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मई, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कैसे कैसे रिश्तेदार

देश भर में इन दिनों शादी और छुट्टी का मौसम है इसलिए सभी ओर रिश्तेदारों(relatives) की बहार आई हुई है. शर्माजी भागकर वर्माजी के घर जा रहे हैं तो वर्माजी पहले ही गुप्ताजी के घर जाने के लिए निकल चुके हैं. दरअसल कोई भी अपने घर नहीं रहना चाहता क्योंकि यदि वो खुद कहीं नहीं गया तो उसके घर कोई आ धमकेगा. इस भीषण गरमी के मौसम में कोई भी रिश्तेदार को अपने घर में टिकाने का जोखिम नहीं लेना चाहता. खासकर दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में तो हालत और भी ख़राब हैं. यहाँ लोगों के अपने ही रहने का ठिकाना नहीं है तो फिर मेहमानवाजी कैसे कर सकते हैं पर छुटिओं में छोटे शहरों के रिश्तेदारों को महानगर जाना ही ज्यादा पसंद आता है इसलिए वे इन शहरों में रहने वाले दूर-दराज के रिश्तेदारों को भी खोज निकलते हैं और पूरे दलबल के साथ उनके घर जा धमकते हैं. वह तो उनसे उनके दिल का हाल पूछिए जो भरी गरमी में बूँद-बूँद पानी की कमी और एक एसी के सहारे किस तरह इस रिश्तेदारी की सजा को भुगतते हैं. सबसे बुरा हाल तो उनका होता है जिन्हें इस मौसम में शादी करनी पड़ती है. शादी करने,कराने और शामिल होने वाले सभी परेशान होते हैं. उत्तर भारत के अध

....मेरी "गंगा माँ" को बचा लो प्लीज

मेरी ममतामयी माँ की जान संकट में है. वह तिल -तिलकर मर रही है और मैं ऐसा अभागा बेटा हूँ जो चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता. दरअसल मेरी माँ की इस हालत के लिए सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि आप सभी ज़िम्मेदार हैं. आप में से कुछ लोगों ने उसे बीमार बनाने में अहम भूमिका निभाई है तो कुछ ने मेरी तरह चुप रहकर इस दुर्दशा तक लाने में मूक सहयोग दिया है.यही कारण है कि आज मुझे आप सभी से माँ को बचने की अपील करनी पड़ रही है. मेरी माँ का नाम गंगा है...अरे वही जिसे आप सब गंगा नदी(river ganga) या गंगा मैया के नाम से पुकारते हैं. आप सब भी इस बात को मानेंगे कि मेरी माँ ने कभी किसी का ज़रा सा भी नुकसान नहीं किया. वह तो ममता, त्याग, करुणा, वात्सल्य और स्नेह की प्रतिमूर्ती है. आज क्या सदिओं से मेरी माँ हम सब के पाप धोते आ रही है और अनादिकाल से सम्मान पाने में सर्वोपरि रही है. तभी तो इस स्रष्टि के निर्माता ब्रम्हा उसे अपने कमंडल में लेकर चलते थे और सर्वशक्तिमान भगवान् शंकर ने उसे अपनी जटाओं में स्थान दिया. मेरी माँ के विशाल ह्रदय का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजा सगर के पुत्रों को मुक्ति देने के लिए वह धरती पर उत

मंगलौर हादसे ने खोली नेशनल न्यूज़ चैनलों की पोल

राखी सावंत और मल्लिका शेरावत के चुम्बन और अधनंगेपन के सहारे टीआरपी की जंग में अपने आपको नम्बर वन बताने में उलझे कथित नेशनल न्यूज़ चैनलों की पोल शनिवार को मंगलौर विमान दुर्घटना(Mangalore air crash) ने खोलकर रख दी.सुबह ६ बजे हुई इस दुर्घटना तक हमारे नेशनल चैनलों के बाईट-वीर लगभग १० बजे तक पहुँच पाए और इस दौरान वे स्थानीय न्यूज़ चैनलों की ख़बरों और फुटेज को चुराकर “एक्सक्लूसिव” बताकर चलाते रहे. वो तो भला हो टीवी-९, इंडियाविजन और स्वर्ण न्यूज़ का जिनकी बदौलत देशभर को इस घटना की पल-पल की जानकारी मिल पायी.इसके लिए ये चैनल वाकई बधाई के पात्र हैं. कुछ दिन पहले सीआरपीएफ के दल पर हुए नक्सली हमले के दौरान भी कथित नेशनल न्यूज़ चैनलों की असलियत सामने आ गयी थी जब उन्हें इस घटना की जानकारी के लिए स्थानीय साधना न्यूज़ चैनल पर निर्भर रहना पड़ा था.सोचने वाली बात यह है की जब मंगलौर जैसे बड़े और वेल-कनेक्टेड शहर तक पहुँचने में इन चैनलों को चार घंटे लग गए तो किसी दूर-दराज़ की जगह पर कोई बड़ा हादसा हो गया तो ये क्या करेंगे? या इसी तरह नेताओं के बयानों पर दिन भर खेलकर अपनी पीठ थपथपाते रहेंगे? विमान हादसे में हमार

