रविवार, 4 अक्टूबर 2026

ऑर्किडेरियम: गंगटोक के दिल में सजी अनूठे फूलों की दुनिया


यह प्रकृति के कैनवास पर की गई एक ऐसी अद्भुत चित्रकारी की तरह है, जो बिना कुछ कहे ही आँखों को अपनी ओर खींच लेती है। यह महज एक फूल या उनका संग्रह नहीं, बल्कि कुदरत की खिलखिलाहट है, जिसमें नज़ाकत भी है और एक अनकहा रहस्य भी। इसमें रंगों का ऐसा ठहराव और पंखुड़ियों की ऐसी बनावट है जैसे किसी शायर की अधूरी ख़्वाहिश मुकम्मल हो गई हो। 

हवा के झोंकों से बात करती इनकी नाजुक पंखुड़ियाँ, जैसे कोई खामोश ग़ज़ल गुनगुना रही हों। हम बात कर रहे हैं अपने में सुंदरता,गरिमा,चंचलता और रंगोली समेटे हुए फूल ऑर्किड की। जब भी बात सबसे अनूठे और गरिमामयी सौंदर्य की आती है, तो जुबां पर बस एक ही नाम ठहरता है-ऑर्किड। ऑर्किड का खिलना मानो प्रकृति का खुद पर गुमान करना है।

वैसे तो इसे दुनिया को अपना रंग रूप दिखाने के लिए किसी न किसी सहारे की जरूरत है लेकिन फिर भी यह परजीवी नहीं है और अब तो यह पर्यटकों को अपनी ओर खींचकर आर्थिक समृद्धि में भी योगदान दे रहा है। ऑर्किड का पूर्वोत्तर में बसेरा है एवं यह यहां की खास पहचान है।


यह अष्टलक्ष्मी में से एक और सात बहनों के इकलौते भाई के नाम से विख्यात सिक्किम का राजकीय पुष्प भी है। इसलिए सिक्किम की राजधानी गंगटोक में ऑर्किड की अनूठी दुनिया बसाई गई है। इस लेख में हम आर्किड पर केंद्रित इस अद्भुत दुनिया की सैर करेंगे।

गंगटोक में पहाड़ों, बादलों और देवदारों के बीच आर्किड की इस अनोखी दुनिया का नाम स्वर्ण जयंती मैत्रेय मंजरी ऑर्किडेरियम है। यहां प्राकृतिक तौर पर, चित्रों में और कांच की दीवारों के भीतर यह रंगीन और दुर्लभ फूल अलग अलग आकार प्रकार और रंग रूप में पूरी भव्यता के साथ मौजूद है। ऑर्किडेरियम में इस फूल की 100 से अधिक प्रजातियां रखी गई हैं। इनमें सिक्किम का राजकीय पुष्प डेंड्रोबियम नोबाइल (Dendrobium nobile) भी शामिल है।


ऑर्किडेरियम का शुभारंभ पिछले साल 2025 में 29 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिक्किम के 50 वर्ष होने के अवसर पर किया था। उसी साल सितंबर माह से इसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया है। सिक्किम सरकार के शहरी विकास विभाग द्वारा विकसित एवं राष्ट्रीय ऑर्किड अनुसंधान केंद्र के तकनीकी सहयोग से तैयार ऑर्किडेरियम को आर्किटेक्चर फर्म सैलिएंट ने डिजाइन किया है।

लगभग 38,000 वर्ग फुट में फैले इस आर्किडोरियम को विश्व का सबसे बड़ा कूल हाउस आर्किडोरियम और भारत का पहला कूल हाउस आर्किडोरियम कहा जाता है। वैसे तो ऑर्किड किसी पहचान का मोहताज नहीं है, फिर भी इस खिलखिलाते फूल से अनजान लोगों की जानकारी के लिए ऑर्किड आर्किडेशियाई (Orchidaceae) नाम का विशाल वनस्पति परिवार है। दुनिया में इसकी हजारों प्रजातियां हैं।


भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से संबद्ध विज्ञान और प्रौद्योगिकी उच्च अध्ययन संस्थान के अनुसार भारत में ऑर्किड की एक हजार से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं और इनमें करीब 850 प्रजातियां पूर्वोत्तर भारत में मिलती हैं। सिक्किम में ऑर्किड को ‘सुनाखरी’ के नाम से भी जाना जाता है जबकि पूर्वोत्तर में कपौ फूल एवं वांडा या बांदा जैसे नाम भी इसके लिए प्रचलित हैं।

जहां तक गंगटोक के ऑर्किडेरियम की बात है तो यह कोई सामान्य फूलों का पार्क भर नहीं है बल्कि हम इसे नियंत्रित वातावरण में ऑर्किड की विभिन्न प्रजातियों को भव्य अंदाज में देखने का जीवंत संग्रहालय कह सकते हैं। यहां प्रदर्शित लगभग 70 प्रतिशत पौधे जीवित ऑर्किड हैं, जबकि शेष हिस्से में दुनिया के विभिन्न भागों के ऑर्किड को समझाने वाले विस्तृत वनस्पति मॉडल हैं। 


यहां का सबसे बड़ा आकर्षण कांच का बना अद्भुत आर्किड हॉल है। जिसमें ऑर्किड अपनी तमाम प्रजातियों और बंधु बांधवों के साथ हंसता, मुस्कराता और खिलखिलाता नजर आता है जबकि ऑर्किड संग्रहालय में ऑर्किड की जैव-विविधता, संरक्षण और खेती की जानकारी दी गई है।

प्रकृति एवं विज्ञान का समन्वय यह ऑर्किडेरियम  यहां आने वाले पर्यटकों को फूलों की सुंदरता देखने के साथ यह भी बताता है कि हिमालय की जैव-विविधता कितनी अनमोल, खूबसूरत एवं विविधता लिए है।


ऐसा नहीं है कि ऑर्किड के प्रति आकर्षण केवल सिक्किम तक सीमित है। दुनिया के कई देशों में भी इसके संरक्षण और पर्यटकों की सुविधा के लिए बड़े उद्यान और वैज्ञानिक संग्रह विकसित किए गए हैं। सिंगापुर का नेशनल ऑर्किड गार्डन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां ऑर्किड की 1,500 से अधिक प्रजातियां हैं।

लेकिन, भारत में ऑर्किड का महत्व इसलिए विशेष है क्योंकि देश की कुल ऑर्किड विविधता का बड़ा हिस्सा पूर्वोत्तर में पाया जाता है। इस लिहाज से सिक्किम का ऑर्किडेरियम केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि पूर्वी हिमालय की वनस्पति विरासत को लोगों के सामने लाने वाला महत्वपूर्ण मंच है। यह सिक्किम की हरित एवं जैविक राज्य की छवि, सतत विकास और इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा दे रहा है। 


जंगल में किसी पेड़ की शाखा पर चुपचाप खिलता हुआ ऑर्किड शायद यह घोषणा नहीं करता कि वह कितना दुर्लभ है। वह बस खिलता है और देखने वालों के दिल में भी अपनी खूबसूरती की छाप छोड़ देता है । सिक्किम ने इसी हँसती, मुस्कराती सुंदरता को गंगटोक के इस ऑर्किडेरियम में एक खूबसूरत और भव्य घर दे दिया है…शायद इसीलिए ऑर्किड का स्थानीय नाम ‘सुनाखरी’ यहां इतना सटीक लगता है।


शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

अंडमान की लाइम स्टोन केव्स: प्रकृति की अद्भुत कारीगरी !!

एक अद्भुत दुनिया.. जहां इंसानी शिल्पकला भी पूरी विनम्रता के साथ पराजय स्वीकार कर ले पर यहां तक पहुंचना किसी तपस्या से कम नहीं है। यह तपस्या सुबह चार बजे से शुरू होती है और ज़ाहिर है चार बजे किसी लंबी यात्रा पर निकलने के लिए घंटे दो घंटे पहले उठना ही पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि अद्भुत दुनिया से रूबरू होने की राह इतनी आसान तो नहीं ही होगी । करीब दो घंटे की 100 किमी की सड़क यात्रा, घंटे भर की लिखा पढ़ी और फिर दो किस्तों में पहले फेरी से एवं बाद में स्पीड बोट से नीले समंदर की शोर मचाती उछलती लहरों पर सवारी..इसके बाद करीब दो किमी तक लकड़ी के पुल, कच्चे एवं ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर पैदल यात्रा…तब जाकर मिलता है प्रकृति का ऐसा आश्चर्यजनक खजाना जो हमारी सफ़र की सारी थकान उतार देता है।


प्रकृति के इस नायाब खजाने में भगवान गणेश हैं, शंख है, देवी देवता, इंसान, हाथी, बंदर, जैली फिश और पता नहीं क्या क्या..हम देखते ही रह जाते हैं और हमारी आँखें आकृतियां बुनने एवं चुनने लगती हैं..वह भी मोबाइल की टॉर्च की रोशनी में।आइए, अब इस खजाने के रहस्य की परतें खोलते हैं। हम बात कर रहे हैं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बाराटांग (बारतांग) की अपनी तरह की इकलौती लाइम स्टोन केव्स यानि चूना पत्थर की गुफाओं की।


अब किसी को ये लग सकता है कि इन चूना पत्थर की गुफाओं में ऐसा क्या है कि घंटों के सफ़र और नींद खराब करके देखा जाए तो उनके लिए उत्तर यही है पहले आओ और खुद देख जाओ। दरअसल,अंडमान या यहां के विभिन्न द्वीपों की यात्रा केवल नीले समुद्र, सफेद रेत और नारियल-सुपारी के पेड़ों की यात्रा भर नहीं है बल्कि यह प्रकृति के ऐसे कई अद्भुत नजारों की यात्रा है जो संभवतः देश में आमतौर पर कहीं और देखने को नहीं मिलते।

इस मायावी दुनिया के सफर की शुरुआत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से शुरू होती है । सबसे पहले हम सड़क मार्ग से लगभग 100 किलोमीटर दूर ज़िरकाटांग पहुंचते हैं। यह रास्ता घने जंगल, पेड़ पौधों की सरसराहट, प्रकृति की मनमोहक खुशबू, पक्षियों के कलरव और एक कतार में एवं एक ही दिशा में चलती सौ गाड़ियों के काफिले के साथ करीब दो घंटे में पूरा होता है। ज़िरकाटांग में तमाम सुरक्षा औपचारिकताओं को पूरा कर हम फेरी में चढ़कर बाराटांग पहुंचते हैं। इस फेरी में हमारे साथ बस, ट्रक, मोटरसाइकिल भी सफर करती हैं..खैर, फेरी की कहानी फिर कभी। 

फेरी से बाराटांग पहुंचकर आगे की यात्रा स्पीड बोट से होती है। लहरों की अठखेलियों के साथ उछल कूद करती हमारी नाव जब मैंग्रोव वन में घुसती है तो वे झूम कर हमारा इस्तकबाल करते हैं। मैंग्रोव पेड़ों/झाड़ियों के बीच लहराती हमारी नाव गंतव्य तक पहुंच जाती है लेकिन असल यात्रा अब शुरू होती है जो हरे भरे पेड़ों के बीच समुद्र के पानी को लकड़ी के पुल से पार करके पूरी होती है। यहां तक पहुँचना अपने-आप में एक रोमांचक अनुभव है क्योंकि यह रास्ता घने जंगलों, समुद्री खाड़ियों और संकरे जलमार्गों से होकर गुजरता है।

