बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

कारगिल युद्ध: स्वर्णिम वीरता की रजत जयंती

आज की ही सी बात लगती है जब कैप्टन विक्रम बत्रा के शब्द ‘ये दिल मांगे मोर’ देश के हर घर का प्रिय मंत्र बन गए थे और ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे, लेफ्टिनेंट बलवान सिंह, कैप्टन एन केंगुरुसे, कैप्टन अनुज नैयर और राइफलमैन संजय कुमार जैसे तमाम बहादुरों की वीरता के किस्से घर घर में कहानियों की तरह गूंजने लगे थे। इसी तरह तोलोलिंग, टाइगर हिल, द्रास,  मरपोला, काकसर, मुस्कोह और बटालिक जैसे अनजान नाम आम लोगों की जुबां पर चढ़ गए थे। दुनिया की सबसे कठिन जंग में युवा सैनिकों के जोश, होश, जज्बे,रणनीति, साहस और चट्टान की तरह बुलंद हौसलों के कारण सुरक्षित और मजबूती से किलेबंदी कर चुकी दुश्मन की सेना को एक बार फिर करारी पराजय की धूल चाटना पड़ा था। साथ ही, दुनिया भर में किरकिरी हुई वह अलग।


भारत हमेशा ही शांति से किसी समस्या के समाधान का पक्षधर रहा है और पहले हमला नहीं करने की अपनी नीति पर देश आज भी कायम है लेकिन जब बात देश की अस्मिता, सुरक्षा और सम्प्रभुता पर आए जाए तो फिर देश के सम्मान और आन बान शान की खातिर युद्ध ही एकमात्र विकल्प शेष रह जाता है। इस साल हम भारतीय रण बांकुरों की इसी स्वर्णिम वीरता की रजत जयंती मना रहे हैं। आज से 25 वर्ष पहले भारत के चिर-परिचित दुश्मन पाकिस्तान ने हमेशा की तरह अपनी नापाक हरकतों से दोनों देशों को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया था। भारतीय सेना की ओर से प्रतिउत्तर की कवायद दो माह की लम्बी लड़ाई के बाद फतह में तब्दील हो पाई। इस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना के खिलाफ एक लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी। भारतीय जवानों ने अपने खून से भारत माता के माथे पर शौर्य का टीका लगाकर उसके मान में श्रीवृद्धि की।  


कारगिल युद्ध के नाम से विख्यात भारतीय सैनिकों की इस वीरगाथा को ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है। 26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध में विजय हासिल की थी। इस दिन को हर वर्ष विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। करीब दो महीने तक चला कारगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस और जाँबाजी का ऐसा उदाहरण है जिस पर हर भारतीय देशवासी को गर्व है। करीब 15 हजार से 18 हजार फीट की ऊँचाई और माइनस 10 डिग्री तापमान पर बर्फीली चोटियों पर लड़ी गई इस जंग में कारगिल वॉर मेमोरियल की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक 674 बहादुर सैनिकों ने शहादत दी। इनमें से 4 को सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र,10 को महावीर चक्र और 70 को वीर चक्र से सम्मानित किया गया। युद्ध में 1300 से ज्यादा सैनिक घायल हुए थे। वहीं, भारतीय सैनिकों ने विपरीत हालात में युद्ध करते हुए भी 2700 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया था जबकि 750 पाकिस्तानी सैनिक मैदान में पीठ दिखाकर भाग गए थे।


भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष की नींव पाकिस्तान ने ही रखी थी । पाकिस्तान की सेना ने उग्रवादियों की आड़ लेकर भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की थी। पाकिस्तान ने दावा किया कि लडऩे वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेज़ों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साबित हुआ कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी। भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाली जगहों पर ताबड़तोड़ हमलों और अंतर राष्ट्रीय कूटनीति से पाकिस्तान को मुंह की खाकर वापस जाने पर मजबूर कर दिया था  । यह युद्ध ऊँचाई वाले इलाके पर हुआ और भारतीय सेनाओं को लडऩे में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।  युद्ध की शुरुआत 3 मई 1999 को हो गई थी जब पाकिस्तान ने कारगिल की ऊंची पहाडिय़ों पर घुसपैठ कर कब्जा जमा लिया था। l बताया जाता है कि 8 मई 1999 को पाकिस्तान की 6 नॉर्दर्न लाइट इंफैंट्री और पाकिस्तानी स्पेशल सर्विसेस ग्रुप ने कारगिल की चोटियों पर राशन पानी और अत्याधुनिक हथियारों के साथ कब्जा जमा लिया था। बताया जाता है कि पाकिस्तानी घुसपैठियों को सेना के साथ कश्मीरी गुरिल्ला और अफगानी लड़ाकों का भी साथ मिला था. लेकिन कुछ भारतीय चरवाहों की नजर उन पर पड़ गई और उन्होंने भारतीय सेना को इसकी खबर दे दी। इस घटना और सैन्य सजगता ने पाकिस्तान के नापाक इरादों की पोल खोल दी।


बताया जाता है कि पाकिस्तान ने नेशनल हाइवे 1ए पर कब्जा कर इस पूरे इलाके को भारत से अलग करने की साजिश रची थी। इस हाइवे को श्रीनगर और लेह की लाइफलाइन माना जाता है. इस पूरे इलाके में केवल यही एक ऐसी सड़क है जो हर मौसम में उपयोगी है और सरहद पर रसद पहुंचाने का एकमात्र जरिया।पाकिस्तान ने एक तरह से सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में भारत की सप्लाई लाइन काट कर उस पूरे इलाके पर नियंत्रण पाने की साजिश रची थी जिससे कश्मीर को हथियाने का वर्षों पुराना ख्वाब पूरा किया जा सके। 


