सोमवार, 2 नवंबर 2026

अष्टलक्ष्मी: आठ राज्य, आठ रंग


अष्टलक्ष्मी यानि देश के पूर्वी भाग में स्थित आठ राज्य। इन्हें सेवन सिस्टर्स और वन ब्रदर (सात बहनों और एक भाई) के नाम से भी जाना जाता है। यहां सिक्किम को भाई और शेष सात राज्यों अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा को सात बहनों के रूप में समझा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में इन राज्यों को देश का ईशान कोण करार दिया था। उनका कहना था कि वास्तु शास्त्र में जैसे ईशान कोण को सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। इसी प्रकार पूर्वोत्तर के राज्य भारत का ईशान कोण हैं और इनके विकास एवं समृद्धि के बिना देश के कल्याण की कल्पना नहीं की जा सकती।

भारत का यह ईशान कोण कला,संस्कृति,उत्सव,प्रकृति और भाषा के लिहाज से भी अलग पहचान रखता है। असम में अपने करीब पांच साल के कार्यकाल और उस दौरान इन राज्यों की सतत् यात्रा से यह अनुभव तो हो ही जाता है कि पूर्वोत्तर को यदि केवल पहाड़ों, बादलों, चाय के बागानों, बांस के जंगलों और नदियों की धरती कहा जाए, तो यह उसके वास्तविक परिचय का एक छोटा-सा हिस्सा होगा। इस क्षेत्र की असली पहचान उन उत्सवों में भी छिपी है, जिनमें कहीं धान की पहली फसल के साथ खुशियाँ घर लौटती हैं, कहीं युवा पारंपरिक परिधानों में नृत्य करते हुए अपनी सांस्कृतिक पहचान का उत्सव मनाते हैं, कहीं सूर्य की आराधना होती है, तो कहीं पूर्वजों को याद कर परिवार और समुदाय के रिश्तों को नए सिरे से मजबूत किया जाता है।



इन आठ राज्यों की सांस्कृतिक दुनिया इतनी विविध है कि यहाँ एक ही पर्व के भीतर प्रकृति, कृषि, लोकविश्वास, संगीत, भोजन और सामाजिक जीवन के अनेक रंग दिखाई देते हैं। इनमें से कई उत्सव सदियों पुरानी जनजातीय परंपराओं से विकसित हुए हैं। उनकी शुरुआत के संबंध में लिखित ऐतिहासिक प्रमाण हर जगह उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए उनकी उत्पत्ति को किसी एक वर्ष या घटना से जोड़ने के बजाय उन लोकमान्यताओं, कृषि-चक्रों और सामुदायिक परंपराओं के संदर्भ में समझना अधिक उचित है, जिनसे वे आज तक जीवित हैं।


आइए, इन आठ राज्यों के प्रमुख पर्वों के बहाने पूर्वोत्तर भारत की उस दुनिया में प्रवेश करें, जहाँ उत्सव कैलेंडर की तारीख भर नहीं, बल्कि जीवन को देखने का एक अलग नजरिया हैं।


अरुणाचल प्रदेश : जनजातीय संस्कृति की झलक


अरुणाचल प्रदेश की पहचान उसकी भौगोलिक विविधता जितनी व्यापक है, उतनी ही विविध यहाँ की जनजातीय संस्कृतियाँ भी हैं। अलग-अलग समुदायों के अपने देवी-देवता, लोकविश्वास, कृषि परंपराएँ और उत्सव हैं। यहाँ कोई एक पर्व पूरे राज्य की सांस्कृतिक तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर सकता। फिर भी न्योकुम, सोलुंग और लोसर जैसे उत्सव इस विविधता को समझने की अच्छी खिड़कियाँ हैं।


न्योकुम पर्व मुख्यतः यहां के न्यीशी समुदाय का प्रमुख पर्व है। इसका संबंध प्रकृति की शक्तियों, कृषि, उर्वरता और समुदाय की खुशहाली से है। फरवरी के आसपास मनाए जाने वाले इस पर्व में पारंपरिक अनुष्ठान किए जाते हैं। सामुदायिक स्थल पर पूजा-अर्चना होती है, लोग पारंपरिक वेशभूषा में जुटते हैं और लोकगीतों तथा नृत्यों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करते हैं। सामूहिक भागीदारी इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। न्योकुम का संदेश यह है कि समृद्धि केवल किसी एक व्यक्ति या परिवार की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के सुख और प्रकृति के संतुलन से जुड़ी है।



सोलुंग पर्व सामान्यतः सितंबर में आदि समुदाय द्वारा मनाया जाता है। इसका संबंध कृषि-जीवन, अच्छी फसल, पशुधन की सुरक्षा और सामुदायिक कल्याण से है। खेती के मौसम में यह पर्व लोगों को अपनी आजीविका और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर देता है। पारंपरिक रीति-रिवाजों, भोज, गीतों और नृत्यों के बीच परिवार तथा समुदाय एक साथ आते हैं। सोलुंग यह भी बताता है कि कृषि केवल अन्न पैदा करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक रिश्तों और सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने का माध्यम है।


वहीं, लोसर पर्व अरुणाचल के मोनपा समुदाय सहित कई हिमालयी बौद्ध समुदायों में नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। इसकी तिथि तिब्बती चंद्र-पंचांग के अनुसार बदलती है और सामान्यतः फरवरी या मार्च में पड़ती है। घरों की सफाई, धार्मिक अनुष्ठान, मठों में प्रार्थना, पारंपरिक भोजन और पारिवारिक मेल-मिलाप इसके प्रमुख हिस्से हैं।


असम : जीवन के अलग-अलग पड़ावों के उत्सव


असम में बिहू सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन के तीन अलग-अलग पड़ावों का उत्सव है। खेती-किसानी से गहरे जुड़े इस राज्य में बिहू की परंपरा असमिया समाज के कृषि-चक्र, ऋतुओं और नववर्ष की अवधारणा से विकसित हुई। इसके प्राचीन स्वरूप में स्थानीय समुदायों की प्रकृति और कृषि से जुड़ी मान्यताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।


रोंगाली बिहू पर्व अप्रैल के मध्य में मनाया जाता है।  रोंगाली या बोहाग बिहू असमिया नववर्ष और वसंत के आगमन का प्रतीक है। खेतों में नई कृषि गतिविधियों की शुरुआत, पेड़ों पर नई पत्तियाँ और प्रकृति की ताजगी इस उत्सव को विशेष बनाती हैं। युवक-युवतियाँ पारंपरिक मेखला-चादर और धोती-गमोसा पहनकर बिहू नृत्य करते हैं। ढोल, पेपा और गोगोना जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन वातावरण में उत्साह भर देती है। घरों में पीठा, लारू और अन्य पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। 


वहीं,भोगाली बिहू जनवरी में मनाया जाता है और यह फसल कटने के बाद की खुशहाली से जुड़ा है। लोग सामुदायिक भोज आयोजित करते हैं, पारंपरिक पकवान बनाते हैं और मेजी नामक अलाव जलाते हैं। कई स्थानों पर अस्थायी सामुदायिक संरचनाएँ बनाकर उत्सव मनाया जाता है। इसी तरह, अक्टूबर के आसपास मनाया जाने वाला काती या कोंगाली बिहू कृषि-वर्ष के उस समय आता है, जब खेतों में फसल बढ़ रही होती है, लेकिन घरों में नई उपज अभी नहीं पहुँची होती। तुलसी के पौधे, धान के खेतों और अन्य स्थानों पर दीप जलाने की परंपरा फसल की सुरक्षा और अच्छी उपज की कामना से जुड़ी है।


तीनों बिहू एक गहरा संदेश देते हैं कि जीवन में उल्लास के साथ प्रतीक्षा और कठिनाई के समय भी उम्मीद बनाए रखना जरूरी है। असम की संस्कृति इस तरह उत्सव को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से जोड़ती है।


मणिपुर : वैष्णव परंपरा का गढ़


मणिपुर के पर्वों में लोकविश्वास, वैष्णव परंपरा, कृषि और सामुदायिक जीवन का सुंदर मेल मिलता है। यहाँ का सांस्कृतिक संसार मैतेई परंपराओं के साथ-साथ राज्य के विभिन्न जनजातीय समुदायों की विशिष्ट पहचान से भी समृद्ध है। यहां का प्रमुख पर्व लाई हराओबा सृष्टि की कथा का जीवंत मंचन है। लाई हराओबा का अर्थ सामान्यतः देवताओं को प्रसन्न करना या आनंदित करना समझा जाता है। यह मैतेई समुदाय की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा उत्सव है। इसकी जड़ें उन स्थानीय मान्यताओं में हैं, जिनमें देवताओं, प्रकृति और सृष्टि के निर्माण को परस्पर संबंधित माना जाता है।


