हर बेटी के नाम... एक पिता का पत्र!!
प्रिय बेटी,
पिछले कुछ दिनों से मन बहुत विचलित है। सोशल मीडिया पर हिमाचल की कुछ बेटियों का एक वीडियो वायरल है जिसमें वे कथित तौर पर नशे, बॉय फ्रेंड, सेक्स जैसे मुद्दों पर गाली-गलौज और मारपीट के बीच परस्पर आरोप प्रत्यारोप लगाते दिखाई दे रही हैं। यही क्यों, आजकल ऐसे वीडियो, किस्से, खबरें हर छोटे बड़े शहर में सामान्य बात हो गई है।
मैं, यह बात भी सबसे पहले पूरीतरह स्पष्ट कर दूं कि यह पत्र किसी डर से नहीं लिख रहा हूं क्योंकि डर से लिखे गए पत्र रिश्तों में दीवारें खड़ी कर देते हैं। मैं यह पत्र विश्वास से लिख रहा हूँ। विश्वास ही वह धागा है जो पिता और बेटी के रिश्ते को सबसे मज़बूती से बाँधता है।
अरे हाँ, तुमने भी तो बताया था कि कुछ दिन पहले ही तुम्हारे पड़ोस में ऐसी ही कुछ लड़कियों रहने आई थी जो वीडियो वाली लड़कियों जैसी ही हरकत करती थीं। हालांकि तुम्हारे लैंडलॉर्ड ने उन्हें एक ही दिन में बाहर का रास्ता दिखाकर मिसाल कायम की थी। वैसे भी, ये वीडियो सोलन या किसी और शहर का है। फिर भी, एक जिम्मेदार पिता के नाते मुझे लगा कि क्यों न तुम्हारे जरिए तमाम बेटियों को समझाया जाए और उनके माता पिता के दर्द में अपनी आवाज भी शामिल की जाए।
इन घटनाओं को देखकर यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि कुछ युवतियों की हरकतें पूरे समाज या सभी लड़कियों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। आज भी लाखों बेटियाँ अपने परिवार, समाज और देश का नाम रोशन कर रही हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ऐसे दृश्य बदलते सामाजिक माहौल की ओर संकेत करते हैं, जिसे नज़रअंदाज़ करना खतरनाक होगा। कम से कम मम्मी पापा को डरा तो देते ही हैं।
तुम्हें याद है न…जब हम पीजी तलाश रहे थे तब भी इसी तरह की परिस्थितियां हमारे सामने आई थीं। कहीं कमरा नशीले पदार्थों की दुर्गंध से भरा था तो कही चिलम/सिगरेट जैसी चीजें खुलेआम रखीं थी। तुमने भी कुछ खुलकर और कुछ इशारों में मम्मा को बता दिया था। तभी हमने तुम्हारे अलग तरह से रहने की व्यवस्था की क्योंकि हम कमरा नहीं देख रहे थे बल्कि उस जगह को महसूस कर रहे थे, जहाँ हमारी बेटी अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण साल बिताएगी। शायद, सभी मां बाप यही सोचते/महसूस करते होंगे।
हाल ही में, वायरल वीडियो और पीजी के उन दृश्यों से मुझे महसूस हुआ कि तमाम बेटियों एवं उनके अभिभावकों से बात करने का यही सही मौका है । तुम्हें याद है, जब तुम पहली बार घर से बाहर गई थीं, तब तुम्हारी मम्मा ने तुम्हारे बैग में कपड़े,खाने पीने का सामान और पता नहीं क्या क्या रखा था लेकिन साथ में चुपचाप अपना ‘विश्वास’ भी रख दिया था। हमें गर्व है कि तुमने आज तक न केवल उस भरोसे को कायम रखा है बल्कि दिन प्रतिदिन मजबूत ही किया है।शायद, बाकी माता पिता भी अपनी बेटियों के बैग में विश्वास रखते होंगे तो फिर बेटियां कैसे रास्ता भटक जाती हैं? माता पिता ने तो सही रास्ता ही बताया होगा तो फिर बेटियां कैसे मुख्य रास्ता छोड़कर आड़ी टेढ़ी पगडंडियों पर निकल जाती हैं?