.....बेटा हो तो ऐसा

बदलते समाज के साथ साथ बच्चे भी बदलने लगे हैं और खासतौर पर बेटों के बारे में तो ये कहा जाने लगा है कि वे अपने माँ-बाप की सेवा करना भूल गए हैं.आज लड़कों को आवारा,मक्कार,कामचोर और बिगडैल नवाब जैसे संबोधनो से बुलाया जाना आम बात हो गई है परन्तु अब कुछ बेटे ऐसे हैं जिनके लिए माँ-बाप की सेवा से बढ़कर कुछ भी नहीं है और वे माँ-बाप की इच्छा को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.उनकी राह में न तो मौसम बाधा बन पाता है और न पैसों की तंगी.ऐसा ही एक बेटा है मध्य प्रदेश के जबलपुर का कैलाश. उसने अपनी बूढ़ी दृष्टिहीन मां को देश के सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों की यात्रा कराने की ठानी है। उसने बद्रीनाथ की कठिन पैदल यात्रा तय कर अपनी मां को बद्रीविशाल के दर्शन कराए। कैलाश कहते हैं कि बड़े बुजुर्गों की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है और वह अपना धर्म निभाते हुए पिछले 14 सालों से अपनी मां को एक टोकरी में रखकर श्रवण कुमार की तरह कंधे पर उठाए हुए पैदल ही देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों की यात्रा कराने निकले हैं। उन्होंने बताया कि वह अपनी मां को करीब सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों की यात्रा करा चुके हैं। इस श्रवण कुमार को यात्रा

घी मिलेगा मुज़ियम में और सब्जी हो जायगी चटनी

बचपन ने दादी दो कंजूस भाइयों की कहानी सुनाती थी वह कहानी सार में इस प्रकार थी कि दो भाई बहुत कंजूसी से रहते थे.वे देसी घी को सदैव अलमारी में बंद कर के रखते थे जब रोटी खानी हो तो वे रोटी के ऊपर घी का डिब्बा घुमा लेते थे और मज़ा लेकर खा लेते थे.एक बार बड़ा भाई दो दिन के लिए बाहर गया और घी का डिब्बा अलमारी में बंद कर गया.जब वह लौटकर आया तो दुखी होकर छोटे भाई से कहने लगा कि मेरी वज़ह से तुझे दो दिन बिना घी के रोटी खानी पड़ी?इसपर छोटे भाई ने कहा नहीं भईया में अलमारी के ताले के आस-पास रोटी घुमा लेता था और मज़े से खा लेता था.इतना सुनते ही बड़े भाई ने उसे एक झापड़ लगाते हुए कहा कि तू दो दिन भी बिना घी के रोटी नहीं खा सकता? यह पढने ने भले ही आश्चर्य जनक लगे पर हमें भविष्य मेंइस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि घी ही क्या फल,सब्जी,सोना-चाँदी तथा अन्य रोजमर्रा कि चीजों के दम जिस तरह से आसमान छू रहे हैं उससे तो लगता है कि हमारी आने वाली पीढ़ी को देसी घी मुजियम में देखने को मिलेगा और सोने-चाँदी के जेवरात केवल तस्वीरों में नज़र आयेंगे.आज हम जिस तरह चटनी खा रहे हैं उस तरह भविष्य में सब्जी खायी जाए

