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सफेद बर्फ, काली बर्फ़..में छिपी हमारी कहानी!!

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ये न तो आपके हमारे घर के पुराने गद्दों की मैली हो चुकी रुई है और न ही सर्फ या साबुन का झाग..इन दिनों शिमला जैसे तमाम पर्वतीय इलाकों में ये नजारा आम है। ये बर्फ़ है, वही बर्फ जिसको देखने के लिए हजारों लाखों लोग पहाड़ों पर जमा होते हैं। पहाड़ों पर जब पहली बार बर्फ गिरती है, तो सब कुछ कितना सुंदर लगता है न...श्वेत चादर ओढ़े खड़े पहाड़, बिल्कुल निर्मल, चमकदार, किसी संत की तरह। लेकिन धीरे-धीरे... हवा में उड़ती धूल, धुआँ, ट्रकों की कालिख, और हमारी अपनी जिंदगी की भागदौड़—सब मिलकर उस सफेद बर्फ़ पर कालिख की परत चढ़ा देते हैं। इसके फलस्वरूप खूबसूरत सफेद बर्फ अब काली होकर बदसूरत दिखने लगती है.. गंदी और नकारात्मकता से भरपूर उदास सी। हम इसे ‘काली बर्फ़’ कह सकते हैं। वैसे पहाड़ों पर काली बर्फ़ के अंग्रेजी नाम ब्लैक आइस का अलग ही खौफ है।यह बर्फ इतनी पारदर्शी होती है कि काली सड़क पर बिल्कुल घुल मिल जाती है और इस पर चलना लगभग नामुमकिन होता है। इस पर लोग सटासट फिसलते हैं, बिल्कुल बच्चों वाली फिसल पट्टी की तरह। अनजाने में कई लोग अपनी कमर,हाथ पैर तक तुड़वा लेते हैं। अब बात पुनः काली गंदी बर्फ की, वैसे...

प्रेम तो भावनात्मक अहसास है, दिखावा नहीं…!!

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  प्रिय ओशो के अनुसार, सच्चा प्रेम स्वतंत्रता है, न कि बंधन या स्वामित्व। उनका मानना था कि प्रेम एक अवस्था है। आप प्रेम में होते नहीं, बल्कि आप प्रेम होते हैं। जो भयमुक्त और साझा करने की भावना पर आधारित है। प्रेम, जीवन को सुंदरता और अर्थ देता है। भले ही यह बात ओशो ने कही है लेकिन तुम भी यह बात बखूबी जानती हो कि हमारा परस्पर प्यार या प्रेम भी एक अनूठा एहसास है, जो दिमाग से नहीं दिल से है और इसमें अनेक भावनाओं और अलग अलग विचारों का समावेश है। जाहिर सी बात है, आप जिससे प्यार से जुड़ जाते हैं उसका प्रेम स्नेह से लेकर खुशी के शिखर तक अपने आप पहुंचने लगता है। प्यार एक मजबूत आकर्षण और परस्पर जुड़ाव की भावना है जो सब भूलकर साथ साथ जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करती है..जैसे की हम । मेरा मानना है कि सच्चा प्यार वह होता है जो सभी हालातों में आप के साथ हो, यानी दुख में भी और सुख में भी.. आप को और आप की खुशियों और परेशानियों को अपनी खुशियां या दुख माने… जैसे मेरा और तुम्हारा प्यार।  मनीषा, तुम मेरी पत्नी भर नहीं हो बल्कि दो दशकों से ज्यादा से मेरी हम कदम हो । प्यार का मतलब हमारे लिए सिर...

