मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

8 हजार फीट ऊंचे शिखर पर 108 फीट के हनुमान…अद्भुत!!

हिमाचल प्रदेश में ‘क्वीन ऑफ हिल्स’ शिमला के सबसे लोकप्रिय स्थान मॉल रोड पहुंचते ही दूर पर्वत की चोटी पर विराजमान पवनपुत्र हनुमान जी की प्रतिमा बरबस ही सभी का ध्यान खींच लेती है। इस प्रतिमा और बादलों की आंख मिचौली से शिमला के बदलते मौसम का अंदाजा भी लगता रहता है क्योंकि कभी यह प्रतिमा बादलों में छिपकर अदृश्य हो जाती है तो कभी सूर्य की किरणें को आत्मसात कर दिव्यता से चमकने लगती है। 

यह प्रतिमा इस तरीके से स्थापित की गई है कि मॉल रोड से लेकर इसके आसपास के कई इलाकों से आप हनुमान जी के दर्शन कर सकते हैं और अब यह मॉल रोड के एक प्रमुख आकर्षणों में से एक है। इस पहाड़ को जाखू हिल्स और हनुमान जी को ‘शिमला के रक्षक’ कहा जाता है। आख़िर, हनुमान चालीसा में ऐसे ही थोड़ी लिखा गया है..’तुम रक्षक काहू से डरना।’

जाखू वाले हनुमान जी केवल एक मंदिर या पर्यटन स्थल नहीं है बल्कि यहां की गाथा रामायण काल से जुड़ी है और यह अकाट्य आस्था का स्थान है। शिमला की ऊंची चोटियों के बीच, समुद्र तल से लगभग 8 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित यह जाखू मंदिर आस्था, प्रकृति और रोमांच का एक अद्भुत संगम है एवं शिमला के 'ताज' से कम नहीं  है।

मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि लंका विजय के दौरान युद्ध में मेघनाद द्वारा शक्ति बाण चलाने से मूर्छित लक्ष्मण को बचाने के लिए जब हनुमान आकाश मार्ग से संजीवनी बूटी लेने के लिए हिमालय की और जा रहे थे तो अचानक उनकी दृष्टि जाखू पर्वत पर तपस्या लीन यक्ष ऋषि पर पड़ी। संजीवनी बूटी का परिचय जानने के लिए हनुमान जी यहां पर उतर गए।  बताया जाता है कि उनके वेग से जाखू पर्वत जो पहले काफी उँचा था, आधा पृथ्वी के गर्भ में समा गया। बूटी का परिचय प्राप्त करने के उपरान्त हनुमान  द्रोण पर्वत की और चले गए। 

जाखू पर्वत पर जिस स्थान पर हनुमान जी उतरे थे वहां पर आज भी उनके चरण चिन्हों को संगमरमर से निर्मित करके सुरक्षित रखा गया है। 

हनुमान ने ऋषि यक्ष को वापसी में इसी स्थान पर उनसे मिलते हुए लौटने का वचन दिया था। परन्तु यात्रा के दौरान हनुमान को मार्ग में कालनेमी राक्षस के कुचक्र सहित कई बाधाओं को पार करना पड़ा और समय अधिक लग गया। 

तब हनुमान समय पर संजीवनी बूटी लक्ष्मण तक पहुंचाने के लिए इस रास्ते की बजाए दूसरे छोटे मार्ग से अयोध्या होते हुए लंका चले गए। जाखू हिल्स पर अन्न जल त्यागकर हनुमान की प्रतीक्षा कर रहे ऋषि यक्ष की व्याकुलता बढ़ने लगी। उनकी व्याकुलता देख हनुमान जी ने ऋषि को दर्शन दिए और न आने का कारण बताया। उनके अंतर्ध्यान होने के तुरन्त बाद यहां बजरंग बली की एक स्वयंभू मूर्ति प्रकट हुई जो आज भी मन्दिर में पूजी जाती है। यक्ष ऋषि ने ही हनुमान जी के यहां ठहराव की स्मृति में इस मन्दिर का निर्माण किया। ऋषि 'यक्ष' के नाम पर ही पर्वत का नाम पहले 'यक्ष' था, जो समय के साथ बदलते हुए 'याक', फिर 'याखू' और अंत में 'जाखू' बन गया।

