शुक्रवार, 13 जून 2025

अब दो जून की नहीं, डिजिटल रोटी कहिए जनाब!!

वक्त बदल गया है और उसके साथ बदल गई है हमारी दो जून की रोटी। कभी वह गोल, मुलायम, माँ के हाथ की थी, जिसकी खुशबू से पेट के साथ-साथ तन मन भी भर जाता था। लेकिन अब तो रोटी भी स्टार्टअप हो गई है।

पहले रोटी केवल रोटी थी, अब वह ग्लूटेन-फ्री, कीटो-फ्रेंडली, ऑर्गेनिक, मल्टीग्रेन, प्रोटीन-लोडेड हो गई है। बाजार में अब एक रोटी के साथ इतने टैग लगे होते हैं कि लगता है, ये खाने की चीज कम, इंस्टाग्राम की रील ज्यादा है। पहले माँ प्यार से पुचकारती थी कि रोटी खा लो, ठंडी हो जाएगी लेकिन अब रोटी खुद बताती है कि मुझे माइक्रोवेव में गरम करो, वरना मज़ा नहीं आएगा।

और अब रोटी दो जून वाली नहीं रही बल्कि कीमती हो गई है। अब दो जून की रोटी कमाने के लिए अब चार पहर काम करना पड़ता है। पहले रोटी गेहूँ खेत से आए घर के गेहूं से बनती थी, अब रोटी सुपरमार्केट से आती है, और उसका दाम सुनकर लगता है जैसे रोटी गेहूँ की नहीं, सोने से बनी है । एक रोटी की कीमत में पहले पूरी थाली आ जाती थी मतलब दाल, चावल, सब्जी, और ऊपर से पापड़ अचार और सलाद फ्री। अब भरपेट रोटी ही मिल जाए तो बहुत है।

अब समय खाली पेट भरने का नहीं है बल्कि हेल्थ कॉन्शस भोजन का है इसलिए रोटी को अब कैलोरी काउंटर के साथ परोसा जाता है। पहले परिवार के बुजुर्ग कहते थे भरपेट रोटी खाने से ताकत मिलती है और अब नए जमाने के फिटनेस ट्रेनर कहते है कि रोटी खाओगे तो फैट बढ़ जाएगा। पहले रोटी हाजमा दुरुस्त रखती थी लेकिन अब पाचन तंत्र की दुश्मन बन गई है। बेचारी रोटी, जो कभी परिवार के प्यार का प्रतीक थी, अब विलेन बन गई। अब गेहूं की रोटी ज्वार, बाजरा, रागी के साथ नए नए अवतार ले रही है। लेकिन इसके लिए स्वाद भूलना होगा क्योंकि वो तो जैसे गेहूं की रोटी के साथ ही छुट्टी पर चला गया है।

अब रोटी भी डिजिटल हो गई है। ऑनलाइन ऑर्डर करो, मिनटों में डिलीवरी। लेकिन  8 मिनट में डिलीवरी की जल्दबाजी में रोटी गोल नहीं, त्रिकोण भी हो जाती है। कभी-कभी तो लगता है, रोटी नहीं, नक्शा डिलीवर हुआ है। और ऊपर से टैक्स अलग। जीएसटी, सर्विस चार्ज, डिलीवरी फी, प्लेटफार्म फीस, रेन चार्ज और टिप वगैरह मतलब रोटी खाने से पहले जेब खाली।

अब दो जून की रोटी सिर्फ पेट की भूख नहीं मिटाती, वो जेब, दिमाग और धैर्य की भी परीक्षा लेती है। पहले रोटी बनाना कला थी, अब रोटी खाना कमाना और खाना कला है। पता नहीं, माँ की वो गोल, गरम और मनुहार वाली स्वादिष्ट रोटी फिर कब लौट कर आएगी से लौट  कर आएगी तब तक ये नए जमाने की डिजिटल और मिलावटी रोटी हमें दो जून में नहीं महीने भर की कमाई में ही नसीब होती रहेगी।


