आमतौर पर परस्पर बोलचाल में लू या लपट से जुड़े एक मुहावरे का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। यह मुहावरा है ‘लू उतारना’। कहीं भी, विवाद बढ़ने पर यह कहा जाता है कि हम ‘दो मिनट में तुम्हारी लू उतार’ देंगे। इस मुहावरे में लू से आशय निश्चित तौर पर घमंड उतारने या बेइज्जती करने से है, लेकिन तकनीकी तौर पर देखें तो यह मुहावरा भी लू से जुड़ी गर्मी की वजह से ही रचा गया होगा । दिमाग पर गर्मी चढ़ना भी एक तरह से लू लगने जैसा ही है । हम सब जानते हैं कि गर्मी के दिनों में लू किस हद तक खतरनाक होती है। अब आपके दिमाग में यह सवाल जरूर आ सकता है कि विदा लेते मानसून और ठंडक के आगमन के बीच लू का क्या काम? लू, बेमौसम बरसात की तरह अभी कैसे टपक पड़ी तो इसकी जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार ने हाल ही में लू को लेकर एक बड़ा फैसला किया है। इस फैसले में लू को प्राकृतिक आपदा में शामिल कर लिया गया है । यह कदम उठाने वाला मप्र देश का संभवतः तीसरा या चौथा राज्य है। अब तक केरल या दक्षिण के गंभीर लू ग्रस्त राज्यों ने ही इस दिशा में पहल की है। इस फैसले का फायदा यह होगा कि अब लू से होने वाली मृत्यु के दौरान मप्र में भी मृतक के परिजनों को उसी तरह से आर्थिक सहायता मिल सकेगी जिस तरह अन्य प्राकृतिक आपदाओं में मिलती है। हमारे प्रदेश में सामान्य तौर पर प्राकृतिक आपदाओं में मृत्यु पर 4 लाख रुपए की मुआवजा राशि या आर्थिक सहायता सरकार की ओर से दी जाती है। अब यह सहायता लू से प्रभावित परिवारों को भी मिल सकेगी। एयर कंडीशंड घरों और एसी कारों में जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए शायद लू किसी चिंता का विषय न हो लेकिन हाड़-तोड़ मेहनत कर जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए लू हर साल किसी संकट से काम नहीं है। खास तौर पर अप्रैल,मई और जून के महीने उनके लिए किसी आपदा से काम नहीं होते। आए दिन लू लगने और लू से मृत्यु की खबरें अखबार के पन्नों को रंगती रहती है लेकिन यह शायद कम लोग ही जानते होंगे की लू से होने वाली मौतें कई बीमारियों से होने वाली मौतों को भी पीछे छोड़ देती हैं। एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में हर साल लू के कारण डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु होती है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि दुनिया भर में हर साल लू से होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा सबसे ज़्यादा है। भारत के बाद चीन और रूस का नंबर आता है। आस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी में किए गए अध्ययन के मुताबिक, लू से होने वाली मौतें गर्मी से जुड़ी सभी मौतों का करीब एक तिहाई होती हैं। इसी अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों का 1 फ़ीसदी हिस्सा लू से होने वाली मौतें होती हैं। लू से हर गर्मियों में होने वाली कुल 1.53 लाख मौतों में से करीब आधी मौतें एशिया में और 30 फ़ीसदी से ज़्यादा मौतें यूरोप में होती हैं। इस रिसर्च के नतीजों के अनुसार, दुनिया भर में 30 वर्षों के बीच लू की वजह से करीब 45 लाख 92 हजार से ज्यादा लोगों की जान गई है। अपने देश की बात करें तो यहां हर साल लू से औसतन 31 हजार 748 मौतें हुई हैं। लू से दुनिया भर में और भारत में मरने वाले लोगों के आंकड़ों की तुलना करें तो लू के कारण विश्व में होने वाली कुल मौतों में से हर 5वीं मौत भारत में हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानी शरीर इस तरह से बना है कि वह एक हद तक ही गर्मी और सर्दी को झेल सकता है। अगर गर्मी के दिनों में पारा 42 डिग्री सेल्सियस से ऊपर है और लू चल रही हैं तो हम सभी को सावधानी बरतते हुए घर के अंदर ही रहना चाहिए। दरअसल गर्म हवाओं और सूरज की तीखी किरणों के कारण शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है और खून के गर्म होने पर पहले सांस लेने में दिक्कत आती है और फिर ब्लड प्रेशर कम होने लगता है । इसके बाद धीरे-धीरे शरीर के अंग काम करना बंद कर देते हैं और कुछ देर में प्रभावित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है इसीलिए लू के दौरान घर के बाहर के सारे काम सुबह 10 बजे से पहले या शाम को 6 बजे के बाद करने की सलाह दी जाती है। सरकार द्वारा लू को प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में शामिल करने से प्रभावित परिवारों की मुश्किलें अवश्य ही कम होंगी और खासतौर पर उन परिवारों को लाभ होगा जिनके परिवार के कमाऊ सदस्य की लू के कारण मृत्यु हो जाती है। हालांकि सबसे अच्छा तरीका तो यही है कि लू से बचा जाए और तमाम सावधानियां बरती जाएं। वैसे, गुस्से में आपा खो देने वाले लोगों को भी ‘दो मिनट में लू उतार देंगे’ जैसे मुहावरे का इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि यदि सामने वाला भारी पड़ गया तो आपकी लू उतरते देर नहीं लगेगी। वक्त का तकाज़ा यही है कि लू से भी बचे और लू उतारने से भी…।
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मंगलवार, 10 दिसंबर 2024
लू से भी बचिए और लू उतारने से भी..!!
आमतौर पर परस्पर बोलचाल में लू या लपट से जुड़े एक मुहावरे का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। यह मुहावरा है ‘लू उतारना’। कहीं भी, विवाद बढ़ने पर यह कहा जाता है कि हम ‘दो मिनट में तुम्हारी लू उतार’ देंगे। इस मुहावरे में लू से आशय निश्चित तौर पर घमंड उतारने या बेइज्जती करने से है, लेकिन तकनीकी तौर पर देखें तो यह मुहावरा भी लू से जुड़ी गर्मी की वजह से ही रचा गया होगा । दिमाग पर गर्मी चढ़ना भी एक तरह से लू लगने जैसा ही है । हम सब जानते हैं कि गर्मी के दिनों में लू किस हद तक खतरनाक होती है। अब आपके दिमाग में यह सवाल जरूर आ सकता है कि विदा लेते मानसून और ठंडक के आगमन के बीच लू का क्या काम? लू, बेमौसम बरसात की तरह अभी कैसे टपक पड़ी तो इसकी जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार ने हाल ही में लू को लेकर एक बड़ा फैसला किया है। इस फैसले में लू को प्राकृतिक आपदा में शामिल कर लिया गया है । यह कदम उठाने वाला मप्र देश का संभवतः तीसरा या चौथा राज्य है। अब तक केरल या दक्षिण के गंभीर लू ग्रस्त राज्यों ने ही इस दिशा में पहल की है। इस फैसले का फायदा यह होगा कि अब लू से होने वाली मृत्यु के दौरान मप्र में भी मृतक के परिजनों को उसी तरह से आर्थिक सहायता मिल सकेगी जिस तरह अन्य प्राकृतिक आपदाओं में मिलती है। हमारे प्रदेश में सामान्य तौर पर प्राकृतिक आपदाओं में मृत्यु पर 4 लाख रुपए की मुआवजा राशि या आर्थिक सहायता सरकार की ओर से दी जाती है। अब यह सहायता लू से प्रभावित परिवारों को भी मिल सकेगी। एयर कंडीशंड घरों और एसी कारों में जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए शायद लू किसी चिंता का विषय न हो लेकिन हाड़-तोड़ मेहनत कर जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए लू हर साल किसी संकट से काम नहीं है। खास तौर पर अप्रैल,मई और जून के महीने उनके लिए किसी आपदा से काम नहीं होते। आए दिन लू लगने और लू से मृत्यु की खबरें अखबार के पन्नों को रंगती रहती है लेकिन यह शायद कम लोग ही जानते होंगे की लू से होने वाली मौतें कई बीमारियों से होने वाली मौतों को भी पीछे छोड़ देती हैं। एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में हर साल लू के कारण डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु होती है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि दुनिया भर में हर साल लू से होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा सबसे ज़्यादा है। भारत के बाद चीन और रूस का नंबर आता है। आस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी में किए गए अध्ययन के मुताबिक, लू से होने वाली मौतें गर्मी से जुड़ी सभी मौतों का करीब एक तिहाई होती हैं। इसी अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों का 1 फ़ीसदी हिस्सा लू से होने वाली मौतें होती हैं। लू से हर गर्मियों में होने वाली कुल 1.53 लाख मौतों में से करीब आधी मौतें एशिया में और 30 फ़ीसदी से ज़्यादा मौतें यूरोप में होती हैं। इस रिसर्च के नतीजों के अनुसार, दुनिया भर में 30 वर्षों के बीच लू की वजह से करीब 45 लाख 92 हजार से ज्यादा लोगों की जान गई है। अपने देश की बात करें तो यहां हर साल लू से औसतन 31 हजार 748 मौतें हुई हैं। लू से दुनिया भर में और भारत में मरने वाले लोगों के आंकड़ों की तुलना करें तो लू के कारण विश्व में होने वाली कुल मौतों में से हर 5वीं मौत भारत में हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानी शरीर इस तरह से बना है कि वह एक हद तक ही गर्मी और सर्दी को झेल सकता है। अगर गर्मी के दिनों में पारा 42 डिग्री सेल्सियस से ऊपर है और लू चल रही हैं तो हम सभी को सावधानी बरतते हुए घर के अंदर ही रहना चाहिए। दरअसल गर्म हवाओं और सूरज की तीखी किरणों के कारण शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है और खून के गर्म होने पर पहले सांस लेने में दिक्कत आती है और फिर ब्लड प्रेशर कम होने लगता है । इसके बाद धीरे-धीरे शरीर के अंग काम करना बंद कर देते हैं और कुछ देर में प्रभावित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है इसीलिए लू के दौरान घर के बाहर के सारे काम सुबह 10 बजे से पहले या शाम को 6 बजे के बाद करने की सलाह दी जाती है। सरकार द्वारा लू को प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में शामिल करने से प्रभावित परिवारों की मुश्किलें अवश्य ही कम होंगी और खासतौर पर उन परिवारों को लाभ होगा जिनके परिवार के कमाऊ सदस्य की लू के कारण मृत्यु हो जाती है। हालांकि सबसे अच्छा तरीका तो यही है कि लू से बचा जाए और तमाम सावधानियां बरती जाएं। वैसे, गुस्से में आपा खो देने वाले लोगों को भी ‘दो मिनट में लू उतार देंगे’ जैसे मुहावरे का इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि यदि सामने वाला भारी पड़ गया तो आपकी लू उतरते देर नहीं लगेगी। वक्त का तकाज़ा यही है कि लू से भी बचे और लू उतारने से भी…।
मीठा राजमार्ग…जहां बन रहे है मदहोश करने वाले फूल !!
तो यह है मप्र का राजमार्ग क्रमांक 45 । इन दिनों, जैसे ही आप भोपाल से बरेली होते हुए नरसिंहपुर जिले की ओर बढ़ते हैं तो आप को एक मीठी, मादक सी और जानी पहचानी सी खुशबू अपनी ओर खींचने लगती है। जैसे जैसे आप नरसिंहपुर के क़रीब पहुंचने लगते हैं राजमार्ग पर मिठास और बढ़ जाती है तथा आपको रुककर इसे महसूस करने के लिए खींचती है। यदि रुक गए तो तय है कि जुबान पर फूल की मिठास लिए बिना आगे नहीं बढ़ सकते और नहीं रुके तब भी दिल ओ दिमाग पर छा गई इस मीठी सी मदहोश कर देने वाली खुशबू से पीछा नहीं छुड़ा सकते।
राजमार्ग क्रमांक 45 पर हर साल इन दिनों में यह मिठास और मदहोशी छाई रहती है और अब तो यह मीठापन यहां के लोगों के स्वभाव और तासीर का हिस्सा बन गया है। तभी तो ओशो यानि आचार्य रजनीश की वाणी और आज के दौर के नामी अभिनेता आशुतोष राणा की आवाज़ में तमाम मंत्र और स्त्रोत कानों में मिश्री सी घोल देते हैं।
खास बात यह है कि साल दर साल इस राजमार्ग पर मिठास का कारोबार फैलता जा रहा है। दरअसल, यह मिठास गन्ने से बन रहे गुड़ की है। मोटे तौर पर बरेली से जबलपुर तक और खासतौर पर नरसिंहपुर जिला गन्ने की खेती के लिए प्रदेश भर में मशहूर है। यहां के गुड़ का तो यह हाल है कि नरसिंहपुर की करेली तहसील का गुड़ ‘करेली के गुड़’ के नाम से प्रदेश तो क्या देश में भी हाथों हाथ लिया जाता है।
इन दिनों इस राजमार्ग के दोनों ओर गुड़ बनाने का काम चरम पर है और मद्धम आंच पर पकते गन्ने के रस की खुशबू इस सड़क को मीठा राजमार्ग बना रही है । थोड़ी-थोड़ी दूरी पर भट्ठियों में उबलता गन्ने का रस, कढ़ाईयों में ऊपर तैरता फूल और फिर गरमागरम खोए जैसे गुड़ से अलग अलग मात्रा और आकार प्रकार में बनती परिया।
गुड़ को एक रेडीमेड उत्पाद समझने वाले दोस्तों को फूल और परिया जैसे शब्द अबूझ लग सकते हैं लेकिन छोता, नोरपा, जरी और मरी सुनकर और यह जानकर कि इनमें नाम के विपरीत मरी सबसे कीमती है,वे चकरा भी सकते हैं। वैसे, नोरपा पहले साल की गन्ने की फसल को कहते हैं, जरी दूसरे साल और मरी तीसरे साल की फसल है। छोता रस निकलने के बाद गन्ने के सूखे छिलके हैं और फूल रस और गुड़ के बीच की अवस्था जो सबसे स्वादिष्ट होती है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक नरसिंहपुर ज़िले में करीब 65 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन पर गन्ने की खेती हो रही है। ज़िले में अब बड़ी मात्रा में जैविक पद्धति से गन्ना उगाने और जैविक गुड़ बनाने का काम भी होने लगा है। एक अनुमान के मुताबिक यहां मौजूद कई शुगर मिल के बाद भी 3000 से ज्यादा स्थानों पर गुड़ बनता है।
नरसिंहपुर में गन्ने की फसल के इतिहास की बात करें तो पुराने संदर्भों से पता चलता है कि 1822 में विलियम हेनरी स्लीमन नामक गोरे अधिकारी ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से एक्साइज ऑफिसर बनकर यहां तैनात हुए और उन्होंने गन्ना की फसल लगाने का श्रीगणेश किया। पहले यहां से मजदूरों को विदेश ले जाकर गन्ने की खेती कराते थे लेकिन, फिर अंग्रेजों ने सोचा कि मजदूरों को वहां न ले जाकर यहीं अच्छी गुणवत्ता का गन्ना लाकर खेती की जाए और फिर उससे बने उत्पाद वहां ले जाएं।
इस तरह, गन्ने का जादू यहां के लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा और अब तो गन्ना और गुड़ यहां की पहचान बन गए हैं। आंकड़ों पर नज़र दौड़ाएं तो यहां क़रीब 800 करोड़ रुपए का गुड़ उत्पादन एवं लगभग 650 करोड़ का चीनी और खांडसारी का उत्पादन हो रहा है।
दरअसल, इस क्षेत्र का गुड़ अपनी गुणवत्ता के लिए खासतौर पर जाना जाता है। यहां का गुड़ बहुत मीठा रहता है। अब तो अदरक और इलायची जैसे तमाम फ्लेवर के साथ जोड़ी बनाकर यह और भी स्वादिष्ट होता जा रहा है। लैपटॉप और ईयर बड्स वाली नई हाईटेक पीढ़ी की जानकारी के लिए बताते चले कि गुड़ बनाने के लिए गन्ने का पहले रस निकाला जाता है।
हां, बिल्कुल वही रस जो बाजार में हम अदरक,पुदीना,धनिया और नींबू के साथ मिलाकर पीते हैं। इस रस को फिर कढ़ाई में ओटाते हैं बिल्कुल दूध से खोया बनाने जैसे। कई घंटे तक उबलने के बाद यह गाढ़ा होकर गुड़ बन जाता है और सांचों में ढल कर अलग अलग आकार प्रकार ले लेता है। हालांकि, समय के साथ लाभ कमाने की चाह बढ़ती जा रही है और एक कड़ाही में पकाकर बनने वाला शुद्ध, सेहतमंद और स्वादिष्ट देशी गुड़ अब मिलावट के कारण संख्या में तो बढ़ रहा है लेकिन गुणवत्ता लगातार घट रही है।
गन्ने की एक ओर विशेषता यह है कि इसका कोई भी हिस्सा बेकार नहीं जाता। यहां तक कि रस निकालने के बाद बचा अवशेष छोता भी ईधन के रूप में काम आ जाता है।
…तो इस गन्ना कथा का वास्तविक आनंद उठाने के लिए निकलिए मीठे राजमार्ग पर और मदहोशी तक डूबकर आइए मीठी खुशबू,नींबू वाले गन्ने के रस ,स्वादिष्ट फूल ,गरम गुड़ में और सहेज लाइए सालभर का कोटा क्योंकि यह मौका फिर अगले साल ही मिल पाएगा।
कब तक हमसे बचोगे धुस्का..!!
