‘माखन के लाल’ किताब नहीं, बल्कि अदरक इलायची वाली चाय है!!
यह किताब नहीं, अनुभवी हाथों से बनी कड़क चाय है.. इसमें संघर्ष के अदरक का स्वाद है तो उपलब्धियों की इलायची की खुशबू भी है। इसमें विद्यार्थियों के चायपत्ती जैसे अनुभव के सुनहरे रंग हैं तो चीनी की मिठास भी। वैसे भी, माखन के हम पहले बैच वाले ‘लालों’ से लेकर बाद के कई बैच तक की जिंदगी के कई अहम पड़ाव यहां मौजूद चाय की टपरी पर ही तय हुए थे। हम बात कर रहे हैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा अपने 50 से ज्यादा पूर्व विद्यार्थियों की अनुभव-गाथाओं पर केंद्रित पुस्तक ‘माखन के लाल’ की। अपने अपने क्षेत्र के महारथी इन छात्रों के अनुभवों की पूंजी से भरा यह एक ऐसा खजाना है, जिसका फायदा हर आने वाली पीढ़ी को मिलता रहेगा। इसमें मुझे भी अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिला है। यह कोई साधारण स्मृति-संग्रह नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ है जो पत्रकारिता के सपने देखने वाले हर युवा को सिखाता है कि सफलता का रास्ता कितना कठिन, रोमांचक और प्रेरणादायी हो सकता है। पुस्तक पढ़ते हुए लगता है जैसे पुराने दोस्त उसी चाय की टपरी पर पर एक बार फिर चाय की चुस्कियों के साथ अ...