मैं बैंटनी कैसल हूँ। शिमला में मॉल रोड पर स्कैंडल पॉइंट से कालीबाड़ी जाते हुए आपने कई बार मुझे देखा होगा..हो सकता है तस्वीर भी निकलवाई हो और यहां बोर्ड पर दर्ज मेरी जानकारी पर भी शायद सरसरी नज़र दौड़ाई हो । परंतु, क्या आपने कभी मेरी खामोशी को सुनने की कोशिश की है? मेरी लकड़ी की दीवारों, ढलानदार छतों, छोटे-छोटे बुर्जों और पुराने दरवाजों के पीछे की कहानियाँ सुनने का प्रयास किया है..शायद नहीं, इसलिए आज अपनी कहानी मैं खुद सुनाता हूं। वैसे, हाल ही में मेरी विकास गाथा में डिजिटल म्यूजियम नामक नया पन्ना जुड़ गया है जो मेरे साथ साथ शिमला ही नहीं इस देवभूमि की कहानी सुनाने लगा है। फिर भी मेरे मन की बात आप मुझसे ही सुनिए।
मैं बैंटनी कैसल केवल पत्थर, लकड़ी, ईंट और चूने से बना कोई पुराना यूरोपियन गोथिक शैली का भवन भर नहीं हूँ। मैं तकरीबन डेढ़ सौ साल से शिमला के बदलते समय का गवाह हूँ। मैंने अंग्रेजी हुकूमत का वैभव देखा है, पहाड़ी रियासत की शाही जिंदगी का हिस्सा रहा हूँ, विश्व युद्धों के दौर की हलचल महसूस की है और आजाद भारत में सरकारी दफ्तरों की जिम्मेदारियाँ भी निभाई हैं। फिर एक समय ऐसा आया, जब मेरी पहचान धुंधली पड़ने लगी पर मेरी कहानी खत्म नहीं हुई। मुझे नया जीवन मिला और आज मैं करीब 20 हजार वर्ग मीटर के अपने परिसर में हिमाचल की कला, संस्कृति और इतिहास को समेटने की कोशिश कर रहा हूँ।
मेरी कहानी उन्नीसवीं सदी के उस दौर से शुरू होती है, जब शिमला अंग्रेजी शासन के प्रभाव में तेजी से एक महत्वपूर्ण पहाड़ी नगर के रूप में विकसित हो रहा था। अंग्रेज अधिकारी यहाँ की ठंडी जलवायु, पहाड़ों और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण गर्मियों में यहां रहना पसंद करते थे। धीरे-धीरे शिमला में ऐसे भवन बनने लगे, जिनमें यूरोपीय वास्तुकला और पहाड़ी परिवेश का अनूठा मेल दिखाई देता था।
जिस जगह आज मैं खड़ा हूँ, वहाँ शुरू में कैप्टन ए. गॉर्डन का एक कॉटेज हुआ करता था। बाद में सिरमौर रियासत ने इस संपत्ति को अपने अधिकार में लिया और वर्ष 1880 के आसपास मेरे निर्माण या पुनर्निर्माण का दौर शुरू हुआ। जब मैं उस समय के शिमला को याद करता हूँ तो मेरे कानों में घोड़ों की टापें, बग्घियों की आवाजाही और अंग्रेज अफसरों की ठसक सुनाई पड़ने लगती है।
लोग भले ही मुझे बैंटनी कैसल के नाम से जानते हैं, लेकिन मेरे व्यक्तित्व में यूरोप के किसी किले की कठोरता नहीं, बल्कि एक पुराने अंग्रेजी आवास की शालीनता और पहाड़ी घरों की आत्मीयता है। मेरी वास्तुकला में अंग्रेजी काउंटी-हाउस शैली और सिरमौर की पारंपरिक शाही स्थापत्य परंपरा का मेल दिखाई देता है। मेरे मौजूदा स्वरूप को 1901-02 के पुनर्निर्माण से भी जोड़ा जाता है। इस काम के लिए इंजीनियर और वास्तुकार टी. ई. जी. कूपर का नाम भी मेरे साथ दर्ज है।
मेरी दो मंजिला मुख्य इमारत, ढलानदार छत, छोटे बुर्ज और लकड़ी का काम मुझे आसपास की इमारतों से अब अलग पहचान देते हैं। मेरे निर्माण में इस्तेमाल की गई सामग्री और कारीगरी उस दौर के शिल्पकारों की दक्षता की कहानी कहती है। मेरे चारों ओर फैला परिसर भी मेरी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। मेरे परिसर में मौजूद पुराने देवदार के पेड़ आज भी मेरे बदलाव और स्मृतियों के साक्षी हैं।
