क्या हर गाली एक जैसी होती है?
क्या गाली हमेशा एक जैसी होती हैं? क्या देश, काल, परिस्थिति, बोलने वाले, सुनने वाले और सामाजिक संदर्भ के साथ उसके अर्थ नहीं बदलते हैं? गालियों को लेकर इस बुनियादी सवाल का कारण यह है कि जंतर-मंतर पर हुए हालिया प्रदर्शन में सबसे अधिक चर्चा मुख्य विषय की नहीं, बल्कि वहाँ खुलेआम दी गई गालियों और अश्लील पोस्टरों की हो रही है। पहले मुझे लगा कि इस विषय पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए लेकिन गालियों/अश्लील पोस्टरों के पक्ष में आ रहे तर्कों के कारण मुझे अपनी बात रखना जरूरी लगा। इस लेख में उठाए गए प्रश्न को दो प्रमुख उदाहरणों से समझा जा सकता है। पंजाब के अनेक हिस्सों में कुछ पारिवारिक गालियाँ मित्रों और रिश्तेदारों के बीच आत्मीयता या सहज बातचीत का हिस्सा हैं। मसलन भैं*द, पैन*द, बहन दी, माँ दी, हरामी, उल्लू दा पट्ठा जैसी गालियां सहज बोलचाल का हिस्सा हैं। वहीं, भोपाल में भी मा*ड़े-भैं*ड़े जैसे शब्द सार्वजनिक रूप से बोले जाते हैं। पूर्वांचल, हरियाणा, राजस्थान और बुंदेलखंड में भी कई ऐसे संबोधन हैं जो बाहर के व्यक्ति को असभ्य लग सकते हैं, पर स्थानीय संस्कृति में हल्के फुल्के अंदाज में लिया जाता है। इ...