धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है:
"जन-गण-मन..."
यह ऐसा अद्भुत अवसर है जब न तो खिलाड़ी कुछ बोल पाता है और न ही दर्शक। शब्द जैसे कहीं खो जाते हैं। केवल आँखें बोलती हैं कभी चमककर तो कभी बरसकर। खिलाड़ी की पलकों पर वर्षों का संघर्ष ठहर जाता है और दर्शकों की आँखों में गर्व उतर आता है। राष्ट्रगान के हर स्वर के साथ तिरंगा थोड़ा-थोड़ा ऊपर जाता है और लगता है मानो पूरे देश का सिर ऊँचा हो रहा हो।
यही वह क्षण है जिसके लिए कोई खिलाड़ी ताउम्र सुबह अँधेरे में उठकर अभ्यास करता है। यही वह क्षण है जिसके लिए वह अपने जन्मदिन, त्योहार, परिवार की खुशियाँ, दोस्तों की महफ़िलें और जीवन की अनगिनत सहज इच्छाएँ छोड़ देता है। स्वर्ण पदक धातु का एक छोटा-सा टुकड़ा भर नहीं होता, उसके पीछे पसीने की अनगिनत बूंदें, चोटों के अनगिनत निशान, परिवारों का अनथक संघर्ष और हार के बाद भी फिर से उठ खड़े होने का साहस छिपा होता है।
स्टेडियम में हजारों लोग बैठे हैं। कैमरे दुनिया के करोड़ों घरों तक उस दृश्य को पहुँचा रहे हैं। पोडियम पर कभी तीन तो कभी चार खिलाड़ी खड़े हैं। तीसरे स्थान वाला कांस्य पदक लेकर मुस्कुरा रहा है। दूसरे स्थान वाला रजत पदक को गौर से देख रहा है। लेकिन सबसे ऊपर खड़ा खिलाड़ी स्थिर है। उसकी आँखें सामने लगी हैं। तभी उद्घोषणा होती है— "Gold Medal… India!"
राष्ट्रमंडल या किसी भी अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत का हर खिलाड़ी केवल अपने नाम के लिए नहीं खेलता। उसकी जर्सी पर लिखा इंडिया उसे हर क्षण याद दिलाता है कि अब उसकी जीत या हार निजी नहीं रही। उसके कंधों पर 140 करोड़ भारतीयों की उम्मीदें हैं।
मुक्केबाजी में स्वर्णिम सफलता पाने वाले सचिन सिवाच ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराना सबसे बड़ा गर्व का क्षण है । जबकि पैरा-एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक विजेता दिलप गवित उनके और देश के लिए एक अविश्वसनीय पल है तो भाला फेंक के स्टार खिलाड़ी नीरज चोपड़ा पोडियम पर खड़े होकर अपने देश का राष्ट्रगान सुनना हमेशा से एक अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव होता है।
जब कोई भारतीय खिलाड़ी मैदान में उतरता है तो उसके साथ उसके गाँव की मिट्टी भी उतरती है, उसकी माँ की दुआ भी, पिता का संघर्ष भी और उस कोच का विश्वास भी जिसने शायद वर्षों तक बिना किसी अपेक्षा के उसे तराशा है। तभी तो मुक्केबाजी में जौहर दिखाने वाली प्रीति पवार और साक्षी चौधरी ने अपनी सफलता का श्रेय देशवासियों के अपार समर्थन को दिया।
हालांकि, दुनिया केवल अंतिम परिणाम देखती है। लेकिन खिलाड़ी उस परिणाम के पीछे की पूरी यात्रा जी चुका होता है। किसी ने रेलवे स्टेशन पर रातें बिताई हैं, किसी ने उधार के जूते पहनकर अभ्यास किया है, किसी ने आर्थिक तंगी के बावजूद सपनों को टूटने नहीं दिया। किसी ने गंभीर चोट के बाद डॉक्टरों की सलाह के विपरीत नहीं, बल्कि चिकित्सा और अनुशासन के सहारे स्वयं को फिर से तैयार किया। किसी ने अपने परिवार से महीनों दूरी बनाई ताकि लक्ष्य पर पूरा ध्यान दे सके।
जब ऐसा खिलाड़ी पोडियम पर खड़ा होता है तो उसकी आँखों से गिरने वाला हर आँसू एक कहानी कहता है।कई लोग सोचते हैं कि स्वर्ण जीतने के बाद खिलाड़ी आखिर रोता क्यों है?वह इसलिए नहीं रोता कि उसने पदक जीत लिया। वह इसलिए रोता है क्योंकि उसे याद आ जाता है कि इस एक पल तक पहुँचने के लिए उसने क्या-क्या खोया है। उसे वह माँ याद आती है जिसने अपनी ज़रूरतें टालकर उसके लिए बेहतर आहार जुटाया। वह पिता याद आते हैं जिन्होंने शायद अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा खेल पर खर्च किया। उसे वह कोच याद आता है जिसने हार के बाद भी कहा था कि "एक दिन तुम देश के लिए पदक जीतोगे।" राष्ट्रगान बजते ही ये सारी यादें एक साथ उमड़ पड़ती हैं और तभी आँसू अपने आप निकल आते हैं।
