न्यूज़ चैनल से नाराज़गी जायज़, पर ‘रिपोर्टर’ पर हमला क्यों?

 


जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए एक युवा आंदोलन की तस्वीरों ने एक असहज सवाल हमारे सामने खड़ा कर दिया। कुछ पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की हुई, कैमरे छीनने की कोशिश की गई और महिला पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार की घटनाएं भी सामने आईं। यह केवल किसी एक चैनल या एक आंदोलन का मामला नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग आंदोलनों, चुनावी रैलियों और संवेदनशील घटनाओं की कवरेज के दौरान भी ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं।

यह मान लेना आसान है कि भीड़ किसी चैनल की संपादकीय नीति से नाराज़ थी। लेकिन मुश्किल सवाल यह है कि यदि नाराज़गी किसी चैनल से है तो उसका शिकार मैदान में खबर जुटाने वाला रिपोर्टर क्यों बने? वह कैमरापर्सन क्यों बने, जो घंटों धूप, बारिश और भीड़ के बीच केवल घटनाओं को रिकॉर्ड कर रहा है? और सबसे अधिक चिंता की बात यह कि महिला पत्रकारों को भी अभद्र टिप्पणियों और दुर्व्यवहार का सामना क्यों करना पड़े?

मेरी नज़र में इस पूरे घटनाक्रम का एक डरावना और दूरगामी पक्ष भी है जो इन्हीं युवाओं से जुड़ा है, जिस पर शायद सबसे कम चर्चा हो रही है। देश के सैकड़ों विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थानों में हर साल हजारों युवा पत्रकारिता की पढ़ाई करते हैं। वे कैमरे के सामने खड़े होने का नहीं, बल्कि समाज के बीच जाकर सच तलाशने का सपना लेकर निकलते हैं। कोई अपने गांव से बड़े शहर आता है, कोई परिवार की जमा-पूंजी खर्च कर मीडिया की डिग्री लेता है, तो कोई यह विश्वास लेकर कि एक दिन किसी प्रतिष्ठित समाचार संस्थान का हिस्सा बनेगा।

जब ऐसे युवाओं को किसी राष्ट्रीय चैनल या अखबार में नौकरी मिलती है, तो उनके लिए वह केवल रोजगार नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष का परिणाम होता है। लेकिन यदि किसी चैनल की संपादकीय नीति से असहमति का गुस्सा उसी नए-नए रिपोर्टर पर उतारा जाएगा, तो सवाल उठता है—उस युवा पत्रकार का कसूर क्या है?क्या उसने चैनल की बहस तय की? क्या उसने प्राइम टाइम की भाषा लिखी? क्या उसने संपादकीय नीति बनाई? अधिकांश मामलों में उत्तर होगा—नहीं। वह तो केवल अपने पेशे का पहला कदम रख रहा है। उसके हाथ में माइक है, लेकिन फैसले उसके हाथ में नहीं हैं।

सोचिए, यदि किसी अस्पताल की प्रशासनिक नीति से असहमति हो तो क्या डॉक्टर या नर्स से मारपीट उचित हो जाएगी? यदि किसी बैंक की सेवा पसंद न आए तो क्या कैशियर पर हमला जायज़ हो जाएगा? बिल्कुल नहीं। फिर किसी चैनल से नाराज़गी का निशाना उस रिपोर्टर को क्यों बनाया जाए, जो कई बार मामूली वेतन पर, धूप-बारिश और जोखिम के बीच सिर्फ घटनाओं को दर्ज कर रहा होता है?


सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि देश के युवा यह महसूस करने लगें कि पत्रकारिता का अर्थ है—हर विरोध प्रदर्शन में अपमान, गाली, धक्का-मुक्की और जान का जोखिम—तो कल कौन इस पेशे में आएगा? क्या हम ऐसी पीढ़ी तैयार करना चाहते हैं जो सच दिखाने से पहले अपनी सुरक्षा की चिंता करे?

मीडिया विशेषज्ञ लंबे समय से एक महत्वपूर्ण बात कहते रहे हैं कि दर्शकों का बड़ा वर्ग "मीडिया" को एक ही इकाई मान लेता है। टीवी स्क्रीन पर जो चेहरा सबसे अधिक दिखाई देता है, वही पूरे संस्थान का प्रतीक बन जाता है। एंकर, रिपोर्टर, संपादक, कैमरापर्सन और प्रोड्यूसर—इन सभी की भूमिकाओं का अंतर आम दर्शक तक स्पष्ट रूप से नहीं पहुंच पाता। परिणाम यह होता है कि स्टूडियो में बैठकर बहस संचालित करने वाले एंकर से नाराज़गी का गुस्सा घटनास्थल पर मौजूद रिपोर्टर पर उतर आता है।

