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सरला माहेश्वरी: समाचार प्रसारण के एक युग का अंत..!!

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आज, 12 फरवरी 2026 को, भारतीय टेलीविजन इतिहास की एक चमकती हुई शख्सियत, दूरदर्शन की पूर्व समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी का निधन हो गया।  71 वर्ष की आयु में उनका यह अवसान न केवल मीडिया जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है, बल्कि उन लाखों दर्शकों के लिए भी है, जिनके घरों में उनकी शांत, मधुर और स्पष्ट आवाज़ ने समाचारों को विश्वसनीयता का पर्याय बना दिया था। सरला माहेश्वरी, एक ऐसी महिला जो सादगी, संयम और सटीकता की मिसाल बनीं; जिन्होंने काले-सफेद टेलीविजन से रंगीन युग तक का सफर तय किया और समाचार प्रसारण को गरिमा प्रदान की।  सरला माहेश्वरी  उस दौर की प्रतिनिधि थी जब महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और पेशेवर जीवन का संतुलन बनाना आसान नहीं था लेकिन सरला जी ने इसे न केवल संभाला, बल्कि एक मिसाल कायम की। उनकी सादगी और संयमपूर्ण व्यक्तित्व ने उन्हें हमेशा लोगों और अपनी जड़ों से जोड़े रखा । दूरदर्शन में उनकी शुरुआत बच्चों के कार्यक्रमों से हुई लेकिन जल्दी ही वे समाचार वाचिका बनकर उस स्थान पर आ गई जो शायद उन्हीं के लिए बना था। यह वह समय था जब भारत का टेलीविजन काले-सफेद से रंगीन युग में प्रवेश कर रहा ...

वाघा बार्डर से आंखों देखी:राष्ट्र गौरव की अमिट अभिव्यक्ति

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  ठंड की शामें उत्तर भारत में एक अनोखी रंगत भरी होती हैं। सूरज ढलते-ढलते आकाश में गुलाबी केसरिया आभा बिखेरता है, ठंडी हवाएँ हल्की सी कंपकंपी पैदा करती हैं और दूर से आती धुंध की चादर वातावरण को अपने आगोश में समेट लेती है। ऐसे में पाकिस्तान के लाहौर से महज 20 किमी और पंजाब के अमृतसर से 30 किलोमीटर दूर अटारी-वाघा बॉर्डर पर बीटिंग रिट्रीट समारोह देखना ठंड में भी गर्माहट ला देता है क्योंकि यहां प्रकृति की सर्दी देशभक्ति की गर्मी से टकराती है।  शाम के करीब साढ़े चार बज रहे हैं। ठंड से बचने के लिए हम भी सपरिवार शॉल, स्वेटर और जैकेट जैसे सुरक्षा कवच के साथ स्टेडियम में सबसे सामने वीआईपी सीट पर अपनी जगह ले लेते हैं। वैसे, यहां लोगों के आने का सिलसिला करीब तीन बजे से शुरू हो गया था और दर्शक दीर्घा धीरे धीरे भरने लगी है। स्टेडियम के बाहर तिरंगा ध्वज से लेकर तिरंगा कैप बेचने  एवं चेहरे पर राष्ट्रीय ध्वज की छाप छोड़ने वाले कलाकार मौजूद हैं। उनके लिए भी क्रिकेट मैच की तरह यही कमाई का अवसर है।  उधर, दर्शकों की भीड़ में बच्चे, बुजुर्ग, देशी विदेशी पर्यटक…सभी हैं और सबके चेहरे पर ग़ज़ब...

हिमाचल में गंगा.. है न वाकई चमत्कार..!!

