शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

क्या हर गाली एक जैसी होती है?

Jugaali on gali

क्या गाली हमेशा एक जैसी होती हैं? क्या देश, काल, परिस्थिति, बोलने वाले, सुनने वाले और सामाजिक संदर्भ के साथ उसके अर्थ नहीं बदलते हैं? गालियों को लेकर इस बुनियादी सवाल का कारण यह है कि जंतर-मंतर पर हुए हालिया प्रदर्शन में सबसे अधिक चर्चा मुख्य विषय की नहीं, बल्कि वहाँ खुलेआम दी गई गालियों और अश्लील पोस्टरों की हो रही है। पहले मुझे लगा कि इस विषय पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए लेकिन गालियों/अश्लील पोस्टरों के पक्ष में आ रहे तर्कों के कारण मुझे अपनी बात रखना जरूरी लगा।

इस लेख में उठाए गए प्रश्न को दो प्रमुख उदाहरणों से समझा जा सकता है। पंजाब के अनेक हिस्सों में कुछ पारिवारिक गालियाँ मित्रों और रिश्तेदारों के बीच आत्मीयता या सहज बातचीत का हिस्सा हैं। मसलन भैं*द, पैन*द, बहन दी, माँ दी, हरामी, उल्लू दा पट्ठा जैसी गालियां सहज बोलचाल का हिस्सा हैं। वहीं, भोपाल में भी मा*ड़े-भैं*ड़े जैसे शब्द सार्वजनिक रूप से बोले जाते हैं। पूर्वांचल, हरियाणा, राजस्थान और बुंदेलखंड में भी कई ऐसे संबोधन हैं जो बाहर के व्यक्ति को असभ्य लग सकते हैं, पर स्थानीय संस्कृति में हल्के फुल्के अंदाज में लिया जाता है। 

इसके उलट, यही शब्द यदि किसी अदालत, संसद, विश्वविद्यालय के मंच, टीवी बहस या किसी शोकसभा में बोले जाएं तो उनका अर्थ बदल जाता है। कहने का आशय यह है कि गाली का वजन शब्दों में नहीं, उसके संदर्भ में ज्यादा छिपा होता है।

अश्लील पोस्टर
यही कारण है कि भाषा को केवल शब्दों से नहीं, उसके सामाजिक संदर्भ से समझना जरूरी है। जंतर-मंतर का आंदोलन निजी बातचीत नहीं थी, न दोस्तों की महफ़िल थी और न ही किसी क्षेत्रीय बोली का स्वाभाविक प्रयोग। यह राष्ट्रीय राजधानी में हुआ सार्वजनिक प्रदर्शन था। यहाँ मीडिया, सोशल मीडिया, बच्चे, बुज़ुर्ग महिलाएं और विभिन्न विचारधाराओं के लोग मौजूद थे। ऐसे मंच पर गाली केवल व्यक्तिगत भाषाई अभिव्यक्ति नहीं बल्कि सार्वजनिक वक्तव्य की तरह है।

जंतर मंतर पर जो गालियां दी गईं और पोस्टरों पर जो अश्लील बातें लिखी गईं..वे किसी निजी कमरे, कॉलेज के हॉस्टल या दोस्तों की पार्टी का हिस्सा नहीं थीं। वे राष्ट्रीय राजधानी के प्रमुख सार्वजनिक स्थल पर, कैमरों के सामने, हजारों लोगों की मौजूदगी में प्रदर्शित की गई थीं इसलिए उन्हें केवल जेन ज़ी की भाषा कहकर नहीं टाला जा सकता।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन हर स्वतंत्रता के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। तीखा व्यंग्य, कठोर आलोचना और सत्ता से असहमति लोकतंत्र की शक्ति हैं, किंतु जब संवाद का स्थान गाली लेने लगती है, तो तर्क कमजोर पड़ने लगते हैं। इससे विरोध का नैतिक बल भी प्रभावित होता है, क्योंकि लोगों का ध्यान मूल मुद्दे से हटकर भाषा पर केंद्रित हो जाता है।

भारतीय इतिहास के सबसे प्रभावी आंदोलनों को उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि सभी ने सशक्त भाषा का प्रयोग किया, लेकिन गालियों और अश्लीलता का नहीं । चाहे महात्मा गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी हो या जयप्रकाश नारायण का आंदोलन हो या हालिया दौर का अन्ना हजारे आंदोलन..सभी में मुद्दे अहम रहे हैं और भाषा सार्वजनिक मंचों के अनुरूप।

जंतर मंतर प्रदर्शन

ऐसा भी नहीं है कि, इस सबके लिए केवल जेन ज़ी या आज के युवा ही दोषी हैं। हमने स्वयं ऐसी संस्कृति विकसित होने दी है जिसमें फिल्मों, वेब सीरीज़, गीतों, स्टैंड-अप कॉमेडी और सोशल मीडिया पर गालियाँ सामान्य मनोरंजन का हिस्सा बन गई हैं। यही कारण है कि आज के युवाओं की शब्दावली में एफ-शब्द या लिंग केंद्रित गालियां सहजता से शामिल हो गई हैं। वही भाषा अब युवा सड़क पर ले आ रहे हैं। यह समस्या हमारे देश भर की नहीं बल्कि तमाम विकसित कहलाने वाले देशों की भी है।

जंतर-मंतर की घटना यह भी बताती है कि डिजिटल संस्कृति और सार्वजनिक संस्कृति के बीच की सीमाएँ तेजी से मिट रही हैं। इसलिए, अब समाज को ही यह तय करना पड़ेगा कि सार्वजनिक जीवन की भाषा कैसी हो?...क्योंकि संसद, सड़क, शैक्षणिक संस्थान, दफ्तर, सोशल मीडिया, घर, दोस्तों की महफ़िल और जंतर-मंतर जैसे सार्वजनिक मंच की भाषा एक जैसी नहीं हो सकतीं। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि गाली हमारे आक्रोश को क्षणिक संतोष तो दे सकती है, पर समाज को आगे बढ़ाने का काम अंततः अच्छा संवाद ही करता है और संवाद से ही समस्या का समाधान निकलता है।

#Gali #JanterManter #Genz #language #culture #socialmedia #webseries 

बुधवार, 29 जुलाई 2026

गुरु पूर्णिमा विशेष: जब हर जेब में ‘ज्ञान’ है, तब ‘गुरु’ का क्या होगा!!

 

Monestry at Rivalsar, Himachal

आज हर जेब में ज्ञान का भंडार है। एक समय वह था जब ज्ञान तक पहुँचने के लिए शिष्य को गुरु के पास जाना पड़ता था। अब समय ऐसा आ गया है कि मोबाइल के जरिए ज्ञान हर जेब तक पहुंच गया है। एक क्लिक पर लाखों पुस्तकें उपलब्ध हैं, हजारों व्याख्यान हैं, अनगिनत वीडियो हैं, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तो हर सवाल का उत्तर चुटकियों में देने को तैयार है। कुल मिलाकर इंटरनेट ने पूरी दुनिया को एक विशाल डिजिटल पुस्तकालय में बदल दिया है। ऐसे समय में प्रश्न उठता है कि क्या अब गुरु की आवश्यकता समाप्त हो रही है?

गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें इसी प्रश्न का सबसे सार्थक उत्तर देता है। दरअसल, ज्ञान और गुरु कभी एक-दूसरे के विकल्प नहीं रहे। ज्ञान सूचना दे सकता है, लेकिन गुरु दृष्टि देता है। इंटरनेट तथ्यों का महासागर है, लेकिन उस महासागर में कौन-सा मोती चुनना है, यह विवेक गुरु ही सिखाता है।

आज की जेन जी (Gen Z) दुनिया की सबसे अधिक डिजिटल पीढ़ी है। उसके लिए मोबाइल सिर्फ़ फोन नहीं, बल्कि स्कूल, लाइब्रेरी, सिनेमा, बैंक, बाज़ार और मित्र सब कुछ है। वह किसी भी विषय पर कुछ ही सेकंड में जानकारी जुटा सकती है। लेकिन इस पीढ़ी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती जानकारी की कमी नहीं, बल्कि जानकारी की अधिकता या सूचनाओं का विस्फोट है।

हजारों उत्तरों के बीच सही उत्तर चुनना, सच और झूठ में अंतर करना, एल्गोरिद्म द्वारा परोसे जा रहे विचारों से स्वतंत्र सोच विकसित करना आज की सबसे बड़ी शिक्षा है। यह काम कोई सर्च इंजन नहीं बल्कि अच्छा एवं योग्य गुरु ही कर सकता।

Teacher

मौजूदा दौर में एआई कविता लिख सकता है, शोधपत्र तैयार कर सकता है, चित्र बना सकता है और जटिल समस्याओं का समाधान भी सुझा सकता है लेकिन वह यह तय नहीं कर सकता कि किसी निर्णय में संवेदना कहाँ आवश्यक है, नैतिकता किस पक्ष में खड़ी है और मनुष्य होने का असल अर्थ क्या है। यहीं से गुरु की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

वरना अब तो गुरु भी नकल और फर्जीवाड़े वाले हो गये हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्व विद्यालय के कुलगुरू रहे  श्री के जी सुरेश सर ने तो कहा है कि अब गुरुजी AI से किताबें लिख रहे हैं और उसमें ऐसे तथ्य इस्तेमाल कर रहे हैं जो हैं ही नहीं। इसतरह का एक मामला कोर्ट में भी आ चुका है जब फर्जी नतीजों के सहारे जज को गुमराह करने के प्रयास हुए हैं।

भारतीय संस्कृति में गुरु केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं रहा। गुरु वह है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए। वह केवल सूचना नहीं देता, बल्कि व्यक्तित्व गढ़ता है। वह केवल करियर नहीं बनाता, बल्कि चरित्र भी बनाता है। यही सबसे बड़ा फर्क है कि तकनीक उत्तर देती है, लेकिन गुरु प्रश्न पूछना सिखाता है।

आज शिक्षा का अर्थ भी बदल रहा है और गुरु का भी। पहले शिक्षक ज्ञान का एकमात्र स्रोत था। अब वह ज्ञान का संरक्षक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक (Mentor) है। उसका कार्य तथ्यों को दोहराना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में जिज्ञासा, आलोचनात्मक सोच, नैतिक विवेक, संवाद क्षमता और मानवीय संवेदनाएँ विकसित करना है। नई पीढ़ी को ऐसे गुरु चाहिए जो एआई को प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी मानें; जो विद्यार्थियों को उत्तर रटाने के बजाय सही प्रश्न पूछना सिखाएँ।

यह भी सच है कि आज के विद्यार्थी केवल शिक्षक से नहीं सीखते। वे यूट्यूब, पॉडकास्ट, ऑनलाइन कोर्स, सोशल मीडिया, ओपन-सोर्स प्लेटफ़ॉर्म और एआई से भी सीख रहे हैं। इसलिए आज गुरु का अधिकार आदेश देने में नहीं, बल्कि अपने आचरण, अनुभव और विश्वसनीयता से अर्जित सम्मान में है।

गुरु पूर्णिमा हमें यह भी याद दिलाती है कि जीवन में हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में गुरु हो सकता है। माता-पिता, शिक्षक, पुस्तकें, प्रकृति, अनुभव, असफलताएँ और कभी-कभी अपने विद्यार्थी भी हमें बहुत कुछ सिखा जाते हैं। सीखने की यह विनम्रता ही भारतीय गुरु-परंपरा की आत्मा है।

आने वाले वर्षों में एआई और अधिक बुद्धिमान होगा। मोबाइल और अधिक शक्तिशाली होंगे। डिजिटल पुस्तकालय और भी विशाल हो जाएंगे। लेकिन मनुष्य को तब भी ऐसे किसी गुरु की आवश्यकता रहेगी जो केवल रास्ता न बताए, बल्कि गिरने पर संभाल भी ले क्योंकि संस्कार आज भी किसी ऐप से डाउनलोड नहीं होते बल्कि योग्य गुरु के सान्निध्य में ही जन्म लेते हैं।

#guru #गुरुपूर्णिमा #teachers #mobilelegends

सोमवार, 27 जुलाई 2026

वास्तेगुना हुइंया नहीं है ‘पापा की परी’

 पापा की परी' शब्द का असली अर्थ और सोशल मीडिया ने इसे कैसे बदल दिया

Daughter and father
‘अरे, रहने दो... ये तो पापा की परी है!’ सोशल मीडिया पर यह वाक्य आजकल इतनी बार सुनाई देता है कि लगता है जैसे पापा की परी कोई रिश्ता नहीं, बल्कि मूर्खता का तमगा हो। अब स्थिति यह हो गई है कि सड़क पर किसी लड़की से छोटी-सी लापरवाही हुई या उसने किसी बात पर अधिकार जताया या कोई युवती  ज़्यादा भावुक हो गई या फिर उसने थोड़ा सा अपरिपक्व व्यवहार कर दिया…तुरंत ही कोई टिप्पणी आ जाएगी कि ‘पापा की परी है।’

लेकिन पापा की परी कोई ‘वास्तेगुना हुइंया’ नहीं है कि कहीं भी इस्तेमाल कर दिया। पापा की परी संबोधन में पिता का अथाह लाड़-प्यार, स्नेह, गर्व और सुरक्षा का भाव छिपा है जिसे आज इंटरनेट या सोशल मीडिया की भाषा में मूर्खता एवं नासमझी का प्रतीक बना दिया गया है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर पापा की परी जैसा स्नेहिल और आत्मीय संबोधन निगेटिव कैसे बन गया? 