वैसे, भारतीय संस्कृति की आत्मा और रसोई की शान हमारी प्रिय रोटी सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और मेहनत का प्रतीक है। तभी तो दो जून की रोटी जैसे लोकप्रिय मुहावरों ने जन्म लिया। बताया जाता है कि रोटी का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव सभ्यता का विकास। रोटी का इतिहास करीब 10,000 साल पुराना माना जाता है, जब मानव ने खेती शुरू की थी। सिंधु घाटी सभ्यता में भी गेहूँ और जौ की खेती के सबूत मिलते हैं। पुरातात्विक खुदाई में रोटी बनाने के लिए तवे और चूल्हे जैसे उपकरण मिले हैं। वैदिक काल में  भी रोटियों का विभिन्न नामों से जिक्र मिलता है।

मध्यकाल में बदलाव के साथ साथ रोटी भी क्षेत्रीय रंग में रंगती गई । उत्तर भारत में गेहूँ की रोटी, दक्षिण में चावल की रोटी और पश्चिम में बाजरे की भाखरी ने भारतीय खान पान में अपनी अमिट जगह बना ली थी । मुगलकाल में नान और पराठे जैसे व्यंजनों ने रोटी को शाही गरिमा प्रदान कर दी । तंदूर का आविष्कार भी इस दौर की देन माना जाता है जिसने फिर नान और तंदूरी रोटी को जन्म दिया। मसाले, घी और मेवों के साथ रूमाली, शीरमाल और कुलचा जैसे परिवर्तित रूप में रोटी सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि उत्सव का हिस्सा बनती गई।

ब्रिटिश काल में रोटी सिर्फ भोजन या पेट भरने का माध्यम नहीं, बल्कि आजादी की प्रतीक बन गई थी। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रोटी और कमल ने गांव गांव में आजादी की अलख जगाने में अहम भूमिका निभाई। यह रोटी की सामाजिक-राजनीतिक ताकत को दर्शाता है।

 अब मौजूदा दौर में रोटी ने नए-नए रूप धर लिए हैं। गेहूँ के साथ ज्वार, बाजरा, मक्का और रागी जैसी फसलों ने क्षेत्रीय स्वाद को बढ़ावा दिया। मसलन पंजाब की मक्के की रोटी, राजस्थान की बाजरे की रोटी और दक्षिण भारत की रागी रोटी ने पोषण और स्वाद का अनूठा मेल पेश किया और यह राज्यों की सीमाओं को पार कर देशव्यापी हो गईं। इसी तरह स्वतंत्र भारत में हरित क्रांति ने गेहूँ और रोटी हर घर की थाली में स्थायी जगह दे दी।

अब रोटी ने वैश्वीकरण की राह पकड़ ली है। ग्लूटेन-फ्री, कीटो और मल्टीग्रेन रोटियाँ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक पीढ़ी की पसंद बन रही हैं लेकिन आम लोगों की हैसियत से दूर होती जा रहीं हैं। रोटी अब सिर्फ घर की रसोई तक सीमित नहीं है बल्कि यह रेस्तराँ के मेन्यू, ऑनलाइन डिलीवरी और यहाँ तक कि प्री-पैकेज्ड रूप में सुपरमार्केट में आन बान और शान से उपलब्ध है। फिर भी, माँ के हाथ की रोटी का स्वाद अब भी अतुलनीय है।

हमारे देश में रोटी सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। रोटी, कपड़ा और मकान जीवन की बुनियादी जरूरतों का पर्याय है। रोटी मेहनत, सादगी और एकजुटता का भी प्रतीक है। रोटी का इतिहास उतना ही समृद्ध और विविध है जितना भारत स्वयं। खेतों से लेकर तंदूर तक, गाँव की चूल्हों से लेकर मॉडर्न किचन तक, रोटी ने हर दौर में अपनी जगह बनाई। यह सिर्फ पेट नहीं, बल्कि दिलों को भी जोड़ती है। चाहे वह सादी चपाती हो या मसालेदार पराठा, रोटी हमारी संस्कृति की थाली में हमेशा गरम रहेगी।

