मां ने पापा से कहा कि 50 पचास पैसे देना ‘एक बच्चा खरीदना है।’ पापा ने भी बिना किसी ना-नुकर के पैसे दे दिए लेकिन हम सब घर के बच्चे अचंभित थे कि घर में इतने बच्चे होने के बाद भी जीजी ( हम मां को जीजी कहते हैं) बच्चा खरीद रहीं हैं!..और फिर बच्चा कोई सब्जी या बाज़ार का सामान है जो उसे खरीदना पड़ रहा है? साथ ही पापा भी कुछ नहीं कह रहे?
बात कई दशक पुरानी है लेकिन ज़ेहन में पूरी मजबूती से दर्ज है। आज जब रिश्ते अक्सर मोबाइल की स्क्रीन पर बनते और टूट जाते हैं, तब बचपन की यह घटनाएं बार-बार रिश्तों के महत्व का अहसास दिलाती हैं । यह उस दौर की बात है, जब इंसान के पास पैसे कम थे, लेकिन अपनापन बहुत था।
तो, हमारी जीजी (मां) अक्सर महज एक रुपया या पचास पैसे देकर किसी न किसी नवजात बच्चे को ‘खरीद’ लिया करती थीं। सुनने में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन इसके पीछे न कोई लालच था, न कोई सौदा और न ही बच्चों की ख़रीद फ़रोख़्त जैसा कोई मामला। यह लोकजीवन में पीढ़ियों से चली आ रही एक मान्यता थी। दरअसल, जिन परिवारों के बच्चे जन्म के बाद जीवित नहीं रह पाते थे, वे विश्वास करते थे कि यदि बच्चे को प्रतीकात्मक रूप से किसी और को बेच दिया जाए, तो उसका दुर्भाग्य पीछे छूट जाता है और वह बच्चा लंबी उम्र पाता है।
जीजी जिन परिवारों के बच्चे खरीदती थीं उनमें पड़ोसी भी थे तो सब्जी और फल बेचने वाले भी। जीजी पचास पैसे या एक रुपया उनकी हथेली पर रख देतीं और नवजात बच्चे को गोद में ले लेती। फिर वह बच्चा वास्तविक मां को लौटा दिया जाता। न बच्चा कहीं जाता, न परिवार बदलता। बदलती थी तो बस जीने की उम्मीद। यह एक छोटा-सा टोटका था, लेकिन उसमें ढेर सारी दुआएं, विश्वास और मानवीय संवेदनाएं छिपी होती थीं।
अब यह कहना तो मुश्किल है कि यह आस्था का चमत्कार था या संयोग, लेकिन जिन बच्चों को जीजी ने इस तरह ‘खरीदा’, उनमें से अधिकांश बच गए। शायद विज्ञान इसकी कोई अलग व्याख्या करे, लेकिन गांव-मोहल्ले के लोग इसे आज भी मां के शुभ हाथों और ईश्वर की कृपा से जोड़कर देखते हैं।
इस किस्से की सबसे सुंदर बात यह है कि वह एक रुपया या पचास पैसे का रिश्ता कभी समाप्त नहीं हुआ। आज भी वे परिवार मिलते हैं, तो मां को उसी सम्मान और आत्मीयता से याद करते हैं। राखी बंधवाने/बांधने आते हैं, त्योहारों पर हालचाल पूछते हैं, शादी विवाह में मां को सबसे अहम दर्जा देते हैं, किसी सुख-दुख में सबसे पहले दरवाजा खटखटाते हैं। उनके लिए हमारी मां केवल पड़ोसन नहीं थीं, बल्कि उस बच्चे की ‘दूसरी मां’ थीं, जिसने उसे नया भाग्य दिया था।
आज के समय में जब हर चीज़ का मूल्य बाजार तय करता है, तब यह किस्से याद दिलाते हैं कि कुछ रिश्तों की कीमत कभी पैसों से नहीं लगती। यहां पचास पैसे में बच्चा नहीं खरीदा गया था, बल्कि विश्वास खरीदा गया था; अपनापन खरीदा गया था और सबसे बढ़कर इंसानियत को जीवित रखने की कोशिश थी।
हमारे समाज में उस समय ऐसे न जाने कितने छोटे-छोटे लोकाचार थे, जो किसी धर्मग्रंथ में नहीं लिखे गए, लेकिन लोगों के दिलों में बसे रहे। तब किसी के घर बच्चा जन्म लेता था तो पूरा मोहल्ला उसकी सलामती की दुआ करता था। कोई काला टीका लगा देता था, कोई पुराने कपड़े पहनाने की सलाह देता था, कोई मंदिर में प्रसाद चढ़ाता था और कोई एक रुपये के प्रतीकात्मक लेन-देन से मृत्यु के भय को मात देने का विश्वास जगा जाता था। आज भी कई घरों में दादी/नानी के बहुमूल्य बक्सों में बच्चों के पुराने कपड़े नए कपड़ों की तरह सुरक्षित मिल जाएंगे जो पीढ़ी दर पीढ़ी नए बच्चों को पहनाये जाते रहे हैं।
शायद इन मान्यताओं की वैज्ञानिक पुष्टि कभी न हो सके, लेकिन इनके भीतर छिपी मानवीय संवेदना पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। वे कर्मकांड कम और एक-दूसरे के जीवन में उम्मीद बोने के छोटे-छोटे प्रयास अधिक थे। इन सबके केंद्र में एक ही भावना थी कि किसी के घर का चिराग बुझने न पाए। वैसे भी, तब बच्चे कई आंगनों में, कई दादी/मौसी/चाची की देखरेख में पलते थे।
आज हम तकनीक से समृद्ध हैं, लेकिन रिश्तों में कहीं न कहीं दरारें भी बढ़ी हैं। अब तो हमें पड़ोसी का नाम तक नहीं पता होता। हमारे बाद की तमाम पीढ़ियां रिश्तों के लिहाज़ से गरीब होती जा रही हैं। ताऊ,ताई, चाचा, मामा, मौसी, मामी,चाची बुआ जैसे महत्वपूर्ण रिश्ते अंकल आंटी में सिमटकर रह गए हैं।
आज जब जीवन के पन्ने पलटकर देखता हूं, तो महसूस होता है कि मां ने कभी बच्चे नहीं खरीदे थे। उन्होंने तो केवल लोगों की उम्मीदों को अपने आंचल में जगह दी थी और ऐसे ही छोटे-छोटे सद्भाव, विश्वास और आत्मीयता के धागों से उस समय का समाज बुना गया था। इसलिए वे रिश्ते आज भी उतने ही खरे एवं मजबूत हैं, जितने उस दिन थे। आखिर हों भी क्यों न, एक मां ने दूसरी मां की आंखों में जीने की नई उम्मीद जो जगा दी थी।
शायद, जेन ज़ी और उसके बाद की पीढ़ियां इस पर विश्वास न करें। उन्हें यह कहानी जैसी लगे लेकिन जिन्होंने उस दौर को जिया है, वे जानते हैं कि उस समय लोगों की सबसे बड़ी पूंजी पैसा नहीं, एक-दूसरे के लिए धड़कता हुआ दिल था।
यदि हम चाहें और आगे बढ़कर प्रयास करें तो उस दौर की आत्मीयता, पड़ोस का अपनापन और किसी अनजान बच्चे के लिए भी मन से निकली दुआ आज भी हमारी सबसे बड़ी सामाजिक संपत्ति हो सकती है क्योंकि समाज कानूनों से नहीं, ऐसे ही अनमोल रिश्तों से जीवित रहता है।




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