बुधवार, 28 जनवरी 2026

डमरू,मृदंगम और नगाड़ा पर बैठकर लीजिए भारतीय संगीत का आनंद..!!


बाँसुरी, डमरू, एकतारा, इसराज, मृदंगम्, नगाड़ा जैसे नाम सुनकर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन कानों में गूंजने लगी न…तो तैयार रहिए, कल नईदिल्ली में विजय चौक पर आपको इन्हीं नामों पर बैठकर इनकी ही धुनों को सुनना है..और केवल यही नहीं, पखावज, संतूर, सारंगी, सारिंदा, सरोद, शहनाई, सितार, सुरबहार, तबला और वीणा भी आपकी बैठक व्यवस्था का हिस्सा होंगे। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आपको इन वाद्य यंत्रों पर बिठाया जाएगा बल्कि पहली बार इस वर्ष बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए विजय चौक पर बैठने के लिए बनाए गए एंक्‍लोज़र्स के नाम भारतीय वाद्य यंत्रों के नाम पर रखे गए हैं ताकि आम लोगों को ज्यादा म्यूजिकल एवं अपनापन महसूस हो।

गौरतलब है कि बीटिंग द रिट्रीट एक पुरानी सैन्य परंपरा है। पहले युद्ध के समय शाम होते ही बिगुल बजाकर सैनिकों को संकेत दिया जाता था कि लड़ाई रोक दी जाए और सभी अपने शिविरों में लौट आएं। यही परंपरा अब बीटिंग द रिट्रीट समारोह के रूप में निभाई जाती है। अब हर साल विजय चौक पर 29 जनवरी को होने वाला ‘बीटिंग रिट्रीट’ गणतंत्र दिवस समारोहों के समापन का प्रतीक होता है । इसे सेनाओं की एकता, अनुशासन और गौरव का प्रतीक माना जाता है।

बीटिंग रिट्रीट के दौरान भारतीय थल सेना, भारतीय नौसेना, भारतीय वायु सेना तथा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के बैंड मनमोहक और जोशीली धुनें प्रस्तुत करते हैं। इस अवसर पर कल राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु, उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ साथ अन्य केंद्रीय मंत्री, अधिकारी तथा आम नागरिक मौजूद रहेंगे।

हर साल की तरह, इस वर्ष भी बीटिंग रिट्रीट समारोह में भारतीय धुनों का बोलबाला रहेगा। पिछले कुछ सालों से इस प्रतिष्ठित समारोह में भारतीय धुनों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसे हम भारतीय संगीत के महत्व को अंतरराष्ट्रीय पटल पर प्रस्तुत करने का एक तरीका भी कह सकते हैं।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार समारोह की शुरुआत संयुक्‍त बैंड द्वारा ‘कदम कदम बढ़ाए जा’ की प्रस्तुति से होगी। इसके बाद पाइप्स एंड ड्रम्स बैंड द्वारा ‘अतुल्य भारत’, ‘वीर सैनिक’, ‘मिली जुली’, ‘नृत्य सरिता’, ‘मरूनी’ तथा ‘झेलम’ जैसी मधुर धुनें प्रस्तुत की जाएंगी। वहीं केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के बैंड ‘विजय भारत’, ‘हथरोही’, ‘जय हो’ और ‘वीर सिपाही’ की प्रस्तुति देंगे।

भारतीय वायु सेना के बैंड द्वारा ‘ब्रेव वॉरियर’, ‘ट्विलाइट’, ‘अलर्ट’ और ‘फ़्लाइंग स्‍टार’ धुनें प्रस्तुत की जाएंगी, जबकि भारतीय नौसेना का बैंड ‘नमस्‍ते’, ‘सागर पवन’, ‘मातृभूमि’, ‘तेजस्‍वी’ और ‘जय भारती’ की प्रस्तुति देगा। इसके पश्चात भारतीय थल सेना का बैंड ‘विजयी भारत’, ‘आरम्‍भ है, प्रचंड है’, ‘ऐ वतन, ऐ वतन’, ‘आनन्‍द मठ’, ‘सुगम्‍य भारत’ तथा ‘सितारे हिन्‍द’ की मधुर धुनें प्रस्तुत करेगा।

इसके उपरांत संयुक्‍त बैंड्स द्वारा ‘भारत के शान’, ‘वंदे मातरम्’ और ‘ड्रमर्स कॉल’ की धुनें प्रस्तुत की जाएंगी। अंत में बुगलरों द्वारा सदाबहार और सर्वप्रिय धुन ‘सारे जहाँ से अच्छा’ की प्रस्तुति के साथ इस भव्य आयोजन का समापन होगा। इस दौरान विजय चौक मनमोहक रोशनी से जगमगा उठेगा। इसके साथ ही गणतंत्र दिवस समारोह का समापन हो जाएगा।