#roti #रोटी #HungerHasNoReligion @highlight @followers

शान और सेहत की सवारी साइकिल

आज विश्व साइकिल दिवस है। हर साल 3 जून को यह दिवस मनाया जाता है। इस दिन उद्देश्य लोगों को साइकिल चलाने के प्रति जागरुक करना है। इतना तो हम सभी जानते हैं कि नियमित तौर पर साइकिल चलाना शरीर के लिए काफी फायदेमंद है। हमने भी कैंची से लेकर सीट तक भरपूर साइकिल चलाई है। मोटापा घटाने से लेकर शरीर की तंदुरुस्ती के लिए नियमित साइकिल चलाना वरदान है। जानकर कहते हैं कि रोजाना आधा घंटा साइकिल चलाने से हृदय रोग, मोटापा, मानसिक बीमारी, मधुमेह, गठिया रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है। 

 3 जून, 2018 के दिन पहली बार विश्व साइकिल दिवस मनाए जाने की घोषणा की गई। इसके बाद से हर साल 3 जून के दिन विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। आज के समय मोटर वाहनों को बढ़ते उपयोग के कारण वातावरण में प्रदूषण काफी बढ़ रहा है। इस कारण वातावरण को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए साइकिल का उपयोग जरूरी हो गया है।  इस साल विश्व साइकिल दिवस की थीम एक सतत भविष्य के लिए साइकिल चलाना है।

तो आइए, हम भी नियमित साइकिल चलाने का प्रयास करें और साइकिल न भी चला पाएं तो कम से कम कार चलाते समय साइकिल सवार लोगों का सम्मान जरूर करें।

#WorldCycleDay 

#विश्वसाइकिलदिवस

भगवान न्यूज चैनलों को सद् बुद्धि दे!!

इन दिनों यदि आप कोई भी न्यूज चैनल देख रहे हैं और उस पर प्रसारित खबरों से आपका बीपी न बढ़े, आपको गुस्सा न आए और आप झटके से टीवी बंद न करें..ऐसा हो ही नहीं सकता। इसके बाद आपका मन करता है उस चैनल के खिलाफ भड़ास निकालने का लेकिन या तो हम लिख नहीं पाते या शायद अभिव्यक्ति का मंच नहीं मिल पाता और वह गुस्सा मन ही मन में रह जाता है लेकिन यदि मौका मिला तो वह खुलकर बाहर भी आ जाता है। 

शायद, यही कारण है कि जैसे ही वरिष्ठ पत्रकार सुधीर निगम ने सोशल मीडिया मुखपोथी पर न्यूज चैनलों के मौजूदा रवैये पर प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हुए लिखा कि ‘नीचता की पराकाष्ठा क्या होती है? घटियापन की इंतहा क्या होती है। जानना चाहते हैं, तो न्यूज चैनल देखिए’…तो उस पर प्रतिक्रियाओं की लाइन लग गई।

ऐसा लगा जैसे तमाम पत्रकार, चिंतक, विचारक या न्यूज चैनलों के सतत् पराभव से चिंतित आम लोग ऐसी किसी कठोर और खरी खरी पोस्ट का इंतजार कर रहे थे। न्यूज चैनलों की हठधर्मिता, अमानवीयता और दुःख को बेचने की हरक़त के खिलाफ अधिकतर लोगों में नाराजगी नई बात नहीं है और खासतौर पर समाज का बौद्धिक तबका तो कथित मीडिया की नौटंकी और बेहूदगी से कुलबुला और खलबला रहा है। 

पहलगाम से लेकर ऑपरेशन सिन्दूर तक और अब सोनम राजा की दुखद कहानी के जरिए मीडिया का यह हिस्सा नैतिकता और सामाजिकता की तमाम सीमाओं को बेशर्मी से रौंद रहा है। 

टीआरपी और उस पर आधारित विज्ञापनों की कमाई ने उसे अंधा/बहरा बना दिया है। गूंगा इसलिए नहीं क्योंकि उसकी बकवास ही उसका यूएसपी है इसलिए उनके लिए नाग नागिन और सोनम राजा की खबर एक समान है। 