इतनी शिद्दत से यदि भगवान को भी याद किया होता तो शायद वे भी पसीज जाते लेकिन ‘धुस्का’ को मुझ पर कोई दया नहीं आई।
धुस्का की तलाश में हमने रांची के वे सभी इलाके छान मारे, जहां आमतौर पर धुस्का की मौजूदगी पाई जाती है लेकिन तलाश पूरी नहीं हो पाई। धुस्का और इसकी उपलब्धता के इलाकों के जानकार साथियों की सहायता भी ली लेकिन उनमें से अधिकतर ने हाथ खड़े कर दिए। यहां तक कि वापिसी में एयरपोर्ट के रास्ते में हमने सभी संभावित ठिकानों पर छापेमारी की लेकिन जैसे ईडी, सीबीआई या पुलिस के डर से अपराधी छिप जाते हैं,इसी तरह धुस्का भी जैसे गायब हो गया था।
आखिर,हमने ही हार मान ली और दिल पक्का कर अगली बार धुस्का के लिए ही झारखंड की यात्रा करने की प्रतिज्ञा के साथ वापसी की उड़ान पकड़ ली। झारखंड-बिहार से बाहर के मित्रों के लिए धुस्का कुछ उसी तरह की अबूझ पहेली है जैसे महानगरों के लोगों और शायद नई पीढ़ी के लिए टपका।
धुस्का और टपका वैसे तो अलग अलग विषय हैं और इनमें कोई समानता भी नहीं है। लेकिन,हमने फिर भी एक समानता तलाश ही नहीं…पानी। टपका आमतौर पर बारिश में पैदा होता है और घर के कोने कोने में प्रकट होकर रहवासियों का जीना दूभर कर देता है। नई पीढ़ी की जानकारी के लिए टपका घर की छत से टपकते पानी को कहते हैं। पक्की छत पर तो वाटर प्रूफिंग जैसे उपायों से इसे रोक सकते हैं लेकिन कच्चे घरों में यह नींद हराम कर देता है। वहीं,धुस्का मुंह में पानी ला देता है और न मिल पाए तो मन में बैचेनी।
खैर, ज्यादा पहेलियां न बुझाते हुए साफ कर दूं कि ‘धुस्का’ दरअसल झारखंड का एक पारंपरिक व्यंजन है जिसे सामान्य रूप से नाश्ते में खाया जाता है। शहरी अंदाज में इसे देशी स्नैक्स कह सकते हैं। आंचलिक बोलियों में इसे ढुस्का, दुष्का, दुस्का और ढूस्का जैसे तमाम नामों से जाना जाता है। बोलचाल की भाषा में और गैर झारखंडी लोगों के समझने और बनाने के तरीके के कारण हम इसे मालपुआ का गरीब भाई कह सकते और इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री के लिहाज़ से यह इडली डोसा खानदान का लगता है। यह चावल की बहुतायत वाले क्षेत्रों के अनुरूप व्यंजन है लेकिन स्वाद और ऊर्जा से भरपूर।
धुस्का, सामान्यतः चावल,चने और उड़द की दाल को निर्धारित मात्रा में मिलाकर बनाया जाता है। थोड़ी बहुत कोशिश के बाद गूगल गुरु इसको बनाने की चुनिंदा विधियां भी पेश कर देते हैं।धुस्का बनाने के लिए चावल और दालों को रात भर पानी में फुलाने के बाद इन्हें मिक्सी में पीस लेते हैं। फिर अदरक, मिर्ची और मनचाहे मसालों के साथ थोड़ा सा ईनो मिला कर धुस्का बनाने का पहला चरण पूरा हो जाता है। फिर इस बेसन के पकौड़े जैसे घोल/बैटर को बड़े चम्मच से तेल में डालकर सुनहरा होने तक तलते हैं।
धुस्का को आमतौर पर आलू या छोले की सब्जी के साथ खाया जाता है। धुस्का से हमारी मुलाकात भलेहि इस दफे टल गई लेकिन उसने एक फ़िक्र भी बढ़ा दी।
दरअसल, चिंता की बात यह है कि, झारखंड क्या सभी राज्यों से उनके मूल या पारंपरिक व्यंजन लुफ्त होते जा रहे हैं और उनका स्थान मोमो, पिज्जा, बर्गर, चाउमीन जैसे व्यंजन तेजी से ले रहे हैं। झारखंड में भी अब सार्वजनिक आयोजनों, शादी विवाह और अन्य पार्टियों में चाइनीज तो दिखता है लेकिन धुस्का गायब होता जा रहा है। अभी लिट्टी चोखा जरूर बिहार के साथ साथ यहां भी अपनी बादशाहत बनाए हुए है लेकिन यही हाल रहा तो लिट्टी भी धुस्का, छिलका रोटी या माडूआ रोटी की तरह स्थानीय खानपान का हिस्सा नहीं रह जाएगी।
यह ठेठ मालवी अंदाज़ बनाए रखिए मुख्यमंत्री जी!!
आमतौर पर राजनीतिक पत्रकार वार्ताएं नीरस होती हैं क्योंकि नेता या तो पत्रकार वार्ता के पहले ही सब बता चुके होते हैं या फिर कुछ बताना नहीं चाहते। ऐसे में यदि पत्रकार वार्ता निवेश और आर्थिक विषय पर हो तो उसके और भी बोझिल होने के खतरे रहते हैं क्योंकि हजारों लाखों करोड़ रुपए के आंकड़े और उनका घिसा पिटा सा प्रस्तुतीकरण खबर के केंद्र होता है जो रुचिकर तो नहीं हो सकता । इसलिए जब यूनाइटेड किंगडम (यूके) और जर्मनी की यात्रा से लौटने के बाद मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की पत्रकार वार्ता की सूचना मिली तो यही उम्मीद थी कि रोज छप रहे निवेश प्रस्तावों और आंकड़ों के अलावा कुछ नहीं होगा। वैसे भी पत्रकार वार्ता का विषय भी इन देशों की यात्रा से जुटाए गए निवेश की जानकारी देना था इसलिए बिना कोई उम्मीदें पाले अपन भी मुख्यमंत्री निवास पहुंच गए।
मुख्यमंत्री निवास का सभागार ठसाठस भरा था। दर्जनों कैमरे मशीनगन की तर्ज पर सीधे उस स्थान पर निशाना साधे थे जहां मुख्यमंत्री को बैठना था। वहीं, रिवॉल्वर और बंदूकों जैसे छोटे मोटे हथियारों की तरह यूट्यूबर्स और पोर्टल वीरों के कैमरे सभागार में यत्र तत्र सर्वत्र बिखरे पड़े थे। बेचारे स्टिल कैमरे वाले अपने लिए ढंग की फोटो लेने लायक जगह जुगाड़ रहे थे। मुख्यमंत्री के हवाई अड्डे से यहां तक आने में कुछ देर हुई तो मीडिया के साथियों के लिए चाय और स्वल्पाहार के द्वार खोल दिए गए परंतु आलम यह था कि अग्रिम पंक्ति की कुर्सियां छिन जाने के डर से हम जैसे कई साथियों ने खानपान का बलिदान दे दिया और जो यह मोह नहीं छोड़ पाए उन्हें पहली से आखिरी पंक्ति में बैठना पड़ गया।
खैर, अपने चिरपरिचित अंदाज़ में मुस्कराते हुए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव हम से रूबरू हुए। कुछ देर की औपचारिक जानकारी के बाद वे अपने रंग में आ गए और ठेठ मालवी अंदाज़ में उन्होंने अपने अनुभव बांटने शुरू किए। फिर क्या था बोरिंग सी पत्रकार वार्ता में आंकड़ों के साथ हंसी और ठहाकों के रंग घुल गए। मुख्यमंत्री ने अपने निजी अनुभव से कई दिलचस्प बातें साझा की मसलन कारों की स्पीड पर उन्होंने ठेठ मालवी अंदाज़ में कहा कि कार में दो ढाई सौ की स्पीड में ऐसा लग रहा था जैसे हवा में उड़ रहे हैं और डर भी लग रहा था कि कहीं उड़ा ही न दे। एक और किस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि विदेशी राजनयिकों से चर्चा के दौरान जब वहां की एक महिला अधिकारी ने भारत और मध्य प्रदेश की तारीफ में कसीदे पढ़ने शुरू किए तो हमने ही इशारे से रोक दिया क्योंकि बहनजी नौकरी तो वहीं की कर रही थीं और भारत प्रेम कहीं उनकी नौकरी न ले बैठे।
जैसे जैसे बात आगे बढ़ी मुख्यमंत्री का अंदाज बिल्कुल परिवार के मुखिया या उस वरिष्ठ सदस्य की तरह होता गया जो कौतूहल के साथ अपने परिजनों को यात्रा के किस्से सुनाता है। डॉ यादव भी किस्सागो बन गए फिर चाहे वह डायनासोर को कीचड़ में फंसा कर शिकार करने की बात हो या दुनिया के इस विशालतम प्राणी को कैंसर होने की, ब्रिटेन की संसद के भीतर चर्च खोजकर उनकी धर्मनिरपेक्षता पर कटाक्ष हो या वहां राज्यसभा में मिलने वाली जीवनभर की सदस्यता…मुख्यमंत्री ने खूब चुटकियां ली। उन्होंने कहा कि वहां आप एक बार सदस्य बने तो बस फिर फोटो टंगने तक बने रहते हैं और हमारे यहां छह साल भी लोगों को भारी लगने लगते हैं। स्वामीनारायण मंदिर के निर्माण की कहानी सुना कर न केवल उन्होंने बातों ही बातों में भारतीय मंदिर निर्माण की उच्च शैली,स्थापत्य कला और एकजुटता की महत्ता साबित कर दी।
वहीं, ब्रिटेन में डॉ भीमराव आंबेडकर के पंचतीर्थ की स्थापना के प्रति गोरों की शुरुआती प्रतिक्रिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्होंने यह समझाने की कोशिश। की कि यदि सरकार मजबूत और दृढ़ इच्छा शक्ति वाली हो तो किसी भी बाधा को दूर किया जा सकता है। निवेश के आंकड़ों पर कुरेद रहे एक साथी को उन्होंने यह कहकर लाजवाब कर दिया कि 78 हजार करोड़ रुपए के निवेश प्रस्तावों का उल्लेख करने बैठूंगा तो बहुत समय लग जाएगा इसलिए आज नकारात्मकता छोड़िए,आंकड़े आप तक पहुंच जाएंगे।
कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि यदि आप पद की गरिमा के साथ अपनी सहजता,सरलता,जड़ों से जुड़ाव और अपनेपन को कायम रखते हैं तो नीरस विषय पर भी सकारात्मक और उल्लासपूर्ण बातचीत हो सकती है। यह सहजता आजकल कम देखने को मिलती है क्योंकि जैसे ही व्यक्ति उच्च पद पर पहुंचता है,वह अपनी जड़ों से दूर होने लगता है और सहज हास्य उसे अपने कद के प्रतिकूल लगने लगता है। लेकिन, डॉ मोहन यादव ने उच्च पद के बाद भी अपने मूल स्वभाव,सहजता,सरलता और खांटी मालवी शैली को नहीं छोड़ा है…अपने इस अंदाज़ को,सरलता को और ठेठ देसीपन को बनाए रखिए मुख्यमंत्री जी।
रविवार, 20 अक्टूबर 2024
मैंने नहीं कहा रेस्ट इन पीस..!!
