शुक्रवार, 30 मई 2025

हिंदी पत्रकारिता दिवस: गौरवशाली अतीत का गुणगान

आज 30 मई को  ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ है..हमारे गौरव और गर्व का दिन। यह ‘उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’ से हिंदी पत्रकारिता का परचम लहराने वाले पंडित युगल किशोर शुक्ल जैसे महारथियों और उनके बाद इस गौरवशाली विरासत और परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजने/संवारने और विकसित करने वाले तमाम दिग्गज संपादकों और पत्रकारों का पुण्य स्मरण करने का दिन है। इस पवित्र पेशे की गुणवत्ता को कायम रखने वाले ‘नींव के पत्थरों’ से मौजूदा पीढ़ी को बताने का दिन है। 

इसके पहले कि आप में से कोई यह टिप्पणी करें कि ‘उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’ के ध्वजवाहक का नाम युगल किशोर शुक्ल नहीं बल्कि जुगल किशोर शुक्ल था तो आपकी जानकारी के लिए मैं यहां पद्मश्री से सम्मानित और अपनी तरह के इकलौते माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान, भोपाल के संस्थापक और वरिष्ठ पत्रकार विजय दत्त श्रीधर का स्पष्टीकरण उद्धृत करना चाहूंगा। उन्होंने अपनी एक पोस्ट में बताया है कि “बांग्‍ला में ‘य’ का उच्‍चारण ‘ज’ होता है। इसलिए उन्‍हें पं. जुगल किशोर शुक्‍ल भी कहा जाता है।” मुझे भी इस अनूठे संस्थान के परामर्श मंडल का सदस्य होने का गौरव हासिल है।

शायद, कम लोग जानते होंगे कि हमारी हिंदी पत्रकारिता अब 200 साल की मजबूत बुनियाद पर डटी है। 30 मई, 1826 को कोलकाता से शुरू हुई इस पावन यात्रा ने आज 199 साल पूरे कर लिए हैं और अब द्वि शताब्‍दी वर्ष का आग़ाज़ हो गया है। दो सौ सालों का सफर कोई छोटी बात नहीं है। कितनी पीढ़ियों के परिश्रम से यह वट वृक्ष अपनी विशालता एवं हरियाली के साथ करोड़ों पाठकों का सूचना और सुरक्षा कवच बना है।  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक और चैट जीपीटी से लेकर ग्रोक तक कितने भी झंझावात आते रहे हों लेकिन हिंदी की प्रिंट पत्रकारिता मजबूती से डटी हुई है और इस स्वर्णिम विरासत का मस्तूल आज भी कई दिग्गज पूरे भरोसे से थामकर आगे बढ़ रहे हैं।

अपने लिए तो हिंदी,पत्रकारिता और हिंदी पत्रकारिता…ये नाम नहीं, रोजी रोटी का जरिया है इसलिए ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ अपने लिए मई दिवस भी है और दीपावली भी और होली भी…सभी संगी साथियों को असंख्य बधाइयां। यदि हिंदी भाषा और पत्रकारिता की पढ़ाई, पेशा और फिर उसके माध्यम से कुछ और सीढियां चढ़ते को नहीं मिलती तो न यह पहचान मिलती और न ही सम्मान और न ही वर्तमान की पहचान परवान चढ़ पाती।


‘ये चमक,ये दमक

फुलवन मा महक

सब कुछ सरकार तुम्हई से है।’


‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ की बधाई


मंगलवार, 27 मई 2025

तो हो जाए…एक कप अदरक इलायची वाली चाय!!

