सोमवार, 21 जुलाई 2025

ये चमक, ये दमक, फूलवन में महक, सब कुछ सरकार तुम्हई से है..।

यह उन दिनों की बात है…90 का दशक था और हम मध्यप्रदेश के संस्कारधानी के नाम से मशहूर जबलपुर शहर के नामी शासकीय मॉडल विज्ञान कॉलेज से फूल पत्तियों से जुड़े विषय वनस्पति विज्ञान (बॉटनी) में एमएससी की अंतिम परीक्षा देकर बनी बनाई लकीर पर चलते हुए एम फिल और फिर  पीएचडी के सपने बुन रहे थे। सब कुछ ठीक था, अंक भी अच्छे थे,विषय भी और वातावरण भी अनुकूल था लेकिन फिर भी मन में एक बेचैनी थी..मन कुछ और करना चाहता था..कुछ लीक से हटकर। लेकिन पता नहीं था कि क्या और कैसे? 

 तभी अचानक एक दिन अखबार में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता संस्थान का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। आज के विद्यार्थियों के लिए संस्थान शब्द अचरज लग सकता है क्योंकि उनके लिए तो यह विश्वविद्यालय है। वे भी सही हैं और हम भी क्योंकि उन दिनों यह संस्थान ही था, विश्वविद्यालय बाद में बना। 

खैर, इस विज्ञापन में जनसंपर्क और पत्रकारिता के दो पाठ्यक्रमों के लिए 20-20 सीटों पर देश भर से आवेदन आमंत्रित किए गए थे । पहली बात तो यह है कि यह प्रदेश में अपनी तरह का पहला संस्थान था और दूसरा इसमें जनसंपर्क जैसा बिल्कुल नया पाठ्यक्रम प्रस्तावित था। 

विज्ञापन देखकर ऐसा लगा जैसे यह मन में मची खलबली का इलाज है। वैसे भी, एमएससी के बाद सीधे तौर पर तो नौकरी मिलने की कोई संभावना होती नहीं है और स्कूल के दिनों से ही मेरी लिखने पढ़ने में गहरी रुचि थी इसलिए लगा कि  मैं और यह संस्थान शायद हमराह होने के लिए ही बने हैं।   फिर क्या था, मेरे बहकावे में हमारे कुछ और साथियों ने भी यह सोचकर फार्म भर दिए कि नया संस्थान और नए कोर्स  हैं इसलिए हो सकता है सार्थक भविष्य की कोई राह मिल जाए। 

दिक्कत यह थी कि केवल फार्म भरने से एडमिशन नहीं मिल रहा था बल्कि महज चालीस सीटों के लिए देश भर के सभी प्रमुख शहरों में होने वाली प्रवेश परीक्षा की बाधा भी सफलता पूर्वक पार करनी थी। अब इसे पठन पाठन में रुचि का प्रतिफल कहें या भाग्य का लेखा..हमारे सभी साथियों में बस मेरा चयन हुआ और वह भी मेरे मनचाहे विषय जनसंपर्क में। इसतरह अपन इस संस्थान के सर्वप्रथम (फाउंडर) बैच के लिए देश भर से चुने गए जनसंपर्क विषय के चुनिंदा 20 विद्यार्थियों की खास जमात में शामिल हो गए। 

मनचाही दिशा और विषय ने उत्साह भर दिया और हम भी साइंस में भविष्य गढ़ने का इरादा त्यागकर झोला उठाकर नए सपने लेकर भोपाल चले आए ।  तब यह संस्थान शाहपुरा में सहकारिता विभाग के भवन में था जहां नीचे हमारी कक्षाएं लगती थी और ऊपर हमारा हॉस्टल था..एक तरह से आधुनिक गुरुकुल की तरह… जहां पढ़ाई-लिखाई से लेकर जेएनयू टाइप लड़के और लड़कियों के साथ घूमने फिरने और  खाने पीने को लेकर पूरी आजादी थी। 

लड़के और लड़कियों में किसी तरह का भेदभाव नहीं था।  हमारा जनसंपर्क और पत्रकारिता विषय के 20-20 विद्यार्थियों का बैच भी लताजी के गाए कालजयी गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों.. “ की ‘कोई सिख, कोई जाट-मराठा, कोई गोरखा, कोई बंगाली..’ टाइप मिश्रित था मतलब विभिन्न राज्यों से आए धुरंधर । पढ़ाई के लिए जहां डॉक्टर नंदकिशोर त्रिखा, प्रोफेसर रघुनाथ प्रसाद तिवारी, सुश्री दविंदर कौर उप्पल, श्री कमल दीक्षित, डॉ श्रीकांत सिंह और श्री शशिकांत शुक्ला जैसे नामचीन पत्रकार और अपनी अपनी फील्ड के मंझे हुए दिग्गज  मौजूद थे तो विषयों में विशेषज्ञता के लिए श्री प्रभात जोशी से लेकर डॉ ओम नागपाल तक देश भर के जाने-माने पत्रकार हमें इस पेशे के हुनर सिखाने बुलाए जाते थे। 

उस समय संस्थान के महानिदेशक श्री राधेश्याम शर्मा और कार्यकारी निदेशक श्री अरविंद चतुर्वेदी की जोड़ी ने संस्थान को इस तरह से संचालित किया कि देशभर में पहले दिन से ही इस संस्थान की और हमारी चर्चा होने लगी। पहले बैच से होने के नाते हमसे मीडिया की उम्मीदें भी जुड़ गई थीं।  

अब यह हमारे समर्पण, उत्साह और पत्रकारिता के प्रति जिज्ञासा का नतीजा था या फिर हमारे गुरुओं की मेहनत का, कि 40 विद्यार्थियों में से जो जिस मीडिया संस्थान में गया वहीं से नाम कमाकर लौटा। शुरुआती प्रशिक्षण से मिली यह सफलता आज 3 दशक बाद भी इसी तरह जारी है। ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात है। हमारे बैच में न तो कोई विषयगत भेदभाव था और न ही कोई पेशागत पक्षपात। यही कारण है कि जनसंपर्क का कोर्स करने के बाद भी मुझे पत्रकारिता के क्षेत्र में जाने का मौका मिला और अखबारों ने भी पूरे उत्साह से हाथों हाथ लिया। 

दैनिक देशबंधु के भोपाल संस्करण से शुरू हुआ यह सफर नवभारत,पाक्षिक हिंदी मेल, एक्सप्रेस मीडिया सर्विस सहित कुछ अन्य मीडिया हाउस से होता हुआ भारतीय सूचना सेवा के साथ आज अनवरत रूप से जारी है।  मैं, एक और मामले में भाग्यशाली हूं कि अध्ययन के बाद मुझे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय में अध्यापन का भी सुअवसर मिला। 

दरअसल, पहले स्नातक और उसके बाद स्नातकोत्तर में अव्वल स्थान हासिल करने के फलस्वरूप मुझे विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर की कक्षाओं को पढ़ाने का अवसर दिया गया। तब इसे शोधवृत्ति कहा जाता था। कक्षाएं लेने के एवज में 1995- 96 में ₹1500 प्रति माह मिलते थे । जो निश्चित ही उस दौर में एक बड़ी राशि थी क्योंकि हमारे कई साथियों को तो इससे आधी तनख्वाह भी नहीं मिलती थी । एक सुखद और गर्व की बात यह भी है कि आज विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में शीर्ष जिम्मेदारियां संभाल रहे गुरुजनों को दीक्षित करने का मौका भी मुझे उसी दौरान मिला ।  

 पठन-पाठन के साथ-साथ अखबार की नौकरी का सिलसिला भी चलता रहा और फिर शिक्षा, अपराध, राजनीति, कला, संस्कृति और धर्म से लेकर तमाम विषयों पर रिपोर्टिंग और संपादन का भरपूर मौका मिला। विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई के फलस्वरुप हासिल कार्य कुशलता ने संपादकों का दिल जीता तो उन्होंने भी अखबार के हर पन्ने पर कलम के रंग बिखेरने के भरपूर अवसर दिए। 