मासूम से प्रांजल का दिल कब तुम्हारी सेवा करते करते कड़ा हो गया,तुम्हें तो ढंग से पता भी नहीं है...भाभी महीनों से कैसे तुमसे अपने आंसू छिपाकर तुम्हें हौंसला देती थी और तुमने एक बार में ही उनके विश्वास को, उनकी तपस्या को तार तार कर दिया। बिटिया प्रियम तो अब तक ठीक से समझ भी नहीं पाई कि तुमने उसके सर से अपने स्नेह की छाया दूर कर दी है । वह आज भी तुम्हारे सभी दोस्तों से वैसे ही आगे बढ़कर मिल रही थी जैसे तुम्हारे सामने मिलती थी।
जब तुम एंबुलेंस में अपने पैतृक निवास ललितपुर की यात्रा के लिए लेटे थे और भाभी का करुण क्रंदन बाहर तक द्रवित कर रहा था लेकिन तुम मजबूत कलेजा किए लेटे रहे!! उस चीत्कार पर तुम्हें उठ बैठना था,दिलासा देना था भाभी को,प्रांजल को..लेकिन तुम अपनी ही दुनिया में मगन थे तो हम क्यों तुम्हारी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें।
तुम्हें, अशांत ही रहना होगा मित्र…ताकि आसपास रहकर प्रांजल के सपने पूरे होते देखो,प्रियम का सहारा बने रहो और भाभी का हौंसला बढ़ाते हुए उनकी ढाल बने रहो..यूं, साथ छोड़ना जब हम मित्रों को गवारा नहीं है तो फिर परिवार को कैसे मंजूर होगा।
तुम्हें, अभी यहीं रहना है और जब तक परिवार सम्भल नहीं जाता,आत्मनिर्भर नहीं हो जाता और तुम्हारे बिना जीने की आदत नहीं डाल लेता तब तक तुम्हें उनके आसपास ही रहना होगा भले ही किसी भी रूप में रहो…तब तक हम भी नहीं कहेंगे विनम्र श्रद्धांजलि या रेस्ट इन पीस!!
तुम बहुत याद आओगे दोस्त… जितेंद्र
उन लोगों के लिए जिन्हें जानकारी नहीं है:
वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र मोहन रिछारिया का आज 55 साल की आयु में निधन हो गया। नईदुनिया जबलपुर के संपादक पद पर रहने के दौरान उन्हें ब्रेन ट्यूमर का पता चला और फिर निरंतर उपचार के कारण उन्होंने सक्रिय पत्रकारिता से अवकाश ले लिया था।
एक अप्रैल 1969 को जन्मे जितेंद्र मोहन रिछारिया ललितपुर के मूल निवासी थे। उनका अंतिम् संस्कार कल उनके पैतृक निवास ललितपुर में ही होगा। उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी है।
उन्होंने भोपाल के माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पहले बैच में स्नातक और फिर स्नातकोत्तर की पढ़ाई की थी। उन्होंने भोपाल के दैनिक नईदुनिया, दैनिक जागरण, सहारा टीवी, पीपुल्स समाचार, पत्रिका और नईदुनिया इंदौर सहित विभिन्न समाचार पत्रों में तीन दशक से ज्यादा समय तक अपनी सेवाएं दी।
मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024
रावण के बहाने समाज की बात…!!
फिलहाल, रावण का धड़ बन गया है। इसमें अहम तथ्य यह है कि जन्म के साथ ही रावण फूलना शुरू कर देता है। यह फुलाव घमंड का हो सकता है,असीमित शक्ति का और शायद संपन्नता का भी। जैसे-जैसे रावण दहन का समय नजदीक आता जाएगा रावण का शरीर और सिर घमंड से बढ़ते जाएंगे। एक सिर वाला रावण दस सिर का हो जाएगा।…और फिर जैसा कि कहावतों/मुहावरों में कहा जाता है कि ‘पाप का घड़ा भर गया है’,’बुराई का अंत निकट है’ या फिर ‘बुराई का अंत अच्छाई से होता है,’ वाले अंदाज में तमाम बड़े आकार प्रकार के बाद भी रावण को अंततः जलना पड़ता है।
वैसे, इन दिनों समाज में समय के साथ-साथ रावण का कद और संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। कभी 20-21 फीट का रावण आज 100 फीट को भी पार कर गया है । इसके बाद भी न तो रावण जलाने वालों की भूख शांत हुई है और न ही रावण का घमंड कम हुआ है इसलिए मृत्यु के बाद भी रावण हर नए साल में नए रंग-रूप और आकार-प्रकार के साथ फिर जन्म ले लेता है ।
समय के साथ रावणों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। पहले किसी शहर में एक या दो जगह ही रावण दहन होता था लेकिन अब रावण जलाने वाले भी बढ़ गए हैं और रावण भी। महानगरों क्या, अब तो छोटे छोटे शहरों में भी हर गली-मोहल्ले में रावण अपने बंधु-बांधवों के साथ बच्चों के खेलने के मैदान पर कई दिन पहले से कब्ज़ा करने लगा है।
उधर, बच्चे भी दशहरे की छुट्टियों के बाद भी मैदान में दिखने की बजाए मोबाइल में तोप तमंचे चलाने वाले खेलों में आंखें गड़ाए रहते हैं। इससे बच्चे भी खुश हैं,उनके अभिभावक भी और रावण भी फूल कर कुप्पा है। रावण का अंत भले ही देशभर में एक साथ एक जैसा होता है लेकिन अपने जन्म से लेकर जलने तक के नौ दिनों के दौरान वह मीडिया की सुर्खियां जरूर बटोरता रहता है। कभी शहर के किसी खास क्षेत्र को ही रावण गली कहा जाता था क्योंकि रावण के सबसे ज्यादा पुतले वही बनते थे लेकिन समय के साथ रावण के जन्म स्थान का भी जमकर विस्तार हुआ है।
अब शहर के कई इलाकों में छोटे बड़े आकार के सैंकड़ों रावण नजर आने लगे हैं। एक बार रावण कुनबे का आकार प्रकार तय हो जाने के बाद उनके जन्मदाता उनके अंदर आतिशबाजी लगाने का काम करते हैं क्योंकि रावण के जलने में असल मजा तो बम पटाखों का ही है। जब वह अपनी भयंकर कानफोडू आवाज और आंखों को चुंधिया देने वाली रोशनी यहां वहां बिखेरता है तो दर्शक उल्लासित होकर तालियां बजाने लगते हैं। एक तरह से इस आतिशबाजी, बम की आवाज और रंग-बिरंगी रोशनी के जरिए रावण अपनी ताकत का अहसास कराता है।
आम लोग भी वहीं सबसे ज्यादा जुटते हैं जहां का रावण सबसे ज्यादा धूम धड़ाका करता है। यह दिखावा आम जिंदगी का फलसफा भी बनता जा रहा है मतलब जो जितना ज्यादा दिखावा कर सकता है उसकी उतनी ही ज्यादा पूछ होती है। फिर भले ही वह बुराइयों का पुतला ही क्यों न हो। शायद, यही वजह है कि इन दिनों किसी अपराध में पकड़े जाने पर भी नामी लोग शर्म से चेहरा छुपाने की बजाय ‘विक्ट्री साइन’ बनाते हुए जेल जाते हैं और मात्र जमानत मिलने पर उसके समर्थक ऐसा जलसा करते हैं जैसे वह जेल से नहीं बल्कि सरहद पर दुश्मन को धूल चटाकर लौट रहे हैं।
समाज में बढ़ती दिखावे की यह प्रवृत्ति उच्च वर्ग से मध्यम वर्ग तक बिल्कुल वैसे ही यत्र-तत्र-सर्वत्र फैलती जा रही है जैसे दशहरे पर रावण के पुतलों की संख्या। शायद समाज को अब अपने बीच बुरी प्रवृत्ति वाले लोगों की मौजूदगी खटकती नहीं है। यदि ऐसा होता तो हर चुनाव में दागी प्रत्याशियों की संख्या नहीं बढ़ती? बुराइयों के प्रति हमारी सहनशीलता इस हद तक बढ़ गई है कि नवरात्रि के दौरान हम कन्या को देवी मानकर पूजते हैं और बिना किसी तीखे विरोध के उनके साथ बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाओं के साक्षी भी बनते हैं।
यदि हमें बेहतर समाज का निर्माण करना है तो बुराइयों को विस्तार देने की बजाय इस प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। इसकी शुरुआत प्रतीकात्मक ही सही, रावण के पुतलों से की जा सकती है क्योंकि दशानन को हम जितना मजबूत और लोकप्रिय बनाकर समाज में उसकी स्वीकार्यता बढ़ाते जाएंगे उससे जुड़ी बुराइयां भी समाज में उतनी ही गहराई से जड़ जमाती जाएंगी।
*(लेखक आकाशवाणी भोपाल में समाचार संपादक हैं और ‘चार देश चालीस कहानियां’ एवं ‘अयोध्या 22 जनवरी’ जैसी लोकप्रिय किताब लिख चुके हैं।)
गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024
हिंदी के हत्यारे…आप/हम,और कौन!!
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हिंदी के हत्यारे’…पढ़कर आप चौंक गए न और हो सकता है कुछ लोग शायद नाराज भी हो गए होंगे क्योंकि हमारी अपनी सर्वप्रिय और मीठी हिंदी भाषा के साथ हत्यारे जैसा क्रूर शब्द सुनना अच्छा नहीं लगता । लेकिन, जब मैं यह कहूं कि मैं,आप और हम सभी हिंदी के हत्यारे हैं तो शायद आपको और भी ज्यादा बुरा लग सकता है और लगना भी चाहिए क्योंकि जब तक बुरा नहीं लगेगा तब तक हम अपनी गलतियों को सुधारने या खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रयास नहीं करेंगे। किसी भाषा में मिलावट, व्याकरण बिगाड़कर,उसकी अनदेखी करना और उसकी बनावट एवं बुनावट से छेड़छाड़ करते जाना उसे तिल तिल कर मारना ही तो है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी कहा कि ‘मातृभाषा का अनादर मां के अनादर के समान है।जो मातृभाषा का अनादर करता है वह देशभक्त कहलाने के लायक नहीं है।’ जब गांधी जी जैसी संजीदा और संयम वाली शख्सियत मातृभाषा का सम्मान नहीं करने वालों को देशद्रोही जैसा मानने की हद तक कट्टर हो सकती है तो हमारी हिंदी भाषा को बर्बाद करने वालों को हिंदी के हत्यारे कहने में क्या बुराई है।हम सब हिंदी की हत्यारे हैं। यहां हम सब का मतलब मैं/हम/आप/ मीडिया/ सिनेमा/ बाजार और सरकारी कार्यालय सभी शामिल हैं। सबसे पहले हमारी बात कि आखिर ‘हम-आप’ हिंदी की हत्यारे कैसे हुए? अगर सही मायने में देखें और समझे तो हम हर दिन हिंदी की या अपनी भाषा की हत्या करते हैं। हिंदी में लेख/कविता/कहानी लिखना हिंदी की सेवा है लेकिन दिन प्रतिदिन उसकी अवहेलना करना अपराध। उदाहरण के लिए हम, अपने परंपरागत रिश्तों को आंटी और अंकल कहकर संबोधित करते हैं। हम, अपने बच्चों से कहते हैं कि वे आगंतुकों को आंटी कहें या उन्हें अंकल कहकर बुलाएं। क्या, दादी/ नानी/ मामी/ चाचा/ मौसी/ भाभी जैसे रिश्तों को अंकल-आंटी से पूरा कर सकते हैं । जिस भाषा के पास अहम पारिवारिक रिश्तों के लिए शब्द नहीं हैं तो वह ममेरे भाई, फुफेरे भाई या चचेरी बहन जैसे विस्तृत रिश्तों के लिए संबोधन कहां से लाएगी? ऐसी कंगाल अंग्रेजी भाषा को अपनाने के लिए हम अपनी मातृभाषा को ठुकराने के लिए तत्पर हैं।
हम, दूसरी बड़ी गलती करते हैं कि अपने बच्चों को रिश्तेदारों के सामने नमूने की तरह पेश करते हुए उनसे अंग्रेजी की फलाना ढिकाना पोएम सुनाने का अनुरोध करते हैं या फिर उनसे कहते हैं बेटा 100 तक काउंटिंग सुनाओ। हम कितनी बार यह कहते हैं कि बेटा गिनती सुनाओ या हिंदी की कोई कविता सुनाओ । फिर हमारा यही बच्चा जब बाजार में सामान लेने जाता है और दुकानदार उससे कहता है कि उनचालीस रुपए हुए तो वह आंखें फाड़ कर मुंह ताकता रह जाता है या फिर कहता है भैया इंग्लिश में बताओ । नई पीढ़ी की इस कमी पर केंद्रित कई सारे चुटकुले बाजार में और मोबाइल पर उपलब्ध है जैसे कि दो लड़कियां एक गोलगप्पे की दुकान पर जाती है और वहां गोलगप्पे खाने के बाद वह दुकानदार से पूछती कितने पैसे हुए तो वह कहता है उन्नचास रुपए… लड़कियां सोचती है कि दुकानदार उन्हें ठगने की कोशिश कर रहा है और एक लड़की थोड़ा ज्यादा स्मार्टनेस दिखाते हुए कहती है कि भैया, हम तो हंड्रेड देंगे । बार बार समझाने के बाद अंततः दुकानदार भी सोचता है कि भाई जब बैठे ठाले दोगुने पैसे मिल रहे हैं तो लेने में क्या बुराई है। सोचिए, यह चुटकुला हकीकत भी हो सकता है। अगर उन बच्चियों के मां-बाप ने उन्हें सिखाया होता है कि 49 का मतलब एक कम 50 रुपए है तो शायद वह 100 रुपए देकर नहीं आतीं।
इसी प्रकार आम बोलचाल में हम सामान्य चीजों के भी अंग्रेजी नाम इस्तेमाल करने लगे हैं जैसे कि हम कहेंगे वीक डेज, वीकेंड, मंडे, ट्यूसडे, थर्सडे या फिर सैटरडे । हम कितनी बार कहते हैं कि सोमवार मंगलवार,बुधवार या फिर वीकेंड को हफ्ते या सप्ताहांत जैसे शब्दों से याद करते हैं। जब हम खुद दिन प्रतिदिन की प्रक्रिया में अंग्रेजी शब्दों का मोह नहीं छोड़ पा रहे तो हम अपनी नई पीढ़ी में या अपने बच्चों में अपनी भाषा के बीज कैसे रोपित करेंगे ? कुछ यही हाल रंगों को लेकर है। अब हम नीला, हरा, गुलाबी या बैंगनी कितनी बार कहते हैं उल्टा रेड/ग्रीन/ यलो/ पिंक या पर्पल की बात ज्यादा करते हैं। तो हुए न, हम हिंदी के हत्यारे..!! यह महज कुछ उदाहरण है जबकि भाषा की विकृतियां दिन प्रतिदिन हमारी जीवन शैली का हिस्सा बनती जा रही हैं। यदि आप खुद अपने बोले गए शब्दों का अध्ययन करने बैठे तो आप स्वयं महसूस करेंगे कि हमारी भाषा में 30 से 40 फीसदी अंग्रेजी घुस गई है और हम हिंदी के पिछड़ने का रोना रो रहे हैं।