नाव से उतरने के बाद लकड़ी के पुल से होते हुए करीब एक दो किलोमीटर पैदल चलकर हम बाराटांग की विश्वप्रसिद्ध लाइमस्टोन गुफाओं तक पहुंच जाते हैं। यहां से शुरू होता है प्रकृति की कारीगरी से साक्षात्कार..पहली नजर में हो सकता है कि आपको ये गुफाएं साधारण लग सकती हैं लेकिन जैसे-जैसे हम आगे कदम दर कदम बढ़ते हैं, प्रकृति अपनी सम्पूर्ण कलाओं के साथ पूरी शिद्दत एवं भव्यता के साथ सामने आती है। कहीं मंदिर के स्तंभ दिखते हैं, कहीं मूर्ति, कई इंसान,कहीं कमल और कहीं पत्थर की जमी हुई जलधारा।

ये गुफ़ाएँ इंसान की बनाई कोई इमारत नहीं हैं बल्कि प्रकृति की सैकड़ों साल की साधना और कला का नमूना हैं। चूने के पत्थरों की यह कारीगरी प्रकृति के विभिन्न तत्वों का लाखों वर्षों का खेल है इसमें समुद्री जीवों के खोल, कोरल, कंकाल, पानी, पेड़, रासायनिक क्रियाएं सब कुछ शामिल हैं। यहां बनी आकृतियां तकनीकी शब्दावली में ‘स्टैलेकटाइट’ और ‘स्टैलेग्माइट’ कहलाती हैं। मतलब गुफा की छत से लटकते पत्थर नुमा आकार प्रकार स्टैलेकटाइट और जमीन से ऊपर उठते पत्थरों के स्तंभ स्टैलेग्माइट कहलाते हैं। 

दरअसल, लाखों वर्षों में पानी की बूँदों के साथ घुला हुआ चूना/कैल्शियम पत्थर धीरे-धीरे जमा होता रहा और समय ने इन्हें यह अद्भुत आकार दे दिए। इन गुफाओं की सबसे रोचक बात यह है कि यहाँ बनने वाली संरचनाएँ बहुत धीमी गति से विकसित होती हैं—कभी-कभी एक सेंटीमीटर बनने में सैकड़ों साल लग जाते हैं। इसलिए हर आकृति वास्तव में समय का एक जीवंत दस्तावेज है। यहाँ पहुँचकर एहसास होता है कि समुद्र के इस दूरस्थ द्वीप में प्रकृति ने केवल सुंदरता ही नहीं, बल्कि समय की अद्भुत शिल्पकला भी सहेज कर रखी है।

बारातांग की ये गुफ़ाएँ अंडमान -निकोबार द्वीप समूह की सबसे बड़ी भूमिगत गुफ़ा प्रणाली का हिस्सा हैं । इन गुफाओं का रखरखाव करने वाले वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि यहां इस तरह की करीब पौने दो सौ से ज़्यादा गुफाएं हैं लेकिन आम पर्यटक सिर्फ़ दो गुफाएं ही देख सकते हैं। बाकी गुफाएं घने जंगल में छिपी हैं। कहीं प्राकृतिक रूप से संरक्षित पक्षियों का बसेरा है तो कहीं पहुंच मार्ग नहीं है और किसी गुफा को अब तक टटोला ही नहीं गया है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझे तो लाइमस्टोन गुफाओं का निर्माण एक धीमी और जटिल रासायनिक प्रक्रिया है जो लाखों-करोड़ों वर्षों में होती है। इसे स्पेलियोजेनेसिस (speleogenesis) कहते हैं। यहां दर्ज विवरण के मुताबिक बारिश का पानी जब वायुमंडल से गुजर कर आता है, तो उसमें कार्बन डाइऑक्साइड भी घुल जाती है। यह पानी मिट्टी में मिलकर सड़ते हुए पौधों और जीवों से और भी कार्बन डाइ ऑक्साइड हासिल करके कार्बोनिक अम्ल में बदल जाता है। यह अम्ल धीरे धीरे चूने की चट्टानों को घोलता जाता है और प्रकृति की अलग अलग कलाकृतियां बनने लगती हैं लेकिन यह एक दो नहीं बल्कि लाखों सालों की रासायनिक क्रिया का नतीजा है।

बाराटांग की इन गुफाओं तक पहुँचना केवल पर्यटन नहीं बल्कि प्रकृति के साथ एक संवाद जैसा अनुभव है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह आने वाले अधिकांश लोग समुद्र तटों की ओर आकर्षित होते हैं, लेकिन जो लोग प्रकृति के रहस्यों को करीब से देखना चाहते हैं, उनके लिए बाराटांग की लाइमस्टोन गुफाएँ एक अनोखा अनुभव हैं।


सोमवार, 28 सितंबर 2026

कहां ‘भंवरा’ बन गया है करोड़ों के कारोबार का सूत्रधार..!!


गीतकार आनंद बख्शी, संगीतकार एस डी बर्मन और गायक मोहम्मद रफी और आशा भोंसले की टीम जब फिल्म ‘आराधना’ के लिए ‘गुनगुना रहे हैं भंवरे, खिल रही है कली कली..’ या फिर फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के लिए ‘भंवरा बड़ा नादान है, कलियन की मुस्कान है..’ रचते समय गीतकार शकील बदायूंनी, गायिका आशा जी और संगीतकार हेमंत कुमार ने कभी सोचा भी नहीं होगा उनके कालजयी गीत का एक किरदार कभी हकीकत भी बन जाएगा और सैकड़ों परिवारों की माली हालत बेहतर बनाने के साथ साथ पूरे इलाके में सुगंध बिखेरने का जरिया बन जाएंगे।

यह कोई कपोल कल्पना नहीं बल्कि सच्चाई है कि इन गानों को वास्तविकता में तब्दील करते हुए भँवरे ने ऐसा जादू बिखेरा है कि कली कली खिल रही है और मुस्कराकर अपनी खुशबू से देश ही नहीं विदेशों तक में जलवा दिखा रही है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं सिक्किम में भरपूर मात्रा में होने वाली बड़ी इलायची की खेती और इसमें भंवरे की महत्वपूर्ण भूमिका की। 

यहां भंवरा या भौंरा बड़ी इलायची की कहानी का एक बेहद महत्वपूर्ण किरदार है। भारत में सिक्किम बड़ी या काली इलायची का गढ़ है और देश में इसका 80 फीसदी उत्पादन इसी राज्य में होता है एवं वह भी जैविक क्योंकि सिक्किम देश का पहला सौ फीसद ऑर्गेनिक स्टेट है। यहां करीब साढ़े पांच हज़ार मीट्रिक टन बड़ी इलायची होती है। उत्तरी सिक्किम से शुरू हुई इस काली बड़ी 'ठूलो इलायची' (स्थानीय भाषा में) की यात्रा अब 23 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गई है।

अब बात भंवरे की, तो सिक्किम कृषि विभाग के अनुसार बड़ी इलायची में पॉलीनेशन मुख्य रूप से भौंरों द्वारा ही होता है। इसे नेपाली भाषा में भोमोरा, भूटिया में बूम बूमटा और लेपचा भाषा में तुंगबूम कहा जाता है। बताया जाता है कि फूलों से रस लेने के लिए जब भौंरा इन तक पहुंचता है तो उसके शरीर पर नर मादा परागकण चिपक जाते हैं और दूसरे फूल तक पहुंच जाते हैं। इस तरह फूल से फल बनने की इस प्राकृतिक प्रक्रिया में भंवरे की भूमिका बहुत बड़ी है। यहां भंवरा किसान का एक ऐसा साथी है, जिसे न मजदूरी चाहिए और न ही छुट्टी।

मजे की बात यह है कि, भंवरे की तरह मधुमक्खी सहित कई कीट बड़ी इलायची के फूलों का रसपान करने के लिए आते हैं लेकिन इसके फूलों में अंतर और अपने छोटे आकार की वजह से वे पराग कण की सफल आवाजाही का हिस्सा नहीं बन पाते और इस वजह से उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाता। भंवरे का आकार नर मादा पराग कण को मिलाने के लिए बिल्कुल सटीक है।

सिक्किम की तर्ज पर एवं यहां से मिलती जुलती परिस्थितियों वाले कुछ अन्य राज्यों में भी बड़ी इलायची की खेती के प्रयास हुए हैं लेकिन सब कुछ अनुकूल होने के बाद भी उत्पादन मन मुताबिक नहीं हुआ। बाद में, कृषि अनुसंधान से पता चला कि वहां परागकण का वाहक भंवरा नहीं था या कम संख्या में था। वैसे, अब अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में भंवरों की मौजूदगी से इसकी खेती को सफलता मिल रही है जबकि कुछ राज्यों में भंवरों की कमी से खेती सफल नहीं हुई।

शायद यह जानकर आपको भी आश्चर्य होगा कि भारत में बड़ी इलायची मानव जाति द्वारा उपयोग किए जाने वाले सबसे पुराने मसालों में से एक मानी जाती है। इसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों में छठी शताब्दी में सुश्रुत के समय से ही होता आ रहा है। इसका उपयोग यूनानी औषधियों में भी  प्राचीन समय से किया जाता रहा है।

वैसे,बड़ी इलायची सिक्किम के लिए सिर्फ मसाला नहीं है। यह राज्य की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है और 16 हजार से अधिक किसान परिवारों की आजीविका से जुड़ी हुई है। सरकार ने भी इसे राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण आधार बताया है। इस फसल की खासियत यह है कि इसे खुले मैदान की तेज धूप की बजाय पेड़ों की छांव और पहाड़ी वातावरण पसंद है। इसलिए सिक्किम में बड़ी इलायची के खेत कई बार खेत कम और जंगल का हिस्सा ज्यादा लगते हैं। बड़ी इलायची यहां केवल कृषि की कहानी नहीं, जैव-विविधता और आजीविका के रिश्ते की कहानी भी है।

सिक्किम की पहाड़ियों में पैदा हुई यह सुगंध देश की सीमाओं पर नहीं रुकती बल्कि अन्य देशों को भी अपनी सुगंध से सराबोर कर देती है। भारत बड़ी इलायची का निर्यात संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, सऊदी अरब, जापान, ब्रिटेन सहित कई देशों को करता है। मसाला बोर्ड के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 229 करोड़  रुपए से अधिक की बड़ी इलायची दुनिया को बेची। तो देखिए, कैसे एक भंवरा करोड़ों के कारोबार का जरिया बन गया वह भी चुपके चुपके।



मंगलवार, 22 सितंबर 2026

एक राज्य…जहां हर बच्चे के पास है अपना जंगल !!