चाय केवल पेय नहीं, बल्कि संस्कृति एवं परंपरा है!!
चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि एक भावना है, संस्कृति है, इतिहास है, अर्थव्यवस्था है और सबसे बढ़कर मेलजोल का पुल है। यह वह पुल है जो हमारी सामाजिकता को बरकरार रखता है। जब हम सुबह की ताजगी के लिए चाय का एक घूंट लेते हैं, या शाम की थकान को दोस्तों के साथ चाय की चुस्कियों में भूल जाते हैं। 

यह एक ऐसा पेय है जो मौसमीय बदलावों से परे है। ठंड में गर्म चाय का प्याला तन मन को ऊर्जा एवं गर्माहट से भर देता है तो गर्मी में वही गर्म प्याला ‘लोहा लोहे को काटता है’ वाले अंदाज में गर्माहट को कम कर देता है और बारिश में पकौड़ों के साथ अदरक वाली चाय के तो क्या कहने। चाय सुबह, दोपहर, शाम, रात, खाने के पहले,भोजन के बाद, सोने से पहले,उठने के बाद...कभी भी, कहीं भी पी जा सकती है। 


ताज जैसी फाइव स्टार होटल में एक प्याला चाय किसी मिडिल क्लास रेस्त्रां के लंच के बराबर कीमत की पड़ती है तो टपरी की चाय के स्वाद का अलग ही आनंद है। कई शहरों में लोकप्रिय कट चाय किफायती भी है और दोस्तों की कंपनी देने वाली भी। यह रंग रूप भी बदलती है, स्वाद भी,अंदाज भी और सेहत से जुड़े फायदे भी इसलिए दूध वाली सफेद, काली, लाल, हरी चाय, सुलेमानी, मलाई मार के जैसी परंपरागत चाय के साथ अब तो तमाम नई किस्में उपलब्ध हैं और उतने ही ज्यादा स्वाद भी।

इसलिए, सबसे पहले गरमागरम चाय की चुस्की के साथ अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस की शुभकामनाएँ। हर साल आज के दिन यानि 21 मई को अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस (International Tea Day) मनाया जाता है, जो न केवल इस पेय की महिमा का उत्सव है, बल्कि इसके पीछे छिपी सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक कहानियों का भी सम्मान करता है।  


चाय, जिसे भारत में ‘चाय’ और दुनिया के कई हिस्सों में ‘टी’ के नाम से जाना जाता है, सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि एक जीवनशैली, परंपरा और आत्मीयता का प्रतीक है। वैसे तो, चाय की कहानी हजारों साल पुरानी है, जो चीन से शुरू होकर विश्व के कोने-कोने तक फैली लेकिन भारत में चाय ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान लोकप्रिय हुई और आज यह देश की आत्मा का हिस्सा है। असम, हिमाचल प्रदेश, दार्जिलिंग और नीलगिरी जैसे विविध इलाकों की चाय ने विश्व स्तर पर अपनी सुगंध और स्वाद से अलग पहचान एवं प्रतिष्ठा बनाई है। 

चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि संस्कृतियों को जोड़ने का माध्यम है। भारत में सुबह की चाय परिवार के साथ बातचीत का बहाना है, तो दोस्तों के साथ चाय पर चर्चा विचारों का आदान-प्रदान। चाय गप्प मारने का जरिया है तो कभी खुद को रिचार्ज करने वाला ईंधन। 

चाय उद्योग लाखों लोगों के लिए आजीविका का स्रोत है। भारत, चीन, श्रीलंका, और केन्या जैसे देशों में चाय की खेती और उत्पादन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। विशेष रूप से भारत में, असम और दार्जिलिंग के चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की मेहनत इस उद्योग को जीवंत रखती है।  यह तो हम सभी जानते ही हैं कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है। 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में चाय का उत्पादन 13 लाख टन के आसपास पहुंच चुका है।


देश की कुल चाय उत्पादन में असम और पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी भारी है, लेकिन हर चाय प्रेमी जानता है कि भारतीय चाय की विविधता ही उसकी खासियत है मसलन असम की बड़े बागानों वाली, दार्जिलिंग की फूलों-सी महक वाली, नीलगिरी की ताज़गी भरी और... हिमाचल की अनोखी कांगड़ा चाय। हिमाचल की चाय में पहाड़ों की खुशबू है तो बादलों का प्यार भी क्योंकि यहां बादल चाय की पत्तियों से बातें करते हैं। खासतौर पर कांगड़ा की चाय तो दुनिया भर में अपने अनूठे स्वाद के जादू के लिए मशहूर है। 1849 में डॉ. जेम्सन ने यहां चाय की खेती की शुरुआत की थी। 