2026 के राष्ट्रमंडल खेलों ने भारतीय खेल इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय लिख दिया । भारत ने पिछले कई संस्करणों में कुश्ती, मुक्केबाज़ी, बैडमिंटन, भारोत्तोलन, निशानेबाज़ी, टेबल टेनिस, हॉकी, स्क्वैश, एथलेटिक्स और पैरा खेलों सहित अनेक क्षेत्रों में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। इस बार इनमें से कई खेल राष्ट्रमंडल खेलों का हिस्सा नहीं थे लेकिन भारतीय खिलाड़ियों ने अन्य खेलों में जोरदार प्रदर्शन से इनकी कमी पूरी कर दी। हालांकि, पदकों की संख्या से भी अधिक महत्वपूर्ण भारतीय खिलाड़ियों का जज़्बा जिसके साथ उन्होंने हर मुकाबले में पूरा दमखम दिखाया।
हमेशा की तरह इस बार भी करोड़ों भारतीयों की निगाहें उन खिलाड़ियों पर थीं जो वर्षों की तैयारी के बाद मैदान में उतरे लेकिन इतिहास केवल स्वर्ण पदकों से नहीं बनता, इतिहास उन खिलाड़ियों से भी बनता है जो हार के बाद भी अंत तक लड़ते हैं। कभी-कभी चौथे स्थान पर रहने वाला खिलाड़ी भी उतनी ही प्रेरणा देता है जितना स्वर्ण जीतने वाला। तभी तो भारोत्तोलन में स्वर्ण पदक जीतने वाली मीराबाई चानू ने कहा कि यह पल उनके लिए बेहद खास है और वे इस लय को आगे भी जारी रखना चाहेंगी।
राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान भारत में एक अलग ही माहौल बन जाता है। सुबह जल्दी उठकर लोग मोबाइल पर स्कोर देखने लगते हैं। कार्यालयों में काम के बीच लाइव अपडेट चलते रहते हैं। स्कूलों में बच्चे एक दूसरे से पूछते हैं कि आज कितने मेडल आए?" घरों में लोग टीवी के सामने बैठे रहते हैं। माँ मंदिर में दीपक जलाकर खिलाड़ी की जीत की प्रार्थना करती है। पिता बार-बार चैनल बदलकर प्रतियोगिता का समय देखते हैं। बच्चे सोशल मीडिया पर हर जीत का जश्न मनाते हैं।
और जब राष्ट्रगान बजता है तो पूरा घर स्वतः शांत हो जाता है। उस समय किसी की जाति नहीं होती, किसी का धर्म नहीं होता, कोई राजनीतिक मतभेद नहीं होता। केवल एक पहचान होती है:भारतीय।
हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा हवा में लहरता हुआ केवल तीन रंगों का एक झंडा नहीं है। यह उन सैनिकों के बलिदान की स्मृति है जिन्होंने सीमाओं पर प्राण दिए। यह उन वैज्ञानिकों की मेहनत का सम्मान है जिन्होंने भारत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। यह उन किसानों के श्रम का प्रतीक है जिनकी मेहनत देश को भोजन देती है। यह उन शिक्षकों की तपस्या का परिणाम है जिन्होंने बच्चों को सपने देखना सिखाया…और जब कोई खिलाड़ी इस तिरंगे को सबसे ऊपर पहुँचाता है, तब वह केवल खेल नहीं जीतता, वह करोड़ों भारतीयों के आत्मविश्वास को भी ऊँचा उठा देता है।
यह भी सच है कि हर पदक के पीछे केवल खिलाड़ी नहीं होता। उसके पीछे फिजियोथेरेपिस्ट, डॉक्टर, न्यूट्रिशनिस्ट, मनोवैज्ञानिक, प्रशिक्षक, ग्राउंड स्टाफ, उपकरण तैयार करने वाले कर्मचारी, खेल संघों के अनेक लोग और सबसे बढ़कर परिवार का त्याग होता है। हम अक्सर कैमरे में केवल पदक देखते हैं, लेकिन उस पदक पर सैकड़ों लोगों की मेहनत की चमक होती है।
इसी तरह यह भी कड़वी सच्चाई है कि हर खिलाड़ी पदक नहीं जीत पाया। कुछ खिलाड़ी पहले दौर में बाहर हो गए। कुछ फाइनल तक पहुँचकर भी हार गए लेकिन खेल हमें यही सिखाता है कि हार अंतिम सत्य नहीं होती। भारतीय खिलाड़ी बार-बार यह साबित कर चुके हैं कि असफलता उन्हें तोड़ती नहीं, बल्कि और मजबूत बनाती है। आज जो खिलाड़ी हारकर लौटा है, वही अगले संस्करण में जीत का नया इतिहास लिख सकता है।
चाहे राष्ट्रमंडल खेल हों या कोई और मुकाबला..इएन स्वर्ण पदक सबसे बड़ा पुरस्कार नहीं है। सबसे बड़ा पुरस्कार वह सम्मान है जो किसी खिलाड़ी को तब मिलता है जब कोई छोटा बच्चा उसे देखकर कहता है कि मैं भी बड़ा होकर भारत के लिए खेलूँगा। यही प्रेरणा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है। इसी प्रेरणा से नए चैंपियन जन्म लेते हैं।
आज भारत में खेलों को लेकर सोच बदल रही है। छोटे शहरों और गाँवों से निकलकर खिलाड़ी विश्व मंच पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। बेटियाँ भी हर क्षेत्र में नए कीर्तिमान बना रही हैं। खेल अब केवल शौक नहीं, राष्ट्रीय आत्मविश्वास का माध्यम बनते जा रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेल 2026 में मिली सफलता इस परिवर्तन की एक और सशक्त तस्वीर हैं ।






खेल और खिलाड़ी के साथ उनके संघर्ष का मार्मिक वर्णन है
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