इसके आयोजन की तिथियाँ और अवधि स्थान के अनुसार बदल सकती हैं। अनुष्ठानों में मैबी कहलाने वाली पारंपरिक महिला धार्मिक साधिकाओं की विशेष भूमिका होती है। उनके नृत्य और मुद्राओं के माध्यम से सृष्टि, मानव जीवन और प्रकृति से संबंधित कथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। लाई हराओबा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकनृत्य, संगीत, मौखिक इतिहास और सामुदायिक स्मृति को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम भी है।


वहीं याओशांग पर्व होली के रंगों में मणिपुरी पहचान कायम रखता है। फरवरी या मार्च में मनाया जाने वाला याओशांग मणिपुर के प्रमुख उत्सवों में से एक है। इसकी तुलना उत्तर भारत की होली से की जाती है, लेकिन इसकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। वैष्णव परंपरा से जुड़े इस पर्व में धार्मिक अनुष्ठान, रंगों का उल्लास, खेलकूद और सामुदायिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं। रात में आयोजित होने वाला थबल चोंगबा विशेष आकर्षण है। इसमें युवक-युवतियाँ चंद्रमा की रोशनी में पारंपरिक गीतों के साथ गोलाकार नृत्य करते हैं। यह दृश्य मणिपुर की सांस्कृतिक आत्मीयता और युवाओं की जीवंत भागीदारी का प्रतीक है।


जबकि संगाई महोत्सव संस्कृति और पर्यटन का आधुनिक संगम है। संगाई महोत्सव अपेक्षाकृत आधुनिक आयोजन है, जिसे मणिपुर की सांस्कृतिक विविधता, हस्तशिल्प, व्यंजन, संगीत और पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विकसित किया गया। इसका नाम राज्य के प्रसिद्ध संगाई हिरण पर रखा गया है, जो मणिपुर की प्राकृतिक विरासत का प्रतीक है।


मेघालय : बादलों का घर


मेघालय में खासी, गारो और जयंतिया आदिवासी समुदायों की परंपराएँ पहाड़ों, वर्षा, कृषि और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ी हैं। इनके प्रमुख उत्सवों में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामूहिक समृद्धि की कामना स्पष्ट दिखाई देती है।


यहां के वांगला पर्व को सौ ढोलों वाला फसल उत्सव भी कहा जाता है। दरअसल, वांगला पर्व गारो समुदाय का प्रमुख फसल उत्सव है। इसे प्रायः अक्टूबर या नवंबर में फसल कटाई के बाद मनाया जाता है। इसकी पारंपरिक धार्मिक पृष्ठभूमि सूर्य से संबंधित देवता सलजोंग के प्रति आभार व्यक्त करने से जुड़ी है। उत्सव में पारंपरिक ढोल बजाए जाते हैं और स्त्री-पुरुष समूह में नृत्य करते हैं। रंगीन परिधान, पंखों से सजे सिर के आभूषण और ढोल की लय इस आयोजन को विशिष्ट बनाते हैं। 


वहीं, नोंगक्रेम पर्व समृद्धि और सामाजिक एकता की कामना के लिए मनाया जाता है। खासी समुदाय का नोंगक्रेम नृत्य उत्सव विशेष रूप से खासी हिल्स क्षेत्र में मनाया जाता है। इसका धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र सिएम या पारंपरिक खासी नेतृत्व से जुड़ी व्यवस्थाओं के साथ-साथ समुदाय की प्राचीन मान्यताएँ हैं। इसमें धार्मिक अनुष्ठान, पारंपरिक नृत्य और सामुदायिक सहभागिता शामिल होती है। उत्सव का संबंध अच्छी फसल, शांति और समृद्धि की कामना से है। पारंपरिक वेशभूषा में महिलाओं के सुंदर आभूषण और पुरुषों की विशिष्ट पोशाक खासी संस्कृति की अलग पहचान प्रस्तुत करते हैं।


जबकि, जयंतिया समुदाय का बेहदीनख्लाम पर्व मुख्यतः जुलाई में जोवाई क्षेत्र में मनाया जाता है। इसके नाम और अनुष्ठानों का संबंध बीमारी तथा विपत्तियों को दूर करने की सामुदायिक कामना से जोड़ा जाता है। इस अवसर पर लकड़ी के विशाल, रंगीन ढाँचों को सजाया जाता है और धार्मिक जुलूस निकाले जाते हैं। पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच लोग सामूहिक कल्याण की प्रार्थना करते हैं।



मिजोरम : खुशियों के उत्सव


मिजोरम की पहाड़ियों में जब सर्दियों की विदाई के बाद वसंत दस्तक देता है, तब चपचार कुट पर्व के साथ खुशियों का नया मौसम शुरू होता है। यह मिजो समुदाय का सबसे प्रसिद्ध पारंपरिक पर्व है। इसकी जड़ें झूम खेती की पुरानी पद्धति में हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि झूम खेती में जंगल के एक हिस्से की वनस्पति काटकर भूमि को खेती के लिए तैयार किया जाता है। कटाई के बाद लकड़ियों और वनस्पति के सूखने की प्रतीक्षा के दौरान मिलने वाला अवकाश सामुदायिक उत्सव का अवसर बन गया। इसी कृषि-चक्र से चपचार कुट की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।


मार्च में मनाए जाने वाले इस पर्व में पारंपरिक परिधान पहनकर लोग नृत्य, संगीत और सामुदायिक भोज में हिस्सा लेते हैं। इसका सबसे आकर्षक पक्ष चेरॉ नृत्य है, जिसे बाँस नृत्य भी कहा जाता है। इसमें नर्तक-नर्तकियाँ जमीन पर लयबद्ध ढंग से खोले और बंद किए जाते बाँसों के बीच अत्यंत फुर्ती से कदम रखते हैं। बाँसों की ताल और कलाकारों के कदमों का मेल देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

चपचार कुट का महत्व केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। यह मिजो समाज के श्रम, सामूहिकता और प्रकृति के साथ तालमेल का उत्सव है। 


नागालैंड : उत्सवों की धरती


नागालैंड में अनेक नगा जनजातियों की अपनी-अपनी परंपराएँ, भाषाएँ, नृत्य और पर्व हैं। इसलिए राज्य की संस्कृति को किसी एक उत्सव में समेटना संभव नहीं। फिर भी हॉर्नबिल महोत्सव इन विविधताओं को एक साझा मंच प्रदान करता है। अब तो इस उत्सव में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी शामिल होते हैं।


वास्तव में हॉर्नबिल महोत्सव परंपराओं को जोड़ने की आधुनिक पहल है। इसकी शुरुआत वर्ष 2000 में नागालैंड सरकार ने राज्य की सांस्कृतिक विरासत को एक मंच पर प्रस्तुत करने और पर्यटन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की थी। इसका नाम हॉर्नबिल पक्षी पर रखा गया है, जिसका नगा लोकजीवन और सांस्कृतिक प्रतीकों में विशेष स्थान है।


दिसंबर के पहले दस दिनों में कोहिमा के निकट किसामा स्थित नगा हेरिटेज विलेज में आयोजित होने वाले इस महोत्सव में विभिन्न जनजातियाँ अपने पारंपरिक नृत्य, गीत, परिधान, हस्तशिल्प और व्यंजन प्रस्तुत करती हैं। पारंपरिक मोरुंग यानी सामुदायिक युवा-भवनों की प्रतिकृतियाँ भी आकर्षण का केंद्र होती हैं। लकड़ी के विशाल नगाड़ों की गूँज, पारंपरिक युद्ध-नृत्य, लोकगीत और स्थानीय खेल नागालैंड के इतिहास तथा सामुदायिक जीवन की झलक दिखाते हैं। आज इस आयोजन में आधुनिक संगीत, कला और पर्यटन से जुड़े कार्यक्रम भी शामिल हैं।


हॉर्नबिल की विशेषता यह है कि यह किसी एक जनजाति का उत्सव नहीं, बल्कि अनेक सांस्कृतिक पहचानों के बीच संवाद का अवसर है। यह एक आधुनिक मंच है, जिसकी जड़ें पुरानी परंपराओं में हैं।


हॉर्नबिल के अलावा यहां फसल के बाद खुशियों का उत्सव मनाने के लिए टोकू एमोंग पर्व भी लोकप्रिय पर्व है। लॉथा समुदाय का टोकू एमोंग सामान्यतः नवंबर में मनाया जाता है। खेतों का काम पूरा होने के बाद परिवार और समुदाय एक साथ आते हैं। भोज, गीत, नृत्य और आपसी मेल-मिलाप इसके प्रमुख अंग हैं।


सिक्किम : आध्यात्मिक साधना का केंद्र


सिक्किम की संस्कृति में हिमालय, बौद्ध दर्शन, लेपचा विरासत और नेपाली लोकपरंपराओं का अनूठा संगम है। यहाँ के उत्सवों में प्रकृति के प्रति श्रद्धा और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व है। सिक्किम के सबसे प्रमुख पर्व लोसर में पुराने वर्ष को विदा, नई उम्मीदों का स्वागत किया जाता है। सिक्किम के तिब्बती बौद्ध समुदायों में इसकी परंपरा तिब्बती चंद्र-पंचांग और बौद्ध सांस्कृतिक जीवन से जुड़ी है। इसे सामान्यतः फरवरी या मार्च में मनाया जाता है ।


