न्यूज़ चैनल से नाराज़गी जायज़, पर ‘रिपोर्टर’ पर हमला क्यों?
जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए एक युवा आंदोलन की तस्वीरों ने एक असहज सवाल हमारे सामने खड़ा कर दिया। कुछ पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की हुई, कैमरे छीनने की कोशिश की गई और महिला पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार की घटनाएं भी सामने आईं। यह केवल किसी एक चैनल या एक आंदोलन का मामला नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग आंदोलनों, चुनावी रैलियों और संवेदनशील घटनाओं की कवरेज के दौरान भी ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं। यह मान लेना आसान है कि भीड़ किसी चैनल की संपादकीय नीति से नाराज़ थी। लेकिन मुश्किल सवाल यह है कि यदि नाराज़गी किसी चैनल से है तो उसका शिकार मैदान में खबर जुटाने वाला रिपोर्टर क्यों बने? वह कैमरापर्सन क्यों बने, जो घंटों धूप, बारिश और भीड़ के बीच केवल घटनाओं को रिकॉर्ड कर रहा है? और सबसे अधिक चिंता की बात यह कि महिला पत्रकारों को भी अभद्र टिप्पणियों और दुर्व्यवहार का सामना क्यों करना पड़े? मेरी नज़र में इस पूरे घटनाक्रम का एक डरावना और दूरगामी पक्ष भी है जो इन्हीं युवाओं से जुड़ा है, जिस पर शायद सबसे कम चर्चा हो रही है। देश के सैकड़ों विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थानों में हर साल हजा...