कारगिल की लड़ाई शुरू में भारत के लिए काफी मुश्किल साबित हुई थी, लेकिन भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस,बोफोर्स तोपों और भारतीय वायुसेना की त्रिमूर्ति ने जंग की पूरी तस्वीर बदल दी। बोफोर्स तोपों के सटीक और जोरदार हमलों ने पाकिस्तानी चौकियों को पूरी तरह तबाह कर दिया । ऊंचाई पर होने के कारण मजबूत स्थिति और पूरी तैयारी के बाद भी पाकिस्तानी सैनिकों की  भारतीय सैनिकों की दिलेरी के आगे एक नहीं चल पाई और उन्हें बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी । 84 दिनों तक भारत-पाक के बीच चले इस युद्ध में थल सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के जरिए दुश्मनों को धूल चटाई तो वायु सेना के ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ने दुश्मन देश के हौसलों को पस्त कर दिया था। कारगिल में वायु सेना ने आक्रामक के साथ मनोवैज्ञानिक भूमिका निभाई। पहले तो बर्फीली पहाड़ियों पर लड़ाकू विमानों की धमाचौकड़ी ने पाकिस्तानी सैनिकों के दिल में खौफ पैदा कर दिया और फिर वायुसेना ने ताबड़तोड़ बम बरसाकर मजबूत दुश्मन को बर्फ में दबा दिया। भारतीय वायुसेना के मिग-27 और मिग-29 विमानों और एमआई 17 हेलीकाप्टर ने कहर बरपा दिया।  इस युद्ध में बड़ी संख्या में रॉकेट और बमों का इस्तेमाल किया गया। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक कारगिल युद्ध के दौरान कुल मिलाकर, भारतीय वायुसेना ने लगभग 5,000 स्ट्राइक मिशन, 350 टोही मिशन और लगभग 800 एस्कॉर्ट उड़ानें भरीं।  इस युद्ध में भारत ने तो कम खोया, पर पाकिस्तान बर्बाद हो गया। जंग के बाद पाकिस्तान में राजनैतिक और आर्थिक अस्थिरता बढ़ गई और नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर परवेज मुशर्रफ सत्ता पर काबिज हो गए। वहीं, भारत में जंग ने देशप्रेम की गंगा बहा दी और अर्थव्यवस्था को भी काफी मजबूती मिली। 


कारगिल की लड़ाई से सीख लेकर भारत ने सीमा पर सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम किए। सरकार ने एक तरफ जहां रक्षा बजट को और बढ़ाया, वहीं सेना की क्षमता बढ़ाने पर भी काम शुरू हुआ।  कारगिल युद्ध इतिहास के पन्नों में पाकिस्तान की पराजय और भारत की स्वर्णिम विजय के रूप में दर्ज है।कारगिल युद्ध की इस विजय ने साबित कर दिया था कि भारत मां की रक्षा के लिए इसके वीर सपूत अपने लहू से देश की धरती को सींच सकते हैं, लेकिन देश की अखंडता और संप्रभुता पर आंच नहीं सहन कर सकते. यह युद्ध दुश्मन की कायरता और हिंदुस्तान के रणबांकुरों के शौर्य की अनूठी दास्तां है।



सेहत के साथ पॉकेट और पर्यावरण फ्रैंडली भी है साइकिल

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि बढ़िया सूट-बूट पहने कोई व्यक्ति साइकिल चला रहा हो या कोई महिला साल-दो साल के बच्चे को लेकर साइकिल पर बाज़ार करने या ऑफिस जाने को निकली हो,वो भी बेखौफ-बिंदास-बेझिझक!..हमारे देश में कोई ऐसा करेगा तो शायद दूसरे दिन अख़बारों में उसकी फोटो छप जाए लेकिन जापान में यह आम बात है। मुझे कुछ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जापान की यात्रा का अवसर मिला था। हम लोग मुख्य तौर पर ओसाका में रहे,जहाँ जी-20 देशों का शिखर सम्मेलन हुआ था। ओसाका में बड़ी संख्या में महिला/पुरुष/युवा/बच्चे सभी बड़े आराम से साइकिल पर घूमते नजर आते थे और वहां के लोगों से बातचीत में पता चला कि पूरे जापान में साइकिल के प्रति इसीतरह का प्रेम है। 

साइकिल पर बात करने का कारण यह है कि जून माह को विश्व साइकिल दिवस के लिए भी जाना जाता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हर साल 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को साइकिल चलाने के प्रति जागरुक करना है। इतना तो हम सभी जानते हैं कि नियमित तौर पर साइकिल चलाना शरीर के लिए काफी फायदेमंद है। 

हम सभी ने भी कभी न कभी कैंची से लेकर सीट तक भरपूर साइकिल चलाई है। मोटापा घटाने से लेकर शरीर की तंदुरुस्ती के लिए नियमित साइकिल चलाना वरदान है। जानकर कहते हैं कि रोजाना आधा घंटा साइकिल चलाने से हृदय रोग, मोटापा, मानसिक बीमारी, मधुमेह, गठिया रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है।   पहली बार विश्व साइकिल दिवस मनाए जाने की घोषणा 3 जून, 2018 को की गई थी । इसके बाद से हर साल 3 जून के दिन विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। 