तकरीबन पौन दशक पत्रकारिता में गुजारने के बाद मेरा चयन भारतीय सूचना सेवा में हो गया। इससे राह जरूर बदली लेकिन काम का तरीका वही रहा। यही कारण है कि रक्षा मंत्रालय की 100 साल से प्रकाशित तेरह भाषाओं वाली पत्रिका ‘सैनिक समाचार’ के संपादन का मौका मिला तो प्रतिष्ठित ‘आकाशवाणी’ से जुड़कर पूर्वोत्तर से लेकर भोपाल तक प्रादेशिक समाचार एकांश संभालने का महत्वपूर्ण जिम्मा भी । असम में कार्यकाल के दौरान हमारे प्रादेशिक समाचार एकांश,सिलचर को देश में सर्वश्रेष्ठ समाचार एकांश के पुरस्कार से नवाजा गया वहीं भोपाल में कोरोना काल के समय प्रसार भारती द्वारा शुरू की गई स्पेशल स्टोरी की प्रतियोगिता में हमारी टीम ने हर सप्ताह अधिकतर पुरस्कारों पर कब्जा जमाया।  

इन सफलताओं ने सीनियर अधिकारियों का भी ध्यान खींचा और फिर  राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति जैसे दिग्गजों के देश में कवरेज के साथ-साथ विदेश में कवरेज करने का अवसर भी दिया। तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के साथ मुझे अफ्रीकी देशों में जाने का मौका मिला तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जापान में जी 20 देशों के महत्वपूर्ण सम्मेलन के कवरेज की जिम्मेदारी भी मिली। यह अनुभव न केवल अविस्मरणीय थे बल्कि आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहने की परीक्षा भी। 

इन देशों की यात्रा से हासिल अनुभव पर मैंने ‘चार देश चालीस कहानियां’ नामक पुस्तक लिखी है जिसे पाठकों और विद्वानों का भरपूर स्नेह मिला। आकाशवाणी भोपाल के कार्यकाल के दौरान ही मैने अयोध्या में मंदिर निर्माण पर केंद्रित ‘अयोध्या 22 जनवरी’ नामक एक और पुस्तक लिखी। इसे भी सुधि जनों ने भरपूर सराहा । पुस्तक लिखने का सिलसिला अभी भी जारी है और जल्दी ही कुछ और विषयों पर नए किस्से पढ़ने को मिल सकते हैं। फिलहाल मैं केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पत्र सूचना कार्यालय पीआईबी) के शिमला क्षेत्रीय ऑफिस में सहायक निदेशक के रूप में प्रदेश भर की पब्लिसिटी का जिम्मा संभाल रहा हूं।  

जब उपलब्धियां जुड़ती हैं तो पुरस्कार और सम्मानों से झोली भरने लगती है । मुझे अब तक प्रतिष्ठित माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान, पब्लिक रिलेशंस सोसायटी ऑफ इंडिया, बंग साहित्य परिषद असम, मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ, प्रेरणा भारती  के प्रतिष्ठा सम्मानों के साथ साथ बेस्ट ब्लॉगर का शोभना सम्मान, नईदिल्ली सहित अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं । मेरा ‘जुगाली’ ( jugaali.blogspot.com ) के नाम से एक लोकप्रिय ब्लॉग भी है और सोशल मीडिया पर लेखन भी सतत रूप से जारी है ।   

इसके अलावा, मुझे माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान के परामर्श मंडल के सम्मानित सदस्य और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम निर्धारण समिति के सम्मानित सदस्य का गौरव भी हासिल है। अपने लगभग साढ़े तीन दशक के पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि मेरी इस यात्रा में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय की सबसे अहम भूमिका है। 

विश्वविद्यालय से जुड़ने के बाद न केवल एक अलग पहचान बनाने का अवसर मिला है बल्कि विश्वविद्यालय की शिक्षा ने स्थाई रोजगार का अवसर भी दिया है। आज जो भी नाम और दाम हासिल है, उसमें निश्चित ही विश्वविद्यालय से हासिल शिक्षा और कार्य कुशलता की सबसे अहम भूमिका है। सीधे शब्दों में कहे तो ये चमक, ये दमक, फूलवन में महक, सब कुछ सरकार तुम्हई से है..।   

अक्सर यह होता है कि हम सभी बहुत सारी बातों को जानते हैं और बहुत ज्ञान भी रखते हैं लेकिन उस ज्ञान को कुशलता के साथ व्यवस्थित सांचे और खांचे में बिठाने का कौशल शिक्षा से ही हासिल होता है। शिक्षा के जरिए हमें अपनी धार को पैना करने और उसे सकारात्मक रूप से इस्तेमाल करने के गुण भी हासिल होते हैं । अपने कार्यकाल के दौरान मैंने हमेशा अपने साथियों और  विश्वविद्यालय में कक्षाएं लेने के दौरान छात्रों को यही सलाह दी है कि जब भी मौका मिले पढ़ते और लिखते रहना चाहिए क्योंकि पढ़ने से आपकी समझ बेहतर होती है और लिखने से आपकी कलम को पारंगतता हासिल होती है।

 जाहिर सी बात है कि हम जितना पढ़ेंगे और लिखेंगे हमारी लेखन शैली उतनी ही सुव्यवस्थित और सुगठित होती जाएगी और वह अपने साथ-साथ पाठकों को भी अपनी ओर खींचेगी।   अंत में, मैं, एक बार पुनः हमारे गुरुकुल यानि विश्वविद्यालय के प्रति आभार व्यक्त करता हूं क्योंकि यदि मुझे विश्वविद्यालय से जुड़ने का मौका नहीं मिलता तो शायद आज यह मकाम हासिल नहीं होता। मैं विश्वविद्यालय के उन सभी गुरुओं के प्रति भी आभारी हूं जिन्होंने हमें मीडिया का ककहरा सिखाकर इस लायक बनाया कि आज हम न केवल कुशलता के साथ अपना काम कर पा रहे हैं बल्कि अपने से जुड़े लोगों को भी सही दिशा दे पा रहे हैं।

 (भोपाल स्थित एशिया के एकमात्र पत्रकारिता विश्वविद्यालय और मेरे गुरुकुल माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा पूर्व छात्रों के अनुभव पर केंद्रित पुस्तक माखन के लाल के लिए लिखा गया मेरा आलेख।)

सायोनारा भोपाल…अल्पविराम के बाद फिर रचेंगे किस्सों का नया संसार!!

मेरे लिए भी यह बहुत ही भावुक और खास पल हैं। जिस शहर में पत्रकारिता का ककहरा सीखा, जहां ‘जब हम जवां होंगे..’ से ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे.. ‘ मार्का दिन गुजारे..उसे कैसे छोड़कर जा सकते हैं?  

