सोमवार, 2 नवंबर 2026

अष्टलक्ष्मी: आठ राज्य, आठ रंग


अष्टलक्ष्मी यानि देश के पूर्वी भाग में स्थित आठ राज्य। इन्हें सेवन सिस्टर्स और वन ब्रदर (सात बहनों और एक भाई) के नाम से भी जाना जाता है। यहां सिक्किम को भाई और शेष सात राज्यों अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा को सात बहनों के रूप में समझा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में इन राज्यों को देश का ईशान कोण करार दिया था। उनका कहना था कि वास्तु शास्त्र में जैसे ईशान कोण को सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। इसी प्रकार पूर्वोत्तर के राज्य भारत का ईशान कोण हैं और इनके विकास एवं समृद्धि के बिना देश के कल्याण की कल्पना नहीं की जा सकती।

भारत का यह ईशान कोण कला,संस्कृति,उत्सव,प्रकृति और भाषा के लिहाज से भी अलग पहचान रखता है। असम में अपने करीब पांच साल के कार्यकाल और उस दौरान इन राज्यों की सतत् यात्रा से यह अनुभव तो हो ही जाता है कि पूर्वोत्तर को यदि केवल पहाड़ों, बादलों, चाय के बागानों, बांस के जंगलों और नदियों की धरती कहा जाए, तो यह उसके वास्तविक परिचय का एक छोटा-सा हिस्सा होगा। इस क्षेत्र की असली पहचान उन उत्सवों में भी छिपी है, जिनमें कहीं धान की पहली फसल के साथ खुशियाँ घर लौटती हैं, कहीं युवा पारंपरिक परिधानों में नृत्य करते हुए अपनी सांस्कृतिक पहचान का उत्सव मनाते हैं, कहीं सूर्य की आराधना होती है, तो कहीं पूर्वजों को याद कर परिवार और समुदाय के रिश्तों को नए सिरे से मजबूत किया जाता है।



इन आठ राज्यों की सांस्कृतिक दुनिया इतनी विविध है कि यहाँ एक ही पर्व के भीतर प्रकृति, कृषि, लोकविश्वास, संगीत, भोजन और सामाजिक जीवन के अनेक रंग दिखाई देते हैं। इनमें से कई उत्सव सदियों पुरानी जनजातीय परंपराओं से विकसित हुए हैं। उनकी शुरुआत के संबंध में लिखित ऐतिहासिक प्रमाण हर जगह उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए उनकी उत्पत्ति को किसी एक वर्ष या घटना से जोड़ने के बजाय उन लोकमान्यताओं, कृषि-चक्रों और सामुदायिक परंपराओं के संदर्भ में समझना अधिक उचित है, जिनसे वे आज तक जीवित हैं।


आइए, इन आठ राज्यों के प्रमुख पर्वों के बहाने पूर्वोत्तर भारत की उस दुनिया में प्रवेश करें, जहाँ उत्सव कैलेंडर की तारीख भर नहीं, बल्कि जीवन को देखने का एक अलग नजरिया हैं।


अरुणाचल प्रदेश : जनजातीय संस्कृति की झलक


अरुणाचल प्रदेश की पहचान उसकी भौगोलिक विविधता जितनी व्यापक है, उतनी ही विविध यहाँ की जनजातीय संस्कृतियाँ भी हैं। अलग-अलग समुदायों के अपने देवी-देवता, लोकविश्वास, कृषि परंपराएँ और उत्सव हैं। यहाँ कोई एक पर्व पूरे राज्य की सांस्कृतिक तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर सकता। फिर भी न्योकुम, सोलुंग और लोसर जैसे उत्सव इस विविधता को समझने की अच्छी खिड़कियाँ हैं।


न्योकुम पर्व मुख्यतः यहां के न्यीशी समुदाय का प्रमुख पर्व है। इसका संबंध प्रकृति की शक्तियों, कृषि, उर्वरता और समुदाय की खुशहाली से है। फरवरी के आसपास मनाए जाने वाले इस पर्व में पारंपरिक अनुष्ठान किए जाते हैं। सामुदायिक स्थल पर पूजा-अर्चना होती है, लोग पारंपरिक वेशभूषा में जुटते हैं और लोकगीतों तथा नृत्यों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करते हैं। सामूहिक भागीदारी इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। न्योकुम का संदेश यह है कि समृद्धि केवल किसी एक व्यक्ति या परिवार की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के सुख और प्रकृति के संतुलन से जुड़ी है।