क्या आपको पता है कि हमारे देश में एक प्रदेश ऐसा भी है जहां का हर बच्चा मोगली है..वही, जंगल बुक वाला मोगली। अब मोगली तो रुडयार्ड किपलिंग की कल्पना मानी जाती है लेकिन मैं जिस राज्य की बात कर रहा हूं वहां हर बच्चा अपना जंगल लेकर पैदा होता है और जैसे जैसे वह बड़ा होता है,उसका जंगल भी उसके साथ बढ़ता जाता है..खास बात है कि यह जंगल भी कोई छोटा मोटा जंगल बल्कि पूरे 108 पेड़ वाला होता है। हम कह सकते हैं कि यहां हर बच्चे का मोगली की तरह अपना जंगल है।


खैर, पहेलियाँ न बुझाते हुए सीधे इस अभिनव पहल पर आते हैं। दरअसल हमारे देश में अष्टलक्ष्मी के नाम से विख्यात पूर्वोत्तर के एक राज्य सिक्किम में यह अद्भुत पहल हुई है। वैसे, सामान्य बोलचाल में उत्तर पूर्व के आठ राज्यों में से सात को सेवन सिस्टर्स और सिक्किम को वन ब्रदर कहा जाता है..मतलब सात बहनों का इकलौता भाई। तो इस भाई यानि सिक्किम में बच्चे के जन्म को प्रकृति से जोड़कर यह अनूठी परंपरा शुरू की गई है। इसे स्थानीय भाषा में ‘मेरो रुख, मेरो संतति’ यानी मेरा पेड़, मेरी संतान कहा जाता है।


आमतौर पर,किसी घर में बच्चे के जन्म की खबर आती है तो माना जाता है कि खुशियों ने उनके दरवाजे पर दस्तक दी है। इन खुशियों में शामिल होने के लिए रिश्तेदार आते हैं, मिठाइयां बंटती हैं, बच्चे के लिए कपड़े और खिलौनों का ढेर लग जाता है लेकिन सिक्किम में बच्चे के जन्म के साथ यह अनूठी परंपरा भी जुड़ जाती है और इससे हासिल खुशी तात्कालिक न होकर सदियों तक स्मृतियों का हिस्सा बन जाती है। दरअसल, यहां हर नवजात के नाम पर 108 पेड़ लगाए जाते हैं।


यह पहल वास्तव में पौधरोपण को सरकारी अभियान की सीमा से आगे ले जाकर परिवार में पीढ़ियों की स्मृति से जोड़ देती है। सामान्यतः बच्चे के जन्म की तारीख जन्म प्रमाणपत्र में दर्ज होती है, फोटो एलबम में सुरक्षित रहती है और परिवार की यादों में बनी रहती है लेकिन सिक्किम में इस तारीख के साथ पेड़ों को भी जोड़ दिया गया है।


इस योजना का एक और दिलचस्प पहलू इसका आर्थिक पक्ष भी है। जिसके तहत हर पात्र नवजात के नाम पर सरकार द्वारा 10,800 रुपये की राशि जमा की जाती है। इस तरह एक ओर बच्चे के नाम पर प्रकृति में निवेश होता है और दूसरी ओर उसके भविष्य के लिए आर्थिक बचत की शुरुआत भी हो जाती है। जब बच्चा 18 साल का होता है तो उसके साथ 108 पेड़ भी बड़े हो जाते हैं और साथ में जमा पैसे बढ़कर करीब 40 हजार रुपए तक पहुंच जाते हैं।


इस योजना की उल्लेखनीय बात यह भी है कि 108 पेड़ लगाने के लिए यहां वन एवं पर्यावरण विभाग पौधे भी उपलब्ध कराता है और जमीन भी, तकनीकी सहायता भी देता है और मौसम के अनुरूप पौधे लगाने की सलाह भी । अब आपके दिमाग में यह सवाल आ सकता है कि ऐसे तो देश भर में लाखों पौधे लगाए जाते हैं लेकिन जीवित कितने बचते हैं? इसलिए सिक्किम में पौधों की निगरानी और रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था भी की गई है। यहां 108 पौधों का रिकॉर्ड रखने के लिए संतति दस्तावेज बनता है। इसमें लगाए गए 108 पौधों का विवरण दर्ज किया जाता है। वैसे, बच्चे का परिवार इन पेड़ों की देखभाल अपने बच्चे की ही तरह करता है।


इस अनूठी परंपरा में अब तक करीब 8 हजार बच्चे जुड़ चुके हैं और लाखों पेड़ लग चुके हैं इसलिए सिक्किम के पहाड़ भरपूर हरियाली से ढके हुए हैं। यहां यह माना जाता है कि एक बच्चे का भविष्य केवल उसके परिवार से नहीं, उस प्रकृति से भी जुड़ा है जिसमें वह बड़ा होगा।

यही वजह है कि सिक्किम जैसे पहाड़ी राज्य में जंगल केवल हरियाली नहीं हैं। वे जलस्रोतों की सुरक्षा करते हैं, मिट्टी को थामते हैं, जैव विविधता को आश्रय देते हैं, पहाड़ों के पारिस्थितिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, भरपूर ऑक्सीजन देते हैं, शुद्ध हवा, स्वच्छ वातावरण और हरा भरा परिवेश बनाते हैं। ऐसे में बच्चे के जन्म को पेड़ लगाने से जोड़ना पर्यावरण संरक्षण को परिवार की रोजमर्रा की संवेदना से जोड़ने का एक अभिनव तरीका है।

खासतौर पर, आज जब दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और घटते वन क्षेत्र की चिंता हो रही है। इसमें सुधार के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन हो रहे हैं, लक्ष्य तय किए जा रहे हैं और कार्बन उत्सर्जन कम करने की बातें हो रही हैं। ऐसे समय में सिक्किम की यह अनूठी पहल उम्मीद जगाती है कि यदि पर्यावरण को जीवन से जोड़ दिया जाए तो प्रकृति हमारे साथ साथ गुनगुनाएगी।




शनिवार, 19 सितंबर 2026

गंगटोक की सड़कों पर दौड़ता एक अनूठा संदेश..!!


यदि आप हाल ही के दिनों में सिक्किम की राजधानी गंगटोक गए हों तो यहां की सड़कों पर चलते हुए एक बात ने सहज ही आपका ध्यान आकर्षित किया होगा। पिछले हफ्ते सिक्किम की यात्रा के दौरान मुझे तो इस संदेश ने बार बार अपनी ओर खींचा। यहां तकरीबन सभी टैक्सियों और अन्य सार्वजनिक परिवहन वाहनों के पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा रहता है-“BE KIND TO ANIMALS”। 

पहली नजर में मुझे भी यह किसी स्थानीय पशु-प्रेमी संस्था का जागरूकता अभियान लगा  लेकिन करीब आठ दिन के इस प्रवास में यह वाक्य दिल-ओ-दिमाग पर इतना छा गया कि हमने इसके पीछे की कहानी पता करने का पक्का मन बना लिया। इस बारे में साथ चलने वाले ड्राइवरों, होटल स्टाफ और मेल मुलाकात के दौरान अधिकारियों से जानकारी हासिल की तो पता चला कि यह किसी एनजीओ का अभियान नहीं बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय पहल है।

दरअसल, देश भर में सड़कों को पशु पक्षियों के लिए सुरक्षित बनाने के लिए केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 25 फरवरी 2025 को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के परिवहन विभागों को सार्वजनिक परिवहन वाहनों पर पशु कल्याण से जुड़ा यह संदेश प्रदर्शित करने का निर्देश दिया था। मंत्रालय ने इस संदेश को हिंदी या संबंधित राज्य की भाषा में 1 अप्रैल 2025 से लागू करने के लिए कहा गया था।

इसके पीछे केवल पशुओं के प्रति संवेदना जगाने की भावना ही नहीं, बल्कि सड़कों पर पशुओं की सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। 

सिक्किम ने इस राष्ट्रीय पहल को अपने यहां लागू करते हुए 10 अक्टूबर 2025 को परिवहन विभाग के मोटर व्हीकल डिवीजन के माध्यम से अधिसूचना जारी की। इसके तहत राज्य में पंजीकृत सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों पर “Be Kind to Animals” संदेश प्रदर्शित करना अनिवार्य किया गया। सबसे खास बात यह है कि इस संदेश के लिए शब्दों का आकार प्रकार तक तय कर दिया ताकि यह संदेश वाहन के आगे और पीछे, स्पष्ट और आसानी से दिखाई देने वाले अक्षरों में नजर आए। अक्षरों की न्यूनतम ऊंचाई 150 मिलीमीटर यानी 15 सेंटीमीटर रखी गई है। 

सिक्किम के पहाड़ी रास्तों और घने वन क्षेत्रों के संदर्भ में इस संदेश का महत्व भी है। वैसे, राज्य सरकार के एक सड़क सुरक्षा कार्यक्रम में भी रोड किल (roadkill) यानी सड़क दुर्घटनाओं में वन्यजीवों की मृत्यु को एक महत्वपूर्ण चिंता के रूप में रेखांकित किया गया और “Be Kind to Animals” जागरूकता पहल को इसके समाधान के उपायों में शामिल किया गया।

गंगटोक में फिलहाल ट्रेन सुविधा तो हर नहीं इसलिए यहां आने जाने वाले हजारों लोगों के लिए यहां की छोटी बड़ी टैक्सियां ही एकमात्र सहारा हैं। यह संदेश वाहनों पर लिखने का फायदा यह है कि अब वाहन सिर्फ यात्री को एक जगह से दूसरी जगह नहीं ले जाते, बल्कि दिनभर पूरे रास्ते में एक विचार भी पहुंचाते हैं कि सड़क केवल इंसानों के लिए प्रकृति के अन्य जीवंत सहचरों के लिए भी है।

हम सभी जानते हैं कि पहाड़ों में सड़कें जंगलों, गांवों और वन्य जीवों के बीच से होकर गुजरती हैं। आमतौर पर मोड़ इसतरह के होते हैं कि सड़क पर जीव जंतु तो दूर सामने से आने वाले वाहन भी नजर नहीं आ पाते। ऐसे में कई बार वाहन चालक के सामने अचानक कोई कुत्ता, गाय, बंदर या वन्यजीव आ जाता है। ऐसे में एक पल की सावधानी किसी जीव की जान बचा सकती है। यह संदेश इस भावना को मजबूत बनाने का दायित्व निभा रहा है।

यही वजह है कि गंगटोक की सड़कों पर यह संदेश महज एक स्टिकर नहीं लगता बल्कि चलती हुई टैक्सियों के पीछे लिखा यह वाक्य लगातार याद दिलाता है कि विकास और यातायात की रफ्तार के बीच संवेदना के लिए भी जगह बची रहनी चाहिए। यहां “Be Kind to Animals” केवल तीन शब्दों का संदेश भर नहीं है,पहाड़ों पर इंसान और प्रकृति के रिश्तों को और मजबूत बनाने की पहल भी है।


रविवार, 30 अगस्त 2026

कुत्ते की राखी…कीमत सुनकर आप चौंक जाएंगे!