लोसर की तैयारी घरों की सफाई और सजावट से शुरू होती है। परिवार पारंपरिक भोजन तैयार करते हैं, एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं और मठों में विशेष प्रार्थनाओं तथा धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हैं। कई स्थानों पर पारंपरिक मुखौटा नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ भी आयोजित होती हैं। लोसर का संदेश केवल नए वर्ष का स्वागत करना नहीं है। यह बीते समय की कटुता छोड़कर मन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है।


पांग ल्हाबसोल : कंचनजंघा के प्रति श्रद्धा


सिक्किम का एक अन्य उत्सव पांग ल्हाबसोल पर्व यहाँ की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ा पर्व है। इसमें कंचनजंघा पर्वत को राज्य का रक्षक मानकर श्रद्धा व्यक्त की जाती है। यह कुछ कुछ गोवर्धन पूजा जैसा उत्सव है। इस अवसर पर पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान, प्रार्थनाएँ और मुखौटा नृत्य आयोजित किए जाते हैं। विशेष रूप से 'सिंहिक छाम' नामक नृत्य प्रसिद्ध है, जिसमें योद्धाओं जैसी मुद्राओं के माध्यम से साहस और सामुदायिक एकता का भाव प्रदर्शित होता है।


त्रिपुरा : बंगाली संस्कृति की झलक 


त्रिपुरा की सांस्कृतिक पहचान में जनजातीय परंपराओं, बंगाली सांस्कृतिक प्रभाव और प्राचीन राजपरंपराओं का मेल दिखाई देता है। यहाँ के प्रमुख उत्सवों में खारची पूजा और गरिया पूजा विशेष स्थान रखते हैं। खारची पूजा में चौदह देवताओं की आराधना की जाती है। राजधानी अगरतला के निकट स्थित चतुर्दश देवता मंदिर में आयोजित खारची पूजा राज्य के प्रमुख धार्मिक उत्सवों में से एक है। यह सामान्यतः जुलाई में मनाया जाता है। इसकी परंपरा त्रिपुरा की पुरानी राजकीय और धार्मिक संस्कृति से जुड़ी है।


खारची पूजा में चौदह देवताओं की आराधना की जाती है। धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना और जुलूस इस उत्सव के महत्वपूर्ण अंग हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं। मंदिर परिसर के आसपास मेले जैसा वातावरण बन जाता है, जहाँ स्थानीय वस्तुओं, भोजन और हस्तशिल्प की भी झलक मिलती है। इस उत्सव की एक खास बात यह है कि यह विभिन्न समुदायों के लोगों को एक साथ आने का अवसर देता है। त्रिपुरा की सांस्कृतिक विविधता के बीच साझा धार्मिक और सामाजिक अनुभवों की भूमिका यहाँ स्पष्ट दिखाई देती है।


वहीं, गरिया पूजा पर्व खेती, पशुधन और समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाता है। गरिया पूजा सामान्यतः अप्रैल में की जाती है और इसका संबंध कृषि-वर्ष की शुरुआत, अच्छी फसल, पशुधन तथा परिवार की खुशहाली की कामना से है। इस अवसर पर गरिया देवता की पूजा की जाती है। पारंपरिक गीत, नृत्य, अनुष्ठान और सामुदायिक आयोजन पर्व का हिस्सा होते हैं। 


कुल मिलाकर पूर्वोत्तर के इन आठ राज्यों के प्रमुख पर्वों की यात्रा के बाद एक दिलचस्प बात यह सामने आती है कि इन राज्यों की भाषा अलग है, पारंपरिक पोशाकें अलग हैं, नृत्य की मुद्राएँ अलग हैं और धार्मिक विश्वासों में भी विविधता है, लेकिन उत्सवों के मूल भाव में कई समानताएँ हैं। जैसे असम का बिहू, मेघालय का वांगला, अरुणाचल का सोलुंग और त्रिपुरा की गरिया पूजा बताते हैं कि खेती और प्रकृति के प्रति आभार इन समाजों के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है।


वहीं, नागालैंड का हॉर्नबिल, मिजोरम का चपचार कुट और मणिपुर का याओशांग लोगों को एक साथ लाते हैं। उत्सव यहाँ सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने का माध्यम हैं। सिक्किम का सागा दावा, लोसर और अरुणाचल के धार्मिक पर्व जीवन में आध्यात्मिकता, करुणा तथा नई शुरुआत के महत्व को सामने रखते हैं।


आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है और पारंपरिक जीवन-पद्धतियों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो रही हैं, तब इन उत्सवों का महत्व और बढ़ जाता है। इनके संरक्षण का अर्थ केवल रंगीन परिधानों और आकर्षक नृत्यों को बचाए रखना नहीं, बल्कि उन भाषाओं, लोककथाओं, संगीत परंपराओं और सामुदायिक मूल्यों को जीवित रखना भी है, जिन्होंने इन्हें जन्म दिया। [यह लेख शोध पत्रिका समागम के नवंबर अंक में प्रकाशित हुआ है]

*(लेखक करीब पांच साल पूर्वोत्तर में आकाशवाणी में पदस्थ रहे हैं और वहां की विशिष्टताओं पर लिखते रहे हैं।)


संदर्भ:


1.भारत सरकार का पर्यटन मंत्रालय, 2.Utsav पोर्टल

3.अरुणाचल प्रदेश पर्यटन विभाग 

4.असम पर्यटन विभाग 

5.Manipur Sangai Festival 2025 

6.मेघालय पर्यटन विभाग 

7.पूर्वोत्तर परिषद का NEC Newsletter 

8.मिजोरम पर्यटन विभाग 

9.नागालैंड पर्यटन विभाग 

10.Anthropological Survey of India के प्रकाशन

11.National Book Trust के प्रकाशन

12. राज्यों के कला एवं संस्कृति विभाग से जनजातीय परंपराओं, लोकनृत्यों और पर्वों पर पुस्तिकाएँ तथा स्मारिका ।




गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

‘मून टूरिज्म’ ने बढ़ाई शिमला की रौनक


शहरों की ऊंची इमारतों, धुएं और धुंध के बीच चांद का इंतजार करने के बजाय अगर कोई जोड़ा पहाड़ों की ठंडी वादियों में पहुंच जाए, तो समझिए करवा चौथ ने पर्यटन का नया रास्ता खोज लिया है। इन दिनों शिमला की रौनक को देखकर कुछ ऐसा ही लगता है। मॉल रोड पर सजी-धजी युवतियों की चहल-पहल, हाथों में मेहंदी लगाए सुहागिनें और रिज मैदान पर आसमान निहारती आंखें। इस खूबसूरत तस्वीर के केंद्र में है ‘मून टूरिज्म’ यानी चांद के दीदार को ही यात्रा का खास मकसद बना लेना।

करवा चौथ का चांद हमेशा से प्रेम, प्रतीक्षा और विश्वास का प्रतीक रहा है। फर्क बस इतना है कि पहले चांद के निकलने का इंतजार घर की छत या आंगन में होता था, अब इसके लिए पर्यटन स्थलों की बुकिंग भी होने लगी है। दिल्ली, चंडीगढ़ और दूसरे मैदानी शहरों से कई जोड़े पहाड़ों की ओर रुख करते हैं, ताकि खुले आसमान के नीचे चांद को निहारते हुए व्रत खोलने का अनुभव यादगार बना सकें।


शिमला इस रोमांटिक पर्यटन के लिए खास आकर्षण रखता है। देवदार के पेड़ों से घिरी पहाड़ियां, सर्द हवा के झोंके और दूर तक फैला आसमान करवा चौथ की शाम को एक अलग ही रंग देते हैं। रिज मैदान और स्कैंडल पॉइंट के आसपास घूमते पर्यटक, पारंपरिक परिधानों में सजे जोड़े और बाजारों की जगमगाहट शहर को उत्सव के रंग में रंग देती है। हालांकि आज चांद के दर्शन मौसम, बादलों और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर हैं, लेकिन प्रतीक्षा का रोमांच भी इस यात्रा का हिस्सा बन गया है।


पर्यटन कारोबार के लिए भी यह नया अवसर है। होटल और रिसॉर्ट अपने यहां विशेष सजावट, रोमांटिक डिनर, पूजा की थाली और चांद देखने के लिए खुले स्थान जैसी सुविधाओं का प्रचार कर रहे हैं। कुछ जगहों पर विशेष पैकेज और छूट भी मिल रही है। इससे होटल, रेस्तरां, टैक्सी संचालकों, फूल विक्रेताओं और स्थानीय दुकानदारों को अतिरिक्त कारोबार की उम्मीद है। 