सोलुंग पर्व सामान्यतः सितंबर में आदि समुदाय द्वारा मनाया जाता है। इसका संबंध कृषि-जीवन, अच्छी फसल, पशुधन की सुरक्षा और सामुदायिक कल्याण से है। खेती के मौसम में यह पर्व लोगों को अपनी आजीविका और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर देता है। पारंपरिक रीति-रिवाजों, भोज, गीतों और नृत्यों के बीच परिवार तथा समुदाय एक साथ आते हैं। सोलुंग यह भी बताता है कि कृषि केवल अन्न पैदा करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक रिश्तों और सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने का माध्यम है।


वहीं, लोसर पर्व अरुणाचल के मोनपा समुदाय सहित कई हिमालयी बौद्ध समुदायों में नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। इसकी तिथि तिब्बती चंद्र-पंचांग के अनुसार बदलती है और सामान्यतः फरवरी या मार्च में पड़ती है। घरों की सफाई, धार्मिक अनुष्ठान, मठों में प्रार्थना, पारंपरिक भोजन और पारिवारिक मेल-मिलाप इसके प्रमुख हिस्से हैं।


असम : जीवन के अलग-अलग पड़ावों के उत्सव


असम में बिहू सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन के तीन अलग-अलग पड़ावों का उत्सव है। खेती-किसानी से गहरे जुड़े इस राज्य में बिहू की परंपरा असमिया समाज के कृषि-चक्र, ऋतुओं और नववर्ष की अवधारणा से विकसित हुई। इसके प्राचीन स्वरूप में स्थानीय समुदायों की प्रकृति और कृषि से जुड़ी मान्यताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।


रोंगाली बिहू पर्व अप्रैल के मध्य में मनाया जाता है।  रोंगाली या बोहाग बिहू असमिया नववर्ष और वसंत के आगमन का प्रतीक है। खेतों में नई कृषि गतिविधियों की शुरुआत, पेड़ों पर नई पत्तियाँ और प्रकृति की ताजगी इस उत्सव को विशेष बनाती हैं। युवक-युवतियाँ पारंपरिक मेखला-चादर और धोती-गमोसा पहनकर बिहू नृत्य करते हैं। ढोल, पेपा और गोगोना जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन वातावरण में उत्साह भर देती है। घरों में पीठा, लारू और अन्य पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। 


वहीं,भोगाली बिहू जनवरी में मनाया जाता है और यह फसल कटने के बाद की खुशहाली से जुड़ा है। लोग सामुदायिक भोज आयोजित करते हैं, पारंपरिक पकवान बनाते हैं और मेजी नामक अलाव जलाते हैं। कई स्थानों पर अस्थायी सामुदायिक संरचनाएँ बनाकर उत्सव मनाया जाता है। इसी तरह, अक्टूबर के आसपास मनाया जाने वाला काती या कोंगाली बिहू कृषि-वर्ष के उस समय आता है, जब खेतों में फसल बढ़ रही होती है, लेकिन घरों में नई उपज अभी नहीं पहुँची होती। तुलसी के पौधे, धान के खेतों और अन्य स्थानों पर दीप जलाने की परंपरा फसल की सुरक्षा और अच्छी उपज की कामना से जुड़ी है।


तीनों बिहू एक गहरा संदेश देते हैं कि जीवन में उल्लास के साथ प्रतीक्षा और कठिनाई के समय भी उम्मीद बनाए रखना जरूरी है। असम की संस्कृति इस तरह उत्सव को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से जोड़ती है।