मैंने गूगल गुरु से लेकर AI के अक्लमंद चैटबॉट से भी पूछा लेकिन वे भी सही सही उत्तर नहीं दे पाए। दरअसल वास्तेगुना हुइंया जैसे भाषा के कई नए मुहावरों की तरह पापा की परी का अर्थ भी धीरे-धीरे सोशल मीडिया की प्रयोगशाला में बदल गया।  हालांकि इन दिनों वायरल वाक्य ‘वास्तेगुना हुइंया’ का तो वाकई कोई अर्थ नहीं है लेकिन पापा की परी तो भावुक भाव लिए है । 

जानकारी मिलती है कि लगभग 2018-19 के बाद इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर (अब एक्स) और विशेष रूप से छोटे वीडियो प्लेटफॉर्मों पर ऐसे मीम और वीडियो आने लगे जिनमें कुछ लड़कियों को बेहद लाड़-प्यार में पली, ज़िम्मेदारी से दूर या वास्तविक दुनिया से अनजान दिखाया जाता था। इन वीडियो के साथ पापा की परी लिखना एक चलन बन गया। धीरे धीरे यह वाक्य इंटरनेट संस्कृति का हिस्सा बन गया।

Parasar lake, Himachal
चिंताजनक बात यह है कि यह बदलाव किसी शब्दकोश ने नहीं किया, बल्कि सोशल मीडिया की मीम संस्कृति ने किया। बिल्कुल वैसे ही जैसे आजकल रील में ‘तेरी गलियों में मुहब्बत होगी..’ गाने की ऊटपटांग चेहरे बनाकर टांग खींची जा रही है। इस लिहाज से देखें तो आज सोशल मीडिया केवल शब्दों का नहीं, उनके अर्थों का भी निर्माता बन चुका है।

मेरी समस्या यह नहीं कि कुछ लड़कियों के व्यवहार पर व्यंग्य क्यों किया जाता है। मेरी समस्या यह है कि व्यंग्य का निशाना एक खूबसूरत संबोधन को बना दिया गया है। क्या, अपनी बेटी को परी कहना, भरपूर लाड प्यार देना गलत है? पापा की परी को ऐसा लेबल बना दिया गया जिसे किसी भी लड़की पर चिपका दिया जाता है।

सोचिए, क्या कोई भी पिता यह चाहेगा कि उसकी बेटी के लिए उसका प्यार मज़ाक का विषय बने? हर बेटी अपने पिता के लिए सचमुच परी ही होती है। वह पहली बार जब उंगली पकड़कर चलती है, पहली बार स्कूल जाती है, पहली बार स्कूल के सालाना उत्सव में परफॉर्म करती है, पहली बार हारती है, पहली बार जीतती है, पहली बार कॉलेज जाती है, घर से बाहर निकलती है, नौकरी करती है…हर पड़ाव पर पिता के मन में उसके लिए वही परी जैसा भाव रहता है क्योंकि इस रिश्ते में न प्रदर्शन है, न दिखावा… केवल विश्वास और अपनापन है।

मुझे अभी भी याद है जब पांचवीं क्लास में मेरी परी ने ताईक्वांडो के जिला स्तरीय टूर्नामेंट के फाइनल में प्रवेश किया तो हमारा पूरा परिवार गर्व से फूल गया था लेकिन फाइनल में जब उसे मुकाबले में राज्यस्तरीय विजेता और नौंवी क्लास की तथा उससे दो गुनी लंबी लड़की के सामने उतारा गया तो मैंने बिना लड़े वॉकओवर दे दिया क्योंकि मेरी बिटिया उसके सामने नाजुक थी और मेरी परी तो थी ही.. ऐसे कई किस्से हैं जीवन में जब बेटी वाकई ‘एंजल’ बन जाती है और हर पिता के पास ऐसे दर्जनों किस्से होंगे।

Roses and Princess
हालांकि, यह भी सच है कि कुछ परिवारों में अत्यधिक लाड़-प्यार बच्चों को ज़िम्मेदार बनने से रोक देता है लेकिन यह केवल बेटियों के साथ नहीं, बेटों के साथ भी होता है। तो फिर केवल पापा की परी  क्यों?  ‘मम्मी का राजा बेटा’ या ‘मम्मी का मुन्ना’, ‘पापा का पप्पू’ या राजा बाबू टाइप कुछ क्यों नहीं? मुझे तो पापा की परी शब्द भी पीढ़ियों से चले आ रहे लैंगिक पूर्वाग्रह का ही विस्तार लगता है ।

मैं, कई ऐसी परियों को जानता हूं जो अपने बुजुर्ग माँ बाप की सेवा में दिनरात एक किए हैं और जिन्हें राजा बाबू बना कर बड़ा किया गया वे मम्मी पापा को वृद्धाश्रम भेजने की जुगत में हैं। ऐसी बेटियां क्या किसी एंजल से कम हैं। क्या भावुक होना, सहज रहना, सरल होना मूर्खता है?

माना कि भाषा समाज का आइना होती है लेकिन जब किसी सम्मानजनक संबोधन का अर्थ का अनर्थ कर दिया जाए तो यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं होता, बल्कि हमारी सोच का भी संकेत होता है। मीम हमें कुछ सेकंड की हँसी मजाक का मौका तो दे सकते हैं, लेकिन वे धीरे-धीरे संवेदनाओं का अर्थ भी बदल देते हैं।

आज जरूरत इस बात की है कि हम व्यवहार की आलोचना करें, रिश्तों की नहीं। यदि कोई व्यक्ति अपरिपक्व है तो उसे अपरिपक्व कहें पर किसी बेटी के अपने पिता से मिले स्नेह को व्यंग्य का पर्याय बनाना तो उचित नहीं।

आखिर, पापा की परी होना कोई कमजोरी नहीं बल्कि सौभाग्य है जिसमें एक पिता अपनी बेटी को बिना शर्त प्यार करता है, उस पर विश्वास करता है और उसे जीवन में ऊँची उड़ान भरते देखना चाहता है इसलिए अगली बार जब आप भी ‘पापा की परी’ कहकर किसी बेटी की हंसी उड़ाएं तो एक पल रुककर सोचिए जरूर क्योंकि दुनिया चाहे इस शब्द का कोई भी अर्थ ले..हर पिता के लिए उसकी बेटी हमेशा एक परी ही रहती है..जिम्मेदार परी, आत्मनिर्भर परी, परिवार की नींव रखने वाली और सबसे लाड़ली परी।

#Papakipari  #वास्तेगुना हुइंया #Angel


शनिवार, 25 जुलाई 2026

न्यूज़ चैनल से नाराज़गी जायज़, पर ‘रिपोर्टर’ पर हमला क्यों?

 


जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए एक युवा आंदोलन की तस्वीरों ने एक असहज सवाल हमारे सामने खड़ा कर दिया। कुछ पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की हुई, कैमरे छीनने की कोशिश की गई और महिला पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार की घटनाएं भी सामने आईं। यह केवल किसी एक चैनल या एक आंदोलन का मामला नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग आंदोलनों, चुनावी रैलियों और संवेदनशील घटनाओं की कवरेज के दौरान भी ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं।

यह मान लेना आसान है कि भीड़ किसी चैनल की संपादकीय नीति से नाराज़ थी। लेकिन मुश्किल सवाल यह है कि यदि नाराज़गी किसी चैनल से है तो उसका शिकार मैदान में खबर जुटाने वाला रिपोर्टर क्यों बने? वह कैमरापर्सन क्यों बने, जो घंटों धूप, बारिश और भीड़ के बीच केवल घटनाओं को रिकॉर्ड कर रहा है? और सबसे अधिक चिंता की बात यह कि महिला पत्रकारों को भी अभद्र टिप्पणियों और दुर्व्यवहार का सामना क्यों करना पड़े?

मेरी नज़र में इस पूरे घटनाक्रम का एक डरावना और दूरगामी पक्ष भी है जो इन्हीं युवाओं से जुड़ा है, जिस पर शायद सबसे कम चर्चा हो रही है। देश के सैकड़ों विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थानों में हर साल हजारों युवा पत्रकारिता की पढ़ाई करते हैं। वे कैमरे के सामने खड़े होने का नहीं, बल्कि समाज के बीच जाकर सच तलाशने का सपना लेकर निकलते हैं। कोई अपने गांव से बड़े शहर आता है, कोई परिवार की जमा-पूंजी खर्च कर मीडिया की डिग्री लेता है, तो कोई यह विश्वास लेकर कि एक दिन किसी प्रतिष्ठित समाचार संस्थान का हिस्सा बनेगा।

जब ऐसे युवाओं को किसी राष्ट्रीय चैनल या अखबार में नौकरी मिलती है, तो उनके लिए वह केवल रोजगार नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष का परिणाम होता है। लेकिन यदि किसी चैनल की संपादकीय नीति से असहमति का गुस्सा उसी नए-नए रिपोर्टर पर उतारा जाएगा, तो सवाल उठता है—उस युवा पत्रकार का कसूर क्या है?क्या उसने चैनल की बहस तय की? क्या उसने प्राइम टाइम की भाषा लिखी? क्या उसने संपादकीय नीति बनाई? अधिकांश मामलों में उत्तर होगा—नहीं। वह तो केवल अपने पेशे का पहला कदम रख रहा है। उसके हाथ में माइक है, लेकिन फैसले उसके हाथ में नहीं हैं।

सोचिए, यदि किसी अस्पताल की प्रशासनिक नीति से असहमति हो तो क्या डॉक्टर या नर्स से मारपीट उचित हो जाएगी? यदि किसी बैंक की सेवा पसंद न आए तो क्या कैशियर पर हमला जायज़ हो जाएगा? बिल्कुल नहीं। फिर किसी चैनल से नाराज़गी का निशाना उस रिपोर्टर को क्यों बनाया जाए, जो कई बार मामूली वेतन पर, धूप-बारिश और जोखिम के बीच सिर्फ घटनाओं को दर्ज कर रहा होता है?

AI and Media

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि देश के युवा यह महसूस करने लगें कि पत्रकारिता का अर्थ है—हर विरोध प्रदर्शन में अपमान, गाली, धक्का-मुक्की और जान का जोखिम—तो कल कौन इस पेशे में आएगा? क्या हम ऐसी पीढ़ी तैयार करना चाहते हैं जो सच दिखाने से पहले अपनी सुरक्षा की चिंता करे?