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मंगलवार, 27 जनवरी 2026

उत्सव से ज्यादा आफत है बर्फबारी


इन दिनों टीवी और अखबारों के समाचारों में आप हिमाचल, उत्तराखंड या कश्मीर में हो रही बर्फबारी का मज़ा ले रहे पर्यटकों को देख रहे होंगे। वे कैसे एक दूसरे पर बर्फ फेंक रहे हैं, नाच रहें हैं और उत्सव मना रहे हैं। आप का मन भी मचल रहा होगा कि काश हम भी जल्दी से वहां पहुंच जाए और खूब बर्फ के गोले बनाकर खेले..लेकिन यह टीवी पर देखने में ही अच्छा लगता है क्योंकि पहाड़ों पर बर्फबारी अवसर या उत्सव भर नहीं लाती बल्कि आफत तथा आपदा भी लाती है।

पहाड़ी इलाकों में सर्दियों में बर्फबारी हमेशा एक जादुई दृश्य रचती है। आसमान से गिरती सफेद रुई जैसी बर्फ, पेड़ों पर जमी बर्फ की चमकदार परत, और चारों ओर फैली सफेद चादर जैसी बर्फ… ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने खुद एक श्वेत कथा रच दी हो लेकिन इस मनभावन सुंदरता के पीछे कई कड़वी कहानियां छिपी होती हैं, जो यहां रहने वाले या फिर इस बर्फबारी को भुगतने वाले ही समझ पाते हैं। पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी के दौरान और उसके बाद कई चुनौतियां आती हैं, जैसे फिसलन भरी सड़कें, ठंड से स्वास्थ्य जोखिम, बिजली-पानी की कटौती, खाने पीने की दिक्कत,रोजगार और यात्रा में बाधाएं।


सबसे पहली और बड़ी आफत आती है सड़कों पर। बर्फबारी के बाद सड़कें पूरी तरह से ब्लॉक हो जाती हैं। वाहन फिसलने लगते हैं, यातायात थम जाता है, और लोग घंटों और कई बार तो दिनों तक फंसे रहते हैं। कल्पना कीजिए, आप सपरिवार किसी पहाड़ी स्थल पर बर्फबारी का मज़ा लेकर शहर लौट रहे हों और बीच रास्ते में जमा बर्फ आपका रास्ता रोक दे। आपके पास महज एक दो बॉटल पानी और कुछ स्नैक्स है..घंटे/आधे घंटे के उत्साह के बाद न पानी बचता है और न ही खाना। फिर बच्चे रोने लगते हैं, भूख बढ़ जाती है एवं ठंड से आप कांपने लगते हैं। आखिर जाम में फंसी गाड़ी में कितनी देर तक हीटर/ब्लोअर चलाएंगे। आपको भी आगे के सफर के लिए ईंधन की चिंता सताने लगेगी। ऐसी सूरत में आप खुद को असहाय महसूस करने लगते हैं। 


यह न केवल यात्रा की समस्या है, बल्कि एक भावनात्मक बोझ है – घर की याद, अपनों की चिंता और अनिश्चितता का डर। पहाड़ों पर अक्सर पर्यटक उत्साह में आते हैं, लेकिन आमतौर पर परेशान होकर वापस जाते हैं। वहीं, स्थानीय लोग तो रोज़ी रोटी के संकट से जूझने लगते हैं। बर्फ उनकी आजीविका को भी प्रभावित करती है। दुकानें बंद, व्यापार ठप, और रोजगार की कमी – यह सब मिलकर एक निराशा की लहर पैदा करता है। 

दूसरा बड़ा संकट यह आता है कि बर्फबारी से बिजली और पानी की किल्लत होने लगती है। बर्फ से बिजली के तार टूट जाते हैं, ट्रांसफॉर्मर फेल हो जाते हैं और घंटों (दूरदराज़ के इलाकों में कई दिनों तक)अंधेरा छा जाता है। रातें ठंडी और लंबी हो जाती हैं, न हीटर और न ही गर्म पानी.. सब्ज़ी नहीं,सामान नहीं,दूध नहीं,ब्रेड नहीं…अलाव के लिए लकड़ी/कोयला भी कब तक चलेगा। स्थानीय लोगों की आंखों में यह डर साफ दिखने लगता है कि क्या कल सुबह तक बिजली आएगी? क्या पानी की सप्लाई बहाल होगी? 

पहाड़ों में रहने वाले लोग प्रकृति के साथ जीते हैं, लेकिन जब वही प्रकृति क्रूर हो जाती है, तो अवसर वास्तव में आपदा बन जाता है। मरीज अस्पताल तक पहुंचने में संघर्ष करते हैं, और कभी-कभी तो जीवन की कीमत भी चुकानी पड़ जाती है। भावनात्मक रूप से देखें तो यह बर्फबारी एकाकीपन और अलगाव बढ़ाती है। परिवार बिखर जाते हैं, क्योंकि कुछ लोग शहरों में फंस जाते हैं। फोन नेटवर्क कमजोर हो जाता है, और अपनों से संपर्क टूट जाता है। ये सब मिलकर एक गहरी उदासी पैदा करते हैं। 


पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी की परेशानियां हमें याद दिलाती हैं कि प्रकृति की सुंदरता हमेशा मीठी नहीं होती इसलिए बचाव एवं सावधानी ही एकमात्र रास्ता है।  सबसे पहले ऐसे किसी भी इलाके में जाने के पहले मौसम अपडेट चेक करें और बर्फबारी का अलर्ट देखकर अनावश्यक यात्रा टाल दें । इसी तरह, गाड़ी में स्नो चेन जरूर रखें और फिसलन वाली सड़कों पर लगाएं। बिना चेन के ड्राइविंग से बचें। इसके बाद भी, धीरे-धीरे ड्राइव करें, अचानक ब्रेक या शार्प टर्न से बचें। यदि पैदल चल रहे हैं तो फुटपाथ पर चलें । पैदल चलते समय सड़क पर ग्रिप वाले जूते पहने क्योंकि इस दौरान सड़क पर ब्लैक आइस का खतरा सबसे ज्यादा होता है। काली बर्फ दिखाई नहीं देती लेकिन आपकी हड्डी टूटने जैसा दर्द देने वाली होती है।

इसी तरह घर में दरवाजे-खिड़कियां अच्छे से बंद रखें। थर्मल कपड़े, वूलन ब्लैंकेट और सुरक्षित हीटर का इस्तेमाल करें। टॉर्च, कैंडल, पावर बैंक, अतिरिक्त बैटरी साथ रखें। पानी की बोतलें पहले से भरकर रखें क्योंकि नलों के पाइप का पानी जम जाता है। खाने-पीने का स्टॉक तो कम से कम  4-5 दिनों के लिए कर ही ले।

इस सबसे बढ़कर सबसे पहले स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सुरक्षा का खास ध्यान रखें मसलन लेयर में कपड़े पहनें  जैसे थर्मल, वूलन स्वेटर, जैकेट, दस्ताने, टोपी, मफलर और वाटरप्रूफ जूते भी । ठंड में गुनगुना पानी पीते रहें। ठंड लगने पर तुरंत गर्म जगह पर जाएं। कंपकंपी, सुन्न होना, थकान जैसे लक्षण दिखें तो डॉक्टर से संपर्क करें। इन सभी सावधानी एवं उपायों के बाद ही बर्फबारी का आप उत्सव की तरह इसका आनंद ले सकते हैं वरना आफत भुगतने के लिए तैयार रहें।


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

देवभूमि के बाग़ में (सफेद) दुशाला ओढ़े खड़ी है..!!


क्वीन ऑफ हिल्स शिमला के साथ साथ देवभूमि हिमाचल में नए साल की आज 23 जनवरी ने लोगों की खोई मुस्कान वापस लौटा दी है। यह एक ऐसा दिन है जब आसमान ने अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलटे और सफ़ेद स्याही से नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया..ऐसा अध्याय जिसे हर कोई पढ़ना चाहता है..स्थानीय लोग, पर्यटक, होटल व्यवसाई और स्वयं प्रकृति भी। 

सुबह-सुबह जब लोगों की आँखें खुलीं, तो उनकी खिड़की के शीशे पर कोई अनजान बच्चा उँगली से दिल नहीं बना रहा था—बल्कि बादल खुद बर्फ के छोटे-छोटे चमकदार सफेद टुकड़े बिखेर रहे थे। शहर का मशहूर रिज मैदान (आम लोगों के लिए मॉल रोड), जो कल तक धूप में अपनी पुरानी कॉलर वाली कोट पहने उदास सा था, आज सुबह-सुबह एकदम सफ़ेद शॉल ओढ़े खिलखिला रहा था—जैसे कोई देवदूत या परी सफेद दुशाला ओढ़े आ गई है और सबकी नज़रें उसी पर टिक गई हों। 


मॉल रोड पर आज बर्फ़ के बीच चाय की केतली से अदरक-इलायची की खुशबू ज्यादा मनमोहक लग रही है। स्कूटर, कार और घरों की लाल-हरी छतों ने जगमग सफेदी भरा दुपट्टा ओढ़ लिया है । बर्फ़ की ठंडक पाकर कई वाहन चैन की नींद सो रहे हैं और मालिक से शायद फुसफुसाकर कह भी रहे हैं.. "अरे पहले मेरी सफेद चादर तो हटाओ!" सड़कें पर चुपचाप पर्यटकों के स्वागत के लिए व्हाइट कार्पेट बिछ गया है—जैसे कोई शायर कह गया हो कि सफेदी की ख़ामोशी भी कभी इतनी सुंदर हो सकती है।

मनाली,कुफ़री, ठियोग और नारकंडा तो पहले से ही तैयार बैठे थे— स्कूल के उन पढ़ाकू बच्चों की तरह जो एग्ज़ाम से पहले ही किताब खोलकर सिलेबस पूरा कर बैठ जाते हैं लेकिन शिमला शहर की संगत ने उनको कुछ बरगला दिया था और क्वीन ऑफ हिल्स ने सूखे में उनका नेतृत्व  भी किया। तीन महीने तक सिलेबस से बाहर सूखे मौसम को पढ़ने पर मजबूर कर दिया। लोगों को बारिश बर्फबारी के लिए भरपूर इंतज़ार करवाया। यहां तक कि स्थानीय लोगों के साथ साथ पर्यटकों को यह पूछते पूछते थका दिया था कि "कब आएगी बर्फ?"...और फिर एकदम से इतनी बर्फ उड़ेल दी—जैसे कोई हीरो लास्ट सीन में एंट्री मारता है या वैसे ही जैसे लास्ट बॉल पर सिक्स मारकर कोई बल्लेबाज टीम को जिता देता है।