मणिपुर : वैष्णव परंपरा का गढ़


मणिपुर के पर्वों में लोकविश्वास, वैष्णव परंपरा, कृषि और सामुदायिक जीवन का सुंदर मेल मिलता है। यहाँ का सांस्कृतिक संसार मैतेई परंपराओं के साथ-साथ राज्य के विभिन्न जनजातीय समुदायों की विशिष्ट पहचान से भी समृद्ध है। यहां का प्रमुख पर्व लाई हराओबा सृष्टि की कथा का जीवंत मंचन है। लाई हराओबा का अर्थ सामान्यतः देवताओं को प्रसन्न करना या आनंदित करना समझा जाता है। यह मैतेई समुदाय की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा उत्सव है। इसकी जड़ें उन स्थानीय मान्यताओं में हैं, जिनमें देवताओं, प्रकृति और सृष्टि के निर्माण को परस्पर संबंधित माना जाता है।


इसके आयोजन की तिथियाँ और अवधि स्थान के अनुसार बदल सकती हैं। अनुष्ठानों में मैबी कहलाने वाली पारंपरिक महिला धार्मिक साधिकाओं की विशेष भूमिका होती है। उनके नृत्य और मुद्राओं के माध्यम से सृष्टि, मानव जीवन और प्रकृति से संबंधित कथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। लाई हराओबा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकनृत्य, संगीत, मौखिक इतिहास और सामुदायिक स्मृति को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम भी है।


वहीं याओशांग पर्व होली के रंगों में मणिपुरी पहचान कायम रखता है। फरवरी या मार्च में मनाया जाने वाला याओशांग मणिपुर के प्रमुख उत्सवों में से एक है। इसकी तुलना उत्तर भारत की होली से की जाती है, लेकिन इसकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। वैष्णव परंपरा से जुड़े इस पर्व में धार्मिक अनुष्ठान, रंगों का उल्लास, खेलकूद और सामुदायिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं। रात में आयोजित होने वाला थबल चोंगबा विशेष आकर्षण है। इसमें युवक-युवतियाँ चंद्रमा की रोशनी में पारंपरिक गीतों के साथ गोलाकार नृत्य करते हैं। यह दृश्य मणिपुर की सांस्कृतिक आत्मीयता और युवाओं की जीवंत भागीदारी का प्रतीक है।


जबकि संगाई महोत्सव संस्कृति और पर्यटन का आधुनिक संगम है। संगाई महोत्सव अपेक्षाकृत आधुनिक आयोजन है, जिसे मणिपुर की सांस्कृतिक विविधता, हस्तशिल्प, व्यंजन, संगीत और पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विकसित किया गया। इसका नाम राज्य के प्रसिद्ध संगाई हिरण पर रखा गया है, जो मणिपुर की प्राकृतिक विरासत का प्रतीक है।


मेघालय : बादलों का घर


मेघालय में खासी, गारो और जयंतिया आदिवासी समुदायों की परंपराएँ पहाड़ों, वर्षा, कृषि और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ी हैं। इनके प्रमुख उत्सवों में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामूहिक समृद्धि की कामना स्पष्ट दिखाई देती है।


यहां के वांगला पर्व को सौ ढोलों वाला फसल उत्सव भी कहा जाता है। दरअसल, वांगला पर्व गारो समुदाय का प्रमुख फसल उत्सव है। इसे प्रायः अक्टूबर या नवंबर में फसल कटाई के बाद मनाया जाता है। इसकी पारंपरिक धार्मिक पृष्ठभूमि सूर्य से संबंधित देवता सलजोंग के प्रति आभार व्यक्त करने से जुड़ी है। उत्सव में पारंपरिक ढोल बजाए जाते हैं और स्त्री-पुरुष समूह में नृत्य करते हैं। रंगीन परिधान, पंखों से सजे सिर के आभूषण और ढोल की लय इस आयोजन को विशिष्ट बनाते हैं। 


वहीं, नोंगक्रेम पर्व समृद्धि और सामाजिक एकता की कामना के लिए मनाया जाता है। खासी समुदाय का नोंगक्रेम नृत्य उत्सव विशेष रूप से खासी हिल्स क्षेत्र में मनाया जाता है। इसका धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र सिएम या पारंपरिक खासी नेतृत्व से जुड़ी व्यवस्थाओं के साथ-साथ समुदाय की प्राचीन मान्यताएँ हैं। इसमें धार्मिक अनुष्ठान, पारंपरिक नृत्य और सामुदायिक सहभागिता शामिल होती है। उत्सव का संबंध अच्छी फसल, शांति और समृद्धि की कामना से है। पारंपरिक वेशभूषा में महिलाओं के सुंदर आभूषण और पुरुषों की विशिष्ट पोशाक खासी संस्कृति की अलग पहचान प्रस्तुत करते हैं।