सुधीर निगम जी की पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ पत्रकार रितेंद्र माथुर ने लिखा कि  ‘टीवी चैनलों में कोई सामाजिक सरोकार नहीं है। वे कुछ भी हरकत कर रहे हैं। हमेशा से अपनी टांगें ऊंची रखने के चक्कर में ये सामाजिक मर्यादाओं का दमन करते आ रहे हैं।’ राजेश कुमरावत ने इस बात को आगे बढ़ाते हुए अत्यंत मार्मिक राय व्यक्त करते हुए लिखा कि ‘जब किसी माँ की कोख शोक से कांप रही हो और उसे ‘बहस’ के नाम पर दूसरी माँ के सामने मंच पर खड़ा कर देना — यह केवल पत्रकारिता की नालायकी नहीं, बल्कि अमानवीयता की पराकाष्ठा है।’ उन्होंने कहा कि ‘हमें फिर से एक विवेकशील, मानवीय और गरिमामय पत्रकारिता के पक्ष में खड़ा होना होगा। वरना, कल को किसी और की माँ यूं ही चैनलों की बहस में अपमानित होती रहेगी और हम दर्शक बने केवल आँखे फाड़ते रहेंगे।’ 

वरिष्ठ मीडिया विशेषज्ञ डॉ राकेश पाठक ने कहा कि ‘नीचता से भी निम्न कोई शब्द हो तो उसका प्रयोग करना चाहिए।’ तो लेखक पत्रकार रत्नाकर त्रिपाठी ने बाइट वीरों की कारगुज़ारियों की गंदगी की पराकाष्ठा से तुलना करते हुए लिखा कि ‘मैला देखिएगा तो उबकाई ही आएगी।’ वरिष्ठ पत्रकार दिनेश निगम त्यागी ने चर्चा पर सहमति जताते हुए लिखा कि ‘भगवान भी इनसे हार चुका है । इनका कुछ नहीं हो सकता। ये पतन की पराकाष्ठा पर हैं।’

दिलचस्प बात यह है कि ये सभी पत्रकारिता की नामचीन शख्सियत हैं और मीडिया की तमाम विधाओं को अपने अनुभव से संवार रहे हैं। मीडिया की मौजूदा दशा पर पत्रकारों की चिंता विचारणीय है। दूसरे व्यवसाय के लोग उंगली उठाएं तो ज्यादा चिंता की बात नहीं है लेकिन जब आपत्ति परिवार के अंदर से उठने लगे तो अपने गिरेबान में झांककर देखना जरूरी है। 

आखिर, टीआरपी के लिए ऐसी भी क्या मारामारी की आप उस पेशे के उसूल, पाबंदियां, नियम, नीतियां और नैतिकता सब भूल जाएं और देश ही नहीं दुनिया के मीडिया संस्थान आपका माखौल उड़ाएं। अमेरिका का लोकप्रिय अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारे टीआरपी उस्तादों  की बखिया उधेड़ चुका है। बीबीसी आए दिन पोल खोलता रहता है और अब तो पाकिस्तानी मीडिया भी हमारे न्यूज चैनलों की खिल्ली उड़ाता है। 

जो बात वरिष्ठ पत्रकारों, विचारकों, विदेशी एवं पड़ोसी मीडिया और आम लोगों को समझ में आ रही है वह इन मीडिया हाउस के ठेकेदार नहीं समझ पा रहे क्या? क्या, उन्हें स्व नियमन से ज्यादा सरकारी शिकंजे का इंतज़ार है? या मीडिया में उसूलों के पैरोकार प्रेस काउंसिल जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की धार बोथरी हो गई है? या फिर मीडिया शिक्षा के संस्थान विद्यार्थियों को नैतिक पत्रकारिता की पढ़ाई कराना भूल गए हैं? 