जहां दोस्ती और रिश्तों को सतत संवाद के साथ बुना-गढ़ा और निरंतर मुलाकात की खाद-पानी से जीवंत बनाए रखा..उस शहर एवं वहां बने रिश्तों के ताने बाने से बाहर निकलना आसान कैसे हो सकता है ?   भोपाल ने पहली नौकरी से लेकर नौकरी की अंतिम पंचवर्षीय पारी के पहले तक फ्रंट फुट पर खुलकर बल्लेबाजी करने का मौका दिया …उस महबूब शहर भोपाल से फिर कुछ साल दूर जाना वाकई मुश्किल है। 

दरअसल, नौकरी की अपनी सीमाएं, दुश्वारियां, परिवार की जरूरत और शहर से प्यार के बीच के उलझे धागों को सुलझाना आसान नहीं है । शहर और परिवार में से किसी एक को चुनना तो और भी जटिल था..काफी सोच विचारकर मैंने परिवार चुना और शायद कोई भी भावनात्मक व्यक्ति यही करता।  वैसे भी, शहर तो स्थायी है,कायम है ही अपनी जगह पर,लेकिन परिवार के सदस्यों की जरूरत समय के साथ घटती बढ़ती रहती है और जब बात इकलौती बिटिया के स्नेह एवं साथ की हो तो उसके आगे सब कुर्बान है । फिर जब यह निश्चित हो कि वापस यहीं आना है एवं यहीं बसना है..इसलिए शहर भी दिल खोलकर कह रहा है कि जाओ कुछ दिन और वतन के नए इलाकों के दीदार कर आओ..मेरी बाहें हमेशा वापसी के इंतजार में खुली हुई हैं..तब जाने का दर्द भी कम हो जाता है । 

खैर, भोपाल में दो पारियों में करीब सात-सात साल जोड़कर कुल 14 साल अब तक गुजारे हैं। पहली पारी की ही तरह इस दूसरी पारी में बिताए सात साल मेरे जीवन का अनमोल हिस्सा हैं। यहाँ दिल खोलकर मिला प्यार, काम के मौके, बेतहाशा सम्मान और आकाशवाणी भोपाल में टीम न्यूजरूम से मिला पारिवारिक माहौल मेरे दिल में हमेशा बसा रहेगा। न्यूजरूम टीम ने तो अपनत्व से दफ्तर को न केवल घर बना दिया, बल्कि एक ऐसा विस्तारित परिवार दिया, जिसने हर कदम पर मेरा साथ निभाया। सिटी ऑफ लेक का ज़र्रा ज़र्रा और आकाशवाणी भोपाल का हर गलियारा, हर चेहरे पर खिली मुस्कान,  साथ बिताए हँसी-खुशी के पल और हर छोटी-बड़ी यादें मेरे लिए जीवंत खजाना हैं। 

इस शहर ने ‘चार देश चालीस कहानियां’ और ‘अयोध्या 22 जनवरी’ जैसी किताबें, सैकड़ों खबरें, हजारों बार रेडियो पर आने का मौका और अनगिनत लेख लिखने का हौंसला दिया।  यहां रहकर सबसे बड़े मीडिया संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्विद्यालय में ‘बोर्ड ऑफ स्ट्डीज’ का सम्मानित सदस्य बनने और दुनिया में अपनी तरह के अनूठे माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान के प्रतिष्ठित ‘परामर्श मंडल’ का मानद सदस्य होने जैसे गौरव के पल दिए।  

इसी शहर में हमने ‘रीडर्स क्लब’ नामक एक ऐसा पौधा रोपा जो पठन पाठन की मुहिम को आगे बढ़ाकर लगातार पुष्पित पल्लवित हो रहा है। यहां मीडिया के  मित्रों सहित सभी साथियों ने मुझे इतना प्यार, सम्मान, सहयोग और समर्थन दिया कि मैं इसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता। 

 इस शहर ने मुझे नई ऊँचाइयों तक पहुँचने ( शिमला भी ऊंचाई पर है😆) का बल दिया और एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा भी दी। अब जब मैं एक नए शहर देवभूमि हिमाचल की राजधानी और मशहूर पर्यटन स्थल शिमला में पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की जिम्मेदारी उठाने की ओर कदम बढ़ा रहा हूँ, तो मेरा दिल इन सभी यादों और भोपाल की गर्मजोशी से भरा हुआ है। मैं उन सभी का तहेदिल से आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने मेरे इस सफर को इतना सुंदर बनाया।  

मेरे इन सात सालों के सफर को भोपाल ने खूबसूरत,सहज और संग्रहणीय बनाया है और मैं इन पलों को हमेशा संजोकर रखूँगा । यहां बिताए लम्हे और आपका साथ मेरे लिए अनमोल है। हम भौगोलिक दूरियों को कभी हमारे बीच नहीं आने देंगे और निश्चित ही यहां की यादें मेरी नई शुरुआत को आसान बनाएंगी और मजबूती से मेरे साथ हमेशा डटी रहेंगी। 

 …अंत में अपने शहर से एक वादा भी कि अब तीसरी पारी स्थायी होगी और फिर साथ साथ किस्सों का नया संसार रचेंगे…फिलहाल अलविदा..सायोनारा!!  

शिमला: प्रेम की कविता सा अहसास


‘क्वीन ऑफ हिल्स’ के नाम से विख्यात शिमला इन दिनों घनी धुंध और अल्हड़ बादलों की एक अलौकिक चादर में लिपटी हुई है, मानो प्रकृति ने इस पहाड़ी नगर को अपने रोमांटिक रहस्य में छिपा लिया हो। ऐसा लगता है जैसे स्वप्नदर्शी निर्देशक राज कपूर ने अपनी फिल्म राम तेरी गंगा मैली का लोकप्रिय गीत कोहरे की चादर लपेटे हूं.. इसी शहर से प्रेरित होकर फिल्माया था। यहां की यह अनूठी सुंदरता पर्यटकों और इस स्वनिल आभाष से अनजान हम जैसे लोगों को एक अलग ही दुनिया का अहसास कराती है। शहर की ढलान वाली सड़कों पर बने घरों की लाल और हरी छतें कोहरे की सफेद परतों से ढककर दूर से देखने पर किसी काल्पनिक चित्र की तरह प्रतीत होती हैं। ये घर, पुराने औपनिवेशिक आकर्षण के साथ, कोहरे में तैरते हुए एक ऐसी शांति और गहराई पैदा करते हैं, जो  सीधे दिल को छू जाती है।

हवा में फैली हल्की ठंडक और नटखट बादलों से जन्म लेती रिमझिम फुहारें चेहरे को हौले से छूकर हनीमून के लिए आए प्रेमियों के लिए रोमांटिक माहौल रच देती हैं । रिज पर चर्च के सामने दिन भर हाथों में हाथ डाले प्रेमी जोड़े जमा रहते हैं। उनके पीछे शिमला का मशहूर चर्च कोहरे से ढका हुआ है जैसे छिपकर उनके प्रेम का आनंद ले रहा हो और वे युगल भी दुनिया की नजरों से बचकर इस कोहरे में गुम हो जाना चाहते हैं। एक-दूसरे के करीब कई युगल कोहरे की नमी को अपनी साँसों में उतारते हुए सोच रहे है कि काश उनके लिए यह पल अनंत काल तक ठहर जाए । वे यहां आकर बस एक-दूसरे में खोए जाते हैं और धुंध की घनी चादर उनके इर्द-गिर्द एक निजी संसार रच देती है। 

कभी, एकाएक परिवार के परिवार बादलों का कंबल हटाकर सामने आ जाते हैं जैसे बादलों की सीढ़ियां उतर रहे हों। हर कोई कोहरे, धुंध और बादलों में ढकी ऐतिहासिक मॉल रोड का हर हिस्सा कैमरे के जरिए अपनी स्मृतियों में सहेज लेना चाहता है। कहीं कहीं वाहनों की रोशनियाँ धुंध के बीच ऐसे चमक उठती हैं, मानो सितारे सड़क पर उतर आए हों। ये रोशनी कोहरे में निखरकर एक सुनहरा आलोक बना देती है। सड़कों पर चलते लोग सुदूर से धीरे धीरे उनकी मौजूदगी की झलक देते हैं। वे भी प्रकृति के इस अद्भुत चित्रण का हिस्सा लगते हैं। वहीं, कोहरे में धुंधली दिखाई दे रही पेड़ों की हरी-भरी चादर इस दृश्य को एक काव्यात्मक सुंदरता प्रदान कर देती है । जबकि दूर से पहरेदारी कर रहीं पर्वतों की चोटियाँ बादलों के ऊपर से इस तरह झाँकती सी लगती हैं, जैसे वे प्रकृति के आगोश में पल रही नवयुगलों की प्रेम कहानी की साक्षी बनना चाहती हैं।