जबकि, जयंतिया समुदाय का बेहदीनख्लाम पर्व मुख्यतः जुलाई में जोवाई क्षेत्र में मनाया जाता है। इसके नाम और अनुष्ठानों का संबंध बीमारी तथा विपत्तियों को दूर करने की सामुदायिक कामना से जोड़ा जाता है। इस अवसर पर लकड़ी के विशाल, रंगीन ढाँचों को सजाया जाता है और धार्मिक जुलूस निकाले जाते हैं। पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच लोग सामूहिक कल्याण की प्रार्थना करते हैं।



मिजोरम : खुशियों के उत्सव


मिजोरम की पहाड़ियों में जब सर्दियों की विदाई के बाद वसंत दस्तक देता है, तब चपचार कुट पर्व के साथ खुशियों का नया मौसम शुरू होता है। यह मिजो समुदाय का सबसे प्रसिद्ध पारंपरिक पर्व है। इसकी जड़ें झूम खेती की पुरानी पद्धति में हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि झूम खेती में जंगल के एक हिस्से की वनस्पति काटकर भूमि को खेती के लिए तैयार किया जाता है। कटाई के बाद लकड़ियों और वनस्पति के सूखने की प्रतीक्षा के दौरान मिलने वाला अवकाश सामुदायिक उत्सव का अवसर बन गया। इसी कृषि-चक्र से चपचार कुट की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।


मार्च में मनाए जाने वाले इस पर्व में पारंपरिक परिधान पहनकर लोग नृत्य, संगीत और सामुदायिक भोज में हिस्सा लेते हैं। इसका सबसे आकर्षक पक्ष चेरॉ नृत्य है, जिसे बाँस नृत्य भी कहा जाता है। इसमें नर्तक-नर्तकियाँ जमीन पर लयबद्ध ढंग से खोले और बंद किए जाते बाँसों के बीच अत्यंत फुर्ती से कदम रखते हैं। बाँसों की ताल और कलाकारों के कदमों का मेल देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

चपचार कुट का महत्व केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। यह मिजो समाज के श्रम, सामूहिकता और प्रकृति के साथ तालमेल का उत्सव है। 


नागालैंड : उत्सवों की धरती


नागालैंड में अनेक नगा जनजातियों की अपनी-अपनी परंपराएँ, भाषाएँ, नृत्य और पर्व हैं। इसलिए राज्य की संस्कृति को किसी एक उत्सव में समेटना संभव नहीं। फिर भी हॉर्नबिल महोत्सव इन विविधताओं को एक साझा मंच प्रदान करता है। अब तो इस उत्सव में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी शामिल होते हैं।


वास्तव में हॉर्नबिल महोत्सव परंपराओं को जोड़ने की आधुनिक पहल है। इसकी शुरुआत वर्ष 2000 में नागालैंड सरकार ने राज्य की सांस्कृतिक विरासत को एक मंच पर प्रस्तुत करने और पर्यटन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की थी। इसका नाम हॉर्नबिल पक्षी पर रखा गया है, जिसका नगा लोकजीवन और सांस्कृतिक प्रतीकों में विशेष स्थान है।


दिसंबर के पहले दस दिनों में कोहिमा के निकट किसामा स्थित नगा हेरिटेज विलेज में आयोजित होने वाले इस महोत्सव में विभिन्न जनजातियाँ अपने पारंपरिक नृत्य, गीत, परिधान, हस्तशिल्प और व्यंजन प्रस्तुत करती हैं। पारंपरिक मोरुंग यानी सामुदायिक युवा-भवनों की प्रतिकृतियाँ भी आकर्षण का केंद्र होती हैं। लकड़ी के विशाल नगाड़ों की गूँज, पारंपरिक युद्ध-नृत्य, लोकगीत और स्थानीय खेल नागालैंड के इतिहास तथा सामुदायिक जीवन की झलक दिखाते हैं। आज इस आयोजन में आधुनिक संगीत, कला और पर्यटन से जुड़े कार्यक्रम भी शामिल हैं।