प्रकृति ने यह खेल इतनी खूबसूरती से रचा कि सब का गुस्सा काफूर हो गया । पर्यटक अब फोटो खींच नहीं रहे, बल्कि फोटो में खुद को बर्फ के साथ समेटने की कोशिश कर रहे हैं। बच्चे बर्फ़ में लोट-पोट होकर स्नोबॉल बना रहे हैं, और रोमांटिक जोड़े हाथ में हाथ डाले एक दूसरे को निहार रहे हैं—जैसे बर्फ़ ने उन्हें रोमांस एवं गर्मजोशी से भर दिया हो। यह बर्फ सिर्फ़ ठंड नहीं लाई, एक तरह की सामूहिक स्मृतियां भी समेट लाई है। सब कुछ इस सफ़ेद चादर के नीचे से फिर से जीवित हो उठा है।

शिमला आज फिर वही पहाड़ों की पुरानी रानी बन गई है— अब उसने सफ़ेद गाउन पहन लिया है, और आसमान उसके लिए बार-बार फूल बरसा रहा है। तो अगर आप भी ठिठुरते हुए कहीं गर्म कम्बल में बैठे हैं, तो एक बार खिड़की खोलकर देखिए—कहीं शिमला की बर्फ़ आपकी तरफ़ भी कोई छोटा-सा संदेश तो नहीं भेज रही? और हाँ, अगर मॉल रोड पर हैं तो हाथ में गरमागरम चाय का एक गर्म प्याला ज़रूर थाम लीजिए क्योंकि इससे बर्फ़ देखने का मज़ा दोगुना जाएगा..आखिर, गर्म हाथ ही तो दिल की गर्मजोशी का मार्ग प्रशस्त करते हैं । 

परामर्श: यह खूबसूरत दृश्य महसूस करने के लिए मुकम्मल तैयारी रखिए..गर्म कपड़े, जूते, छाता वगैरह और हां, बर्फ की फिसलन से जरूर बचिए क्योंकि दिल की फिसलन की तरह बर्फ की फिसलन भी ऐसे गहरे दर्द दे जाती है तो सालों साल इस सीजन की याद दिलाते हैं।


रविवार, 18 जनवरी 2026

देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क पर सफ़र !!


बर्फ के बीच हाड़ कंपाती ठंड, मूसलाधार बारिश, आए दिन हो रहे भूस्खलन, पहाड़ से गिरते पत्थरों के बीच न डायनामाइट, न जेसीबी, न कोई ड्रिल मशीन..बस छैनी- हथौड़ी…और इंसानी हौंसला। मौत के साए में दिन रात बिना रुके काम करते हुए 18 हज़ार मज़दूरों ने मौसम की बेदर्दी और पहाड़ की कठोरता पर जीत हासिल कर दिखाई और बना दी देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क। इसी सड़क पर हमें एनाकोंडा के चट्टानी रूप से भी रूबरू होने का मौका मिलता है।

हम बात कर रहे हैं राष्ट्रीय राजमार्ग-5 की। यह केवल एक सड़क भर नहीं, बल्कि इतिहास, साहस और रोमांच की जीवित धरोहर  है। यह इंसानी जिद का प्रमाण है। जिसमें महज हाथों ने असंभव को संभव बनाते हुए न केवल मजबूत पहाड़ों को काट डाला बल्कि झुकने पर भी मजबूर कर दिया। कभी हिंदुस्तान-तिब्बत रोड कहलाने वाली यह सड़क कालका से शुरू होकर शिमला, रामपुर, किन्नौर और शिपकिला दर्रे तक जाती है। लगभग 450 किलोमीटर लंबी यह पहाड़ी राह सतलुज नदी के साथ-साथ चलती हुई हिमालय के सबसे दुर्गम और सुंदर इलाकों से गुजरती है।

यह एक ऐसी सड़क है, जो हमें प्रकृति की विराटता, मानव साहस और इतिहास की गहराइयों से जोड़ देती है। सड़क कभी इतनी संकरी हो जाती कि लगता—अब आगे कुछ नहीं है। एक के बाद एक खतरनाक अंधे मोड़, सीधी खड़ी चट्टानों, सैकड़ों फीट नीचे पूरे वेग से बहती सतलुज नदी और सामने से एकाएक आ जाने वाले वाहनों के कारण हाथ अनायास ही स्टीयरिंग पर कस जाते हैं और सांसें खुद-ब-खुद धीमी हो जाती हैं।

हिमाचल प्रदेश की इस अनूठी सड़क की कहानी शुरू होती है 1850 में जब भारत पर अपने शासन प्रशासन की पकड़ मजबूत करने के बाद अंग्रेज सरकार ने व्यापार व्यवसाय पर अपना ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। तब तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने भारत को तिब्बत से जोड़ने के लिए इस महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना को हाथ में लिया। ब्रिटिश हुकूमत का प्राथमिक उद्देश्य भारतीय वस्तुओं को तिब्बत के रास्ते आगे तक बेचना और वहां से जरूरी सामान की भारत तक आवाजाही सुनिश्चित करना था। कहा तो यह जाता है कि खुद लॉर्ड डलहौजी ने इस भारत तिब्बत सड़क की शुरुआती रूपरेखा (डीपीआर) तैयार की और फिर इस सड़क का ब्लूप्रिंट ब्रिटिश आर्मी के कमांडर इन चीफ सर चार्ल्स नेपियर को सौंपा। इसमें मेजर ब्रिग्स की भी अहम भूमिका थी।