आज के समय मोटर वाहनों को बढ़ते उपयोग के कारण वातावरण में प्रदूषण काफी बढ़ रहा है। इस कारण वातावरण को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए साइकिल का उपयोग जरूरी हो गया है।  इस साल विश्व साइकिल दिवस की थीम साइकिलिंग के माध्यम से अच्छे स्वास्थ्य, निष्पक्षता और स्थिरता को प्रोत्साहित करना थी । 

अब बात फिर जापान की…सोचिए, न गाड़ियों की कर्कश चिल्लपों, न बेतहाशा भागते लोग एवं वाहन और न ही रेड लाइट पर हमारे जैसी चीख-पुकार...सब कुछ सुकून/शांति/आराम और सम्मान से....सम्मान पैदल यात्रियों का और सम्मान साइकिल सवारों का। जापान साइकिल की सवारी के मामले में भले ही दुनिया में नीदरलैंड,डेनमार्क और जर्मनी जैसे देशों से पीछे हो लेकिन शायद हम से बहुत आगे है। हमारे देश में दुनिया भर में कुल साइकिल उत्पादन का 10 फीसदी हिस्सा बनता है लेकिन साइकिल चलाना हमें गंवारा नहीं है। 

जापान के सिर्फ ओसाका शहर में ही 10 लाख से ज्यादा साइकिल हैं जबकि आबादी हमारे देश के भोपाल, रायपुर,जोधपुर और लखनऊ जैसी ही मतलब 18-20 लाख के आसपास है। यदि हम ओसाका की तुलना इन शहरों से करें तो साइकिल को लेकर मानसिकता साफ़ जाहिर हो जाती है।  दरअसल साइकिल चलाने के लिए मानसिकता चाहिए और हमारे यहाँ तो साइकिल गरीबी की पहचान है।  

अब भले ही मोटापे से मुक्ति,तोंद से छुटकारे और डाक्टर की सलाह पर मन मारकर साइकिल चलाने लगे हैं लेकिन वे भी बस पार्क या घर के आसपास तक ही सीमित हैं तभी तो जब कोई सांसद/विधायक साइकिल पर संसद/विधानसभा पहुँच जाता है तो वह खबर बन जाता है जबकि जापान जैसे देशों में यह सामान्य बात है। जापान में हर व्यक्ति दिनभर में औसतन 15 प्रतिशत यात्राएँ साइकिल से ही करता है और यक़ीनन जापानियों की छरहरी काया का राज भी यही है। 

ओसाका में मुझे तो कोई तोंद वाला और बेढब काया वाली महिला नज़र नहीं आयी। अब आप कह सकते हैं सूमो पहलवान भी तो जापानी हैं लेकिन वह एक अलग नस्ल है और यहां हम जापान के सामान्य लोगों की बात कर रहे हैं। हाल के वर्षों में यहां 10 लाख से अधिक बाइक(साइकिल) हर साल बेची जाती हैं। जापान में मोटरसाइकिलों के विकल्प के रूप में साइकिल का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। बहुत सारे लोग ट्रेन स्टेशनों पर सवारी करने के लिए उनका उपयोग करते हैं। 

आजकल अधिक से अधिक जापानी ट्रैफिक जाम और भीड़ वाली ट्रेनों से बचने के लिए साइकिल चला रहे हैं। हर जगह साइकिल खड़ी करने के लिए बाकायदा साईकिल स्टैंड बने हुए हैं- माल में,ऑफिसों में,आम बाज़ारों में,फुटपाथ पर,बस स्टाप पर सभी जगह आधुनिक साइकिल स्टैंड हैं. लोग नियम से साइकिल पार्क करते हैं और ज़ेबरा क्रासिंग पर लोग लालबत्ती होने का इंतजार नहीं करते बल्कि साइकिल और पैदल यात्रियों को सुकून और शांति से निकलने देते हैं. वाहनों की लाइन होने के बाद भी कोई हार्न बजा-बजाकर पूरे इलाक़े को सर पर नहीं उठाता बल्कि आगे बढ़ने के लिए चुपचाप अपनी बारी का इंतज़ार करता है। यहाँ लड़कियां और महिलाएं अपने मन मुताबिक कपड़े पहनकर मन चाहे समय तक पैदल और साइकिल पर घूमती हैं लेकिन उन पर कोई फब्ती नहीं कसता,कोई आंख फाड़ फाड़कर नहीं देखता,कपड़ों की आड़ लेकर कोई बलात्कार नहीं करता और उन्हें नारीत्व को लेकर कोई शर्म का अहसास नहीं कराता...बस यहीं हम बहुत पीछे हैं और शायद कभी जापान की बराबरी भी न कर पाएंगे।  जैसा कि हम जानते हैं कि विश्व साइकिल दिवस का मतलब है कि हम सभी को यह याद दिलाना है कि साइकिल एक सुरक्षित, प्रदूषण मुक्त और स्वास्थ्यप्रद यातायात का प्रमुख साधन है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य साइकिल के उपयोग को प्रोत्साहित करना है, जो स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देता है और पर्यावरण के लिए भी अच्छा होता है।   आज के युग में जहां शहरी जीवन की गतिविधियाँ तेजी से बढ़ रही हैं, वहां साइकिल एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है जो स्वास्थ्य, पर्यावरण, और आर्थिक दृष्टि से बहुत ही उपयुक्त है। साइकिल न केवल हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करती है, बल्कि इसका उपयोग करके हम प्रदूषण को कम करने और वातावरण को सुरक्षित रखने में भी योगदान कर सकते हैं। साइकिल का उपयोग करना स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देता है, जिससे हृदय स्वास्थ्य सुधारता है और रोगों से बचाव होता है।  इस दिवस के अवसर पर हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हम साइकिल का उपयोग अपने दैनिक यातायात में शामिल कर सकते हैं और इससे हमारे आसपास के पर्यावरण को कैसे बचा सकते हैं। इसी प्रकार, साइकिल दिवस हमें साइकिल के महत्व को समझाने और इसे एक सकारात्मक बदलाव के लिए एक माध्यम के रूप में उपयोग करने की प्रेरणा देता है। यह एक अवसर है जब हम लोग साइकिल के लाभों पर ध्यान दें और उसे एक सही और सुरक्षित यात्रा का हिस्सा बनाएं।