हिंदी के हत्यारों में दूसरा नाम है- बाजार। हम आए दिन सुनते हैं ‘यह दिल मांगे मोर’, ‘ठंडा मतलब कोका-कोला’, ‘आई एम कॉम्प्लान बॉय’, ‘यही है राइट चॉइस बेबी’ या और भी ऐसे तमाम तरह के विज्ञापन और उनकी बेसिर पैर की लाइन…जो हमें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं और हम उन्हें अपने व्यवहार में भी अपनाते जाते हैं। इसी तरह पैट शॉप, ग्रीटिंग कार्ड, शॉपिंग मॉल या और भी इसी तरह के तमाम शब्द जो बाजार हमारे सामने पेश करता जा रहा है और हम भी आंख बंद कर उनको अपनाते जा रहे हैं। बाजार तो मोटे तौर पर अंग्रेजी के हवाले है ही..यदि हम अपने आसपास की कुछ स्थानीय दुकानों या और छोटे-मोटे बाजारों को छोड़ दें तो किसी भी बड़े शॉपिंग मॉल मेंअंग्रेजी का बोलबाला खुलकर दिखता है और हिंदी कहीं किसी कोने में दबी सहमी नजर आती है।
हिंदी के हत्यारों में तीसरा नाम आता है मीडिया का । मीडिया यानि समाचार पत्र, टीवी चैनल, पत्रिकाएं या इसी तरह के अन्य माध्यम । मीडिया में इन दिनों हिंग्लिश का इस्तेमाल परवान पर है। यदि आप अपने घर आने वाले अखबार के पन्ने पलटे तो आप आसानी से समझ जाएंगे की अंग्रेजी किस तरह से हिंदी मीडिया पर हावी होते जा रही है। हिंदी के कुछ अखबारों की सुर्खियों पर नजर डाली जाए तो इस तरह के उदाहरण रोज ही मिल जाते हैं जैसे ‘पेट्स को खुश रखने हजारों के गिफ्ट’, ‘केंद्रीय मंत्री को मिली क्लीन चिट’, ‘गुणवत्ता में फेल हुए नमूने’, ‘धर्म की पाठशाला में सीखा टाइम और लाइफ स्टाइल मैनेजमेंट’, ‘कैश में खरीदा टीवी’, ‘वर्क लाइफ में संतुलन साधने की चुनौती’। वहीं,टीवी चैनलों में करप्शन, क्राइम, अटैक, मर्डर जैसे शब्द बहुतायत में देखने/ सुनने/पढ़ने को मिल जाते हैं । दिल्ली के एक अखबार ने तो हिंग्लिश को लगभग अपना लिया है।
हिंदी के हत्यारों में चौथा नाम है सिनेमा का । सिनेमा ने जहां हिंदी भाषा को जनप्रिय और देशभर में फैलाने में सबसे अहम भूमिका निभाई है लेकिन भाषा को बर्बाद करने में भी यह पीछे नहीं है। उदाहरण के लिए यदि हम हिंदी फिल्मों के शीर्षकों पर ही सरसरी नज़र दौड़ाएं तो ऐसा लगता है कि हिंदी में उनके पास कोई उपयुक्त शब्द ही नहीं थे। मसलन ‘मिस्टर एंड मिसेस 55’, ‘लव इन शिमला’, ‘दाग:द फायर’, ‘गोलमाल अगेन’, ‘जेंटलमैन’, ‘सिंघम रिटर्न’ जैसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे। ऐसा नहीं है कि हिंदी नाम वाली फिल्में लोकप्रिय नहीं होती। आखिर ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और ‘जब जब फूल खिले’ से लेकर ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे’ जैसी तमाम फिल्में बहुत लोकप्रिय हुई हैं। इसके अलावा फिल्मों के सफल अभिनेता और अभिनेत्री हिंदी में रोजी-रोटी कमाकर अंग्रेजी में संवाद करके गर्वित महसूस करते हैं। कुछ यही हाल टीवी पर आ रहे तमाम धारावाहिकों का है। वे खुलेआम हिंदी की टांग तोड़ते नजर आते हैं। कोरोना दौर में जन्में ओटीटी ने तो मानो हिंदी का समूल नाश करने की कसम ले ली है। विदेशों की नकल करती ओटीटी की विषय वस्तु और भाषा हर पल यह साबित करती है कि उसका जन्म ही मातृ भाषा से बलात्कार करने के लिए हुआ है ।
हिंदी के हत्यारों में आखिरी नाम है सरकारी कार्यालय । इन कार्यालयों में ज्यादातर अपने दैनिक कामकाज में बेवजह कठिन और दुरूह हिंदी शब्दों का इतना अधिक इस्तेमाल करते हैं कि आम व्यक्ति तो दूर शायद लिखने वालों की समझ में भी उनके पूरे अर्थ नहीं आते होंगे। उदाहरण के लिए ट्रेन के लिए लोह पथ गामिनी या मोबाइल के लिए चलित दूरभाष। शायद आप में से कुछ ही लोगों का पाला पुलिस थानों से पड़ा होगा लेकिन यदि आप इस जगह से रूबरू हुए हैं तो आपको पता होगा कि थानों में प्रथम सूचना रिपोर्ट- एफआईआर जिस भाषा में लिखी जाती है उसे समझ पाना उन हवलदार साहब के बस में भी नहीं होता जो उसे लिखते हैं।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत राजभाषा विभाग ने भी सरकारी कामकाज में कठिन हिंदी शब्दों के स्थान पर सहज और सरल शब्दों के इस्तेमाल की सलाह दी है। जैसे प्रत्याभूति, मिसिल,अभिलेख और शास्ति जैसे शब्दों के स्थान पर क्रमशः गारंटी, फाइल,रिकॉर्ड और जुर्माना जैसे ज्यादा प्रचलित शब्द । वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग भी अपनी तरफ से हिंदी को सहज और सरल बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। 1960 में बने संस्थान ने अब तक आठ लाख से ज्यादा शब्द गढ़े हैं जो अब प्रचलन में भी हैं जैसे संगणक के लिए कंप्यूटर या संसद सदस्यों के लिए सांसद । कहने का मतलब यह है कि सरकार के स्तर पर भी भाषा को सहज एवं सरल बनाए रखने के लिए तमाम प्रयास हो रहे हैं बस जरूरत हमें उन्हें अपनाने की है।
सरकारी महकमों में एक चलन और बड़ी तेजी से बढ़ा है, वह है किसी योजना के परिष्कृत संस्करण को अंग्रेजी में लिखा जाना मसलन मोदी 3.0 या फिर उज्जवला 2.0 या इसी तरह के अन्य शब्द जबकि उनके स्थान पर मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल या उज्ज्वला का दूसरा संस्करण जैसे आसान शब्द उपलब्ध हैं। कुल मिलाकर किसी दूसरे व्यक्ति या दूसरी भाषा को दोष देने की बजाय सबसे पहले हमें अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए कि हम खुद अपनी भाषा को बर्बाद करने में कितने और किस हद तक जिम्मेदार हैं। सबसे पहले हमें अपने आप से, अपने घर से, अपने बच्चों से,अपनी परस्पर बातचीत से और अपने दफ्तर से शुरुआत करनी होगी तभी हम अपनी भाषा के मान, सम्मान और गुणवत्ता को बरकरार रख पाएंगे।
बुधवार, 25 सितंबर 2024
आइए, मेघा रे मेघा रे...के कोरस से करें 'मानसून' का स्वागत
पाठकों ने इस तरह बना दिया ‘अयोध्या 22 जनवरी’ पुस्तक को दस्तावेज
शनिवार 29 जून को रीडर्स क्लब भोपाल के ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम के दिन मौसम विभाग ने पहले ही भारी बारिश की चेतावनी देकर डरा दिया था। इसके बाद दिन चढ़ते ही शैतान बादलों ने अपनी धुंआधार कलाबाजियों से मौसम विभाग की चेतावनी को सच्चाई बना दिया। हम मतलब Manoj Kumar भैया, मेरे हमनाम Sanjeev Persai ,अपनी ही राशि के Sanjay Saxena और हम कदम Manisha Sanjeev जी..फिक्रमंद थे कि ऐसी बरसात में कोई कैसे आ पाएगा? लेकिन पढ़ने/सुनने/कहने की पुस्तक प्रेमियों की चाह को बारिश की धमा चौकड़ी भी नहीं रोक पाई।
कुछ भीगते,कुछ बचते बचाते लोग जुटने लगे और चार बजे के लिए निर्धारित कार्यक्रम में साढ़े चार बजे तक 9 मसाला रेस्त्रां का सभागार खचाखच भर गया (वैसे भी, भारतीय समय तो यही है कार्यक्रम शुरू होने का)। वैसे, सर्व गुण संपन्न पत्रकार Ahmad Rashid Khan ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि बेफिक्र रहिए सर, बहुत लोग आएंगे। साथ ही, मौसम वैज्ञानिक Gurudatta Mishra जी की मौजूदगी से भी हम आश्वस्त हो गए थे कि बाकी लोगों को भी आने का मौका मिलेगा।
पहले मूल रूप से लगाई गई कुर्सियां भरी, फिर अतिरिक्त और उसके बाद व्यवस्थापकों ने हाथ खड़े कर दिए कि अब और कुर्सियां नहीं लग सकती और न ही अब कुर्सियां बची हैं। जगह की हो रही कमी को महसूस कर पहले परिजनों ने कुछ कुर्सियां छोड़ी और बाद में आकाशवाणी के साथियों ने दिल बड़ा किया ताकि मेहमान बैठ सकें। कुछ लोगों ने बाहर से रिमझिम के बीच कार्यक्रम का आनंद लिया। फिर अनुशासित प्रस्तोता और संचार विशेषज्ञ संजीव ने कमान संभाली।
चूंकि कार्यक्रम एक घंटे में समेटना था (उस सभागार में आगे भी एक कार्यक्रम था और हमने तय भी यही किया था) इसलिए वक्ता भी सीमित रखे गए थे लेकिन पाठकों पर किसी का जोर चला है क्या…!! स्थिति यह बन गई कि मूल वक्ता पीछे छूट गए और उत्साही पाठक बोलते गए। संजीव ने समय की कमी के मद्देनजर भरपूर प्रयास किए और एडवोकेट Yogesh Verma जैसे कुछ अपने लोगों को सादर न बोलने के लिए मना भी लिया तो Pushpendra Mishra जी जैसे वक्ताओं को समय की सीमा में बांध दिया। फिर भी, वरिष्ठ पत्रकार चंद्रहास शुक्ला,मौसम वैज्ञानिक और मेरे छात्रावासी जीवन के वरिष्ठ गुरुदत्त मिश्रा जी, जाने माने योग गुरु Devi Dayal Bharti जी, भारतीय सूचना सेवा के साथी Ajay Upadhyay , वरिष्ठ पत्रकार शुरैई नियाजी,जनसंपर्क अधिकारी रीतेश दुबे, जाने माने कमेंट्रैटर Prashant Singh Sengar ,समाचार वाचक Dharana Sachdev और राशिद अहमद खान को अपनी बात रखने का मौका मिल ही गया।
मनीषा जी को भी अपने मनोभाव समेटने पड़े तो मनोज भैया ने अपना संबोधन और संजीव ने अपनी पटकथा सीमित कर ली। वरिष्ठ पत्रकार Ajay Bokil , Sarman Nagele, वरिष्ठ जनसंपर्क अधिकारी Manoj Dwivedi ,भारतीय सूचना सेवा के Prashant Sharma और समीर वर्मा, मित्र @सुरेंद्र गुप्ता और Hema Gupta जी, डा अनामिका रावत, जानी मानी पत्रकार, उद्घोषक Sanyukta Banerjee , समाजसेवी और पर्यावरणविद डा रचना डेविड सहित कई विशिष्ट जनों की मौजूदगी ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ा दी।
इसके बाद शुरू हुआ अनूठा प्रश्नोत्तर सत्र। दोस्त,लेखक और संचारक संजय सक्सेना ने अपनी रोचक शैली में प्रश्नों के गोले दागे और हम भी निर्भीक सिपाही की तरह शब्दों की ढाल से उनका सामना करते गए। पुस्तक क्यों से लेकर हर पुस्तक के शीर्षक में अंकों के इस्तेमाल,हर लेख में चौपाई क्यों जैसे प्रश्नों के जरिए संजय ने ‘अयोध्या 22 जनवरी’ के लेखन के पीछे की कहानी पाठकों तक पहुंचा दी।
तब तक 9 मसाला रेस्त्रां की टीम गरमा गरम पकौड़े और चाय लेकर हाजिर हो गई। बारिश के बीच चाय पकौड़े की भारतीय मेजबानी और मनमोहक/लज़ीज़ सुगंध भी उपस्थित लोगों के बोलने/सुनने के इरादों को डिगा नहीं सकी। दरअसल, घड़ी की सुइयां शाम के 6 बजे के आगे पहुंच गई थी इसलिए अगले आयोजन की तैयारी के मद्देनजर 9 मसाला की टीम चाहती थी कि लोग जल्दी खाएं और जाएं..पर सभागार में मौजूद लोगों के इरादे थे कि खायेंगे जरूर पर जाएंगे पूरा सुन/देख कर ही।
खैर, किसी तरह बोलने सुनने का दौर थमा तो स्मृतियों को सहेजने के लिए मोबाइल के कैमरे मैदान में आ गए…अनगिनत फोटो, मौके पर खरीदी गई दर्जनों किताबों पर हस्ताक्षर का गौरव, ढेर सारी सराहना और फिर ऐसे ही किसी आयोजन में मिलने के वादे के बीच यह कार्यक्रम संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण चरण यह था कि शुरुआत में रीडर्स क्लब ने सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफेसर शरद पगारे को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की और दो मिनट का मौन रखा।
#अयोध्या22जनवरी
#ayodhya22january
एक सौ एक नॉट आउट…!!
सौ साल पूरे करना किसी भी प्रसारण माध्यम/संस्थान के लिए गर्व की बात है। हमारे देश में विधिवत रेडियो प्रसारण का आज 101 वां जन्मदिन है। 23 जुलाई, 1927 को इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (IBC) अस्तित्व में आई और यहीं से रेडियो प्रसारण को सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन मिला. यही कारण है कि 23 जुलाई राष्ट्रीय प्रसारण दिवस के रूप में मनाया जाता है.