जाखू मंदिर का अब सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ स्थापित हनुमान जी की 108 फीट ऊँची सिंदूरी प्रतिमा है । वर्ष 2010 में स्थापित यह मूर्ति इतनी विशाल है कि इसे शिमला के लगभग हर कोने से देखा जा सकता है। हनुमान जी की इस मूर्ति का निर्माण बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता नन्दा और दामाद निखिल नन्दा ने करवाया है। साल 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने इस उद्घाटन किया था. इस दौरान मौके पर अभिनेता और श्वेता के भाई अभिषेक बच्चन भी मौजूद थे। यह प्रतिमा शहर की पहचान बन चुकी है और इसे 'प्राइड ऑफ शिमला' भी कहा जाता है। 2025 में यहां विशाल ध्वज भी स्थापित कर दिया गया है। 

जाखू मंदिर तक पहुँचना भी अपने आप में एक रोमांचक अनुभव है। पर्यटक मॉल रोड के रिज मैदान से जाखू मंदिर तक पहुँचने के लिए पैदल या टैक्सी का उपयोग कर सकते हैं। पैदल रास्ता घने देवदार के जंगल से होकर गुज़रता है, जो ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए स्वर्ग जैसा है। वहीं संकरे पहाड़ी कच्चे-पक्के मार्ग पर टैक्सी की सवारी भी किसी रोमांच से कम नहीं है। वहीं, जो पर्यटक खड़ी चढ़ाई से बचना चाहते हैं उनके लिए जाखू रोपवे एक बेहतरीन विकल्प है। रिज मैदान से शुरू होकर यह रोपवे कुछ ही मिनटों में सीधे मंदिर परिसर तक पहुँचा देता है, साथ ही शिमला शहर के मनमोहक नज़ारे भी दिखाता है।

जाखू पहाड़ी की चोटी से शिमला शहर, आसपास की चोटियों और घाटियों का मनोरम और विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त का नज़ारा देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है। कुल मिलाकर जाखू मंदिर केवल पत्थर और मूर्तियों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह वह सिद्ध स्थान है जहाँ देवत्व और प्रकृति का मिलन होता है इसलिए शिमला की यात्रा जाखू हनुमान के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है।

रविवार, 19 अक्टूबर 2025

क्या है शिमला का इटली से प्राकृतिक कनेक्शन..!!

क्वीन ऑफ हिल्स शिमला के बारे में यह तो सभी को पता है कि अंग्रेजों ने अपने आराम के लिए इस स्थान को सजाया संवारा था लेकिन यहां इटेलियन कनेक्शन भी है। अंग्रेजों ने भले ही इसे सत्ता प्रतिष्ठान का केंद्र बनाया था और यहां की वादियों से देश दुनिया को रूबरू कराया लेकिन अन्य देशों के लोग भी शिमला के कैनवास को अपने रंगों से रंगने में पीछे नहीं रहे हैं। इसी शृंखला में एक बेहतरीन स्थान है - क्रेग्नानो नेचर पार्क। 

क्रेग्नानो नेचर पार्क प्रकृति के चितेरो के लिए एक ऐसा कैनवास है जिसपर वे अपनी कलात्मकता से नए नए रंग भर सकते हैं, मनमाफिक पटकथा लिख सकते हैं और सुकून और सेहत के खुशनुमा पल गुजार सकते हैं। देवदार, चीड़ और चिनार के पत्तों के बीच से झांकती सूरज की नटखट किरणें हो या खूबसूरत फूलों पर अठखेलियां करती रंग बिरंगी तितलियां या पक्षियों के कलरव से उपजा दिलकश संगीत..या फिर अनोखी दिल को छू लेने वाली शांति। यहां आकर आपको प्रकृति से निकटता का अनूठा अनुभव होता है।  