इसलिए, यह पत्र तुम्हारे लिए नहीं है। उन लाखों बेटियों के लिए भी है, जो माता पिता के भरोसे की पूंजी लेकर अपने सपनों की तलाश में घरों से निकल रही हैं..किसी हॉस्टल में, किसी पीजी में, किसी अनजान शहर में या जीवन की किसी नई मंज़िल की तलाश में।
कभी हम माता-पिता अपनी बेटी को हॉस्टल या पीजी भेजते समय उसकी पढ़ाई, फीस, सुरक्षा और भविष्य की चिंता करते थे। आज चिंता की सूची में नशा, गलत संगति, मानसिक दबाव, हिंसा, सोशल मीडिया का प्रभाव और दिखावे की संस्कृति जैसे कई विषय जुड़ गए हैं ।
इस पत्र का उद्देश्य यह कतई नहीं है कि बेटियों के सपनों पर पहरे लगें या उनकी उड़ान छोटी हो जाए। बल्कि, मैं सिर्फ इतना चाहता हूँ कि उड़ते समय उन्हें यह याद रहे कि आसमान कितना भी बड़ा क्यों न हो, अपनी दिशा कभी मत खोना। जब साइबेरिया और पता नहीं कहां कहां से पक्षी हजारों किलोमीटर का रास्ता तय कर अपनी मंजिल तक पहुंच जाते हैं तो फिर कुछ बेटियों के कदम क्यों डगमगा जाते हैं और फिर उसका खामियाजा हर बेटी और उसके माता पिता को भुगतना पड़ता है।
वैसे, मौजूदा स्थिति के लिए केवल बेटियों को दोष देना भी उचित नहीं होगा।परिवारों में संवाद कम हुआ है। माता-पिता अपनी दुनिया में व्यस्त हैं, शिक्षक टार्गेट पूरा करने के दबाव में और समाज सफलता को केवल पैसे और दिखावे से मापने लगा है। मोबाइल फोन ने घर में रहकर भी एक अलग दुनिया के दरवाजे खोल दिए हैं। ऐसे में मूल्य, मर्यादा और आत्मसंयम पीछे छूटते जा रहे हैं।
सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और ज्यादा बढ़ावा दिया है। आज लोकप्रियता, लाइक्स और वायरल होने की इच्छा कई बार ऐसे व्यवहार की ओर धकेल देती है जहां नशे, अभद्र भाषा या हिंसक व्यवहार को मनोरंजन या साहस का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है।
इसलिए, चिंता इस बात की है कि अब नशा, अभद्रता, स्वछंदता, हिंसक प्रवृत्ति को कूल या मॉडर्न होने का प्रतीक समझने की भूल की जा रही है। यही नहीं, अब मेरी ज़िंदगी, मेरी मर्ज़ी कहकर सही साबित करने का भरपूर प्रयास भी किया जा रहा है ।
बिटिया रानी, यह बात अच्छी तरह से समझ लो कि हमारा काम तुम्हें हमेशा पकड़कर रखना नहीं, बल्कि इतना सक्षम बनाना है कि तुम पढ़ो, दुनिया देखो, अपने निर्णय स्वयं लो, अपने सपनों को सच करो और हमें तुम्हारी उड़ान पर गर्व हो। लेकिन, बेटा आज का समय बहुत तेज़ है। यहाँ हर चीज़ तुरंत चाहिए जैसे दोस्ती भी, प्रसिद्धि भी, सफलता भी और सुख भी। शायद इसी जल्दबाज़ी में कुछ बेटियाँ यह भूल जा रही हैं कि जीवन शॉर्टकट से नहीं, सही रास्तों से सुंदर बनता है।
जब तुम उड़ान के लिए पंख फैलाओगी तो कोई तुम्हें समझायेगा कि नशा आधुनिकता है। कोई बहलाएगा कि नियमों की परवाह करना पुराना विचार है। कोई ज्ञान देगा कि जो मन चाहे वही करना ही आज़ादी है। बेटियों,आधुनिक बनो, लेकिन अपनी आत्मा को पुराना ही रहने दो क्योंकि आत्मा की आवाज ही सच की राह दिखाती है।
याद रखना बेटियों, तुम्हारी पहचान तुम्हारे कपड़ों, मोबाइल, गाड़ी, आधुनिकता या सोशल मीडिया से कुछ समय के लिए तो बन सकती है लेकिन असल पहचान तुम्हारा चरित्र है, परिवार है, मायाजाल से बचना है और अपने काम से नाम कमाना है। एक पिता होने के नाते मेरी चिंता बेटियों की आज़ादी नहीं, वह माहौल है जहाँ कभी-कभी आज़ादी और स्वच्छंदता का फर्क मिटता हुआ दिखाई देता है।