मीडिया विशेषज्ञ लंबे समय से एक महत्वपूर्ण बात कहते रहे हैं कि दर्शकों का बड़ा वर्ग "मीडिया" को एक ही इकाई मान लेता है। टीवी स्क्रीन पर जो चेहरा सबसे अधिक दिखाई देता है, वही पूरे संस्थान का प्रतीक बन जाता है। एंकर, रिपोर्टर, संपादक, कैमरापर्सन और प्रोड्यूसर—इन सभी की भूमिकाओं का अंतर आम दर्शक तक स्पष्ट रूप से नहीं पहुंच पाता। परिणाम यह होता है कि स्टूडियो में बैठकर बहस संचालित करने वाले एंकर से नाराज़गी का गुस्सा घटनास्थल पर मौजूद रिपोर्टर पर उतर आता है।

कई वरिष्ठ संपादकों और मीडिया विश्लेषकों ने समय-समय पर यह कहा है कि फील्ड रिपोर्टर अक्सर संपादकीय नीतियां तय नहीं करते। उनका काम घटनास्थल से तथ्य जुटाना, लोगों से बात करना और दृश्य रिकॉर्ड करना होता है। कौन-सी खबर किस रूप में दिखाई जाएगी, किस शीर्षक के साथ चलेगी या किस एंगल से प्रस्तुत होगी, यह निर्णय प्रायः संपादकीय स्तर पर लिया जाता है। इसलिए किसी रिपोर्टर को चैनल की पूरी नीति का प्रतिनिधि मान लेना वास्तविकता से दूर है।

दुर्भाग्य से सोशल मीडिया ने इस भ्रम को और गहरा किया है। छोटे-छोटे वीडियो क्लिप, अधूरी जानकारी और उत्तेजक टिप्पणियां लोगों की राय को तेजी से प्रभावित करती हैं। कई बार किसी चैनल की बहस देखकर लोगों में गुस्सा पैदा होता है और वही गुस्सा अगली बार सड़क पर दिखाई देने वाले पहले माइक पर निकल पड़ता है। भीड़ यह भूल जाती है कि सामने खड़ा व्यक्ति भी एक पेशेवर है, जो अपना दायित्व निभा रहा है।

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए भी चिंताजनक है। पत्रकार पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं होता, बल्कि समाज के सूचना के अधिकार पर भी चोट होती है। यदि रिपोर्टर घटनास्थल पर जाने से डरने लगेंगे तो सबसे पहले नुकसान जनता का होगा, क्योंकि घटनाओं की प्रत्यक्ष और स्वतंत्र जानकारी कम होती जाएगी।


महिला पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार का कोई भी औचित्य नहीं हो सकता। किसी विचारधारा, आंदोलन या राजनीतिक मतभेद के नाम पर महिलाओं के सम्मान से समझौता लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। असहमति का अधिकार और गरिमा का सम्मान—दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।

इस समस्या का समाधान केवल कानून से नहीं होगा। सबसे पहले मीडिया साक्षरता (Media Literacy) को बढ़ावा देना होगा। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में यह समझ विकसित की जानी चाहिए कि समाचार कैसे तैयार होता है, एंकर और रिपोर्टर की भूमिकाएं क्या होती हैं और संपादकीय निर्णय किस स्तर पर लिए जाते हैं। जब लोग मीडिया की कार्यप्रणाली समझेंगे तो उनका आक्रोश सही दिशा में व्यक्त होगा।

यदि किसी चैनल की प्रस्तुति या नीति से असहमति है तो उसके शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके मौजूद हैं—चैनल का बहिष्कार, शिकायत दर्ज कराना, नियामक संस्थाओं से संपर्क करना, तथ्यात्मक आलोचना करना, सोशल मीडिया पर संयमित विरोध दर्ज कराना या वैकल्पिक मीडिया को समर्थन देना। लेकिन हिंसा, धमकी, कैमरे तोड़ना या पत्रकारों से मारपीट कभी भी लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा नहीं हो सकते।

दूसरी ओर मीडिया संस्थानों को भी आत्ममंथन करना होगा। निष्पक्षता, तथ्यपरकता और सनसनी से दूरी ही जनता का विश्वास वापस ला सकती है। जब दर्शकों का भरोसा बढ़ेगा तो टकराव की संभावना भी कम होगी। युवा किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं। यदि वही संवाद की जगह हिंसा का रास्ता चुनेंगे तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होगा। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन असहमति का तरीका भी लोकतांत्रिक होना चाहिए।

आलोचना कीजिए, सवाल पूछिए, चैनल बदलिए, बहिष्कार कीजिए—यह आपका अधिकार है। लेकिन मैदान में सच जुटाने निकले पत्रकार को दुश्मन मत बनाइए। आखिरकार, कैमरे के पीछे खड़ा वह व्यक्ति भी आपका साथी है और वह आपकी आवाज़ दुनिया तक पहुंचाने के लिए हर दिन जोखिम उठाता है।

लोकतंत्र केवल अच्छे नेताओं, अच्छे न्यायालयों और अच्छे कानूनों से नहीं चलता; उसे अच्छे पत्रकार भी चाहिए। लेकिन अच्छे पत्रकार तभी मिलेंगे, जब समाज उन्हें सम्मान और सुरक्षा दोनों देगा। इसलिए यदि किसी चैनल से शिकायत है तो विरोध भी उसी स्तर पर होना चाहिए—चैनल को देखना बंद कीजिए, उसके विज्ञापनदाताओं पर लोकतांत्रिक दबाव बनाइए, प्रेस परिषद, नियामक संस्थाओं या अदालत का दरवाजा खटखटाइए, तथ्य आधारित आलोचना कीजिए। लेकिन मैदान में रिपोर्टिंग कर रहे युवा पत्रकार को यह महसूस मत कराइए कि उसने गलत पेशा चुन लिया है क्योंकि जिस दिन योग्य और ईमानदार युवा पत्रकारिता से मुंह मोड़ने लगेंगे, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान किसी चैनल का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का होगा।



बुधवार, 22 जुलाई 2026

मौसम तो जीवन का आनंद है,आफ़त नहीं

 मिट्टी के लोग: आधुनिक जीवन में प्रकृति से दूर होता इंसान

Parasar lake Himachal

बारिश.. केवल एक मौसम नहीं है । वह बच्चों की कागज़ की नाव है, पेड़ों की संजीवनी है, प्रकृति का श्रृंगार है, किसानों की उम्मीद है, प्रेमियों का संगीत और कवियों की सबसे प्रिय प्रेरणा है। पहले महीनों पहली फुहार का इंतज़ार होता था, उसके आते ही लोग घरों से बाहर निकल पड़ते थे लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। अब बारिश शुरू होते ही सबसे पहले छाता खुलता है, कार के शीशे चढ़ते हैं और कपड़ों/मोबाइल को बचाने की चिंता सताने लगती है। प्रकृति, जिसके साथ कभी हमारा आत्मीय रिश्ता था, आज सुविधाओं और कृत्रिम जीवनशैली के बीच पीछे छूटती जा रही है। 

आमतौर पर हम जीवन की सहजता को अपने आसपास सोच की कंटीली बाड़ लगाकर जटिल बनाते जा रहे हैं। सोचिये, कितनी विचित्र बात है कि जिस बारिश के लिए किसान टकटकी लगाए रहता है, बच्चे घरों से भागकर गलियों में आ जाते थे, हम भी गर्मी से निपटने के लिए दिन रात मानसून की खबरों पर कान लगाए रहते हैं..आज उसी बारिश से बचने के लिए हम सबसे पहले छाता ढूंढ़ते हैं। महीनों तक मौसम के जिस अमृत का इंतज़ार किया, उसके आते ही हम उससे दूर भागने लगे। हम मिट्टी से बने लोग मिट्टी को भिगोने वाली बारिश से ही डरने लगे। 

हम वाकई अज़ीब होते जा रहे हैं..पानी बरसे तो दिक्कत,कम बरसे तो परेशानी और ज्यादा हो तो संकट। हम चाहते हैं कि हमारे ऑफिस जाते और लौटते समय बारिश न हो, रात को हो और वह भी जब सब काम निपटाकर हम सोने लगें तब। न्यूज़ चैनलों पर भी बारिश गुनगुनाती नहीं है बल्कि कहर ढाती है। दरअसल, यह केवल बारिश की कहानी नहीं है। यह आधुनिकता का लिबास पहनकर घूम रहे हमारी और हमारे समाज की कहानी है, जिसने प्रकृति को जीना लगभग छोड़ दिया है। 

हम पहाड़ों पर इसलिए जाते हैं कि प्रकृति का आनंद लें, लेकिन होटल के कमरे की खिड़की से बाहर झांककर या उसे मोबाइल में समेटकर लौट आते हैं। तेज़ धूप से बचने के लिए एयर कंडीशनर, बारिश से बचने के लिए रेनकोट, ठंडी हवा से बचने के लिए बंद कमरे और सर्दी से बचने के लिए हीटर। धीरे-धीरे हमने हर मौसम को एक समस्या में बदल दिया है।

सुबह की धूप कभी विटामिन और ऊर्जा का स्रोत मानी जाती थी। आज वही धूप हमें टैनिंग का डर दिखाती है। चांदनी रातें कभी चौपालों और आंगनों की साथी थीं, आज वे बंद खिड़कियों के बाहर अकेली रह जाती हैं। हवा कभी पेड़ों की पत्तियों से बात करती थी, अब उसे एयर प्यूरीफायर के फिल्टर से होकर गुजरना पड़ता है।

अब यह विडंबना नहीं तो क्या है कि हमने पेड़ों को इसलिए काटा कि सड़क/पार्किंग बन सके, फिर सप्ताहांत में उसी हरियाली की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर दूर निकल जाते हैं और असली पेड़ों की जगह घर आँगन को सजावटी पौधों से सजाते हैं। 

पहले नदियों को गंदा किया और फिर बोतलबंद पानी खरीदकर पीने लगे। पक्षियों के घोंसले उजाड़ दिए और फिर मोबाइल में उनकी आवाज़ें डाउनलोड करके नेचर साउंड सुनने लगे। यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि हम प्रकृति की तस्वीरें हजारों खींचते हैं, लेकिन प्रकृति के साथ कुछ पल नहीं बिताते।

Parasar lake Himachal

हम सभी के बचपन में बारिश का मतलब होता था कागज़ की नाव, भीगे कपड़े, मिट्टी की सोंधी खुशबू, गरमागरम पकौड़े और मां की डांट लेकिन आज हमारे लिए बारिश का मतलब ट्रैफिक जाम, कपड़े/मोबाइल खराब होने का डर और सोशल मीडिया पर स्टेट्स रह गया है। अपने बच्चों को तो हमने कब से स्कूल एवं कैरियर की भूख में ऐसा बाँध दिया है कि उनके लिए बारिश बस कैलेंडर के कुछ महीने बनकर रह गई है और वे शुरुआत से ही रेन रेन गो अवे.. सीखने लगते हैं।

हमने अपने आपको, परिवार और बच्चों को सुविधाओं का ऐसा कवच पहना दिया है कि अब मौसम हमें छू भी नहीं पाते। हम हरियाली देखना चाहते हैं, लेकिन धूल नहीं। नदी देखना चाहते हैं, लेकिन उसके किनारे बैठना नहीं। पहाड़ पसंद हैं, लेकिन पैदल चलना नहीं। बारिश अच्छी लगती है, लेकिन भीगना नहीं इसलिए हम पहले से अधिक सुविधासंपन्न तो हो गए हैं, पर प्रकृति-संपन्न नहीं।

प्रकृति हमसे क्या मांगती है, कुछ नहीं..बस, जरा सी देखभाल। वह केवल इतना चाहती है कि हम उसके साथ कुछ वक्त बिताएं मसलन कभी बारिश में बिना वजह भीग लें, कभी किसी पेड़ की छांव में चुपचाप बैठ जाएं, कभी नदी के कलकल बहाव को बिना मोबाइल निकाले देखते रहें, कभी सूर्योदय को केवल महसूस करें, चिड़ियों की चहचहाहट सुने, प्रकृति का मधुर संगीत और सुगंध महसूस करें।

लेकिन हमारी विडंबना यह है कि हम मंगल ग्रह पर तो जीवन खोज रहे हैं, जबकि पृथ्वी पर जीवन जीने की कला धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं। 

शायद कवि मणि मोहन की कविता मिट्टी के लोग भी हमसे यही जानना चाहती है कि क्या सचमुच हम अब भी मिट्टी के लोग हैं या फिर कंक्रीट के जंगलों में रहने वाले ऐसे लोग बन चुके हैं जिनके लिए बारिश की चंद बूंदें भी अब असुविधा लगने लगी हैं? जिस दिन हम इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर खोज लेंगे, शायद उसी दिन बारिश फिर से केवल मौसम नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव बन जाएगी और प्रकृति हमारे आसपास पहले की तरह खिलखिलाएगी।

#rain #rainyday #बारिश #मौसम #weather

रविवार, 19 जुलाई 2026

मिलिए, इडली के भाई और मोमोज के मालदार मामा से...!!