वजह जो भी हो..इस पर संवाद जरूरी है ताकि कम से कम पत्रकारों की नई जमात इन बातों/प्रतिक्रियाओं से कुछ सीख ले सके वरना वे भी इसी राह पर चल पड़े तो भगवान ही मालिक है।

मुझे लगता राष्ट्रीय स्तर पर संभव न हो तब भी स्थानीय, जिला, तहसील, संभाग, नगर, सामाजिक ग्रुप, पत्रकार फोरम, कॉफी हाउस, मीडिया संगठनों, मीडिया संस्थानों और ऐसे ही अन्य मंच जहां चार छह साथी मिलते जुलते हैं..पर चर्चा शुरू करनी चाहिए क्योंकि स्थानीय प्रतिक्रिया ही व्यापक बदलाव का मार्ग प्रशस्त करेगी और धीरे धीरे ही सही इन ‘मीडिया मुगल’ को अपनी बिरादरी की और आम लोगों की बात सुननी ही पड़ेगी अन्यथा टीआरपी की यह अंधी  दौड़ और भी गर्त में ले जा सकती है। 

फिलहाल तो यही होता दिख रहा है। तभी शायद सुधीर भाई को अपनी पोस्ट के अंत में भगवान से प्रार्थना करते हुए लिखना पड़ा कि ‘भगवान इन कमीनों को सद्बुद्धि दे, जिसकी उम्मीद कम है!!’

#मीडिया #media  #news #NewsUpdate  @Eveeyone @followers @highlight


किन्नर समुदाय का रचनात्मक इंद्रधनुष है पुस्तक ‘पूर्ण इदम’ !!

‘पूर्ण इदम’ का अर्थ है संसार की तमाम संरचनाओं की तरह यह भी पूर्ण है। ‘पूर्ण इदम: सकारात्मक किन्नर विमर्श का संचय’ नामक किताब किन्नर समुदाय पर एक अनूठा और विचारोत्तेजक संकलन है जो समुदाय की जटिल जिंदगियों, उनकी आंतरिक और बाहरी यात्रा,उनके सुख-दुख और भारतीय समाज में उनकी स्थिति को गहनता से प्रस्तुत करता है। किताब का शीर्षक उपनिषदों के दर्शन से प्रेरित है, जो किन्नर समुदाय की संपूर्णता और मानवीय गरिमा को रेखांकित करता है। 

किताब में लेखों, कविताओं,नाटक, संस्मरण,कहानियों, लघुकथाएं और साक्षात्कारों का मिश्रण न केवल किन्नर समुदाय के अनुभवों को उजागर करता है, बल्कि पाठकों को उनके प्रति सहानुभूति और समझ विकसित करने के लिए प्रेरित करता है।

वैसे,यदि हम किन्नर समुदाय पर उपलब्ध कुछ चर्चित पुस्तकों का उल्लेख करें तो इनमें राहुल सांकृत्यायन की ‘किन्नर देश में’, डॉ बंशीराम शर्मा की ‘किन्नर साहित्य’, प्रदीप सौरभ की ‘तीसरी ताली’ और  महेंद्र भीष्म की ‘मैं पायल हूं’ प्रमुख हैं। इसके अलावा, डॉ मधु शर्मा की ‘किन्नर की कन्या’, ए रेवंती की ‘द ट्रुथ अबाउट मी: ए हिजड़ा लाइफ स्टोरी’ और सुप्रसिद्ध लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की पुस्तक ‘मी हिजड़ा, मी लक्ष्मी’ भी काफी चर्चा में रही हैं। लेकिन ये सभी किताबें किसी एक विधा या शैली में हैं जबकि ‘पूर्ण इदम’  किन्नर समुदाय के मनोभाव को साहित्य की तमाम विधाओं में अभिव्यक्त करती है और यही इस पुस्तक की विशिष्टता है।

‘पूर्ण इदम’ किताब का पहला खंड साक्षात्कार पर केंद्रित है। दूसरा भाग आलेखों और तीसरा नाटक,चौथा संस्मरण, पांचवा कहानी, छठवां लघुकथा और सातवां कविताओं पर केंद्रित है, जिसमें सामाजिक विशेषज्ञों, कार्यकर्ताओं और अन्य विद्वान सदस्यों द्वारा लिखी गई रचनाएं शामिल हैं। ये रचनाएं किन्नर समुदाय के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य को कवर करते हैं। 

अंतिम परिशिष्ट में किन्नर समुदाय के उन विशिष्ट दिग्गजों का उल्लेख है जिन्होंने समाज की तमाम बाधाओं को पार कर अपने लिए सम्मानजनक स्थान बनाया है।

