सोमवार, 28 सितंबर 2026

कहां ‘भंवरा’ बन गया है करोड़ों के कारोबार का सूत्रधार..!!


गीतकार आनंद बख्शी, संगीतकार एस डी बर्मन और गायक मोहम्मद रफी और आशा भोंसले की टीम जब फिल्म ‘आराधना’ के लिए ‘गुनगुना रहे हैं भंवरे, खिल रही है कली कली..’ या फिर फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के लिए ‘भंवरा बड़ा नादान है, कलियन की मुस्कान है..’ रचते समय गीतकार शकील बदायूंनी, गायिका आशा जी और संगीतकार हेमंत कुमार ने कभी सोचा भी नहीं होगा उनके कालजयी गीत का एक किरदार कभी हकीकत भी बन जाएगा और सैकड़ों परिवारों की माली हालत बेहतर बनाने के साथ साथ पूरे इलाके में सुगंध बिखेरने का जरिया बन जाएंगे।

यह कोई कपोल कल्पना नहीं बल्कि सच्चाई है कि इन गानों को वास्तविकता में तब्दील करते हुए भँवरे ने ऐसा जादू बिखेरा है कि कली कली खिल रही है और मुस्कराकर अपनी खुशबू से देश ही नहीं विदेशों तक में जलवा दिखा रही है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं सिक्किम में भरपूर मात्रा में होने वाली बड़ी इलायची की खेती और इसमें भंवरे की महत्वपूर्ण भूमिका की। 

यहां भंवरा या भौंरा बड़ी इलायची की कहानी का एक बेहद महत्वपूर्ण किरदार है। भारत में सिक्किम बड़ी या काली इलायची का गढ़ है और देश में इसका 80 फीसदी उत्पादन इसी राज्य में होता है एवं वह भी जैविक क्योंकि सिक्किम देश का पहला सौ फीसद ऑर्गेनिक स्टेट है। यहां करीब साढ़े पांच हज़ार मीट्रिक टन बड़ी इलायची होती है। उत्तरी सिक्किम से शुरू हुई इस काली बड़ी 'ठूलो इलायची' (स्थानीय भाषा में) की यात्रा अब 23 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गई है।

अब बात भंवरे की, तो सिक्किम कृषि विभाग के अनुसार बड़ी इलायची में पॉलीनेशन मुख्य रूप से भौंरों द्वारा ही होता है। इसे नेपाली भाषा में भोमोरा, भूटिया में बूम बूमटा और लेपचा भाषा में तुंगबूम कहा जाता है। बताया जाता है कि फूलों से रस लेने के लिए जब भौंरा इन तक पहुंचता है तो उसके शरीर पर नर मादा परागकण चिपक जाते हैं और दूसरे फूल तक पहुंच जाते हैं। इस तरह फूल से फल बनने की इस प्राकृतिक प्रक्रिया में भंवरे की भूमिका बहुत बड़ी है। यहां भंवरा किसान का एक ऐसा साथी है, जिसे न मजदूरी चाहिए और न ही छुट्टी।

मजे की बात यह है कि, भंवरे की तरह मधुमक्खी सहित कई कीट बड़ी इलायची के फूलों का रसपान करने के लिए आते हैं लेकिन इसके फूलों में अंतर और अपने छोटे आकार की वजह से वे पराग कण की सफल आवाजाही का हिस्सा नहीं बन पाते और इस वजह से उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाता। भंवरे का आकार नर मादा पराग कण को मिलाने के लिए बिल्कुल सटीक है।

सिक्किम की तर्ज पर एवं यहां से मिलती जुलती परिस्थितियों वाले कुछ अन्य राज्यों में भी बड़ी इलायची की खेती के प्रयास हुए हैं लेकिन सब कुछ अनुकूल होने के बाद भी उत्पादन मन मुताबिक नहीं हुआ। बाद में, कृषि अनुसंधान से पता चला कि वहां परागकण का वाहक भंवरा नहीं था या कम संख्या में था। वैसे, अब अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में भंवरों की मौजूदगी से इसकी खेती को सफलता मिल रही है जबकि कुछ राज्यों में भंवरों की कमी से खेती सफल नहीं हुई।

शायद यह जानकर आपको भी आश्चर्य होगा कि भारत में बड़ी इलायची मानव जाति द्वारा उपयोग किए जाने वाले सबसे पुराने मसालों में से एक मानी जाती है। इसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों में छठी शताब्दी में सुश्रुत के समय से ही होता आ रहा है। इसका उपयोग यूनानी औषधियों में भी  प्राचीन समय से किया जाता रहा है।

