यह प्रकृति के कैनवास पर की गई एक ऐसी अद्भुत चित्रकारी की तरह है, जो बिना कुछ कहे ही आँखों को अपनी ओर खींच लेती है। यह महज एक फूल या उनका संग्रह नहीं, बल्कि कुदरत की खिलखिलाहट है, जिसमें नज़ाकत भी है और एक अनकहा रहस्य भी। इसमें रंगों का ऐसा ठहराव और पंखुड़ियों की ऐसी बनावट है जैसे किसी शायर की अधूरी ख़्वाहिश मुकम्मल हो गई हो।
हवा के झोंकों से बात करती इनकी नाजुक पंखुड़ियाँ, जैसे कोई खामोश ग़ज़ल गुनगुना रही हों। हम बात कर रहे हैं अपने में सुंदरता,गरिमा,चंचलता और रंगोली समेटे हुए फूल ऑर्किड की। जब भी बात सबसे अनूठे और गरिमामयी सौंदर्य की आती है, तो जुबां पर बस एक ही नाम ठहरता है-ऑर्किड। ऑर्किड का खिलना मानो प्रकृति का खुद पर गुमान करना है।
वैसे तो इसे दुनिया को अपना रंग रूप दिखाने के लिए किसी न किसी सहारे की जरूरत है लेकिन फिर भी यह परजीवी नहीं है और अब तो यह पर्यटकों को अपनी ओर खींचकर आर्थिक समृद्धि में भी योगदान दे रहा है। ऑर्किड का पूर्वोत्तर में बसेरा है एवं यह यहां की खास पहचान है।
यह अष्टलक्ष्मी में से एक और सात बहनों के इकलौते भाई के नाम से विख्यात सिक्किम का राजकीय पुष्प भी है। इसलिए सिक्किम की राजधानी गंगटोक में ऑर्किड की अनूठी दुनिया बसाई गई है। इस लेख में हम आर्किड पर केंद्रित इस अद्भुत दुनिया की सैर करेंगे।
गंगटोक में पहाड़ों, बादलों और देवदारों के बीच आर्किड की इस अनोखी दुनिया का नाम स्वर्ण जयंती मैत्रेय मंजरी ऑर्किडेरियम है। यहां प्राकृतिक तौर पर, चित्रों में और कांच की दीवारों के भीतर यह रंगीन और दुर्लभ फूल अलग अलग आकार प्रकार और रंग रूप में पूरी भव्यता के साथ मौजूद है। ऑर्किडेरियम में इस फूल की 100 से अधिक प्रजातियां रखी गई हैं। इनमें सिक्किम का राजकीय पुष्प डेंड्रोबियम नोबाइल (Dendrobium nobile) भी शामिल है।
ऑर्किडेरियम का शुभारंभ पिछले साल 2025 में 29 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिक्किम के 50 वर्ष होने के अवसर पर किया था। उसी साल सितंबर माह से इसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया है। सिक्किम सरकार के शहरी विकास विभाग द्वारा विकसित एवं राष्ट्रीय ऑर्किड अनुसंधान केंद्र के तकनीकी सहयोग से तैयार ऑर्किडेरियम को आर्किटेक्चर फर्म सैलिएंट ने डिजाइन किया है।
लगभग 38,000 वर्ग फुट में फैले इस आर्किडोरियम को विश्व का सबसे बड़ा कूल हाउस आर्किडोरियम और भारत का पहला कूल हाउस आर्किडोरियम कहा जाता है। वैसे तो ऑर्किड किसी पहचान का मोहताज नहीं है, फिर भी इस खिलखिलाते फूल से अनजान लोगों की जानकारी के लिए ऑर्किड आर्किडेशियाई (Orchidaceae) नाम का विशाल वनस्पति परिवार है। दुनिया में इसकी हजारों प्रजातियां हैं।
भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से संबद्ध विज्ञान और प्रौद्योगिकी उच्च अध्ययन संस्थान के अनुसार भारत में ऑर्किड की एक हजार से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं और इनमें करीब 850 प्रजातियां पूर्वोत्तर भारत में मिलती हैं। सिक्किम में ऑर्किड को ‘सुनाखरी’ के नाम से भी जाना जाता है जबकि पूर्वोत्तर में कपौ फूल एवं वांडा या बांदा जैसे नाम भी इसके लिए प्रचलित हैं।
जहां तक गंगटोक के ऑर्किडेरियम की बात है तो यह कोई सामान्य फूलों का पार्क भर नहीं है बल्कि हम इसे नियंत्रित वातावरण में ऑर्किड की विभिन्न प्रजातियों को भव्य अंदाज में देखने का जीवंत संग्रहालय कह सकते हैं। यहां प्रदर्शित लगभग 70 प्रतिशत पौधे जीवित ऑर्किड हैं, जबकि शेष हिस्से में दुनिया के विभिन्न भागों के ऑर्किड को समझाने वाले विस्तृत वनस्पति मॉडल हैं।
यहां का सबसे बड़ा आकर्षण कांच का बना अद्भुत आर्किड हॉल है। जिसमें ऑर्किड अपनी तमाम प्रजातियों और बंधु बांधवों के साथ हंसता, मुस्कराता और खिलखिलाता नजर आता है जबकि ऑर्किड संग्रहालय में ऑर्किड की जैव-विविधता, संरक्षण और खेती की जानकारी दी गई है।
प्रकृति एवं विज्ञान का समन्वय यह ऑर्किडेरियम यहां आने वाले पर्यटकों को फूलों की सुंदरता देखने के साथ यह भी बताता है कि हिमालय की जैव-विविधता कितनी अनमोल, खूबसूरत एवं विविधता लिए है।
ऐसा नहीं है कि ऑर्किड के प्रति आकर्षण केवल सिक्किम तक सीमित है। दुनिया के कई देशों में भी इसके संरक्षण और पर्यटकों की सुविधा के लिए बड़े उद्यान और वैज्ञानिक संग्रह विकसित किए गए हैं। सिंगापुर का नेशनल ऑर्किड गार्डन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां ऑर्किड की 1,500 से अधिक प्रजातियां हैं।
लेकिन, भारत में ऑर्किड का महत्व इसलिए विशेष है क्योंकि देश की कुल ऑर्किड विविधता का बड़ा हिस्सा पूर्वोत्तर में पाया जाता है। इस लिहाज से सिक्किम का ऑर्किडेरियम केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि पूर्वी हिमालय की वनस्पति विरासत को लोगों के सामने लाने वाला महत्वपूर्ण मंच है। यह सिक्किम की हरित एवं जैविक राज्य की छवि, सतत विकास और इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा दे रहा है।
जंगल में किसी पेड़ की शाखा पर चुपचाप खिलता हुआ ऑर्किड शायद यह घोषणा नहीं करता कि वह कितना दुर्लभ है। वह बस खिलता है और देखने वालों के दिल में भी अपनी खूबसूरती की छाप छोड़ देता है । सिक्किम ने इसी हँसती, मुस्कराती सुंदरता को गंगटोक के इस ऑर्किडेरियम में एक खूबसूरत और भव्य घर दे दिया है…शायद इसीलिए ऑर्किड का स्थानीय नाम ‘सुनाखरी’ यहां इतना सटीक लगता है।








