...बेटी हो तो ऐसी

बेटियां अपने साहस से ऐसी मिसाल कायम करती हैं कि आम लोग कह उठते हैं कि बेटी हो तो ऐसी। कुछ ऐसा ही उदाहरण हापुड की मीनू ने पेश किया है। उसने न केवल फेरों से पहले ज्यादा दहेज की मांग कर रहे दूल्हे को ठुकरा दिया बल्कि दहेज लोलुप लोगों के खिलाफ मामला दायर कराकर एक नजीर भी पेश की। मोहल्ला इंद्रगढी निवासी चरण सिंह की पुत्री मीनू का विवाह दादरी (गौतमबुध्द नगर) के निवासी जूनियर इंजीनियर सुनील पुत्र रामपाल के साथ तय हुआ था। इंद्रगढी पहुंची और विवाह की रस्म शुरू हो गई। आरोप है कि सुनील और उसके पिता ने फेरों से पहले रात करीब दो बजे दुल्हन पक्ष से 42 हजार रूपये की मांग की और चेतावनी दी कि मांग पूरी न होने तक शादी की रस्म नहीं होगी। दहेज में एकाएक 42 हजार रूपये की मांग करने पर और कई घंटों की समझाईश के बाद भी इस शर्त से टस से मस नहीं होने पर मीनू के परिजनों ने दूल्हे, उसके पिता और भाई की जमकर धुनाई कर दी और उन्हें 4 घंटे तक बंधक बनाए रखा। वधु पक्ष के लोग इतने गुस्से में थे कि मौके पर पहुंची पुलिस को भी एक बार खदेड दिया गया। किसी तरह पुलिस बंधकों को मुक्त कराकर थाने ले गई।

जानवरों के इंजेक्शन से बच्चियां बन रहीं जवान

सब्जियों का आकार बढाने और जानवरों से ज्यादा दूध हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन अब छोटी बच्चियों को समय से पहले जवान बनाने के लिए लगाया जा रहा है। इससे देशभर के वेश्यावृत्ति के बाजार में नन्हीं लडकियों के शोषण का खतरा बत्रढ गया है। गौरतलब है कि ऑक्सीटोसिन का इस्तेमाल सामान्य तौर पर जानवरों का दूध बढाने के लिए किया जाता है। इसी तरह सब्जियों का आकार और उनका रंग निखारने के लिए भी आजकल इस इंजेक्शन का इस्तेमाल चोरी-छिपे होने लगा है लेकिन अब वेश्यावृत्ति के धंधे में धकेलने से पूर्व मासूम बच्चियों को बडा करने के लिए ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाया जाने लगा है। सूत्रों ने बताया कि छोटी बच्चियों को शुरू से ही अच्छी खुराक दी जाती है। साथ में ऑक्सीटोसिन और अन्य हार्मोन बढाने की दवाइयां भी नियमित खिलाई जाती हैं। दस वर्ष की बालिका इस प्रयोग से जवान नजर आती है। उसके शारीरिक बदलाव की रफ्तार अचानक तेजी से बढती है। इससे लडकियों की त्वचा भी अन्य लडकियों के मुकाबले आकर्षण और मुलायम हो जाती है और ग्राहकों को आकर्षित करने में सफल रहती हैं। उधर ऑक्सीटोसिन के इस तरह लडकियों पर कि

वाकई २०० साल जीने लगा आदमी तो क्या होगा?

बाबा रामदेव का कहना है की यदि लोग नियमित योग करें और खान-पण में मर्यादित व्यव्हार करें तो १५० से २०० तक जीने की कल्पना को साकार किया जा सकता है.रामदेव ने तो आजतक न्यूज़ चैनल के साथ बातचीत में ये दावा भी किया कि वे खुद कम से कम १५० साल तक जीकर दिखायेंगे . आम लोगो के लिए मौजूदा दौर में २०० साल तक जीने की कल्पना किसी स्वप्न जैसी है क्योंकि अभी तो इंसान को ये भरोसा भी नहीं है कि वो कल का सूरज भी देख पायेगा कि नहीं और यदि आप दिल्ली जैसे किसी महानगर में रहते हैं तो फिर आपकी आयु वहां के प्रदूषण,शोर और ब्लू लाइन बसों के चालकों की मर्ज़ी पर निर्भर करेगी.शयद बाबा रामदेव भी ये कारण जानते हैं तभी तो उन्होंने कार बनाने वाली कम्पनिओं की तर्ज़ पर "आदर्श स्थितिओं "वाली शर्त जोड़ दी है.अक्सर कम्पनिया भी तो अपने दावों पर यही तर्क देती हैं कि आदर्श स्थितिओं में ही दावा किया गया माइलेज मिलेगा.वैसे बाबा रामदेव ने अब तक जो भी दावे किये हैं वे बिलकुल सही निकले हैं और अब तो हमारे तथाकथित तर्कवादी और डॉक्टर भी उनके दावो को सही बताकर योग-कपालभाती-अनुलोम विलोम और भ्रामरी करने लगें हैं इसलिए यदि बाबा कह र