इस परियोजना पर अमल आसान नहीं था क्योंकि 1850 में जब इस सड़क का निर्माण शुरू हुआ था तब न तो आज की तरह पहाड़ों का सीना चीर देने वाली मशीन थीं और न ही ब्लास्टिंग तकनीक। तब केवल हाथों में छैनी और हथौड़ी लिए

आत्मविश्वास से भरपूर इंसान थे। अंग्रेजों ने सड़क निर्माण में 18 हजार भारतीय मजदूरों को अनजान से पहाड़ के सामने खड़ा कर दिया। जान की परवाह किए बिना इन मजदूरों ने अपने हाथों से विशाल पहाड़ काट दिया। उन्होंने न तो कड़कड़ाती ठंड की परवाह की,न बर्फबारी उनका हाथ रोक पाई और न ही भूस्खलन और मूसलाधार बारिश से उनके हौसलों पर कोई फर्क पड़ा। इस दुर्गम लक्ष्य को हासिल करने के दौरान कई श्रमिकों को अपना बलिदान देना पड़ा। कभी पहाड़ से गिरते भारी भरकम पत्थरों के नीचे दबकर, तो कभी प्राकृतिक आपदाओं का शिकार बनकर 122 मजदूरों को जान गंवानी पड़ी। इनकी स्मृति में जेओरी में एक गुमनाम सा स्मारक भी है।


वैसे तो यह पूरी सड़क अपने आप में मानवीय कुशलता,इंजीनियरिंग और श्रम का उत्कृष्ट नमूना है लेकिन इसमें भी सबसे खास है तरंडा ढांक क्योंकि किन्नौर जिले के इस इलाके में करीब ढाई किलोमीटर पहाड़ को बीच से काटकर सड़क बनाई गई है और पहाड़ का यह टुकड़ा विशाल एनाकोंडा के सिर की तरह नज़र आता है। यहां पहाड़ ही सड़क है और पहाड़ ही आपकी छत। इसके बीच से निकलती गाड़ियां ऐसी लगती हैं जैसे पहाड़ ने अपना जबड़ा खोलकर उन्हें रास्ता दिया हो। सड़क के इस अविश्वसनीय भाग के निर्माण का श्रेय एक भारतीय इंजीनियर राजबहादुर सिंह को दिया जाता है। हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग में कार्यरत राजबहादुर सिंह ने हिमाचल के कई दुर्गम क्षेत्रों में सड़कों का जाल फैलाया।

इस सड़क के निर्माण में एक स्थानीय व्यक्ति बाबा भलकू का भी अतुलनीय योगदान बताया जाता है। बाबा भलकू को पहाड़ों की बनावट और भूगोल ज्ञान का गहरा अनुभव था। उन्होंने हिंदुस्तान-तिब्बत रोड के सर्वेक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह है कि मशोबरा के ऊपर एक सड़क का नाम भी उनके सम्मान में भलकू रोड रखा गया है।

सड़क को बनने में भले ही कई साल में लग गए लेकिन तब से अब तक यह सड़क हिमाचल को सालाना लाखों करोड़ों रुपए का व्यापार देती आ रही है।  हम इसे हिमाचल की आर्थिक जीवन रेखा या इकोनॉमिक लाइफलाइन ऑफ हिमाचल भी कह सकते हैं। इस सड़क ने न केवल हिमाचल प्रदेश को व्यापार से जोड़ा बल्कि पूरे उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयां प्रदान की।  


दरअसल,उस समय ब्रिटिश हुकूमत का मकसद तिब्बत तक अपने व्यापार और प्रभाव को बढ़ाना था। तिब्बत के व्यापारी उस समय रेशम, ऊन, नक्काशीदार वस्तुएं,चमड़े का सामान,नमक और बेशकीमती मखमल लाते थे जबकि भारत के व्यापारी चावल,तेल,फल,सूखे मेवे और  किन्नौरी राजमा सहित तमाम चीजें वहां भेजते थे । शिमला जिले के रामपुर में अभी भी लगने वाला पारंपरिक लवी मेला इस व्यापार का गढ़ होता था। लवी मेला आज भी हिमाचल प्रदेश के सबसे पुराने मेलों में शामिल है। इस सड़क ने परस्पर व्यापार को नई ऊंचाइयां प्रदान की और इसी वजह से तब इसे लोगों ने सिल्क रुट ऑफ़ द हिमालय कहना भी शुरू कर दिया था।

इस सड़क की असली उपयोगिता 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान साबित हुई। बताया जाता है कि उस समय भारतीय सेना के पास सीमावर्ती इलाकों तक पहुंचने का यही एकमात्र रास्ता था और गोला बारूद से लेकर जवानों एवं राशन भेजने के लिए भी इसी रास्ते का इस्तेमाल हुआ। तब यह सड़क देश के लिए रणनीतिक जीवन रेखा बन गई थी। 