शिमला से मशोबरा की ओर तथा लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित इस क्रैग्नानो नेचर पार्क तक महज 40 मिनट की हरीभरी और ऊंचे देवदार की छत्रछाया में ड्राइव आपको इस मामूली सी दूरी का भी अहसास नहीं होने देती।   मशोबरा में 7,700 फीट की ऊँचाई पर करीब 9.6 हेक्टेयर में फैला यह क्रैग्नानो  पार्क हरी-भरी वादियों में बसा एक ऐसा स्वर्ग है, जहाँ पहाड़ों की ठंडी हवा, घने जंगलों की सिहरन और इतालवी शैली का ऐतिहासिक आकर्षण एक साथ मिल जाते हैं।


 यहां से हिमालय की चोटियाँ बादलों को छूती नजर आती हैं। यह जगह मूल रूप से 19 वीं सदी में इतालवी व्यवसाई और फोटोग्राफर चेवालियर फ्रेडरिको पेलिटी द्वारा बनाई गई थी, जिन्होंने इसे अपने जन्मस्थान क्रैग्नानो (इटली) के नाम पर बसाया था। इस पार्क की खूबसूरती इतनी विविध और मोहक है कि हर मौसम में यह नया रंग-रूप धारण कर लेता है। वसंत और ग्रीष्म में पार्क रंग-बिरंगे फूलों से सजा होता है एवं लाल, पीले और गुलाबी फूलों की चादर यहां बिछी रहती है तो शरद ऋतु में पेड़ सोने-चाँदी के रंगों से जगमगा उठते हैं, जबकि सर्दियों में बर्फ की सफेद चादर इस जगह को एक परी लोक जैसा बना देती है। 

यहाँ देवदार, ओक और पाइन के घने जंगल हैं, जिनके बीच से बहती ठंडी ताजी हवा जीवन को नए अहसास और मन को शांति से भर देती है। यहाँ तीन ट्रेल्स (रास्ते) हैं – पाइन ट्रेल, ओक ट्रेल और एकेडमी ट्रेल – जो पैदल चलने वालों के लिए अनूठा अनुभव देते हैं। इन रास्तों पर चलते हुए आप तितलियों के झुंड, रंगीन फूलों और शांत वादियों का भरपूर आनंद ले सकते हैं। यहाँ बने ट्री हाउस में पहुँचकर आप शहर की भागदौड़ भूलकर प्रकृति की गोद में सुकून से आराम कर सकते हैं। 

इस बार जलाएं एक दिया उम्मीदों का..!!

फोन में घुसकर ऑनलाइन लाइटिंग,सजावट का सामान और कपड़े तलाशने में समय बर्बाद करने की बजाए एक बार सपरिवार घर से बाहर निकलिए और सड़क पर दिए बेचती बूढ़ी अम्मा की आंखों में पलती उम्मीदों की रोशनी देखिए या फिर रंगोली के रंग फैलाए उस नहीं सी बालिका के चेहरे पर चढ़ते उतरते रंग महसूस कीजिए..क्या आप हम इस बार ऐसे ही किसी व्यक्ति/परिवार के घर में उम्मीदों का दिया नहीं जला सकते?  हमें करना ही क्या है…बस,इस बार स्थानीय और खासतौर पर पटरी पर बाज़ार सजाने वालों से खरीददारी करनी है और अपने बच्चों में भी यही आदत डालनी है। 

जाहिर सी बात है रोशनी, खुशहाली, समृद्धि और सामूहिकता का पर्व दीपावली क़रीब है। घर घर में सफाई,रंगाई पुताई और दीप पर्व से जुड़ी तैयारियों का दौर जारी है इसलिए सामान खरीदने का दौर भी शुरू हो गया है।  दीप पर्व केवल रोशनी और खुशियों का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता और आर्थिक सहयोग का भी अवसर है। इसलिए,इस दीवाली जब हम बाजारों में रंग-बिरंगे दीयों, मिठाइयों, और सजावटी सामानों की खरीदारी के लिए निकलें, तो अपनी आदत में क्यों न एक छोटा सा बदलाव लाएं ? 