इस नए चलन का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसमें परंपरा और आधुनिक जीवनशैली एक साथ दिखाई देते हैं। दिन में शिमला की गलियों में घूमना और शाम को चांद निकलने की प्रतीक्षा । छलनी से चांद देखने और फिर जीवनसाथी का चेहरा निहारने की रस्म जब पहाड़ों की पृष्ठभूमि में पूरी होती है, तो उसकी तस्वीरें यादों के साथ सोशल मीडिया पर भी जगह बना लेती हैं।


लेकिन मून टूरिज्म की असली खूबसूरती केवल तस्वीरों, महंगे कमरों या विशेष आयोजनों में नहीं है। यह रोजमर्रा की भागदौड़ से निकलकर एक-दूसरे के साथ कुछ सुकून भरे पल बिताने का बहाना भी है। करवा चौथ की परंपरा अपनी जगह है और उसे मनाने के तरीके व्यक्तिगत पसंद के अनुसार बदल सकते हैं।


शिमला की पहाड़ियां यही संदेश देती हैं कि त्योहारों की खुशियां सीमाओं में नहीं बंधतीं। कभी चांद आंगन में उतरता था, अब उसे देखने और उसके और करीब जाने के लिए लोग पहाड़ों का सफर तय कर रहे हैं। आस्था वही है, प्रेम वही है…बस चांद तक पहुंचने का रास्ता ज्यादा खूबसूरत हो गया है।


बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

बैंटनी कैसल: शिमला में विरासत से विकास का चश्मदीद


मैं बैंटनी कैसल हूँ। शिमला में मॉल रोड पर स्कैंडल पॉइंट से कालीबाड़ी जाते हुए आपने कई बार मुझे देखा होगा..हो सकता है तस्वीर भी निकलवाई हो और यहां बोर्ड पर दर्ज मेरी जानकारी पर भी शायद सरसरी नज़र दौड़ाई हो । परंतु, क्या आपने कभी मेरी खामोशी को सुनने की कोशिश की है? मेरी लकड़ी की दीवारों, ढलानदार छतों, छोटे-छोटे बुर्जों और पुराने दरवाजों के पीछे की कहानियाँ सुनने का प्रयास किया है..शायद नहीं, इसलिए आज अपनी कहानी मैं खुद सुनाता हूं। वैसे, हाल ही में मेरी विकास गाथा में डिजिटल म्यूजियम नामक नया पन्ना जुड़ गया है जो मेरे साथ साथ शिमला ही नहीं इस देवभूमि की कहानी सुनाने लगा है। फिर भी मेरे मन की बात आप मुझसे ही सुनिए।


मैं बैंटनी कैसल केवल पत्थर, लकड़ी, ईंट और चूने से बना कोई पुराना यूरोपियन गोथिक शैली का भवन भर नहीं हूँ। मैं तकरीबन डेढ़ सौ साल से शिमला के बदलते समय का गवाह हूँ। मैंने अंग्रेजी हुकूमत का वैभव देखा है, पहाड़ी रियासत की शाही जिंदगी का हिस्सा रहा हूँ, विश्व युद्धों के दौर की हलचल महसूस की है और आजाद भारत में सरकारी दफ्तरों की जिम्मेदारियाँ भी निभाई हैं। फिर एक समय ऐसा आया, जब मेरी पहचान धुंधली पड़ने लगी पर मेरी कहानी खत्म नहीं हुई। मुझे नया जीवन मिला और आज मैं करीब 20 हजार वर्ग मीटर के अपने परिसर में हिमाचल की कला, संस्कृति और इतिहास को समेटने की कोशिश कर रहा हूँ।



मेरी कहानी उन्नीसवीं सदी के उस दौर से शुरू होती है, जब शिमला अंग्रेजी शासन के प्रभाव में तेजी से एक महत्वपूर्ण पहाड़ी नगर के रूप में विकसित हो रहा था। अंग्रेज अधिकारी यहाँ की ठंडी जलवायु, पहाड़ों और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण गर्मियों में यहां रहना पसंद करते थे। धीरे-धीरे शिमला में ऐसे भवन बनने लगे, जिनमें यूरोपीय वास्तुकला और पहाड़ी परिवेश का अनूठा मेल दिखाई देता था।


जिस जगह आज मैं खड़ा हूँ, वहाँ शुरू में कैप्टन ए. गॉर्डन का एक कॉटेज हुआ करता था। बाद में सिरमौर रियासत ने इस संपत्ति को अपने अधिकार में लिया और वर्ष 1880 के आसपास मेरे निर्माण या पुनर्निर्माण का दौर शुरू हुआ। जब मैं उस समय के शिमला को याद करता हूँ तो मेरे कानों में घोड़ों की टापें, बग्घियों की आवाजाही और अंग्रेज अफसरों की ठसक सुनाई पड़ने लगती है। 


लोग भले ही मुझे बैंटनी कैसल के नाम से जानते हैं, लेकिन मेरे व्यक्तित्व में यूरोप के किसी किले की कठोरता नहीं, बल्कि एक पुराने अंग्रेजी आवास की शालीनता और पहाड़ी घरों की आत्मीयता है। मेरी वास्तुकला में अंग्रेजी काउंटी-हाउस शैली और सिरमौर की पारंपरिक शाही स्थापत्य परंपरा का मेल दिखाई देता है। मेरे मौजूदा स्वरूप को 1901-02 के पुनर्निर्माण से भी जोड़ा जाता है। इस काम के लिए इंजीनियर और वास्तुकार टी. ई. जी. कूपर का नाम भी मेरे साथ दर्ज है।



मेरी दो मंजिला मुख्य इमारत, ढलानदार छत, छोटे बुर्ज और लकड़ी का काम मुझे आसपास की इमारतों से अब अलग पहचान देते हैं। मेरे निर्माण में इस्तेमाल की गई सामग्री और कारीगरी उस दौर के शिल्पकारों की दक्षता की कहानी कहती है। मेरे चारों ओर फैला परिसर भी मेरी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। मेरे परिसर में मौजूद पुराने देवदार के पेड़ आज भी मेरे बदलाव और स्मृतियों के साक्षी हैं।


मेरी खासियत यह है कि मेरी बनावट में अलग-अलग संस्कृतियों और निर्माण परंपराओं ने एक-दूसरे के साथ जगह बनाई। मैं अंग्रेजी स्थापत्य का उदाहरण भर नहीं हूँ। मैं, शिमला में यूरोपीय प्रभाव और पहाड़ी रियासतों की साझा विरासत का हिस्सा हूँ। मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय सिरमौर रियासत से भी जुड़ा है। मैं रियासत के ग्रीष्मकालीन निवास के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और शिमला की ठंडी जलवायु और प्राकृतिक सुंदरता में राजपरिवार के लिए आराम और आतिथ्य का स्थान बना।


मैं, बैंटनी कैसल दोनों विश्व युद्धों का गवाह हूं। जब सन् 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो मेरे परिसर का इस्तेमाल सरकार के सैन्य कार्यों से संबंधित कार्यालय के लिए होने लगा । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी मैंने कमोबेश यही भूमिका निभाई। युद्ध समाप्त हुए तो राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं और भारत की स्वतंत्रता का समय नजदीक आ गया। मैं, समझ गया कि आजाद भारत में अब नई भूमिका मेरा इंतजार कर रही है।


वर्ष 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ और देश का अप्रिय विभाजन भी । उस दौरान, लाहौर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र द ट्रिब्यून को विभाजन के कारण अपना ठिकाना बदलना पड़ा और 25 सितंबर 1947 से 12 मई 1948 तक मेरे परिसर में इस समाचार पत्र का कार्यालय भी रहा। सोशल मीडिया के जरिए एक जानकारी ओर मिली की यहां के सूद परिवार के साथ भी मेरा आत्मीय रिश्ता रहा है।


इसके बाद मेरे जीवन में सरकारी कामकाज का एक लंबा दौर आया। वर्ष 1957 से मेरी मुख्य इमारत में हिमाचल प्रदेश का पुलिस मुख्यालय रहा। मेरे परिसर की दूसरी इमारत बैंटनी कॉटेज का उपयोग रोजगार कार्यालय के रूप में किया गया। इस तरह मैं शाही निवास से प्रशासनिक परिसर में बदल गया। हालांकि वक्त के थपेड़ों के साथ मेरी इमारत पुरानी होने लगी। आखिर उम्र तो मेरी भी बढ़ ही रही थी। मेरी छतों, लकड़ी के हिस्सों, दरवाजों और अन्य संरचनाओं को संरक्षण की आवश्यकता महसूस होने लगी थी।



फिर आया वर्ष 2017, जब हिमाचल प्रदेश सरकार ने भाषा, कला एवं संस्कृति विभाग के माध्यम से मेरा अधिग्रहण कर लिया । मेरे लिए यह बदलाव लंबे अंधेरे के बाद रोशन दान जैसा था। इस बदलाव के बाद मेरी दीवारों के भीतर हिमाचल की संस्कृति, इतिहास, लोककलाओं और परंपराओं को स्थान मिलने लगा। अब मेरी उम्र को कमजोरी नहीं, बल्कि मेरी सबसे बड़ी विशेषता के रूप में देखा जाने लगा था।


 जुलाई 2026 में मेरे जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ, जब मुझे डिजिटल संग्रहालय के रूप में आम लोगों के सामने प्रस्तुत किया गया। अब मैं अपने प्रदेश की व्यापक सांस्कृतिक पहचान को सामने लाने का माध्यम हूँ।  मेरी ऐतिहासिक बनावट और आधुनिक डिजिटल प्रस्तुति मिलकर अतीत तथा वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करती हैं। 


मैं बैंटनी कैसल हूँ। मेरा अतीत मेरे साथ है, लेकिन मैं केवल विरासत में जीना नहीं चाहता। मेरी इच्छा है कि आने वाली पीढ़ियाँ मेरी दीवारों में इतिहास की धड़कन सुनें, मेरी वास्तुकला में पुराने शिल्पकारों की कल्पना देखें और मेरे भीतर प्रदर्शित हिमाचली संस्कृति में अपनी जड़ों को पहचानें एवं विरासत से विकास तक की मेरी ऐतिहासिक यात्रा के साक्षी बन मुझे जीवंत बनाए रखें।


मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

पकवान हैं या पहाड़ी मिसाइलें..!!