Pet Rakhi

हाल ही में कृति सेनन से जुड़े एक राखी विज्ञापन को लेकर खूब विवाद हुआ। विज्ञापन में कृति के कपड़ों से लेकर उसके कथित सांस्कृतिक संदेश तक पर बहस हुई और आखिरकार विज्ञापन वापस लेना पड़ा। लेकिन इस पूरे विवाद में पालतू जानवरों के लिए बाजार में बिक रही राखियां और उनकी कीमतों से जुड़ा दिलचस्प पहलू लगभग अनदेखा रह गया है।

सवाल यह नहीं कि कुत्ते या बिल्ली को राखी बांधनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि जिस बाजार में कभी राखी कुछ पैसों में मिल जाती थी, वहां अब पालतू जानवरों की राखी भी सैकड़ों और कुछ मामलों में हजारों रुपये की हो गई है।

मसलन, GIVA नामक जिस कंपनी के विज्ञापन पर विवाद हुआ था उसका कुत्तों और बिल्लियों के लिए राखी( Pet Collection) आपकी हमारी राखी से कई गुना महंगा है । यहां पालतू जानवर (पेट) के लिए पेंडेंट और नेकलेस लगभग 2,999 से 5,499 रुपये तक बताए जा रहे हैं। ब्रेसलेट सेट की कीमत करीब 3,699 से 8,999 रुपये तक है, जबकि पेट राखियां और दूसरी एक्सेसरीज लगभग 2,299 रुपये से शुरू होती हैं। मतलब जिस राखी को हमारी दादी-नानी के दौर में प्रेम का प्रतीक बनाने के लिए महंगी चीज की जरूरत नहीं थी, आज उसी भावना का Pet Rakhi Market एक नया बाजार तैयार हो गया है।

मौजूदा दौर में रक्षाबंधन का त्योहार जैसे-जैसे बदल रहा है, राखी भी बदल रही है। कभी भाई की कलाई पर बंधा धागा ही इस रिश्ते की सबसे बड़ी निशानी हुआ करता था। फिर इसमें चांदी, सोना, मोती और डिजाइनर राखियों का प्रवेश हुआ। अब बाजार ने एक नया रिश्ता खोज लिया है—इंसान और उसके पालतू जानवर का रिश्ता।

इस बाजार की सबसे मजेदार बात यह है कि अब पालतू कुत्ता सिर्फ ‘पालतू’ नहीं रहा। वह परिवार का सदस्य है, घर का बच्चा है और कई लोगों के लिए तो बाकायदा ‘भाई’ या ‘बहन’ भी है। इसलिए बाजार ने उसके लिए भी वही भावनाएं पैकेज कर दी हैं।

भारत का लोकप्रिय पेट केयर ब्रांड Heads Up For Tails (HUFT) इस बार भी पेट्स के लिए विशेष कलेक्शन लेकर आया था। ‘दिल का टुकड़ा’ और ‘पाव्सम भाई (Pawsome Bhai)’ जैसे नामों वाली राखियां यह बताती हैं कि बाजार अब सिर्फ उत्पाद नहीं बेच रहा, वह रिश्ते की नई भाषा भी गढ़ रहा है।

इन राखियों की शुरुआती कीमत लगभग 199 से 399 रुपये के आसपास है। साथ में पालतू जानवरों के लिए बहन और इंसानी भाई के साथ मैचिंग वाले कुर्ते और पारंपरिक कपड़े भी उपलब्ध हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अगर इंसानी भाई ने नया कुर्ता पहन लिया तो घर के ‘पॉसम भाई’ को भी वैसा ही हूबहू कुर्ता पहनाया जा सकता है।

‘पाव्सम भाई (Pawsome Bhai) शब्द की पैदाइश की कहानी भी मजेदार है। जैसे इंग्लिश में तारीफ के लिए awesome शब्द का सामान्य तौर पर इस्तेमाल होता है तो इससे समतुल्य Pawsome शब्द गढ़ किया गया। इसमें Paw का अर्थ है -कुत्ते/बिल्ली के पंजे। इसलिए “Pawsome Bhai” का अर्थ हुआ “कमाल का पंजों वाला भाई”।

कहानी अभी बाकी है..अगर आपको लगता है कि पेट राखी मतलब बस रंगीन धागा और दो-चार मोती, तो बाजार आपको गलत साबित कर देगा। डिजाइनर ब्रांड Tonoto ने हाथ से कढ़ाई वाली प्रीमियम राखियों को पेट फैशन का हिस्सा बना दिया है। ‘Tricks for Treats’, ‘Top Dog’ और ‘Bed Hog’ जैसे संदेशों वाली राखियां इसकी खासियत हैं। इनकी कीमत लगभग 500 से 800 रुपये तक बताई जाती है।

यहां रंगों का चुनाव भी सिर्फ फैशन के लिए नहीं बताया जाता। कुत्तों की रंग पहचान की क्षमता को ध्यान में रखते हुए नीले और पेस्टल रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही ये राखियां कुत्ता बिल्ली खा ले तो भी उसे कोई नुकसान नहीं होगा । इन राखियों को Chew-friendly टैग हासिल है। इसका अर्थ है कि ये राखियां पालतू जानवरों के चबाने के लिए सुरक्षित हैं।

एक फर्क यह है कि पालतू जानवरों के लिए राखी का डिजाइन इंसानों की राखी से अलग है। With All My Paw (WAMP) जैसे ब्रांड ने नेक-राखी की शैली पेश की । ‘Sock Thief’ और ‘Jigra’ जैसे नामों वाली ये राखियां गले में कॉलर की तरह पहनी जा सकती हैं। इसका एक व्यावहारिक कारण भी है। हाथ में राखी बांधने का सवाल ही नहीं, इसलिए पेट की गर्दन अब उसकी ‘कलाई’ बन गई! इनकी कीमत लगभग 799 रुपये के आसपास बताई जाती है।

बाजार को रिश्ते में निजीपन की कमी लगती है तो उसके पास उसका भी समाधान है। Ferns N Petals (FNP) जैसी गिफ्टिंग साइट्स पर पेट के नाम वाली पर्सनलाइज्ड राखियां उपलब्ध हैं। यानी ‘रॉकी’, ‘सिम्बा’, ‘लियो’ या ‘मिस्टी’—जिस नाम से आपका पालतू जानवर घर में पुकारा जाता है, वही राखी पर भी दर्ज हो सकता है। इनकी कीमत लगभग 349 से 499 रुपये के आसपास है।

दूसरी ओर Wrapinfur जैसी साइटों पर हाथ से बनी पर्ल और पॉ-प्रिंट (पंजे के डिजाइन वाली) राखियां लगभग 179 से 289 रुपये तक मिलती हैं। Supertails पर भी पेट के लिए विशेष राखियां लगभग 199 रुपये से उपलब्ध बताई जाती हैं।

जानकारों का कहना है कि भारत के शहरों में एकल परिवार की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसी तरह अकेले रहने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है और पालतू जानवरों के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी बढ़ा है। इसलिए पालतू जानवरों के लिए जन्मदिन का केक है, कपड़े हैं, जूते हैं, स्पा है, फोटोशूट है और अब रक्षाबंधन की राखी भी ।

कृति सेनन के विज्ञापन पर बहस में हमने कपड़ों को, संस्कृति को, विज्ञापन की भाषा का तो जमकर विश्लेषण कर लिया। लेकिन शायद यह नहीं देख पाए कि भारत में रिश्तों का बाजार कितनी तेजी से फैल रहा है। कल तक रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार था। आज उसमें दोस्त, चचेरे-ममेरे रिश्ते, सैनिकों को राखी, पर्यावरण के नाम पर राखी और अब पालतू जानवर भी शामिल हो रहे हैं। यह बदलाव अच्छा है या बाजारवाद की नई चाल, इस पर बहस हो सकती है लेकिन इतना तय है कि जिस घर में कुत्ता ‘घर का सदस्य’ है, वहां राखी की थाली में अब उसके लिए भी जगह बन गई है।


शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

पचास पैसे में खरीदे बच्चे,एक रुपए में रिश्ता..!!

Relationship cost 1Rs only

मां ने पापा से कहा कि 50 पचास पैसे देना ‘एक बच्चा खरीदना है।’ पापा ने भी बिना किसी ना-नुकर के पैसे दे दिए लेकिन हम सब घर के बच्चे अचंभित थे कि घर में इतने बच्चे होने के बाद भी जीजी ( हम मां को जीजी कहते हैं) बच्चा खरीद रहीं हैं!..और फिर बच्चा कोई सब्जी या बाज़ार का सामान है जो उसे खरीदना पड़ रहा है? साथ ही पापा भी कुछ नहीं कह रहे?

बात कई दशक पुरानी है लेकिन ज़ेहन में पूरी मजबूती से दर्ज है। आज जब रिश्ते अक्सर मोबाइल की स्क्रीन पर बनते और टूट जाते हैं, तब बचपन की यह घटनाएं बार-बार रिश्तों के महत्व का अहसास दिलाती हैं । यह उस दौर की बात है, जब इंसान के पास पैसे कम थे, लेकिन अपनापन बहुत था।

तो, हमारी जीजी (मां) अक्सर महज एक रुपया या पचास पैसे देकर किसी न किसी नवजात बच्चे को ‘खरीद’ लिया करती थीं। सुनने में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन इसके पीछे न कोई लालच था, न कोई सौदा और न ही बच्चों की ख़रीद फ़रोख़्त जैसा कोई मामला। यह लोकजीवन में पीढ़ियों से चली आ रही एक मान्यता थी। दरअसल, जिन परिवारों के बच्चे जन्म के बाद जीवित नहीं रह पाते थे, वे विश्वास करते थे कि यदि बच्चे को प्रतीकात्मक रूप से किसी और को बेच दिया जाए, तो उसका दुर्भाग्य पीछे छूट जाता है और वह बच्चा लंबी उम्र पाता है।

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जीजी जिन परिवारों के बच्चे खरीदती थीं उनमें पड़ोसी भी थे तो सब्जी और फल बेचने वाले भी। जीजी पचास पैसे या एक रुपया उनकी हथेली पर रख देतीं और नवजात बच्चे को गोद में ले लेती। फिर वह बच्चा वास्तविक मां को लौटा दिया जाता। न बच्चा कहीं जाता, न परिवार बदलता। बदलती थी तो बस जीने की उम्मीद। यह एक छोटा-सा टोटका था, लेकिन उसमें ढेर सारी दुआएं, विश्वास और मानवीय संवेदनाएं छिपी होती थीं।

अब यह कहना तो मुश्किल है कि यह आस्था का चमत्कार था या संयोग, लेकिन जिन बच्चों को जीजी ने इस तरह ‘खरीदा’, उनमें से अधिकांश बच गए। शायद विज्ञान इसकी कोई अलग व्याख्या करे, लेकिन गांव-मोहल्ले के लोग इसे आज भी मां के शुभ हाथों और ईश्वर की कृपा से जोड़कर देखते हैं।

इस किस्से की सबसे सुंदर बात यह है कि वह एक रुपया या पचास पैसे का रिश्ता कभी समाप्त नहीं हुआ। आज भी वे परिवार मिलते हैं, तो मां को उसी सम्मान और आत्मीयता से याद करते हैं। राखी बंधवाने/बांधने आते हैं, त्योहारों पर हालचाल पूछते हैं, शादी विवाह में मां को सबसे अहम दर्जा देते हैं, किसी सुख-दुख में सबसे पहले दरवाजा खटखटाते हैं। उनके लिए हमारी मां केवल पड़ोसन नहीं थीं, बल्कि उस बच्चे की ‘दूसरी मां’ थीं, जिसने उसे नया भाग्य दिया था।

आज के समय में जब हर चीज़ का मूल्य बाजार तय करता है, तब यह किस्से याद दिलाते हैं कि कुछ रिश्तों की कीमत कभी पैसों से नहीं लगती। यहां पचास पैसे में बच्चा नहीं खरीदा गया था, बल्कि विश्वास खरीदा गया था; अपनापन खरीदा गया था और सबसे बढ़कर इंसानियत को जीवित रखने की कोशिश थी।


हमारे समाज में उस समय ऐसे न जाने कितने छोटे-छोटे लोकाचार थे, जो किसी धर्मग्रंथ में नहीं लिखे गए, लेकिन लोगों के दिलों में बसे रहे। तब किसी के घर बच्चा जन्म लेता था तो पूरा मोहल्ला उसकी सलामती की दुआ करता था। कोई काला टीका लगा देता था, कोई पुराने कपड़े पहनाने की सलाह देता था, कोई मंदिर में प्रसाद चढ़ाता था और कोई एक रुपये के प्रतीकात्मक लेन-देन से मृत्यु के भय को मात देने का विश्वास जगा जाता था। आज भी कई घरों में दादी/नानी के बहुमूल्य बक्सों में बच्चों के पुराने कपड़े नए कपड़ों की तरह सुरक्षित मिल जाएंगे जो पीढ़ी दर पीढ़ी नए बच्चों को पहनाये जाते रहे हैं।

