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प्रेम में डूबी एक अल्हड़ प्रेयसी और दूसरी परिपक्व संगिनी..!!

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  …ऐसा लग रहा था जैसे किसी खूबसूरत श्वेत-वसना अल्हड़ युवती ने अपने गले में हीरे-मोतियों का अनुपम हार धारण कर लिया हो और वह अपने प्रेमी की अनंत प्रतीक्षा में बाँहें फैलाकर आतुरता से ताका झांकी कर रही है क्योंकि पहाड़ों के गोल गोल रास्ते बार बार एक ही दृश्य हमारे सामने लाते रहते हैं। बस, इस दृश्य से हमारी दूरी कुछ कम ज्यादा होती रहती है।  धर्मशाला से मैकलोडगंज के लिए चढ़ते हुए आप कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं जैसे पहाड़ झांक झांक कर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। यहां बर्फ को हम श्वेतवासना युवती की पवित्रता और रोशनियों को उसकी मुस्कान कह सकते हैं। अपने प्रेमी (पर्यटक) के इंतजार में हर रात वह स्वयं को इस तरह के मनमोहक श्रृंगार से सजाती है। दरअसल, जब हम धर्मशाला से मैकलोडगंज की ओर बढ़ रहे थे तब तक सूरज ढल चुका था और चांद की शह पाकर धौलाधार की ऊँची चोटियों पर बिछी बर्फ की सफेद चादर चांदी सी दमक रही थी और उसके नीचे मैकलोडगंज शहर की असंख्य रोशनियाँ जगमगा रहीं थीं।  मैकलोडगंज के ठीक नीचे करीब 10 किमी की दूरी पर धर्मशाला है। जीवन के अनुभवों से समृद्ध, आत्मविश्वास से भरी, एक परिपक्व पत्नी की...

कुछ लोग उम्र नहीं बढ़ाते… वे जीवन को बड़ा कर देते हैं।

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कुछ रिश्ते जितने कम बोले जाएँ, उतने ही अधिक महसूस किए जाते हैं लेकिन जीवन में कुछ अवसर ऐसे भी आते हैं, जब मन की कृतज्ञता शब्दों का सहारा मांग ही लेती है। आज ऐसा ही एक दिन है। आज मनीषा जी का 51वाँ जन्मदिन है—जीवन के स्वर्ण जयंती वर्ष के बाद का पहला पड़ाव। यह पड़ाव केवल कैलेंडर के पन्नों पर जुड़ी एक संख्या नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, त्याग, धैर्य और अपनत्व से रचे गए अनगिनत अध्यायों का उत्सव है। लगभग 26 वर्षों के हमारे साथ में, मैंने एक बात बहुत गहराई से समझी है कि किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से बनती है..और यदि मुझे मनीषा जी को एक ही वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं बस इतना कहूँगा—वे उन दुर्लभ लोगों में हैं जो स्वयं से अधिक दूसरों की खुशियों में जीते हैं। कई लोग अच्छे होते हैं, कई लोग सज्जन भी होते हैं, लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिनके मन में किसी के लिए ईर्ष्या, द्वेष या कटुता का स्थान ही नहीं होता। मनीषा जी उन्हीं विरले लोगों में से हैं। किसी के सुख में प्रसन्न होना, किसी की परेशानी में बिना बुलाए साथ खड़े हो जाना, किसी की छोटी-सी उपलब्धि ...