हर साख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिश्तां क्या होगा..

यात्रिओं को यूँ ही मरने के लिए छोड़ दिया जाता है?मेडिकल शिक्षा का स्तरसुधरने की ज़िम्मेदारी रखने वाले केतन देसाई खुद ही इस स्तर को बिगाड़ने के लिए रिश्वत लेते पकडे जाते हैं ,तकनीकी शिक्षा परिषद् में भी ऐसा ही हो चुका है, दिल्ली के मंत्री को सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ा तो उन्होंने होटल पर छापे पड़वा दिए,आई पी एल के आयोजक ही टीमों के साथ मिलकर घोटाला कर रहें हैं और हमारे केन्द्रीय मंत्री कभी चीनी तो कभी दाल के दाम बढवा रहे हैं ,कोई संचार तंत्र को बेचने पर आमादा हैं और कुछ मंत्रिओं के लिए प्रधानमंत्री कोई मायने नहीं रखते इसलिए वे कहीं भी-कभी भी कुछ भी कह बैठते हैं और ये भी नहीं सोचते की इससे देश की प्रतिष्ठा पर क्या असर हो सकता है.इन सब के लिए "में" ज्यादा मायने रखता है बजाय "हम' या अपने देश के! इसलिए कभी-कभी लगता है-क्या होगा हमारे देश का? क्या चुचाप रहते हुए देश को ऐसे लोगों के भरोसे छोड़ देना ठीक है या फिर इन्हें सुधरने के लिए हम सब को मिल-जुलकर कुछ करना चाहिए?आम आदमी आखिर किस पर भरोसा करे?भ्रष्ट नेताओं पर?काली कमाई में जुटे आला अफसरों पर? गरीब जनता के नाम पर पैसा पीट

आखिर कुत्तों की भी तो कोई इज्ज़त है?

कुत्ता समाज इन दिनों बहुत नाराज़ है खासतौर पर भाजपा के मुखिया नितिन गडकरी के खिलाफ तो वे मानहानि का मुकदमा दायर करने के मूड में हैं.कुत्ता समाज का कहना है की इन नेताओं ने हमें समझ क्या रखा है.कुत्ता समाज की युवा शाखा ने तो चेतावनी दे डाली है की यदि उनके विरुद्ध यह दुष्प्रचार बंद नहीं किया गया तो वे सीधे कारवाई करने के लिए मजबूर हो जायेंगे.युवा कुत्ते तो अब मरने-मारने(पढ़े काटने)के मूड में हैं पर समाज के बुजुर्गो ने उन्हें समझा बुझाकर रोक रखा है.समाज की आपत्ति उनकी इंसानों से तुलना को लेकर है.कुत्ता समाज का मानना है की इंसानों तक तो फिर भी ठीक था लेकिन नेताओं से तुलना करके तो अब हद हे पर कर दे गए है.नितिन गडकरी के बयान ने कुत्तों की नाराज़गी में आग में घी डालने का कम किया है.यह बताने की ज़रूरत नहीं है की गडकरी ने लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह को सोनिया गांघी के तलवे चाटने वाले नेता करार दिया है.कुत्तो की राय है की टुच्ची राजनीती में हमारा नाम नहीं घसीटा जाय ,यदि नेताओं को उपमा ही देने है तो किसी और जानवर का इस्तेमाल करें और वैसे भी उन्ही(नेताओं) के बीच में इतने उपमाए/तुलनाए मौजूद हैं की