शाम ढलने ही दिनभर बादलों की गिरफ्त में रहा सूरज किसी तरह डूबने की औपचारिक निभाने लगता है। तभी हवा में एक मीठी खुशबू फैलने लगती र है—शायद देवदार के पेड़ों की या किसी पास की चाय की दुकान से आ रही अदरक इलायची की । यह खुशबू एक अनकही बातचीत को जन्म देती है, जहाँ शब्दों की जरूरत नहीं है और इसे बस महसूस किया जा सकता है । 

शिमला इस मौसम में सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि प्रेम की एक कविता बन जाता है, जहाँ धुंध, कोहरा, बादल और रोशनी की हर किरण प्रकृति से मानव के रिश्ते की गहराई को प्रतिबिंबित करते हैं ।

जैसे-जैसे रात गहराती जाती है, कोहरे एवं धुंध की परतें और घनी होती जाती हैं और स्ट्रीट लाइट से लेकर शहर के घरों की रोशनियाँ धीरे-धीरे मंद पड़कर अदृश्यता से एकाकार होने लगती  हैं लेकिन यह मंदता रोमांस को कम नहीं करती बल्कि इसे और गहरा बना देती है। 

धुंधलका बढ़ते ही नवयुगलों के जोड़े अपनी होटलों की ओर बढ़ने लगते हैं, हाथों में हाथ लिए, कोहरे के इस जादुई आलिंगन में खोए हुए और शिमला को अपनी प्रेम कहानी का गवाह बनाकर भविष्य के सपने बुनते हुए ।  धुंध और बादलों से ढके शहर का यह दृश्य न केवल आँखों को भाता है, बल्कि दिल को भी छू जाता है और एक ऐसी छाप छोड़ जाता है जो हमेशा के लिए, सालों साल तक दिल में संजोई जा सके ।


शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

स्वर्ण जयंती अंदाज कुछ इस तरह का हो !!


आज 10 जुलाई 2025 को मनीषा जी का 50वां जन्मदिन है..स्वर्ण जयंती वर्ष..जीवन की साझा स्वर्णिम यादों का साल और हमारे रजत जयंती साथ का सुनहरा अध्याय। मनीषा जी सिर्फ मेरी पत्नी ही नहीं, बल्कि हमारे परिवार की धुरी हैं, उन्होंने प्यार, त्याग और समर्पण से हमारे घर को स्वर्ग बनाया है। यह दिन केवल उम्र का उत्सव नहीं, बल्कि मनीषा जी के अनमोल योगदान का सम्मान है।

मनीषा जी मेरे जीवन की वह रोशनी हैं, जिन्होंने हर अंधेरे को दूर किया। आधी सदी का यह सफर एक अनमोल तोहफा है। तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारी हिम्मत, और तुम्हारा अटूट प्यार हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहा है।

तुम्हारी छोटी-छोटी बातें—सुबह की चाय में तुम्हारा प्यार, खाने में मिठास, पल पल का साथ, कठिन दिनों में तुम्हारा धैर्य और हर खुशी में तुम्हारा साथ—ये सब मेरे जीवन की सबसे अनमोल यादें हैं। तुमने मेरे साथ हर चुनौती को मुस्कुराते हुए अपनाया है।

इन 50 वर्षों में मनीषा जी ने हर भूमिका—माँ, पत्नी, बहू, और दोस्त—को इतने प्यार और जिम्मेदारी से निभाया कि हम सभी कायल हैं। इनकी हंसी बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाती है, और धैर्य मुश्किल वक्त में हिम्मत देता है। हमारे परिवार की हर छोटी-बड़ी खुशी में इनका हाथ है—चाहे वह बच्चों की सफलता हो, हमारे घर की रौनक हो, या एक साथ बिताए पल।

आज हम सब मिलकर तुम्हें धन्यवाद कहना चाहते हैं। तुमने हमें प्यार करना, एक-दूसरे का सम्मान करना और हर परिस्थिति में मुस्कुराना सिखाया। इस खास दिन पर, मैं और हमारा परिवार  चाहते हैं कि तुम्हारा हर दिन खुशियों से भरा हो।

तुम्हारा यह 50वां जन्मदिन नई शुरुआतों का प्रतीक है—नए सपनों, नई खुशियों और अनगिनत यादों का। ईश्वर से प्रार्थना है कि तुम्हें लंबी उम्र, अच्छा स्वास्थ्य और अनंत खुशियाँ मिलें। यह 50वां जन्मदिन महज एक पड़ाव है… हम साथ साथ और अनगिनत यादें बनाएंगे। 

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं!




बुधवार, 9 जुलाई 2025

न्यूजरूम परिवार के नाम एक पाती

 

मेरे न्यूजरूम परिवार के सभी प्रिय सदस्यों,

  • सभी को नमस्कार


मजरूह सुल्तानपुरी 

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया


आज मेरे लिए एक ऐसा क्षण है, जो मन में मिश्रित भावनाओं का तूफान लिए हुए है—खुशी, गर्व, और कहीं न कहीं एक हल्की-सी उदासी। सात साल पहले जब मैंने इस दफ्तर में कदम रखा था, तब यह स्थान मेरे लिए सिर्फ एक कार्यस्थल था। लेकिन आप सभी ने इसे मेरे लिए एक घर बना दिया, एक ऐसा परिवार जहाँ हर दिन नई सीख, हँसी, और अपनत्व का एहसास हुआ। आज, जब मैं ट्रांसफर के साथ एक नए सफर की ओर बढ़ रहा हूँ, तो यह विदाई मेरे लिए उतनी ही मुश्किल है, जितनी किसी अपने को अलविदा कहना।


इन सात सालों में हमने मिलकर अनगिनत चुनौतियों का सामना किया। चाहे वो डेडलाइन का दबाव हो, प्रोजेक्ट्स की जटिलताएँ हों, या फिर नई योजनाओं को आकार देना हो—आप सभी का साथ मेरे लिए एक ढाल की तरह रहा। कॉफी ब्रेक में की गई हल्की-फुल्की बातें, लंच टाइम की वो छोटी-छोटी कहानियाँ, और उत्सवों में एक साथ नाचना-गाना—ये वो पल हैं जो मेरे दिल में हमेशा जिंदा रहेंगे। आप में से हर एक ने मुझे कुछ न कुछ सिखाया—कोई धैर्य, कोई मेहनत, तो कोई मुस्कुराते हुए हर मुश्किल को आसान बनाने का हुनर।

मुझे याद है वो दिन जब हमने एक साथ मिलकर असंभव-से लगने वाले लक्ष्य को हासिल किया था, और वो रातें जब हम सब देर तक बैठकर हँसते-बतियाते रहे। यहाँ के हर गलियारे, हर डेस्क, और हर मीटिंग रूम में मेरी यादें बसी हैं। यह दफ्तर मेरे लिए सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि एक जीवंत कहानी है, जिसमें आप सभी किरदार हैं।

इस मौके पर मुझे मशहूर शायर बशीर बद्र का एक शेर याद आ रहा है, जो मेरे मन की बात को बयान करता है:

"याद इतनी सी बनी रहे बस हमारे बाद,

कोई मुड़कर देख ले हमें, ये तमन्ना है बहुत।"

मैं चाहता हूँ कि मेरी मेहनत, मेरी मौजूदगी, और मेरे योगदान की एक छोटी-सी छाप यहाँ रह जाए। और अगर मैंने अनजाने में किसी का दिल दुखाया हो, कोई गलती की हो, तो इसके लिए मैं आप सभी से दिल से माफी माँगता हूँ।