कई वरिष्ठ संपादकों और मीडिया विश्लेषकों ने समय-समय पर यह कहा है कि फील्ड रिपोर्टर अक्सर संपादकीय नीतियां तय नहीं करते। उनका काम घटनास्थल से तथ्य जुटाना, लोगों से बात करना और दृश्य रिकॉर्ड करना होता है। कौन-सी खबर किस रूप में दिखाई जाएगी, किस शीर्षक के साथ चलेगी या किस एंगल से प्रस्तुत होगी, यह निर्णय प्रायः संपादकीय स्तर पर लिया जाता है। इसलिए किसी रिपोर्टर को चैनल की पूरी नीति का प्रतिनिधि मान लेना वास्तविकता से दूर है।

दुर्भाग्य से सोशल मीडिया ने इस भ्रम को और गहरा किया है। छोटे-छोटे वीडियो क्लिप, अधूरी जानकारी और उत्तेजक टिप्पणियां लोगों की राय को तेजी से प्रभावित करती हैं। कई बार किसी चैनल की बहस देखकर लोगों में गुस्सा पैदा होता है और वही गुस्सा अगली बार सड़क पर दिखाई देने वाले पहले माइक पर निकल पड़ता है। भीड़ यह भूल जाती है कि सामने खड़ा व्यक्ति भी एक पेशेवर है, जो अपना दायित्व निभा रहा है।

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए भी चिंताजनक है। पत्रकार पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं होता, बल्कि समाज के सूचना के अधिकार पर भी चोट होती है। यदि रिपोर्टर घटनास्थल पर जाने से डरने लगेंगे तो सबसे पहले नुकसान जनता का होगा, क्योंकि घटनाओं की प्रत्यक्ष और स्वतंत्र जानकारी कम होती जाएगी।


महिला पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार का कोई भी औचित्य नहीं हो सकता। किसी विचारधारा, आंदोलन या राजनीतिक मतभेद के नाम पर महिलाओं के सम्मान से समझौता लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। असहमति का अधिकार और गरिमा का सम्मान—दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।

इस समस्या का समाधान केवल कानून से नहीं होगा। सबसे पहले मीडिया साक्षरता (Media Literacy) को बढ़ावा देना होगा। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में यह समझ विकसित की जानी चाहिए कि समाचार कैसे तैयार होता है, एंकर और रिपोर्टर की भूमिकाएं क्या होती हैं और संपादकीय निर्णय किस स्तर पर लिए जाते हैं। जब लोग मीडिया की कार्यप्रणाली समझेंगे तो उनका आक्रोश सही दिशा में व्यक्त होगा।

यदि किसी चैनल की प्रस्तुति या नीति से असहमति है तो उसके शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके मौजूद हैं—चैनल का बहिष्कार, शिकायत दर्ज कराना, नियामक संस्थाओं से संपर्क करना, तथ्यात्मक आलोचना करना, सोशल मीडिया पर संयमित विरोध दर्ज कराना या वैकल्पिक मीडिया को समर्थन देना। लेकिन हिंसा, धमकी, कैमरे तोड़ना या पत्रकारों से मारपीट कभी भी लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा नहीं हो सकते।

दूसरी ओर मीडिया संस्थानों को भी आत्ममंथन करना होगा। निष्पक्षता, तथ्यपरकता और सनसनी से दूरी ही जनता का विश्वास वापस ला सकती है। जब दर्शकों का भरोसा बढ़ेगा तो टकराव की संभावना भी कम होगी। युवा किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं। यदि वही संवाद की जगह हिंसा का रास्ता चुनेंगे तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होगा। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन असहमति का तरीका भी लोकतांत्रिक होना चाहिए।

आलोचना कीजिए, सवाल पूछिए, चैनल बदलिए, बहिष्कार कीजिए—यह आपका अधिकार है। लेकिन मैदान में सच जुटाने निकले पत्रकार को दुश्मन मत बनाइए। आखिरकार, कैमरे के पीछे खड़ा वह व्यक्ति भी आपका साथी है और वह आपकी आवाज़ दुनिया तक पहुंचाने के लिए हर दिन जोखिम उठाता है।

लोकतंत्र केवल अच्छे नेताओं, अच्छे न्यायालयों और अच्छे कानूनों से नहीं चलता; उसे अच्छे पत्रकार भी चाहिए। लेकिन अच्छे पत्रकार तभी मिलेंगे, जब समाज उन्हें सम्मान और सुरक्षा दोनों देगा। इसलिए यदि किसी चैनल से शिकायत है तो विरोध भी उसी स्तर पर होना चाहिए—चैनल को देखना बंद कीजिए, उसके विज्ञापनदाताओं पर लोकतांत्रिक दबाव बनाइए, प्रेस परिषद, नियामक संस्थाओं या अदालत का दरवाजा खटखटाइए, तथ्य आधारित आलोचना कीजिए। लेकिन मैदान में रिपोर्टिंग कर रहे युवा पत्रकार को यह महसूस मत कराइए कि उसने गलत पेशा चुन लिया है क्योंकि जिस दिन योग्य और ईमानदार युवा पत्रकारिता से मुंह मोड़ने लगेंगे, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान किसी चैनल का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का होगा।



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