आज कांगड़ा चाय को GI टैग हासिल है। एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर यह चाय हिमाचल में करीब ढाई हजार हेक्टेयर क्षेत्र  उगाई जाती है और  सालाना उत्पादन 8-10 लाख किलो तक पहुंच गया है।कांगड़ा की चाय की लोकप्रियता का कारण यहां की आवोहवा है।पहाड़ी मिट्टी, ऊंचाई पर मौजूद चाय बागान, ठंडी हवाएं और शुद्ध पानी मिलकर कांगड़ा चाय को अनोखा स्वाद देते हैं।

चाय न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक भी है। ग्रीन टी, ब्लैक टी, और हर्बल टी में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो तनाव कम करने, हृदय स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं। आयुर्वेद में भी चाय को विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर उपयोग किया जाता है। हालांकि, चाय का सेवन संतुलित मात्रा में जरूरी है, क्योंकि अधिक चाय पीने से इसमें मौजूद कैफीन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। 

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस हमें इस साधारण पेय के पीछे की असाधारण कहानियों को याद करने का अवसर देता है। यह हमें उन मेहनती हाथों का सम्मान करने का मौका देता है जो चाय की पत्तियों को हमारे कप तक पहुंचाते हैं। यही वह दिन है जब पूरी दुनिया खासतौर पर एक कप चाय के इर्द-गिर्द इकट्ठा होती है। न सिर्फ चुस्की लेने के लिए, बल्कि उन लाखों हाथों को सलाम करने के लिए जिन्होंने इस जादुई पत्ती को उगाया, तोड़ा और हमारी प्याली तक पहुंचाया। 

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस टिकाऊ खेती, उचित मजदूरी और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों को भी प्रोत्साहित करता है। आइए, इस अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस पर एक कप चाय के साथ नई शुरुआत करें। यह कप न केवल स्वाद से भरा हो, बल्कि परस्पर प्रेम, एकता,सहयोग और सतत संवाद के संदेश से भी भरा हो। तो, उठाइए अपनी पसंदीदा चाय का कप..चियर्स!!

सौ रुपए में मूक संवाद..!!

सरहद पर स्थित एक कस्बे में एक व्यक्ति रोज अपने शहर के एटीएम में जाता और  मात्र ₹100 निकालकर वापस लौट आता। उसका यह सिलसिला लगभग रोज चलता रहा । उस एटीएम में तैनात गार्ड को भी आश्चर्य होता कि यह व्यक्ति रोज केवल ₹100 निकालने आता है जबकि वह चाहे तो सामान्य लोगों की तरह एक बार में अपनी जरूरत की राशि निकाल सकता है और बार-बार एटीएम आने से भी बच सकता है, लेकिन अपनी नौकरी की सीमाओं के कारण वह चुपचाप देखता रहता है और कुछ नहीं पूछता। 

उस व्यक्ति के रोज आने की वजह से स्वाभाविक तौर पर उनमें नमस्कार जैसा शुरुआती संवाद भी होने लगा । जब उस व्यक्ति के एटीएम आने का यह सिलसिला एक पखवाड़े से भी ऊपर तक चलता रहता है तो गार्ड का धैर्य जवाब दे गया और उसकी जिज्ञासा हिलोरे मारने लगी । अंततः गार्ड ने एक दिन उस व्यक्ति को रोककर पूछ ही लिया  कि साहब,मैं, कई दिन से देख रहा हूं कि आप प्रतिदिन एटीएम आते हैं और केवल ₹100 निकाल कर चले जाते हैं जबकि आप चाहे तो एक ही बार में आपकी जरूरत का पैसा निकाल सकते हैं।

 गार्ड के सवाल पर उस व्यक्ति ने मुस्करा कर जो जवाब दिया उससे गार्ड की आँखें भी नम हो गईं। उस व्यक्ति ने बताया कि मैं फौजी हूं और अभी इस इलाके में सीमा की पहरेदारी करने आया हूं। जहां तैनात हूं वहां से फोन करना सुरक्षित नहीं है और फोन के सिग्नल मिलना और भी मुश्किल।  परंतु इस बैंक खाते से जुड़ा मोबाइल मेरी पत्नी के पास है और मेरे ₹100 निकालने के साथ ही प्रतिदिन बैंक के मैसेज से पत्नी को यह सूचना मिल जाती है कि मैं सुरक्षित हूं और जीवित भी । 

