देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क पर सफ़र !!
बर्फ के बीच हाड़ कंपाती ठंड, मूसलाधार बारिश, आए दिन हो रहे भूस्खलन, पहाड़ से गिरते पत्थरों के बीच न डायनामाइट, न जेसीबी, न कोई ड्रिल मशीन..बस छैनी- हथौड़ी…और इंसानी हौंसला। मौत के साए में दिन रात बिना रुके काम करते हुए 18 हज़ार मज़दूरों ने मौसम की बेदर्दी और पहाड़ की कठोरता पर जीत हासिल कर दिखाई और बना दी देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क। इसी सड़क पर हमें एनाकोंडा के चट्टानी रूप से भी रूबरू होने का मौका मिलता है।
हम बात कर रहे हैं राष्ट्रीय राजमार्ग-5 की। यह केवल एक सड़क भर नहीं, बल्कि इतिहास, साहस और रोमांच की जीवित धरोहर है। यह इंसानी जिद का प्रमाण है। जिसमें महज हाथों ने असंभव को संभव बनाते हुए न केवल मजबूत पहाड़ों को काट डाला बल्कि झुकने पर भी मजबूर कर दिया। कभी हिंदुस्तान-तिब्बत रोड कहलाने वाली यह सड़क कालका से शुरू होकर शिमला, रामपुर, किन्नौर और शिपकिला दर्रे तक जाती है। लगभग 450 किलोमीटर लंबी यह पहाड़ी राह सतलुज नदी के साथ-साथ चलती हुई हिमालय के सबसे दुर्गम और सुंदर इलाकों से गुजरती है।
यह एक ऐसी सड़क है, जो हमें प्रकृति की विराटता, मानव साहस और इतिहास की गहराइयों से जोड़ देती है। सड़क कभी इतनी संकरी हो जाती कि लगता—अब आगे कुछ नहीं है। एक के बाद एक खतरनाक अंधे मोड़, सीधी खड़ी चट्टानों, सैकड़ों फीट नीचे पूरे वेग से बहती सतलुज नदी और सामने से एकाएक आ जाने वाले वाहनों के कारण हाथ अनायास ही स्टीयरिंग पर कस जाते हैं और सांसें खुद-ब-खुद धीमी हो जाती हैं।हिमाचल प्रदेश की इस अनूठी सड़क की कहानी शुरू होती है 1850 में जब भारत पर अपने शासन प्रशासन की पकड़ मजबूत करने के बाद अंग्रेज सरकार ने व्यापार व्यवसाय पर अपना ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। तब तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने भारत को तिब्बत से जोड़ने के लिए इस महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना को हाथ में लिया। ब्रिटिश हुकूमत का प्राथमिक उद्देश्य भारतीय वस्तुओं को तिब्बत के रास्ते आगे तक बेचना और वहां से जरूरी सामान की भारत तक आवाजाही सुनिश्चित करना था। कहा तो यह जाता है कि खुद लॉर्ड डलहौजी ने इस भारत तिब्बत सड़क की शुरुआती रूपरेखा (डीपीआर) तैयार की और फिर इस सड़क का ब्लूप्रिंट ब्रिटिश आर्मी के कमांडर इन चीफ सर चार्ल्स नेपियर को सौंपा। इसमें मेजर ब्रिग्स की भी अहम भूमिका थी।
इस परियोजना पर अमल आसान नहीं था क्योंकि 1850 में जब इस सड़क का निर्माण शुरू हुआ था तब न तो आज की तरह पहाड़ों का सीना चीर देने वाली मशीन थीं और न ही ब्लास्टिंग तकनीक। तब केवल हाथों में छैनी और हथौड़ी लिएआत्मविश्वास से भरपूर इंसान थे। अंग्रेजों ने सड़क निर्माण में 18 हजार भारतीय मजदूरों को अनजान से पहाड़ के सामने खड़ा कर दिया। जान की परवाह किए बिना इन मजदूरों ने अपने हाथों से विशाल पहाड़ काट दिया। उन्होंने न तो कड़कड़ाती ठंड की परवाह की,न बर्फबारी उनका हाथ रोक पाई और न ही भूस्खलन और मूसलाधार बारिश से उनके हौसलों पर कोई फर्क पड़ा। इस दुर्गम लक्ष्य को हासिल करने के दौरान कई श्रमिकों को अपना बलिदान देना पड़ा। कभी पहाड़ से गिरते भारी भरकम पत्थरों के नीचे दबकर, तो कभी प्राकृतिक आपदाओं का शिकार बनकर 122 मजदूरों को जान गंवानी पड़ी। इनकी स्मृति में जेओरी में एक गुमनाम सा स्मारक भी है।