इस बार, बिना मोलभाव के लोकल और पटरी विक्रेताओं से खरीदारी करें और त्योहार के असली मायने को और गहरा करें।   बिना मोलभाव के खरीदारी करना न केवल आपके त्योहार को खास बनाएगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा। पटरी बाजार के लिए हर बिक्री न केवल आजीविका का साधन है, बल्कि परिवार के पोषण, बच्चों की पढ़ाई, और त्योहार की तैयारी का आधार भी है। एक छोटे विक्रेता के लिए, 10-20 रुपये की कीमत कम करना भी उनके दिन के कुल मुनाफे को प्रभावित कर सकता है। 

दीवाली जैसे व्यस्त मौसम में, जब उनकी बिक्री साल भर की कमाई का बड़ा हिस्सा होती है, मोलभाव उनके लिए बोझ बन सकता है। बिना मोलभाव के खरीदारी करके आप उनकी मेहनत का सम्मान करते हैं और उन्हें त्योहार की असली खुशी देते हैं। हम सात सौ रुपए का पिज़्ज़ा, दो सौ का बर्गर और तीन सौ रुपए की कॉफी बिना मोलभाव के खा पी लेते हैं लेकिन साल में एक बार मिट्टी के दर्जन भर दिए खरीदने के लिए मोलभाव में कोई कसर नहीं छोड़ते। हम मल्टीप्लेक्स में चार सौ रुपए का पॉपकॉर्न चुपचाप ले लेते हैं लेकिन कागज़ की झालर,तोरण और बिजली का लड़ी खरीदते समय इतना भाव ताव करते हैं जैसे अमेरिका चीन से कोई व्यापारिक समझौता कर रहे हों। 

हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि देश में बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी  स्थानीय बाजारों मसलन किराना दुकानें, पटरी विक्रेता और छोटे रिटेलर पर गहरा प्रभाव डाल रही है। 2025 तक, ई-कॉमर्स बाजार का मूल्य लगभग 10 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुका है, जो 2024 की तुलना में 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। एक अध्ययन के मुताबिक भारत का कुल रिटेल बाजार 2024 में लगभग 1.4 ट्रिलियन डॉलर का है, जिसमें ई-कॉमर्स का योगदान 8 फीसदी है और  2028 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 14 फीसदी हो जाएगी, जिससे ऑफलाइन रिटेल का शेयर 92 प्रतिशत से घटकर 86 फीसदी रह जाएगा।   

हमारे मोबाइल में घुसकर खरीददारी करने और बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी के कारण छोटे रिटेलरों की बिक्री में 15-20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है । एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022-2024 के बीच 1-2 लाख छोटे स्टोर्स बंद हो चुके हैं या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में बदल गए हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रिटेल सेक्टर भारत में 4 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ई-कॉमर्स की वृद्धि से 5-7 लाख नौकरियां प्रभावित हुई हैं। इनमें मुख्य रूप से पटरी विक्रेताओं और छोटे दुकानदारों से जुड़ी नौकरी शामिल हैं ।   

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करते रहे हैं और इसे वे आत्मनिर्भरता का जरिया मानते थे। वैसे भी, लोकल और पटरी विक्रेता भारतीय बाजारों की रीढ़ हैं। ये वे लोग हैं जो सुबह जल्दी उठकर अपने स्टॉल सजाते हैं, मिट्टी के दीये बनाते हैं, हस्तनिर्मित सजावटी सामान तैयार करते हैं, और स्थानीय स्वाद वाली मिठाइयां बेचते हैं। इनके उत्पाद न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, बल्कि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखते हैं। इन विक्रेताओं से खरीदारी करके आप हम न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट्स पर निर्भरता को भी कम करते हैं।  

आइए,इस दीवाली रोशनी के साथ-साथ अपने करीबी बाजार को भी रोशन करें। बिना मोलभाव के खरीदारी करें एवं त्योहार की असली खुशियों को फैलाकर सभी के लिए दीवाली शुभ बनाए और घर घर में जलाएं एक दिया उम्मीदों का।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

‘मन की बात’ कैसे बनी जन जन की बात..!!