चुटकियों में जिंदगी का फ़लसफ़ा समझाती रोचक किस्सागोई

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कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो बिना किसी गूढ़ और अलंकृत भाषा के भी जीवन के अहम फलसफे आसानी से समझा देती हैं। बिल्कुल परिवार के उस सदस्य की तरह  जो बच्चों से लेकर बड़ों तक के बीच हल्के फुल्के अंदाज में अपनी बात कह जाता है। वरिष्ठ लेखक एवं संचार विशेषज्ञ संजय सक्सेना एवं उनकी नई किताब ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ भी परिवार के सदस्य की तरह है जो बिना लाग लपेट के जरूरी संदेश दे जाती है लेकिन अंदाजे बयां ऐसा है कि आप मुस्कराते हुए उस संदेश को आत्मसात कर सकते हैं। ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ न केवल बिना किसी बनावटीपन के आपको ज़िंदगी की सच्चाई से रूबरू कराती हैं बल्कि यह किताब आपको अपनी डायरी खोलकर कोई संदेश, कोई सबक या बस एक ईमानदार एहसास जैसा कुछ न कुछ लिखने के लिए प्रेरित भी करती है। ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ वास्तव में रोज़मर्रा की ज़िंदगी के उन छोटे-छोटे किस्सों का संग्रह है, जो सतह पर साधारण लगते हैं, लेकिन गहराई में जीवन के गहरे संदेश छिपाए हुए हैं। यह किताब ठीक उसी तरह है जैसे हमारी अपनी डायरी का आखिरी पन्ना…जहाँ हम वे सभी बातें लिखते हैं जो कहीं और नहीं लिख पाते, जो सच्ची, ईमानदार और बिना किसी फि...

डमरू,मृदंगम और नगाड़ा पर बैठकर लीजिए भारतीय संगीत का आनंद..!!

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बाँसुरी, डमरू, एकतारा, इसराज, मृदंगम्, नगाड़ा जैसे नाम सुनकर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन कानों में गूंजने लगी न…तो तैयार रहिए, कल नईदिल्ली में विजय चौक पर आपको इन्हीं नामों पर बैठकर इनकी ही धुनों को सुनना है..और केवल यही नहीं, पखावज, संतूर, सारंगी, सारिंदा, सरोद, शहनाई, सितार, सुरबहार, तबला और वीणा भी आपकी बैठक व्यवस्था का हिस्सा होंगे। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आपको इन वाद्य यंत्रों पर बिठाया जाएगा बल्कि पहली बार इस वर्ष बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए विजय चौक पर बैठने के लिए बनाए गए एंक्‍लोज़र्स के नाम भारतीय वाद्य यंत्रों के नाम पर रखे गए हैं ताकि आम लोगों को ज्यादा म्यूजिकल एवं अपनापन महसूस हो। गौरतलब है कि बीटिंग द रिट्रीट एक पुरानी सैन्य परंपरा है। पहले युद्ध के समय शाम होते ही बिगुल बजाकर सैनिकों को संकेत दिया जाता था कि लड़ाई रोक दी जाए और सभी अपने शिविरों में लौट आएं। यही परंपरा अब बीटिंग द रिट्रीट समारोह के रूप में निभाई जाती है। अब हर साल विजय चौक पर 29 जनवरी को होने वाला ‘बीटिंग रिट्रीट’ गणतंत्र दिवस समारोहों के समापन का प्रतीक होता है । इसे सेनाओं की एकता, अनुशासन और गौर...

उत्सव से ज्यादा आफत है बर्फबारी

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इन दिनों टीवी और अखबारों के समाचारों में आप हिमाचल, उत्तराखंड या कश्मीर में हो रही बर्फबारी का मज़ा ले रहे पर्यटकों को देख रहे होंगे। वे कैसे एक दूसरे पर बर्फ फेंक रहे हैं, नाच रहें हैं और उत्सव मना रहे हैं। आप का मन भी मचल रहा होगा कि काश हम भी जल्दी से वहां पहुंच जाए और खूब बर्फ के गोले बनाकर खेले..लेकिन यह टीवी पर देखने में ही अच्छा लगता है क्योंकि पहाड़ों पर बर्फबारी अवसर या उत्सव भर नहीं लाती बल्कि आफत तथा आपदा भी लाती है। पहाड़ी इलाकों में सर्दियों में बर्फबारी हमेशा एक जादुई दृश्य रचती है। आसमान से गिरती सफेद रुई जैसी बर्फ, पेड़ों पर जमी बर्फ की चमकदार परत, और चारों ओर फैली सफेद चादर जैसी बर्फ… ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने खुद एक श्वेत कथा रच दी हो लेकिन इस मनभावन सुंदरता के पीछे कई कड़वी कहानियां छिपी होती हैं, जो यहां रहने वाले या फिर इस बर्फबारी को भुगतने वाले ही समझ पाते हैं। पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी के दौरान और उसके बाद कई चुनौतियां आती हैं, जैसे फिसलन भरी सड़कें, ठंड से स्वास्थ्य जोखिम, बिजली-पानी की कटौती, खाने पीने की दिक्कत,रोजगार और यात्रा में बाधाएं। सबसे पहली और बड़...