ट्रांसफर मेरे लिए एक नया अध्याय है, एक नई राह, जहाँ मैं आप सभी से मिली सीख और प्रेरणा को साथ ले जा रहा हूँ। मैं वादा करता हूँ कि जहाँ भी रहूँ, इस परिवार की गरिमा और मूल्यों को ऊँचा रखूँगा। आप सभी से मेरा निवेदन है कि इस दफ्तर के इस पारिवारिक माहौल को हमेशा बनाए रखें, क्योंकि यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।


अंत में, मैं एक और कविता की पंक्तियाँ साझा करना चाहूँगा, जो मेरे इस सफर को बयान करती हैं। ये पंक्तियाँ हैं हरिवंश राय बच्चन की:

"मंजिलें अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह,

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, जिंदगानी फिर कहाँ।"

आप सभी का हृदय से आभार, जो आपने मुझे इतना प्यार, सम्मान, और साथ दिया। मेरी कामना है कि यह परिवार हमेशा यूँ ही मुस्कुराता रहे, एक-दूसरे का हौसला बढ़ाता रहे। मेरे नए सफर के लिए आपकी शुभकामनाएँ मेरी ताकत होंगी। उम्मीद है, भविष्य में हम फिर मिलेंगे, और नई यादें बनाएंगे।

धन्यवाद, और अलविदा नहीं, बल्कि फिर मिलने की उम्मीद के साथ!



अभिशाप नहीं,सीधे संवाद का सटीक माध्यम है भी सोशल मीडिया

इन दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया खासकर न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया को खरी-खोटी सुनाना एक फैशन बन गया है. मीडिया की कार्यप्रणाली के बारे में ‘क-ख-ग’ जैसी प्रारंभिक समझ न रखने वाला व्यक्ति भी ज्ञान देने में पीछे नहीं रहता. हालाँकि यह आलोचना कोई एकतरफा भी नहीं है बल्कि टीआरपी/विज्ञापन और कम समय में ज्यादा चर्चित होने की होड़ में कई बार मीडिया भी अपनी सीमाएं लांघता रहता है और निजता और सार्वजनिक जीवन के अंतर तक को भुला देता है. वैसे जन-अभिरुचि की ख़बरों और भ्रष्टाचार को सामने लाने के कारण न्यूज़ चैनल तो फिर भी कई बार तारीफ़ के हक़दार बन जाते हैं लेकिन सोशल मीडिया को तो समय की बर्बादी तथा अफवाहों का गढ़ माना लिया गया है. 

आलम यह है कि सोशल मीडिया पर वायरल होते संदेशों के कारण अब ‘वायरल सच’ जैसे कार्यक्रम तक आने लगे हैं  लेकिन, वास्तविक धरातल पर देखें तो न्यू मीडिया के नाम से सुर्खियाँ बटोर रहे  मीडिया के इस नए स्तम्भ का सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो यह वरदान बन सकता है. कई बार मुसीबत में फंसे लोगों तक सहायता पहुँचाने में फेसबुक,ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के लोकप्रिय प्लेटफार्म ने गज़ब की तेज़ी दिखाते हुए अनुकरणीय उदाहरण पेश किए हैं. बाढ़,भूकंप,आग प्राकृतिक आपदाओं के दौरान इस मीडिया की सकारात्मक भूमिका अब सामने आने लगी है.


निजी तौर पर सोशल मीडिया की सक्रियता के तो बेशुमार उदाहरण मौजूद हैं लेकिन सरकारी स्तर पर भी यह मीडिया इन दिनों कारगर भूमिका निभा रहा है. हाल ही में रेलमंत्री और उनके मंत्रालय की ट्विटर पर सक्रियता के कारण मुसीबत में फंसे यात्रियों को समय पर सार्थक मदद मिलने के कई किस्से सामने आ रहे है. यहाँ तक कि इस मीडिया के चलते नवजात बच्चे को ट्रेन में दूध से लेकर डायपर तक उपलब्ध कराने जैसी मानवीय पहल देखने को मिली है. ट्रेन में महिलाओं से छेड़छाड़ रोकने और बदमाशों को मौके पर ही गिरफ्त में लेने में भी इस मीडिया ने अहम् भूमिका निभाई है.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया पर सक्रियता किसी से छिपी नहीं है. वे इस मंच का इस्तेमाल आम जनता के संपर्क में रहने के लिए बखूबी करते हैं और शायद यही कारण है कि ‘स्वच्छ भारत’ और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढाओ’ जैसे सामाजिक कल्याण से जुड़े कार्यक्रम शुरू होते ही न केवल आम जनता तक पहुँच जाते हैं बल्कि जन-सामान्य के मन की थाह लेने में भी सहायक बनते हैं. यदि कुछ साल पहले के परिपेक्ष्य में देखे तो यह सब अविश्वसनीय सा लगता है. पहले सामाजिक कल्याण से जुडी सरकारी योजनाएं जन-सामान्य तक तब पहुँच पाती थीं जब कि वे या तो समाप्त होने के कगार पर होती थीं या फिर जन-भागीदारी के अभाव में वे असफल हो जाती थीं. आकाशवाणी से प्रसारित प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में आम लोगों की भागीदारी सोशल मीडिया की वजह से ही संभव हो पायी है. प्रधानमंत्री द्वारा विभिन्न देशों की यात्रा के दौरान सोशल मीडिया के जरिए उस देश की भाषा में सन्देश प्रेषित करने से गर्मजोशी और परस्पर उत्साह का जो माहौल बनता है उससे सुदृढ़ रणनीतिक संबंधों की नींव रखने में भी मदद मिलती है.     


अब तो सरकार के अधिकतर मंत्रालय सोशल मीडिया पर सक्रिय है लेकिन विदेश मंत्रालय की ट्विटर पर सक्रियता से कई परिवारों को नया जीवन मिल गया. चाहे वह रूस और यूक्रेन युद्ध में भारतीय विद्यार्थियों को वापस लाने का मामला हो या खाड़ी देशों से लेकर इजरायल तक में फंसे भारतीयों को महज सोशल मीडिया पर मिले संदेशों के आधार पर मदद पहुंचाना हो, सोशल मीडिया की सकारात्मक भूमिका सामने आई है।


चंद शब्दों में अपनी बात को सीधे सम्बंधित व्यक्ति तक तुरंत पहुंचा पाने की कुशलता के कारण इस नए मीडिया ने इन परिवारों के परिजनों को विदेश से सुरक्षित वापस लाने में अनुकरणीय सहायता की.


असम की आराधना बरुआ यूक्रेन में डाक्टरी की पढाई कर रही हैं और सालभर में कम से कम एक बार अपने वतन आना उनके लिए सामान्य बात थी,लेकिन हाल ही में आराधना के लिए यूक्रेन से इन्स्ताबुल होते हुए गुवाहाटी का सफ़र किसी बुरे सपने से कम नहीं था. चूँकि इन्स्ताबुल में विमान को काफी देर तक रुकना था इसलिए आदत के मुताबिक आराधना विमान से बाहर निकलकर चहलकदमी करने लगी. पहले भी वे ऐसा करती रही हैं और यह सामान्य बात थी लेकिन इन्स्ताबुल में हाल ही हुए आतंकी हमले के बाद वहां के सुरक्षा हालात बदल गए थे. इस बार जैसे ही आराधना विमान से बाहर निकली सुरक्षा एजेंसियों ने बिना ट्रांजिट वीसा के बाहर घूमने के आरोप में उसे हिरासत में ले लिया. बिन बुलाए आई इस मुसीबत ने आराधना के होश उड़ा दिए. फिर धीरज से काम लेते हुए उसने किसी तरह असम की बराक घाटी में इन्स्पेक्टर आफ स्कूल के पद पर तैनात अपने पिता को फोन किया. मामले की गंभीरता को समझते हुए बदहवास पिता ने अपने ज़िले हैलाकांदी के डिप्टी कमिश्नर से मदद मांगी. डिप्टी कमिश्नर मलय बोरा ने भी मामले की नजाकत को समझते हुए और सूझ-बूझ का इस्तेमाल कर बिना समय गँवाए तत्काल ट्विटर पर विदेश मंत्रालय को सन्देश भेजकर सहायता की गुहार लगाई. सरकार ने भी बिना देर किए इन्स्ताबुल में भारतीय दूतावास के एक अधिकारी को आराधना को सुरक्षित भारत भेजने का दायित्व सौंप दिया.