युद्ध के दौरान इस सड़क के महत्व को देखते हुए इसके रखरखाव की जिम्मेदारी सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को सौंप दी गई । वैसे इस सड़क की मजबूती और शानदार रखरखाव के महत्व का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सन 2000 में किन्नौर में सतलुज नदी में आई भयंकर बाढ़ के दौरान तमाम सड़कें टूट गई लेकिन यह सड़क लोगों की उम्मीद और राहत का जरिया बनी रही।

यह सड़क अब किन्नौर के सबसे मीठे, क्रिस्पी और लज़ीज़ सेब और मटर का मीठा स्वाद देश के अन्य इलाकों तक पहुंचाने का माध्यम है। यह हमें देश के सबसे अच्छे राजमा और चिलगोजा उपलब्ध कराती है। आर्थिक एवं रणनीतिक महत्व के कारण यह सड़क देश की किसी भी आधुनिक सड़क से पीछे नहीं है। अब जब भी आप इस सड़क से गुजरे तो हजारों श्रमिकों के परिश्रम और अनुकरणीय इंजीनियरिंग को याद करना नहीं भूलें। हिंदुस्तान-तिब्बत रोड पर चलना सिर्फ ड्राइव नहीं है—यह हिमालय से आमने-सामने संवाद है। अगर आप रोमांच चाहते हैं, डर से दोस्ती करना चाहते हैं और इतिहास को महसूस करना चाहते हैं तो इस सड़क पर एक बार ज़रूर चलिए।

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व पर सनातन का जयघोष

सनातन संस्कृति का जयघोष करती अरब सागर की लहरें, हवा में 'हर-हर महादेव' के जयकारों के बीच आस्था का सैलाब लेकर आराधना में जुटे हजारों श्रद्धालु, डमरूओं की मधुर ध्वनि के साथ 'ओम नमः शिवाय' के जाप से सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर पूरा परिसर, महादेव के स्वर्ण कलश की आभा को सौ गुना बढ़ाती दिलकश साज सज्जा एवं इन सभी के बीच खड़ा एक ऐसा अनूठा, दिव्य,भव्य और प्रतिष्ठित मंदिर… जो समय की हर चुनौती को गरिमा के साथ पार करता आ रहा है।

हम बात कर रहे हैं देवों के देव महादेव के सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ की और यहां आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व की। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर न सिर्फ भारतीय सांस्कृतिक विरासत में अहम धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक है। यह मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि विनाश और पुनर्निर्माण की, आस्था और संघर्ष की एक जीवंत कहानी है ।   सोमनाथ मंदिर की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे सीधे पौराणिक काल से जुड़ी हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक चंद्रमा ने खुद इस मंदिर की स्थापना की थी, ताकि शिव की कृपा पाकर श्राप से मुक्ति पा सकें। यह क्षेत्र आस्था के लिहाज से इतना अहम है कि भगवान कृष्ण ने भी यहीं से लीला समाप्त कर स्वर्गारोहण किया था ।

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में कहा गया है कि,  ‘सौराष्ट्रे सोमनाथं च, श्री शैले मल्लिकार्जुनम्, उज्जयिन्यां महाकालम् ॐ कारम अमलेश्वरम्।’ अर्थात् जब भारत के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों का वर्णन होता है, तब सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। यह भारत की संस्कृति में सोमनाथ के अग्रिम स्थान तथा उसके अविनाशी, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व को दर्शाता है। 

सोमनाथ मंदिर की अपार संपदा, श्रद्धालुओं की इस मंदिर पर आस्था, अरब सागर के किनारे देश के रक्षा द्वार के रूप में इसकी सशक्त मौजूदगी और सनातन की मजबूत पहचान विदेशी आक्रमणकारियों की आंखों में हमेशा गड़ती रही । वे बार बार हमले कर भारतीय संस्कृति को नेस्तानाबूद करने का दुष्प्रयास करते रहे । सबसे पहले 1026 में आज से एक हजार साल पहले अफगानिस्तान महमूद गजनवी ने लूट-पाट के लिए मंदिर पर बर्बर हमला किया और लाखों करोड़ों का सोना, चांदी, हीरे जवाहरात लूट लिए। 

यह एक ऐसा वर्ष था जो इतिहास की किताबों में काले अक्षरों से दर्ज है एवं इसी ने मौजूदा स्वाभिमान पर्व की नींव रखी। लेकिन गजनवी का वहशीपन न सोमनाथ मंदिर का कुछ बिगाड़ पाया और न ही भारतीय समाज की आस्था को डिगा पाया। मात्र कुछ दशकों में, गुजरात के राजा भीमदेव सोलंकी ने इसे फिर से वैभवशाली स्वरूप प्रदान कर दिया ।

मंदिर में फिर लूट का सिलसिला चल पड़ा। करीब दर्जन भर से ज्यादा बार मंदिर पर हमले हुए। कभी अलाउद्दीन खिलजी, दिल्ली सल्तनत के प्रतिनिधि जफर खान, गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा,  कभी औरंगजेब, तो कभी कोई हमले करते रहे, मंदिर की संपदा लूटते रहे और भारत की सनातन परंपरा को रौंदने का कुत्सित प्रयास करते रहे। लेकिन हर बार स्थानीय राजाओं और आम लोगों ने तन मन धन से मंदिर का पुनर्निर्माण कर यहां की गौरवशाली परंपरा को जीवित रखा। 