‘ओटीपी पापा’...पिताओं की नई जमात !!

ओटीपी पापा…जी हां, क्या आप भी ओटीपी पापा हैं!! यह पढ़कर आप भी चौंक गए न। आज जब सोशल मीडिया पापा, पॉप्स, बाबूजी, दादा, अब्बा, पापाजी, बाबा और डैड जैसे-जैसे तमाम संबोधन के जरिए पिताओं के योगदान को सराह रहा है, उनका गुणगान कर रहा है और उनसे मिली शिक्षाओं का बढ़ चढ़कर बयान कर रहा है तब ‘ओटीपी पापा’ कहना चौंकाता है और चौंकना भी चाहिए क्योंकि अब तक आपने भी पिताजी के लिए यह संबोधन नहीं सुना होगा।  

 कुछ साल पहले की बात है जब दिल्ली में अक्सर ‘संडे पापा’ को लेकर चर्चा होती थी । दरअसल दिल्ली में नौकरी करने वाले बहुत सारे हमारे साथी ऐसे थे जो मेरठ, अलीगढ़ और इसी तरह दिल्ली के आसपास के शहरों से अप-डाउन करते थे । उस समय न तो आवागमन के इतने ज्यादा साधन थे और न ही आज की तरह तेज रफ्तार गाड़ियां। इसलिए, उन्हें सुबह नौ-साढ़े नौ बजे का ऑफिस मिलाने के लिए घर से बहुत जल्दी निकलना पड़ता था और तब बच्चे सोते रहते थे। इसीतरह शाम को 6 बजे तक की ड्यूटी करने के बाद दोस्तों के चाय पानी करते हुए वे देर रात की ट्रेन से घर पहुंच पाते थे । ऐसी स्थिति में उनके छोटे बच्चे सो जाते थे। ऐसी सूरत में बच्चों की संडे और छुट्टी के दिनों में ही अपने पिता से मुलाकात हो पाती थी इसलिए मजाक में ‘संडे पापा’ कहने का चलन शुरू हो गया क्योंकि पापा और बच्चों के बीच में मुलाकात संडे को ही हो पाती थी।  

 कुछ इस तरह का किस्सा ‘ओटीपी पापा’ का भी है। दरअसल आज के कैशलेस बाजार में नकद पैसे लेकर चलने का रिवाज लगभग खत्म हो गया है और पिता से लेकर बच्चों तक तमाम पेमेंट एप और ऑनलाइन भुगतान के तरीकों से खरीदारी या लेनदेन कर रहे हैं। अब बच्चों का खर्च पर काबू तो होता नहीं है इसलिए अक्सर मां-बाप या तो उनके पॉकेट मनी को सीमित कर देते हैं या फिर भुगतान के लिए उनके उनकी पेमेंट प्रक्रिया को अपने अकाउंट से जोड़ देते हैं ।

 वैसे भी , बच्चन साहब (अमिताभ बच्चन) आए दिन भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से यही ज्ञान प्रतिदिन देते हैं।   यह उचित भी है क्योंकि साइबर फ्रॉड अथवा ऑनलाइन ठगी से बचने के लिए बैंकों ने भी किसी भी लेनदेन के साथ ओटीपी अनिवार्य कर दिया है। अब, जब भी बच्चों को कुछ खरीदना या लेनदेन करना होता है तो वे अक्सर ओटीपी के लिए पापा पर आश्रित हो जाते हैं । बस, यहीं से ‘ओटीपी पापा’ की अवधारणा शुरू हुई। 

हम सब जानते हैं कि मोबाइल फोन और ईयर फोन/बड्स में रमी नई पीढ़ी के पास जब दोस्तों के साथ बैठकर बात करने का वक्त नहीं है तो वह मां-बाप के साथ कहां से समय निकाल पाएंगे इसलिए घरों में और खासतौर पर एकल परिवारों में परस्पर बातचीत का चलन कम होता जा रहा है।   बच्चे मोबाइल में मैसेजिंग के जरिए तो बहुत सारी बात कर लेते हैं, सोशल मीडिया पर वह देश ही नहीं दुनिया भर के लोगों से संवाद करते हैं और उनके दोस्तों की संख्या भी हजारों में होती है…लेकिन असल जिंदगी में साथ बैठकर गपियाने के लिए न उनके पास वक्त होता है, न दोस्त और न ही रिश्तेदार। इसलिए, जब भी उन्हें किसी चीज की जरूरत होती है तो वह ऑनलाइन ऑर्डर करते हैं और फिर मां-बाप के पास ओटीपी के लिए फोन या संदेश आ जाता है। एक तरह से अब यह ओटीपी ही उनके बीच परस्पर संवाद का कारण बन गए हैं और इसी के चलते पापा, बाबूजी, पापा जी, बाबा और अब्बा की बजाय अब पापा ‘ओटीपी पापा’ हो गए हैं।  