माननीयों को चाहिए बस मकान....फिर क्यों करें काम

हमारे परमपूज्य और आदरणीय "माननीयों" को तो बस मकान चाहिए ,कैसे भी ?किसी भी नियम को तोड़कर या फिर कोई भी नया नियम बनाकर .माननीयों से मेरा आशय हमारे सांसदों और विधायकों से है.चूकिं बार बार संसद-विधायक लिकने में टाइम खर्च होगा और फिर इनका सम्मान भी काम हो सकता है इसलिए माननीय शब्द से काम चला रहा हूँ.मकान के लिए हमारे माननीय काम की भी परवाह नहीं करते फिर वह काम देश की प्रगति से ,सरकार चलने से या आम जनता की भलाई से ही क्यों न जुड़ा हो? यह बात अलग है की जब इनके अपने काम की बारी आती है तो सब मिल-जुलकर सारे गिले शिकवे भूलकर और समय की परवाह न करते हुए भी उसे पूरा करके ही दम लेते हैं मसलन अपना वेतन -भत्ते बढवाना .जहाँ तक हमारे-आपके हितों से जुड़े काम की बात है जैसे महंगाई ,भ्रष्टाचार महिला आरक्षण,नक्सली हमले,आतंकवाद जैसे विषयों पर चर्चा करनी और कानूनी उपाय करना हो तो ये आपस में फिजोल की बहस कर सारा समय ख़राब कर देते हैं.ये मेरी भड़ास नहीं बल्कि संसद के आंकड़े हैं जिनमे बताया गया है की इन माननीयों ने संसद के बजट सत्र का किस तरह बेड़ा गर्क किया.२२ फरवरी से लेकर ७ मई तक चले इस सत्र में कुल३८५

बेटी की हत्या और माँ की पूजा:ये कैसा मदर्स डे

हम भारतीय लोग दिखावे के मामले में शायद दुनिया में सबसे अव्वल हैं तभी तो बेटी को तो पैदा होते ही या जन्म लेने के पहले ही मार देते हैं और मदर्स डे इतनी धूमधाम से मानते हैं मानो हमसे बड़ा माँ का भक्त कोई और नहीं है.मेरे इस बात से शायद अधिकतर लोग इत्तेफाक रखते होंगे की दिल्ली सहित पंजाब,हरियाणा और उन तमाम राज्यों में जहाँ पुरुष-महिलाओं के बीच अंतर सबसे ज्यादा है और जहाँ सबसे ज्यादा भ्रूण हत्या का मामले सामने आ रहें हैं वाही के लोग बढ-चढ़कर मदर्स डे मना रहे हैं. हमारी साड्डी दिल्ली में तो कार्ड और गिफ्ट गैलरिओं में बीते कई दिनों से मेला सा लगा है ..हर मॉल में दुकाने सजी हैं ..होटलों में उस माँ के नाम पर नई-नई डिशे परोसी और भकोसी जा रहे हैं जिसे शायद सामान्य दिनों में पानी के लिए भी नहीं पूछते.पूरा बाज़ार ममतामय है माँ की ममता में .वही दूसरी और घर लौटते ही इनमे से कई लोग अपनी पत्नी (माँ का इक और रूप ) को कोसने,गरियाने और लतियाने में पीछे नहीं रहते . कुछ ऐसे भी हैं जो शायद मदर्स डे के दिन ही अपनी पत्नी को डॉक्टर को दिखाकर ये सुनिश्चित कर आयें हो की उसके पेट में बेटा ही है और यदि बाती है तो डॉक्

निरुपमा के बहाने चैनल चर्चा

टी वी चैनल पर मेरे साथ बैठकर निरुपमा पाठक मामले दे सम्बंधित न्यूज़(?) देख रही मेरी आठ साल की बेटी की बेटी ने पूछा-‘पापा आप और मम्मा तो ऐसा नहीं करोगे?” सवाल सुनकर मेरे तो होश उड गए.फिर लगा जब मेरे बेटी ऐसा सोच सकती है तो और भी बच्चों के मन में यह सवाल ज़रूर आया होगा?कई तो और भी चिती उम्र के बच्चे होंगे?क्या मीडिया को बालमन से इसतरह खिलवाड़ करने देना चाहिए?इसलिए इस विषय पर कुछ लिखने और आप सबसे अपने मन की बात साझा करने से अपने आपको रोक नहीं पाया... इन दिनों टी वी चैनेलों में निरुपमा को न्याय दिलाने कि होड़ मची है –हमारी नीरू,बेचारी नीरू,निरुपमा को न्याय जैसे लुभावने शीर्षकों के ज़रिए खबर बेचने का बाजार लगा है.इस होड़ में हर चैनल जज बन गया है.अभी नीरू कि मौत कि जांच ठीक से रफ़्तार भी नहीं पकड़ पाई है और हमारे “खबर जासूस” रोज नया फैसला सुना रहे हैं.कभी नीरू कि माँ तो कभी उसका प्रेमी(शायद पति?) के सर हत्या का फैसला सुनाया जा रहा है.हत्या जैसे जघन्य मामले को भी ऑनर किलिंग कहा जा रहा है.इकतरफा ख़बरों का यह आलम है कि इंडिया गेट पर मोमबत्ती जलाते चंद कम उम्र के बच्चों,इनमें भी ज़्यादातर प्रियाभान्शु क