शायद इन मान्यताओं की वैज्ञानिक पुष्टि कभी न हो सके, लेकिन इनके भीतर छिपी मानवीय संवेदना पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। वे कर्मकांड कम और एक-दूसरे के जीवन में उम्मीद बोने के छोटे-छोटे प्रयास अधिक थे। इन सबके केंद्र में एक ही भावना थी कि किसी के घर का चिराग बुझने न पाए। वैसे भी, तब बच्चे कई आंगनों में, कई दादी/मौसी/चाची की देखरेख में पलते थे।

आज हम तकनीक से समृद्ध हैं, लेकिन रिश्तों में कहीं न कहीं दरारें भी बढ़ी हैं। अब तो हमें पड़ोसी का नाम तक नहीं पता होता। हमारे बाद की तमाम पीढ़ियां रिश्तों के लिहाज़ से गरीब होती जा रही हैं। ताऊ,ताई, चाचा, मामा, मौसी, मामी,चाची बुआ जैसे महत्वपूर्ण रिश्ते अंकल आंटी में सिमटकर रह गए हैं।

आज जब जीवन के पन्ने पलटकर देखता हूं, तो महसूस होता है कि मां ने कभी बच्चे नहीं खरीदे थे। उन्होंने तो केवल लोगों की उम्मीदों को अपने आंचल में जगह दी थी और ऐसे ही छोटे-छोटे सद्भाव, विश्वास और आत्मीयता के धागों से उस समय का समाज बुना गया था। इसलिए वे रिश्ते आज भी उतने ही खरे एवं मजबूत हैं, जितने उस दिन थे। आखिर हों भी क्यों न, एक मां ने दूसरी मां की आंखों में जीने की नई उम्मीद जो जगा दी थी।

शायद, जेन ज़ी और उसके बाद की पीढ़ियां इस पर विश्वास न करें। उन्हें यह कहानी जैसी लगे लेकिन जिन्होंने उस दौर को जिया है, वे जानते हैं कि उस समय लोगों की सबसे बड़ी पूंजी पैसा नहीं, एक-दूसरे के लिए धड़कता हुआ दिल था।

यदि हम चाहें और आगे बढ़कर प्रयास करें तो उस दौर की आत्मीयता, पड़ोस का अपनापन और किसी अनजान बच्चे के लिए भी मन से निकली दुआ आज भी हमारी सबसे बड़ी सामाजिक संपत्ति हो सकती है क्योंकि समाज कानूनों से नहीं, ऐसे ही अनमोल रिश्तों से जीवित रहता है।


मंगलवार, 18 अगस्त 2026

सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!


Commonwealth games

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है:

"जन-गण-मन..."

यह ऐसा अद्भुत अवसर है जब न तो खिलाड़ी कुछ बोल पाता है और न ही दर्शक। शब्द जैसे कहीं खो जाते हैं। केवल आँखें बोलती हैं कभी चमककर तो कभी बरसकर। खिलाड़ी की पलकों पर वर्षों का संघर्ष ठहर जाता है और दर्शकों की आँखों में गर्व उतर आता है। राष्ट्रगान के हर स्वर के साथ तिरंगा थोड़ा-थोड़ा ऊपर जाता है और लगता है मानो पूरे देश का सिर ऊँचा हो रहा हो।

यही वह क्षण है जिसके लिए कोई खिलाड़ी ताउम्र सुबह अँधेरे में उठकर अभ्यास करता है। यही वह क्षण है जिसके लिए वह अपने जन्मदिन, त्योहार, परिवार की खुशियाँ, दोस्तों की महफ़िलें और जीवन की अनगिनत सहज इच्छाएँ छोड़ देता है। स्वर्ण पदक धातु का एक छोटा-सा टुकड़ा भर नहीं होता, उसके पीछे पसीने की अनगिनत बूंदें, चोटों के अनगिनत निशान, परिवारों का अनथक संघर्ष और हार के बाद भी फिर से उठ खड़े होने का साहस छिपा होता है।

स्टेडियम में हजारों लोग बैठे हैं। कैमरे दुनिया के करोड़ों घरों तक उस दृश्य को पहुँचा रहे हैं। पोडियम पर कभी तीन तो कभी चार खिलाड़ी खड़े हैं। तीसरे स्थान वाला कांस्य पदक लेकर मुस्कुरा रहा है। दूसरे स्थान वाला रजत पदक को गौर से देख रहा है। लेकिन सबसे ऊपर खड़ा खिलाड़ी स्थिर है। उसकी आँखें सामने लगी हैं। तभी उद्घोषणा होती है— "Gold Medal… India!"


राष्ट्रमंडल या किसी भी अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत का हर खिलाड़ी केवल अपने नाम के लिए नहीं खेलता। उसकी जर्सी पर लिखा इंडिया उसे हर क्षण याद दिलाता है कि अब उसकी जीत या हार निजी नहीं रही। उसके कंधों पर 140 करोड़ भारतीयों की उम्मीदें हैं।

मुक्केबाजी में स्वर्णिम सफलता पाने वाले सचिन सिवाच ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराना सबसे बड़ा गर्व का क्षण है । जबकि पैरा-एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक विजेता दिलप गवित उनके और देश के लिए एक अविश्वसनीय पल है तो भाला फेंक के स्टार खिलाड़ी नीरज चोपड़ा पोडियम पर खड़े होकर अपने देश का राष्ट्रगान सुनना हमेशा से एक अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव होता है।

जब कोई भारतीय खिलाड़ी मैदान में उतरता है तो उसके साथ उसके गाँव की मिट्टी भी उतरती है, उसकी माँ की दुआ भी, पिता का संघर्ष भी और उस कोच का विश्वास भी जिसने शायद वर्षों तक बिना किसी अपेक्षा के उसे तराशा है। तभी तो मुक्केबाजी में जौहर दिखाने वाली प्रीति पवार और साक्षी चौधरी ने अपनी सफलता का श्रेय देशवासियों के अपार समर्थन को दिया।


हालांकि, दुनिया केवल अंतिम परिणाम देखती है। लेकिन खिलाड़ी उस परिणाम के पीछे की पूरी यात्रा जी चुका होता है। किसी ने रेलवे स्टेशन पर रातें बिताई हैं, किसी ने उधार के जूते पहनकर अभ्यास किया है, किसी ने आर्थिक तंगी के बावजूद सपनों को टूटने नहीं दिया। किसी ने गंभीर चोट के बाद डॉक्टरों की सलाह के विपरीत नहीं, बल्कि चिकित्सा और अनुशासन के सहारे स्वयं को फिर से तैयार किया। किसी ने अपने परिवार से महीनों दूरी बनाई ताकि लक्ष्य पर पूरा ध्यान दे सके।

जब ऐसा खिलाड़ी पोडियम पर खड़ा होता है तो उसकी आँखों से गिरने वाला हर आँसू एक कहानी कहता है।कई लोग सोचते हैं कि स्वर्ण जीतने के बाद खिलाड़ी आखिर रोता क्यों है?वह इसलिए नहीं रोता कि उसने पदक जीत लिया। वह इसलिए रोता है क्योंकि उसे याद आ जाता है कि इस एक पल तक पहुँचने के लिए उसने क्या-क्या खोया है। उसे वह माँ याद आती है जिसने अपनी ज़रूरतें टालकर उसके लिए बेहतर आहार जुटाया। वह पिता याद आते हैं जिन्होंने शायद अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा खेल पर खर्च किया। उसे वह कोच याद आता है जिसने हार के बाद भी कहा था कि "एक दिन तुम देश के लिए पदक जीतोगे।" राष्ट्रगान बजते ही ये सारी यादें एक साथ उमड़ पड़ती हैं और तभी आँसू अपने आप निकल आते हैं।


2026 के राष्ट्रमंडल खेलों ने भारतीय खेल इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय लिख दिया । भारत ने पिछले कई संस्करणों में कुश्ती, मुक्केबाज़ी, बैडमिंटन, भारोत्तोलन, निशानेबाज़ी, टेबल टेनिस, हॉकी, स्क्वैश, एथलेटिक्स और पैरा खेलों सहित अनेक क्षेत्रों में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। इस बार इनमें से कई खेल राष्ट्रमंडल खेलों का हिस्सा नहीं थे लेकिन भारतीय खिलाड़ियों ने अन्य खेलों में जोरदार प्रदर्शन से इनकी कमी पूरी कर दी। हालांकि, पदकों की संख्या से भी अधिक महत्वपूर्ण भारतीय खिलाड़ियों का जज़्बा जिसके साथ उन्होंने हर मुकाबले में पूरा दमखम दिखाया।

हमेशा की तरह इस बार भी करोड़ों भारतीयों की निगाहें उन खिलाड़ियों पर थीं जो वर्षों की तैयारी के बाद मैदान में उतरे लेकिन इतिहास केवल स्वर्ण पदकों से नहीं बनता, इतिहास उन खिलाड़ियों से भी बनता है जो हार के बाद भी अंत तक लड़ते हैं। कभी-कभी चौथे स्थान पर रहने वाला खिलाड़ी भी उतनी ही प्रेरणा देता है जितना स्वर्ण जीतने वाला। तभी तो भारोत्तोलन में स्वर्ण पदक जीतने वाली मीराबाई चानू ने कहा कि यह पल उनके लिए बेहद खास है और वे इस लय को आगे भी जारी रखना चाहेंगी।


राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान भारत में एक अलग ही माहौल बन जाता है। सुबह जल्दी उठकर लोग मोबाइल पर स्कोर देखने लगते हैं। कार्यालयों में काम के बीच लाइव अपडेट चलते रहते हैं। स्कूलों में बच्चे एक दूसरे से पूछते हैं कि आज कितने मेडल आए?" घरों में लोग टीवी के सामने बैठे रहते हैं। माँ मंदिर में दीपक जलाकर खिलाड़ी की जीत की प्रार्थना करती है। पिता बार-बार चैनल बदलकर प्रतियोगिता का समय देखते हैं। बच्चे सोशल मीडिया पर हर जीत का जश्न मनाते हैं।

और जब राष्ट्रगान बजता है तो पूरा घर स्वतः शांत हो जाता है। उस समय किसी की जाति नहीं होती, किसी का धर्म नहीं होता, कोई राजनीतिक मतभेद नहीं होता। केवल एक पहचान होती है:भारतीय।

हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा हवा में लहरता हुआ केवल तीन रंगों का एक झंडा नहीं है। यह उन सैनिकों के बलिदान की स्मृति है जिन्होंने सीमाओं पर प्राण दिए। यह उन वैज्ञानिकों की मेहनत का सम्मान है जिन्होंने भारत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। यह उन किसानों के श्रम का प्रतीक है जिनकी मेहनत देश को भोजन देती है। यह उन शिक्षकों की तपस्या का परिणाम है जिन्होंने बच्चों को सपने देखना सिखाया…और जब कोई खिलाड़ी इस तिरंगे को सबसे ऊपर पहुँचाता है, तब वह केवल खेल नहीं जीतता, वह करोड़ों भारतीयों के आत्मविश्वास को भी ऊँचा उठा देता है।