बेटियों, अगर कभी तुम्हें लगे कि कोई तुम्हें नशा आज़माने के लिए कह रहा है, किसी गलत रास्ते पर ले जा रहा है या तुम्हें यह समझा रहा है कि सब ऐसा करते हैं, तो एक बार मम्मी पापा को याद कर लेना। वे, जिन्होंने तुम्हें पहली बार चलना सिखाया था और आज भी तुम्हारे हर कदम की मजबूती के लिए दुआ करते हैं।
जीवन में दोस्त बहुत बनाना, लेकिन ऐसे बनाना जिनके साथ रहने में तुम्हें अपने माँ-बाप से कुछ छिपाना न पड़े। हिमाचली वायरल वीडियो में भी तुमने देखा होगा कि उन लड़कियों के झगड़े का एक कारण अपने बंदे (दोस्त) को कमरे पर लाना भी था। ऐसे दोस्त तुम्हारे अकेलेपन, कथित आधुनिकता,दिखावे और खुले व्यवहार का अनुचित फायदा उठाते हैं क्योंकि सोशल मीडिया और कथित दोस्तों के लिए सेक्स और साथी बदलना आजकल चिप्स कुरकरे खाने जैसा मामला हो गया है। यह बात अलग है कि बाद में इसका खामियाजा बेटियों को ही ज्यादा भुगतना पड़ता है। इसलिए दोस्त बनाना लेकिन ऐसा कुछ मत करना जिसके बदले तुम्हें अपना आत्मसम्मान खोना पड़े।
और एक आखिरी बात…अगर कभी जीवन में कोई ऐसी गलती हो जाए जिसे बताने में तुम्हें डर लगे, तो दुनिया के किसी और दरवाज़े पर दस्तक देने से पहले अपने घर का दरवाज़ा खटखटाना…सीधे घर लौट आना। हो सकता है मां बाप कुछ देर के लिए नाराज़ हो जाएं, डांटे या पिटाई भी कर दें लेकिन उनके दिल के दरवाजे कभी तुम्हारे लिए बंद नहीं होंगे क्योंकि माता पिता न्यायाधीश नहीं… अंतिम आश्रय होते हैं।
हमारी राजकुमारी, ईश्वर तुम्हें इतनी ऊँचाई दे कि आकाश भी छोटा लगे और इतना विवेक दे कि ऊँचाई पर पहुँचकर भी तुम्हारे पैर ज़मीन पर टिके रहें। तुम्हारे जीवन में सफलता हो, विकास हो, आत्मसम्मान हो और ऐसे निर्णय हों जिन पर तुम्हें कभी पछताना न पड़े।
ढेर सारे आशीर्वाद के साथ,
— पापा



ऐसे विषयों पर लिखते रहना जरूरी है।
जवाब देंहटाएंआभार आपका
हटाएंEkadam Sahi baat aapane kahiye bhai sahab Desh mein pahle ladkon se dar lagta tha aap ladkiyon se lagta hai
हटाएंवाकई, बराबरी की होड़ में वे गुण के साथ दोष भी अपना रही हैं
हटाएंदिल को छू लेने वाला प्रसंग
जवाब देंहटाएं🚩 अभी पढ़ा।
हटाएं🌟 पापा के मन की बात बहुत जरूरी है।
🌟 सही बात है इन दिनों हमारे आसपास का माहौल बहुत चिंताजनक होता जा रहा है। 🌟लोगों में सामाजिक मर्यादा के साथ ही कानून व्यवस्था का डर खत्म हो रहा है।
🌟ऐसे में संजीव भाई के मन की बात सभी बेटियों को सरल शब्दों में सजग , सतर्क रहने की की सलाह देती है।
🌟आइए हम गर्व करें कि पढ़ाई अथवा जाब के लिए घर से निकलते समय हमारी बेटियां जो विश्वास अपने साथ लेकर गई हैं, उसको जीवनभर कायम रखेंगी।
🌟यह आलेख बहुत महत्वपूर्ण और अपनी अपनी बेटियों को पढ़वाने वाला है।
🌟 शेयर करने के लिए हार्दिक आभार।
🌟 सादर ,
✍️ अमिताभ पाण्डेय
धन्यवाद पांडे जी
हटाएंधन्यवाद
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
हटाएंVery nice and absolutely true sir👌👌
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