परिपक्व वृक्ष गोवर्धन पर्वत की तरह विशाल छाते से कम नहीं है जो धूप एवं बारिश से बचाता है। दरअसल, इसकी बड़ी एवं लंबी पत्तियों का समूह हमारे पंजे जैसा होता है इसलिए अन्य वृक्षों की तुलना में इस पेड़ से ज्यादा छाया मिलती है।  यह सेहत का भी पिटारा है और वैरिकोज वेंस, सूजन, बवासीर और शुक्राणु की गुणवत्ता सुधारने जैसे कई काम आता है। लेकिन सावधान, इसके कच्चे बीज, पत्तियां, छाल या फूल सामान्य रूप से इतने जहरीले हो सकते हैं कि बिना ...

इस बरफी को खाने की गलती मत करना, वरना..!!

चित्र
  क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि महज कुछ हजार की आबादी वाले एक कस्बाई शहर की एक साधारण सी मिठाई के लिए सुबह से लाइन लगती होगी और लाइन भी ऐसी की बाकायदा पुलिस लगानी पड़े!! इसके बाद भी जरूरी नहीं है कि आपके हाथ मनचाही मात्रा में मिठाई हाथ लग जाए ।..और मिठाई भी कोई अनोखी नहीं बल्कि बेसन की बरफी..जी हां, वही बेसन की बरफी जो हर गली-मोहल्ले की मिठाई की दुकान पर आसानी से मिल जाती है।  बेसन की बरफी राजस्थान एवं गुजरात में मोहनथाल व दिलखुशाल तो कुछ राज्यों में बेसन चक्की के नाम से जानी जाती है। यह दिल्ली से लेकर उत्तरप्रदेश तक तथा राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश तक लोकप्रिय है। वही बेसन की बरफी, जो भारत में हर शादी-विवाह, तीज-त्यौहार एवं हर छोटे-बड़े अवसर पर घर-घर में  आमतौर पर बनती है और शायद सोन पापड़ी के बाद नई पीढ़ी द्वारा सबसे ज्यादा हिकारत से देखी/खाई जाती है। लेकिन, इस कस्बे की बेसन की बरफी के स्वाद का जादू ऐसा है कि दिन भर में एक क्विंटल मतलब सौ-डेढ़ सौ किलो से ज्यादा बरफी बिक जाना सामान्य बात है जबकि खास अवसरों पर दो-तीन सौ किलो बरफी लोग खा जाते हैं। इस बेसन की बरफी का प्रताप ...

अमेरिकी जादूगर के नीले जादू की क़ैद में हिमाचल..!!

चित्र
दुनिया भर के लोगों को अपने श्वेत-बर्फीले हुस्न, आकाश छूते चीड़-देवदार और प्रकृति के हरियाली भरे श्रृंगार से अपनी ओर खींचने वाला हिमाचल प्रदेश इन दिनों एक अमेरिकी जादूगर के नीले जादू के मोहपाश में बंधा हुआ है। आमतौर पर जादूगर वैसे तो काला जादू करते हैं लेकिन इस विदेशी जादूगर ने नीला जादू किया है और आलम यह है कि देवभूमि के अधिकतर इलाके अपनी सुध बुध खोकर इस जादू के रंग में रंग गए हैं..वहीं, हिमाचल की दिव्यता एवं भव्यता को निहारने आए पर्यटक भी इस नीले जादू के सम्मोहन से बच नहीं पा रहे हैं। इस नीली आभा का ऐसा अद्भुत असर है जैसे आसमान स्वयं धरती से आलिंगन कर रहा है। जगह जगह बिछे नरम मुलायम नीले कालीन ने इस सौंदर्य में चार चांद लगा दिए हैं। यह जादूगर दक्षिण अमेरिका का मूल निवासी है एवं ब्राजील, अर्जेंटीना, बोलीविया, पैराग्वे में जवान हुआ है और अब दबे पांव हिमाचल में घुसपैठ कर गया है। इन दिनों इसका जादू  धर्मशाला, कुल्लू, कांगड़ा और सोलन जैसे इलाकों से होते हुए पूरे राज्य में परवान चढ़ रहा है। वैसे, हिमाचल के पहले यह जादूगर अपने नीले जादू से अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, यूरोप, फ्लोरिडा, कै...