 तो इस फादर्स डे पर आप भी ओटीपी पापा बनकर न केवल बच्चों को खुश रखिए बल्कि अपने भी आधुनिक होने की खुशियां मनाइए। वैसे भी फादर्स डे कोई हमारा परंपरागत त्यौहार तो है नहीं बल्कि यह भारतीय संस्कृति से अलग किस्म का पर्व है। हमारी सनातन संस्कृति में तो पूरे 365 दिन माता-पिता के सम्मान को समर्पित हैं लेकिन फादर्स डे और इसी तरह के अन्य दिन हमें साल में एक दिन मां बाप के सम्मान का अवसर देते हैं ।

 बाजार ने अपने मुनाफे के लिए इन एक दिन के पर्वों को दशहरा- दीवाली और ईद से बड़ा बना दिया है ।   फ़ादर्स डे नुमा दिनों का मतलब ग्रीटिंग कार्ड खरीदना, केक कटवाना और उपहार देकर किसी महंगे होटल में जाकर खा पी लेना, हो गया है।  यदि आपके पास पैसा है तो आप कपड़े, जूते और गहने में भी खर्च कर सकते हैं। हालांकि, मेरा मानना है कि  हम उत्सव धर्मी लोग हैं इसलिए किसी भी माध्यम से सही…आनंद मनाए। फिर चाहे वह फादर्स डे  हो,मदर्स डे या फिर होली-दीवाली…तो बस, ओटीपी पापा मौज करिए।  

आर यू वेजीटेरियन? सिंपल या हिन्दू वेजीटेरियन

कैथी पेसिफिक एयरलाइन्स के विमान में खाना परोसते हुए एयर होस्टेस ने पूछा- यू आर वेजीटेरियन? मेरे हाँ कहते ही उसने तत्काल दूसरा सवाल दागा- विच टाइप आफ वेजीटेरियन....मीन्स सिंपल वेजीटेरियन या हिन्दू वेजीटेरियन? अपनी लगभग ढाई दशक की नौकरी में यह सवाल चौंकाने वाला था क्योंकि अब तक तो शाकाहारी का एक ही प्रकार अपने को ज्ञात था। अब शाकाहार भी हिन्दू-मुस्लिम टाइप होता है!! इसकी जानकारी जापान यात्रा के दौरान ही मिली। खैर मैंने बताया कि हिन्दू वेजीटेरियन तो उसने कहा कि आपको 20 मिनट इंतज़ार करना होगा क्योंकि मुझे आपके लिए खाना पकाना पड़ेगा ! अब सोचिए विदेशी विमान में कोई विदेशी व्योमबाला (एयर होस्टेस) कहे कि मैं आपके लिए खाना बनाकर लाती हूँ तो दिल में लड्डू फूटना स्वाभाविक है। लगभग 20-25 मिनट के इंतज़ार के बाद वह बटर में बघारी हुई खिचड़ी,चने की दाल और रोटी के नाम पर ब्रेड के टुकड़े लेकर हाज़िर हुई। उसने भरसक प्रयास किया था कि खाना स्वादिष्ट रहे और अपन ने भी दबाकर खा लिया ताकि उसे भी महसूस हो कि खाना स्वादिष्ट ही था।..खैर इस एक किस्से से यह तो साफ़ हो गया था कि जापान में शाकाहार के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और दूसरा यह कि यात्रा पर रवानगी से पहले इष्ट मित्रों की बात सही लग रही थी जो उन्होंने अपने और अपनों के अनुभव के आधार पर बताई थी कि जापान में तुम्हें उपवास करना पड़ सकता है। दरअसल,मुझे आकाशवाणी की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जी 20 देशों के सम्मेलन की कवरेज के लिए जापान भेजा गया था। मैं, एडवांस पार्टी का हिस्सा था मतलब ये की प्रधानमंत्री के वहां पहुंचने से पहले वहां के उत्साह,तैयारियों,भारतीय लोगों से मुलाकात और दोनों देशों के बीच संभावित समझौतों वगैरह पर समाचार भेजना था इसलिए अन्य पत्रकारों की तुलना में यहां ज्यादा रुकना और घूमना था। यही वजह है कि भोजन अपनी प्रमुख चिंता था।

अब जब मैदान में कूद पड़े तो फिर जंग से क्या डरना इसलिए जो जैसा मिलेगा-काम चला लेंगे, के अंदाज़ में मन बना लिया...अब निश्चित ही आप सभी के मन में यह सवाल उछल रहे होंगे कि फिर वहां क्या खाया तो सबसे पहले तो सुन और जान लीजिए कि हमने वहां शाही पनीर, दाल मखनी, रसगुल्ला, गुलाब जामुन, खिचड़ी, सोन-पापड़ी, आलूबंडा, पोहा,उत्पम और इडली सहित वो सब कुछ खाया जो यहाँ भारत में खाने को मिलता है और उतना ही स्वादिष्ट क्योंकि...‘मोदी है तो मुमकिन है।’