।। हिमाचल प्रदेश के अनूठे खानपान पर विशेष।।


फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में गुजराती खाने को लेकर करीना कपूर का एक डायलॉग बड़ा चर्चित हुआ था- “तुम्हारे खाने के नाम ऐसे होते हैं जैसे कोई मिसाइल फटने वाली हो... ढोकला, फाफड़ा, हांडवा, थेपला... ऐसा लगता है जैसे कोई बम ब्लास्ट होने वाला है!"...शायद करीना या इस फिल्म के संवाद लेखक का कभी हिमाचली खानपान से सामना नहीं हुआ होगा वरना वे गुजरात की बजाए हिमाचल की पृष्ठभूमि को फिल्म में रखते। 


यदि आपने भी नाम नहीं सुने हैं तो सुनिए हिमाचली व्यंजन अपने विशिष्ट नामों के मामले में किसी भी प्रकार से गुजरात से पीछे नहीं है जैसे पतीड़, घी-लौटे, भगचीरी, पकैन, ओगल के पकौड़े, बबरू, कापरु, इन्ड्रा, जय पाटांडा और सिड्डू। ये तो महज कुछ लोकप्रिय नाम हैं जबकि इन जैसे तमाम व्यंजन यहां पहाड़ों में अपने अनूठे स्वाद का जादू बिखेर रहे हैं।


खैर,ये तो हुई हल्की फुल्की बातें लेकिन सबसे खास बात यह है कि हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी व्यंजन सिर्फ खाना नहीं, बल्कि पहाड़ों की कहानी, मेहनत और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक हैं। ये व्यंजन आसपास उपलब्ध सामग्री से बनते हैं, लेकिन इनका स्वाद और सेहत से भरी खूबियां अनुकरणीय हैं। ये पहाड़ी व्यंजन सिर्फ पेट नहीं भरते बल्कि दिल और स्मृतियों को भी अपने स्वाद तथा खुशबू से भर देते हैं।



हिमाचल प्रदेश में ठंड का आगाज हो गया है और पहाड़ में भी ऊंचे स्थानों पर रहने वाले लोग कड़ाके की ठंड और बर्फबारी से पहले खानपान के इंतजाम में जुट गए हैं। 

इन व्यंजनों की विशेषता यह है कि ये स्थानीय सामग्री, मौसम के अनुरूप और लम्बे समय तक खराब नहीं होने के गुणों से भरपूर हैं।


फर्मेंटेशन, स्टीमिंग और घी का इस्तेमाल इन्हें पाचन में आसान तो बनाता ही है, साथ ही ये ठंडी जलवायु में शरीर को गर्माहट, इम्यूनिटी और ऊर्जा देते हैं। किण्वन (फर्मेंटेशन), अनाज को भिगोने, पीसने, मसालों का संतुलित इस्तेमाल और भाप में पकाने जैसी तकनीकें हिमाचल की पारंपरिक रसोई को विशिष्ट बनाती हैं। 



एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि हिमाचल प्रदेश में भोजन का संबंध केवल भूख मिटाने से नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक परंपराओं से भी है। विवाह, त्योहार, देव उत्सव, फसल कटाई और अन्य सामुदायिक अवसरों पर ये विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं।


अब एक नज़र कुछ खास व्यंजनों, उनकी सामग्री और सेहत से भरपूर गुणों पर डाल लेते हैं। सबसे पहले बात पतीड़/ पतरोड़े / पत्रोडू की। यह वास्तव में अरबी के पत्तों का लज़ीज़ व्यंजन है और पहाड़ों में अरबी के बड़े-बड़े हरे पत्ते एक तरह से प्रकृति का उपहार हैं।


इन पत्तों को बेसन-मसालों के घोल में लपेटकर भाप में पका कर फिर तला जाता है। हम सब जानते हैं कि अरबी के पत्ते फाइबर, आयरन और कैल्शियम से भरपूर होते हैं एवं ठंड के मौसम में शरीर को गर्म रखते हैं। वैसे यह मैदानी इलाकों में भी चाव से खाया जाता है।


वहीं, घी-लौटे या चिल्डू फर्मेंटेड गेहूं के आटे से बने स्टीम्ड ब्रेड या पैनकेक जैसा व्यंजन हैं, जिनमें गुड़, सौंफ और तिल मिलाए जाते हैं। इनमें पर्याप्त मात्रा में प्रो-बायोटिक्स मिलते हैं, जो पेट के लिए वरदान हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में यह ताकत और गर्माहट दोनों के लिए उपयोगी है। घी के साथ या फिर सुबह की चाय/दूध के साथ इसका स्वाद कमाल का होता है।



वहीं, भगचीरी चावल, दाल और दही का मिश्रण है जो आसानी से पच जाता है जबकि पकैन या पोलडू खासतौर पर शिवरात्रि या त्योहारों पर बनने वाला कचौड़ी जैसा होता है और इसमें उड़द दाल या अन्य सामग्री की भरावन होती है। यह प्रोटीन और फाइबर का खजाना है।


इसीतरह ओगल या बकवीट या कुट्टू के पकौड़े सेहत का पावर पैक है। खासतौर पर सर्दियों में बनने वाले ये पकौड़े ग्लूटेन-फ्री, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते हैं और ब्लड शुगर कंट्रोल करने से लेकर शरीर को गर्म रखने में सहायक है। 


अब बात बाबरू या बबरू की…यह कोई गब्बर या गबरू का भाई नहीं बल्कि एक तरह की पहाड़ी कचौड़ी है जिसे आमतौर पर गेहूं के आटे एवं गुड़ से बनाया जाता है। इसे पंजाबी भटूरे का पहाड़ी भाई भी कह सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में लोकप्रियता के मसले पर यह सिड्डू के बाद या उसके समकक्ष है। चाय के साथ इसका स्वाद लाजवाब होता है। 


कापरु भी कपड़े का दूसरा नाम नहीं बल्कि दाल या आटे से बना पहाड़ी अंदाज का स्वादिष्ट स्नैक है। इसी तरह इन्ड्रा या इन्ड्रे कुलथी दाल से बनी सूप जैसी डिश है। कड़ाके की सर्दी के दौरान यह प्रोटीन, आयरन और फाइबर का खजाना है और जोड़ों के दर्द, वजन नियंत्रण और किडनी स्टोन में फायदेमंद। इसे आयुर्वेदिक गुणों वाला व्यंजन माना जाता है।


जय पाटांडा या पटांडे भी दीपावली के पटाखे का कोई प्रकार नहीं है बल्कि गेहूं या रागी के आटे के पैन केक है। यह दूध, गुड़ और घी के साथ एनर्जी देने वाला व्यंजन है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए तो यह खासतौर पर उपयोगी है। आजकल के फास्ट फूड के लिए लार टपकाने वाली दुनिया में ये व्यंजन हमें याद दिलाते हैं कि असली स्वाद फटाफट फूड में नहीं बल्कि सरलता और सतत् अनुभव से बनी परंपरा में है। 



हिमाचल प्रदेश के व्यंजनों के स्वादिष्ट होने के साथ साथ सेहत से भरपूर होने का दावा हमारा नहीं है बल्कि पोषण विशेषज्ञों ने भी इस पर अपनी मोहर लगाई है। राज्य के राजकीय राजीव गांधी स्नातकोत्तर आयुर्वेदिक महाविद्यालय एवं अस्पताल के विशेषज्ञों ने अपने व्यापक अध्ययन के बाद इसे साबित किया है।


विशेषज्ञों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के पारंपरिक व्यंजनों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री से शरीर को ऊर्जा, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और खनिज मिलते हैं। मसलन सर्दियों में खाया जाने वाला सिड्डू ऊर्जा देने वाले भोजन का हिस्सा है। वहीं, अरबी के पत्तों से तैयार पतीड़ में कैरोटीनॉयड जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। 


आज जब दुनिया फिर से मोटे अनाजों और पारंपरिक भोजन की ओर लौट रही है, तब हिमाचल प्रदेश के ये व्यंजन और भी प्रासंगिक हो गए हैं। इनमें पोषण है, स्थानीयता है, पर्यावरण के प्रति सम्मान है और सबसे बढ़कर अपनी मिट्टी की खुशबू है। दरअसल, सदियों से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और मौसम की चुनौतियों के बीच पहाड़ के लोगों ने यह खाद्य परंपरा विकसित की है, जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक और टिकाऊ भी है। 












 








शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

अलविदा विकल्प शुक्ला… इतनी जल्दी क्या थी विदाई लेने की !