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  कल्पना कीजिए, जब चारों तरफ चमकती धूप खिली हो लेकिन इसके बाद भी एक स्थान ऐसा हो जहां पूरा पानी कांच की तरह मोटी परत में जमा हो.. पत्थर का बना फर्श इतना ठंडा हो कि पैर जम जाए, लेकिन हवा इतनी शुद्ध एवं साफ की अंतर्मन तक महसूस हो.. अकल्पनीय लगता है न..लेकिन यह हकीकत है और वह भी क्वीन ऑफ हिल्स शिमला से तकरीबन सौ सवा सौ किलोमीटर दूर।  यहां तक पहुंचने का रास्ता भी इतना मनमोहक और रोमांचक है कि आप देश के तमाम दुर्गम सफर को भूल जाएंगे। एक तरफ पहाड़ की चोटियों से ऊंचाई में मुकाबला करता चीड़ देवदार का घना जंगल है तो ऊंचाई से विपरीत दिशा में प्रतिस्पर्धा करतीं गहरी खाई और बीच बीच में आवाजाही करते सियार एवं उनके जंगली दोस्त भी। हम भी वापसी में सियार के जोड़े से रूबरू हुए और वह भी इतने दमदार जोड़े से जो बिना डरे आंखों में आंखें डालकर देख रहे थे। हम बात कर रहे हैं गिरी गंगा की.. हरिद्वार की तरह मां गंगा का एक पवित्र स्थान। शिमला जिले के कड़ापत्थर एरिया के पास स्थित यह स्थान अभी तक पर्यटकों की भीड़, वाहनों की चिल्लपों और शोरगुल से बचा हुआ है। हर तरफ सुकून बिखरा है और चारों ओर बिखरी है बर्फ। ...

सफेद बर्फ, काली बर्फ़..में छिपी हमारी कहानी!!

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ये न तो आपके हमारे घर के पुराने गद्दों की मैली हो चुकी रुई है और न ही सर्फ या साबुन का झाग..इन दिनों शिमला जैसे तमाम पर्वतीय इलाकों में ये नजारा आम है। ये बर्फ़ है, वही बर्फ जिसको देखने के लिए हजारों लाखों लोग पहाड़ों पर जमा होते हैं। पहाड़ों पर जब पहली बार बर्फ गिरती है, तो सब कुछ कितना सुंदर लगता है न...श्वेत चादर ओढ़े खड़े पहाड़, बिल्कुल निर्मल, चमकदार, किसी संत की तरह। लेकिन धीरे-धीरे... हवा में उड़ती धूल, धुआँ, ट्रकों की कालिख, और हमारी अपनी जिंदगी की भागदौड़—सब मिलकर उस सफेद बर्फ़ पर कालिख की परत चढ़ा देते हैं। इसके फलस्वरूप खूबसूरत सफेद बर्फ अब काली होकर बदसूरत दिखने लगती है.. गंदी और नकारात्मकता से भरपूर उदास सी। हम इसे ‘काली बर्फ़’ कह सकते हैं। वैसे पहाड़ों पर काली बर्फ़ के अंग्रेजी नाम ब्लैक आइस का अलग ही खौफ है।यह बर्फ इतनी पारदर्शी होती है कि काली सड़क पर बिल्कुल घुल मिल जाती है और इस पर चलना लगभग नामुमकिन होता है। इस पर लोग सटासट फिसलते हैं, बिल्कुल बच्चों वाली फिसल पट्टी की तरह। अनजाने में कई लोग अपनी कमर,हाथ पैर तक तुड़वा लेते हैं। अब बात पुनः काली गंदी बर्फ की, वैसे...

प्रेम तो भावनात्मक अहसास है, दिखावा नहीं…!!

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  प्रिय ओशो के अनुसार, सच्चा प्रेम स्वतंत्रता है, न कि बंधन या स्वामित्व। उनका मानना था कि प्रेम एक अवस्था है। आप प्रेम में होते नहीं, बल्कि आप प्रेम होते हैं। जो भयमुक्त और साझा करने की भावना पर आधारित है। प्रेम, जीवन को सुंदरता और अर्थ देता है। भले ही यह बात ओशो ने कही है लेकिन तुम भी यह बात बखूबी जानती हो कि हमारा परस्पर प्यार या प्रेम भी एक अनूठा एहसास है, जो दिमाग से नहीं दिल से है और इसमें अनेक भावनाओं और अलग अलग विचारों का समावेश है। जाहिर सी बात है, आप जिससे प्यार से जुड़ जाते हैं उसका प्रेम स्नेह से लेकर खुशी के शिखर तक अपने आप पहुंचने लगता है। प्यार एक मजबूत आकर्षण और परस्पर जुड़ाव की भावना है जो सब भूलकर साथ साथ जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करती है..जैसे की हम । मेरा मानना है कि सच्चा प्यार वह होता है जो सभी हालातों में आप के साथ हो, यानी दुख में भी और सुख में भी.. आप को और आप की खुशियों और परेशानियों को अपनी खुशियां या दुख माने… जैसे मेरा और तुम्हारा प्यार।  मनीषा, तुम मेरी पत्नी भर नहीं हो बल्कि दो दशकों से ज्यादा से मेरी हम कदम हो । प्यार का मतलब हमारे लिए सिर...