जी हाँ, इसमें जरा भी गलत नहीं है क्योंकि जापान में प्रधानमंत्री श्री मोदी के कारण ही यह मुमकिन हुआ। दरअसल हमारे प्रधानमंत्री ठहरे हम से ज्यादा शाकाहारी इसलिए जापान की जिस होटल में हम लोग ठहते थे, उसने भारत से खासतौर पर रसोइए बुलाए थे और जब रसोइए भारतीय थे तो स्वाद भी भारतीय था और अंदाज़ भी, लेकिन जापान में खाने का मामला इतना सीधा भी नहीं था क्योंकि इस कहानी का दूसरा हिस्सा भी है जिसमें ज़रूर जापान में शाकाहारी खाने के संकट का अहसास होता है। दरअसल होटल में तो भारतीय रसोइए की मेहरबानी से शाकाहारी भोजन मिल गया लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया सेंटर में तो दुनियाभर के लोगों का ध्यान रखा गया था इसलिए वहां शाकाहार और विशेष तौर पर हिन्दू शाकाहार(!) कहीं पीछे रह गया। मीडिया सेंटर में अपना खाना तो दूर अपनी देशी चाय (वही दूध-शक्कर और पत्ती की जुगलबंदी से भरपूर खौलने के बाद तैयार) के लिए भी तरसना पड़ा। वैसे तो जापान में वीआईपी मेहमानों को 24 प्रकार की चाय उपलब्ध थी जिसमें कई अबूझ नामों के बीच हमारी दार्जिलिंग चाय और आइस टी जैसे कुछ जाने माने नाम भी शामिल थे लेकिन वही अपनी असल कड़क-खौलती चाय नहीं थी। चाय के अलावा कॉफ़ी के भी दर्जन भर प्रकार थे जिनमें ओसाका के स्थानीय ब्रांड के अलावा ‘20 देशों के 20 दाने’(20 beans of 20 countries) जैसी उत्तम किस्म की कॉफ़ी भी थी लेकिन दिक्क़त यहाँ भी दूध की थी और बिना दूध के कड़वी कॉफ़ी को हलक से नीचे उतारना अपने लिए तो किसी सज़ा की तरह है। हालाँकि यहाँ कॉफ़ी के एक प्रकार कॉफ़ी लैटे ने मदद की क्योंकि इसमें पर्याप्त दूध होता है और इसतरह कुछ हद तक चाय- कॉफ़ी का संकट दूर हुआ।

रही खाने की बात तो यदि मैं आपसे कहूँ कि सुशी, साशिमी, टेम्पुरा, याकीतोरी, उडोन, सोबा, कैसेकी, सुकीआकी, सुकमोनो अचार और मिसो सूप...इन नामों को सुनकर कुछ समझ आया..तो आप भी आश्चर्य से पलकें झपकाते रह जाएंगे क्योंकि जब मुझे जापान जाने के बाद भी समझ नहीं आया तो आप खाली नाम पढ़कर कैसे समझ सकते हैं...चलिए इस पहेली को आसान बनाते हैं..दरअसल ये सभी नाम जापान के सबसे लोकप्रिय और लज़ीज़ व्यंजनों के हैं और बड़ी संख्या में तमाम देशों के लोग इनका स्वाद चखने के लिए जापान जाते हैं. जी-20 देशों के महारथियों को भी ये और इनके साथ दर्जनों अन्य व्यंजन परोसे गए थे. व्यंजन तो छोड़िये, दुनिया के इन सबसे ताकतवर मुल्कों के प्रतिनिधियों के लिए 100 से ज्यादा प्रकार के शेक,24 प्रकार की चाय, 8 प्रकार की काफ़ी, दर्जन भर से ज्यादा प्रकार की बीयर,17 प्रकार की वाइन,12 तरह के साफ्ट ड्रिंक,30 प्रकार की देशी मदिरा-शोचु परोसी गयी. शोचु गन्ना, शकरकंद, ज्वार,चावल जैसे कई अनाज और फलों से बनती है. तक़रीबन दौ सौ से ज्यादा व्यंजनों और ड्रिंक्स की सूची में मुझे बस चावल, दार्जिलिंग टी, आइस टी,काफ़ी जैसे कुछ नाम ही समझ आए.

वैसे, शायद कम ही लोग जानते होंगे कि जापानी भोजन दुनिया में काफी लोकप्रिय है और इसका कारण यह है कि पारंपरिक जापानी खाने में पाँच नियमों को ध्यान में रखकर विविधता और संतुलन पर जोर दिया जाता है। इन नियमों के अंतर्गत खाने में पांच रंगों (काला, सफेद, लाल, पीला और हरा), खाना पकाने की पांच तकनीकों (कच्चा भोजन, ग्रिलिंग, स्टीमिंग, उबालना और तलना) के साथ साथ पांच स्वाद (मीठा, मसालेदार, नमकीन, खट्टा और कड़वा) का खास ध्यान रखा जाता है। यहाँ तक कि सूप और चावल बनाते समय भी इन नियमों का पालन किया जाता है। इसके अलावा ताज़ी और उच्च गुणवत्ता वाली मौसमी कच्ची सामग्री का इस्तेमाल के साथ साथ नफ़ासत के साथ परोसने के कारण भी जापानी खान-पान के मुरीद बढ़ रहे हैं।