मेरी माँ .....मम्मा

शुरुआत दो अलग अलग तेवरों वाले उदाहरणों से ... प्रथम :एक बार स्वामी विवेकानंद से किसी ने पूछा कि हमेशा माँ को इतना महत्त्व क्यों दिया जाता है तो उन्होंने उस व्यक्ति दे कहा कि ये दो किलो का पत्थर लो और इसे अपने पेट पर बांधकर शाम तक घूमों.जब तुम वापस आओगे तब मैं इसका उत्तर दूँगा.शाम को जब वह व्यक्ति वापस आया तो उसकी हालत खराब थी उसने कहाँ स्वामीजी आपकी शर्त ने तो मेरे प्राण ही निकल दिए तब विवेकानंद ने कहाँ सोचो यदि इस भार  के साथ दिन भर में तुम्हारी हालत खराब हो गई तो तुम्हारी माँ ने तो इस भार  को पूरे नौ माह तक खुशी –खुशी बर्दाश्त किया है इसलिए माँ कि महानता को सबसे ऊंचा दर्ज़ा हासिल है. द्वितीय:एक अँगरेज़ से भारतीय ने पूछा कि मेरे तीन भाई बहन हैं ,तुम्हारे कितने भाई-बहन हैं तो अँगरेज़ ने उत्तर दिया एक भी नहीं परन्तु मेरी एक माँ से चार पिता और मेरे पहले पिता से पांच माँ ज़रूर हैं . ये दोनों उदाहरण दो भिन्न भिन्न संस्कृतिओं को अभिव्यक्त करते हैं.इसलिए भले ही मदर डे कि शुरुआत पश्चिमी देशों से हुई हो लेकिन इसका महत्त्व हम भारत वासी ही जानते हैं.भारत से याद आया कि भारत कुमार के

नेताओं की टी आर पी

सामान्य पाठकों के लिए टी आर पी का मतलब टी वी रेटिंग प्वान्ट होता है और इसको नापने का पैमाना यही है की किसी भी कार्यक्रम को कितने दर्शक देख रहें हैं.कार्यक्रम जितना ज्यादा लोकप्रिय होगा उसकी टीआरपी भी उतनी ही ज्यादा होगी .सोचिये यदि हमारे नेताओं अर्थात सांसदों और मंत्रिओं की भी संसद में उनकी भागेदारी को लेकर टीआरपी भी नापी जाने लगे और इसके लिए पैमाना टेली विजन वाला ही रखा जाये तो क्या स्थिति होगी ? जो नेता दूरदर्शन और निजी समाचार चैनलों पर जितना ज्यादा दिखेगा उसकी टी आर पी भी उतनी ही ज्यादा होगी....यदि ऐसा हो गया तो अभी तक लोकसभा के बेल (कुआं नहीं ,वहां तो वे जनता को गिराते हैं) में जाकर हंगामा करने वाले सांसदों की तो लाटरी ही लग जाएगी.कुछ यही हाल बात बात पर गला फाड़कर चिल्लाने वाले नेताओं का होगा .सबसे अच्छी टीआरपी पाने की होड़ में हमारे नेता संसद का और भी वक्त बर्बाद करने लगेंगे और आम जनता के गाढे पसीने की कमाई इसी तरह लुटती रहेगी .मज़ा तो तब आयेगा जब एस टी आर पी के आधार पर "एड देने लगें तब तो हंगामे के कमाई का नया रास्ता ही खुल जायेगा .संसद की हुल्लड़ ब्रिगेड के मुखिया लालू प्रसा