सोशल मीडिया की इस सक्रियता का असर दिखा और आराधना के लिए न केवल सभी जरुरी दस्तावेजों का इंतजाम हो गया बल्कि उसे दूसरी फ्लाइट से भारत रवाना भी कर दिया गया. असम में अपने घर पहुंचकर आराधना ने चैन की सांस ली और सरकार की इस मानवीय पहल के प्रति आभार जताया क्योंकि इसके फलस्वरूप ही वह सुरक्षित अपने घर आ पायी.


असम के ही सिलचर के निवासी जायफुल रोंग्मेई की कहानी तो और भी दिल दहलाने वाली है. एक तेल कंपनी के जहाज पर नाविक की नौकरी कर रहे रोंग्मेई को बिना किसी गलती के नाइजीरिया में तेल चोरी के आरोप में बंदी बना लिया गया था जबकि असलियत में उसके जहाज को ईंधन की कमी के कारण मज़बूरी में नाइजीरिया की सीमा में लंगर डालना पड़ा था. किसी तरह रोंग्मेई की परेशानी की कहानी उसके घर तक पहुंची और फिर स्थानीय विधायक और सांसद के जरिए विदेश मंत्री को इस बात का पता चला तो उन्होंने बिना देर किए रोंग्मेई और उनके साथ नाइजीरिया की जेल में बंद उनके ग्यारह अन्य  भारतीय साथियों को छुड़ाने के प्रयास तेज कर दिए. सरकार की मध्यस्तता के फलस्वरूप रोंग्मेई  अपनी पत्नी और छह साल के बेटे के पास घर वापस आ गए.

जरा सोचिए, संपर्कों और साधनों के लिहाज से देश के सबसे कमजोर इलाके पूर्वोत्तर के भी दूर दराज के हिस्सों में रहने वाले इन लोगों के न तो कोई बड़े संपर्क थे और न ही इतना पैसा की उन देशों तक जाकर अपने परिजनों की कोई मदद कर पाते लेकिन सोशल मीडिया के विस्तार ने एक के बाद एक कड़ियाँ जोड़ दी और महीनों का सफ़र मिनटों में पूरा हो गया.


नए भारत के इस नए मीडिया के इन सकारात्मक पहलुओं से एक बात तो पूरी तरह साफ़ हो जाती है कि यदि सोशल मीडिया का समझदारी से इस्तेमाल किया जाए तो यह मीडिया आम जनता के कल्याण में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और उन इलाकों तक भी अपनी पहुँच बना सकता है जहाँ आज तक ट्रेन जैसी बुनियादी सेवा भी उपलब्ध नहीं है

बस,चाय पकौड़े की कमी थी..

ऐसा लगा जैसे प्रकृति अपने पूरे शबाव के साथ हमारे इस्तकबाल के लिए आ गई है। भोपाल से दिल्ली और फिर पंचकूला तक यात्रा सामान्य सी ही रही लेकिन जैसे ही हमने welcome to Himachal Pradesh का बोर्ड पार किया…बादलों के एक युवा उत्साही समूह ने तेज फुहारों के साथ हुलसकर हमारा स्वागत किया बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी नए हवाईजहाज की पहली यात्रा में पानी की फुहारों से वेलकम किया जाता है। 


इस दौरान मौसम इतना खुशगवार था कि चाय पकौड़े की कमी खलने लगी। अब प्रकृति भले ही अपने बंधु बांधवों के साथ पूरे मूड में थी लेकिन चलती सड़क पर बारिश के बीच हमारे लिए चाय और पकौड़े बनाने की हिम्मत कौन दिखाता।


बारिश ने विराम लिया तो धुंध को चीरकर पहाड़ों और घने पेड़ों ने हमें निहारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फिर धुंध भी छट गई और हमें हिमाचल के असली सौंदर्य से साक्षात्कार  का मौका मिलने लगा। बीच बीच में सड़क किनारे परिवार के साथ भुट्टे और गरमागरम मैगी खाते लोग अपने शहर भोपाल का अहसास करा रहे थे और यह संदेश भी दे रहे थे कि मौसम के अनुकूल खाने के मामले में हम सब एक हैं। 


सड़क के बीचों बीच निडर होकर इठलाते कनेर और बोगनवेलिया के फूल यहां के अनुकूल मौसम के कारण सड़क पर अतिक्रमण करने में भी पीछे नहीं थे । वहीं,सनवारा टोल प्लाजा पर वाहनों की लंबी कतार बता रही थी कि दिल्ली और पंजाब के साथ अन्य राज्यों के लोग वीकेंड शिमला में मनाने निकल पड़े हैं। कार की छत फाड़कर (सन रुफ) बाहर निकले बच्चों के स्पर्श के लिए बादल भी कुछ नीचे आ गए थे। 


अब हम भी बादलों के बीच से ऊपर पहाड़ की परिक्रमा करते हुए शिमला पहुंच गए । शिमला में मित्र प्रकाश पंत के सौजन्य से मिले शानदार गेस्ट हाउस के आलीशान कमरे ( हाल कहना बेहतर होगा) और कमरे नुमा बाथरूम से यात्रा के शानदार समापन का सुकून मिला। गरमागरम चाय और आलू प्याज के परांठे के साथ पहले दिन की कथा पूरी हुई।

परंपराएं तोड़कर बदलाव की अंगड़ाई लेता रेडियो

कल्पना कीजिए कि आप रेडियो पर फरमाइशी गीत जैसा कोई कार्यक्रम सुन रहे हैं और अपने फिल्म नदिया के पार का कौन दिशा में ले के चला रे गीत सुनाने का अनुरोध किया है। जैसे ही गीत शुरू होता है आपके मोबाइल या रेडियो सेट पर इस गाने के दृश्य भी दिखाई देने लगें। इसी तरह, आप रेडियो पर समाचार सुन रहे हैं और एकाएक न्यूज रीडर की जानी पहचानी आवाज़ के साथ उसका चेहरा भी दिखने लगे…आश्चर्य हो रहा है न!! तो इस अचंभे के लिए तैयार रहिए क्योंकि जल्दी ही नए जमाने का यह रेडियो आपके जीवन का हिस्सा बनने वाला है। इसे फिलहाल विजुअल रेडियो नाम दिया गया है। विजुअल रेडियो वास्तव में रेडियो प्रसारण का भविष्य है, जो ऑडियो और विजुअल अनुभव को एक साथ लाता है। 

विजुअल रेडियो में एक आधुनिक प्रसारण तकनीक है जो पारंपरिक रेडियो की ऑडियो सामग्री को दृश्य तत्वों (विजुअल्स) के साथ जोड़ती है। इसमें रेडियो प्रसारण के साथ-साथ चित्र, वीडियो, ग्राफिक्स, टेक्स्ट, और अन्य मल्टीमीडिया सामग्री को एकीकृत किया जाता है, जिसे श्रोता रेडियो सेट, मोबाइल ऐप, या इंटरनेट के माध्यम से सुनने के साथ साथ रेडियो प्रसारण को देख भी सकते हैं। इसको हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम मन की बात से भी समझ सकते हैं। मन की बात मूलतः रेडियो पर प्रसारित एक ऑडियो कार्यक्रम है लेकिन रेडियो प्लस यानि रेडियो सेट से इतर जब इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रस्तुत किया जाता है तो उसमें दृश्य भी जोड़ दिए जाते हैं ।