मेरी खासियत यह है कि मेरी बनावट में अलग-अलग संस्कृतियों और निर्माण परंपराओं ने एक-दूसरे के साथ जगह बनाई। मैं अंग्रेजी स्थापत्य का उदाहरण भर नहीं हूँ। मैं, शिमला में यूरोपीय प्रभाव और पहाड़ी रियासतों की साझा विरासत का हिस्सा हूँ। मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय सिरमौर रियासत से भी जुड़ा है। मैं रियासत के ग्रीष्मकालीन निवास के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और शिमला की ठंडी जलवायु और प्राकृतिक सुंदरता में राजपरिवार के लिए आराम और आतिथ्य का स्थान बना।
मैं, बैंटनी कैसल दोनों विश्व युद्धों का गवाह हूं। जब सन् 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो मेरे परिसर का इस्तेमाल सरकार के सैन्य कार्यों से संबंधित कार्यालय के लिए होने लगा । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी मैंने कमोबेश यही भूमिका निभाई। युद्ध समाप्त हुए तो राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं और भारत की स्वतंत्रता का समय नजदीक आ गया। मैं, समझ गया कि आजाद भारत में अब नई भूमिका मेरा इंतजार कर रही है।
वर्ष 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ और देश का अप्रिय विभाजन भी । उस दौरान, लाहौर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र द ट्रिब्यून को विभाजन के कारण अपना ठिकाना बदलना पड़ा और 25 सितंबर 1947 से 12 मई 1948 तक मेरे परिसर में इस समाचार पत्र का कार्यालय भी रहा। सोशल मीडिया के जरिए एक जानकारी ओर मिली की यहां के सूद परिवार के साथ भी मेरा आत्मीय रिश्ता रहा है।
इसके बाद मेरे जीवन में सरकारी कामकाज का एक लंबा दौर आया। वर्ष 1957 से मेरी मुख्य इमारत में हिमाचल प्रदेश का पुलिस मुख्यालय रहा। मेरे परिसर की दूसरी इमारत बैंटनी कॉटेज का उपयोग रोजगार कार्यालय के रूप में किया गया। इस तरह मैं शाही निवास से प्रशासनिक परिसर में बदल गया। हालांकि वक्त के थपेड़ों के साथ मेरी इमारत पुरानी होने लगी। आखिर उम्र तो मेरी भी बढ़ ही रही थी। मेरी छतों, लकड़ी के हिस्सों, दरवाजों और अन्य संरचनाओं को संरक्षण की आवश्यकता महसूस होने लगी थी।
फिर आया वर्ष 2017, जब हिमाचल प्रदेश सरकार ने भाषा, कला एवं संस्कृति विभाग के माध्यम से मेरा अधिग्रहण कर लिया । मेरे लिए यह बदलाव लंबे अंधेरे के बाद रोशन दान जैसा था। इस बदलाव के बाद मेरी दीवारों के भीतर हिमाचल की संस्कृति, इतिहास, लोककलाओं और परंपराओं को स्थान मिलने लगा। अब मेरी उम्र को कमजोरी नहीं, बल्कि मेरी सबसे बड़ी विशेषता के रूप में देखा जाने लगा था।
जुलाई 2026 में मेरे जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ, जब मुझे डिजिटल संग्रहालय के रूप में आम लोगों के सामने प्रस्तुत किया गया। अब मैं अपने प्रदेश की व्यापक सांस्कृतिक पहचान को सामने लाने का माध्यम हूँ। मेरी ऐतिहासिक बनावट और आधुनिक डिजिटल प्रस्तुति मिलकर अतीत तथा वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करती हैं।
मैं बैंटनी कैसल हूँ। मेरा अतीत मेरे साथ है, लेकिन मैं केवल विरासत में जीना नहीं चाहता। मेरी इच्छा है कि आने वाली पीढ़ियाँ मेरी दीवारों में इतिहास की धड़कन सुनें, मेरी वास्तुकला में पुराने शिल्पकारों की कल्पना देखें और मेरे भीतर प्रदर्शित हिमाचली संस्कृति में अपनी जड़ों को पहचानें एवं विरासत से विकास तक की मेरी ऐतिहासिक यात्रा के साक्षी बन मुझे जीवंत बनाए रखें।






