वैसे निजी तौर पर रेडियो प्रसारण 1923 से शुरू हो गया था। 8 जून 1936 को इसे ऑल इंडिया रेडियो (AIR) नाम दिया गया और 1957 में आकाशवाणी नाम अपनाकर कर यह रेडियो प्रसारण का पर्याय बन गया । हर साल नेशनल ब्रॉडकास्टिंग दिवस सेलिब्रेट करने का उद्देश्य रेडियो का महत्व याद दिलाना है।
इन सौ सालों में रेडियो ने सतत रूप से जवान होते हुए कई उपलब्धियां हासिल की हैं। अब नए नवेले डिजिटल रूप में साफ आवाज़, अल्फाज़ और अंदाज़ में यह मोबाइल फोन और कार के साउंड सिस्टम के जरिए हर घर तक पहुंच रहा है और हर दिल में जगह बना रहा है। यह हर जेब का हिस्सा भी बन चुका है।
हाल ही में रायटर और ऑक्सफोर्ड जैसे नामचीन संस्थानों के सर्वे में आकाशवाणी और आकाशवाणी से प्रसारित समाचारों को देश भर के सभी मीडिया में सबसे विश्वसनीय माना गया है।
तकनीकी के साथ कदम से कदम मिलाते हुए आकाशवाणी की सेवाएं अब रेडियो से भी आगे मोबाइल ऐप newsonair पर लाइव उपलब्ध हैं और आप दुनियाभर में कहीं से भी एक टच पर भोपाल से लेकर देश के किसी भी रेडियो स्टेशन का प्रसारण सुन सकते हैं।
इसके अलावा,हमारे समाचार बुलेटिन और समसामयिक कार्यक्रम यूट्यूब, एक्स और फेसबुक पर भी उपलब्ध हैं जिन्हें आप अपनी सुविधा से कभी भी और कहीं भी सुन सकते हैं। इसलिए,सबसे विश्वसनीय/सटीक/सहज और सहयोगी माध्यम के हमारे जीवन से जुड़ने-ज़िंदगी का हिस्सा बनने और तमाम उतार चढ़ाव के बाद भी निरंतर सहभागी के रूप में कायम रहने की बधाई। रेडियो इसी तरह फले फूले… सभी रेडियो प्रेमियों को बधाई-शुभकामनाएं🙏
क्या रेडियो डाइंग मीडियम है?
रेडियो डाइंग मीडियम है? रेडियो कौन सुनता है? आकाशवाणी में कैरियर की क्या संभावनाएं हैं? रेडियो प्रसारण कितने प्रकार के हैं?आकाशवाणी के समाचारों की कॉपी कैसे लिखी जाती है? यह अख़बार की न्यूज से कितनी अलग है? जैसे तमाम सवालों के साथ #lnctbhopal के ‘स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन’ के विद्यार्थियों की टीम तैयार थी…अवसर था-#राष्ट्रीयप्रसारणदिवस पर ‘बदलते वक्त के साथ बदलता रेडियो’ विषय पर संवाद का।
सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और इससे आगे बढ़ चुकी नई पीढ़ी के साथ सौ साल पुराने मीडियम की बात करना और उन्हें बातचीत में रुचि के साथ जोड़े रखना आसान नहीं है लेकिन #LNCT के सुलझे हुए गुरुओं Anu Shrivastava जी, @ManishkantJain और अन्य सहयोगियों की विद्वान टीम तथा अनुशासित विद्यार्थियों ने इस संवाद को आसान बना दिया और चर्चा संपन्न होने के बाद अधिकतर विद्यार्थियों की व्यक्त/अनकही प्रतिक्रिया यही थी कि- रेडियो और खासकर #आकाशवाणी में इतना कुछ है,हमें पता ही नहीं था।
कुछ विदेशी विद्यार्थियों को भी भारत के लोक प्रसारक के बारे में बताने का मौका मिला। उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि इस संवाद सत्र के बाद विद्यार्थियों की यह गलतफहमी दूर हो गई होगी कि रेडियो डाइंग मीडियम है और वे यह बात भी समझ सके होंगे कि रेडियो वक्त के साथ बदलता माध्यम है और भविष्य की संभावनाओं से भरपूर भी…कुल मिलाकर, एक अच्छा दिन,मजेदार संवाद और सिखाने से ज्यादा सीखने वाला भी।
बूंदों,बादलों,पानी और हरियाली का मेला!!
चेहरे के साथ अठखेलियां करती कभी नन्हीं तो कभी बादलों से तर माल उड़ाकर आईं मोटी बूंदे, कभी भिगोकर तो कभी छींटें मारकर हमारे आसपास अपनी मौजूदगी का सतत अहसास कराती रहती हैं। वहीं, काले, घने, मचलते बादल एक छोर से दूसरे छोर तक रेस लगाते से नज़र आते हैं। ऐसा लगता है अभी टूटकर बरस पड़ेंगे और आपके पास छाते में छिपकर कार में घुसने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रहेगा..लेकिन जैसे ही आप डरकर भागते हैं,ये नटखट और बदमाश बादल खिलखिलाते हुए कोलार बांध को दूर से निहारने के लिए कहीं ओर टहलने निकल जाते हैं।
आप, बादलों और बूंदों के खेल में ठीक से शामिल भी नहीं हो पाते हो कि नीचे कोलाहल करती विशाल जलराशि अपनी ओर ध्यान खींचने का पुरजोर प्रयास करती दिखती है। अथाए पानी, दूर दूर तक बस पानी ही पानी…जैसे समंदर हो। बड़े तालाब का तो फिर भी ओर-छोर दिखता है परंतु कोलार डैम में बस पानी ही पानी दिखता है। यहां पानी ने पेड़ों के समूह को खास गोलाकार अंदाज में अपनी बांहों में समेट रखा है जैसे थोड़ी-थोड़ी दूर पर पानी के गमलों में किसी ने पेड़ लगा दिए हों।
वैसे तो रहीम कह गए हैं कि ‘बिन पानी सब सून..’, लेकिन यहां पानी से भी आकर्षक है चटक हरियाली,आंखों को लुभाती, मोबाइल के कैमरों पर कब्ज़ा जमाती और हर फोटो के लिए खूबसूरत बैकग्राउंड बनाती हरियाली। आप चाहकर भी अपने आपको रोक नहीं सकते और जब पेड़ों,पानी, बादल,बूंदों (छुट्टी के दिनों में डीजल पेट्रोल भी) की मिली-जुली महक आपकी सांसों से होती हुई फेफड़ों में पहुंचती है तो वे भी फूलकर 56 इंच के होना चाहते हैं ताकि कुछ हफ्ते या महीने की शुद्ध हवा को जमा कर सकें।
कोलार रोड पर बैरागढ़ चीचली के बाद कालापानी जैसे अंतिम गांव को पार करते ही आप प्रकृति की इस लीला के साक्षी बनने लगते हैं। सड़क के दोनों ओर से ताका झांकी करते कई प्रजातियों के पेड़ आपके साथ साथ चलते हैं। रास्ते में,लाल कोयले पर सिंकते पीले भुट्टो की खुशबू से यदि आप मदहोश नहीं हुए तो अपने समय पर कोलार डैम पहुंच जायेंगे और भुट्टों ने मोहपाश में बांध लिया तो कुछ देर बाद।
हरियाली और जंगल का आलम यह है कि ऊंचाई से दिखते सड़क के कुछ टुकड़े अपने अस्तित्व के लिए लड़ते दिखते हैं। यदि आप भदभदा के गेट के दीदार और यहां जुटती भीड़ से ऊब चुके हैं तो आपके लिए कोलार डैम सर्वोत्तम विकल्प है। इसी तरह, यदि कलियासोत पर बाघ की मौजूदगी डराती है और केरवा की सड़क पर लगता जाम परेशान करता है तो जनाब,परिवार के साथ कोलार डैम का रुख करिए…यहां आपको फिलहाल प्रकृति की गोद में बैठ कर सुकून ही मिलेगा।
अंत में एक सुझाव भी: कोलार या कहीं भी प्रकृति से साक्षात्कार करने जाएं तो अपनी कार दूर खड़ी कर पैदल ही घूमे।तभी आप इतना कुछ महसूस कर पाएंगे।
समोसे-कचौरी पर क्यों मेहरबान हैं ‘सरकार’
इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट के अनुसार 20 से 79 साल की उम्र के 463 मिलियन लोग डायबिटीज की बीमारी से ग्रसित हैं। यह इस आयु वर्ग में दुनिया की 9.3 फीसदी आबादी है। रिपोर्ट कहती है कि चीन, भारत और अमेरिका में सबसे अधिक डायबिटीज के वयस्क मरीज हैं।
2021 के अध्ययन के अनुसार, भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग मधुमेह से ग्रसित हैं और इतने ही प्री-डायबिटीज थे, जबकि 31 करोड़ से ज्यादा लोगों को उच्च रक्तचाप था। इसके अलावा, 25 करोड़ से ज्यादा लोग मोटापे का शिकार हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा 2017 में जारी अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, अनुमान है कि भारत में गैर संचारी रोग के कारण होने वाली मौतों का अनुपात 1990 में 37.9 प्रतिशत से बढ़कर 2016 में 61.8 प्रतिशत हो गया है । भारत में मधुमेह और इसके दुष्प्रभावों की वजह से दस करोड़ से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है । जबकि इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट कहती है कि 20-79 आयु वर्ग को होने वाली डायबिटीज के मामले में भारत दूसरे नंबर पर है।
जिस देश में जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों की स्थिति इतनी भयानक हो और हम फिर भी शौक से हर शादी/पार्टी में जंक फूड ठूंस ठूंस कर खा रहे हैं तो हमारा भविष्य क्या और कैसा होगा,इसका सहज अंदाजा लगा सकते हैं। 2019 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि खराब आहार से वैश्विक स्तर पर तंबाकू की तुलना में ज्यादा लोगों की मौत होती है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वयस्क किसी न किसी रूप में अस्वस्थ खा रहे हैं, जिससे कुपोषण जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। हमारे आहार में जंक फूड का दायरा इतना बढ़ चुका है कि भारत में 25 प्रतिशत से ज्यादा वयस्क सप्ताह में एक बार भी हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन नहीं करते। नतीजा वे बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
जंक फूड में मैदा और आलू से भी ज्यादा हानिकारक तेल होता है। वही तेल, जिसमें डूबते उतराते समोसे-कचौरी और ब्रेड पकौड़े देखकर हमारी लार टपकने लगती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के अनुसार एक बार खाद्य तेल के प्रयोग के बाद दोबारा उपयोग करने से कैंसर जैसी बीमारी का खतरा रहता है। तेल को बार-बार गर्म करने से धीरे-धीरे फ्री रेडिकल्स बनने से एंटी आक्सीडेंट की मात्रा खत्म होने लगती है। इसमें खतरनाक कीटाणु जन्म लेने लगते हैं, जो खाने के साथ चिपक कर हमारी सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे बॉडी में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा भी तेजी से बढ़ जाती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की गाइडलाइन के अनुसार खाद्य तेल को तीन बार से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए । लेकिन घर से लेकर बाजार तक एक ही तेल का बार बार इस्तेमाल सामान्य बात है और मजे की बात यह है कि नियम जो भी हों परंतु तेल के बार बार उपयोग पर किसी को आपत्ति नहीं है।
भारत में जंक फूड के उत्पादन और 22सेबिक्री को नियंत्रित करने वाले कोई विशेष कानून नहीं हैं। देश में खाद्य उत्पादों की सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ही जिम्मेदार है। हालांकि, जंक फूड से संबंधित नियम इसके उपभोग से संबंधित बढ़ती चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त व्यापक नहीं है। प्राधिकरण ने उच्च वसा, नमक और चीनी वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री और विपणन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि ऐसे खाद्य पदार्थों को स्कूलों के 50 मीटर के भीतर बेचा या विज्ञापित नहीं किया जा सकता है, और इन खाद्य पदार्थों के विज्ञापन टेलीविजन पर बच्चों के कार्यक्रमों के दौरान प्रसारित नहीं किए जा सकते हैं। हालाँकि, ये दिशा-निर्देश स्वैच्छिक हैं, और इनका पालन न करने पर कोई दंड नहीं है। इसलिए सबसे जरूरी है कि जंक फूड को स्वाद के साथ सेहतमंद बनाने के लिए कुछ अनिवार्य कानूनी पहल होनी चाहिए मसलन कुछ देशों में शुरुआत हुई है जैसे कोलंबिया में ऐसे खाद्य पदार्थों पर टैक्स की दर बढ़ा दी गई है। द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित खाद्य पदार्थों पर अतिरिक्त टैक्स 10 फीसदी से शुरू होगा, जो अगले साल बढ़कर 15 प्रतिशत हो जाएगा और 2025 में 20 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। हेल्थ पॉलिसी वॉच वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, टैक्स के दायरे में ऐसे सभी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड शामिल किए गए हैं, जिनमें ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट , सॉसेज, अनाज, जेली और जैम, प्यूरी, सॉस और मसाला शामिल हैं। मैक्सिको जैसे कुछ अन्य देशों में भी कदम उठाए गए हैं लेकिन हम नियमों और जागरूकता के अभाव में अपने पेट को बीमारियों की गोदाम और देश को बीमारियों का गढ़ बना रहे हैं।
क्या हम खानपान में कुछ अभिनव प्रयास नहीं कर सकते!! खासतौर पर ट्रेन, स्कूल कालेज की कैंटीन,सरकारी दफ्तरों की कैंटीन और सरकारी आयोजनों में मोटे अनाज से बने सेहतमंद खाद्य पदार्थ ही उपलब्ध हों, ट्रेन में शाकाहारी/मांसाहारी खाने की चॉइस के साथ साथ मधुमेह और उच्च रक्तचाप वाले लोगों के लिए अलग खाना परोसा जाए और समोसे कचौरी या आइसक्रीम को सरकारी मैन्यू से पूरीतरह बाहर कर दिया जाए। मैदे के बिस्किट और कुकीज़ को आटे या श्रीअन्न से बनाया जाए और ट्रेन/कैंटीन में पोहा,उपमा, इडली सांभर, बाजरे की खिचड़ी, चीला जैसे लज़ीज़ और सेहतमंद खानपान को शामिल किया जाए। पहले ही हम बहुत देर कर चुके हैं,यदि अभी भी जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो हमारे साथ साथ नई पीढ़ी भी बीमार बनती जाएगी और आने वाले सालों में हमारा युवा ‘डिविडेंड’ के स्थान पर देश के लिए बोझ बन जाएगा।
एक शहर से साक्षात्कार…!!