सोचिए, संवाद का यह कितना अद्भुत तरीका है। बिना कुछ कहे और बिना कुछ सुने अपने लोगों को खुद के सुरक्षित होने की जानकारी दे देना ।  कुछ समय पहले, ऐसी ही एक कहानी और पढ़ने को मिली थी जिसमें मैसेज से जीवन के होने या न होने का सार छिपा था । दरअसल, एक बड़े शहर की एक संभ्रांत कॉलोनी में एकाएक एक बुजुर्ग महिला की मृत्यु हो जाती है और तुरंत ही उस कॉलोनी के लोग विदेश में बसे उसके बेटे को खबर भेज देते हैं । अंतिम संस्कार की तमाम औपचारिकताओं के बाद बेटा उस कॉलोनी के लोगों से पूछता है कि मैं भी मां के नियमित संपर्क में रहता हूं लेकिन आपको इतनी जल्दी कैसे पता चल गया कि मेरी मां अब इस दुनिया में नहीं रहीं। तो इसके उत्तर में कॉलोनी के लोगों ने जो बात बताई वह आज नहीं तो कल हम सबके जीवन में लागू होने लायक है। 

उन्होंने कहा कि हमने अपनी कॉलोनी के सभी बुजुर्गों का एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया हुआ है। इस ग्रुप का सबसे सख्त, कठोर या कहें कि अनिवार्य नियम यह है कि आप कितने भी व्यस्त हों लेकिन आपको हर घंटे में ग्रुप में एक मैसेज अवश्य करना है। जरूरी नहीं है कि वह मैसेज कोई ज्ञान, फोटो, विचार या कुछ और हो । आप केवल हेलो लिखकर, हाय लिखकर या फिर कोई इमोजी डालकर भी मैसेज भेज सकते हैं । यदि उस घंटे में किसी बुजुर्ग का मैसेज नहीं आता है तो तत्काल हमारे साथी उनके घर जाकर उनका हाल-चाल पूछते हैं। इससे फायदा यह है कि हम हर घंटे एक दूसरे की सेहत की निगरानी करते रहते हैं। यदि कोई बीमार है तो उसे तत्काल अस्पताल पहुंचा दिया जाता है। बस, इसी नियमित मैसेजिंग प्रक्रिया के कारण आपकी मां की मृत्यु का समाचार हम तत्काल आप तक पहुंचा पाए।  

 हो सकता है किसी को सुनने में यह बेफिजूल की कहानी लगें लेकिन असल जिंदगी में ये उदाहरण बहुत मायने रखते हैं।  महज एक मैसेज के जरिए आप किसी की जिंदगी में अपनी मौजूदगी दर्ज कर सकते हैं या उसकी जिंदगी बचा भी सकते हैं । इसलिए यदि कोई आपको सुबह गुड मॉर्निंग जैसा कोई फॉरवर्ड मैसेज भी भेजता है तो उसे डाटा या समय की बर्बादी समझकर उस पर अपनी खीज निकालने की बजाए यह सोचिए कि उस व्यक्ति के लिए आपकी कितनी अहमियत है। तभी तो वह सबसे पहले अपने दिन की शुरुआत आपको शुभकामना संदेश भेजकर कर रहा है।

 इस छोटे से मैसेज के जरिए वह न केवल आपके सेहतमंद होने की कामना कर रहा है बल्कि अपने खुद के सेहतमंद होने की जानकारी भी दे रहा है। अब जबकि, हम सब अपने अपने दायरे में इतने सिमट गए हैं कि जन्मदिन और त्यौहारों जैसे जीवन के तमाम शुभ अवसरों पर परस्पर एक दूसरे के घर जाने की बजाय या फोन पर बात करने के स्थान पर रेडीमेड मैसेज का सहारा लेने लगे हैं तो ऐसी सूरत में यदि वाकई कोई आपकी चिंता कर रहा है तो आपको उसकी सराहना तो करनी ही चाहिए बल्कि कुछ इसी तरह की सार्थक पहल को आगे बढ़ाना भी चाहिए ताकि छोटे-छोटे समूह में ही सही हम एक दूसरे से या एक दूसरे के हालात से अनजान न रहे। 