यह भी सच है कि हर पदक के पीछे केवल खिलाड़ी नहीं होता। उसके पीछे फिजियोथेरेपिस्ट, डॉक्टर, न्यूट्रिशनिस्ट, मनोवैज्ञानिक, प्रशिक्षक, ग्राउंड स्टाफ, उपकरण तैयार करने वाले कर्मचारी, खेल संघों के अनेक लोग और सबसे बढ़कर परिवार का त्याग होता है। हम अक्सर कैमरे में केवल पदक देखते हैं, लेकिन उस पदक पर सैकड़ों लोगों की मेहनत की चमक होती है।

इसी तरह यह भी कड़वी सच्चाई है कि हर खिलाड़ी पदक नहीं जीत पाया। कुछ खिलाड़ी पहले दौर में बाहर हो गए। कुछ फाइनल तक पहुँचकर भी हार गए लेकिन खेल हमें यही सिखाता है कि हार अंतिम सत्य नहीं होती। भारतीय खिलाड़ी बार-बार यह साबित कर चुके हैं कि असफलता उन्हें तोड़ती नहीं, बल्कि और मजबूत बनाती है। आज जो खिलाड़ी हारकर लौटा है, वही अगले संस्करण में जीत का नया इतिहास लिख सकता है।

चाहे राष्ट्रमंडल खेल हों या कोई और मुकाबला..इएन स्वर्ण पदक सबसे बड़ा पुरस्कार नहीं है। सबसे बड़ा पुरस्कार वह सम्मान है जो किसी खिलाड़ी को तब मिलता है जब कोई छोटा बच्चा उसे देखकर कहता है कि मैं भी बड़ा होकर भारत के लिए खेलूँगा। यही प्रेरणा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है। इसी प्रेरणा से नए चैंपियन जन्म लेते हैं।

आज भारत में खेलों को लेकर सोच बदल रही है। छोटे शहरों और गाँवों से निकलकर खिलाड़ी विश्व मंच पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। बेटियाँ भी हर क्षेत्र में नए कीर्तिमान बना रही हैं। खेल अब केवल शौक नहीं, राष्ट्रीय आत्मविश्वास का माध्यम बनते जा रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेल 2026 में मिली सफलता इस परिवर्तन की एक और सशक्त तस्वीर हैं । 

(तस्वीर AI से बनाई है और इस पोस्ट पर ध्यान खींचने के लिए है।)



शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

हिमाचल की पर्वत चोटियों पर राष्ट्रीय ध्वज की अनूठी उड़ान।

#Dron #तिरंगा #Tiranga

हिमाचल प्रदेश में कभी डाकिया पहाड़ों की पगडंडियों पर चिट्ठियों का थैला कंधे पर लादकर चलता था। तब किसी गांव में महीनों बाद बेटे की चिट्ठी पहुंचती थी तो किसी घर में शहर से हफ्तों पहले चला मनीऑर्डर कई दिन बाद चेहरे पर मुस्कान ला पाता था लेकिन इस साल 14 अगस्त को हिमाचल की पहाड़ियों में कुछ ऐसा हुआ, जिसने डाक विभाग और आसमान के रिश्ते को एक नया अर्थ दे दिया।

हिमाचल के मंडी के प्रधान डाकघर से एक ड्रोन ने ऐतिहासिक उड़ान भरी। ऐतिहासिक इसलिए क्योंकि इस उड़ान में कोई साधारण पार्सल नहीं था बल्कि उसमें था- भारत का गौरव, देश की आन-बान-शान तिरंगा..और उसकी मंजिल थी मंडी का रेहड़ाधार डाकघर। यह भारत में पहली बार था, जब इंडिया पोस्ट ने ड्रोन के जरिए तिरंगे की डिलीवरी की।

मंडी प्रधान डाकघर से ड्रोन ने जैसे ही उड़ान भरी, मानो डाक विभाग के पुराने लाल डिब्बों और चिट्ठियों की दुनिया ने डिजिटल युग में एक नई करवट ले ली। ड्रोन जब रेहड़ाधार पहुंचा तो वहां डाक विभाग की टीम पहले से इंतजार कर रही थी। उसने तिरंगे का पार्सल प्राप्त किया और फिर उसे एक पूर्व सैनिक भारतीय सेना से सेवानिवृत्त पूर्व मानद सूबेदार मेजर करतार सिंह को सौंपा गया। इस ऐतिहासिक सफ़र के बाद तिरंगे का एक सैनिक के हाथों पहुंचना इस पूरी कहानी को और भावुक बना गया। एक तरफ देश की सीमाओं की रक्षा करने वाला पूर्व सैनिक और दूसरी तरफ देश की दूर-दराज की बस्तियों तक सेवा पहुंचाने वाला डाक विभाग, दोनों एक ही तिरंगे के नीचे जैसे एक कहानी के दो अध्याय बन गए। सही मायनों में डाक सेवा के लिए यह पगडंडी से आसमान तक की अनूठी यात्रा थी।

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स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हुई यह उड़ान महज कुछ किलोमीटर की तकनीकी यात्रा नहीं थी बल्कि यह उस सोच की उड़ान थी, जिसमें पहाड़ों की मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों को तकनीक के सहारे पार करने का संकल्प दिखाई देता है। केंद्रीय संचार एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य एम सिंधिया ने इस ऐतिहासिक पहल का वर्चुअल उद्घाटन किया। 

हम सभी जानते हैं कि ड्रोन कठिन पहाड़ी रास्तों, सड़क की दूरी और परिवहन संबंधी चुनौतियों को पार करते हुए सीधे अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में ड्रोन आधारित डाक परिवहन की संभावनाएं विशेष महत्व रखती हैं। हिमाचल प्रदेश में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां सड़कें लंबी, रास्ते कठिन और मौसम चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में ड्रोन तकनीक डाक और सार्वजनिक सेवाओं की अंतिम छोर तक पहुंच को आसान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

जानकारी के मुताबिक, डाक विभाग ने हिमाचल प्रदेश और असम में 150 चिन्हित मार्गों पर ड्रोन आधारित डाक परिवहन शुरू करने की योजना बनाई है। यह केवल डाक पहुंचाने की तकनीक नहीं है। भविष्य में यही तकनीक उन इलाकों में समय और संसाधन बचाने का माध्यम बन सकती है, जहां सड़क मार्ग से पहुंचने में अधिक समय लगता है।

वैसे भी, इंडिया पोस्ट की पहचान अब सिर्फ चिट्ठियों और डाक टिकटों तक सीमित नहीं रही है। देश के दूर-दराज के इलाकों में उसकी मौजूदगी लंबे समय से जनसेवा का महत्वपूर्ण माध्यम है। अब उसी ‘डाक सेवा, जन सेवा’ की भावना को ड्रोन तकनीक ने नए पंख लगा दिए हैं।


इस पहल की सबसे खूबसूरत तस्वीर यह है कि जिस तिरंगे को हम स्वतंत्रता दिवस पर अपने घरों की छतों पर लहराते देखते हैं, वही तिरंगा ‘हर दिल तिरंगा, हर घर तिरंगा’ की भावना के अनुरूप इस बार हिमाचल की पहाड़ियों के ऊपर से उड़ता हुआ डाकघर तक पहुंचा। मंडी से रेहड़ाधार की यह उड़ान इसलिए भी याद रखी जाएगी क्योंकि इसमें तीन चीजें एक साथ दिखाई दीं-तिरंगा, तकनीक और त्वरित सेवा।

एक तरफ 150 साल की ‘वंदे मातरम्’ की विरासत का स्मरण, दूसरी तरफ विकसित भारत का तकनीकी सपना और बीच में हिमाचल की पहाड़ियों के ऊपर उड़ता हुआ तिरंगा..इसीलिए यह सिर्फ ड्रोन की उड़ान नहीं थी बल्कि यह उस भारत की उड़ान थी, जो अपनी विरासत को सीने से लगाकर तकनीक के पंखों पर भविष्य की नई इबारत लिख रहा है।

#drone #tricolour #तिरंगा #tiranga #postal #डाक विभाग @highlight @everyone

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

उल्टे हाथ वालों का अपना एक दिन

 

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आज 13 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय बाएं हाथ वालों का दिवस है यानी हम जैसे लोगों का दिन, जो दुनिया के बहुमत से थोड़ा अलग हैं। 😊

दुनिया हमें Left Handed कहती है और हिंदी में कभी-कभी बड़े मजेदार अंदाज़ में ‘उल्टे हाथ से काम करने वाला’ भी 😄

खैर, नाम जो भी हो, हर साल 13 अगस्त को दुनिया के लगभग 10 प्रतिशत लोगों को यह याद दिलाने के लिए यह दिन मनाया जाता है कि वे संख्या में भले कम हों, लेकिन अपनी अलग पहचान रखते हैं।

और यह कोई छोटी-मोटी सूची नहीं है। इतिहास और दुनिया की मशहूर हस्तियों में कई नाम बाएं हाथ वालों के रहे हैं—जॉन ऑफ आर्क, लियोनार्डो दा विंची, माइकल एंजेलो, जूलियस सीजर, नेपोलियन बोनापार्ट, फिदेल कास्त्रो, लुईस कैरोल, हेनरी फोर्ड, नील आर्मस्ट्रांग, एच. जी. वेल्स, अल्बर्ट आइंस्टीन, सर पॉल मैकार्टनी, चार्ली चैपलिन और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा तक।

भारत में भी बाएं हाथ वालों की अपनी पूरी ‘ऑल स्टार टीम’ है—अमिताभ बच्चन, रजनीकांत, सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, ज्वाला गुट्टा, लक्ष्मी मित्तल, मैरी कॉम और रतन टाटा जैसे दिग्गजों के नाम इस सूची में शामिल किए जाते हैं। महात्मा गांधी भी कई बार बाएं हाथ से लिखते थे। वैसे वे दोनों हाथों से लिखने में सक्षम थे।

लेफ्ट हैंडर्स को लेकर हुए कई अध्ययनों ने उनके बारे में रोचक बातें सामने रखी हैं। हालांकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर बाएं हाथ वाले व्यक्ति में ये खूबियां होना वैज्ञानिक रूप से तय नहीं है। फिर भी शोधों में सामने आए कुछ पैटर्न दिलचस्प जरूर हैं।

मसलन, रचनात्मकता और कल्पनाशक्ति की बात हो तो बाएं हाथ वालों का नाम अक्सर चर्चा में आता है। कला, संगीत, डिजाइन और नए ढंग से सोचने जैसे क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी भी खूब दिखाई देती है। शायद इसलिए बाएं हाथ वालों को देखकर कभी-कभी लगता है कि वे चीजों को थोड़ा अलग एंगल से देखते हैं—आखिर बचपन से ही उन्हें दुनिया को दूसरे हाथ से पकड़ने की आदत जो है!