‘छोटे-छोटे शहरों से,
खाली भोर-दुपहरों से,
हम तो झोला उठाके चले।
बारिश कम-कम लगती है,
नदियां मद्धम लगती है,
हम समंदर के अंदर चले।’
वाकई, हमारा सफर कुएं से समंदर का था..अपने कस्बे से भोपाल जैसे बड़े शहर और प्रदेश की राजधानी में आना, किसी समंदर से कम नहीं था। यह बात अलग है कि प्रदेश की राजधानी भी बाद में पीछे छूट गई और कैरियर के विस्तार की रफ्तार राष्ट्रीय राजधानी तक ले गई। बहरहाल,सफर साझा था तो सामान भी,साथ भी और परस्पर सहयोग भी साझा ही था। इसका परिणाम यह हुआ कि ‘हम’ यानि मैं, इस पुस्तक के लेखक संजीव परसाई,मित्र संजय सक्सेना और अग्रज जैसे मित्र और इस पुस्तक के प्रकाशक प्रो मनोज कुमार यानि हमारे मनोज भैया और बिल्लू भैया मतलब अरविंद सिंह भाल जल्दी ही ‘मैं रंग शरबतों का तू मीठे घाट का पानी’ वाले अंदाज में इतने घुल-मिल गए कि आज तीन दशक बाद हमारी आधी दुनिया और परिवार की दूसरी पीढ़ी ने मिलकर हमारी दोस्ती को संयुक्त परिवार का सा रूप दे दिया है । हम सभी ने शहर-ए-भोपाल में सपने बुने और उन्हें पूरा भी किया। कभी शाहपुरा, तो कभी होशंगाबाद रोड, तो कभी श्यामला हिल्स होते हुए हमने भोपाल को करीब से जानने का हरसंभव प्रयास किया इसलिए जब संजीव (परसाई) ने भोपाल पर किताब लिखने का मन बनाया तो लगा कि यह किताब नहीं बल्कि साथ साथ जिए पलों की साझा यात्रा है। हम में से कुछ भोपाल से आते जाते रहे और संजीव जैसे कुछ दोस्तों के घर हमारे प्रवास का अड्डा। हमारी हर मुलाकात भोपाल को हमारे और क़रीब ले आती। शायद, ऐसी ही किसी परिस्थिति में जाने माने कवि ध्रुव शुक्ल को लिखना पड़ा होगा:
‘उसी शहर में नाल गड़ी है मेरी
उसी शहर में दाल पकी है मेरी
उसी शहर में रहते मेरे दोस्त
उसी शहर में बीवी बच्चे
उसी शहर खाल खिंची है मेरी
उसी शहर में बहुत दिनों तक
रहने से दुख होता है
उसी शहर में बहुत दिनों के बाद
लौट आने से सुख होता है।।’
संजीव अपनी लेखनी से हमें भोपाल को नए सिरे से जानने समझने का मौका देते हैं। हर पन्ने पर हमारी तीन दशकों की यादें उभर आई हैं। उनकी लेखन शैली सुसंगत और सुगम है। उन्होंने पाठकों को भोपाल की संस्कृति और इतिहास में गहराई से डुबोने के लिए प्रासंगिक संदर्भों और विवरणों का संतुलित समावेश किया है। ऐतिहासिक घटनाओं और सांस्कृतिक तत्वों का वर्णन बहुत ही सरल और स्पष्ट तरीके से किया गया है, जिससे पाठक आसानी से विषय को समझ सकते हैं। संजीव बिना कुछ कहे चुपचाप शब्दों का ऐसा मायाजाल रचते हैं कि हम भी उसमें खो जाना चाहते हैं। भोपाल को लेकर जो भाव हमारे हैं,शायद वही सोच जाने माने कवि/कलाकार हेमंत देवलेकर की भी रही होगी। तभी तो उन्होंने लिखा:
‘सुंदरता वह प्रतिभा है/जिसे रियाज़ की ज़रूरत नहीं/
भोपाल ऐसी ही प्रतिभा से संपन्न और सिद्ध/यह शहर कविताएँ लिखने के लिए पैदा हुआ/आप इसे पचमढ़ी का लाड़ला बेटा कह सकते हैं/पहाड़ यहाँ के आदिम नागरिक/झीलों ने आकर उनकी गृहस्थियाँ बसाई हैं/इस शहर में पानी की खदानें हैं/जिनमें तैर रहा है मछलियों का अक्षय खनिज भंडार/इस शहर में जितनी मीनारें हैं/उतने ही मंदिर भी/लेकिन बाग़ीचों की तादाद उन दोनों से ज़्यादा/रात भर चलते मुशायरों और क़व्वालियों के जलसों में/चाँद की तरह जागते इस शहर की नवाबी यादें/गुंबदों के उखड़ते पलस्तरों में से आज भी झाँकती हैं/इस शहर का सबसे ख़ूबसूरत वक़्त/शाम को झीलों के किनारे उतरता है/और यह शहर अपनी कमर के पट्टे ढीले कर/पहाड़ से पीठ टिका/अपने पाँव पानी में बहा देता है/और झील में दीये तैरने लगते हैं।’
अब बात पुस्तक की, ‘भोपाल: एक शहर हजार किस्से’ पुस्तक में संजीव परसाई ने भोपाल शहर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक विविधताओं को अलग अलग किस्सों में पिरोया है। यह पुस्तक भोपाल शहर की तमाम कहानियाँ, अतीत के घटनाक्रम और स्थानीय किंवदंतियों को जीवंत तरीके से सिलसिलेवार पेश करती है। संजीव परसाई की धाराप्रवाह लेखनी भोपाल शहर की व्यापक और विविध तस्वीर उकेरती है। लेखक ने इस शहर के इतिहास, संस्कृति, और सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से प्रस्तुत किया है।"भोपाल: एक शहर हजार किस्से" पुस्तक में भोपाल की ऐतिहासिक घटनाएँ, प्रमुख व्यक्तित्व और सांस्कृतिक परंपराओं की विविध कहानियाँ शामिल हैं। प्रत्येक कहानी एक अलग दृष्टिकोण से शहर के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है, जैसे कि रानी कमलापति की कथा,नवाबी दौर, विलीनीकरण आंदोलन, स्थानीय किंवदंतियाँ और शहर की सांस्कृतिक पहचान। पुस्तक बदलते और संवरते भोपाल की बहुरंगी तस्वीर पेश करती है। जब कैनवास बड़ा होता है तो उसमें रंग भी बढ़ते जाते हैं। भोपाल के विस्तारित कैनवास में भी हमें इस पुस्तक के जरिए कहीं सांस्कृतिक इंद्रधनुष देखने को मिलता है तो कहीं भोपालियों का अलग मिजाज। कहीं बड़े तालाब की विशालता आश्चर्य से आंखें फैला देती है तो कहीं कंक्रीट के नए उगते पेड़ दिल में फांस सी चुभा देते हैं। कुछ ऐसी ही स्थितियों से दो चार हुए कवि राही डूमरचीर को लिखना पड़ा होगा:
‘दरमियाँ एक तालाब था
जो नदी-सा बहता था
अब कंक्रीट के महल हैं दरमियाँ
जो पानी की क़ब्र पर उगे हैं।’
भोपाल: एक शहर,हजार किस्से’ पुस्तक की लेखन शैली कथात्मक और जीवंत है। लेखक ने भोपाल की कहानियों को एक सम्मोहक तरीके से प्रस्तुत किया है, जिससे पाठकों को शहर की प्राचीनता और आधुनिकता के समन्वय का रोचक अनुभव होता है। कहानियों की शैली और भाषा पाठकों को समय और स्थान की सीमा से परे ले जाती है।
पुस्तक में ऐतिहासिक घटनाओं के साथ-साथ सांस्कृतिक परंपराओं का भी समावेश है। पाठक भोपाल की नवाबी धरोहर, ऐतिहासिक स्थल जैसे इस्लामपुर और भारत भवन सहित स्थानीय धरोहरों की कहानियों से परिचित होते हैं। पुस्तक में प्रस्तुत तथ्य और शोध गहन और सटीक हैं। श्री परसाई ने विभिन्न स्रोतों से जानकारी एकत्र की है और उसे विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। ऐतिहासिक डेटा, सांस्कृतिक संदर्भ, और अन्य विवरण वास्तविकता पर आधारित हैं, जो पुस्तक की विश्वसनीयता को बढ़ाते हैं।
पुस्तक हमें भोपाल शहर के इतिहास,परंपरा,समृद्धि, संस्कृति और विविधता को एक नए दृष्टिकोण से समझाती है। यह न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए है, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो स्थानीय कहानियों और सांस्कृतिक परंपराओं में रुचि रखते हैं। "भोपाल: एक शहर हजार किस्से" एक समृद्ध और मनोरंजक पुस्तक है जो भोपाल की अनगिनत कहानियों को प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक शहर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को एक दिलचस्प और कथात्मक तरीके से उजागर करती है। यह एक उत्कृष्ट पुस्तक है जो भोपाल शहर की गहरी समझ प्रदान करती है। इसके माध्यम से पाठक भोपाल की ऐतिहासिक यात्रा और सांस्कृतिक समृद्धि के एक अनूठे दृष्टिकोण को जान सकते हैं। पुस्तक की उपयोगिता और विस्तृत विवरण इसे एक महत्वपूर्ण संदर्भ पुस्तक भी बनाते हैं।
अंत में,भोपाल एक ऐसा शहर है जहां हमें प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक विकास का एक अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है ।भोपाल विभिन्न संस्कृतियों का संगम है। यहां हिंदू, मुस्लिम और अन्य धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं। यहां की हरी भरी वादियां,तालाब झीलें,पहाड़ और सांस्कृतिक सरोकारों का असर ऐसा है कि जो एक बार यहां आता है,यहीं का होकर रह जाता है। तभी तो प्रख्यात साहित्यकार मंगलेश डबराल ने लिखा है:
‘मैंने शहर को देखा और मैं मुस्कराया
वहाँ कोई कैसे रह सकता है
यह जानने मैं गया
और वापस न आया।’
मित्र संजीव ने ‘भोपाल: एक शहर हजार किस्से’ पुस्तक के जरिए भोपाल के दो सौ सालों से ज्यादा के विस्तार को डेढ़ सौ पन्नों में समेट दिया है। भोपाल शहर के लोगों,पर्यटकों और यहां आने वाले लोगों के लिए यह पुस्तक एक ज्ञानवर्धक,मनोरंजक और भावनात्मक सहयोगी साबित होगी…बधाई और अनेक शुभकामनाएं।
अब्बू खां का कुत्ता
बड़े तालाब के किनारे बसा है भोपाल का सबसे वीआईपी और सुन्दर इलाका श्यामला हिल्स. यही की एक बस्ती में रहते थे अब्बू खां. वैसे तो अब्बू खां का भरा पूरा परिवार था लेकिन जवान होते ही बच्चे पंख फैलाकर उड़ गए और उन्होंने शहर में दीगर ठिकानों पर अपने घोंसले बना लिए. बेग़म असमय ही खुदा को प्यारी हो गयीं और अब्बू खां निपट अकेले रह गए. दरअसल, वे अपने खानदानी आशियाने का मोह छोड़ नहीं पाए और बच्चों के दड़बे नुमा घोंसलों में इतनी जगह नहीं थी कि वे अपनी हसरतों के साथ अब्बू खां की इच्छाओं को जगह दे सकें.
जैसा की होता है, अब्बू खां और बच्चों के बीच ईद का समझौता हो गया मतलब ईद पर बच्चे या तो अब्बू खां से मिलने आ जाते या फिर अब्बू खां किसी बच्चे के साथ ईद मनाने चले जाते. समय सुकून से गुजर रहा था और रही अकेलेपन की बात तो अब्बू खां को कुत्ता पालने का शौक था और वे कुत्ते को ही अपना साथी बना लेते थे,,,इससे समय भी व्यतीत हो जाता और उनका मन भी लगा रहता था.
परन्तु, अब्बू खां जितने गरीब थे उससे ज्यादा बदनसीब क्योंकि वे जब भी कुत्ते के साथ मन के तार जोड़ने लगते वह बच्चों की तरह उनके लाड प्यार से किनारा कर सड़क के आवारा कुत्तों के साथ जा मिलता और बेचारे अब्बू खां उदास एवं अकेले रह जाते. प्यार-मनुहार के साथ पाले गए कुत्ते के भाग जाने के बाद अब्बू खां ठान लेते कि अब किसी और कुत्ते को नहीं पालेंगे.
कुछ दिन तो वे अकेले गुजारते लेकिन किसी ठण्ड में कांपते या हड्डियों का दांचा बनी मां के स्तनों से भूख मिटाने के व्यर्थ प्रयास में जुटे आठ-दस पिल्लों और फिर उन्हें भूख से बिलबिलाते देखकर अब्बू खां का मन पसीज जाता और वे एक पिल्ले को अपने साथ ले आते. अब्बू खां का मन तो सभी को लाने का रहता था लेकिन खुद अब्बू खां के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ मुश्किल से हो पाता था तो वे दर्जन भर पिल्लों का बंदोबस्त कहाँ से करते इसलिए मन मारकर एक ही पिल्ला गोद ले लेते थे.
अब्बू खां अपनी तरफ पिल्ले को पाल पोसकर बड़ा करने में हरसंभव प्रयास करते थे जैसे ब्रेड खिलाना,कभी कभी बिस्किट तो कभी दूध में रोटी गलाकर देना और कभी जुगाड़ हो जाए तो अपने हिस्से में से मटन-चिकन का स्वाद भी लगा ही देते थे. पिल्ला जब तक पिल्ला रहता तो दिनभर अब्बू खां के सामने कूं कूं कर दुम हिलाता रहता,उनके पैरों को कभी चाटता तो कभी लोट-पोट होता रहता.
अब्बू खां का भी मन लगा रहता था. दिक्कत पिल्ले के बड़े होने के बाद शुरू होती थी क्योंकि जैसे ही उसे बाहर की हवा लगती वह धीरे धीरे अब्बू खां से कन्नी काटने लगता और फिर किसी दिन फुर्र हो जाता. बेचारे अब्बू खां गम में डूब जाते और फिर कभी कुत्ता नहीं पालने की कस्में खाते. इस बार, तो अब्बू खां ने वाकई ठान लिया था तभी तो गली-मोहल्ले में किकियाते-चिचियाते और उनके पैरों में लोट पीट होते पिल्लों को देखकर भी उन्होंने अपना मन कड़ा कर लिया था. कुछ महीने यूँ ही बीत गए और अब पास-पड़ोस के लोग भी समझ चुके थे कि इस बार अब्बू खां अकेले रहने का मन बना चुके हैं.
सब कुछ ठीक चल रहा था तभी उनकी जिन्दगी में रुस्तम की घुसपैठ हुई. घुसपैठ इसलिए क्योंकि अब्बू खां ने तो कुत्ता नहीं पालने की जिद ठान ली थी लेकिन मासूम और पनीली आखों वाला,भूरे रंग का तथा किसी विदेशी नस्ल के कुत्ते को मात करता रुस्तम आते जाते उनकी ओर टकटकी लगाये देखता रहता और अब्बू खां के पास आते ही उनसे लिपट जाता. उसकी मासूमियत और सुन्दरता इतनी मनमोहक थी कि अब्बू खां को अपनी कसम तोडनी पड़ी और वे रुस्तम को घर ले आए.