विदाई से पुनर्मिलन तक का एक साल: वही जगह/वही साथी/वही तारीख…अद्भुत

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27 जून 2025…आकाशवाणी भोपाल के हमारे ग्रुप ‘न्यूजरूम’ में उस दिन हल्की सी उदासी और ढेर सारा प्यार था। कारण यह था कि बीते सात वर्षों से रोज़ की खबरों की दुनिया में मेरे मेरे  अभिन्न साथी मुझे विदाई दे रहे थे। दरअसल,माइक, हेडफोन, न्यूज डेस्क और उन अनगिनत यादों को पीछे छोड़कर मेरा तबादला पीआईबी शिमला हो गया था।  उस दिन भोपाल के एमपी नगर में ‘जश्न ए पैराडाइज’ होटल में विदाई- सह - मेलमिलाप कार्यक्रम रखा गया था। हँसी-मज़ाक के बीच हमारी आँखें नम हो रही थीं। भोपाल ने मुझे बहुत कुछ दिया था — अनुभव, दोस्ती, न्यूजरूम परिवार और आकाशवाणी की वह गर्मजोशी, जो कभी नहीं भूली जा सकती।  ठीक एक साल बाद, 27 जून 2026 को वही तारीख, वही होटल जश्न ए पैराडाइज। इस बार माहौल पूरी तरह उत्साह से भरा था। आकाशवाणी भोपाल के न्यूजरूम के साथी फिर से एकत्र हुए । वही, हमारा गैट टूगेदर का कार्यक्रम था। पुरानी यादें ताज़ा हुईं, हँसी के ठहाके गूँजे और हमारी खबरों की दुनिया के रोचक किस्से दोहराए गए। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि जिस दिन विदाई हुई थी, उसी दिन एक साल बाद पुनर्मिलन हो गया.. यह संयोग कितना अद्भुत है ।...

मौसम मौसम... लवली मौसम..."

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अस्सी के दौर की लोकप्रिय फिल्म थोड़ी सी बेवफाई फिल्म का प्रसिद्ध गीत "मौसम मौसम... लवली मौसम..." लिखते समय गुलज़ार साहब निश्चित ही शिमला या ऐसे ही किसी पहाड़ी इलाके से गुजरे होंगे क्योंकि मौसम को महसूस किए बिना उसे शब्दों में उतारना तभी संभव है जब आपने उसका पूरा लुत्फ़ उठाया हो । बहरहाल, यह गीत इन दिनों शिमला की फिज़ाओं पर बिल्कुल सटीक बैठता है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं इस गीत की लय पर झूम रही हो।  मानसून की आहट के साथ पहाड़ों की रानी शिमला ने एक बार फिर अपने सौंदर्य का नया ही रूप दिखा दिया है। बादलों की सफेद चादर कभी आसमान छूती पहाड़ियों को पूरी तरह ढक लेती है, तो अगले ही पल युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी के अंदाज़ में हवा का एक जोरदार झोंका बादलों को हटाकर देवदार के ऊँचे वृक्षों और दूर तक फैली हरियाली की झलक दिखा देता है। कभी नीचे से ऊपर उठती धुंध सब कुछ ढक लेती है। यह आँख-मिचौली दिनभर चलती है और इतनी मनमोहक होती है कि हर देखने वाला कुछ पल के लिए ठहर जाता है। इन दिनों शिमला की सुबह धुंध की चादर में लिपटी हुई होती हैं।  बिल्कुल वैसे ही जैसे 'राम तेरी गंगा मैली' म...

भोपाल की जामुन,शिमला की जामुन..कुछ स्वाद खरीदे नहीं जाते!!

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बरसात का अपना एक संस्कार होता है..इस दौरान केवल बादल आकर बरसते भर नहीं हैं बल्कि वे प्रकृति की पूरी रंगत बदल देते हैं, मिट्टी की मनमोहक सुगंध वातावरण में बिखर जाती है और मन के भीतर बारिश से जुड़ी सालों पुरानी यादें दस्तक देने लगती हैं। बारिश में किसी की यादों में चटपटे पकौड़े उभरते होंगे तो किसी के लिए भुट्टे परंतु मेरी यादों में अब सबसे ज्यादा जामुन का पेड़ शामिल हैं। इन्हीं दिनों जब जब बाज़ार में जामुन दिखाई देती है, मन अनायास ही भोपाल की ओर लौट जाता है—आकाशवाणी कॉलोनी के उस सरकारी आवास की ओर, जहाँ एक जामुन का पेड़ हमारे जीवन का मौन लेकिन सबसे लोकप्रिय सदस्य हुआ करता था। वह पेड़ पता नहीं किसने रोपा था या अपने आप पल बढ़ गया था क्योंकि हमारे इससे रिश्ते तब बने जब हम दोनों उम्र की परिपक्व दहलीज पर खड़े थे। फिर क्या था यह साल दर साल हमारे जीवन की मीठी स्मृतियों का हिस्सा बनता गया और कई अनजान परिवारों से मधुर संबंधों का आधार भी। वह हमारे हर अच्छे बुरे दिनों का साथी था, मौसमों का कथाकार और उदारता का जीवंत पाठ । बरसात शुरू होते ही उसकी शाखाएँ फलों से लद जाती थीं। पहले फूल आते,फिर नन्हें फल ,...

