वास्तेगुना हुइंया नहीं है ‘पापा की परी’
‘अरे, रहने दो... ये तो पापा की परी है!’ सोशल मीडिया पर यह वाक्य आजकल इतनी बार सुनाई देता है कि लगता है जैसे पापा की परी कोई रिश्ता नहीं, बल्कि मूर्खता का तमगा हो। अब स्थिति यह हो गई है कि सड़क पर किसी लड़की से छोटी-सी लापरवाही हुई या उसने किसी बात पर अधिकार जताया या कोई युवती ज़्यादा भावुक हो गई या फिर उसने थोड़ा सा अपरिपक्व व्यवहार कर दिया…तुरंत ही कोई टिप्पणी आ जाएगी कि ‘पापा की परी है।’
लेकिन पापा की परी कोई ‘वास्तेगुना हुइंया’ नहीं है कि कहीं भी इस्तेमाल कर दिया। पापा की परी संबोधन में पिता का अथाह लाड़-प्यार, स्नेह, गर्व और सुरक्षा का भाव छिपा है जिसे आज इंटरनेट या सोशल मीडिया की भाषा में मूर्खता एवं नासमझी का प्रतीक बना दिया गया है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर पापा की परी जैसा स्नेहिल और आत्मीय संबोधन निगेटिव कैसे बन गया?
मैंने गूगल गुरु से लेकर AI के अक्लमंद चैटबॉट से भी पूछा लेकिन वे भी सही सही उत्तर नहीं दे पाए। दरअसल वास्तेगुना हुइंया जैसे भाषा के कई नए मुहावरों की तरह पापा की परी का अर्थ भी धीरे-धीरे सोशल मीडिया की प्रयोगशाला में बदल गया। हालांकि इन दिनों वायरल वाक्य ‘वास्तेगुना हुइंया’ का तो वाकई कोई अर्थ नहीं है लेकिन पापा की परी तो भावुक भाव लिए है ।
जानकारी मिलती है कि लगभग 2018-19 के बाद इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर (अब एक्स) और विशेष रूप से छोटे वीडियो प्लेटफॉर्मों पर ऐसे मीम और वीडियो आने लगे जिनमें कुछ लड़कियों को बेहद लाड़-प्यार में पली, ज़िम्मेदारी से दूर या वास्तविक दुनिया से अनजान दिखाया जाता था। इन वीडियो के साथ पापा की परी लिखना एक चलन बन गया। धीरे धीरे यह वाक्य इंटरनेट संस्कृति का हिस्सा बन गया।
चिंताजनक बात यह है कि यह बदलाव किसी शब्दकोश ने नहीं किया, बल्कि सोशल मीडिया की मीम संस्कृति ने किया। बिल्कुल वैसे ही जैसे आजकल रील में ‘तेरी गलियों में मुहब्बत होगी..’ गाने की ऊटपटांग चेहरे बनाकर टांग खींची जा रही है। इस लिहाज से देखें तो आज सोशल मीडिया केवल शब्दों का नहीं, उनके अर्थों का भी निर्माता बन चुका है।मेरी समस्या यह नहीं कि कुछ लड़कियों के व्यवहार पर व्यंग्य क्यों किया जाता है। मेरी समस्या यह है कि व्यंग्य का निशाना एक खूबसूरत संबोधन को बना दिया गया है। क्या, अपनी बेटी को परी कहना, भरपूर लाड प्यार देना गलत है? पापा की परी को ऐसा लेबल बना दिया गया जिसे किसी भी लड़की पर चिपका दिया जाता है।
सोचिए, क्या कोई भी पिता यह चाहेगा कि उसकी बेटी के लिए उसका प्यार मज़ाक का विषय बने? हर बेटी अपने पिता के लिए सचमुच परी ही होती है। वह पहली बार जब उंगली पकड़कर चलती है, पहली बार स्कूल जाती है, पहली बार स्कूल के सालाना उत्सव में परफॉर्म करती है, पहली बार हारती है, पहली बार जीतती है, पहली बार कॉलेज जाती है, घर से बाहर निकलती है, नौकरी करती है…हर पड़ाव पर पिता के मन में उसके लिए वही परी जैसा भाव रहता है क्योंकि इस रिश्ते में न प्रदर्शन है, न दिखावा… केवल विश्वास और अपनापन है।
मुझे अभी भी याद है जब पांचवीं क्लास में मेरी परी ने ताईक्वांडो के जिला स्तरीय टूर्नामेंट के फाइनल में प्रवेश किया तो हमारा पूरा परिवार गर्व से फूल गया था लेकिन फाइनल में जब उसे मुकाबले में राज्यस्तरीय विजेता और नौंवी क्लास की तथा उससे दो गुनी लंबी लड़की के सामने उतारा गया तो मैंने बिना लड़े वॉकओवर दे दिया क्योंकि मेरी बिटिया उसके सामने नाजुक थी और मेरी परी तो थी ही.. ऐसे कई किस्से हैं जीवन में जब बेटी वाकई ‘एंजल’ बन जाती है और हर पिता के पास ऐसे दर्जनों किस्से होंगे।
हालांकि, यह भी सच है कि कुछ परिवारों में अत्यधिक लाड़-प्यार बच्चों को ज़िम्मेदार बनने से रोक देता है लेकिन यह केवल बेटियों के साथ नहीं, बेटों के साथ भी होता है। तो फिर केवल पापा की परी क्यों? ‘मम्मी का राजा बेटा’ या ‘मम्मी का मुन्ना’, ‘पापा का पप्पू’ या राजा बाबू टाइप कुछ क्यों नहीं? मुझे तो पापा की परी शब्द भी पीढ़ियों से चले आ रहे लैंगिक पूर्वाग्रह का ही विस्तार लगता है ।मैं, कई ऐसी परियों को जानता हूं जो अपने बुजुर्ग माँ बाप की सेवा में दिनरात एक किए हैं और जिन्हें राजा बाबू बना कर बड़ा किया गया वे मम्मी पापा को वृद्धाश्रम भेजने की जुगत में हैं। ऐसी बेटियां क्या किसी एंजल से कम हैं। क्या भावुक होना, सहज रहना, सरल होना मूर्खता है?
माना कि भाषा समाज का आइना होती है लेकिन जब किसी सम्मानजनक संबोधन का अर्थ का अनर्थ कर दिया जाए तो यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं होता, बल्कि हमारी सोच का भी संकेत होता है। मीम हमें कुछ सेकंड की हँसी मजाक का मौका तो दे सकते हैं, लेकिन वे धीरे-धीरे संवेदनाओं का अर्थ भी बदल देते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि हम व्यवहार की आलोचना करें, रिश्तों की नहीं। यदि कोई व्यक्ति अपरिपक्व है तो उसे अपरिपक्व कहें पर किसी बेटी के अपने पिता से मिले स्नेह को व्यंग्य का पर्याय बनाना तो उचित नहीं।
आखिर, पापा की परी होना कोई कमजोरी नहीं बल्कि सौभाग्य है जिसमें एक पिता अपनी बेटी को बिना शर्त प्यार करता है, उस पर विश्वास करता है और उसे जीवन में ऊँची उड़ान भरते देखना चाहता है इसलिए अगली बार जब आप भी ‘पापा की परी’ कहकर किसी बेटी की हंसी उड़ाएं तो एक पल रुककर सोचिए जरूर क्योंकि दुनिया चाहे इस शब्द का कोई भी अर्थ ले..हर पिता के लिए उसकी बेटी हमेशा एक परी ही रहती है..जिम्मेदार परी, आत्मनिर्भर परी, परिवार की नींव रखने वाली और सबसे लाड़ली परी।
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