कहीं, ऐसा न हो कि किसी के चले जाने के बाद आपको पता चले और फिर आप ताउम्र यह अफसोस मनाते रहे कि काश,समय से पता चल जाता तो हम कुछ कर पाते…संवाद करिए,जुड़िए,जोड़िए क्योंकि बचपन से पढ़ाया जा रहा है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए समाज में रहिए और सामाजिक बनिए भी। 

रविवार, 18 मई 2025

क्या है मध्यप्रदेश की पहचान…पोहा जलेबी या कुछ और !!

लिट्टी चोखा कहते ही हमारे सामने बिहार की छवि उभर आती है। वही, बड़ापाव बोलते ही महाराष्ट्र याद आने लगता है। इडली-बड़ा या डोसा सुनते ही तमिलनाडु से लेकर आंध्र प्रदेश तक तस्वीर सामने आ जाती है और मोमोज सुनते ही पूर्वोत्तर की झलक मिल जाती है… लेकिन, क्या हमारे अपने प्रदेश मध्य प्रदेश का ऐसा कोई खानपान है जिसका नाम लेते ही पूरे प्रदेश की तस्वीर उभर कर सामने आ जाती हो? दरअसल, यह प्रश्न हाल ही में सामने आया जब हमारे प्रदेश की यात्रा पर आए एक परिचित ने पूछा कि जिसतरह हर राज्य के कुछ खान-पान,कपड़े, हस्तशिल्प या अन्य सामग्री वहां की पहचान है तो मध्य प्रदेश की पहचान क्या है? सवाल जरूरी भी है और मौजू भी। 

आखिर, हर राज्य की अपनी एक पहचान होती है और होनी भी चाहिए।  यह पहचान उस राज्य की संस्कृति, परंपरा और मोटे तौर पर वहां के उत्पादों की झलक पेश करती है । अब कुछ लोग कह सकते हैं कि हम भी ‘दाल बाफले’ को अपने प्रदेश की पहचान के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं। निश्चित तौर पर, दाल बाफले लोकप्रिय व्यंजन है लेकिन इसकी लोकप्रियता मालवा क्षेत्र में ज्यादा है जबकि बुंदेलखंड, बघेल या अन्य क्षेत्र में लोग दाल बाफले को लेकर उतने लालायित नहीं दिखते। यहां बाफले की जगह दाल के साथ बाटी ज्यादा पसंद की जाती है। 

कुछ लोगों ने पोहा को मध्य प्रदेश की पहचान बताई। हालांकि, यह बात सौ फीसदी सच है कि पोहा मध्य प्रदेश में जबरदस्त लोकप्रिय है लेकिन तकनीकी रूप से यह मध्य प्रदेश की बजाय महाराष्ट्र की पहचान है। यह मूल रूप से महाराष्ट्र से चलकर हमारे प्रदेश में आया है। यह बात जरूर है कि हमने पोहा के साथ जलेबी की जोड़ी बनाकर ‘पोहा-जलेबी’ को अपनी पहचान बना लिया है। यही कारण है कि प्रदेश के लगभग हर शहर की नींद सुबह पोहा जलेबी के साथ ही खुलती है। भले ही पोहे का रूप इंदौर से लेकर जबलपुर तक बदलता रहता हो। जलेबी के साथ भजिया (पकौड़े) भी पोहे के बाद लोकप्रियता में दूसरे स्थान पर हैं। आलूबड़ा/ आलूगोंडा पहले ही पाव के घर बसाकर महाराष्ट्र का हो चुका है और अब तो बड़ा पाव, भाजीबड़ा, मिसल पाव जैसे कई स्वादों में राज्यव्यापी है। 

उधर, समोसा तो राज्यों की सीमा को पार कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रुतबा हासिल कर चुका है। अब तो यह आलू जैसे अपने स्थायी साथी के अलावा चाइनीज, मिठाई, मीट,मैगी के साथ जोड़ी बनाकर बहुरूपिया हो गया है।बुरहानपुर की मशहूर जलेबी, मालपुआ, या इंदौर के रतलामी सेव भी मध्यप्रदेश की एक स्वादिष्ट पहचान के विकल्प हो सकते है लेकिन ये भी राज्यव्यापी न  होकर क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व ज्यादा करते हैं।  