कुछ लोग सिर्फ अपने पद और काम से नहीं, बल्कि अपने सहज व्यवहार, मिलनसार स्वभाव और आत्मीयता से लोगों के दिलों में जगह बनाते हैं। मेरे मित्र,सहयोगी,सीनियर और सलाहकार विकल्प जी ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी थे। अभी पखवाड़े भर पहले ही हमने रेडियो पर कुछ नए प्रोजेक्ट को लेकर घंटे भर चर्चा की थी और आप,मैं, मानस और योगेश भाई के साथ एक्सक्लुसिव ग्रुप भी बनाया था..अब वह कोना सूना रहेगा।

आकाशवाणी रायपुर में उपनिदेशक और भारतीय सूचना सेवा के 1993 बैच के अधिकारी विकल्प शुक्ला के असमय निधन की खबर मन को गहरे तक उदास कर गई। अभी तो बहुत कुछ कहना-सुनना बाकी था, बहुत सी मुलाकातें बाकी थीं। लेकिन जिंदगी कभी-कभी बिना कोई मौका दिए ऐसा विराम लगा देती है, जिसे स्वीकार करना बेहद कठिन होता है।

दिल का दौरा कितना निर्मम होता है! पीठ में दर्द की शिकायत से शुरू हुई परेशानी ने देखते ही देखते एक हंसते-मुस्कुराते, ऊर्जावान इंसान को हमसे छीन लिया। यह विश्वास करना मुश्किल है कि जो व्यक्ति कल तक अपने काम और अपनी सहज उपस्थिति से आसपास के माहौल को जीवंत बनाए हुए था, वह आज हमारे बीच नहीं है।

दिल्ली से भोपाल और फिर रायपुर तक फैली उनकी सेवायात्रा में अनेक साथी जुड़े। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की विभिन्न मीडिया इकाइयों मसलन पीआईबी, दूरदर्शन और आकाशवाणी में काम करते हुए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। 

छत्तीसगढ़ के मीडिया जगत में उनका परिचय केवल एक अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे सहयोगी के रूप में था, जिनसे सहजता से बात की जा सकती थी और जिन पर भरोसा किया जा सकता था। वे संभवतः हमारी सेवा के इकलौते अधिकारी थे जो प्रतिष्ठित कौन बनेगा करोड़पति (KBC) जैसे ज्ञान मंच तक पहुंचे।

लेकिन आज सबसे ज्यादा पीड़ा इस बात की है कि उनके जाने से एक परिवार की दुनिया उजड़ गई। भाभी और दो बेटियों के लिए यह क्षति शब्दों से परे है। जिस पिता और जीवनसाथी का साथ जीवन के हर मोड़ पर संबल बनता है, उसका अचानक छूट जाना कितना असहनीय होता है, इसे महसूस भर किया जा सकता है।

विकल्प जी, आपका यूं चले जाना बहुत अखरता है। सरकारी सेवा में पद और जिम्मेदारियां पीछे छूट जाती हैं, लेकिन इंसान का व्यवहार, उसकी आत्मीयता और लोगों के जीवन में छोड़ी गई यादें हमेशा जीवित रहती हैं।

विकल्प जी, कुछ विदाइयां ऐसी होती हैं, जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता और कुछ रिक्तताएं ऐसी होती हैं, जिन्हें समय भी नहीं भर पाता। आपका यूं अचानक चले जाना एक ऐसी ही अपूरणीय क्षति है।

आपकी स्मृतियां, आपका सहज व्यवहार और आपकी आत्मीयता उन सभी के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगी, जिन्हें आपके साथ काम करने और आपको जानने का अवसर मिला।

ईश्वर आपकी पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और आपके परिवार को इस असहनीय दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

आपकी स्मृतियां हमारे बीच रहेंगी।

🙏💐



रविवार, 4 अक्टूबर 2026

ऑर्किडेरियम: गंगटोक के दिल में सजी अनूठे फूलों की दुनिया


यह प्रकृति के कैनवास पर की गई एक ऐसी अद्भुत चित्रकारी की तरह है, जो बिना कुछ कहे ही आँखों को अपनी ओर खींच लेती है। यह महज एक फूल या उनका संग्रह नहीं, बल्कि कुदरत की खिलखिलाहट है, जिसमें नज़ाकत भी है और एक अनकहा रहस्य भी। इसमें रंगों का ऐसा ठहराव और पंखुड़ियों की ऐसी बनावट है जैसे किसी शायर की अधूरी ख़्वाहिश मुकम्मल हो गई हो। 

हवा के झोंकों से बात करती इनकी नाजुक पंखुड़ियाँ, जैसे कोई खामोश ग़ज़ल गुनगुना रही हों। हम बात कर रहे हैं अपने में सुंदरता,गरिमा,चंचलता और रंगोली समेटे हुए फूल ऑर्किड की। जब भी बात सबसे अनूठे और गरिमामयी सौंदर्य की आती है, तो जुबां पर बस एक ही नाम ठहरता है-ऑर्किड। ऑर्किड का खिलना मानो प्रकृति का खुद पर गुमान करना है।

वैसे तो इसे दुनिया को अपना रंग रूप दिखाने के लिए किसी न किसी सहारे की जरूरत है लेकिन फिर भी यह परजीवी नहीं है और अब तो यह पर्यटकों को अपनी ओर खींचकर आर्थिक समृद्धि में भी योगदान दे रहा है। ऑर्किड का पूर्वोत्तर में बसेरा है एवं यह यहां की खास पहचान है।


यह अष्टलक्ष्मी में से एक और सात बहनों के इकलौते भाई के नाम से विख्यात सिक्किम का राजकीय पुष्प भी है। इसलिए सिक्किम की राजधानी गंगटोक में ऑर्किड की अनूठी दुनिया बसाई गई है। इस लेख में हम आर्किड पर केंद्रित इस अद्भुत दुनिया की सैर करेंगे।

गंगटोक में पहाड़ों, बादलों और देवदारों के बीच आर्किड की इस अनोखी दुनिया का नाम स्वर्ण जयंती मैत्रेय मंजरी ऑर्किडेरियम है। यहां प्राकृतिक तौर पर, चित्रों में और कांच की दीवारों के भीतर यह रंगीन और दुर्लभ फूल अलग अलग आकार प्रकार और रंग रूप में पूरी भव्यता के साथ मौजूद है। ऑर्किडेरियम में इस फूल की 100 से अधिक प्रजातियां रखी गई हैं। इनमें सिक्किम का राजकीय पुष्प डेंड्रोबियम नोबाइल (Dendrobium nobile) भी शामिल है।


ऑर्किडेरियम का शुभारंभ पिछले साल 2025 में 29 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिक्किम के 50 वर्ष होने के अवसर पर किया था। उसी साल सितंबर माह से इसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया है। सिक्किम सरकार के शहरी विकास विभाग द्वारा विकसित एवं राष्ट्रीय ऑर्किड अनुसंधान केंद्र के तकनीकी सहयोग से तैयार ऑर्किडेरियम को आर्किटेक्चर फर्म सैलिएंट ने डिजाइन किया है।

लगभग 38,000 वर्ग फुट में फैले इस आर्किडोरियम को विश्व का सबसे बड़ा कूल हाउस आर्किडोरियम और भारत का पहला कूल हाउस आर्किडोरियम कहा जाता है। वैसे तो ऑर्किड किसी पहचान का मोहताज नहीं है, फिर भी इस खिलखिलाते फूल से अनजान लोगों की जानकारी के लिए ऑर्किड आर्किडेशियाई (Orchidaceae) नाम का विशाल वनस्पति परिवार है। दुनिया में इसकी हजारों प्रजातियां हैं।


भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से संबद्ध विज्ञान और प्रौद्योगिकी उच्च अध्ययन संस्थान के अनुसार भारत में ऑर्किड की एक हजार से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं और इनमें करीब 850 प्रजातियां पूर्वोत्तर भारत में मिलती हैं। सिक्किम में ऑर्किड को ‘सुनाखरी’ के नाम से भी जाना जाता है जबकि पूर्वोत्तर में कपौ फूल एवं वांडा या बांदा जैसे नाम भी इसके लिए प्रचलित हैं।