वैसे,बड़ी इलायची सिक्किम के लिए सिर्फ मसाला नहीं है। यह राज्य की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है और 16 हजार से अधिक किसान परिवारों की आजीविका से जुड़ी हुई है। सरकार ने भी इसे राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण आधार बताया है। इस फसल की खासियत यह है कि इसे खुले मैदान की तेज धूप की बजाय पेड़ों की छांव और पहाड़ी वातावरण पसंद है। इसलिए सिक्किम में बड़ी इलायची के खेत कई बार खेत कम और जंगल का हिस्सा ज्यादा लगते हैं। बड़ी इलायची यहां केवल कृषि की कहानी नहीं, जैव-विविधता और आजीविका के रिश्ते की कहानी भी है।

सिक्किम की पहाड़ियों में पैदा हुई यह सुगंध देश की सीमाओं पर नहीं रुकती बल्कि अन्य देशों को भी अपनी सुगंध से सराबोर कर देती है। भारत बड़ी इलायची का निर्यात संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, सऊदी अरब, जापान, ब्रिटेन सहित कई देशों को करता है। मसाला बोर्ड के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 229 करोड़  रुपए से अधिक की बड़ी इलायची दुनिया को बेची। तो देखिए, कैसे एक भंवरा करोड़ों के कारोबार का जरिया बन गया वह भी चुपके चुपके।



मंगलवार, 22 सितंबर 2026

एक राज्य…जहां हर बच्चे के पास है अपना जंगल !!


क्या आपको पता है कि हमारे देश में एक प्रदेश ऐसा भी है जहां का हर बच्चा मोगली है..वही, जंगल बुक वाला मोगली। अब मोगली तो रुडयार्ड किपलिंग की कल्पना मानी जाती है लेकिन मैं जिस राज्य की बात कर रहा हूं वहां हर बच्चा अपना जंगल लेकर पैदा होता है और जैसे जैसे वह बड़ा होता है,उसका जंगल भी उसके साथ बढ़ता जाता है..खास बात है कि यह जंगल भी कोई छोटा मोटा जंगल बल्कि पूरे 108 पेड़ वाला होता है। हम कह सकते हैं कि यहां हर बच्चे का मोगली की तरह अपना जंगल है।


खैर, पहेलियाँ न बुझाते हुए सीधे इस अभिनव पहल पर आते हैं। दरअसल हमारे देश में अष्टलक्ष्मी के नाम से विख्यात पूर्वोत्तर के एक राज्य सिक्किम में यह अद्भुत पहल हुई है। वैसे, सामान्य बोलचाल में उत्तर पूर्व के आठ राज्यों में से सात को सेवन सिस्टर्स और सिक्किम को वन ब्रदर कहा जाता है..मतलब सात बहनों का इकलौता भाई। तो इस भाई यानि सिक्किम में बच्चे के जन्म को प्रकृति से जोड़कर यह अनूठी परंपरा शुरू की गई है। इसे स्थानीय भाषा में ‘मेरो रुख, मेरो संतति’ यानी मेरा पेड़, मेरी संतान कहा जाता है।


आमतौर पर,किसी घर में बच्चे के जन्म की खबर आती है तो माना जाता है कि खुशियों ने उनके दरवाजे पर दस्तक दी है। इन खुशियों में शामिल होने के लिए रिश्तेदार आते हैं, मिठाइयां बंटती हैं, बच्चे के लिए कपड़े और खिलौनों का ढेर लग जाता है लेकिन सिक्किम में बच्चे के जन्म के साथ यह अनूठी परंपरा भी जुड़ जाती है और इससे हासिल खुशी तात्कालिक न होकर सदियों तक स्मृतियों का हिस्सा बन जाती है। दरअसल, यहां हर नवजात के नाम पर 108 पेड़ लगाए जाते हैं।


यह पहल वास्तव में पौधरोपण को सरकारी अभियान की सीमा से आगे ले जाकर परिवार में पीढ़ियों की स्मृति से जोड़ देती है। सामान्यतः बच्चे के जन्म की तारीख जन्म प्रमाणपत्र में दर्ज होती है, फोटो एलबम में सुरक्षित रहती है और परिवार की यादों में बनी रहती है लेकिन सिक्किम में इस तारीख के साथ पेड़ों को भी जोड़ दिया गया है।