मल्टीटास्किंग को लेकर भी लेफ्ट और राइट हैंडर्स पर शोध हुए हैं और कुछ अध्ययनों में बाएं हाथ वालों की अलग-अलग कामों को संभालने की क्षमता को बेहतर बताया गया है।

रिश्तों के मामले में भी एक दिलचस्प बात कही जाती है। बाएं हाथ वाले लोग अपने करीबी रिश्तों और दोस्ती में पूरी शिद्दत से निवेश करते हैं और बदले में वैसी ही संवेदनशीलता की अपेक्षा रखते हैं। वे सामने वाले को समझें, उसका ख्याल रखें और जरूरत के समय साथ खड़े हों तो चाहते हैं कि सामने वाला भी उनके लिए वैसा ही हो।

शायद इसी वजह से जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं तो उन्हें चोट भी कुछ ज्यादा लगती है। यानी दिल भी थोड़ा ‘लेफ्ट’ है और उम्मीदें भी! 😊

Lefty, left handers
भाषा और संवाद को लेकर भी कुछ शोधों में बाएं हाथ वालों के मस्तिष्क में भाषा से जुड़े दोनों हिस्सों की अपेक्षाकृत अधिक भागीदारी की बात सामने आई है और हां, एलर्जी जैसी स्वास्थ्य संबंधी कुछ चीजों को लेकर भी शोध हुए हैं, जिनमें बाएं हाथ वालों में कुछ जोखिमों की चर्चा मिलती है।

यह दावा सोशल मीडिया पर खूब घूमता है कि बाएं हाथ वालों का IQ दाएं हाथ वालों से अधिक होता है। यानी अगर आप लेफ्ट हैंडर हैं तो खुशी मनाइए! 😄

दुनिया की आबादी में लगभग 10 प्रतिशत लोग बाएं हाथ से काम करते हैं, हालांकि अलग-अलग अध्ययनों और परिभाषाओं के कारण आंकड़ों में अंतर मिलता है। भारत में भी यह संख्या करोड़ों में है। यदि लगभग 10 प्रतिशत का अनुमान लिया जाए तो भारतीय आबादी में 10 करोड़ से अधिक लोग बाएं हाथ वाले हो सकते हैं। यानी हम अल्पसंख्यक जरूर हैं, लेकिन इतने भी कम नहीं कि हमें नजरअंदाज किया जा सके।

वैसे असली परेशानी तो तब होती है जब स्कूल में बेंच ऐसी हो जिस पर दाएं हाथ से लिखने वाले के लिए सब कुछ बिल्कुल सही और हमारे लिए बिल्कुल उल्टा हो! कैंची उठाइए तो वह दाएं हाथ वालों की, डेस्क पर बैठिए तो वह दाएं हाथ वालों की, लिखिए और खाइये तो भी बगल में सीधे हाथ वाले की कोहनी से टकराइए 😄

बाएं हाथ वालों को समर्पित अंतरराष्ट्रीय दिवस की शुरुआत 1976 में Left Handers International Inc. के संस्थापक डीन आर. कैंपबेल से जोड़ी जाती है। इसका उद्देश्य सिर्फ बाएं हाथ से काम करने वालों का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि ऐसी दुनिया के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी है जो अक्सर अनजाने में दाएं हाथ वालों को ध्यान में रखकर डिजाइन की जाती है। इसलिए आज के दिन सभी लेफ्ट हैंडर्स को दिल से सलाम।

आपका हमारा हाथ जरूर उल्टा हो सकता है, लेकिन कहानी दुनिया के बाकी लोगों की तरह बिल्कुल सीधी है😆😆।


#InternationalLeftHandersDay  #lefthandersday #lefty @highlight @everyone

रविवार, 9 अगस्त 2026

बंगाल की ‘लुची’ हिमाचल के मंडी में आकर कैसे बन गई आवारा ?

 

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बंगाल की लज़ीज़ ‘लुची-चना’ वाली लुची हिमाचल प्रदेश के मंडी में आकर आवारा कैसे हो गई? या दूसरे शब्दों में कहें तो संस्कारी बंगाल की सफेद झक गोल मटोल गर्व से फूली लुची ने मंडी आकर कैसे चरित्र बदल लिया। इसके पीछे बहुत दिलचस्प कहानी है लेकिन लुची के चरित्र चित्रण से इससे पहले यह जान लेते हैं कि बंगाल के स्वाद की पहचान लुची क़रीब 2000 किलोमीटर का सफ़र तय कर हिमालय की बर्फ़ से ढकी चोटियों को पार करते हुए मंडी तक कैसे आ गई। कहां समंदर से सटा बंगाल और कहां ऊंचे ऊंचे पर्वतों से भरा पूरा हिमाचल। अरे हाँ, लुची से अनजान, खासकर बंगाल एवं हिमाचल से बाहर के लोगों की जानकारी के लिए लुची को बाकी राज्यों में पूरी/पूड़ी/पुड़ी/बुंदेलखंड में लुचई के नाम से भी जानते हैं..वही, हलवा के साथ वाली पूड़ी।


मंडी में लुची की कहानी की शुरुआत ब्रिटिश काल से होती है। बताया जाता है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब अंग्रेजों ने जोगिंदरनगर तक रेल लाइन बिछाई और मंडी व्यापारिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बना, तब बंगाल से बड़ी संख्या में इंजीनियर, कर्मचारी और व्यापारी यहां पहुंचे। उनके साथ बंगाल का लोकप्रिय व्यंजन लुची और चने की सब्जी भी आया। समय के साथ स्थानीय हलवाइयों ने इसे अपने स्वाद के अनुरूप ढाल लिया। धीरे-धीरे यह व्यंजन इतना लोकप्रिय हुआ कि आज मंडी में सांस्कृतिक समन्वय का स्वाद बन गया है।


हालांकि, कुछ लोग इसे और भी पहले सेन वंश के राजाओं के बंगाल से हिमाचल पहुंचने और फिर मंडी रियासत की स्थापना से जोड़कर देखते हैं। उनका मानना है कि राज परिवार के साथ आए दल बल में शामिल रसोइयों ने लुची चना को यहां तक पहुंचाया। बंगाल से विस्थापित होकर आए सेन वंश के राजाओं ने 13वीं सदी में मंडी और सुकेत की नींव रखी। इस वंश के राजा अजबर सेन ने 1527 ईस्वी में वर्तमान मंडी शहर की स्थापना और मंडी के आराध्य भोलेनाथ के सुप्रसिद्ध भूतनाथ मंदिर की स्थापना की थी। वैसे, राज परिवार की बजाए ब्रिटिश काल में बंगाल से आए लोगों के साथ लुची के यहां तक पहुंचने की कहानी ज्यादा तथ्यपरक लगती है।


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खैर, लुची बंगाल से न केवल मंडी आ गई बल्कि समय के साथ यह मंडयाली व्यंजनों के साथ यहां की बोली में भी रच-बस गई । यहीं से शुरू हुई लुची के आवारा होने मतलब नाम बदलकर ‘लुच्ची’ बनने की कहानी। हम सभी जानते हैं कि हिंदी में लुच्ची शब्द लुच्चा के स्त्रीलिंग के रूप में इस्तेमाल होता है और इसका अर्थ चरित्रहीन व्यक्ति, आवारा, दुष्ट या शरारती व्यक्ति होता है इसलिए मैंने स्वादिष्ट नरम मुलायम लुच्ची को आवारा लिखा है। हालांकि, यह तो हुई हंसी मजाक की बात।

असलियत यह है कि पहाड़ी बोलियों में व्यंजन को कई बार ज़ोर देकर एवं दो बार बोला जाता है। इसी कारण ‘लुची’ का उच्चारण धीरे-धीरे ‘लुच्ची’ हो गया। यह कोई आधिकारिक नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि बोलचाल की स्वाभाविक भाषाई प्रक्रिया से आया बदलाव है । इसलिए, मंडी में भी लुच्ची का अर्थ मैदे से बनी पूड़ी ही है जैसे बंगाल में । बस, लुच्ची बंगाल की लुची का स्थानीय उच्चारण है और इसका कोई नकारात्मक अर्थ नहीं है।


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लुची ने हिमाचल आकर नाम ही नहीं बदला बल्कि आकार प्रकार में भी स्थानीय रूप रख लिया। मसलन बंगाल की लुची छोटी और फूली होती है तो मंडी की लुच्ची सामान्य तौर पर रुमाली रोटी की तरह की पुड़ी जैसी हो गई है। इसका कारण मौसमीय परिस्थितियां भी हैं। हिमाचल में ठंड ज्यादा होने के कारण इन्हें बार बार गरम करने की जरूरत पड़ती है और बदला रूप तवे पर आराम से गरम किया जा सकता है जबकि फूली हुई लुची को दोबारा तेल/घी में तलना पड़ेगा।

आज मंडी में लुच्ची-चना केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। बंगाल की लुची चना स्थानीय स्वाद, मसाले, आकार प्रकार और मंडयाली उच्चारण के साथ इतना घुल-मिल गया है कि उसका नया नाम ही उसकी पहचान बन गया है और रही स्वाद की बात तो वह लुची, लुच्ची और पुड़ी किसी में कम नहीं है। इसलिए, बेफ़िक्र होकर खाइए..बंगाल की लुची हो या मंडी की लुच्ची..स्वाद वैसा ही आयेगा।



शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

हॉस्टल ने दी जिंदगी जीने की डिग्री..!!

jugaali.blogspot.com

कुछ जगहें जिंदगी में ऐसी होती हैं, जहां हम पढ़ने जाते हैं, लेकिन लौटते समय पता चलता है कि वहां हमने विषयों से ज्यादा जिंदगी पढ़ी है। शासकीय मॉडल विज्ञान महाविद्यालय, जबलपुर (अब स्वशासी भी) के अशोक और विक्रम छात्रावास मेरे लिए ऐसी ही जगह थे। मेरे पहले के छात्र हमारे कॉलेज को रॉबर्टसन कॉलेज के नाम से जानते थे।

कॉलेज में विज्ञान की पढ़ाई तो हुई ही, लेकिन असली प्रयोगशाला शायद हॉस्टल था। यहां प्रयोग किताबों में नहीं, जिंदगी में होते थे। यहां दोस्ती का रसायन था, अनुशासन का गणित था, आत्मनिर्भरता का भौतिक विज्ञान था और भावनाओं की अपनी जीवविज्ञान।


घर से हॉस्टल आना मेरे लिए एक तरह से जिंदगी के दूसरे अध्याय में प्रवेश था। घर में मां-बाप और परिवार का सुरक्षा कवच था। यहां अपना बिस्तर भी खुद संभालना था, कपड़े भी और महीने भर के खर्च का हिसाब भी। गांव-कस्बों से आए हम जैसे कई लड़कों के लिए तो जबलपुर की दुनिया बिल्कुल नई थी। शहर की चहल-पहल, कॉलेज का माहौल, नए चेहरे और सबसे बढ़कर घर से दूर अपने दम पर जीना।


शुरुआत में हम सबके बीच झिझक थी। कौन कहां का है, किसका स्वभाव कैसा है, किससे दोस्ती होगी जैसे कई सवाल मन में थे। फिर सीनियर्स सामने आए और परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उस दौर की रैगिंग भी नए लड़कों की झिझक तोड़ने का एक अनौपचारिक तरीका थी। फिर चाहे खुले मैदान में देर रात की नागा एक्सप्रेस ट्रेन बनाना हो या टंकी में डुबकी या अपना अनूठा परिचय देना, कुछ रोचक बातें बताना, कभी अपनी प्रतिभा दिखाना.. इन सबने अनजान चेहरों को धीरे-धीरे परिचित बना दिया।


Sanjeev Sharma /hostel

और फिर शुरू हुई हॉस्टल की असल जिंदगी।


जेब में पैसे हमेशा सीमित होते थे। कहने को हम कॉलेज के छात्र थे, लेकिन महीने के आखिरी दिनों में हमारी आर्थिक स्थिति किसी छोटे-मोटे वित्त मंत्री से कम चुनौतीपूर्ण नहीं होती थी। ऐसी ही ‘कड़की’ के दिनों में सीनियर्स की ओर से सामूहिक समोसे और चाय की पार्टी झटक लेते थे तो लगता था जैसे कोई बड़ी लॉटरी लग गई हो। दो समोसे और एक कप चाय भी उस समय रईसी का ऐसा स्वाद देते थे, जिसे आज किसी महंगे रेस्तरां में बैठकर भी महसूस नहीं किया जा सकता।