कुछ लोगों ने कहा कि गोंड, भील और सहारिया जैसे आदिवासी हमारी मूल पहचान है इसलिए इनके खानपान को मध्य प्रदेश की मूल पहचान बनाया जा सकता है। यह सुझाव अच्छा है लेकिन अब तो आदिवासी समाज भी आधुनिकता के रंग में रंगने लगा है और उनका खानपान बस मेलों-ठेलों की रौनक बनकर रह गया है। इसके अलावा, आदिवासी भोजन के ऑथेंटिक रेस्त्रां की कमी, सभी जगह सहज उपलब्धता जैसे तमाम कारण हैं जिनकी वजह से यह पूरे राज्य का प्रतिनिधि भोजन नहीं बन पा रहे हैं।

तो, सोचिए..आप भी दिमाग दौड़ाइए और बताइए कि क्या हो हमारे प्रदेश की पहचान…जो स्वादिष्ट भी हो,विशिष्ट भी,लोकप्रिय भी और लिट्टी या इडली की तरह सर्वसुलभ और सबसे जरूरी पॉकेट फ्रैंडली भी!! एक खास बात और, आपकी सोच का दायरा बस स्नैक्स/नाश्ते तक सीमित मत रखिए बल्कि सम्पूर्ण भोजन तक विस्तारित कीजिए😋😋


बुधवार, 14 मई 2025

अपनों और अपनेपन का अहसास कराती है ‘आरसी अक्षरों की’

कविता महज कुछ शब्दों को लिपिबद्ध करना या मन में आए विचारों को लयात्मक रूप देना भर नहीं है बल्कि यह समाज के प्रति जिम्मेदारी है। कविता के जरिए या कहें की साहित्य की किसी भी विद्या के जरिए रचनाकार समाज से रूबरू होने और समाज को आइना दिखाने जैसे दोनों ही काम करते हैं । कभी वह अपने लेखन से समाज को उसकी असलियत से वाकिफ  कराता है तो कभी समाज में व्याप्त रूढ़ियों को सामने लाकर बदलाव का वाहक बनने का प्रयास करता है।


सत्तर के दशक में जन्मी हमारी पीढ़ी इस मामले में सौभाग्यशाली है कि उसने सामाजिक परंपराओं को भी जिया है तो सतत बदलाव की प्रक्रिया की साक्षी भी रही है। इस पीढ़ी को कंडे और चूल्हे का भान भी है तो गैस से लेकर इंडक्शन और उसके बाद तक के आविष्कारों के उपयोग का तरीका भी आता है। यही कारण है कि पेशे से हिंदी की सम्मानित शिक्षिका और कवियत्री डॉ मोना परसाई का कविता संग्रह ‘आरसी अक्षरों की’ हमें अपने और अपनेपन के इन्हीं अहसासों से जोड़ती है । यह हमें गांव, घर, चौपाल से लेकर महानगरों तक की प्रवाहमान यात्रा कराता है।


‘आरसी अक्षरों की’ सही मायने में भूत\भविष्य\वर्तमान के बीच का सेतु है। खुद लेखिका ने ‘अपनी बात’ में लिखा है कि हो सकता है कि यह कविता संग्रह दुनिया को देखने का केवल मेरा ही नजरिया भर हो या भड़ास निकालने का तरीका लेकिन समाज में आ रहे बदलाव की संवेदना तंतुओं को उभारने की एक कोशिश जरूर है। 


‘आरसी अक्षरों की’ कविता संग्रह में हम जगह-जगह डॉ मोना परसाई की इन्हीं संवेदनाओं से रूबरू होते हैं। कुल 41 कविताओं का यह गुलदस्ता अपने अंदर समाज के विभिन्न रंग और खुशबू समेटे है। यहां प्यार भी है, इंतजार भी है, बच्चे भी हैं, खुशबू  भी है, रिश्ते भी हैं, प्रेम भी है, युद्ध और यादें भी। हर कविता अपने आप में एक संपूर्ण अध्याय है जो अपनी चंद पंक्तियों में गागर में सागर की तरह बहुत कुछ कह जाती है। यदि आप लेखन में ‘बिटवीन द लाइन’ को समझने की महारत रखते हैं तो कविताएं आपके लिए 41 अध्याय से काम नहीं है। 