 

Siddu/Siddhu,food of Himachal

यह गोल मटोल और धवल रंग से भरपूर व्यंजन सिड्डू है जो देखने में इडली का हट्टा-कट्टा भाई और मोमोज का मालदार मामा लगता है। सिड्डू दरअसल हिमाचल प्रदेश का एक पारंपरिक और लोकप्रिय व्यंजन है । इसे सिदु या सिद्दो भी कहा जाता है जबकि अंग्रेजी अंदाज में बोलने के कारण अब इसे सिड्डू भी पुकारा जाने लगा है। चूँकि, ब्रिटिश काल में शिमला अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी रही है इसलिए अंग्रेज भी इस गोलू-मोलू के मुरीद बने और यह जनाब सिद्दू से सिड्डू हो गए लेकिन एक बात बिलकुल साफ़ है कि इसका क्रिकेटर नवजोत सिंह ‘सिद्धू’ से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है।

सिद्दू/सिड्डू न केवल हिमाचल के ग्रामीण इलाकों में, बल्कि शहरी रेस्तरां और शिमला-मनाली जैसे पर्यटक स्थलों में भी लोकप्रिय है। यह हिमाचली थाली का अभिन्न हिस्सा है। बस, फर्क इतना है कि शिमला में सिद्दू अंडाकार बनता है तो ग्रामीण इलाकों में गोलाकार और कुल्लू में कुछ चपटा सा होता है। साधारण भाषा में समझने के लिए हम कह सकते हैं कि यह एक स्टीम्ड ब्रेड या बन है, जिसे गेहूं के आटे से बनाया जाता है और इसमें विभिन्न प्रकार की मसालेदार या मीठी स्टफिंग (भरावन) होती है। 

सर्दियों में इसे देसी घी, दाल या चटनी के साथ खाया जाता है, जो शरीर को गर्म तो रखता ही है और स्वाद को भी दोगुना कर देता है। सिद्दू प्रोटीन और फाइबर जैसे तमाम पोषक तत्वों से भरपूर है इसलिए स्वादिष्ट होने के साथ-साथ यह पौष्टिक भी है।

जानकारों का कहना है कि सिद्दू की स्टीमिंग (भाप से पकाना) तकनीक कुछ कुछ तिब्बती और लद्दाखी व्यंजनों जैसे मोमोज की तरह है। वैसे भी, हिमाचल और तिब्बत बहुत करीब हैं। सिद्दू बनाने के तरीके को लेकर हमारे दक्षिण भारतीय मित्र भी इस पर दावा कर सकते हैं क्योंकि जैसा मैंने ऊपर लिखा है कि यह कुछ कुछ इडली जैसा है और अब तो स्टफ्ड इडली और घी के साथ इडली भी चलन में हैं। 

लिट्टी में सत्तू भरने के कारण पूर्वांचल और खासकर बिहार के लोग भी इस पर दावा कर सकते हैं। इसीतरह यदि इसे रोटी की तरह बेल दिया जाए तो यह पूरण पोली खानदान में शामिल हो सकता है...और यदि तेल में तल दिया जाए तो यह हमारे आलूबड़े का सगा भाई लगेगा। हालांकि, इन तमाम समानताओं के बाद भी मुख्य और मूल बात यह है कि सिद्दू का उद्भव, विकास, स्वाद और बनावट खालिस हिमाचली है।

यहाँ सिद्दू सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि हिमाचली आतिथ्य, सामुदायिकता और प्रकृति के साथ तालमेल का प्रतीक है। इसे बनाने की प्रक्रिया मसलन आटा तैयार करना, स्टफिंग बनाना, स्टीम करना...परिवारों को एक साथ लाती है। यह हिमाचल की जमीन से थाली तक की अवधारणा को दर्शाता है क्योंकि इसमें स्थानीय उपज और पारंपरिक तरीकों का ही उपयोग होता है।

सिद्दू के इतिहास के बारे में ज्यादा लिखित साक्ष्य तो नहीं मिलते क्योंकि यह मूल रूप से मौखिक परंपराओं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे ज्ञान पर आधारित है। हिमाचल के स्थानीय लोग और खानपान के जानकार इसे यहाँ की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानते हैं। बनाने के तौर तरीके के कारण भी यह यहां का मूल व्यंजन है। शिमला और किन्नौर में सिद्दू को अक्सर अखरोट या खसखस की स्टफिंग के साथ बनाया जाता है जबकि कुल्लू और मंडी में उड़द दाल या मटर की मसालेदार स्टफिंग आम है । इसी तरह,रोहड़ू और चंबा में कुछ जगहों पर सिद्दू को गुड़ और नारियल की मीठी स्टफिंग के साथ इसे मिठाई जैसा बनाया जाता है लेकिन देशी घी का साथ यह कहीं नहीं छोड़ता।

वैसे, सिद्दू की उत्पत्ति हिमाचल के ग्रामीण इलाकों में मानी जाती है । भाप में पकाने की तकनीक के कारण ठंडे मौसम में यह आसानी से तैयार हो जाता है और यही इसकी लोकप्रियता का कारण है । सिद्दू को अक्सर विशेष अवसरों जैसे शादी, त्योहार और पारिवारिक समारोहों में बनाया जाता था। स्थानीय कथाओं के अनुसार, सिद्दू को पहाड़ी महिलाएं अपने परिवार के उन पुरुषों के लिए बनाती थीं जो लंबी यात्राओं या खेतों में काम करने के लिए जाते थे। यह पेट भरने वाला और लंबे समय तक ताजा रहने वाला भोजन है ।

इन दिनों सोशल मीडिया और फूड ब्लॉगर के चलते सिद्दू को हिमाचल से बाहर भी पहचान मिल रही है । इसे अब अन्य राज्यों में फूड फेस्टिवल्स और हिमाचली खानपान को बढ़ावा देने वाले आयोजनों में भी आमतौर पर प्रदर्शित किया जाने लगा है। अब यदि आप हिमाचल प्रदेश जाएँ तो अपनी डायबिटीज भूलकर मीठा सिद्दू और नमकीन के शौकीन हैं तो साथ में एक मसालेदार सिद्दू जरूर खाइए क्योंकि सिद्दू के बिना हिमाचल की यात्रा अधूरी है।

#himachalpradesh  #हिमाचल  #himachal  #siddu 

मंडी की मंडियाली कचौरी..स्वाद और अंदाज, दोनों निराले










 मंडी की प्रसिद्ध कचौरी: इतिहास, स्वाद 
और हिमाचली पहचान

यह फोटो देखकर सबसे पहले आपके दिमाग में कौन सा नाम या मुंह में कौन सा स्वाद आता है?..अगर आप हिंदी पट्टी से हैं तो निश्चित ही पूड़ी/पूरी कहेंगे और पंजाब-दिल्ली से हैं तो भटूरा..लेकिन न तो यह पूड़ी है और न ही भटूरा। यह कचौरी है..लेकिन आमतौर पर मिलने वाली कचौरियों की जमात से बिल्कुल अलग स्वाद,अंदाज, आकार वाली और दमदार इतनी कि हम जैसों के लिए एक ही दिनभर के लिए पर्याप्त है। यह है मंडी की ‘मंडियाली कचौरी’ । इसे हिमाचली व्यंजनों में "बेडुआं" (Beduon) के नाम से भी जाना जाता है। आकार और भरावन छोड़ दें तो इसे बेड़मी पूड़ी का मोटू पतलू टाइप रिश्तेदार कह सकते हैं।

यह तो आप जानते ही होंगे कि मंडी हिमाचल प्रदेश का एक प्रमुख शहर है जिसे ‘छोटी काशी’ भी कहा जाता है। मंडी की यह कचौरी कोई साधारण कचौरी नहीं है बल्कि अब यहां की संस्कृति एवं पहचान है। पहली नज़र में यह भले ही अन्य शहरों की कचौरियों जैसी या बस थोड़ी बड़ी लगे लेकिन पहला कौर लेते ही इसका अलग स्वाद मुंह में घुल जाता है। बाहर से हल्की कुरकुरी, भीतर से नरम और उड़द की दाल तथा पारंपरिक मसालों की सुगंध से भरपूर यह कचौरी स्वाद की ऐसी परतें खोलती है, जिन्हें  बस खाकर ही महसूस किया जा सकता है।

केवल मंडी या मंडियाली संस्कृति में उपलब्ध इस खास कचौरी की सबसे बड़ी विशेषता इसको बनाने का पारंपरिक तरीका है। अधिकतर हलवाई आज भी पीढ़ियों से चली आ रही विधि से इसका आटा तैयार करते हैं। सबसे पहले आटे को हल्का खमीर दिया जाता है, जिससे इसकी बनावट और स्वाद दोनों अलग हो जाते हैं। इसके बाद उड़द की दाल में हींग, जीरा, धनिया, सौंफ और अन्य मसालों का संतुलित मिश्रण भरकर इसे धीमी आँच पर सुनहरा तला जाता है। इसकी एक प्रमुख खासियत यह भी है कि तेल से भरी कड़ाही में भरपूर गोता लगाने और फुदक फुदककर नाचने के बाद भी इस पर तेल की एक बूंद नज़र  नहीं आती। यही धैर्य एवं कुशलता इसकी असली पहचान है।

 मंडी सदियों तक व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। बताया जाता है कि कुल्लू, लाहौल, किन्नौर और तिब्बत से आने वाले व्यापारी यहां रुकते थे एवं उन्हें ऐसा भोजन चाहिए होता था जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पेट भी भर दे और लंबे समय तक ताजा रहे। माना जाता है कि इन्हीं आवश्यकताओं के बीच मंडी की इस विशेष कचौरी का जन्म हुआ और धीरे धीरे इसने अपनी अलग पहचान बनाई। यद्यपि इसका कोई आधिकारिक लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय लोग इसे शहर की पुरानी खाद्य विरासत का हिस्सा मानते हैं। कहते भी हैं कि किसी शहर का इतिहास उसके भोजन में भी दर्ज होता है।

खासतौर पर, यहां के प्रसिद्ध महाशिवरात्रि महोत्सव के दौरान तो इस कचौरी की लोकप्रियता देखने लायक होती है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक मंदिरों के दर्शन के बाद गरमागरम कचौरी का स्वाद लेना अपनी यात्रा का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं। यह कुछ कुछ वैसा ही है जैसे कोलकाता में दक्षिणेश्वर काली मंदिर के दर्शन के बाद मंदिर के सामने मिलने वाले पुड़ी छोले का अनूठा स्वाद।

आज फास्ट फूड, चाइनीज, मोमो और बहुराष्ट्रीय व्यंजनों के दौर में भी मंडी की कचौरी अपनी पहचान बनाए हुए है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी शहर की असली ताकत उसकी परंपराओं में होती है। आधुनिकता चाहे जितनी आगे बढ़ जाए, पीढ़ियों से चला आ रहा स्वाद लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखता है।

#Mandi #himachalpradesh  #himachaliculture #कचौरी #foodie #culture

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

‘इमोजी’…मतलब भाव ने भाषा की छुट्टी कर दी..!!

