पहाड़, चोटी वाला और परांठे का बाप..!!
शिमला से रामपुर की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग-5 पर सफर करने वालों के लिए पहाड़ सिर्फ मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता नहीं होते, बल्कि वे अपने भीतर अनगिनत छोटे-छोटे अनुभव समेटे रहते हैं। कहीं देवदार की खुशबू, कहीं सतलुज की गूंज, कहीं बादलों की धुंध और कहीं सड़क किनारे चूल्हे पर सिकते परांठों की महक। इन्हीं अनुभवों में एक नाम ऐसा है, जो यात्रियों की यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है—बधाल का 'चोटी वाला ढाबा'।
नाम सुनते ही ऋषिकेश के प्रसिद्ध चोटीवाला रेस्तरां की याद आ सकती है, लेकिन बधाल का यह ढाबा अपनी अलग पहचान रखता है। न यहां कोई भव्य इमारत है, न चमचमाती सजावट और न ही आधुनिक कैफे जैसा माहौल। लकड़ी के खंभों, टिन की छत और पहाड़ी सादगी से बना यह ढाबा इस बात का प्रमाण है कि स्वाद का वास्ता आलीशान इमारतों से नहीं, बल्कि ईमानदारी से पकाए गए भोजन और आत्मीयता से होता है।
पहाड़ों की घुमावदार सड़कें एक अलग तरह की भूख पैदा करती हैं। लगातार चढ़ाई, ठंडी हवा और लंबे सफर के बाद जैसे ही बधाल के पास पहुंचते हैं, चूल्हे पर सिकते परांठों की सोंधी खुशबू हवा के साथ गाड़ियों तक आ जाती है। कई बार तो लगता है कि भूख नहीं, बल्कि यही खुशबू गाड़ियों को ब्रेक लगाने पर मजबूर कर देती है।इस ढाबे की सबसे बड़ी पहचान है इसका विशाल आकार का परांठा। एक परांठा ही कई लोगों की भूख मिटाने के लिए काफी होता है। आलू, गोभी, पनीर या मिक्स सब्जियों की भराई वाले ये परांठे तवे से उतरते ही शुद्ध देसी घी या मक्खन के साथ परोसे जाते हैं। साथ में घर की पिसी हुई तीखी हरी चटनी ऐसी होती है कि हर कौर के बाद अगला निवाला खुद-ब-खुद मुंह तक पहुंच जाता है।
लेकिन यहां की सबसे अनोखी परंपरा है—जग भरकर मिलने वाली अनलिमिटेड छाछ। गुजरात की मेहमाननवाजी की याद दिलाने वाली यह छाछ सिर्फ भोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि सफर की थकान मिटाने वाली ठंडी राहत है। बड़े जग में भरकर बार-बार परोसी जाने वाली छाछ इस ढाबे की उदारता का परिचय देती है। पहाड़ की चढ़ाई के बाद इसका हर घूंट शरीर और मन दोनों को तरोताजा कर देता है।
अगर आप पारंपरिक भोजन पसंद करते हैं, तो यहां की थाली किसी दावत से कम नहीं। मक्के की गरमागरम रोटी, सरसों का साग, पहाड़ी कढ़ी, राजमा और मौसमी सब्जियां... और सबसे खास बात यह कि यहां कोई यह नहीं पूछता कि "और चाहिए?" बल्कि तब तक परोसते रहते हैं, जब तक आप खुद हाथ जोड़कर यह न कह दें कि अब बस।
ढाबे की एक और खासियत है इसकी खुली रसोई। ग्राहक चाहें तो खुद किचन तक जाकर देख सकते हैं कि उनका परांठा कैसे तैयार हो रहा है। आटे की लोई से लेकर तवे पर सुनहरा होने तक की पूरी प्रक्रिया भोजन के प्रति भरोसा और अपनापन दोनों बढ़ा देती है।
और फिर आते हैं इस ढाबे के असली आकर्षण—इसके मालिक। सिर पर लंबी चोटी उनकी पहचान है। मुस्कुराते हुए वे मजाक में अपनी चोटी को "एंटीना" बताते हैं और कहते हैं कि इसी से उन्हें दूर से ही पता चल जाता है कि कौन-सी गाड़ी भूखी आ रही है। उनकी किस्सागोई, आत्मीय व्यवहार और पहाड़ी अपनापन भोजन के स्वाद में ऐसा तड़का लगाते हैं कि लोग सिर्फ खाना खाने नहीं, बल्कि उनसे मिलने भी रुकते हैं।
आज जब हाईवे पर बड़े-बड़े फूड चेन और ब्रांडेड रेस्तरां तेजी से बढ़ रहे हैं, तब भी बधाल का यह साधारण-सा ढाबा यह साबित करता है कि असली पहचान स्वाद, आत्मीयता और मेहमाननवाजी से बनती है। शायद यही वजह है कि शिमला-रामपुर मार्ग पर नियमित यात्रा करने वाले लोग कहते हैं—"अगर बधाल के चोटी वाले ढाबे पर नहीं रुके, तो सफर अधूरा रह गया।"
पहाड़ों में कुछ जगहें मंज़िल नहीं होतीं, वे सफर की सबसे खूबसूरत याद बन जाती हैं। बधाल का 'चोटी वाला ढाबा' भी ऐसी ही एक याद है, जहां परोसा सिर्फ भोजन नहीं जाता, बल्कि पहाड़ का दिल भी आपकी थाली में उतर आता है।



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