‘माखन के लाल’ किताब नहीं, बल्कि अदरक इलायची वाली चाय है!!

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यह किताब नहीं, अनुभवी हाथों से बनी कड़क चाय है.. इसमें संघर्ष के अदरक का स्वाद है तो उपलब्धियों की इलायची की खुशबू भी है। इसमें विद्यार्थियों के चायपत्ती जैसे अनुभव के सुनहरे रंग हैं तो चीनी की मिठास भी। वैसे भी, माखन के हम पहले बैच वाले ‘लालों’ से लेकर बाद के कई बैच तक की जिंदगी के कई अहम पड़ाव यहां मौजूद चाय की टपरी पर ही तय हुए थे।  हम बात कर रहे हैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा अपने 50 से ज्यादा पूर्व विद्यार्थियों की अनुभव-गाथाओं पर केंद्रित पुस्तक ‘माखन के लाल’ की। अपने अपने क्षेत्र के महारथी इन छात्रों के अनुभवों की पूंजी से भरा यह एक ऐसा खजाना है, जिसका फायदा हर आने वाली पीढ़ी को मिलता रहेगा। इसमें मुझे भी अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिला है। यह कोई साधारण स्मृति-संग्रह नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ है जो पत्रकारिता के सपने देखने वाले हर युवा को सिखाता है कि सफलता का रास्ता कितना कठिन, रोमांचक और प्रेरणादायी हो सकता है।  पुस्तक पढ़ते हुए लगता है जैसे पुराने दोस्त उसी चाय की टपरी पर पर एक बार फिर चाय की चुस्कियों के साथ अ...

मलाई बरफ: कतरा-कतरा स्वाद का पहाड़ी जादू

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  छह घंटे की लगातार मेहनत और डेढ़ घंटे में खेल खत्म। वैसे, हवा न लगे तो इसका जीवन करीब नौ घंटे का है लेकिन हवा लगी कि यह छुई मुई की तरह लजाकर पानी पानी हो जाती है। सबसे खास बात कि इसमें न तो कृत्रिम मलाई है और न ही बरफ..फिर भी नाम है मलाई बरफ और स्वाद ऐसा की आप पत्ता चाटते रह जाओगे। जी हां, पत्ता क्योंकि इसे पत्ते में ही दिया जाता है और पत्ते से ही खाया जाता है। हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश की मशहूर और पारंपरिक ‘मलाई बरफ’ की। यह ऐसी अनूठी आइसक्रीम है जिसमें न तो बर्फ़ के एक भी टुकड़े का इस्तेमाल होता है और न ही फ्रिज/फ्रीजर जैसी किसी मशीन की जरूरत पड़ती है लेकिन फिर भी यह इतनी ठंडी एवं मजबूती से जमी रहती है कि आप आराम से इसका एक एक टुकड़ा मुँह में घोलते हुए जीभ पर इसके स्वाद का कतरा कतरा महसूस कर सकते हैं। आमतौर पर आइसक्रीम का ख़्याल जेहन में आते ही फ्रीजर, बर्फ और रंग-बिरंगे कोन/कप की तस्वीर ही उभरती है लेकिन हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों की यह एक ऐसी पारंपरिक आइसक्रीम है, जो न बर्फ से बनती है और न मशीन से  बल्कि इसे बनाने के लिए बस दूध, आग और धैर्य की जरूरत पड़ती है। देखने में,...