हॉर्नबिल की विशेषता यह है कि यह किसी एक जनजाति का उत्सव नहीं, बल्कि अनेक सांस्कृतिक पहचानों के बीच संवाद का अवसर है। यह एक आधुनिक मंच है, जिसकी जड़ें पुरानी परंपराओं में हैं।


हॉर्नबिल के अलावा यहां फसल के बाद खुशियों का उत्सव मनाने के लिए टोकू एमोंग पर्व भी लोकप्रिय पर्व है। लॉथा समुदाय का टोकू एमोंग सामान्यतः नवंबर में मनाया जाता है। खेतों का काम पूरा होने के बाद परिवार और समुदाय एक साथ आते हैं। भोज, गीत, नृत्य और आपसी मेल-मिलाप इसके प्रमुख अंग हैं।


सिक्किम : आध्यात्मिक साधना का केंद्र


सिक्किम की संस्कृति में हिमालय, बौद्ध दर्शन, लेपचा विरासत और नेपाली लोकपरंपराओं का अनूठा संगम है। यहाँ के उत्सवों में प्रकृति के प्रति श्रद्धा और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व है। सिक्किम के सबसे प्रमुख पर्व लोसर में पुराने वर्ष को विदा, नई उम्मीदों का स्वागत किया जाता है। सिक्किम के तिब्बती बौद्ध समुदायों में इसकी परंपरा तिब्बती चंद्र-पंचांग और बौद्ध सांस्कृतिक जीवन से जुड़ी है। इसे सामान्यतः फरवरी या मार्च में मनाया जाता है ।


लोसर की तैयारी घरों की सफाई और सजावट से शुरू होती है। परिवार पारंपरिक भोजन तैयार करते हैं, एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं और मठों में विशेष प्रार्थनाओं तथा धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हैं। कई स्थानों पर पारंपरिक मुखौटा नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ भी आयोजित होती हैं। लोसर का संदेश केवल नए वर्ष का स्वागत करना नहीं है। यह बीते समय की कटुता छोड़कर मन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है।


पांग ल्हाबसोल : कंचनजंघा के प्रति श्रद्धा


सिक्किम का एक अन्य उत्सव पांग ल्हाबसोल पर्व यहाँ की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ा पर्व है। इसमें कंचनजंघा पर्वत को राज्य का रक्षक मानकर श्रद्धा व्यक्त की जाती है। यह कुछ कुछ गोवर्धन पूजा जैसा उत्सव है। इस अवसर पर पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान, प्रार्थनाएँ और मुखौटा नृत्य आयोजित किए जाते हैं। विशेष रूप से 'सिंहिक छाम' नामक नृत्य प्रसिद्ध है, जिसमें योद्धाओं जैसी मुद्राओं के माध्यम से साहस और सामुदायिक एकता का भाव प्रदर्शित होता है।


त्रिपुरा : बंगाली संस्कृति की झलक 


त्रिपुरा की सांस्कृतिक पहचान में जनजातीय परंपराओं, बंगाली सांस्कृतिक प्रभाव और प्राचीन राजपरंपराओं का मेल दिखाई देता है। यहाँ के प्रमुख उत्सवों में खारची पूजा और गरिया पूजा विशेष स्थान रखते हैं। खारची पूजा में चौदह देवताओं की आराधना की जाती है। राजधानी अगरतला के निकट स्थित चतुर्दश देवता मंदिर में आयोजित खारची पूजा राज्य के प्रमुख धार्मिक उत्सवों में से एक है। यह सामान्यतः जुलाई में मनाया जाता है। इसकी परंपरा त्रिपुरा की पुरानी राजकीय और धार्मिक संस्कृति से जुड़ी है।