इस योजना का एक और दिलचस्प पहलू इसका आर्थिक पक्ष भी है। जिसके तहत हर पात्र नवजात के नाम पर सरकार द्वारा 10,800 रुपये की राशि जमा की जाती है। इस तरह एक ओर बच्चे के नाम पर प्रकृति में निवेश होता है और दूसरी ओर उसके भविष्य के लिए आर्थिक बचत की शुरुआत भी हो जाती है। जब बच्चा 18 साल का होता है तो उसके साथ 108 पेड़ भी बड़े हो जाते हैं और साथ में जमा पैसे बढ़कर करीब 40 हजार रुपए तक पहुंच जाते हैं।


इस योजना की उल्लेखनीय बात यह भी है कि 108 पेड़ लगाने के लिए यहां वन एवं पर्यावरण विभाग पौधे भी उपलब्ध कराता है और जमीन भी, तकनीकी सहायता भी देता है और मौसम के अनुरूप पौधे लगाने की सलाह भी । अब आपके दिमाग में यह सवाल आ सकता है कि ऐसे तो देश भर में लाखों पौधे लगाए जाते हैं लेकिन जीवित कितने बचते हैं? इसलिए सिक्किम में पौधों की निगरानी और रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था भी की गई है। यहां 108 पौधों का रिकॉर्ड रखने के लिए संतति दस्तावेज बनता है। इसमें लगाए गए 108 पौधों का विवरण दर्ज किया जाता है। वैसे, बच्चे का परिवार इन पेड़ों की देखभाल अपने बच्चे की ही तरह करता है।


इस अनूठी परंपरा में अब तक करीब 8 हजार बच्चे जुड़ चुके हैं और लाखों पेड़ लग चुके हैं इसलिए सिक्किम के पहाड़ भरपूर हरियाली से ढके हुए हैं। यहां यह माना जाता है कि एक बच्चे का भविष्य केवल उसके परिवार से नहीं, उस प्रकृति से भी जुड़ा है जिसमें वह बड़ा होगा।

यही वजह है कि सिक्किम जैसे पहाड़ी राज्य में जंगल केवल हरियाली नहीं हैं। वे जलस्रोतों की सुरक्षा करते हैं, मिट्टी को थामते हैं, जैव विविधता को आश्रय देते हैं, पहाड़ों के पारिस्थितिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, भरपूर ऑक्सीजन देते हैं, शुद्ध हवा, स्वच्छ वातावरण और हरा भरा परिवेश बनाते हैं। ऐसे में बच्चे के जन्म को पेड़ लगाने से जोड़ना पर्यावरण संरक्षण को परिवार की रोजमर्रा की संवेदना से जोड़ने का एक अभिनव तरीका है।

खासतौर पर, आज जब दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और घटते वन क्षेत्र की चिंता हो रही है। इसमें सुधार के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन हो रहे हैं, लक्ष्य तय किए जा रहे हैं और कार्बन उत्सर्जन कम करने की बातें हो रही हैं। ऐसे समय में सिक्किम की यह अनूठी पहल उम्मीद जगाती है कि यदि पर्यावरण को जीवन से जोड़ दिया जाए तो प्रकृति हमारे साथ साथ गुनगुनाएगी।




शनिवार, 19 सितंबर 2026

गंगटोक की सड़कों पर दौड़ता एक अनूठा संदेश..!!


यदि आप हाल ही के दिनों में सिक्किम की राजधानी गंगटोक गए हों तो यहां की सड़कों पर चलते हुए एक बात ने सहज ही आपका ध्यान आकर्षित किया होगा। पिछले हफ्ते सिक्किम की यात्रा के दौरान मुझे तो इस संदेश ने बार बार अपनी ओर खींचा। यहां तकरीबन सभी टैक्सियों और अन्य सार्वजनिक परिवहन वाहनों के पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा रहता है-“BE KIND TO ANIMALS”। 

पहली नजर में मुझे भी यह किसी स्थानीय पशु-प्रेमी संस्था का जागरूकता अभियान लगा  लेकिन करीब आठ दिन के इस प्रवास में यह वाक्य दिल-ओ-दिमाग पर इतना छा गया कि हमने इसके पीछे की कहानी पता करने का पक्का मन बना लिया। इस बारे में साथ चलने वाले ड्राइवरों, होटल स्टाफ और मेल मुलाकात के दौरान अधिकारियों से जानकारी हासिल की तो पता चला कि यह किसी एनजीओ का अभियान नहीं बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय पहल है।