चुटकियों में जिंदगी का फ़लसफ़ा समझाती रोचक किस्सागोई

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कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो बिना किसी गूढ़ और अलंकृत भाषा के भी जीवन के अहम फलसफे आसानी से समझा देती हैं। बिल्कुल परिवार के उस सदस्य की तरह  जो बच्चों से लेकर बड़ों तक के बीच हल्के फुल्के अंदाज में अपनी बात कह जाता है। वरिष्ठ लेखक एवं संचार विशेषज्ञ संजय सक्सेना एवं उनकी नई किताब ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ भी परिवार के सदस्य की तरह है जो बिना लाग लपेट के जरूरी संदेश दे जाती है लेकिन अंदाजे बयां ऐसा है कि आप मुस्कराते हुए उस संदेश को आत्मसात कर सकते हैं। ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ न केवल बिना किसी बनावटीपन के आपको ज़िंदगी की सच्चाई से रूबरू कराती हैं बल्कि यह किताब आपको अपनी डायरी खोलकर कोई संदेश, कोई सबक या बस एक ईमानदार एहसास जैसा कुछ न कुछ लिखने के लिए प्रेरित भी करती है। ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ वास्तव में रोज़मर्रा की ज़िंदगी के उन छोटे-छोटे किस्सों का संग्रह है, जो सतह पर साधारण लगते हैं, लेकिन गहराई में जीवन के गहरे संदेश छिपाए हुए हैं। यह किताब ठीक उसी तरह है जैसे हमारी अपनी डायरी का आखिरी पन्ना…जहाँ हम वे सभी बातें लिखते हैं जो कहीं और नहीं लिख पाते, जो सच्ची, ईमानदार और बिना किसी फि...

डमरू,मृदंगम और नगाड़ा पर बैठकर लीजिए भारतीय संगीत का आनंद..!!

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बाँसुरी, डमरू, एकतारा, इसराज, मृदंगम्, नगाड़ा जैसे नाम सुनकर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन कानों में गूंजने लगी न…तो तैयार रहिए, कल नईदिल्ली में विजय चौक पर आपको इन्हीं नामों पर बैठकर इनकी ही धुनों को सुनना है..और केवल यही नहीं, पखावज, संतूर, सारंगी, सारिंदा, सरोद, शहनाई, सितार, सुरबहार, तबला और वीणा भी आपकी बैठक व्यवस्था का हिस्सा होंगे। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आपको इन वाद्य यंत्रों पर बिठाया जाएगा बल्कि पहली बार इस वर्ष बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए विजय चौक पर बैठने के लिए बनाए गए एंक्‍लोज़र्स के नाम भारतीय वाद्य यंत्रों के नाम पर रखे गए हैं ताकि आम लोगों को ज्यादा म्यूजिकल एवं अपनापन महसूस हो। गौरतलब है कि बीटिंग द रिट्रीट एक पुरानी सैन्य परंपरा है। पहले युद्ध के समय शाम होते ही बिगुल बजाकर सैनिकों को संकेत दिया जाता था कि लड़ाई रोक दी जाए और सभी अपने शिविरों में लौट आएं। यही परंपरा अब बीटिंग द रिट्रीट समारोह के रूप में निभाई जाती है। अब हर साल विजय चौक पर 29 जनवरी को होने वाला ‘बीटिंग रिट्रीट’ गणतंत्र दिवस समारोहों के समापन का प्रतीक होता है । इसे सेनाओं की एकता, अनुशासन और गौर...