815 ईस्वी में प्रतिहार सम्राट नागभट्ट द्वितीय ने, 1026-42 में चालुक्य राजवंश के भीमदेव सोलंकी ने, 1169 में राजा कुमारपाल ने, 1308 में सौराष्ट्र के राजा महिपाल प्रथम तो 1783 में अहिल्याबाई होलकर ने मंदिर के निर्माण में बढ़ चढ़कर भूमिका निभाई। फिर 1951 में सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रयासों से सोमनाथ मंदिर को वर्तमान स्वरूप मिला। खास बात यह है कि मौजूदा स्वरूप के भी अब 75 वर्ष पूरे हो गए हैं।


इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि उन दिनों लुटेरों की तलवारें जितनी घृणा से चमकतीं, भक्तों की प्रार्थनाएँ और मजबूत हो जातीं। सोमनाथ मंदिर की  गौरवशाली विरासत इस बात का प्रतीक है कि सच्ची शक्ति सोने-चांदी में नहीं, बल्कि लोगों की एकता में है। यही कारण है कि जनवरी 2026 में 1000 साल पहले के उस हमले को याद करते हुए ' सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' मनाया गया। यह एक ऐसा उत्सव है जो हार नहीं, बल्कि पुनरुत्थान की,आत्मसम्मान बनाए रखने और हमलावरों के सामने डटकर खड़े रहने की कहानी सुनाता है।

गुजरात में 8 जनवरी से 11 जनवरी (बाद में बढ़ाकर 15 जनवरी) तक आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान दिनभर मंदिर परिसर हर हर महादेव के जयघोष से गूंजता रहा तो शाम को तीन हजार ड्रोन ने आकाश में शिवलिंग, त्रिशूल, भगवान शिव का तांडव, वीर हमीरजी गोहिल की छवि, अहिल्याबाई होलकर का सम्मान और सरदार पटेल की पुनर्निर्माण पहल जैसी स्वर्णिम विरासत से आसमान को रंग दिया । वहीं, शानदार आतिशबाजी ने समुद्र तट को रंग-बिरंगी रोशनी से भरने के साथ साथ आम लोगों को यह विश्वास दिलाया कि सोमनाथ की आभा को कोई कम नहीं कर सकता । 

11 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं 'शौर्य यात्रा' का नेतृत्व किया। 108 घोड़ों के साथ निकली यह शोभायात्रा वीर हमीरजी गोहिल और वेगड़ाजी भील जैसे उन अनगिनत वीरों को समर्पित थी, जिन्होंने मंदिर की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया था । बाद में, प्रधानमंत्री ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह पर्व विनाश का नहीं, बल्कि हजार वर्षों की उस यात्रा का है जहां सोमनाथ बार-बार उठ खड़ा हुआ। गजनवी चला गया, लेकिन सोमनाथ आज भी अडिग खड़ा है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ विकास और विरासत का आदर्श उदाहरण है। आज का सोमनाथ सिर्फ मंदिर नहीं, एक संपूर्ण तीर्थक्षेत्र है। 

 शिखर पर 1,666 स्वर्ण कलशों तथा 14,200 ध्वजाओं के साथ सोमनाथ मंदिर तीन पीढ़ियों की अडिग श्रद्धा, दृढ़ता तथा कलात्मकता के प्रतिबिंब के रूप में खड़ा है। हर वर्ष लाखों लोग इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए आते हैं। वर्ष 2020 से 2024 तक वार्षिक अनुमानित 97 लाख श्रद्धालु सोमनाथ के दर्शन के लिए आए हैं।  पिछले 2 वर्ष में श्रद्धालुओं की संख्या 13.77 लाख दर्ज हुई थी, जिसमें पिछले साल महाशिवरात्रि के दौरान ही 3.56 लाख श्रद्धालु आए थे। इतना ही नहीं, गूगल पर भारतीयों द्वारा सर्वाधिक सर्च किए गए शीर्षस्थ 10 स्थानों में सोमनाथ शामिल है।

सोमनाथ मंदिर की यात्रा हमें सिखाती है कि विनाश कितना भी बड़ा हो, पुनर्निर्माण की शक्ति उससे कहीं अधिक है। यह भारत की आत्मा का दर्पण है – जहाँ विरासत जीवित रहती है और विकास नई ऊंचाइयों को छूता है। अगर आप कभी गुजरात जाएं, तो इस मंदिर के द्वार पर खड़े होकर महसूस कीजिए उस अमर ऊर्जा को क्योंकि सोमनाथ सिर्फ एक जगह नहीं, एक भावना है – स्वाभिमान की, आस्था की। 

(मैं सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान वहां मौजूद था।)

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मंगलवार, 13 जनवरी 2026

जब हेडलाइट हार गई लेकिन हौसला जीत गया..!!