दरअसल, देश भर में सड़कों को पशु पक्षियों के लिए सुरक्षित बनाने के लिए केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 25 फरवरी 2025 को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के परिवहन विभागों को सार्वजनिक परिवहन वाहनों पर पशु कल्याण से जुड़ा यह संदेश प्रदर्शित करने का निर्देश दिया था। मंत्रालय ने इस संदेश को हिंदी या संबंधित राज्य की भाषा में 1 अप्रैल 2025 से लागू करने के लिए कहा गया था।

इसके पीछे केवल पशुओं के प्रति संवेदना जगाने की भावना ही नहीं, बल्कि सड़कों पर पशुओं की सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। 

सिक्किम ने इस राष्ट्रीय पहल को अपने यहां लागू करते हुए 10 अक्टूबर 2025 को परिवहन विभाग के मोटर व्हीकल डिवीजन के माध्यम से अधिसूचना जारी की। इसके तहत राज्य में पंजीकृत सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों पर “Be Kind to Animals” संदेश प्रदर्शित करना अनिवार्य किया गया। सबसे खास बात यह है कि इस संदेश के लिए शब्दों का आकार प्रकार तक तय कर दिया ताकि यह संदेश वाहन के आगे और पीछे, स्पष्ट और आसानी से दिखाई देने वाले अक्षरों में नजर आए। अक्षरों की न्यूनतम ऊंचाई 150 मिलीमीटर यानी 15 सेंटीमीटर रखी गई है। 

सिक्किम के पहाड़ी रास्तों और घने वन क्षेत्रों के संदर्भ में इस संदेश का महत्व भी है। वैसे, राज्य सरकार के एक सड़क सुरक्षा कार्यक्रम में भी रोड किल (roadkill) यानी सड़क दुर्घटनाओं में वन्यजीवों की मृत्यु को एक महत्वपूर्ण चिंता के रूप में रेखांकित किया गया और “Be Kind to Animals” जागरूकता पहल को इसके समाधान के उपायों में शामिल किया गया।

गंगटोक में फिलहाल ट्रेन सुविधा तो हर नहीं इसलिए यहां आने जाने वाले हजारों लोगों के लिए यहां की छोटी बड़ी टैक्सियां ही एकमात्र सहारा हैं। यह संदेश वाहनों पर लिखने का फायदा यह है कि अब वाहन सिर्फ यात्री को एक जगह से दूसरी जगह नहीं ले जाते, बल्कि दिनभर पूरे रास्ते में एक विचार भी पहुंचाते हैं कि सड़क केवल इंसानों के लिए प्रकृति के अन्य जीवंत सहचरों के लिए भी है।

हम सभी जानते हैं कि पहाड़ों में सड़कें जंगलों, गांवों और वन्य जीवों के बीच से होकर गुजरती हैं। आमतौर पर मोड़ इसतरह के होते हैं कि सड़क पर जीव जंतु तो दूर सामने से आने वाले वाहन भी नजर नहीं आ पाते। ऐसे में कई बार वाहन चालक के सामने अचानक कोई कुत्ता, गाय, बंदर या वन्यजीव आ जाता है। ऐसे में एक पल की सावधानी किसी जीव की जान बचा सकती है। यह संदेश इस भावना को मजबूत बनाने का दायित्व निभा रहा है।

यही वजह है कि गंगटोक की सड़कों पर यह संदेश महज एक स्टिकर नहीं लगता बल्कि चलती हुई टैक्सियों के पीछे लिखा यह वाक्य लगातार याद दिलाता है कि विकास और यातायात की रफ्तार के बीच संवेदना के लिए भी जगह बची रहनी चाहिए। यहां “Be Kind to Animals” केवल तीन शब्दों का संदेश भर नहीं है,पहाड़ों पर इंसान और प्रकृति के रिश्तों को और मजबूत बनाने की पहल भी है।


उम्र का तकाजा है साहब... अब सेहत संभालना भी एडवेंचर स्पोर्ट्स हो गया है !!

अब मैं उस उम्र में पहुंच गया हूं, जहां अपनी सेहत का ख्याल रखना किसी एडवेंचर स्पोर्ट्स से कम नहीं है। मीठा खाता हूं तो शुगर बढ़ जाती है। नमक ...