दरअसल,रुस्तम उसका नाम नहीं था बल्कि अब्बू खां ने प्यार से उसका नाम रुस्तम रख दिया था. रुस्तम के आते ही अब्बू खां का आशियाना फिर चहल पहल का अड्डा बन गया. अडोस-पड़ोस के बच्चे रुस्तम के साथ खेलने लगे और रुस्तम के बहाने अब्बू खां के नियमित खानपान की व्यवस्था भी होने लगी.
रुस्तम वाकई में अब्बू खां के अब तक पाले गए कुत्तों से अलग था. जब वे उसे मोहल्ले के इकलौते हैंडपंप के नीचे बिठाकर नहलाते तो उसका रोम रोम खिल उठता और फिर उसके सामने श्यामला हिल्स के साहबों के यहाँ पेडिग्री खाकर एसी में मस्त गुलगुले बिछौने पर सोने वाले और मेमसाहबों की गोद में चढ़कर लड़ियाने वाले विदेशी नस्ल के महंगे पिल्ले भी फीके पड़ जाते. विदेशी नस्ल के झबरे,बड़े मुंह वाले,लम्बे मुंह वाले और बालों से आँख तक ढककर घूमने वाले कुत्ते तो कुत्ते उनके मालिक और मैडम भी रुस्तम को ईर्ष्या से देखते थे और फिर अंग्रेजी में बड़-बड़ करते हुए अपने विदेशी कुत्ते को देशी सड़क पर पूर्ण देशी अंदाज में हगा-मुताकर अन्दर ले जाते.
अब्बू खां को न उनकी अंग्रेजी समझ में आती और न ही जलन...वे तो बस, रुस्तम की मस्ती में मगन रहते. अब्बू खां का घर मस्जिद के करीब था और वैसे भी मस्जिद के मौलाना साहब गला फाड़कर इतनी ऊँची आवाज़ में अज़ान भरते थे कि गैर नमाजियों की भी हडबडाकर नींद खुल जाती थी. रुस्तम को पता नहीं क्यों मौलाना साहब की आवाज़ खूब पसंद आने लगी थी क्योंकि जब भी वे अज़ान भरते रुस्तम उनके सुर में सुर मिलाकर ऊँचा मुंह करके आवाज निकालने लगता. कुछ दिन में उसका अभ्यास और समय इतना सध गया कि मौलाना साहब के साथ उसकी सुरबंदी देखने लायक हो गयी. अब्बू खां के पैर तो जमीन पर नहीं पड़ते थे क्योंकि गली मोहल्ले के लोग भी रुस्तम के इस हुनर की जमकर प्रशंसा करते नहीं थकते थे.
अब्बू खां तो रुस्तम को ख़ुदा की नेमत मानने लगे और उसकी और भी ज्यादा देखभाल और सत्कार करने लगे. अब्बू खां और रुस्तम के सम्बन्ध समय के साथ गहरे होते गए और अब उनका दिनभर रुस्तम के साथ ही बीतते लगा. उधर,समय के साथ रुस्तम का आकार भी बढ़ने लगा और अब वह भरा-पूरा, जवान और किसी उम्दा नस्ल का कुत्ता दिखता था. रुस्तम के बड़े होने के साथ ही अब्बू खां की चिंता बढ़ने लगी और वे उसे बाहरी या यों कहें सड़क की दुनिया की हवा लगने से बचाने के लिए तमाम जतन करने लगे.
किसी तरह कबाड़ी से जुगाड़ कर अब्बू खां एक पुरानी जंजीर ले आए और रुस्तम को पहना दी. जब भी अब्बू खां रोटी-पानी के प्रबंध के लिए जाते रुस्तम को जंजीर से बाँध देते थे जिससे वो घर से बाहर नहीं जा सके. अब्बू खां अब निश्चिन्त थे कि रुस्तम अब नहीं भाग पायेगा लेकिन रुस्तम तो रुस्तम था. वह मौलाना साहब की आवाज़ के साथ साथ अपनी बिरादरी की आवाज भी पहचानने लगा था और अक्सर उनके साथ अपनी आवाज बुलंद कर अपनी मौजूदगी का अहसास भी करा ही देता था.
अब्बू खां की जंजीर ने रुस्तम को तो रोक लिया था लेकिन उसकी बिरादरी को कैसे रोकते इसलिए गाहे-बगाहे गली के आवारा कुत्तों का झुण्ड रुस्तम के दीदार को आ ही जाता. इस झुण्ड में रुस्तम की हमउम्र जैसी भूरी भी थी जो कुछ देर रूककर रुस्तम को निहार लेती थी.धीरे धीरे रुस्तम और भूरी में नैन-मटक्का शुरू हो गया और भूरी अपने झुण्ड से विद्रोह कर रुस्तम के आसपास मंडराने लगी.
अब रुस्तम को भूरी और बाहर की दुनिया अच्छी लगने लगी. आखिर बुजुर्ग अब्बू खां और उनकी पुरानी जंजीर जवान-तंदुरुस्त रुस्तम को कब तक रोक पाते. उसने एक दिन जोर लगाया और जंजीर के टुकड़े टुकड़े हो गए. फिर क्या था रुस्तम ने ‘जब हम जवां होंगे,जाने कहाँ होंगे...’ अंदाज में भूरी के साथ अब्बू खां का आशियाना छोड़ दिया.
अब्बू खां ने भरसक कोशिश की रुस्तम को रोकने की लेकिन जवानी के सामने लाचार बुढापे का क्या जोर. रुस्तम और भूरी दिनभर साथ साथ घूमे-खेले और अपनी तमाम हसरतें पूरी करते रहे. इस दौरान वे अब्बू खां के इलाक़े से काफी दूर निकल आए. अँधेरा होते ही भूरी अपने झुण्ड के साथ अपने सुरक्षित ठिकाने पर निकल गयी और रुस्तम नयी मंजिल की ओर.
रुस्तम को अब तक बाहर की दुनिया लाज़वाब लगने लगी थी क्योंकि कहाँ अब्बू खां की जरा सी झोपडी और जंजीर वाला कैदखाना और कहाँ भूरी,पार्क,सड़क,बिजली और सड़क पर मौजूद खाने-पीने के साधनों से भरी आज़ाद दुनिया...इसलिए रुस्तम ने वापस नहीं लौटने का फैसला किया. यहाँ तक की मौलाना साहब की आवाज़ भी रुस्तम को वापस नहीं बुला सकी. रात ढलते ही रुस्तम ने एक पार्क में बेंच के ऊपर अपना ठिकाना बनाया और सो गया.
कुछ ही वक्त बीता होगा कि उसने खुद को उस इलाक़े के खूंखार,गंदे,डरावने और पैने दांतों वाले दर्जन भर कुत्तों की गैंग से घिरा पाया. अब तक अब्बू खां के लाड में पले रुस्तम को लड़ना तो आता नहीं था इसलिए उसने झुककर और बचकर निकलना चाहा. गली के कुत्तों के लिए तो रुस्तम बंगलों में ऐशो आराम से पल रहे कुत्तों का प्रतिनिधि था और वे किसी भी अमीर कुत्ते को अपने बीच सुख से सोते हुए कैसे बर्दाश्त कर सकते थे इसलिए उन्होंने विदेशी कुत्तों के प्रति अपनी पूरी नाराजगी रुस्तम पर उतार दी.
रुस्तम ने हरसंभव प्रतिशोध किया लेकिन कहाँ लड़ाई में पारंगत सड़क के कुत्ते और कहाँ नाजो में पला रुस्तम...कुछ देर में ही उसकी हिम्मत जवाब दे गयी और फिर क्या था गली के कुत्तों ने नोंच नोचकर रुस्तम से विदेशी कुत्तों की शान शौकत भरी जिन्दगी के प्रति अपने विरोध का बदला ले लिया...कुछ ही देर में रुस्तम ने दुनिया छोड़ दी.
रुस्तम और कुत्तों की गैंग की इस लड़ाई को उस पार्क के पेड़ पर बैठी चिड़ियाओं का एक समूह भी देख रहा था. लड़ाई पूरी होते ही जवान चिड़ियाओं ने कहा कुत्तों का गैंग जीता,परन्तु एक बूढी चिड़िया ने कहा –रुस्तम जीता क्योंकि उसने गुलामी की बेड़ियाँ तोड़कर आज़ादी को चुना. सुबह रुस्तम को तलाशते पार्क पहुँचे अब्बू खां का कलेजा मुंह को आ गया और उन्होंने फिर कसम खाई कि अब कोई कुत्ता नहीं पालेंगे.
(पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षाविद जाकिर हुसैन की सुप्रसिद्ध कहानी ‘अब्बू खां की बकरी’ से प्रेरित)
ढाई राज्यपाल और दो मुख्यमंत्रियों वाला अनूठा शहर…!!
‘बालूशाही’ के बहाने बदलाव की बात…!!
इन दिनों पिज़्ज़ा, बर्गर,केक और पेस्ट्री में डूब-उतरा रही नयी पीढ़ी ने तो शायद बालूशाही का नाम भी नहीं सुना होगा। इस पीढ़ी को समझाने के लिए हम कह सकते हैं कि बालूशाही हमारे जमाने का मीठा बर्गर था या फिर आज का उनका प्रिय डोनट। समझाने तक तो ठीक है, लेकिन ‘कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली’ वाले अंदाज में कहें तो बालूशाही की बात और अंदाज़ ही निराला है।
मैदे और आटे की देशी घी के साथ गुत्थम गुत्था वाली नूराकुश्ती के बाद उठती सौंधी और भीनी सुगंध और फिर चीनी की चाशनी में इलायची की खुशबू के साथ गोते लगाती गोल मटोल बालू। दरअसल बालू इसलिए क्योंकि शाही सरनेम तो इसे चीनी और इलायची का आवरण ओढ़ने के बाद ही मिलता है। कई जगह इसे बालुका भी कहते हैं जिसका अर्थ होता है बाटी या गेंहू से बनी गेंद। जब यह बालुका, चाशनी को पीकर और उसमें नहाकर शाही तेवर अपनाते हुए इतनी मुलायम हो जाती है कि मुंह में रखते ही घुल जाती है।
देखने में कचौरी की छोटी-मीठी बहन और आकार में लड्डू की दीदी बालूशाही किसी समय हर शादी-ब्याह,पार्टी और पंगत का सबसे प्रमुख आकर्षण होती थी। अपने मीठे पर सूखे कलेवर के कारण इसे कहीं भी लाना-ले जाना और रिश्तेदारी में भेजना भी आसान था क्योंकि न तो यह गुलाब जामुन खानदान की तरह रस टपकाकर कपडे ख़राब करती है और न ही लड्डू की तरह भरभरा कर बिखर जाती है बल्कि यह तो ‘माँ’ की तरह ऊपर से कठोर और अन्दर से नरम स्वभाव वाली है।
हमारी बालूशाही खोया और छेना की छरहरी मिठाइयों की तरह भी नहीं है जिनके स्वाद की असलियत दो चार दिन में खुल जाती है और वे बेस्वाद हो जाती हैं जबकि बालूशाही तो कई दिनों तक अपने स्वाद को अपने अंदर सहेजे रहती है। उत्तरप्रदेश और बिहार में तो बताते हैं कि आज भी बालूशाही का राज चल रहा है और नए दौर की मिठाइयाँ इसके इर्द-गिर्द उसी तरह संख्या बढाने का काम काम करती हैं जैसे विवाह में दुल्हन की सहेलियां। उत्तरप्रदेश के बरेली के श्यामगंज में रम्कूमल की दुकान पर मिलने वाली शुद्ध देशी घी में बन रहीं करीब 100 साल पुरानी बालूशाही की मिठास आज भी लोगों को अपनी ओर खींच लाती है। बरेली का झुमका तो पहले ही बरेली के बाजार को देश भर में लोकप्रिय बना गया लेकिन यहाँ की बालूशाही ने झुमके को भी पीछे छोड़ दिया।
भारत ही क्या, हमारे हमजाया पाकिस्तान-बांग्लादेश और नेपाली व्यंजनों में भी यह ऊँचे दर्जा रखती है। बालूशाह, मक्खन बड़ा,भक्कम पेड़ा और या बाडुशा जैसे नामों से लोकप्रिय बालूशाही के नाम से भी जाना जाता है.जब बालूशाही में क्षेत्र के अनुसार कई तरह के बदलाव भी देखने को मिलते हैं मसलन उत्तर भारत में बालूशाही ज़्यादा मालदार होती है, वहीँ, दक्षिण में आमतौर पर सूखी और कम मीठी । लेकिन इस विविधता के बावजूद, बालूशाही इन दोनों ही इलाकों में अपनी खास पहचान रखती है ।
खास बात यह है कि बालूशाही पूरीतरह से स्वदेशी है और हमारे देश में ही जन्मी और सैकड़ों साल से अपने खास स्वाद के साथ विकसित हुई है। यही कारण है कि जयपुर और घनघोर मालवा में यह मक्खन बड़ा के बदले नाम से नजर आती है. इन्हीं वहीं,मक्खन बड़ा दक्षिण में बेकिंग सोडा से यारी कर यह बाडुशा कहलाने लगती है तो गोवा जाकर वहां की खुली आवोहवा में यह भक्कम पेड़ा बन जाती है.
बालूशाही की वापसी से यह बात भी साबित होती है कि किसी का भी समय सदैव एक सा नहीं रहता, वह बदलता जरूर है।बस, इसके लिए धीरज और कुछ समयानुरूप बदलाव की जरूरत होती है। इसलिए, यदि आप अभी गुमनामी के दौर से गुजर रहे हैं तो निश्चिंत रहिए वक्त आपका भी बदलेगा और आप भी अपने समाज की मुख्य धारा में एक दिन अवश्य ही वापस लौटेंगे।
और हां एक और बात, जो लोग इन दिनों सोन पापड़ी का मज़ाक बना रहे हैं वे भी ध्यान रखें कि सुनहली रंगत वाली यह मिठाई एक दिन फिर शादी-पार्टियों की शान बनेगी और तब आपको उसके डिब्बे बिना खोले किसी और के यहां भेज देने का पछतावा होगा। वैसे भी, वंदे भारत जैसी ट्रेनों में सोन पापड़ी अपने परिवार को छोड़कर अकेले नई पैकिंग में नजर आने लगी है। आप भी, समय के मुताबिक खुद में कुछ बदलाव लाइए और फिर देखिए,समाज आपको कैसे हाथों हाथ लेता है।
वे अपने से हैं, सभी के हैं, तभी तो परम प्रिय हैं गणेश…,!!