जहां तक गंगटोक के ऑर्किडेरियम की बात है तो यह कोई सामान्य फूलों का पार्क भर नहीं है बल्कि हम इसे नियंत्रित वातावरण में ऑर्किड की विभिन्न प्रजातियों को भव्य अंदाज में देखने का जीवंत संग्रहालय कह सकते हैं। यहां प्रदर्शित लगभग 70 प्रतिशत पौधे जीवित ऑर्किड हैं, जबकि शेष हिस्से में दुनिया के विभिन्न भागों के ऑर्किड को समझाने वाले विस्तृत वनस्पति मॉडल हैं। 


यहां का सबसे बड़ा आकर्षण कांच का बना अद्भुत आर्किड हॉल है। जिसमें ऑर्किड अपनी तमाम प्रजातियों और बंधु बांधवों के साथ हंसता, मुस्कराता और खिलखिलाता नजर आता है जबकि ऑर्किड संग्रहालय में ऑर्किड की जैव-विविधता, संरक्षण और खेती की जानकारी दी गई है।

प्रकृति एवं विज्ञान का समन्वय यह ऑर्किडेरियम  यहां आने वाले पर्यटकों को फूलों की सुंदरता देखने के साथ यह भी बताता है कि हिमालय की जैव-विविधता कितनी अनमोल, खूबसूरत एवं विविधता लिए है।


ऐसा नहीं है कि ऑर्किड के प्रति आकर्षण केवल सिक्किम तक सीमित है। दुनिया के कई देशों में भी इसके संरक्षण और पर्यटकों की सुविधा के लिए बड़े उद्यान और वैज्ञानिक संग्रह विकसित किए गए हैं। सिंगापुर का नेशनल ऑर्किड गार्डन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां ऑर्किड की 1,500 से अधिक प्रजातियां हैं।

लेकिन, भारत में ऑर्किड का महत्व इसलिए विशेष है क्योंकि देश की कुल ऑर्किड विविधता का बड़ा हिस्सा पूर्वोत्तर में पाया जाता है। इस लिहाज से सिक्किम का ऑर्किडेरियम केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि पूर्वी हिमालय की वनस्पति विरासत को लोगों के सामने लाने वाला महत्वपूर्ण मंच है। यह सिक्किम की हरित एवं जैविक राज्य की छवि, सतत विकास और इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा दे रहा है। 


जंगल में किसी पेड़ की शाखा पर चुपचाप खिलता हुआ ऑर्किड शायद यह घोषणा नहीं करता कि वह कितना दुर्लभ है। वह बस खिलता है और देखने वालों के दिल में भी अपनी खूबसूरती की छाप छोड़ देता है । सिक्किम ने इसी हँसती, मुस्कराती सुंदरता को गंगटोक के इस ऑर्किडेरियम में एक खूबसूरत और भव्य घर दे दिया है…शायद इसीलिए ऑर्किड का स्थानीय नाम ‘सुनाखरी’ यहां इतना सटीक लगता है।


शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

अंडमान की लाइम स्टोन केव्स: प्रकृति की अद्भुत कारीगरी !!

एक अद्भुत दुनिया.. जहां इंसानी शिल्पकला भी पूरी विनम्रता के साथ पराजय स्वीकार कर ले पर यहां तक पहुंचना किसी तपस्या से कम नहीं है। यह तपस्या सुबह चार बजे से शुरू होती है और ज़ाहिर है चार बजे किसी लंबी यात्रा पर निकलने के लिए घंटे दो घंटे पहले उठना ही पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि अद्भुत दुनिया से रूबरू होने की राह इतनी आसान तो नहीं ही होगी । करीब दो घंटे की 100 किमी की सड़क यात्रा, घंटे भर की लिखा पढ़ी और फिर दो किस्तों में पहले फेरी से एवं बाद में स्पीड बोट से नीले समंदर की शोर मचाती उछलती लहरों पर सवारी..इसके बाद करीब दो किमी तक लकड़ी के पुल, कच्चे एवं ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर पैदल यात्रा…तब जाकर मिलता है प्रकृति का ऐसा आश्चर्यजनक खजाना जो हमारी सफ़र की सारी थकान उतार देता है।


प्रकृति के इस नायाब खजाने में भगवान गणेश हैं, शंख है, देवी देवता, इंसान, हाथी, बंदर, जैली फिश और पता नहीं क्या क्या..हम देखते ही रह जाते हैं और हमारी आँखें आकृतियां बुनने एवं चुनने लगती हैं..वह भी मोबाइल की टॉर्च की रोशनी में।आइए, अब इस खजाने के रहस्य की परतें खोलते हैं। हम बात कर रहे हैं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बाराटांग (बारतांग) की अपनी तरह की इकलौती लाइम स्टोन केव्स यानि चूना पत्थर की गुफाओं की।


अब किसी को ये लग सकता है कि इन चूना पत्थर की गुफाओं में ऐसा क्या है कि घंटों के सफ़र और नींद खराब करके देखा जाए तो उनके लिए उत्तर यही है पहले आओ और खुद देख जाओ। दरअसल,अंडमान या यहां के विभिन्न द्वीपों की यात्रा केवल नीले समुद्र, सफेद रेत और नारियल-सुपारी के पेड़ों की यात्रा भर नहीं है बल्कि यह प्रकृति के ऐसे कई अद्भुत नजारों की यात्रा है जो संभवतः देश में आमतौर पर कहीं और देखने को नहीं मिलते।

इस मायावी दुनिया के सफर की शुरुआत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से शुरू होती है । सबसे पहले हम सड़क मार्ग से लगभग 100 किलोमीटर दूर ज़िरकाटांग पहुंचते हैं। यह रास्ता घने जंगल, पेड़ पौधों की सरसराहट, प्रकृति की मनमोहक खुशबू, पक्षियों के कलरव और एक कतार में एवं एक ही दिशा में चलती सौ गाड़ियों के काफिले के साथ करीब दो घंटे में पूरा होता है। ज़िरकाटांग में तमाम सुरक्षा औपचारिकताओं को पूरा कर हम फेरी में चढ़कर बाराटांग पहुंचते हैं। इस फेरी में हमारे साथ बस, ट्रक, मोटरसाइकिल भी सफर करती हैं..खैर, फेरी की कहानी फिर कभी। 

फेरी से बाराटांग पहुंचकर आगे की यात्रा स्पीड बोट से होती है। लहरों की अठखेलियों के साथ उछल कूद करती हमारी नाव जब मैंग्रोव वन में घुसती है तो वे झूम कर हमारा इस्तकबाल करते हैं। मैंग्रोव पेड़ों/झाड़ियों के बीच लहराती हमारी नाव गंतव्य तक पहुंच जाती है लेकिन असल यात्रा अब शुरू होती है जो हरे भरे पेड़ों के बीच समुद्र के पानी को लकड़ी के पुल से पार करके पूरी होती है। यहां तक पहुँचना अपने-आप में एक रोमांचक अनुभव है क्योंकि यह रास्ता घने जंगलों, समुद्री खाड़ियों और संकरे जलमार्गों से होकर गुजरता है।

नाव से उतरने के बाद लकड़ी के पुल से होते हुए करीब एक दो किलोमीटर पैदल चलकर हम बाराटांग की विश्वप्रसिद्ध लाइमस्टोन गुफाओं तक पहुंच जाते हैं। यहां से शुरू होता है प्रकृति की कारीगरी से साक्षात्कार..पहली नजर में हो सकता है कि आपको ये गुफाएं साधारण लग सकती हैं लेकिन जैसे-जैसे हम आगे कदम दर कदम बढ़ते हैं, प्रकृति अपनी सम्पूर्ण कलाओं के साथ पूरी शिद्दत एवं भव्यता के साथ सामने आती है। कहीं मंदिर के स्तंभ दिखते हैं, कहीं मूर्ति, कई इंसान,कहीं कमल और कहीं पत्थर की जमी हुई जलधारा।

ये गुफ़ाएँ इंसान की बनाई कोई इमारत नहीं हैं बल्कि प्रकृति की सैकड़ों साल की साधना और कला का नमूना हैं। चूने के पत्थरों की यह कारीगरी प्रकृति के विभिन्न तत्वों का लाखों वर्षों का खेल है इसमें समुद्री जीवों के खोल, कोरल, कंकाल, पानी, पेड़, रासायनिक क्रियाएं सब कुछ शामिल हैं। यहां बनी आकृतियां तकनीकी शब्दावली में ‘स्टैलेकटाइट’ और ‘स्टैलेग्माइट’ कहलाती हैं। मतलब गुफा की छत से लटकते पत्थर नुमा आकार प्रकार स्टैलेकटाइट और जमीन से ऊपर उठते पत्थरों के स्तंभ स्टैलेग्माइट कहलाते हैं। 