साक्षात्कार खंड किताब का सबसे जीवंत और व्यक्तिगत जानकारियों से भरा हिस्सा है। इसमें किन्नर समुदाय की सबसे महत्वपूर्व शख्सियतों के साथ आत्मीय बातचीत शामिल है। पहले साक्षात्कार में, किन्नर महामंडलेश्वर संजना सखी से बातचीत पाठकों को किन्नर समुदाय की आंतरिक गतिशीलता की गहरी समझ देता है। इसमें उनके संघर्ष,सफलता और सहजता का जीवंत चित्रण पढ़ने को मिलता है। संजना सखी ने अपने परिश्रम से निर्वाचन आयोग की स्टेट आइकन सहित शीर्ष उपलब्धियां हासिल की हैं। वहीं,एक अन्य साक्षात्कार में, किन्नरों की सबसे चर्चित हस्ती,उनकी सबसे प्रमुख पैरोकार और किन्नर अखाड़े की महामंडेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी से मुलाकात को रोचक और बहुत ही दिलचस्प ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

‘पूर्ण इदम’ का काव्य खंड इस संकलन का भावनात्मक और कलात्मक हिस्सा है। इस खंड की करीब 24 कविताएँ किन्नर समुदाय की आत्म-पहचान, सामाजिक संघर्ष, और आध्यात्मिक खोज को सहजता से अभिव्यक्त करती हैं। साक्षात्कार,लेखों,कहानियों और कविताओं की भाषा संतुलित और तथ्यात्मक है, जो पाठकों को बौद्धिक रूप से आकर्षित करती है।

‘पूर्ण इदम’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी समावेशिता और संवेदनशीलता है। यह किन्नर समुदाय को केवल पीड़ित के रूप में नहीं, बल्कि सशक्त, रचनात्मक, और समाज का अभिन्न हिस्सा दिखाती है। लेख, कविताएँ, लघुकथा, कहानियां और साक्षात्कार का मिश्रण एक समग्र अनुभव प्रदान करता है, जो बौद्धिक, भावनात्मक, और सामाजिक स्तर पर प्रभाव छोड़ता है। 

किताब का दार्शनिक शीर्षक ‘पूर्ण इदम’ किन्नर समुदाय की संपूर्णता को स्वीकार करने का संदेश देता है, जो सामाजिक जागरूकता और समावेशिता को बढ़ावा देता है। किताब का आकर्षक कवर और साफ सुथरी छपाई भी इसका आकर्षण बढ़ाती है। बस, यदि किताब के फ़ॉन्ट, प्वाइंट साइज और डिजाइन को और बेहतर किया जाता तो इसमें वाकई चार चांद लग जाते। हो सकता है समय सीमा ने हाथ बांध दिए हों।

‘पूर्ण इदम’ एक ऐसी किताब है जो किन्नर समुदाय के प्रति समाज की धारणाओं को चुनौती देती है और उनकी मानवीय गरिमा, रचनात्मकता और सशक्तिकरण को उजागर करती है। 188 पृष्ठों में और 60 अलग अलग खुशबू के फूलों से बनी यह माला साहित्य प्रेमियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और उन सभी के लिए एक अनमोल सौगात है जो लैंगिक विविधता और सामाजिक समावेशिता को समझना चाहते हैं। यह किताब न केवल जागरूकता बढ़ाती है, बल्कि पाठकों को किन्नर समुदाय के प्रति सहानुभूति और सम्मान विकसित करने के लिए प्रेरित भी करती है।

पुस्तक: पूर्ण इदम: सकारात्मक किन्नर विमर्श का संचय 

सम्पादक: डॉ मीनू पाण्डेय ‘नयन’

प्रकाशक: भव्या पब्लिकेशन

पेज:188

मूल्य: 250 रुपए 

एक राज्य…जहां हर बच्चे के पास है अपना जंगल !!

क्या आपको पता है कि हमारे देश में एक प्रदेश ऐसा भी है जहां का हर बच्चा मोगली है..वही, जंगल बुक वाला मोगली। अब मोगली तो रुडयार्ड किपलिंग की क...