रविवार को सुबह 11 बजे आकाशवाणी और दूरदर्शन से लेकर विभिन्न संचार माध्यमों पर गूंजने वाली आवाज ‘मेरे प्यारे देशवासियों’ अब न केवल मासिक मंत्र बन गई है बल्कि जन संवाद की पहचान भी है। इसे हम सभी मन की बात कार्यक्रम के नाम से जानते हैं जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों के साथ अराजनीतिक और प्रेरक संवाद करते हैं। 3 अक्टूबर को इस कार्यक्रम की 11वीं वर्षगांठ है। दरअसल श्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के करीब 5 महीने बाद बुराई पर अच्छाई की जीत के पर्व विजयादशमी के दिन 3 अक्टूबर 2014 को अपने इस सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात’ की शुरुआत की थी। आज यह कार्यक्रम महीने के आखिरी रविवार की पहचान और एक अनिवार्य जरूरत बन गया है।

इस कार्यक्रम को रेडियो माध्यम को नया जन्म देने की दिशा में मील का पत्थर माना जाता है। खास तौर पर जब दुनिया संचार के नए युग के विभिन्न प्लेटफॉर्म के पीछे भाग रही हो तब किसी राष्ट्र प्रमुख द्वारा पारंपरिक और केवल आवाज़ पर केंद्रित माध्यम पर विश्वास जताना वाकई प्रशंसनीय एवं अचरज भरा प्रयास था लेकिन आज मन की बात कार्यक्रम के सवा सौ एपिसोड पूरे हो जाने के बाद हम कह सकते हैं कि श्री मोदी ने रेडियो का चयन कर जमीनी स्तर तक संवाद कायम करने की जो शुरुआत की थी वह आज सफलता का नया इतिहास रच रही है।

मन की बात कार्यक्रम के जरिए प्रधानमंत्री ने आम जनता के साथ सहज तरीके से सरल भाषा में संवाद कायम किया है। आसान शब्दों में कहें तो अब यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री और आम नागरिकों के बीच सीधे संवाद का एक मजबूत सेतु बन चुका है।  मन की बात कार्यक्रम ने 30 अप्रैल 2023 को 100 एपिसोड का सफर पूरा कर लिया था और अब यह सवा सौ एपिसोड का आंकड़ा पार कर चुका है। बीते रविवार को मन की बात के 126 वे अंक का प्रसारण हुआ। हालांकि, देश में आम चुनाव के मद्देनजर चुनावी आचार संहिता के कारण 2019 में मार्च, अप्रैल और मई माह में यह कार्यक्रम प्रसारित नहीं हुआ था।

मन की बात कार्यक्रम से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह है कि इसके पहले एपिसोड का प्रसारण शुक्रवार के दिन हुआ था तब से लेकर मार्च 2015 तक इसका प्रसारण हर महीने शुक्रवार को ही होता था लेकिन अप्रैल 2015 से इसके प्रसारण का दिन बदल दिया गया और फिर यह हर महीने के आखिरी रविवार को प्रसारित होने लगा। एक अन्य मजेदार बात यह है कि पहला एपिसोड करीब 14 मिनट का था जबकि नवंबर 2014 में प्रसारित दूसरा एपिसोड 19 मिनट का और तीसरा एपिसोड 26 मिनट अवधि का था। हालांकि चौथे एपिसोड से इसकी अवधि 30 मिनट तय कर दी गई और तब से अब तक यह प्रतिमाह 30 मिनट की अवधि में ही प्रसारित होता है। आकाशवाणी पर यह कार्यक्रम 22 भारतीय भाषाओं, 29 बोलियों और 11 विदेशी भाषा में प्रसारित होता है। इसके अलावा दूरदर्शन तथा अन्य निजी समाचार चैनलों, यूट्यूब और कई सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी इस कार्यक्रम का प्रसारण किया जाता है।

 मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक करीब 1000 प्रतिष्ठित व्यक्तियों, प्रेरित करने वाली शख्सियतों और संगठनों का उल्लेख कर चुके हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के समुचित प्रतिनिधित्व के कारण मन की बात कार्यक्रम अब सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात नहीं रह गया है बल्कि यह करोड़ों भारतीय लोगों के मन की बात बन चुका है ।

मन की बात के सौवें एपिसोड के पहले भारतीय प्रबंध संस्थान, रोहतक द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक मन की बात के बारे में लगभग 96 प्रतिशत लोग जानते हैं और यह कार्यक्रम 100 करोड़ लोगों तक पहुँच चुका है। इतना ही नहीं, 23 करोड़ लोग नियमित रूप से यह कार्यक्रम देखते/सुनते हैं, जबकि अन्य 41 करोड़ लोग कभी कभी इस कार्यक्रम से जुड़ते हैं। इस कार्यक्रम ने अब तक करीब 35 करोड़ रुपए का राजस्व भी अर्जित किया है। अब सवा सौ एपिसोड का सफर तय कर यह कार्यक्रम सफलता की नई ऊंचाइयां छू रहा है।

मन की बात परस्पर संवाद का मंच इसलिए भी बन गया है क्योंकि आम लोग इस कार्यक्रम के संबंध में न केवल प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं बल्कि अपने रिकॉर्ड किए गए संदेश भी भेजते हैं इसलिए यह दो तरफा संवाद सकारात्मक पहलुओं को सामने लाने और समाज में बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण जरिया बन गया है। यह एक ऐसा कार्यक्रम है जिसमें अरुणाचल प्रदेश से लेकर नागालैंड तक और पंजाब से लेकर लक्षद्वीप तक से जुड़े मुद्दों को उठाया जाता है,वहां की समस्याओं पर बातचीत होती है और जनसहयोग से उनके समाधान पर भी बात होती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण स्वच्छता अभियान है । प्रधानमंत्री ने मन की बात के पहले एपिसोड में ही स्वच्छता को जन आंदोलन बनाने की अपील की थी और अब करीब 10 साल बाद देश स्वच्छता में किन बुलंदियों पर है, यह किसी से छिपा नहीं है। 

इसी तरह, प्रधानमंत्री ने जुलाई 2022 में घरेलू खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने की अपील की थी और कभी आयात पर निर्भर मृतप्राय भारतीय खिलौना उद्योग अब लगभग 3000 करोड रुपए के निर्यात का आंकड़ा हासिल कर रहा है। प्रधानमंत्री ने खादी के वस्त्र खरीदने और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने जैसी कई मुहिम इस कार्यक्रम के जरिए शुरू की और आज ये सभी क्षेत्र विकास की रफ़्तार पर सवार हैं ।

विशेषज्ञों का मानना है कि मन की बात कार्यक्रम के लोकप्रिय होने की वजह इसका पारिवारिक शैली में संवाद है और यह बचपन में दादी नानी से सुनी गई कहानियों की याद दिलाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरल, सहज और व्यक्तिगत संवाद शैली लोगों को जोड़ती है। वे आम लोगों की भाषा में बात करते हैं, जिससे श्रोता अपनेपन का अनुभव करते हैं। इतना ही नहीं,पत्रों या MyGov प्लेटफॉर्म के माध्यम से आम लोगों की कहानियों और सुझावों को शामिल करना इसे जन-आधारित बनाता है। यह कार्यक्रम हमें अपने त्योहार, संस्कृति, परंपराओं, समुदाय और परिवेश से जोड़ने में भी मदद करता है। 

मन की बात एआई और मशीन लर्निंग के दौर में पारंपरिक संचार माध्यम के इस्तेमाल का बेहतरीन उदाहरण है जो चुपचाप सामाजिक क्रांति का जरिया भी बन गया है। सेल्फी विद डॉटर, देश के गुमनाम नायकों का गौरवपूर्ण स्मरण, पर्यावरण संरक्षण, वोकल फॉर लोकल,एक पेड़ मां के नाम, कुपोषण से मुक्ति और जल शक्ति अभियान जैसे कई उदाहरण है जिन्हें इस कार्यक्रम के जरिए न केवल राष्ट्रव्यापी सफलता मिली है बल्कि उन्होंने देश की सूरत और सीरत बदलने का काम किया है।