खारची पूजा में चौदह देवताओं की आराधना की जाती है। धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना और जुलूस इस उत्सव के महत्वपूर्ण अंग हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं। मंदिर परिसर के आसपास मेले जैसा वातावरण बन जाता है, जहाँ स्थानीय वस्तुओं, भोजन और हस्तशिल्प की भी झलक मिलती है। इस उत्सव की एक खास बात यह है कि यह विभिन्न समुदायों के लोगों को एक साथ आने का अवसर देता है। त्रिपुरा की सांस्कृतिक विविधता के बीच साझा धार्मिक और सामाजिक अनुभवों की भूमिका यहाँ स्पष्ट दिखाई देती है।


वहीं, गरिया पूजा पर्व खेती, पशुधन और समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाता है। गरिया पूजा सामान्यतः अप्रैल में की जाती है और इसका संबंध कृषि-वर्ष की शुरुआत, अच्छी फसल, पशुधन तथा परिवार की खुशहाली की कामना से है। इस अवसर पर गरिया देवता की पूजा की जाती है। पारंपरिक गीत, नृत्य, अनुष्ठान और सामुदायिक आयोजन पर्व का हिस्सा होते हैं। 


कुल मिलाकर पूर्वोत्तर के इन आठ राज्यों के प्रमुख पर्वों की यात्रा के बाद एक दिलचस्प बात यह सामने आती है कि इन राज्यों की भाषा अलग है, पारंपरिक पोशाकें अलग हैं, नृत्य की मुद्राएँ अलग हैं और धार्मिक विश्वासों में भी विविधता है, लेकिन उत्सवों के मूल भाव में कई समानताएँ हैं। जैसे असम का बिहू, मेघालय का वांगला, अरुणाचल का सोलुंग और त्रिपुरा की गरिया पूजा बताते हैं कि खेती और प्रकृति के प्रति आभार इन समाजों के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है।


वहीं, नागालैंड का हॉर्नबिल, मिजोरम का चपचार कुट और मणिपुर का याओशांग लोगों को एक साथ लाते हैं। उत्सव यहाँ सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने का माध्यम हैं। सिक्किम का सागा दावा, लोसर और अरुणाचल के धार्मिक पर्व जीवन में आध्यात्मिकता, करुणा तथा नई शुरुआत के महत्व को सामने रखते हैं।


आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है और पारंपरिक जीवन-पद्धतियों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो रही हैं, तब इन उत्सवों का महत्व और बढ़ जाता है। इनके संरक्षण का अर्थ केवल रंगीन परिधानों और आकर्षक नृत्यों को बचाए रखना नहीं, बल्कि उन भाषाओं, लोककथाओं, संगीत परंपराओं और सामुदायिक मूल्यों को जीवित रखना भी है, जिन्होंने इन्हें जन्म दिया। [यह लेख शोध पत्रिका समागम के नवंबर अंक में प्रकाशित हुआ है]

*(लेखक करीब पांच साल पूर्वोत्तर में आकाशवाणी में पदस्थ रहे हैं और वहां की विशिष्टताओं पर लिखते रहे हैं।)


संदर्भ:


1.भारत सरकार का पर्यटन मंत्रालय, 2.Utsav पोर्टल

3.अरुणाचल प्रदेश पर्यटन विभाग 

4.असम पर्यटन विभाग 

5.Manipur Sangai Festival 2025 

6.मेघालय पर्यटन विभाग 

7.पूर्वोत्तर परिषद का NEC Newsletter 

8.मिजोरम पर्यटन विभाग 

9.नागालैंड पर्यटन विभाग 

10.Anthropological Survey of India के प्रकाशन

11.National Book Trust के प्रकाशन

12. राज्यों के कला एवं संस्कृति विभाग से जनजातीय परंपराओं, लोकनृत्यों और पर्वों पर पुस्तिकाएँ तथा स्मारिका ।




अष्टलक्ष्मी: आठ राज्य, आठ रंग

अष्टलक्ष्मी यानि देश के पूर्वी भाग में स्थित आठ राज्य। इन्हें सेवन सिस्टर्स और वन ब्रदर (सात बहनों और एक भाई) के नाम से भी जाना जाता है। यहा...