 विश्व इमोजी दिवस यानी उन पीले-पीले गोल चेहरों का दिन, जिन्होंने दुनिया की हजारों भाषाओं को चुनौती दे दी है। यह दिन हाल ही में मनाया गया। जब दिन है तो उस पर चर्चा भी जरूरी है और इस विषय पर बातचीत तो इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि भाव पर आधारित ये चंद चित्रों ने भाषा की छुट्टी करने के लिए कमर कस ली है। कभी शब्दों के सहारे रिश्ते बनते थे, अब एक 😊, 😍, 😡 या 👍 तय कर देता है कि सामने वाला खुश है, नाराज़ है या केवल औपचारिकता निभा रहा है।

किसी समय हम सभी चिट्ठी में लिखते थे  कि “प्रिय मित्र, तुम्हारा पत्र पाकर हृदय गदगद हो उठा।” आज इस भाव को एक ❤️ में समेट दिया गया है। कभी किसी की उपलब्धि पर हम खुलकर लिखते थे कि “हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ।” अब बस... 🎉👏और काम खत्म।

Emoji

अब तो ऐसा लगने लगा है कि भाषा पुस्तकों/शब्दकोश/अखबारों में कैद हो गई है और बातचीत इमोजी कीबोर्ड पर आ बसी है। सोशल मीडिया में तो बिना इमोजी के गुजारा ही नहीं है। सारा सुख-दुख बस चंद कार्टून नुमा चेहरों में सिमट गया है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इमोजी ने उम्र का, अनुभव का,रिश्तों का अंतर भी लगभग मिटा दिया है। दस बारह साल का बच्चा भी 😂 भेजता है और सत्तर पचहत्तर वर्ष के दादाजी भी। दोनों का हँसना अब एक ही चेहरे से व्यक्त होता है। दुख भी एक 😢 है, गुस्सा भी 😡 और प्यार भी ❤️। भावनाओं की विविधता चंद चित्रों में सिमटती जा रही है।

Emoji

इस बदलाव का एक दूसरा पहलू भी है। पहले किसी की बात पसंद आती थी तो हम लिखते थे कि "आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ।"असहमति होती तो तर्क दिए जाते थे..विषय पर चर्चा/बहस और तर्क वितर्क होते थे। अब पूरी बहस का निष्कर्ष केवल दो बटन हैं 👍 या ❤️।

कई बार तो समझ ही नहीं आता कि सामने वाले ने पोस्ट पढ़ी भी है या केवल अंगूठा दिखाकर आगे बढ़ गया। कुल मिलाकर संवाद की जगह प्रतिक्रिया ने ले ली है, और प्रतिक्रिया भी इतनी छोटी कि उसमें विचारों की कोई जगह नहीं बचती। बाकी कई बार तो रिएक्शन (प्रतिक्रिया) का स्थान भी व्यूज (views) ले जाते हैं और लिखने/पोस्ट करने वाले की पूरी मेहनत व्यूज की संख्या में सिमट जाती है। अब तो सोशल मीडिया में लोकप्रियता आंकने का पैरामीटर व्यूज ही रह गया है और व्यूज के आधार पर कमाई ने तो सारे मनोभाव/क्रिया प्रतिक्रिया को व्यूज में समेट दिया है।

Emojis

इमोजी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह हर व्यक्ति के लिए अलग अर्थ भी रख सकता है। किसी के लिए 🙂 शिष्ट मुस्कान है, तो किसी के लिए व्यंग्य। 😂 किसी के लिए ठहाका है, तो किसी के लिए मज़ाक उड़ाना। यानी भाषा, जो स्पष्टता लाती थी, उसकी जगह कई बार अनुमान ने ले ली है। वैसे भी, आमतौर पर कुछ नियमित इस्तेमाल होने वाले इमोजी को छोड़कर अधिकतर लोगों को इन इमोजी के सही अर्थ भी नहीं पता होते। इसलिए, वे बिना अर्थ जाने भाव का अनर्थ करते रहते हैं।

इमोजी ने सबसे गहरा असर बच्चों की शब्द-सम्पदा पर डाला है। अब जब हर भावना के लिए उनके पास चित्र मौजूद हैं तो उन्हें नए शब्द सीखने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती है।आश्चर्यचकित/ विस्मित/आह्लादित/व्यथित/आक्रोशित जैसे सुंदर एवं अर्थपूर्ण शब्द धीरे-धीरे चंद चेहरे के पीछे छिपते जा रहे हैं। 

हम सभी जानते हैं भाषा में हर शब्द का उपयोग के मुताबिक अर्थ होता है, उनमें अर्थ के साथ गूढ़ अर्थ भी छिपा होता है जिसे अंग्रेजी में बिटवीन द लाइन कहते हैं लेकिन इमोजी की बस एक भाषा/अर्थ होता है। विकास का एक पहलू यह भी है कि भाषा जितनी समृद्ध होती है, सोच भी उतनी ही गहरी होती है। शब्द घटते हैं तो विचार भी घटने लगते हैं।

लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि इमोजी बुरे हैं और उनको व्यवहार से निकाल फेंकना चाहिए। इमोजी उपयोगी हैं और कई बार संवाद को सहज, तेज़ और कई बार अधिक आत्मीय बनाते हैं। इसलिए समस्या उनका इस्तेमाल नहीं बल्कि उन्हें भाषा की तरह उपयोग करना है क्योंकि वे भाषा के सहायक बन सकते हैं लेकिन भाषा के विकल्प नहीं बन सकते और इसे किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।

इसलिए, इस तरह के स्वघोषित दिवसों पर हमें अपने आप से एक सवाल जरूर करना चाहिए कि क्या हम या हमारे बाद की पीढ़ियों में भाषा का स्थान इमोजी को सहजता से सौंपना उचित है और इससे भाषा का भविष्य कहां पहुंचेगा?

एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि जिस दिन हमारी पूरी बातचीत केवल 😊😂❤️👍 तक सीमित रह जाएगी, उस दिन शब्द भी मौन हो जाएँगे क्योंकि इमोजी चेहरे दिखाते हैं, लेकिन शब्द मन की पूरी तस्वीर बनाते हैं।

#Emoji #Language #Bhasha #इमोजी #भाषा

सोमवार, 13 जुलाई 2026

हर बेटी के नाम... एक पिता का पत्र!!

 प्रिय बेटी,

पिछले कुछ दिनों से मन बहुत विचलित है। सोशल मीडिया पर हिमाचल की कुछ बेटियों का एक वीडियो वायरल है जिसमें वे कथित तौर पर नशे, बॉय फ्रेंड, सेक्स जैसे मुद्दों पर गाली-गलौज और मारपीट के बीच परस्पर आरोप प्रत्यारोप लगाते दिखाई दे रही हैं। यही क्यों, आजकल ऐसे वीडियो, किस्से, खबरें हर छोटे बड़े शहर में सामान्य बात हो गई है।

Letter to daughters

मैं, यह बात भी सबसे पहले पूरीतरह स्पष्ट कर दूं कि यह पत्र किसी डर से नहीं लिख रहा हूं क्योंकि डर से लिखे गए पत्र रिश्तों में दीवारें खड़ी कर देते हैं। मैं यह पत्र विश्वास से लिख रहा हूँ। विश्वास ही वह धागा है जो पिता और बेटी के रिश्ते को सबसे मज़बूती से बाँधता है।

अरे हाँ, तुमने भी तो बताया था कि कुछ दिन पहले ही तुम्हारे पड़ोस में ऐसी ही कुछ लड़कियों रहने आई थी जो वीडियो वाली लड़कियों जैसी ही हरकत करती थीं। हालांकि तुम्हारे लैंडलॉर्ड ने उन्हें एक ही दिन में बाहर का रास्ता दिखाकर मिसाल कायम की थी। वैसे भी, ये वीडियो सोलन या किसी और शहर का है। फिर भी, एक जिम्मेदार पिता के नाते मुझे लगा कि क्यों न तुम्हारे जरिए तमाम बेटियों को समझाया जाए और उनके माता पिता के दर्द में अपनी आवाज भी शामिल की जाए।

इन घटनाओं को देखकर यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि कुछ युवतियों की हरकतें पूरे समाज या सभी लड़कियों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। आज भी लाखों बेटियाँ अपने परिवार, समाज और देश का नाम रोशन कर रही हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ऐसे दृश्य बदलते सामाजिक माहौल की ओर संकेत करते हैं, जिसे नज़रअंदाज़ करना खतरनाक होगा। कम से कम मम्मी पापा को डरा तो देते ही हैं।

तुम्हें याद है न…जब हम पीजी तलाश रहे थे तब भी इसी तरह की परिस्थितियां हमारे सामने आई थीं। कहीं कमरा नशीले पदार्थों की दुर्गंध से भरा था तो कही चिलम/सिगरेट जैसी चीजें खुलेआम रखीं थी। तुमने भी कुछ खुलकर और कुछ इशारों में मम्मा को बता दिया था। तभी हमने तुम्हारे अलग तरह से रहने की व्यवस्था की क्योंकि हम कमरा नहीं देख रहे थे बल्कि उस जगह को महसूस कर रहे थे, जहाँ हमारी बेटी अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण साल बिताएगी। शायद, सभी मां बाप यही सोचते/महसूस करते होंगे।

Dharmashala stadium
हाल ही में, वायरल वीडियो और पीजी के उन दृश्यों से मुझे महसूस हुआ कि तमाम बेटियों एवं उनके अभिभावकों से बात करने का यही सही मौका है । तुम्हें याद है, जब तुम पहली बार घर से बाहर गई थीं, तब तुम्हारी मम्मा ने तुम्हारे बैग में कपड़े,खाने पीने का सामान और पता नहीं क्या क्या रखा था लेकिन साथ में चुपचाप अपना ‘विश्वास’ भी रख दिया था। हमें गर्व है कि तुमने आज तक न केवल उस भरोसे को कायम रखा है बल्कि दिन प्रतिदिन मजबूत ही किया है।

शायद, बाकी माता पिता भी अपनी बेटियों के बैग में विश्वास रखते होंगे तो फिर बेटियां कैसे रास्ता भटक जाती हैं? माता पिता ने तो सही रास्ता ही बताया होगा तो फिर बेटियां कैसे मुख्य रास्ता छोड़कर आड़ी टेढ़ी पगडंडियों पर निकल जाती हैं?

इसलिए, यह पत्र तुम्हारे लिए नहीं है। उन लाखों बेटियों के लिए भी है, जो माता पिता के भरोसे की पूंजी लेकर अपने सपनों की तलाश में घरों से निकल रही हैं..किसी हॉस्टल में, किसी पीजी में, किसी अनजान शहर में या जीवन की किसी नई मंज़िल की तलाश में।

कभी हम माता-पिता अपनी बेटी को हॉस्टल या पीजी भेजते समय उसकी पढ़ाई, फीस, सुरक्षा और भविष्य की चिंता करते थे। आज चिंता की सूची में नशा, गलत संगति, मानसिक दबाव, हिंसा, सोशल मीडिया का प्रभाव और दिखावे की संस्कृति जैसे कई विषय जुड़ गए हैं ।

Dhauladhar mountain

इस पत्र का उद्देश्य यह कतई नहीं है कि बेटियों के सपनों पर पहरे लगें या उनकी उड़ान छोटी हो जाए। बल्कि, मैं सिर्फ इतना चाहता हूँ कि उड़ते समय उन्हें यह याद रहे कि आसमान कितना भी बड़ा क्यों न हो, अपनी दिशा कभी मत खोना। जब साइबेरिया और पता नहीं कहां कहां से पक्षी हजारों किलोमीटर का रास्ता तय कर अपनी मंजिल तक पहुंच जाते हैं तो फिर कुछ बेटियों के कदम क्यों डगमगा जाते हैं और फिर उसका खामियाजा हर बेटी और उसके माता पिता को भुगतना पड़ता है।

वैसे, मौजूदा स्थिति के लिए केवल बेटियों को दोष देना भी उचित नहीं होगा।परिवारों में संवाद कम हुआ है। माता-पिता अपनी दुनिया में व्यस्त हैं, शिक्षक टार्गेट पूरा करने के दबाव में और समाज सफलता को केवल पैसे और दिखावे से मापने लगा है। मोबाइल फोन ने घर में रहकर भी एक अलग दुनिया के दरवाजे खोल दिए हैं। ऐसे में मूल्य, मर्यादा और आत्मसंयम पीछे छूटते जा रहे हैं।

सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और ज्यादा बढ़ावा दिया है। आज लोकप्रियता, लाइक्स और वायरल होने की इच्छा कई बार ऐसे व्यवहार की ओर धकेल देती है जहां नशे, अभद्र भाषा या हिंसक व्यवहार को मनोरंजन या साहस का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है।

इसलिए, चिंता इस बात की है कि अब नशा, अभद्रता, स्वछंदता, हिंसक प्रवृत्ति को कूल या मॉडर्न होने का प्रतीक समझने की भूल की जा रही है। यही नहीं, अब मेरी ज़िंदगी, मेरी मर्ज़ी कहकर सही साबित करने का भरपूर प्रयास भी किया जा रहा है ।

बिटिया रानी, यह बात अच्छी तरह से समझ लो कि हमारा काम तुम्हें हमेशा पकड़कर रखना नहीं, बल्कि इतना सक्षम बनाना है कि तुम पढ़ो, दुनिया देखो, अपने निर्णय स्वयं लो, अपने सपनों को सच करो और हमें तुम्हारी उड़ान पर गर्व हो। लेकिन, बेटा आज का समय बहुत तेज़ है। यहाँ हर चीज़ तुरंत चाहिए जैसे दोस्ती भी, प्रसिद्धि भी, सफलता भी और सुख भी। शायद इसी जल्दबाज़ी में कुछ बेटियाँ यह भूल जा रही हैं कि जीवन शॉर्टकट से नहीं, सही रास्तों से सुंदर बनता है।

जब तुम उड़ान के लिए पंख फैलाओगी तो कोई तुम्हें समझायेगा कि नशा आधुनिकता है। कोई बहलाएगा कि नियमों की परवाह करना पुराना विचार है। कोई ज्ञान देगा कि जो मन चाहे वही करना ही आज़ादी है। बेटियों,आधुनिक बनो, लेकिन अपनी आत्मा को पुराना ही रहने दो क्योंकि आत्मा की आवाज ही सच की राह दिखाती है। 

याद रखना बेटियों, तुम्हारी पहचान तुम्हारे कपड़ों, मोबाइल, गाड़ी, आधुनिकता या सोशल मीडिया से कुछ समय के लिए तो बन सकती है लेकिन असल पहचान तुम्हारा चरित्र है, परिवार है, मायाजाल से बचना है और अपने काम से नाम कमाना है। एक पिता होने के नाते मेरी चिंता बेटियों की आज़ादी नहीं, वह माहौल है जहाँ कभी-कभी आज़ादी और स्वच्छंदता का फर्क मिटता हुआ दिखाई देता है।

बेटियों, अगर कभी तुम्हें लगे कि कोई तुम्हें नशा आज़माने के लिए कह रहा है, किसी गलत रास्ते पर ले जा रहा है या तुम्हें यह समझा रहा है कि सब ऐसा करते हैं, तो एक बार मम्मी पापा को याद कर लेना। वे, जिन्होंने तुम्हें पहली बार चलना सिखाया था और आज भी तुम्हारे हर कदम की मजबूती के लिए दुआ करते हैं।

जीवन में दोस्त बहुत बनाना, लेकिन ऐसे बनाना जिनके साथ रहने में तुम्हें अपने माँ-बाप से कुछ छिपाना न पड़े। हिमाचली वायरल वीडियो में भी तुमने देखा होगा कि उन लड़कियों के झगड़े का एक कारण अपने बंदे (दोस्त) को कमरे पर लाना भी था। ऐसे दोस्त तुम्हारे अकेलेपन, कथित आधुनिकता,दिखावे और खुले व्यवहार का अनुचित फायदा उठाते हैं क्योंकि सोशल मीडिया और कथित दोस्तों के लिए सेक्स और साथी बदलना आजकल चिप्स कुरकरे खाने जैसा मामला हो गया है। यह बात अलग है कि बाद में इसका खामियाजा बेटियों को ही ज्यादा भुगतना पड़ता है। इसलिए दोस्त बनाना लेकिन ऐसा कुछ मत करना जिसके बदले तुम्हें अपना आत्मसम्मान खोना पड़े।

और एक आखिरी बात…अगर कभी जीवन में कोई ऐसी गलती हो जाए जिसे बताने में तुम्हें डर लगे, तो दुनिया के किसी और दरवाज़े पर दस्तक देने से पहले अपने घर का दरवाज़ा खटखटाना…सीधे घर लौट आना। हो सकता है मां बाप कुछ देर के लिए नाराज़ हो जाएं, डांटे या पिटाई भी कर दें लेकिन उनके दिल के दरवाजे कभी तुम्हारे लिए बंद नहीं होंगे क्योंकि माता पिता न्यायाधीश नहीं… अंतिम आश्रय होते हैं।

हमारी राजकुमारी, ईश्वर तुम्हें इतनी ऊँचाई दे कि आकाश भी छोटा लगे और इतना विवेक दे कि ऊँचाई पर पहुँचकर भी तुम्हारे पैर ज़मीन पर टिके रहें। तुम्हारे जीवन में सफलता हो, विकास हो, आत्मसम्मान हो और ऐसे निर्णय हों जिन पर तुम्हें कभी पछताना न पड़े।

ढेर सारे आशीर्वाद के साथ,

— पापा


शनिवार, 11 जुलाई 2026

प्रेम में डूबी एक अल्हड़ प्रेयसी और दूसरी परिपक्व संगिनी..!!

 


…ऐसा लग रहा था जैसे किसी खूबसूरत श्वेत-वसना अल्हड़ युवती ने अपने गले में हीरे-मोतियों का अनुपम हार धारण कर लिया हो और वह अपने प्रेमी की अनंत प्रतीक्षा में बाँहें फैलाकर आतुरता से ताका झांकी कर रही है क्योंकि पहाड़ों के गोल गोल रास्ते बार बार एक ही दृश्य हमारे सामने लाते रहते हैं। बस, इस दृश्य से हमारी दूरी कुछ कम ज्यादा होती रहती है। 

धर्मशाला से मैकलोडगंज के लिए चढ़ते हुए आप कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं जैसे पहाड़ झांक झांक कर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। यहां बर्फ को हम श्वेतवासना युवती की पवित्रता और रोशनियों को उसकी मुस्कान कह सकते हैं। अपने प्रेमी (पर्यटक) के इंतजार में हर रात वह स्वयं को इस तरह के मनमोहक श्रृंगार से सजाती है।

दरअसल, जब हम धर्मशाला से मैकलोडगंज की ओर बढ़ रहे थे तब तक सूरज ढल चुका था और चांद की शह पाकर धौलाधार की ऊँची चोटियों पर बिछी बर्फ की सफेद चादर चांदी सी दमक रही थी और उसके नीचे मैकलोडगंज शहर की असंख्य रोशनियाँ जगमगा रहीं थीं। 


मैकलोडगंज के ठीक नीचे करीब 10 किमी की दूरी पर धर्मशाला है। जीवन के अनुभवों से समृद्ध, आत्मविश्वास से भरी, एक परिपक्व पत्नी की तरह। उसमें मैकलोडगंज जैसी चंचलता नहीं, बल्कि गहराई और धैर्य है। उसकी सड़कों पर पसरा सुकून, देवदार के वृक्षों की गंभीरता और पहाड़ों से उतरती शीतल हवा मानो कहती है कि प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि विश्वास का दूसरा नाम है। 

धर्मशाला से मैकलोडगंज जाते समय यहां के दृश्यों को निहारते हुए अचानक लगता है कि नीचे शांत रोशनियों में फैली धर्मशाला उसी श्वेतवसना युवती मैकलोडगंज का भविष्य है। वह अब अल्हड़ नहीं रही। जीवन ने उसे अनुभवों का सौंदर्य दिया है। वह एक परिपक्व पत्नी की तरह अपने घर के आँगन में उम्मीद का दीप जलाए बैठी है। उसे मालूम है कि प्रतीक्षा प्रेम का दूसरा नाम है। उसकी आँखों में ठहराव है, मुस्कान में अपनापन और मौन में गहरी आत्मीयता।

मैकलोडगंज और धर्मशाला का यही अंतर उन्हें एक-दूसरे का पूरक बनाता है। एक प्रेम का पहला स्पंदन है, दूसरा उसी प्रेम की स्थिर धड़कन। एक आकर्षण है, दूसरा अपनापन। एक स्वप्न है, दूसरा जीवन। धौलाधार इन दोनों के परस्पर प्रेम का साक्षी बनकर किसी ऋषि की तरह तपस्या में मग्न है। सदियों से वह प्रेम, विरह, मिलन और बिछोह के असंख्य दृश्य देखता आया है। उसकी चोटियाँ केवल बर्फ का विस्तार नहीं, समय की कसौटी  हैं। 


मैकलोडगंज और धर्मशाला…हिमाचल की गोद में बसे इन दोनों अनूठे और प्राकृतिक रूप से बेहतरीन शहरों को धौलाधार पर्वत श्रृंखला अपनी मौन उपस्थिति से जोड़ती है। हाल ही में इन दोनों शहरों से रूबरू होने का मौका मिला। 

धौलाधार पर बिछी बर्फ़ की सफेद चादर पर जब सुबह सूरज की सुनहरी किरणें पड़ती हैं, तब लगता है जैसे किसी ने धौलाधार की चाँदी सी धवल चादर पर सोने का रंग चढ़ा दिया हो और वह सुनहरी आभा से दमकने लगती हैं लेकिन रात में वही बर्फ चाँदनी के साथ मिलकर एक ऐसा दृश्य रचती है कि उसके सामने शब्द भी फीके पड़ जाते हैं ।

जब हम मैकलोडगंज/ मक्लोडगंज/ मैक्लॉडगंज में प्रवेश करते हैं तो यहां की गलियों में कहीं तिब्बती संस्कृति की मधुर सुगंध महसूस होती है तो कहीं प्रार्थना चक्रों की ध्वनि से बिखरते मंत्र। हवा के साथ पंख फैलाकर अपनी आवाज से पर्यटकों को अपनी और खींचती रंग बिरंगी छोटी बड़ी झंडियां सुकून की एक अलग ही दुनिया में ले जाती हैं। 

मैक्लॉडगंज तिब्बती संस्कृति का एक जीवंत कैनवास है, जहाँ आध्यात्मिकता, प्रकृति और मानवता का संगम होता है। इसे लिटिल ल्हासा भी कहा जाता है। धर्मगुरु हिज हॉलीनेस दलाई लामा की उपस्थिति ने इस स्थान को तिब्बती बौद्ध धर्म का वैश्विक केंद्र बना दिया है।

 

यहाँ की गलियों में प्रार्थना चक्र (प्रेयर व्हील्स) घुमाते हुए लाल और केसरिया वस्त्रों में लिपटे भिक्षु, अगरबत्ती की सुगंध और मंत्रों की गूंज एक अनूठा माहौल रचते हैं और यहां आप एक अलग दुनिया में होते हैं। यहां का वातावरण एवं आवोहवा हमारे शहरों से बिल्कुल अलग है, अनूठी है और आध्यात्मिक सुकून से भरी भी।

वहीं, धर्मशाला अपने विस्तृत आकाश, हरियाली और सहज जीवन-लय के साथ मन को स्थिर कर देती है। धर्मशाला अपनी शांत जीवनशैली, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करता है। धर्मशाला का हर कोना सादगी, सौम्यता और आत्मीयता का एहसास कराता है। 

यहाँ की वादियों में बहती ठंडी हवाएँ, पक्षियों का मधुर कलरव, देवदार की मोहक खुशबू और हरियाली से भरे पहाड़ मन को ऐसी शांति देते हैं, जो लंबे समय तक स्मृतियों में बनी रहती है। यहां सुविधाएं हैं,साधन हैं और शांति भी। दुनिया के सबसे खूबसूरत क्रिकेट स्टेडियम ने यहां के आकर्षण में चार चांद लगा दिए हैं। वैसे, यह मैकलोडगंज का प्रवेश द्वार भी है। इस साल ही महज मई जून में 8 लाख से ज्यादा लोग धौलाधार से वशीभूत होकर यहां आ चुके हैं।

 