कुल मिलाकर यह कार्यक्रम प्रेरणादायक और सकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है और लोगों को अच्छा करने के लिए प्रेरित एवं उत्साहित करता है। यही वजह है कि मन की बात भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लोकप्रिय हो रहा है। यह हमारा भी कर्तव्य है कि हम इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री द्वारा की गई अपील का सामूहिक रूप से पालन करें और देश को विकास,बदलाव और सकारात्मक सोच के साथ प्रगति के पथ पर अग्रसर रखने में कोई कसर नहीं छोड़े।

#Mannkibaat #NarendraModi #Radio #Akashvani

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

शिव और प्रकृति का मेल है डमरू घाटी

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के  गाडरवारा शहर के करीब स्थित डमरू घाटी एक ऐसा धार्मिक स्थल है, जो प्रकृति की गोद में बसा होने के कारण भक्तों के मन को मोह लेता है। यह घाटी शक्कर नदी के तट पर स्थित है, जो नर्मदा की सहायक नदियों में से एक है। 

घाटी का आकार भगवान शिव के डमरू के समान होने के कारण इसका नाम 'डमरू घाटी' पड़ा है। यहाँ की शांत वादियाँ और हरे-भरे पेड़ प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करते हैं। गाडरवारा पहले से ही आचार्य रजनीश (ओशो) के लिए प्रसिद्ध है।

मंदिर का उद्घाटन 1980 के दशक में हुआ, और तब से यह शिवभक्तों का प्रमुख केंद्र बन गया है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है इसका विशाल शिवलिंग, जो मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है। यह शिवलिंग लगभग 20-21 फुट ऊँचा है। 

डमरू घाटी का वातावरण इतना शांतिपूर्ण है कि आने वाला हर यात्री मन की शांति का अनुभव करता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशाल मेला लगता है, जिसमें विभिन्न भागों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। 

डमरू घाटी न केवल एक मंदिर है, बल्कि भक्ति, प्रकृति और स्थानीय संस्कृति का जीवंत चित्रण है। यदि आप मध्य प्रदेश की यात्रा पर हैं, तो यहाँ शिव के दर्शन अवश्य करें । यह जबलपुर-भोपाल मार्ग पर कुछ वक्त गुजारने के लिए बेहतरीन स्थान है।


केवल गंभीर नहीं, विनोदप्रिय भी थे बापू

आज 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिन है। आज अगर बापू हमारे बीच होते तो वे 156 साल के होते लेकिन कहते हैं न कि उम्र बड़ी नहीं होनी चाहिए बल्कि जीवन में किए गए कार्य बड़े होने चाहिए और यह बात मोहनदास करमचंद गांधी पर सौ फीसदी लागू होती है। महात्मा गांधी अपने कार्यों, आदर्शों, विचारों, सिद्धांतों और जीवन के उदाहरणों से इतना ऊंचा दर्जा रखते हैं कि देश क्या, दुनिया में उनकी बराबरी का कोई और शख्स नहीं दिखता। आमतौर पर गांधीजी जी की छवि को गंभीर, अत्यधिक अनुशासित और नीरस आंका जाता है लेकिन असलियत यह है कि गांधीजी विनोदप्रियता और हंसी मजाक में किसी से कम नहीं थे लेकिन गांधीजी की विनोदप्रियता में सबसे बड़ा अंतर यह था कि महात्मा गांधी का हास्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं था, बल्कि उसमें हमेशा गहरा संदेश छिपा होता था।

हम यह कह सकते हैं कि महात्मा गांधी का व्यक्तित्व जितना गंभीर, त्यागपूर्ण और आदर्शवादी था, उतना ही सहज और विनोदी भी था। उनका हास्य-बोध भी उनके अन्य कार्यों की तरह असाधारण था। अपनी विनोदप्रियता के कारण ही वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सहज भाव बनाए रखते थे । 