वे सहज हैं, सरल हैं और सर्व प्रिय भी। बच्चों को वे अपने बालसखा लगते हैं तो युवा उन्हें सभी परेशानियों का हल मानते हैं । बुजुर्गों के लिए वे आरोग्यदाता और विघ्नहर्ता हैं तो महिलाओं के लिए सुख समृद्धि देने वाले मंगलमूर्ति। यह देवताओं में तुलना की बात नहीं है लेकिन भगवान गणेश जैसी व्यापक, सर्व वर्ग और हर उम्र में लोकप्रियता ईश्वर के किसी भी अन्य रूप को इतने व्यापक स्तर पर हासिल नहीं है। सभी वर्ग, जाति और उम्र के लोग श्री गणेश को अपने सबसे करीब पाते हैं इसलिए वे लोक देव हैं।
उनकी भक्ति और आराधना के कोई कठोर नियम नहीं हैं। उनकी पूजा में सरलता, सार्वभौमत्व और व्यापक अपील है। आप ढाई दिन पूजिए या दस दिन, मिट्टी से बनाइए या पान सुपारी से या फिर किसी ओर सामग्री से,विधि विधान से पूजिए या केवल हाथ जोड़कर स्मरण करिए…वे आपसे खुश ही रहेंगे । गणेश जी को विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। गणेश जी को विघ्नहर्ता इसलिए माना जाता है क्योंकि वे जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं। उनकी बुद्धि और ज्ञान के किस्से घर घर में मशहूर है।
गणेश जी की सौम्य और मिलनसार छवि है, जो लोगों को उनसे जुड़ने में मदद करती है। गणेश जी सभी जाति और धर्म के लिए पूज्य हैं, इसलिए उन्हें घर घर में पूजा जाता है। भगवान गणेश को लोक देवता इस कारण से भी माना जाता है क्योंकि वे विभिन्न भारतीय परंपराओं और समाजों में व्यापक रूप से पूजित हैं। गणेश जी की पूजा हर वर्ग और जाति के लोग करते हैं, और उनकी उपस्थिति घर के हर कोने में महसूस की जाती है।
गणेश को बाधाओं को हटाने वाले और समृद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है, जिससे वे सभी लोगों के लिए प्रिय बन जाते हैं। उनकी सरलता, समर्पण, और असीमित दया के कारण वे आम जनमानस के बीच गहरे तौर पर जुड़ गए हैं। गणेश की सुंदरता, उनके विशेष रूप हाथी का सिर, मानव शरीर और उनके दया भाव की वजह से उन्हें हर उम्र के लोग पसंद करते हैं।
गणेश की कथाएँ और उपदेश जीवन की महत्वपूर्ण सीख देती हैं, जैसे धैर्य, समर्पण, और कठिनाइयों का सामना करना, जो हर उम्र के लोगों के लिए प्रेरणादायक होते हैं। कुल मिलाकर कहने का अर्थ यह है कि यदि आप सरल,सहज,मददगार और मिलनसार हैं तो आपका बेढब स्वरूप भी सब को प्रिय लगने लगते है वरना खराब स्वभाव और लोक व्यवहार की कमी आपकी सुंदरता को भी कुरूप बना सकती है। आप में क्षमता है तो आप भगवान गणेश की तरह चूहे पर बैठकर भी दुनिया जीत सकते हैं वरना जहाज भी कम पड़ जाते हैं।..और, सबसे जरूरी है सभी को साध लेने का गुण जो आपको बच्चों से लेकर महिलाओं और बुजुर्गों तक से अपनापन दिला सकता है। तो, इन दस दिनों में रिद्धि सिद्धि के दाता की भक्ति के साथ उनके स्वभाव,व्यक्तित्व और सोच की सहजता को जीवन में उतारने का प्रयास करिए और फिर देखिए कैसे समय के साथ सुख समृद्धि से आपकी झोली भरती जाएगी।
गणेश विसर्जन…मानो, मतदान की रात!!
कबीर दास जी ने लिखा है..’लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल, लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल'...कुछ यही हाल अनंत चतुर्दशी के दिन मुंबई,भोपाल और जबलपुर जैसे तमाम शहरों का था। कबीर ने यह दोहा भले ही किसी और भाव में लिखा था लेकिन फिलहाल तो यह गणेश विसर्जन के माहौल पर सटीक लग रहा था क्योंकि
हर तरफ गणेश जी ही गणेश जी थे..कहीं छोटे से खूबसूरत गणेश तो कहीं लंबे चौड़े लंबोदर, कहीं पंडाल को छूते गणेश तो कहीं भित्ति चित्र में सिमटे गणेश। भोपाल में एक पंडाल ने तो भगवान गणेश के जरिए मां भगवती और भोले शंकर दोनों को साध लिया। उन्होंने शेर पर मां दुर्गा की वर मुद्रा वाली शैली में भगवान गणेश को बिठा दिया और उन्हें शिवशंकर की तरह जटा जूट के साथ नीले रंग में रंग दिया…मतलब, आप विघ्नहर्ता के साथ शक्ति और शिव को भी महसूस कर सकें।
खैर, अनंत चतुर्दशी के माहौल पर ही कायम रहें तो तमाम घाटों पर एक के बाद एक गणेश चले आ रहे थे। कहीं, साइकिल पर गणेश तो कहीं रिक्शे पर, मोटरसाइकिल पर, कार में और यहां तक कि ट्रैक्टर और ट्रक में भी। जहां देखो वहां बस भगवान गणेश और उनके साथ था हजारों स्त्री/पुरुष/युवाओं/बच्चों का हुजूम…जो डीजे पर बज रहे अलग अलग धुन के कानफोडू गीतों पर एक ही ढंग से नाचता-कूदता सड़कों/घाटों को रौंदने पर आमादा था।
सड़कों पर गूंजती पुलिस की सीटियां और इशारे उनके नृत्य के जोश को कम करने के बजाए बढ़ाने में ‘बघार लगाने जैसा’ काम कर रहे थे। सबसे दर्शनीय आलम तो घाटों पर था…बिल्कुल मतदान वाले दिन जैसा। कल्पना कीजिए,मतदान के बाद मतपेटी और अन्य चुनावी सामग्री जमा कराने के लिए कैसा कोहराम मचता है…सभी चाहते हैं कि उनकी वोटिंग मशीन जमा हो और वे गंगा नहाएं। कुछ यही हाल विसर्जन स्थल पर प्रतिमाएं सौंपने का था। सभी इस चक्कर में थे कि फटाफट अपनी मूर्ति सौंपे और घर पहुंचे लेकिन ‘पहले मैं,पहले मैं’ की चिल्लपो में कोई भी आगे नहीं बढ़ पा रहा था जबकि भोपाल सहित तमाम शहरों में नगर निगम और जिला प्रशासन ने क्रेन और भीमकाय मशीनों के जरिए विसर्जन की आसान व्यवस्था कायम की थी।
वैसे भी,हम भारतीय मौलिक रूप से आसान व्यवस्था को भी कठिन बनाने में माहिर हैं इसलिए किसी को भगवान गणेश को क्रेन के हवाले करने की जल्दी थी तो कोई मंडल सपरिवार यहां भी फुरसत से आरती करने में जुटा था।
बारिश और कारों की धमा चौकड़ी के कारण विसर्जन घाट में बना कीचड़ का दरिया मानो चप्पल जूतों से होकर कपड़ों पर मॉर्डन आर्ट बनाने को बेताब था । फिर भी, उसी में छप छप करके अपने साथ साथ अन्य लोगों को अपनी कीचड़-कारी का नमूना पेश करते लोगों में अपनी अपनी प्रतिमाएं सौंपने की होड़ मची थी। हड़बड़ी में कुछ लोगों ने अपने वाहन भी इतने बेतरतीब तरीके से खड़े किए थे कि गलती से भी कोई बिना कीचड़ में लिपटे न निकल सके। इस सबके बाद भी विसर्जन वीर पूरे जोश में थे और कुछ तो होश तक खो चुके थे। इस तरह के टुन्न बहादुरों को नियंत्रित करना ज्यादा मुश्किल था क्योंकि उत्साह में उनके क्रेन पर चढ़कर प्रतिमा की जगह खुद विसर्जित होने का खतरा ज्यादा था। फिर भी सरकारी अमले ने आपा नहीं खोया और विसर्जन कार्यक्रम ‘गणपति बप्पा मोरया अगले बरस तू जल्दी आ..’ की गर्जना और मंगल कामना के साथ बिना किसी अमंगल के पूरा हो गया।
शनिवार, 15 जून 2024
भारतीय पराक्रम की स्वर्णिम गाथा है… ‘विजय दिवस’
इतिहास के पन्नों में दर्ज निर्णायक तारीख जरूर 16 दिसंबर 1971 है, लेकिन पाकिस्तान की कारगुजारियों ने उसकी नींव कई साल पहले डाल दी थी । जब उसकी सेना के अत्याचारों से कराह रहे पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने मदद के लिए भारत से गुहार लगाना शुरू कर दिया था। आखिर, तत्कालीन भारत सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और फिर भारतीय सैनिकों के शौर्य और पराक्रम का स्वर्णिम पन्ना ‘विजय दिवस’ के नाम से इतिहास में दर्ज हो गया ।
16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तान की ओर से पूर्वी मोर्चे पर कमान संभाल रहे लेफ्टिनेंट जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाजी ने भारतीय सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और हजारों उत्साही लोगों की भीड़ के समक्ष आत्मसमर्पण के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। हस्ताक्षर के बाद जनरल नियाजी ने अपनी रिवाल्वर जनरल अरोड़ा को सौंपकर पराजय स्वीकार कर ली। इस ऐतिहासिक अवसर पर बांग्लादेश सशस्त्र बल के डिप्टी कमांडर-इन-चीफ एयर कमोडोर ए के खांडकर और भारत की पूर्वी कमान के लेफ्टिनेंट जनरल जे एफ आर जैकब ने आत्मसमर्पण के गवाह की भूमिका निभाई जबकि पाकिस्तान की ओर से तो उसकी सेना के सर झुकाए 90 हजार सैनिक इस पराजय के साक्षी थे।
भारतीय सेनाओं के अदम्य साहस, वीरता, बलिदान और पराक्रम के लिए दुनिया के सैन्य इतिहास की इस अमिट तिथि को हर साल विजय दिवस के रूप में याद किया जाता है। इस दिन ऐतिहासिक युद्ध में जीत हासिल करने वाले भारतीय सैनिकों को देशभर में विनम्र श्रद्धांजलि दी जाती है। इन कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री सहित देश और प्रदेश की शीर्ष हस्तियां भी शामिल होती हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा 'विजय दिवस पर, हम उन सभी बहादुर नायकों को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जिन्होंने 1971 में निर्णायक जीत सुनिश्चित करते हुए कर्तव्यनिष्ठा से भारत की सेवा की. उनकी वीरता और समर्पण राष्ट्र के लिए अत्यंत गौरव का स्रोत है. उनका बलिदान और अटूट भावना हमेशा लोगों के दिलों और हमारे देश के इतिहास में अंकित रहेगी. भारत उनके साहस को सलाम करता है और उनकी अदम्य भावना को याद करता है.' इस साल,रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने नई दिल्ली में विजय दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य लोगों के साथ नई दिल्ली में आर्मी हाउस में विजय दिवस की पूर्व संध्या पर 'एट होम' रिसेप्शन में शामिल हुईं।
आइए, अब एक नजर इस विजय दिवस की पृष्ठभूमि पर डालते हैं। दरअसल,भारत से बेमेल विभाजन के बाद बने पाकिस्तान में पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच कभी भी एका नहीं रहा और पश्चिमी पाकिस्तान के प्रभुत्व वाले शासकों ने बंगाली बहुल पूर्वी हिस्से को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह खाई जब और चौड़ी हो गई तब 1970 के दौरान हुए आम चुनावों में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग पार्टी को जबरदस्त समर्थन मिला और उसने सरकार बनाने का दावा किया, लेकिन पाकिस्तानी हुकूमत को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि उसकी नाफरमानी करने वाली कोई पार्टी वहां सत्ता संभाले।
इसलिए जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार ने येन केन प्रकारेण इस बात के प्रयास शुरू कर दिए कि अवामी लीग को सत्ता न मिले। अपने षड्यंत्र को पूरा करने के लिए उसने सेना को भी मोर्चे पर लगा दिया। पर्याप्त जनसमर्थन के बाद भी सत्ता से दूर रखने की साजिश का अवामी लीग ने राजनीतिक स्तर पर विरोध किया और इससे पूर्वी पाकिस्तान में हालात खराब होते चले गए। लोकतंत्र की आवाज़ को दबाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया. इस कदम से विरोध हिंसक हो गया और पाकिस्तान के दोनों हिस्सों पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हालात बेकाबू होने लगे। पूर्वी पाकिस्तान में हालात बद से बदतर होने के कारण बड़ी संख्या में वहां से शरणार्थी भारत आने लगे।
भारत ने मानवीय आधार पर शरणार्थियों को हरसंभव सहायता प्रदान की। भारत की ओर से मदद देने से पाकिस्तान बौखला गया और उसने भारत को आंख दिखाते हुए हमले करने की धमकियां देना शुरू कर दिया. अपने बिगड़ते अंदरूनी हालात के कारण पाकिस्तानी शासक वास्तव में अपनी सुध बुध खो बैठे और उन्होंने परिणामों और अपने हित अहित की चिंता किए बगैर 3 दिसंबर 1971 को भारत के कई शहरों पर हमला कर दिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आधी रात को देश के नाम संबोधन में पाकिस्तान की ओर से किए गए हमले की जानकारी देते हुए अपनी ओर से भी युद्ध का ऐलान कर दिया।
भारत-पाकिस्तान युद्ध करीब 13 दिन तक चला और 16 दिसंबर को भारत की ऐतिहासिक जीत और बंगलादेश के निर्माण के साथ समाप्त हुआ। युद्ध के समापन पर 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेनाओं के समकक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। इस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी. इस दौरान करीब 3 हजार 900 भारतीय सैनिकों को अपना सर्वोच्च बलिदान देना पड़ा। पाकिस्तान का तो अंतर राष्ट्रीय बिरादरी के सामने न केवल सर झुका बल्कि उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा ।
पाकिस्तान के साथ इस युद्ध में विजयश्री का वरण करने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान को एक नया राष्ट्र बनाने का एलान किया, जिससे बांग्लादेश का जन्म हुआ. इस युद्ध में भारतीय सैनिकों ने साबित कर दिया कि परम पराक्रमी होने के बाद भी भारतीय नीति के पालन करते हुए कभी भी किसी देश पर हमला नहीं करते लेकिन यदि किसी देश ने गलत इरादों और दुश्मनी की मंशा से भारत पर हमला किया तो वे मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम हैं ।
कुत्ते की राखी…कीमत सुनकर आप चौंक जाएंगे!
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