सच्चाई भी यही है कि जो भी धौलाधार की इन वादियों में एक बार आता है, वह केवल तस्वीरें लेकर नहीं लौटता, वह अपने भीतर कुछ अनकहे भाव भी साथ ले जाता है। उसे महसूस होने लगता है कि पर्वत भी प्रेम करते हैं, बर्फ भी प्रतीक्षा करती है और रोशनियाँ भी किसी के आने की आशा में पूरी रात जागती हैं।

मैकलोडगंज और धर्मशाला.. केवल दो पर्यटन स्थल नहीं हैं। वे प्रेम और धैर्य, आकर्षण और विश्वास, यौवन और परिपक्वता की दो जीवंत कहानी हैं। धौलाधार की गोद में बसे ये दोनों शहर प्रकृति की ऐसी प्रेम-कथा रचते हैं, जिसे देखने वाला हर व्यक्ति अपने भीतर एक कवि, एक प्रेमी और एक यात्री सा महसूस करने लगता है।

#Dharamshala #McLeodGanj #Himachal #dholadhar #Mountain



शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

कुछ लोग उम्र नहीं बढ़ाते… वे जीवन को बड़ा कर देते हैं।

कुछ रिश्ते जितने कम बोले जाएँ, उतने ही अधिक महसूस किए जाते हैं लेकिन जीवन में कुछ अवसर ऐसे भी आते हैं, जब मन की कृतज्ञता शब्दों का सहारा मांग ही लेती है। आज ऐसा ही एक दिन है।

आज मनीषा जी का 51वाँ जन्मदिन है—जीवन के स्वर्ण जयंती वर्ष के बाद का पहला पड़ाव। यह पड़ाव केवल कैलेंडर के पन्नों पर जुड़ी एक संख्या नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, त्याग, धैर्य और अपनत्व से रचे गए अनगिनत अध्यायों का उत्सव है।

लगभग 26 वर्षों के हमारे साथ में, मैंने एक बात बहुत गहराई से समझी है कि किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से बनती है..और यदि मुझे मनीषा जी को एक ही वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं बस इतना कहूँगा—वे उन दुर्लभ लोगों में हैं जो स्वयं से अधिक दूसरों की खुशियों में जीते हैं।


कई लोग अच्छे होते हैं, कई लोग सज्जन भी होते हैं, लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिनके मन में किसी के लिए ईर्ष्या, द्वेष या कटुता का स्थान ही नहीं होता। मनीषा जी उन्हीं विरले लोगों में से हैं। किसी के सुख में प्रसन्न होना, किसी की परेशानी में बिना बुलाए साथ खड़े हो जाना, किसी की छोटी-सी उपलब्धि को भी पूरे मन से मनाना और बिना किसी अपेक्षा के लोगों के जीवन में मुस्कान जोड़ देना—यह उनके व्यक्तित्व का सहज स्वभाव है, कोई दिखावा नहीं।

हमारे परिवार और मित्रों का दायरा जितना बढ़ा है, उसमें सबसे बड़ा योगदान उनका ही है। आज अनेक लोग ऐसे हैं जिनके लिए जन्मदिन या शादी की सालगिरह तब पूरी होती है, जब मनीषा जी का संदेश या शुभकामना उन तक पहुँचती है। किसी का विशेष दिन याद रखना, समय निकालकर उसे सम्मान देना और यह एहसास कराना कि वह हमारे लिए महत्वपूर्ण है—यह उनकी ऐसी आदत है जिसने न जाने कितने रिश्तों को मजबूती दी है।

मैंने उन्हें कई बार अपनी सबसे प्रिय वस्तुएँ भी बिना किसी हिचक के किसी और को उपहार में देते देखा है। उन्हें देने में जितनी खुशी मिलती है, शायद पाने में भी उतनी नहीं मिलती होगी। यही कारण है कि वे केवल मेरी पत्नी नहीं हैं; वे किसी की भाभी हैं, किसी की मामी, किसी की बुआ, किसी की चाची, किसी की दीदी और किसी के लिए बस एक ऐसा आत्मीय चेहरा, जिससे मिलकर मन हल्का हो जाता है। 

जीवन हमेशा आसान नहीं रहा। हर परिवार की तरह हमारे हिस्से भी संघर्ष आए, कठिन समय आए, कुछ अधूरे रिश्तों का दर्द भी आया। मैंने कई बार उनकी आँखों में मन के भीतर दबे दुःख को महसूस किया है। लेकिन यह भी देखा है कि वे बिना इस दर्द को अभिव्यक्त किए अपनी ट्रेड मार्क मुस्कान के साथ पूरे घर को ऊर्जा से भर देती हैं। अपने दर्द को उन्होंने कभी अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने दिया।

हमारा साथ जबलपुर, करेली, दिल्ली, सिलचर, भोपाल और अब शिमला तक पहुँचा है। हर शहर ने हमें कुछ यादें दीं, कुछ चुनौतियाँ दीं और कुछ नए रिश्ते दिए लेकिन यदि इन सभी जगहों को जोड़ने वाला कोई एक सूत्र है तो वह मनीषा जी का अपनापन है। उन्होंने हर नए शहर को घर बनाया और हर नए व्यक्ति को अपना बनाया।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि घर केवल ईंट-पत्थरों से नहीं बनता। घर उस व्यक्ति से बनता है जो उसमें प्रेम का वातावरण रचता है। जिसने परिवार को केवल साथ नहीं रखा, बल्कि एक-दूसरे के लिए जीना भी सिखाया। 

आज उनके जन्मदिन पर, मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि उनकी यह सरलता, उनकी यह निश्छलता, उनकी मुस्कान और उनका स्नेह हमेशा यूँ ही बना रहे। वे स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और इसी तरह अपने प्रेम से हम सबका जीवन उल्लसित करती रहें।

जन्मदिन पर बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ मनीषा जी


मंगलवार, 7 जुलाई 2026

विदाई से पुनर्मिलन तक का एक साल: वही जगह/वही साथी/वही तारीख…अद्भुत


27 जून 2025…आकाशवाणी भोपाल के हमारे ग्रुप ‘न्यूजरूम’ में उस दिन हल्की सी उदासी और ढेर सारा प्यार था। कारण यह था कि बीते सात वर्षों से रोज़ की खबरों की दुनिया में मेरे मेरे  अभिन्न साथी मुझे विदाई दे रहे थे। दरअसल,माइक, हेडफोन, न्यूज डेस्क और उन अनगिनत यादों को पीछे छोड़कर मेरा तबादला पीआईबी शिमला हो गया था। 

उस दिन भोपाल के एमपी नगर में ‘जश्न ए पैराडाइज’ होटल में विदाई- सह - मेलमिलाप कार्यक्रम रखा गया था। हँसी-मज़ाक के बीच हमारी आँखें नम हो रही थीं। भोपाल ने मुझे बहुत कुछ दिया था — अनुभव, दोस्ती, न्यूजरूम परिवार और आकाशवाणी की वह गर्मजोशी, जो कभी नहीं भूली जा सकती। 


ठीक एक साल बाद, 27 जून 2026 को वही तारीख, वही होटल जश्न ए पैराडाइज। इस बार माहौल पूरी तरह उत्साह से भरा था। आकाशवाणी भोपाल के न्यूजरूम के साथी फिर से एकत्र हुए । वही, हमारा गैट टूगेदर का कार्यक्रम था। पुरानी यादें ताज़ा हुईं, हँसी के ठहाके गूँजे और हमारी खबरों की दुनिया के रोचक किस्से दोहराए गए। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि जिस दिन विदाई हुई थी, उसी दिन एक साल बाद पुनर्मिलन हो गया.. यह संयोग कितना अद्भुत है । 

इस एक साल में बहुत कुछ बदल गया था लेकिन भोपाल की हमारी टीम नहीं बदली। वही गर्मजोशी,अपनापन,हंसी मजाक,उत्साह और स्नेह। तबादले के लिहाज से देखें तो 30 जून 2025 को ज्वाइन करने के बाद पीआईबी शिमला ने मुझे नया आयाम दिया। हिमालय की गोद में बसा शिमला शहर और प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) का माहौल पूरी तरह अलग, लेकिन उतना ही सम्मानजनक और चुनौतीपूर्ण है। 

भोपाल की गर्म हवाओं से शिमला की ठंडी हवाओं तक का सफर मेरे लिए सीखने, अनुकूलन करने और नई ऊर्जा पाने का सफर है। आकाशवाणी में जहाँ हम खबरों को आवाज़ देते थे, वहीं पीआईबी में खबरों को देश/प्रदेश के कोने-कोने तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी है। दोनों जगहों ने मुझे लगातार समृद्ध किया है।

भोपाल और शिमला.. दो शहर, दो बिल्कुल अलग रंग जैसे हमारा भोपाल  झीलों का शहर है, जहाँ आकाशवाणी का न्यूजरूम हमेशा सक्रिय रहता था। वहाँ की मिट्टी में अपनापन है और दोस्ती में स्थिरता । वहीं, शिमला देवदार और बर्फीली चोटियों का शहर है। यहां पीआईबी का कार्यालय राष्ट्र की सूचना यात्रा का अटूट हिस्सा है। यहाँ की शांति में भी गति है और ठंड में भी ऊर्जा । 

आकाशवाणी एवं पीआईबी दोनों संस्थाएँ अलग हैं, लेकिन मकसद एक ही है यानि जनता तक सही और समय पर सूचना पहुँचाना। आकाशवाणी भोपाल ने मुझे संवेदनशील रिपोर्टर बनाया, तो पीआईबी शिमला ने मुझे व्यापक दृष्टिकोण दिया। 27 जून 2026 के उस गैट टूगेदर में लगा कि जीवन में तबादले सिर्फ़ जगह नहीं, नज़रिया भी बदलते हैं। भोपाल के पुराने साथी आज भी उतनी ही गर्माहट एवं अपनापन दिखा रहे हैं जबकि शिमला के नए साथी भी अब परिवार जैसे लगने लगे हैं।

आज जब मैं दोनों जगहों को याद करता हूँ, तो मन में सिर्फ़ कृतज्ञता है। भोपाल ने मुझे तैयार किया, शिमला ने मुझे नई उड़ान दी। विदाई की वह शाम और पुनर्मिलन की दोपहर.. दोनों मेरी ज़िंदगी की अनमोल स्मृतियाँ बन गई हैं। यह सफर जारी है…नई चुनौतियों, नई यादों और नई उपलब्धियों के साथ। धन्यवाद आकाशवाणी भोपाल..धन्यवाद पीआईबी शिमला और धन्यवाद उन सभी दोस्तों/साथियों का, जो तबादले के बाद भी नहीं बदले । हम जल्दी ही फिर किसी पैराडाइज में जश्न करेंगे…वह भी कुछ और नई कहानियों के साथ, तब तक सोशल मीडिया है न😍।

आकाशवाणी भोपाल #NewsUpdate  #PIB #gettogether

शनिवार, 4 जुलाई 2026

मौसम मौसम... लवली मौसम..."


