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भोपाल की जामुन,शिमला की जामुन..कुछ स्वाद खरीदे नहीं जाते!!

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बरसात का अपना एक संस्कार होता है..इस दौरान केवल बादल आकर बरसते भर नहीं हैं बल्कि वे प्रकृति की पूरी रंगत बदल देते हैं, मिट्टी की मनमोहक सुगंध वातावरण में बिखर जाती है और मन के भीतर बारिश से जुड़ी सालों पुरानी यादें दस्तक देने लगती हैं। बारिश में किसी की यादों में चटपटे पकौड़े उभरते होंगे तो किसी के लिए भुट्टे परंतु मेरी यादों में अब सबसे ज्यादा जामुन का पेड़ शामिल हैं। इन्हीं दिनों जब जब बाज़ार में जामुन दिखाई देती है, मन अनायास ही भोपाल की ओर लौट जाता है—आकाशवाणी कॉलोनी के उस सरकारी आवास की ओर, जहाँ एक जामुन का पेड़ हमारे जीवन का मौन लेकिन सबसे लोकप्रिय सदस्य हुआ करता था। वह पेड़ पता नहीं किसने रोपा था या अपने आप पल बढ़ गया था क्योंकि हमारे इससे रिश्ते तब बने जब हम दोनों उम्र की परिपक्व दहलीज पर खड़े थे। फिर क्या था यह साल दर साल हमारे जीवन की मीठी स्मृतियों का हिस्सा बनता गया और कई अनजान परिवारों से मधुर संबंधों का आधार भी। वह हमारे हर अच्छे बुरे दिनों का साथी था, मौसमों का कथाकार और उदारता का जीवंत पाठ । बरसात शुरू होते ही उसकी शाखाएँ फलों से लद जाती थीं। पहले फूल आते,फिर नन्हें फल ,...