विरासत,बदलाव और भविष्य पर गंभीर विमर्श

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 ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता विशेषांक की समीक्षा देश में शोध पर केंद्रित अनेक पत्रिकाएं या जर्नल निकल रहे हैं लेकिन अधिकतर अकादमिक संस्थानों से प्रकाशित हो रहे हैं और उनका विमर्श भी अकादमिक स्तर का ही रहता है लेकिन ‘समागम’ ने इस सीमा से न बँधकर अपने लिए विषयों का आसमान खुला रखा है। शायद, इसकी मूल वजह इस लोकप्रिय शोध पत्रिका का संपादक किसी शैक्षणिक विशेषज्ञ का न होकर खांटी पत्रकार प्रो मनोज कुमार का होना है। ‘समागम’ में विषयों की इतनी विविधता होती है कि हर अंक संग्रहणीय दस्तावेज बन जाता है। ‘समागम’ का मई माह का अंक भी विविधता की इसी श्रृंखला को आगे बढ़ा रहा है। खास बात यह है कि यह सामान्य अंक न होकर विशेषांक है। यह विशेषांक उदंत मार्तंड से लेकर अब तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल के इतिहास को केंद्र में रखकर तैयार किया गया एक गंभीर, बहुआयामी और शोधपरक प्रयास है। करीब डेढ़ सौ पेजों का यह अंक पत्रकारिता के विद्यार्थियों, अध्येताओं और संस्थानों के साथ साथ इस विषय में रुचि रखने वालों के लिए अत्यधिक उपयोगी है।  इस अंक की बात करते हुए संपादक प्रो मनोज कुमार बताते हैं कि- ‘हमारा प्रया...

किरदार में जीता एक उम्दा कलाकार

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  रोहिताश्व गौड़ किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। ‘भाबीजी घर पर हैं’ के मनमोहन तिवारी और ‘लापतागंज’ के मुकुंदीलाल गुप्ता के उनके किरदारों ने उन्हें घर घर में लोकप्रिय बना दिया है। रोहिताश्व गौड़ की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे हर भूमिका में जान फूंक देते हैं। वे हिंदी रंगमंच और टेलीविजन की उस परंपरा के प्रतिनिधि कलाकार हैं जिन्होंने अभिनय को केवल लोकप्रियता का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन के साधारण पात्रों को असाधारण ढंग से प्रस्तुत करने की कला बनाया है। लोकप्रिय धारावाहिक ‘भाबीजी घर पर हैं’ में निभाया गया उनका चरित्र केवल हास्य नहीं रचता, बल्कि छोटे शहरों की मानसिकता, महत्वाकांक्षा और घरेलू जीवन की विडंबनाओं को भी हल्के-फुल्के अंदाज़ में सामने लाता है। उनकी कॉमेडी में शोर नहीं, बल्कि अवलोकन की सूक्ष्मता दिखाई देती है। @RohitashvGour रोहिताश्व गौड़ की खासियत है कि वे अपने पात्रों में अभिनय करते हुए दिखाई नहीं देते, बल्कि उनमें घुल मिल जाते हैं। चाहे व्यंग्य हो, हास्य हो या आम भारतीय परिवारों के बीच का सहज संवाद, रोहिताश्व अपने चेहरे के भाव, संवाद की लय और देहभाषा से पात्र को विश्वसनीय बना ...

लेखकों को क्यों इतना पसंद आता है शिमला..!!

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  आखिर, शिमला में ऐसा क्या है कि दुनिया भर के नामी लेखक यहां खिंचे चले आते हैं? कोई यहां रहकर किताब लिखना चाहता है तो कोई यहां की वादियों पर ही शब्द चित्र उकेरने लगता है। कुछ तो ऐसा खास है देवभूमि हिमाचल प्रदेश और इसकी राजधानी में, जो हर छोटे बड़े रचनाकार को अपने मोहपाश में जकड़ लेता है। यह तो ज़ाहिर बात है कि लेखन के लिए मानसिक शांति और एकांत की आवश्यकता होती है। शिमला के घने देवदार-चीड़ के जंगल, धुंध भरी सुबह और आमतौर पर बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों की शांति लेखकों को रचनात्मक वातावरण प्रदान करती हैं। जिससे वे बाहरी शोर से दूर होकर अपने विचारों को शब्द दे पाते हैं। शायद, यही कारण है कि निर्मल वर्मा जैसे लेखकों की रचनाओं में शिमला का शांत और सुकून भरा माहौल स्पष्ट रूप से झलकता है। हिमालय की गोद में बसे इस शहर का प्राकृतिक सौंदर्य भी कवियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने यहाँ की वादियों से प्रभावित होकर अपनी प्रसिद्ध कविताओं की रचना की। यहां के पहाड़ों का बदलता मौसम, बर्फबारी और मनमोहक सूर्यास्त लेखकों की कल्पनाशीलता को नई उड़ान देते हैं। शिमला की एक अनूठी वि...