।। हिमाचल प्रदेश के अनूठे खानपान पर विशेष।।
फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में गुजराती खाने को लेकर करीना कपूर का एक डायलॉग बड़ा चर्चित हुआ था- “तुम्हारे खाने के नाम ऐसे होते हैं जैसे कोई मिसाइल फटने वाली हो... ढोकला, फाफड़ा, हांडवा, थेपला... ऐसा लगता है जैसे कोई बम ब्लास्ट होने वाला है!"...शायद करीना या इस फिल्म के संवाद लेखक का कभी हिमाचली खानपान से सामना नहीं हुआ होगा वरना वे गुजरात की बजाए हिमाचल की पृष्ठभूमि को फिल्म में रखते।
यदि आपने भी नाम नहीं सुने हैं तो सुनिए हिमाचली व्यंजन अपने विशिष्ट नामों के मामले में किसी भी प्रकार से गुजरात से पीछे नहीं है जैसे पतीड़, घी-लौटे, भगचीरी, पकैन, ओगल के पकौड़े, बबरू, कापरु, इन्ड्रा, जय पाटांडा और सिड्डू। ये तो महज कुछ लोकप्रिय नाम हैं जबकि इन जैसे तमाम व्यंजन यहां पहाड़ों में अपने अनूठे स्वाद का जादू बिखेर रहे हैं।
खैर,ये तो हुई हल्की फुल्की बातें लेकिन सबसे खास बात यह है कि हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी व्यंजन सिर्फ खाना नहीं, बल्कि पहाड़ों की कहानी, मेहनत और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक हैं। ये व्यंजन आसपास उपलब्ध सामग्री से बनते हैं, लेकिन इनका स्वाद और सेहत से भरी खूबियां अनुकरणीय हैं। ये पहाड़ी व्यंजन सिर्फ पेट नहीं भरते बल्कि दिल और स्मृतियों को भी अपने स्वाद तथा खुशबू से भर देते हैं।
हिमाचल प्रदेश में ठंड का आगाज हो गया है और पहाड़ में भी ऊंचे स्थानों पर रहने वाले लोग कड़ाके की ठंड और बर्फबारी से पहले खानपान के इंतजाम में जुट गए हैं।
इन व्यंजनों की विशेषता यह है कि ये स्थानीय सामग्री, मौसम के अनुरूप और लम्बे समय तक खराब नहीं होने के गुणों से भरपूर हैं।
फर्मेंटेशन, स्टीमिंग और घी का इस्तेमाल इन्हें पाचन में आसान तो बनाता ही है, साथ ही ये ठंडी जलवायु में शरीर को गर्माहट, इम्यूनिटी और ऊर्जा देते हैं। किण्वन (फर्मेंटेशन), अनाज को भिगोने, पीसने, मसालों का संतुलित इस्तेमाल और भाप में पकाने जैसी तकनीकें हिमाचल की पारंपरिक रसोई को विशिष्ट बनाती हैं।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि हिमाचल प्रदेश में भोजन का संबंध केवल भूख मिटाने से नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक परंपराओं से भी है। विवाह, त्योहार, देव उत्सव, फसल कटाई और अन्य सामुदायिक अवसरों पर ये विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं।
अब एक नज़र कुछ खास व्यंजनों, उनकी सामग्री और सेहत से भरपूर गुणों पर डाल लेते हैं। सबसे पहले बात पतीड़/ पतरोड़े / पत्रोडू की। यह वास्तव में अरबी के पत्तों का लज़ीज़ व्यंजन है और पहाड़ों में अरबी के बड़े-बड़े हरे पत्ते एक तरह से प्रकृति का उपहार हैं।
इन पत्तों को बेसन-मसालों के घोल में लपेटकर भाप में पका कर फिर तला जाता है। हम सब जानते हैं कि अरबी के पत्ते फाइबर, आयरन और कैल्शियम से भरपूर होते हैं एवं ठंड के मौसम में शरीर को गर्म रखते हैं। वैसे यह मैदानी इलाकों में भी चाव से खाया जाता है।
वहीं, घी-लौटे या चिल्डू फर्मेंटेड गेहूं के आटे से बने स्टीम्ड ब्रेड या पैनकेक जैसा व्यंजन हैं, जिनमें गुड़, सौंफ और तिल मिलाए जाते हैं। इनमें पर्याप्त मात्रा में प्रो-बायोटिक्स मिलते हैं, जो पेट के लिए वरदान हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में यह ताकत और गर्माहट दोनों के लिए उपयोगी है। घी के साथ या फिर सुबह की चाय/दूध के साथ इसका स्वाद कमाल का होता है।