दरअसल, लाखों वर्षों में पानी की बूँदों के साथ घुला हुआ चूना/कैल्शियम पत्थर धीरे-धीरे जमा होता रहा और समय ने इन्हें यह अद्भुत आकार दे दिए। इन गुफाओं की सबसे रोचक बात यह है कि यहाँ बनने वाली संरचनाएँ बहुत धीमी गति से विकसित होती हैं—कभी-कभी एक सेंटीमीटर बनने में सैकड़ों साल लग जाते हैं। इसलिए हर आकृति वास्तव में समय का एक जीवंत दस्तावेज है। यहाँ पहुँचकर एहसास होता है कि समुद्र के इस दूरस्थ द्वीप में प्रकृति ने केवल सुंदरता ही नहीं, बल्कि समय की अद्भुत शिल्पकला भी सहेज कर रखी है।

बारातांग की ये गुफ़ाएँ अंडमान -निकोबार द्वीप समूह की सबसे बड़ी भूमिगत गुफ़ा प्रणाली का हिस्सा हैं । इन गुफाओं का रखरखाव करने वाले वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि यहां इस तरह की करीब पौने दो सौ से ज़्यादा गुफाएं हैं लेकिन आम पर्यटक सिर्फ़ दो गुफाएं ही देख सकते हैं। बाकी गुफाएं घने जंगल में छिपी हैं। कहीं प्राकृतिक रूप से संरक्षित पक्षियों का बसेरा है तो कहीं पहुंच मार्ग नहीं है और किसी गुफा को अब तक टटोला ही नहीं गया है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझे तो लाइमस्टोन गुफाओं का निर्माण एक धीमी और जटिल रासायनिक प्रक्रिया है जो लाखों-करोड़ों वर्षों में होती है। इसे स्पेलियोजेनेसिस (speleogenesis) कहते हैं। यहां दर्ज विवरण के मुताबिक बारिश का पानी जब वायुमंडल से गुजर कर आता है, तो उसमें कार्बन डाइऑक्साइड भी घुल जाती है। यह पानी मिट्टी में मिलकर सड़ते हुए पौधों और जीवों से और भी कार्बन डाइ ऑक्साइड हासिल करके कार्बोनिक अम्ल में बदल जाता है। यह अम्ल धीरे धीरे चूने की चट्टानों को घोलता जाता है और प्रकृति की अलग अलग कलाकृतियां बनने लगती हैं लेकिन यह एक दो नहीं बल्कि लाखों सालों की रासायनिक क्रिया का नतीजा है।

बाराटांग की इन गुफाओं तक पहुँचना केवल पर्यटन नहीं बल्कि प्रकृति के साथ एक संवाद जैसा अनुभव है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह आने वाले अधिकांश लोग समुद्र तटों की ओर आकर्षित होते हैं, लेकिन जो लोग प्रकृति के रहस्यों को करीब से देखना चाहते हैं, उनके लिए बाराटांग की लाइमस्टोन गुफाएँ एक अनोखा अनुभव हैं।


सोमवार, 28 सितंबर 2026

कहां ‘भंवरा’ बन गया है करोड़ों के कारोबार का सूत्रधार..!!


गीतकार आनंद बख्शी, संगीतकार एस डी बर्मन और गायक मोहम्मद रफी और आशा भोंसले की टीम जब फिल्म ‘आराधना’ के लिए ‘गुनगुना रहे हैं भंवरे, खिल रही है कली कली..’ या फिर फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के लिए ‘भंवरा बड़ा नादान है, कलियन की मुस्कान है..’ रचते समय गीतकार शकील बदायूंनी, गायिका आशा जी और संगीतकार हेमंत कुमार ने कभी सोचा भी नहीं होगा उनके कालजयी गीत का एक किरदार कभी हकीकत भी बन जाएगा और सैकड़ों परिवारों की माली हालत बेहतर बनाने के साथ साथ पूरे इलाके में सुगंध बिखेरने का जरिया बन जाएंगे।

यह कोई कपोल कल्पना नहीं बल्कि सच्चाई है कि इन गानों को वास्तविकता में तब्दील करते हुए भँवरे ने ऐसा जादू बिखेरा है कि कली कली खिल रही है और मुस्कराकर अपनी खुशबू से देश ही नहीं विदेशों तक में जलवा दिखा रही है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं सिक्किम में भरपूर मात्रा में होने वाली बड़ी इलायची की खेती और इसमें भंवरे की महत्वपूर्ण भूमिका की। 

यहां भंवरा या भौंरा बड़ी इलायची की कहानी का एक बेहद महत्वपूर्ण किरदार है। भारत में सिक्किम बड़ी या काली इलायची का गढ़ है और देश में इसका 80 फीसदी उत्पादन इसी राज्य में होता है एवं वह भी जैविक क्योंकि सिक्किम देश का पहला सौ फीसद ऑर्गेनिक स्टेट है। यहां करीब साढ़े पांच हज़ार मीट्रिक टन बड़ी इलायची होती है। उत्तरी सिक्किम से शुरू हुई इस काली बड़ी 'ठूलो इलायची' (स्थानीय भाषा में) की यात्रा अब 23 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गई है।

अब बात भंवरे की, तो सिक्किम कृषि विभाग के अनुसार बड़ी इलायची में पॉलीनेशन मुख्य रूप से भौंरों द्वारा ही होता है। इसे नेपाली भाषा में भोमोरा, भूटिया में बूम बूमटा और लेपचा भाषा में तुंगबूम कहा जाता है। बताया जाता है कि फूलों से रस लेने के लिए जब भौंरा इन तक पहुंचता है तो उसके शरीर पर नर मादा परागकण चिपक जाते हैं और दूसरे फूल तक पहुंच जाते हैं। इस तरह फूल से फल बनने की इस प्राकृतिक प्रक्रिया में भंवरे की भूमिका बहुत बड़ी है। यहां भंवरा किसान का एक ऐसा साथी है, जिसे न मजदूरी चाहिए और न ही छुट्टी।

मजे की बात यह है कि, भंवरे की तरह मधुमक्खी सहित कई कीट बड़ी इलायची के फूलों का रसपान करने के लिए आते हैं लेकिन इसके फूलों में अंतर और अपने छोटे आकार की वजह से वे पराग कण की सफल आवाजाही का हिस्सा नहीं बन पाते और इस वजह से उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाता। भंवरे का आकार नर मादा पराग कण को मिलाने के लिए बिल्कुल सटीक है।

सिक्किम की तर्ज पर एवं यहां से मिलती जुलती परिस्थितियों वाले कुछ अन्य राज्यों में भी बड़ी इलायची की खेती के प्रयास हुए हैं लेकिन सब कुछ अनुकूल होने के बाद भी उत्पादन मन मुताबिक नहीं हुआ। बाद में, कृषि अनुसंधान से पता चला कि वहां परागकण का वाहक भंवरा नहीं था या कम संख्या में था। वैसे, अब अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में भंवरों की मौजूदगी से इसकी खेती को सफलता मिल रही है जबकि कुछ राज्यों में भंवरों की कमी से खेती सफल नहीं हुई।

शायद यह जानकर आपको भी आश्चर्य होगा कि भारत में बड़ी इलायची मानव जाति द्वारा उपयोग किए जाने वाले सबसे पुराने मसालों में से एक मानी जाती है। इसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों में छठी शताब्दी में सुश्रुत के समय से ही होता आ रहा है। इसका उपयोग यूनानी औषधियों में भी  प्राचीन समय से किया जाता रहा है।

वैसे,बड़ी इलायची सिक्किम के लिए सिर्फ मसाला नहीं है। यह राज्य की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है और 16 हजार से अधिक किसान परिवारों की आजीविका से जुड़ी हुई है। सरकार ने भी इसे राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण आधार बताया है। इस फसल की खासियत यह है कि इसे खुले मैदान की तेज धूप की बजाय पेड़ों की छांव और पहाड़ी वातावरण पसंद है। इसलिए सिक्किम में बड़ी इलायची के खेत कई बार खेत कम और जंगल का हिस्सा ज्यादा लगते हैं। बड़ी इलायची यहां केवल कृषि की कहानी नहीं, जैव-विविधता और आजीविका के रिश्ते की कहानी भी है।

सिक्किम की पहाड़ियों में पैदा हुई यह सुगंध देश की सीमाओं पर नहीं रुकती बल्कि अन्य देशों को भी अपनी सुगंध से सराबोर कर देती है। भारत बड़ी इलायची का निर्यात संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, सऊदी अरब, जापान, ब्रिटेन सहित कई देशों को करता है। मसाला बोर्ड के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 229 करोड़  रुपए से अधिक की बड़ी इलायची दुनिया को बेची। तो देखिए, कैसे एक भंवरा करोड़ों के कारोबार का जरिया बन गया वह भी चुपके चुपके।



अष्टलक्ष्मी: आठ राज्य, आठ रंग

अष्टलक्ष्मी यानि देश के पूर्वी भाग में स्थित आठ राज्य। इन्हें सेवन सिस्टर्स और वन ब्रदर (सात बहनों और एक भाई) के नाम से भी जाना जाता है। यहा...