विजुअल रेडियो तकनीक मौजूदा डिजिटल युग में रेडियो को और अधिक इंटरैक्टिव और आकर्षक बना रही  है। विजुअल रेडियो में रेडियो जॉकी (RJ) या स्टूडियो गतिविधियों का लाइव प्रसारण किया जा सकता है। इंटरैक्टिव सामग्री के माध्यम से श्रोताओं के लिए पोल, क्विज, या कमेंट सेक्शन बनाए जा सकते हैं । रेडियो प्रसारण को सीधे फेसबुक, यूट्यूब, या अन्य प्लेटफॉर्म पर साझा किया जा सकता है । यह तकनीक रेडियो को पारंपरिक ऑडियो माध्यम से डिजिटल मल्टीमीडिया प्लेटफॉर्म में बदल रही है जिससे रेडियो युवा पीढ़ी और डिजिटल उपभोक्ताओं के लिए अधिक प्रासंगिक हो रहा है।

हालांकि, भारत में विजुअल रेडियो का विकास अभी प्रारंभिक चरण में है लेकिन आकाशवाणी ने डिजिटल युग में प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए विजुअल रेडियो की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। प्रसार भारती ने न्यूज़ ऑन एयर मोबाइल ऐप और वेबसाइट लॉन्च की है, जिसके माध्यम से आकाशवाणी के रेडियो कार्यक्रमों को लाइव स्ट्रीम किया जाता है। आकाशवाणी के कुछ प्रमुख केंद्र, जैसे दिल्ली और मुंबई, अपने चुनिंदा कार्यक्रमों को यूट्यूब और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लाइव स्ट्रीम करते हैं, जिसमें रेडियो जॉकी और स्टूडियो गतिविधियों के वीडियो शामिल होते हैं। आकाशवाणी की लोकप्रिय सेवा विविध भारती के कुछ कार्यक्रम, जैसे हवा महल या जयमाला, को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऑडियो के साथ-साथ विजुअल सामग्री जैसे गाने के वीडियो या पुरानी तस्वीरें के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। विविध भारती ने अपने यूट्यूब चैनल पर पुराने रेडियो कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग को विजुअल तत्वों जैसे गाने के दृश्य या कलाकारों की तस्वीरें के साथ अपलोड किया है, जो विजुअल रेडियो का एक प्रारंभिक रूप है।

आकाशवाणी के एफएम रेनबो चैनल के स्टेशन कई बार अपने लाइव शो को सोशल मीडिया पर वीडियो स्ट्रीम करते हैं, जिसमें रेडियो जॉकी की बातचीत, स्टूडियो का माहौल, और श्रोताओं के साथ इंटरैक्शन शामिल होता है।  जैसा कि हम जानते हैं कि प्रसार भारती ने हाल के वर्षों में डिजिटल परिवर्तन पर जोर दिया है।  इसके तहत आकाशवाणी के स्टेशनों को अपग्रेड किया जा रहा है। प्रसार भारती की वेबसाइट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी आकाशवाणी के कार्यक्रमों को विजुअल सामग्री के साथ प्रचारित करने की शुरुआत की जा चुकी है।

निजी क्षेत्र की बात करें तो रेडियो मिर्ची,रेड एफएम और रेडियो सिटी जैसे चैनल अपने लोकप्रिय शो को यूट्यूब, फेसबुक, और इंस्टाग्राम पर लाइव स्ट्रीम कर रहे हैं, जिसमें रेडियो जॉकी के वीडियो, मेहमानों के साक्षात्कार, और स्टूडियो की गतिविधियां शामिल होती हैं।  इसके अलावा,हंगामा जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म ने भी विजुअल रेडियो को बढ़ावा दिया है। उनके रेडियो चैनल गानों के साथ वीडियो, गाने के बोल, और कलाकारों की जानकारी प्रदान करते हैं।

विजुअल रेडियो की औपचारिक शुरुआत 2005 में मानी जाती है जब नोकिया ने इसे एक ट्रेडमार्क उत्पाद के रूप में पेश किया। नोकिया का विजुअल रेडियो कॉन्सेप्ट पारंपरिक FM रेडियो के साथ डेटा कनेक्शन के माध्यम से ग्राफिक्स, टेक्स्ट, और इंटरैक्टिव सामग्री को जोड़ता था। यह तकनीक सबसे पहले फिनलैंड में किस FM में लागू की गई थी। इसके बाद ब्रिटेन, सिंगापुर, भारत,फिलीपींस और स्पेन जैसे कई देशों में विभिन्न रेडियो स्टेशनों ने इसे अपनाया। हालांकि, विजुअल रेडियो का विचार इससे पहले भी विभिन्न रूपों में मौजूद था। उदाहरण के लिए, डिजिटल ऑडियो ब्रॉडकास्टिंग (DAB) के तहत 1990 के दशक के अंत में कुछ देशों में रेडियो प्रसारण के साथ स्लाइड शो या टेक्स्ट जैसी विजुअल सामग्री को शामिल करने के प्रयोग शुरू हो चुके थे। 

विजुअल रेडियो ने पिछले दो दशकों में महत्वपूर्ण प्रगति की है, जो डिजिटल तकनीक, इंटरनेट और सोशल मीडिया के विकास के साथ-साथ तेजी से बढ़ी है। 2010 के दशक में फेसबुक, यूट्यूब, और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म के उदय के साथ विजुअल रेडियो के विस्तार को पंख लग गए । 2010 के बाद, DIGISPOT जैसे सॉफ्टवेयर प्रदाताओं ने विजुअल रेडियो को स्वचालित करने के लिए समाधान पेश किए। इनमें स्टूडियो में कैमरे, ऑटोमेटेड विजुअल्स जैसे मौसम अपडेट, गाने की जानकारी और स्ट्रीमिंग फीड शामिल हैं। जबकि VisualRadioAssist जैसे प्लेटफॉर्म ने छोटे रेडियो स्टेशनों के लिए सस्ते और उपयोगी समाधान पेश किए, जिससे विजुअल रेडियो को वैश्विक स्तर पर सुलभ बनाया गया।

अब सवाल यह उठता है कि जब हमारे पास टीवी और मोबाइल के रूप में पहले ही विजुअल्स के बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं तो रेडियो में विजुअल जोड़ने की क्या जरूरत आन पड़ी। इसी सवाल के जवाब भी शामिल है। सीधी सी बात है कि आप रेडियो सुनने के लिए और टीवी देखने के लिए इस्तेमाल करते हैं और इन माध्यमों के ताजी गुण इन्हें एक दूसरे से अलग भी करते हैं। सामान्य समझ के हिसाब से विजुअल रेडियो और टीवी प्रसारण दोनों ही दृश्य और श्रव्य सामग्री का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन उनके उद्देश्य, प्रारूप, तकनीक, और दर्शक अनुभव में महत्वपूर्ण अंतर हैं। 


विजुअल रेडियो का मूल आधार रेडियो प्रसारण है, जिसमें ऑडियो सामग्री जैसे संगीत, टॉक शो, समाचार प्राथमिक हैं । दृश्य तत्व  जैसे वीडियो, ग्राफिक्स, टेक्स्ट केवल ऑडियो को पूरक और आकर्षक बनाने के लिए जोड़े जा रहे हैं। इसका उद्देश्य पारंपरिक रेडियो को डिजिटल युग में प्रासंगिक बनाना और श्रोताओं को इंटरैक्टिव अनुभव प्रदान करना है।