रात के करीब 11.30 बजे..विमान की खिड़की से बाहर कुछ नजर नहीं आ रहा। आमतौर पर इतनी ऊंचाई से चंडीगढ़ शहर की लाइट दिखने लगती हैं। लगा, शायद कोहरा होगा। कई मिनटों की मशक्कत के बाद विमान उतरा लेकिन असली चिंता यहीं से शुरू हुई क्योंकि कोहरा इतना घना था कि तमाम प्रबंध के बाद भी पायलट विमान को सही जगह पर नहीं उतार पाया था।

ग्राउंड स्टाफ ने किसी तरह जहाज को सीधा कराकर सुरक्षित जगह तक पहुंचाया लेकिन विजिबिलिटी ज़ीरो थी यानि कुछ भी नहीं दिख रहा था। शून्य दर्शनीयता की समस्या इतनी विकराल थी कि कड़ाके की ठंड में यात्रियों को हवाई अड्डे तक पहुंचाने के लिए एयर ब्रिज बनाना तक मुश्किल था। इसलिए यात्रियों को जहाज में ही आधे घंटे से अधिक समय तक कैद रहना पड़ा। फिर, लंबे विचार विमर्श के बाद बसों का इंतजाम किया गया..वे भी किसी तरह सरकते हुए विमान तक आई, यात्री ठिठुरते हुए और अंधेरे में किसी तरह बस तक पहुंचे और बसें आहिस्ता आहिस्ता हवाई अड्डे तक।   

पायलट ने तो हिम्मत दिखाकर हमें हवाई अड्डे तक लाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली लेकिन समस्या अब शुरू हुई। हवाई अड्डे से चंडीगढ़ में होटल तक पहुंचना वर्ल्ड कप जीतने जैसा मामला था क्योंकि हवाई अड्डे के बाहर सड़क तो दूर गेट भी नहीं दिख रहा था। आधी रात, घनघोर कोहरा, ठिठुरन बढ़ाती सर्दी और बाहर भटक जाने का डर..टैक्सी कहां मिलती। 

ओला उबर वाले किराया तो मनचाहा दिखा रहे थे लेकिन आने का नाम नहीं ले रहे थे। मौके का फायदा उठाकर गिने चुने टैक्सी वाले पांच गुना किराया मांग रहे थे।   किसी तरह, मन मारकर एवं पॉकेट से समझौता कर टैक्सी की और हवाई अड्डे से चल पड़े। हवाई अड्डे से हमारे रुकने के ठिकाने तक करीब 18 किमी की दूरी असल नाइटमेयर साबित हुई क्योंकि न सड़क दिख रही थी, न चौराहे, न मोड़ और न ही दिल की धड़कन बढ़ाने वाले ऑटो, ट्रैक्टर जैसे वाहन। 

हमारी कार की हेडलाइट तो जल रही थी, पर रोशनी जमीन से दो-तीन फीट आगे नहीं जा पा रही। सामने सिर्फ़ सफ़ेदी थी.. यानि घना, दूधिया, ठंडा कोहरा। ऐसा कोहरा जो न सिर्फ़ आँखों को अंधा करता है, बल्कि मन को भी भयभीत कर देता है।  जीरो विजिबिलिटी में भी जिंदगी रुकती नहीं, बस बहुत धीमी और बहुत खतरनाक हो जाती है।

 हर कुछ सेकंड में ब्रेक और एक्सीलरेटर के बीच का फैसला जिंदगी-मौत का फैसला बन जाता है क्योंकि क्या वो सामने आती धुंधली रोशनी ट्रक है? ट्रैक्टर है? या सिर्फ़ किसी ने गाड़ी पार्क करके लाइट जला दी है? इसतरह, क्या वो सड़क का किनारा है या नाली है? इन सारे सवालों के बीच सबसे डरावनी चिंता होती है कि "अगर मैं रुक गया तो पीछे से कोई टकरा तो नहीं जाएगा? बस, हर आहट पर हॉर्न बजाना ही एक सुरक्षित विकल्प लगता है।

 इंडिकेटर अपना वजूद खो देते हैं। इस दौरान बस एक ही चीज़ काम आती है – इंसान की पूरी ताकत से केंद्रित ध्यान। एक सेकंड की लापरवाही या एक पल की जल्दबाजी – सब कुछ खत्म करने के लिए काफी है। हम भी चलते रहे क्योंकि मजबूरी थी..एयरपोर्ट पर रात भर तो बैठ नहीं सकते और अगले दिन कामकाज की जिम्मेदारियां थी ।  अगले दिन "अरे भाई, कोहरे में भी आ गए? वाह!" ये तारीफ़ सुनकर अच्छा लगता है, पर वो तारीफ़ करने वाला शायद नहीं जानता कि यह वाह सुनने के लिए कितनी बार दिल धक-धक किया था। आप भी जानते हैं और मानते भी होंगे कि कल भी कोहरा होगा तब भी हमें जाना ही पड़ेगा..वही मजबूरी क्योंकि जिंदगी कोहरे से नहीं पूछती कि आज विजिबिलिटी कितनी है। वो बस कहती है – चलते रहो, चलना ही जिंदगी है। बाकी ऊपरवाला सब संभाल लेगा ।

पचास पैसे में खरीदे बच्चे,एक रुपए में रिश्ता..!!

मां ने पापा से कहा कि 50 पचास पैसे देना ‘एक बच्चा खरीदना है।’ पापा ने भी बिना किसी ना-नुकर के पैसे दे दिए लेकिन हम सब घर के बच्चे अचंभित थे ...