लेकिन हॉस्टल का चक्र भी बड़ा दिलचस्प होता है। कल तक जो सीनियर हमें समोसे खिलाकर अपना ‘स्नेह’ दिखा रहे थे, कुछ समय बाद हम खुद सीनियर बन गए तो फिर वही परंपरा हमारे सामने थी। जेब भले कहती रही कि भाई, थोड़ा रहम करो, लेकिन हॉस्टल की परंपरा कहती थी—अब तुम्हारी बारी है! तब पता चलता था कि सीनियर होना आर्थिक दृष्टि से कितना डरावना है लेकिन तब इसकी भी अपनी शान थी क्योंकि कॉलेज के डे स्कॉलर साथियों पर रौब जो पड़ता था। इसलिए, हम भी जेब ढीली करते और जूनियर्स को चाय-समोसे खिलाते थे। शायद यही हॉस्टल की अनकही अर्थव्यवस्था थी मतलब पैसा ऊपर से नीचे नहीं, पीढ़ी दर पीढ़ी दोस्ती के साथ बहता था।


हॉस्टल ने दिखाई सामूहिकता की ताकत 


किसी एक साथी का किसी बाहर वाले से या डे स्कॉलर से झगड़ा हो जाए तो मामला केवल उस लड़के का नहीं रहता था। कुछ ही देर में रॉड की आवाज से यह खबर पूरे हॉस्टल में फैल जाती थी और फिर पता नहीं कितने लड़के किसी जवान सेना की तरह उसके साथ खड़े हो जाते। कई बार तो स्थिति यह होती कि हमें यह भी नहीं मालूम होता था कि झगड़ा शुरू किस बात पर हुआ, किसके साथ हुआ और कहां तक जाना है लेकिन इतना जरूर पता होता था कि ‘अपना हॉस्टलर’ अकेला नहीं जाएगा।


Hostel life

आज के नजरिए से उन घटनाओं को देखता हूं तो लगता है कि उनमें उतावलापन भी था और उम्र की नादानी भी, लेकिन उसके पीछे एक भावना बेहद मजबूत थी—अपने साथी को अकेला नहीं छोड़ना। बाद में जिंदगी ने सिखाया कि हर लड़ाई में कूद पड़ना समझदारी नहीं होती, लेकिन उस उम्र में साथी के लिए खड़े होने का जो जज्बा था, उसने हमें एकता का अर्थ जरूर समझाया। यही जज़्बा किसी का दूध,किसी की चीनी, किसी की चायपत्ती, किसी का हीटर और सबके अपने अपने कप के साथ फाइव स्टार चाय का मज़ा भी देता था।


हॉस्टल केवल लड़ने-भिड़ने और मौज-मस्ती की जगह भी नहीं था। पढ़ाई के समय वही लड़के एक-दूसरे के सबसे अच्छे शिक्षक बन जाते थे। किसी को कोई विषय समझ नहीं आया तो कमरे में बैठकर चर्चा शुरू हो जाती। एक के पास किताब थी, दूसरे के पास नोट्स और तीसरे को उस विषय की अच्छी समझ। सामूहिक अध्ययन में एक अजीब-सी ऊर्जा होती थी। जो बात अकेले पढ़ते हुए कठिन लगती, वह दोस्त के समझाने से अचानक आसान हो जाती।


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और जब हॉस्टल सांस्कृतिक केंद्र में बदल जाता था


गणेश जी की मूर्ति की स्थापना उन्हीं यादों में से एक है। चंदा जुटाना, मूर्ति लाना, सजावट करना, पूजा की तैयारी, प्रसाद और फिर सबका मिलकर कार्यक्रम करना। इन सबने हमें आयोजन करना सिखाया। कोई सजावट में माहिर था, कोई व्यवस्था में, कोई चंदा जुटाने में और कोई केवल उत्साह बढ़ाने में। लेकिन अंत में गणेश जी सबके थे और आयोजन भी सबका। ऐसे अवसरों पर हॉस्टल का टीवी हाल, बरामदा और आसपास का पूरा माहौल अचानक घर जैसा लगने लगता था।


मनोरंजन के सीमित साधन थे। आज की तरह हर जेब में मोबाइल और हर कमरे में इंटरनेट नहीं था। इसलिए गणेश स्थापना के ग्यारह दिनों में VCR का खास तौर पर किराए से इंतजाम किया जाता तो वह अपने आप में सबसे बड़ा आयोजन होता था। अच्छी और अन सेंसर्ड फिल्में देर रात तक देखने का अपना ही आनंद था। टीवी के सामने भीड़ लगती, जगह के लिए खींचतान होती, कोई फर्श पर बैठता, कोई कुर्सी और सोफे पर और कोई दरवाजे के पास खड़ा होकर भी फिल्म देखने को तैयार रहता।


फिल्म से ज्यादा मजा शायद उस सामूहिक माहौल में आता था। बीच-बीच में किसी की टिप्पणी पर ठहाका लग जाता और फिर कोई सीनियर चुप रहने का इशारा करते हुए अंग्रेजी संवाद समझने का पुरजोर प्रयास करता। आज के डिजिटल दौर में यह सब बहुत साधारण लग सकता है, लेकिन हमारे लिए वह सामूहिक मनोरंजन था। एक स्क्रीन और दर्जनों चेहरे,लेकिन खुशी सबकी साझा।


घर से दूर एक घर


हॉस्टल की जिंदगी ने हमें यह भी सिखाया कि घर से दूर रहकर भी परिवार बनाया जा सकता है। किसी के घर से अचार आया तो वह केवल उसी लड़के का नहीं रहा। किसी के घर से देशी घी के लड्डू,कहीं से गुझिया तो कभी खुरमा बतिया आती और चट से खत्म भी हो जाती क्योंकि खाने वाले भी दर्जनों थे। किसी को घर से चिट्ठी आई तो कई साथी उसके आसपास बैठकर उसके चेहरे का भाव पढ़ते थे। त्योहारों पर घर की याद आती थी, लेकिन उसी समय दोस्तों का साथ उस खालीपन को कुछ कम कर देता था। धीरे-धीरे हम हमउम्र लड़कों का एक ऐसा परिवार बन गए थे, जिसमें रिश्तों की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई थी, लेकिन रिश्ते बनते चले गए।


हॉस्टल ने हमें वित्तीय अनुशासन भी सिखाया। महीने की शुरुआत में जेब में पैसा देखकर लगता था कि खूब खर्च करेंगे। महीने का मध्य आते-आते गणित बदल जाता और आखिरी सप्ताह में चाय भी सोच-समझकर पीनी पड़ती। तब समझ में आया कि सीमित साधनों में प्राथमिकताएं तय करना क्या होता है। शायद इसी कारण बाद में सीनियर बनकर जब जूनियर्स को समोसे-चाय खिलाने के लिए जेब ढीली करनी पड़ती थी, तब हमें अपने पुराने सीनियर्स याद आते थे। समझ आता था कि उन्होंने सिर्फ समोसे नहीं खिलाए थे, एक परंपरा सौंपी थी।


Hostel life

हॉस्टल एक और बड़ी चीज देता है हिम्मत


घर से पहली बार दूर निकलना, अनजान लोगों के बीच रहना, अपनी बात रखना, जरूरत पड़ने पर किसी शिक्षक या अधिकारी से बात करना, अपने खर्च का हिसाब रखना, बीमारी या परेशानी में खुद निर्णय लेना जैसी छोटी-छोटी घटनाएं मिलकर व्यक्तित्व बनाती थीं। मुसीबत की घड़ी में कभी सीनियर्स हमारे लोकल गार्जियन बन जाते कभी हम किसी जूनियर के अभिभावक।


हॉस्टल ने हमें रहन-सहन का सलीका भी सिखाया। कमरे में दूसरे लोग हैं तो अपनी सुविधा के साथ उनकी सुविधा का भी ख्याल रखना है। देर रात लौटे हैं तो सो रहे साथी की नींद का सम्मान करना है। किसी से मदद ली है तो मौका आने पर उसकी मदद करनी है। वरिष्ठ हैं तो कनिष्ठ को दबाना नहीं, उसे संभालना है। इन सबके बीच अनुशासन भी था और शरारत भी। पढ़ाई भी थी और मस्ती भी। बहस भी थी और दोस्ती भी। कभी रूठना था, कभी मनाना था। कभी जेब खाली थी तो कभी किसी दोस्त की वजह से चाय मुफ्त हो जाती थी।


आज इतने वर्षों बाद जब उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है कि अशोक और विक्रम जैसे छात्रावास वास्तव में हमारे जीवन की अनौपचारिक पाठशाला थे। वहां किसी ने ब्लैकबोर्ड पर लिखकर नहीं बताया कि एकता क्या होती है। हमने उसे दोस्तों के साथ खड़े होकर महसूस किया। किसी किताब ने वित्तीय अनुशासन का अध्याय नहीं पढ़ाया। हमने महीने के आखिरी पांच दिनों में खाली जेब से सीखा। आत्मनिर्भरता का कोई व्याख्यान नहीं हुआ। घर से दूर रहकर हमने उसे रोज जिया। भाईचारे की परिभाषा नहीं पढ़ी। किसी एक साथी के साथ खड़े होकर समझी। 


इसी तरह, बड़ों का सम्मान किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं था। सीनियर्स के व्यवहार और परंपराओं से सीखा। सामूहिक अध्ययन की उपयोगिता किसी शिक्षक ने बताई होगी, लेकिन उसे हमने रात-दर-रात साथ बैठकर अनुभव किया। और परिवार से दूर रहकर परिवार बनाने की कला—वह शायद हॉस्टल का सबसे बड़ा उपहार था।


आज मेरे या हम सभी दोस्तों के जीवन में कई उपलब्धियां हैं, कई अनुभव हैं, कई शहर हैं और कई रिश्ते हैं लेकिन जब कभी मन अतीत की ओर लौटता है तो जबलपुर का हॉस्टल, साथी, हमारे वे कमरे, वे चेहरे, चाय-समोसे की छोटी-छोटी पार्टियां, जूनियर्स की खातिर ढीली होती जेब, गणेश जी की स्थापना, VCR के सामने देर रात तक बैठी भीड़ और किसी साथी के लिए एकजुट होकर खड़ा पूरा हॉस्टल..सब एक साथ आंखों के सामने आ जाते हैं।


तब लगता है कि हम वहां केवल पढ़ने नहीं गए थे। हम वहां बड़े होने गए थे। कॉलेज ने शायद हमें डिग्री दी, लेकिन हॉस्टल ने जिंदगी जीने की डिग्री दी। और उस डिग्री की सबसे खूबसूरत बात यह है कि उसका प्रमाणपत्र आज भी मेरे भीतर सुरक्षित है—कुछ दोस्तों की यादों में, कुछ शरारतों में, कुछ संस्कारों में और उस विश्वास में कि जिंदगी चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, अपने लोगों के साथ मिलकर जी जाए तो हर मुश्किल थोड़ी आसान हो जाती है और यही हमारे हॉस्टल परिवार की सबसे बड़ी सीख है।


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ऑर्किडेरियम: गंगटोक के दिल में सजी अनूठे फूलों की दुनिया

यह प्रकृति के कैनवास पर की गई एक ऐसी अद्भुत चित्रकारी की तरह है, जो बिना कुछ कहे ही आँखों को अपनी ओर खींच लेती है। यह महज एक फूल या उनका संग...