गांधीजी अक्सर अपने बारे में ही मजाक करते थे, जो उनकी विनम्रता को दर्शाता है । एक बार, जब किसी ने उनकी पतली काया का मजाक उड़ाया तो गांधीजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि मेरे शरीर में हड्डियाँ ही हड्डियाँ हैं, लेकिन मेरी आत्मा में ताकत है। एक अन्य मौके पर, जब किसी ने उनकी सख्त दिनचर्या और कम खाने की आदत पर टिप्पणी की, तो उन्होंने मजाक में कहा कि मैं अपने पेट को ज्यादा काम नहीं देता, ताकि मेरा दिमाग ज्यादा काम कर सके।

इसी तरह, एक बार किसी विदेशी पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप इतने बड़े देश का प्रतिनिधित्व करते हुए भी केवल एक धोती क्यों पहनते हैं? तो गांधीजी ने मुस्कराकर उत्तर दिया कि मेरे देश के करोड़ों लोग पूरे कपड़े नहीं पहन पाते। जब वे सब पहनने लगेंगे, तब मैं भी पहन लूंगा। यह उत्तर व्यंग्य के साथ  करुणा भी जगाता है ।

बताया जाता है कि सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जब बापू जेल में थे, तो एक जेलर ने उनसे मजाक में कहा कि गांधीजी, आप बार-बार जेल क्यों आ जाते हैं? इस पर गांधीजी ने हँसते हुए जवाब दिया कि यहाँ का खाना मुझे घर से बेहतर लगता है। यह जवाब न केवल हास्यपूर्ण था, बल्कि उनकी निर्भीकता को भी दर्शाता है।

गांधीजी बच्चों के साथ विशेष रूप से विनोदप्रिय हो जाते थे। वे बच्चों के साथ मजाक करते, कहानियाँ सुनाते और उनके सवालों का जवाब हल्के-फुल्के अंदाज में देते थे। एक बार, एक बच्चे ने उनसे पूछा कि बापू, आप इतने पतले क्यों हैं? तो गांधीजी ने हँसते हुए कहा कि मैं अपनी सारी ताकत तुम जैसे बच्चों को देने के लिए बचाता हूँ।

इसी प्रकार, एक बार, जब एक ब्रिटिश पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप इतने कम कपड़ों में लंदन की सर्दी में क्या करेंगे? तो गांधीजी ने हँसते हुए जवाब दिया कि मेरे पास तो मेरे देशवासियों से ज्यादा कपड़े हैं, वे तो और भी कम पहनते हैं। यह जवाब न केवल विनोदी था, बल्कि भारत की गरीबी और ब्रिटिश शोषण की ओर भी इशारा करता था।

एक अन्य उदाहरण ऐसा भी है जिसमें भूख से भी उन्होंने हास्य पैदा कर दिया था। एक बार अनशन के दौरान किसी ने  उनसे पूछा कि बापू भूख तो नहीं लग रही? तो उन्होंने हँसकर कहा कि भूख तो लगती है, पर सोच रहा हूँ कि भूख भी कितनी सहनशील है। 

सबसे खास बात यह है कि गांधीजी की विनोदप्रियता कभी किसी को चोट पहुँचाने के लिए नहीं होती थी। वह हास्य में व्यंग्य का सहारा लेते थे, लेकिन उसमें करुणा और आत्मीयता झलकती थी। यही कारण है कि उनका विनोद प्रेरक बन जाता था। महात्मा गांधी की विनोदप्रियता उनकी विनम्रता, बुद्धिमत्ता, और मानवता का प्रतीक थी। उनका हास्य न तो आक्रामक था और न ही अपमानजनक, बल्कि यह विचारशील, प्रेरणादायक और सकारात्मक था। यह उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पहलू था, जो उन्हें न केवल एक महान नेता, बल्कि एक सहज और प्रिय इंसान बनाता था। महात्मा गांधी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि गंभीरता और विनोद साथ-साथ चल सकते हैं और समाज को नई दिशा दे सकते हैं।


सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...