वहीं, भगचीरी चावल, दाल और दही का मिश्रण है जो आसानी से पच जाता है जबकि पकैन या पोलडू खासतौर पर शिवरात्रि या त्योहारों पर बनने वाला कचौड़ी जैसा होता है और इसमें उड़द दाल या अन्य सामग्री की भरावन होती है। यह प्रोटीन और फाइबर का खजाना है।
इसीतरह ओगल या बकवीट या कुट्टू के पकौड़े सेहत का पावर पैक है। खासतौर पर सर्दियों में बनने वाले ये पकौड़े ग्लूटेन-फ्री, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते हैं और ब्लड शुगर कंट्रोल करने से लेकर शरीर को गर्म रखने में सहायक है।
अब बात बाबरू या बबरू की…यह कोई गब्बर या गबरू का भाई नहीं बल्कि एक तरह की पहाड़ी कचौड़ी है जिसे आमतौर पर गेहूं के आटे एवं गुड़ से बनाया जाता है। इसे पंजाबी भटूरे का पहाड़ी भाई भी कह सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में लोकप्रियता के मसले पर यह सिड्डू के बाद या उसके समकक्ष है। चाय के साथ इसका स्वाद लाजवाब होता है।
कापरु भी कपड़े का दूसरा नाम नहीं बल्कि दाल या आटे से बना पहाड़ी अंदाज का स्वादिष्ट स्नैक है। इसी तरह इन्ड्रा या इन्ड्रे कुलथी दाल से बनी सूप जैसी डिश है। कड़ाके की सर्दी के दौरान यह प्रोटीन, आयरन और फाइबर का खजाना है और जोड़ों के दर्द, वजन नियंत्रण और किडनी स्टोन में फायदेमंद। इसे आयुर्वेदिक गुणों वाला व्यंजन माना जाता है।
जय पाटांडा या पटांडे भी दीपावली के पटाखे का कोई प्रकार नहीं है बल्कि गेहूं या रागी के आटे के पैन केक है। यह दूध, गुड़ और घी के साथ एनर्जी देने वाला व्यंजन है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए तो यह खासतौर पर उपयोगी है। आजकल के फास्ट फूड के लिए लार टपकाने वाली दुनिया में ये व्यंजन हमें याद दिलाते हैं कि असली स्वाद फटाफट फूड में नहीं बल्कि सरलता और सतत् अनुभव से बनी परंपरा में है।
हिमाचल प्रदेश के व्यंजनों के स्वादिष्ट होने के साथ साथ सेहत से भरपूर होने का दावा हमारा नहीं है बल्कि पोषण विशेषज्ञों ने भी इस पर अपनी मोहर लगाई है। राज्य के राजकीय राजीव गांधी स्नातकोत्तर आयुर्वेदिक महाविद्यालय एवं अस्पताल के विशेषज्ञों ने अपने व्यापक अध्ययन के बाद इसे साबित किया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के पारंपरिक व्यंजनों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री से शरीर को ऊर्जा, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और खनिज मिलते हैं। मसलन सर्दियों में खाया जाने वाला सिड्डू ऊर्जा देने वाले भोजन का हिस्सा है। वहीं, अरबी के पत्तों से तैयार पतीड़ में कैरोटीनॉयड जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं।
आज जब दुनिया फिर से मोटे अनाजों और पारंपरिक भोजन की ओर लौट रही है, तब हिमाचल प्रदेश के ये व्यंजन और भी प्रासंगिक हो गए हैं। इनमें पोषण है, स्थानीयता है, पर्यावरण के प्रति सम्मान है और सबसे बढ़कर अपनी मिट्टी की खुशबू है। दरअसल, सदियों से कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और मौसम की चुनौतियों के बीच पहाड़ के लोगों ने यह खाद्य परंपरा विकसित की है, जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक और टिकाऊ भी है।



