डॉ मोना परसाई ने अपने आसपास बिखरे आंचलिक और देशज शब्दों के जरिए कविताओं में देसीपन का छौंक लगाकर अपनापन सा ला दिया है। मसलन ‘चलो कहीं ठहरें’ कविता में वे लिखती है:  


मिट्टी के घरौंदों में

आशियाना सजाते 

चलो कहीं ठहरे 

अंतर की सीपी में 

सुख के मोती टटोले 

कई रातें गयी सोते हुए

भी जागते सपनों की धुंध में 

अनजाने अक्स तलाशते

चलो कहीं ठहरे। 


वैसे तो संग्रह की सभी कविताएं चमकते मोती की माला की तरह है लेकिन कई कविताएं ऐसी है जो हमें अंदर तक झकझोर देती हैं और सोचने पर मजबूर करती है। ‘लड़की नदी है’, कविता में वे लिखती हैं: 


बहना जानती है, बहना चाहती है 

बंधन उसका स्वभाव कभी नहीं रहा 

फिर भी बांधा है तुमने उसे

कभी नैतिकता के पहाड़ों के घेरे में

कभी उसकी अपनी 

नाजुक अनुभूतियों के पास में 

परंपराओं के ऊंचे-ऊंचे बांध बनाकर


यह कविता हमें बेटियों को बराबरी का दर्जा देने उन्हें पंख लगाकर उड़ने और खुले आसमान में अपनी मंजिल चुनने का संदेश देती है। कविता के अंत में वह समाज को चुनौती देते हुए स्पष्ट संदेश  देती हैं:


लड़की चिड़िया या तितली नहीं है।

नदी है,

वेग से भरी हुई नदी।। 


ऐसी ही एक और भावनात्मक कविता ‘इंतजार’ में भी गौरैया के बहाने वे बच्चों के इंतजार में अकेलापन काट रहे मां-बाप की भावनाओं को उजागर करते हुए लिखती हैं:


गौरैया जानती है 

उड़ना सीखने पर परिंदे 

नहीं लौटा करते घोंसलों की ओर 

पर बूढ़ी आंखें समझते हुए भी 

नहीं छोड़ती हरकारे का इंतजार 


भावनाओं के दरिया में बहाते हुए ‘यादें’ कविता में वे लिखती हैं:


बस यादें होती हैं, 

चिताओं की तपिश भी,

उन्हें नहीं जला पाती,

बल्कि वे और भी चमक उठती हैं।


डॉ मोना परसाई की भाषा में नमक भी है, गमक भी है, माटी की सोंधी खुशबू भी है और महानगरों के मॉल में व्याप्त नए दौर की सुगंध भी.. जो हमें, हमारे परिवार से भी जोड़ती है और समाज से भी। पुस्तक का सुंदर कवर और सुस्पष्ट छपाई भी प्रशंसनीय है। कुल मिलाकर यह एक पठनीय, संग्रहणीय और पहली पुस्तक होने के नाते सराहनीय भी है। यदि आप कविताओं के मुरीद हैं तो आरसी शब्दों की जरूर पढ़िए… यह आपको निश्चित ही अपनेपन का एहसास कराएगी।


पुस्तक: आरसी अक्षरों की

विधा: कविता संग्रह

रचनाकार: डॉ मोना परसाई 

पृष्ठ: 81

मूल्य: 200 रुपए

प्रकाशक: लोक प्रकाशन, भोपाल


#किताबीकीड़ा  #आरसीअक्षरोंकी 


कुत्ते की राखी…कीमत सुनकर आप चौंक जाएंगे!

हाल ही में कृति सेनन से जुड़े एक राखी विज्ञापन को लेकर खूब विवाद हुआ। विज्ञापन में कृति के कपड़ों से लेकर उसके कथित सांस्कृतिक संदेश तक पर ब...