अकेलापन..पैसे नहीं, समय मांगता है !!!

चित्र
...शहर के एक व्यस्त इलाके में राहुल नाम का एक युवक डिलीवरी बॉय का काम करता था। ज्यादातर उसकी शाम की शिफ्ट होती। एक दिन रात नौ बजे उसने आखिरी ऑर्डर उठाया। रेस्टोरेंट से पैकेट लेते समय उसने देखा — बहुत छोटा ऑर्डर था। बस सादी खिचड़ी, दही और दो केले। पता पुराने शहर का था। एक जर्जर पुरानी इमारत, तीसरी मंजिल। सीढ़ियाँ चढ़कर उसने घंटी बजाई। दरवाजा एक वृद्ध महिला ने खोला। सफेद बाल, काँपते हाथ, मोटे चश्मे। चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी, पर आवाज में मिठास थी —"बेटा, अंदर रख दो... मेरे हाथ काँपते हैं। "राहुल ने खाना टेबल पर रखा और लौटने लगा तो अम्मा ने कहा —"बेटा, दो मिनट बैठोगे? अकेले खाना खाने में मन नहीं लगता।" राहुल ने घड़ी देखी। शिफ्ट खत्म हो चुकी थी। थकान भी हो रही थी। फिर भी कुछ अनकहा भाव उसके मन में उठा और वह बैठ गया।  कमरा सन्नाटे में डूबा था। दीवार पर पुरानी घड़ी टिक-टिक कर रही थी। एक कोने में भगवान की छोटी सी तस्वीर। दूसरी दीवार पर परिवार की दर्जनों फोटो लगी थीं। अम्मा ने प्लेट खोली। धीरे-धीरे खिचड़ी खाने लगीं। हर दो कौर के बाद वे राहुल की ओर देखकर मुस्कुरातीं। फिर ब...

नारद मुनि: केवल पत्रकार नहीं, प्रथम ‘सोशल मीडिया पत्रकार’..!!

चित्र
आज सूचना क्रांति के दौर में जब सूचना की रफ्तार इंटरनेट और सोशल मीडिया से तय हो रही है एवं सोशल मीडिया पर हर सेकंड लाखों खबरें, रील्स और पोस्ट वायरल हो रही हैं, तब यह सवाल दिलचस्प लगता है कि क्या प्राचीन काल में भी ऐसा कोई संचार तंत्र था? इसका उत्तर पौराणिक कथाओं में ही मिलता है। पौराणिक संदर्भों में देवर्षि नारद का व्यक्तित्व इस सवाल का सटीक जवाब प्रस्तुत करता है। उन्हें केवल एक ऋषि या भक्त के रूप में नहीं, बल्कि सूचना और संवाद के प्राचीन वाहक के रूप में भी देखा जाता रहा है। धार्मिक कथा कहानियों के अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और भगवान विष्णु के परम भक्त नारद मुनि तीनों लोकों—स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—में निर्बाध विचरण करते थे। वे जहां भी जाते, वहां की घटनाओं, परिस्थितियों और संदेशों को एकत्र कर दूसरे स्थान तक पहुंचाते। यह कार्य आधुनिक पत्रकारिता की मूल परिभाषा से काफी हद तक मेल खाता है—सूचना जुटाना, उसका संप्रेषण करना और समाज को प्रभावित करना। नारद मुनि की सबसे प्रमुख खासियत उनकी निष्पक्षता और गतिशीलता थी। वे देवताओं, असुरों और मनुष्यों—सभी के बीच समान रूप से संवाद स्थापित करते थे। उ...