अस्सी के दौर की लोकप्रिय फिल्म थोड़ी सी बेवफाई फिल्म का प्रसिद्ध गीत "मौसम मौसम... लवली मौसम..." लिखते समय गुलज़ार साहब निश्चित ही शिमला या ऐसे ही किसी पहाड़ी इलाके से गुजरे होंगे क्योंकि मौसम को महसूस किए बिना उसे शब्दों में उतारना तभी संभव है जब आपने उसका पूरा लुत्फ़ उठाया हो । बहरहाल, यह गीत इन दिनों शिमला की फिज़ाओं पर बिल्कुल सटीक बैठता है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं इस गीत की लय पर झूम रही हो। 

मानसून की आहट के साथ पहाड़ों की रानी शिमला ने एक बार फिर अपने सौंदर्य का नया ही रूप दिखा दिया है। बादलों की सफेद चादर कभी आसमान छूती पहाड़ियों को पूरी तरह ढक लेती है, तो अगले ही पल युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी के अंदाज़ में हवा का एक जोरदार झोंका बादलों को हटाकर देवदार के ऊँचे वृक्षों और दूर तक फैली हरियाली की झलक दिखा देता है। कभी नीचे से ऊपर उठती धुंध सब कुछ ढक लेती है। यह आँख-मिचौली दिनभर चलती है और इतनी मनमोहक होती है कि हर देखने वाला कुछ पल के लिए ठहर जाता है।


इन दिनों शिमला की सुबह धुंध की चादर में लिपटी हुई होती हैं।  बिल्कुल वैसे ही जैसे 'राम तेरी गंगा मैली' में गीतकार रविंद्र जैन लिखते हैं ..'कोहरे की चादर लपेटे हूं,पानी में खुद को समेटे हूं..।' पर आप यहां मंदाकिनी के अंदाज में नहीं रह सकते बल्कि भरपूर कपड़ों और छाते के बिना इस मौसम का सामना नहीं कर सकते। सुबह ऊगते सूरज की किरणें जब बादलों के बीच से छनकर धरती पर उतरती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी चित्रकार ने तुलिका से प्रकृति के कैनवास पर सुनहरे रंग बिखेर दिए हों । दिन चढ़ने के साथ हल्की/मध्यम/ तेज फुहारें/बौछारें वातावरण को शीतल बना देती हैं। कभी महीन बूंदें चेहरे को सहलाती हैं, तो कभी बादलों की धमाचौकड़ी यह एहसास दिलाती है कि पहाड़ों का मानसून अपने पूरे शबाब पर है।

शिमला की मॉल रोड की चहल-पहल भी इस मौसम में कुछ अलग ही दिखाई देती है। रंग-बिरंगी छतरियों के साथ टहलते पर्यटक, हाथों में गर्म कॉफी या चाय का प्याला लिए मौसम का आनंद लेते लोग और बारिश से धुली साफ सुथरी सड़कें। प्रकृति के इस रूप को शब्दों में पूरी तरह बांध पाना आसान नहीं है। देवदार और चीड़ के वृक्षों से आती भीगी लकड़ी की सुगंध हवा में घुलकर मन को अनायास ही ताज़गी से भर देती है। ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने अपने इत्र की सबसे सुंदर खुशबू शिमला के नाम कर दी है।


बरसात केवल मौसम नहीं बदलती, यह मन का रंग भी बदल देती है। शहर का शोर जैसे धीमा पड़ जाता है और प्रकृति की आवाज़ें स्पष्ट सुनाई देने लगती हैं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे फिल्म '1942 ए लव स्टोरी' में गीतकार मुकुल दत्त लिखते हैं.. 'बजता है जलतरंग टीन की छत पे जब, मोतियों जैसा जल बरसे..'। यहां भी टीन की छत पर गिरकर शोर मचाती बारिश की जवाँ बूंदें, दूर कहीं गरजते बादल, पक्षियों की धीमी पुकार, पेड़ों में छिपे बंदर और ठंडी हवा की सरसराहट। ऐसे क्षणों में शिमला केवल एक पर्यटन स्थल नहीं रहता, बल्कि वह एक ऐसी अनुभूति बन जाता है जिसे बस महसूस किया जा सकता है।


इन दिनों शिमला में हल्की से मध्यम बारिश, घने बादल और ठंडी हवाओं का सिलसिला बना हुआ है। तापमान लगभग 15 से 24 डिग्री सेल्सियस के बीच है, जिससे मौसम और भी सुहावना है। सच ही है, जब बादल धरती को चूमने उतर आएँ, हवा प्रेम गीत गुनगुनाने लगे, देवदार धुंध की चादर ओढ़ लें और हर ओर हरियाली मुस्कुरा उठे, तब अनायास ही मन गुनगुनाते लगता है—"मौसम मौसम... लवली मौसम..."। 

#shimla #mansoonvibes #मानसून #mountains

बुधवार, 1 जुलाई 2026

भोपाल की जामुन,शिमला की जामुन..कुछ स्वाद खरीदे नहीं जाते!!


बरसात का अपना एक संस्कार होता है..इस दौरान केवल बादल आकर बरसते भर नहीं हैं बल्कि वे प्रकृति की पूरी रंगत बदल देते हैं, मिट्टी की मनमोहक सुगंध वातावरण में बिखर जाती है और मन के भीतर बारिश से जुड़ी सालों पुरानी यादें दस्तक देने लगती हैं। बारिश में किसी की यादों में चटपटे पकौड़े उभरते होंगे तो किसी के लिए भुट्टे परंतु मेरी यादों में अब सबसे ज्यादा जामुन का पेड़ शामिल हैं।

इन्हीं दिनों जब जब बाज़ार में जामुन दिखाई देती है, मन अनायास ही भोपाल की ओर लौट जाता है—आकाशवाणी कॉलोनी के उस सरकारी आवास की ओर, जहाँ एक जामुन का पेड़ हमारे जीवन का मौन लेकिन सबसे लोकप्रिय सदस्य हुआ करता था।

वह पेड़ पता नहीं किसने रोपा था या अपने आप पल बढ़ गया था क्योंकि हमारे इससे रिश्ते तब बने जब हम दोनों उम्र की परिपक्व दहलीज पर खड़े थे। फिर क्या था यह साल दर साल हमारे जीवन की मीठी स्मृतियों का हिस्सा बनता गया और कई अनजान परिवारों से मधुर संबंधों का आधार भी। वह हमारे हर अच्छे बुरे दिनों का साथी था, मौसमों का कथाकार और उदारता का जीवंत पाठ ।

बरसात शुरू होते ही उसकी शाखाएँ फलों से लद जाती थीं। पहले फूल आते,फिर नन्हें फल ,फिर युवा होते फलों की हरियाली गहराती, फिर गहरे बैंगनी रंग के छोटे-छोटे फल हवा के साथ झूमते और धीरे धीरे पूरा वृक्ष जामुनी हो जाता। हवा चलती तो मीठे मीठे फल स्वयं धरती पर बिखर जाते और उनकी खुशबू से पूरी कालोनी महकने लगती। उन दिनों, सुबह उठते ही यहाँ वहां बिखरे जामुन चुनना मेरी और खासतौर पर मनीषा जी की दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा होता था। अच्छे फल चुनना,फिर उन्हें नजाकत से कई बार धोना और आखिर में सहेजकर फ़्रिज में रखना।

हमारी सुबह भी जामुन खाने से ही होती। जामुन हमारे लिए बेड टी/ ब्रेकफास्ट बन जाती। हम दोनों खाली पेट किलो किलो तक जामुन खा जाते। सच में, किलो किलो..अब यह उस पेड़ का प्यार था या हमारे पाचन क्षमता बेहतर थी लेकिन न तो पेटदर्द होता,न अपच..बस, जीवन का स्वाद एवं जीभ पर जामुन का रंग जरूर भरपूर उतर आता था। यह पेड़ इतनी ज्यादा जामुन देता था कि फ्रिज भर जाता..हम खाते, दोस्त खाते,रिश्तेदार खाते,पूरी कालोनी खाती,हमारे न्यूजरुम की टीम खाती और फिर भी इतनी बच जाती कि दूरदराज के लोगों तक भी पहुंच जाती। हाल ही हमारी गैट टूगैदर में भी सभी ने सबसे ज्यादा चर्चा जामुन की ही हुई। असल बात यह है कि उस समय जामुन का स्वाद था, मूल्य नहीं।

घर आने वाला कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था। पड़ोसी अपने हिस्से की खुशी लेकर जाते । किसी ने कभी नहीं पूछा—एक किलो कितने की है? क्योंकि वहाँ जामुन मूल्यवान नहीं, साझा आनंद थी।

बचपन और प्रकृति दोनों की यही विशेषता होती है—वे हिसाब नहीं रखते लेकिन जीवन का एक स्वभाव है कि वह स्थिर नहीं रहता। समय ने करवट ली। तबादला हुआ और सात साल में जामुन का जीवनभर का कोटा पूरा कर हम शिमला आ गए। शहर बदला तो केवल दृश्य नहीं बदले, वस्तुओं के अर्थ भी बदलने लगे। शिमला से बीच-बीच में गृह नगर करेली और भोपाल आना जाना चलता रहा। बाजारों में जामुन दिखी और मन भी मचला इसलिए पहली बार पेड़ ने नहीं, दुकानदार ने जामुन के मूल्य से परिचित कराया। तब पता चला कि जामुन की कीमत भी होती है और वह भी 50 से 100 रुपये किलो।


जामुन तो खानी ही थी इसलिए खरीदनी पड़ी । उस दिन अनुभव हुआ कि जो कभी बिना माँगे मिलता था, उसे खरीदने में एक हल्की-सी झिझक होती है। स्वाद वही था। जीभ फिर जामुनी हुई.. लेकिन अनुभव वैसा नहीं था क्योंकि स्वाद केवल फल में नहीं होता, उसके संदर्भ में भी होता है।

और फिर शिमला में उसी जामुन को 300 रुपये किलो बिकते देखा। बिना दाम चुकाए सहजता से भरपूर मात्रा में मिलने वाले जामुन को इतना बेशकीमती देखकर मन भी ठिठका और जेब में रखे पैसे भी। पर, सात साल से चढ़ा स्वादिष्ट जामुन के स्वाद का नशा कैसे उतरता इसलिए खरीदनी पड़ी। न जामुन बदली,न स्वाद पर मूल्य जरूर बदल गया। तब, प्रकृति ने दूसरा सबक सिखाया कि वस्तु वही रहती है, पर दूरी उसका मूल्य बदल देती है। यह केवल बाजार का सिद्धांत नहीं, जीवन का दर्शन भी है।

घर के पिछवाड़े का पेड़, रोज़ मिलने वाले लोग, माता-पिता की उपस्थिति, अपने शहर की सहजता—जब तक पास रहते हैं, सामान्य लगते हैं लेकिन जैसे ही दूरी आती है, उनका महत्व बढ़ जाता है। तात्पर्य यह है कि हमारी दुनिया में कई चीज़ों का मूल्य उनकी गुणवत्ता नहीं, उनकी उपलब्धता तय करती है। शायद इसी कारण बचपन हमें सबसे सुंदर लगता है क्योंकि उस समय बहुत कुछ बिना मूल्य मिला होता है।

आज भी जब शिमला में जामुन खरीदी तो मन के भीतर यह तुलना लगातार चलती रही कि एक तरफ बाजार का तराजू और दूसरी तरफ भोपाल के उस सरकारी क्वार्टर का पेड़। एक तरफ रुपये हैं, दूसरी तरफ स्मृतियाँ और हर बार स्मृतियाँ भारी पड़ जाती हैं। धीरे-धीरे समझ आया कि जीवन का सबसे बड़ा वैभव वह नहीं होता जिसे हम खरीद सकते हैं; वह होता है जिसे हमने कभी सहज रूप से जिया हो। 

जामुन अब भी जीभ पर रंग छोड़ती है लेकिन अब वह रंग केवल बैंगनी नहीं होता। उसमें थोड़ा-सा भोपाल होता है, थोड़ा-सा शिमला, थोड़ा-सा समय और बहुत सारे जीवन मूल्य। शायद जामुन के उस पेड़ ने भी हमें जीवन के सबसे बड़े सत्य से रूबरू करा दिया कि जो चीज़ें हमारे पास सहज रूप से उपलब्ध हैं, वे साधारण नहीं होतीं; हम केवल उनके साथ इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उनका मूल्य देर से समझते हैं इसलिए जो भी सहजता से उपलब्ध है उसका भरपूर सम्मान कीजिए चाहे वे माता पिता हों, भाई बहन,दोस्त या संबंधी..या फिर प्रकृति में निःशुल्क उपलब्ध हवा,धूप,पानी,पेड़,फल एवं फूल... क्योंकि ऐसा न हो कि समय का अंतराल उन्हें आपसे दूर ले जाए और वे इतने बेशकीमती हो जाएं कि आप उन्हें बस याद ही करते रह जाएं।

#जामुन #Jamun #BlackPlum 

हिमाचल की पर्वत चोटियों पर राष्ट्रीय ध्वज की अनूठी उड़ान।

हिमाचल प्रदेश में कभी डाकिया पहाड़ों की पगडंडियों पर चिट्ठियों का थैला कंधे पर लादकर चलता था। तब किसी गांव में महीनों बाद बेटे की चिट्ठी पहु...