अब यदि आप हिन्दू वेजीटेरियन (जैसा कैथी पैसिफिक एयरलाइन्स में पूछा गया था) जैसे किसी खूंटे से नहीं बंधे हैं तो जापान में आपकी जीभ के लिए भरपूर गुंजाइश है जो मछली-मटन-चिकन से आगे बढ़कर सुअर,गाय और सी फूड में ऑक्टोपस-केंकड़े और कई प्रकार के कीड़े मकोड़े का भी स्वाद ले सकती है…तो जाइए कभी जापान और लुत्फ उठाइए यहां के स्वाद, संस्कार, संगीत, सहजता, सरलता और सबसे प्रमुख अनुशासन का।


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

"मिज़ाज का हिस्सा बनता स्वच्छता का संकल्प"

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आज देश में स्वच्छता का एक नया अध्याय लिख रही है। एक समय था जब यह शहर भी अन्य शहरों की तरह कचरे और गंदगी से जूझता था। लेकिन आज यह शहर देश के सबसे स्वच्छ शहरों में शुमार है। कभी जर्दा, परदा के साथ अपनी गर्दा यानि धूल के लिए बदनाम भोपाल आज देश की स्वच्छतम राजधानी है। बीते स्वच्छ सर्वेक्षण में झीलों का शहर भोपाल सबसे स्वच्छ राज्य की राजधानियों में शीर्ष पर है और देश भर के शीर्ष 10 स्वच्छ शहरों में 5वें नंबर पर है।

इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं मसलन:

नागरिकों की जागरूकता: भोपाल के नागरिक अब स्वच्छता को लेकर जागरूक हो गए हैं। वे अपने घरों और आसपास के क्षेत्रों को साफ रखने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

नगर निगम के प्रयास: नगर निगम ने शहर को स्वच्छ बनाने के लिए कई पहल की हैं। इनमें कचरा निस्तारण की बेहतर व्यवस्था, सड़कों की नियमित सफाई, और नागरिकों को जागरूक करने के अभियान शामिल हैं।

स्वच्छ सर्वेक्षण: स्वच्छ सर्वेक्षण ने शहरों के बीच स्वच्छता को लेकर एक प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाया है। भोपाल ने इस प्रतिस्पर्धा में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है।

भोपाल में कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जाता है। शहर में कई कचरा निस्तारण संयंत्र हैं जो कचरे से ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। विगत वर्षों में भोपाल शहर में कचरा संग्रहण और प्रसंस्करण तंत्र बेहतर हुआ है, इस हेतु 719 वाहन शामिल हैं जिनमें 250 वाहन बायो सीएनजी आधारित हैं। इनके अलावा रोड स्वीपिंग हेतु 6 नए मेकेनिकल रोड स्वीपिंग वाहन अपने बेड़े में शामिल किए गए हैं। इसके अलावा भोपाल नगर निगम द्वारा 17 गार्बेज ट्रांसफर स्टेशन, ग्रीन वेस्ट मैनेजमेंट हेतु श्रेडर आदि कचरा प्रसंस्करण हेतु शामिल किए गए हैं। 

प्लास्टिक कचरे के शमन हेतु 5 टन प्रतिदिन का प्लास्टिक रिसायकल प्लांट तैयार किया गया है  जिसमें जिसमें मल्टीलेयर प्लास्टिक को निष्पादित किया जा रहा है , इसी प्रकार संभवतः देश का पहला थर्माकोल रिसायकल प्लांट और 3टन प्रतिदिन क्षमता का रिसायकल प्लांट नारियल अपशिष्ट के समाधान हेतु स्थापित किया गया है। शहर जी जरूरत के अनुसार 50 टन प्रतिदिन क्षमता का रेंडरींग प्लांट भी निगम द्वारा संचालित किया जा रहा है। जिसमें फिश, मीट मार्केट और स्लाटर हाउस से निकला हुआ अपशिष्ट निष्पादित किया जाता है। नगर निगम के इस प्रयास की भारत सरकार द्वारा भी सराहना की गयी है।

इन्हीं सब प्रयासों की वजह से भोपाल की सड़कें, पार्क, कॉलोनियाँ और सार्वजनिक स्थल साफ-सुथरे हैं। शहर में नियमित रूप से सफाई की जाती है और सड़कों पर कचरा फेंकने पर जुर्माना लगाया जाता है।


भोपाल की इस सफलता का राज नागरिकों और सरकार के बीच सहयोग में निहित है। नागरिकों ने स्वच्छता को अपना धर्म बना लिया है और सरकार ने उन्हें हर संभव मदद दी है। भोपाल को स्वच्छ शहर बनाने का सफर अभी भी जारी है। हमें और अधिक प्रयास करने होंगे। हमें सभी को मिलकर काम करना होगा ताकि भोपाल हमेशा स्वच्छ और सुंदर बना रहे जैसे अपने घर और आसपास के क्षेत्र को साफ रखें, कचरा हमेशा डस्टबिन में डालें, प्लास्टिक का उपयोग कम करें, पेड़ जरूर लगाएं और स्वच्छता अभियानों में भाग लें।