वैसे तो यह पूरी सड़क अपने आप में मानवीय कुशलता,इंजीनियरिंग और श्रम का उत्कृष्ट नमूना है लेकिन इसमें भी सबसे खास है तरंडा ढांक क्योंकि किन्नौर जिले के इस इलाके में करीब ढाई किलोमीटर पहाड़ को बीच से काटकर सड़क बनाई गई है और पहाड़ का यह टुकड़ा विशाल एनाकोंडा के सिर की तरह नज़र आता है। यहां पहाड़ ही सड़क है और पहाड़ ही आपकी छत। इसके बीच से निकलती गाड़ियां ऐसी लगती हैं जैसे पहाड़ ने अपना जबड़ा खोलकर उन्हें रास्ता दिया हो। सड़क के इस अविश्वसनीय भाग के निर्माण का श्रेय एक भारतीय इंजीनियर राजबहादुर सिंह को दिया जाता है। हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग में कार्यरत राजबहादुर सिंह ने हिमाचल के कई दुर्गम क्षेत्रों में सड़कों का जाल फैलाया।
इस सड़क के निर्माण में एक स्थानीय व्यक्ति बाबा भलकू का भी अतुलनीय योगदान बताया जाता है। बाबा भलकू को पहाड़ों की बनावट और भूगोल ज्ञान का गहरा अनुभव था। उन्होंने हिंदुस्तान-तिब्बत रोड के सर्वेक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह है कि मशोबरा के ऊपर एक सड़क का नाम भी उनके सम्मान में भलकू रोड रखा गया है।
सड़क को बनने में भले ही कई साल में लग गए लेकिन तब से अब तक यह सड़क हिमाचल को सालाना लाखों करोड़ों रुपए का व्यापार देती आ रही है। हम इसे हिमाचल की आर्थिक जीवन रेखा या इकोनॉमिक लाइफलाइन ऑफ हिमाचल भी कह सकते हैं। इस सड़क ने न केवल हिमाचल प्रदेश को व्यापार से जोड़ा बल्कि पूरे उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयां प्रदान की।
दरअसल,उस समय ब्रिटिश हुकूमत का मकसद तिब्बत तक अपने व्यापार और प्रभाव को बढ़ाना था। तिब्बत के व्यापारी उस समय रेशम, ऊन, नक्काशीदार वस्तुएं,चमड़े का सामान,नमक और बेशकीमती मखमल लाते थे जबकि भारत के व्यापारी चावल,तेल,फल,सूखे मेवे और किन्नौरी राजमा सहित तमाम चीजें वहां भेजते थे । शिमला जिले के रामपुर में अभी भी लगने वाला पारंपरिक लवी मेला इस व्यापार का गढ़ होता था। लवी मेला आज भी हिमाचल प्रदेश के सबसे पुराने मेलों में शामिल है। इस सड़क ने परस्पर व्यापार को नई ऊंचाइयां प्रदान की और इसी वजह से तब इसे लोगों ने सिल्क रुट ऑफ़ द हिमालय कहना भी शुरू कर दिया था।
इस सड़क की असली उपयोगिता 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान साबित हुई। बताया जाता है कि उस समय भारतीय सेना के पास सीमावर्ती इलाकों तक पहुंचने का यही एकमात्र रास्ता था और गोला बारूद से लेकर जवानों एवं राशन भेजने के लिए भी इसी रास्ते का इस्तेमाल हुआ। तब यह सड़क देश के लिए रणनीतिक जीवन रेखा बन गई थी।
युद्ध के दौरान इस सड़क के महत्व को देखते हुए इसके रखरखाव की जिम्मेदारी सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को सौंप दी गई । वैसे इस सड़क की मजबूती और शानदार रखरखाव के महत्व का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सन 2000 में किन्नौर में सतलुज नदी में आई भयंकर बाढ़ के दौरान तमाम सड़कें टूट गई लेकिन यह सड़क लोगों की उम्मीद और राहत का जरिया बनी रही।
यह सड़क अब किन्नौर के सबसे मीठे, क्रिस्पी और लज़ीज़ सेब और मटर का मीठा स्वाद देश के अन्य इलाकों तक पहुंचाने का माध्यम है। यह हमें देश के सबसे अच्छे राजमा और चिलगोजा उपलब्ध कराती है। आर्थिक एवं रणनीतिक महत्व के कारण यह सड़क देश की किसी भी आधुनिक सड़क से पीछे नहीं है। अब जब भी आप इस सड़क से गुजरे तो हजारों श्रमिकों के परिश्रम और अनुकरणीय इंजीनियरिंग को याद करना नहीं भूलें। हिंदुस्तान-तिब्बत रोड पर चलना सिर्फ ड्राइव नहीं है—यह हिमालय से आमने-सामने संवाद है। अगर आप रोमांच चाहते हैं, डर से दोस्ती करना चाहते हैं और इतिहास को महसूस करना चाहते हैं तो इस सड़क पर एक बार ज़रूर चलिए।






शानदार लेखन
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
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