मौसम तो जीवन का आनंद है,आफ़त नहीं
बारिश.. केवल एक मौसम नहीं है । वह बच्चों की कागज़ की नाव है, पेड़ों की संजीवनी है, प्रकृति का श्रृंगार है, किसानों की उम्मीद है, प्रेमियों का संगीत और कवियों की सबसे प्रिय प्रेरणा है। पहले महीनों पहली फुहार का इंतज़ार होता था, उसके आते ही लोग घरों से बाहर निकल पड़ते थे लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। अब बारिश शुरू होते ही सबसे पहले छाता खुलता है, कार के शीशे चढ़ते हैं और कपड़ों/मोबाइल को बचाने की चिंता सताने लगती है। प्रकृति, जिसके साथ कभी हमारा आत्मीय रिश्ता था, आज सुविधाओं और कृत्रिम जीवनशैली के बीच पीछे छूटती जा रही है। आमतौर पर हम जीवन की सहजता को अपने आसपास सोच की कंटीली बाड़ लगाकर जटिल बनाते जा रहे हैं। सोचिये, कितनी विचित्र बात है कि जिस बारिश के लिए किसान टकटकी लगाए रहता है, बच्चे घरों से भागकर गलियों में आ जाते थे, हम भी गर्मी से निपटने के लिए दिन रात मानसून की खबरों पर कान लगाए रहते हैं..आज उसी बारिश से बचने के लिए हम सबसे पहले छाता ढूंढ़ते हैं। महीनों तक मौसम के जिस अमृत का इंतज़ार किया, उसके आते ही हम उससे दूर भागने लगे। हम मिट्टी से बने लोग मिट्टी को भिगोने वाली बा...