भोपाल ने स्वच्छता के क्षेत्र में जो उपलब्धि हासिल की है, वह अन्य शहरों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। भोपाल को स्वच्छता में मिल रही इस सफलता का बहुत श्रेय काफी हद तक भोपाल नगर निगम के प्रयासों को भी जाता है। 2022 में 6वें स्थान से आगे बढ़ते हुए, भोपाल अब 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में 5वां सबसे स्वच्छ शहर बन गया है। भोपाल को 5-स्टार गार्बेज फ्री सिटी रेटिंग भी मिली है, जिससे यह देश की सबसे स्वच्छ राज्य की राजधानी बन गई है।

हाल के वर्षों में भोपाल की उन्नति का श्रेय इसके सर्वोत्तम अभ्यासों, नवाचार और विशिष्टता को दिया जा सकता है। शहर में प्रतिदिन 850 टन कचरा निकलता है और पूरे कचरे का प्रसंस्करण प्रतिदिन किया जाता है। नगर निगम की केन्द्रीय पहल जैसे कचरे का वैज्ञानिक निपटान, कचरे से कंचन बनाने की परियोजनाएं, कचरे का पुनर्चक्रण, सीएनजी से चलने वाले कचरा संग्रह वाहन, रिड्यूस, रीयूज रीसाइकिल-3-आर पर जोर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कचरा संवेदनशील बिंदुओं को हटाकर शहर के सौंदर्य आकर्षण को बढ़ाया गया है। कचरे को अब सीएंडडी, बायो-सीएनजी और चारकोल संयंत्रों के माध्यम से कुशलतापूर्वक एकत्रित और संसाधित किया जाता है।


इस पूरी प्रक्रिया में मध्य प्रदेश के नागरिकों ने जिस उत्साह के साथ भागीदारी की है, वह देश के सामने एक उदाहरण बनकर उभरा है। प्रदेश के इंदौर शहर ने 7 वर्षों में स्वच्छ सर्वेक्षण में लगातार प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। इसी कारण इंदौर को गोल्ड सिटी क्लब में शामिल किया गया है। आज इंदौर देश का ऐसा पहला शहर है जहां लोग अपने घर के कूड़े को दो नहीं बल्कि छह भागों में अलग-अलग करते हैं जिससे इसकी निष्पादन लागत में काफी कमी आई है। उनका यह प्रयास वेस्ट टू वेल्थ की परिकल्पना को साकार करता है। इन प्रयासों के चलते ही इंदौर आज डस्ट-फ्री एवं बिन-फ्री शहर बन गया है। इन्हीं मानकों के आधार पर गारबेज फ्री सिटी रेटिंग में भी इंदौर सेवन-स्टार शहर घोषित किया गया है। इंदौर देश का पहला वाटर-प्लस शहर भी बना है। वॉटर-प्लस श्रेणी के अंतर्गत घरों से निकलने वाले गंदे पानी को नदी या तालाबों में जाने से पूर्व ट्रीट किया जाता है जिससे पानी के अन्य स्रोत जल प्रदूषण से मुक्त होते हैं। साथ ही, इस पानी का पुनः उपयोग किया जाता है। इंदौर ने जन भागीदारी के माध्यम से अपने शहर की जीवन-रेखा कही जाने वाली कान्ह और सरस्वती नदियों को नया जीवन प्रदान किया है।


दरअसल, स्वच्छ भारत मिशन शहरी सरकार का मात्र एक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक जन आंदोलन है। स्वच्छता की दिशा में प्रदेश के नागरिक और अन्य हितधारकों के सामूहिक प्रयासों से मध्य प्रदेश स्वच्छ, स्वस्थ व समृद्ध प्रदेश के रूप में उभरा है। मध्य प्रदेश में स्वच्छता अभियान के तहत कई काम किए जा रहे हैं। स्वच्छता अभियान के कारण प्रदेश में स्वच्छता के स्तर में सुधार आया है।


आंकड़ों पर नजर दौडाएं तो प्रदेश के नगरीय क्षेत्रों में 7082 से अधिक मोटराइज्ड वाहनों से कचरा संग्रहण व्यवस्था का संचालन किया जा रहा है। इनमें सूखे, गीले, घरेलू हानिकारक और सेनेटरी अपशिष्ट को अलग-अलग रखने के लिये कम्पार्टमेंट बनाये गये हैं। जीपीएस और पीए सिस्टम से वाहनों की निगरानी और स्वच्छता विषयों का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। गीले कचरे के प्रसंस्करण और निष्पादन के लिये स्पॉट कंपोस्टिंग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रदेश में 850 से अधिक ठोस अपशिष्ट उत्पादकों द्वारा स्पॉट कंपोस्टिंग की जा रही है। 


प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर देश में शुरू हुए स्वच्छता अभियान में मध्यप्रदेश अनेक कीर्तिमान स्थापित कर चुका है। प्रधानमंत्री की मंशानुरूप प्रदेशवासियों ने पूरे उत्साह और जन-सहयोग से स्वच्छता के क्षेत्र में नये आयाम भी स्थापित किये हैं। इस वर्ष अभियान की थीम “स्वभाव स्वच्छता-संस्कार स्वच्छता’’ रखी गयी । स्वच्छता ही सेवा अभियान में अधिक से अधिक जन-भागीदारी और स्थानीय निकायों की भागीदारी पर जोर दिया गया । मध्यप्रदेश स्वच्छ भारत मिशन में कई मामलों में लगातार नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है । प्रदेश के सभी शहरों ने पिछले 10 वर्षों के दौरान अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयास किये हैं। जनता के सहयोग से स्वच्छ भारत मिशन अब यहाँ जन-आंदोलन का रूप ले चुका है।

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