बंगाल की ‘लुची’ हिमाचल के मंडी में आकर कैसे बन गई आवारा ?
बंगाल की लज़ीज़ ‘लुची-चना’ वाली लुची हिमाचल प्रदेश के मंडी में आकर आवारा कैसे हो गई? या दूसरे शब्दों में कहें तो संस्कारी बंगाल की सफेद झक गोल मटोल गर्व से फूली लुची ने मंडी आकर कैसे चरित्र बदल लिया। इसके पीछे बहुत दिलचस्प कहानी है लेकिन लुची के चरित्र चित्रण से इससे पहले यह जान लेते हैं कि बंगाल के स्वाद की पहचान लुची क़रीब 2000 किलोमीटर का सफ़र तय कर हिमालय की बर्फ़ से ढकी चोटियों को पार करते हुए मंडी तक कैसे आ गई। कहां समंदर से सटा बंगाल और कहां ऊंचे ऊंचे पर्वतों से भरा पूरा हिमाचल। अरे हाँ, लुची से अनजान, खासकर बंगाल एवं हिमाचल से बाहर के लोगों की जानकारी के लिए लुची को बाकी राज्यों में पूरी/पूड़ी/पुड़ी/बुंदेलखंड में लुचई के नाम से भी जानते हैं..वही, हलवा के साथ वाली पूड़ी।
मंडी में लुची की कहानी की शुरुआत ब्रिटिश काल से होती है। बताया जाता है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब अंग्रेजों ने जोगिंदरनगर तक रेल लाइन बिछाई और मंडी व्यापारिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बना, तब बंगाल से बड़ी संख्या में इंजीनियर, कर्मचारी और व्यापारी यहां पहुंचे। उनके साथ बंगाल का लोकप्रिय व्यंजन लुची और चने की सब्जी भी आया। समय के साथ स्थानीय हलवाइयों ने इसे अपने स्वाद के अनुरूप ढाल लिया। धीरे-धीरे यह व्यंजन इतना लोकप्रिय हुआ कि आज मंडी में सांस्कृतिक समन्वय का स्वाद बन गया है।
हालांकि, कुछ लोग इसे और भी पहले सेन वंश के राजाओं के बंगाल से हिमाचल पहुंचने और फिर मंडी रियासत की स्थापना से जोड़कर देखते हैं। उनका मानना है कि राज परिवार के साथ आए दल बल में शामिल रसोइयों ने लुची चना को यहां तक पहुंचाया। सेन वंश के शासक अजबर सेन ने मंडी के आराध्य भोलेनाथ के सुप्रसिद्ध भूतनाथ मंदिर की स्थापना की थी। वैसे, राज परिवार की बजाए ब्रिटिश काल में बंगाल से आए लोगों के साथ लुची के यहां तक पहुंचने की कहानी ज्यादा तथ्यपरक लगती है।
खैर, लुची बंगाल से न केवल मंडी आ गई बल्कि समय के साथ यह मंडयाली व्यंजनों के साथ यहां की बोली में भी रच-बस गई । यहीं से शुरू हुई लुची के आवारा होने मतलब नाम बदलकर ‘लुच्ची’ बनने की कहानी। हम सभी जानते हैं कि हिंदी में लुच्ची शब्द लुच्चा के स्त्रीलिंग के रूप में इस्तेमाल होता है और इसका अर्थ चरित्रहीन व्यक्ति, आवारा, दुष्ट या शरारती व्यक्ति होता है इसलिए मैंने स्वादिष्ट नरम मुलायम लुच्ची को आवारा लिखा है। हालांकि, यह तो हुई हंसी मजाक की बात।
असलियत यह है कि पहाड़ी बोलियों में व्यंजन को कई बार ज़ोर देकर एवं दो बार बोला जाता है। इसी कारण ‘लुची’ का उच्चारण धीरे-धीरे ‘लुच्ची’ हो गया। यह कोई आधिकारिक नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि बोलचाल की स्वाभाविक भाषाई प्रक्रिया से आया बदलाव है । इसलिए, मंडी में भी लुच्ची का अर्थ मैदे से बनी पूड़ी ही है जैसे बंगाल में । बस, लुच्ची बंगाल की लुची का स्थानीय उच्चारण है और इसका कोई नकारात्मक अर्थ नहीं है।
लुची ने हिमाचल आकर नाम ही नहीं बदला बल्कि आकार प्रकार में भी स्थानीय रूप रख लिया। मसलन बंगाल की लुची छोटी और फूली होती है तो मंडी की लुच्ची सामान्य तौर पर रुमाली रोटी की तरह की पुड़ी जैसी हो गई है। इसका कारण मौसमीय परिस्थितियां भी हैं। हिमाचल में ठंड ज्यादा होने के कारण इन्हें बार बार गरम करने की जरूरत पड़ती है और बदला रूप तवे पर आराम से गरम किया जा सकता है जबकि फूली हुई लुची को दोबारा तेल/घी में तलना पड़ेगा।
आज मंडी में लुच्ची-चना केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। बंगाल की लुची चना स्थानीय स्वाद, मसाले, आकार प्रकार और मंडयाली उच्चारण के साथ इतना घुल-मिल गया है कि उसका नया नाम ही उसकी पहचान बन गया है और रही स्वाद की बात तो वह लुची, लुच्ची और पुड़ी किसी में कम नहीं है। इसलिए, बेफ़िक्र होकर खाइए..बंगाल की लुची हो या मंडी की लुच्ची..स्वाद वैसा ही आयेगा।



लज़ीज लेख
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
हटाएंसचमुच लज़ीज़ और ज़ायकेदार लेख।
जवाब देंहटाएंमज़ा आ गया
आभार
हटाएंबहुत ही अच्छी. जानकारी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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