देवभूमि के बाग़ में (सफेद) दुशाला ओढ़े खड़ी है..!!

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क्वीन ऑफ हिल्स शिमला के साथ साथ देवभूमि हिमाचल में नए साल की आज 23 जनवरी ने लोगों की खोई मुस्कान वापस लौटा दी है। यह एक ऐसा दिन है जब आसमान ने अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलटे और सफ़ेद स्याही से नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया..ऐसा अध्याय जिसे हर कोई पढ़ना चाहता है..स्थानीय लोग, पर्यटक, होटल व्यवसाई और स्वयं प्रकृति भी।  सुबह-सुबह जब लोगों की आँखें खुलीं, तो उनकी खिड़की के शीशे पर कोई अनजान बच्चा उँगली से दिल नहीं बना रहा था—बल्कि बादल खुद बर्फ के छोटे-छोटे चमकदार सफेद टुकड़े बिखेर रहे थे। शहर का मशहूर रिज मैदान (आम लोगों के लिए मॉल रोड), जो कल तक धूप में अपनी पुरानी कॉलर वाली कोट पहने उदास सा था, आज सुबह-सुबह एकदम सफ़ेद शॉल ओढ़े खिलखिला रहा था—जैसे कोई देवदूत या परी सफेद दुशाला ओढ़े आ गई है और सबकी नज़रें उसी पर टिक गई हों।  मॉल रोड पर आज बर्फ़ के बीच चाय की केतली से अदरक-इलायची की खुशबू ज्यादा मनमोहक लग रही है। स्कूटर, कार और घरों की लाल-हरी छतों ने जगमग सफेदी भरा दुपट्टा ओढ़ लिया है । बर्फ़ की ठंडक पाकर कई वाहन चैन की नींद सो रहे हैं और मालिक से शायद फुसफुसाकर कह भी रहे हैं.. ...

देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क पर सफ़र !!

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बर्फ के बीच हाड़ कंपाती ठंड, मूसलाधार बारिश, आए दिन हो रहे भूस्खलन, पहाड़ से गिरते पत्थरों के बीच न डायनामाइट, न जेसीबी, न कोई ड्रिल मशीन..बस छैनी- हथौड़ी…और इंसानी हौंसला। मौत के साए में दिन रात बिना रुके काम करते हुए 18 हज़ार मज़दूरों ने मौसम की बेदर्दी और पहाड़ की कठोरता पर जीत हासिल कर दिखाई और बना दी देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क। इसी सड़क पर हमें एनाकोंडा के चट्टानी रूप से भी रूबरू होने का मौका मिलता है। हम बात कर रहे हैं राष्ट्रीय राजमार्ग-5 की। यह केवल एक सड़क भर नहीं, बल्कि इतिहास, साहस और रोमांच की जीवित धरोहर  है। यह इंसानी जिद का प्रमाण है। जिसमें महज हाथों ने असंभव को संभव बनाते हुए न केवल मजबूत पहाड़ों को काट डाला बल्कि झुकने पर भी मजबूर कर दिया। कभी हिंदुस्तान-तिब्बत रोड कहलाने वाली यह सड़क कालका से शुरू होकर शिमला, रामपुर, किन्नौर और शिपकिला दर्रे तक जाती है। लगभग 450 किलोमीटर लंबी यह पहाड़ी राह सतलुज नदी के साथ-साथ चलती हुई हिमालय के सबसे दुर्गम और सुंदर इलाकों से गुजरती है। यह एक ऐसी सड़क है, जो हमें प्रकृति की विराटता, मानव साहस और इतिहास की गहराइयों से जोड़...