केवल मंडी या मंडियाली संस्कृति में उपलब्ध इस खास कचौरी की सबसे बड़ी विशेषता इसको बनाने का पारंपरिक तरीका है। अधिकतर हलवाई आज भी पीढ़ियों से चली आ रही विधि से इसका आटा तैयार करते हैं। सबसे पहले आटे को हल्का खमीर दिया जाता है, जिससे इसकी बनावट और स्वाद दोनों अलग हो जाते हैं। इसके बाद उड़द की दाल में हींग, जीरा, धनिया, सौंफ और अन्य मसालों का संतुलित मिश्रण भरकर इसे धीमी आँच पर सुनहरा तला जाता है। इसकी एक प्रमुख खासियत यह भी है कि तेल से भरी कड़ाही में भरपूर गोता लगाने और फुदक फुदककर नाचने के बाद भी इस पर तेल की एक बूंद नज़र नहीं आती। यही धैर्य एवं कुशलता इसकी असली पहचान है।
मंडी सदियों तक व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। बताया जाता है कि कुल्लू, लाहौल, किन्नौर और तिब्बत से आने वाले व्यापारी यहां रुकते थे एवं उन्हें ऐसा भोजन चाहिए होता था जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पेट भी भर दे और लंबे समय तक ताजा रहे। माना जाता है कि इन्हीं आवश्यकताओं के बीच मंडी की इस विशेष कचौरी का जन्म हुआ और धीरे धीरे इसने अपनी अलग पहचान बनाई। यद्यपि इसका कोई आधिकारिक लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय लोग इसे शहर की पुरानी खाद्य विरासत का हिस्सा मानते हैं। कहते भी हैं कि किसी शहर का इतिहास उसके भोजन में भी दर्ज होता है।
खासतौर पर, यहां के प्रसिद्ध महाशिवरात्रि महोत्सव के दौरान तो इस कचौरी की लोकप्रियता देखने लायक होती है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक मंदिरों के दर्शन के बाद गरमागरम कचौरी का स्वाद लेना अपनी यात्रा का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं। यह कुछ कुछ वैसा ही है जैसे कोलकाता में दक्षिणेश्वर काली मंदिर के दर्शन के बाद मंदिर के सामने मिलने वाले पुड़ी छोले का अनूठा स्वाद।
आज फास्ट फूड, चाइनीज, मोमो और बहुराष्ट्रीय व्यंजनों के दौर में भी मंडी की कचौरी अपनी पहचान बनाए हुए है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी शहर की असली ताकत उसकी परंपराओं में होती है। आधुनिकता चाहे जितनी आगे बढ़ जाए, पीढ़ियों से चला आ रहा स्वाद लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखता है।
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