 वहीं, टीवी प्रसारण का फोकस दृश्य सामग्री पर होता है, जहां वीडियो, कहानी और विजुअल प्रभाव प्राथमिक होते हैं। ऑडियो मसलन संवाद और संगीत दृश्यों को समर्थन देते हैं । इसका उद्देश्य मनोरंजन, सूचना या शिक्षा के लिए पूरी तरह से दृश्य-केंद्रित अनुभव प्रदान करना है।

विजुअल रेडियो मुख्य रूप से इंटरनेट-आधारित प्लेटफॉर्म जैसे यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम या मोबाइल ऐप जैसे न्यूज़ ऑन एयर के माध्यम से प्रसारित होता है। जबकि टीवी प्रसारण मुख्य रूप से टेलीविजन चैनलों के माध्यम से प्रसारित होता है, जो सैटेलाइट, केबल, या डिजिटल टेरेस्ट्रियल टीवी (DTT) का उपयोग करते हैं। अब ओटीटी प्लेटफॉर्म जैसे नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम भी टीवी सामग्री का हिस्सा हैं। इसे देखने के लिए टीवी सेट, सेट-टॉप बॉक्स, या स्ट्रीमिंग डिवाइस की आवश्यकता होती है।

एक बड़ा अंतर उत्पादन लागत का भी है। विजुअल रेडियो में उत्पादन लागत अपेक्षाकृत कम होती है, क्योंकि यह न्यूनतम उपकरण जैसे एक कैमरा, माइक्रोफोन और स्ट्रीमिंग सॉफ्टवेयर के साथ शुरू हो सकता है। छोटे रेडियो स्टेशन भी इसे लागू कर सकते हैं जबकि टीवी प्रसारण में उत्पादन लागत बहुत अधिक होती है, क्योंकि इसमें मल्टी-कैमरा सेटअप, पेशेवर लाइटिंग, साउंड डिज़ाइन, और पोस्ट-प्रोडक्शन की आवश्यकता होती है।

कुल मिलाकर देखें तो यह प्रसारण माध्यमों का नवाचार है जो श्रोताओं और दर्शकों को जोड़े रखने के लिए लगातार किया जा रहा है। अंतिम फैसला तो सुनने वालों के हाथ में ही है कि उन्हें रेडियो सुनना है या देखना भी है। फिलहाल तो विजुअल रेडियो कुछ नया, कुछ हटकर और रेडियो की पारंपरिक सीमाएं तोड़कर सृजन और रचनात्मकता का नया अनुभव नजर आ रहा है।

शिमला में स्कैंडल पॉइंट!! क्या है असल माजरा

पर्यटन स्थल में स्कैंडल प्वाइंट…पर्यटन स्थलों या नामचीन शहरों में सन सेट प्वाइंट, माउंटेन व्यू, लेक व्यू और सुसाइड प्वाइंट जैसे नाम तो हम सभी ने आमतौर पर सुने हैं और ये हमेशा ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहते हैं लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के सबसे लोकप्रिय स्थान का नाम स्कैंडल प्वाइंट भी हो सकता है?

हिमाचल प्रदेश ही नहीं देश दुनिया के सबसे चर्चित पर्यटन स्थल शिमला में पर्यटकों के सर्वाधिक आकर्षण की केंद्र मॉल रोड (स्थानीय लोगों के लिए केवल मॉल) पर स्थित है यह स्कैंडल प्वाइंट। मौजूदा दौर में यह मॉल रोड के उन चुनिंदा स्थानों में से एक है जहां सबसे ज्यादा संख्या में लोग जुटते हैं और ठंड के दिनों में धूप तापते हैं। पर्यटकों की सुविधा के लिए प्रशासन ने यहां भरपूर मात्रा में बेंच भी लगाई हुई हैं ताकि वे आराम से बैठ सकें।

जैसा कि हम सभी जानते है कि शिमला, हिमाचल प्रदेश की राजधानी के साथ साथ भारत का एक प्रमुख हिल स्टेशन भी है। यह अपने औपनिवेशिक आकर्षण और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए खास तौर पर प्रसिद्ध है। शिमला के केंद्र में स्थित माल रोड को शहर की धड़कन माना जाता है। इसी माल रोड का पश्चिमी छोर स्कैंडल पॉइंट के नाम से जाना जाता है। यह रास्ता आगे जाकर रिज रोड से मिल जाता है। 

 हम यह भी बखूबी जानते हैं औपनिवेशिक काल में शिमला ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। माल रोड उस समय ब्रिटिश अधिकारियों, उनके परिवारों और भारतीय रियासतों के राजा-महाराजाओं के लिए एक सामाजिक केंद्र था। कहा तो यह भी जाता है कि उस समय आम भारतीयों को मॉल रोड पर जाने की अनुमति नहीं दी। इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है क्योंकि अंग्रेज हम भारतीयों के साथ दोयम दर्जे के व्यवहार के कुख्यात थे और महात्मा गांधी तक को इस दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा था। जाहिर सी बात है कि वे हम काले भारतीयों को उनके मनोरंजन के लिए सृजित मॉल रोड पर कैसे आने देते।

अब आते हैं स्कैंडल प्वाइंट के पीछे की कहानी पर। स्कैंडल पॉइंट का नामकरण 19वीं सदी के अंत में हुई एक कथित घटना से हुआ। लोककथाओं के अनुसार, 1892 में पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह और तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय की बेटी के बीच प्रेम प्रसंग की अफवाहें उड़ी थीं। कहानी यह है कि महाराजा, जो अपनी आकर्षक शख्सियत और रईसी के लिए जाने जाते थे, ने वायसराय की बेटी को शिमला में भगा लिया था। यह घटना उस समय के रूढ़िगत ब्रिटिश और भारतीय समाज में एक बड़े विवाद का कारण बनी। इस प्रकरण ने शिमला के सामाजिक दायरे में इतनी हलचल मचाई कि इस स्थान को "स्कैंडल पॉइंट" नाम दे दिया गया। हालांकि, इस कहानी की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर कुछ इतिहासकार संदेह जताते हैं, लेकिन यह किंवदंती स्कैंडल पॉइंट की पहचान का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

स्कैंडल पॉइंट का इतिहास औपनिवेशिक भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिशीलता को  भी दर्शाता है, जो आज भी शिमला के आगंतुकों को लुभाता है। वैसे भी, स्कैंडल पॉइंट अपनी केंद्रीय स्थिति के कारण लोगों के मिलने-जुलने और गपशप करने का एक प्रमुख स्थान है। यह स्थान न केवल यहां सामाजिक गतिविधियों का केंद्र है बल्कि शिमला की राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों का भी साक्षी है। यहां स्थित जनरल पोस्ट ऑफिस और अन्य औपनिवेशिक इमारतें इस क्षेत्र के प्रशासनिक,ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को और बढ़ा देती हैं ।

स्वतंत्रता के बाद, स्कैंडल प्वाइंट के पास महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की प्रतिमा स्थापित की गई। इसके फलस्वरूप यह स्थान ऐतिहासिक और देशभक्ति का प्रतीक भी है। पंजाब केसरी के नाम से मशहूर लाला लाजपत राय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से एक थे। यहां दर्ज विवरण के अनुसार उनकी यह प्रतिमा लाहौर से लाकर इस स्थान पर 15 अगस्त 1948 को स्थापित की गई थी ।

आज, स्कैंडल पॉइंट शिमला के सबसे लोकप्रिय पर्यटक स्थलों में से एक है। यह अपने खुलेपन और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। यहां से हिमालय की चोटियों का मनोरम दृश्य दिखता है, और माल रोड की चहल-पहल इसे जीवंत बनाती है। पर्यटक यहां बैठकर शिमला की ठंडी हवाओं और औपनिवेशिक वास्तुकला का आनंद लेते हैं। कुल मिलाकर स्कैंडल पॉइंट शिमला की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का एक प्रतीक है, जो अतीत को वर्तमान को जोड़ता है।


सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...