बुधवार, 4 नवंबर 2026

उम्र का तकाजा है साहब... अब सेहत संभालना भी एडवेंचर स्पोर्ट्स हो गया है !!


अब मैं उस उम्र में पहुंच गया हूं, जहां अपनी सेहत का ख्याल रखना किसी एडवेंचर स्पोर्ट्स से कम नहीं है।

मीठा खाता हूं तो शुगर बढ़ जाती है। नमक खाता हूं तो बीपी ऊपर चढ़ जाता है। दवाइयों की कीमत देखता हूं तो शुगर और बीपी दोनों एक साथ बढ़ जाते हैं।

पानी ज्यादा पी लूं तो हर पांच मिनट में बाथरूम जाना पड़ता है। कम पीऊं तो डॉक्टर कहते हैं कि डिहाइड्रेशन हो जाएगा। अब तो सोच रहा हूं कि बाथरूम में ही टीवी लगवा लूं और उसे अपना दूसरा ड्राइंग रूम घोषित कर दूं।

खाना खाता हूं तो वजन बढ़ता है। नहीं खाता हूं तो कमजोरी आ जाती है। सिर्फ सलाद खाऊं तो मन उदास हो जाता है। और मन उदास हो तो कुछ अच्छा खाने का मन करता है। यानी समस्या का समाधान भी समस्या ही है!

डॉक्टर साहब ने कहा, "अपने शरीर की सुनिए।" मैंने ध्यान से सुना। शरीर कुछ और नहीं, बस शिकायतों का पुलिंदा निकला। लगता है जैसे किसी हाउसिंग सोसायटी की सालाना बैठक चल रही हो, जिसमें हर अंग अपनी-अपनी समस्या लेकर बैठा है।

व्यायाम करता हूं तो अगले दिन उठने-बैठने के लिए किसी की मदद चाहिए। व्यायाम नहीं करता तो खड़े होने के लिए सहारे की जरूरत पड़ती है। जिम की फीस इसलिए भर रहा हूं कि तय कर सकूं कि तकलीफ किस तरीके से उठानी ज्यादा पसंद है।

ज्यादा सोऊं तो कमर दर्द करने लगती है। कम सोऊं तो दिन भर भूत बना घूमता हूं। और अगर सोते समय गर्दन गलत दिशा में मुड़ गई तो अगले तीन दिन तक दुनिया को सिर्फ एक ही तरफ से देख सकता हूं।

वैसे अब पता चला है कि चोट लगने के लिए गिरना जरूरी नहीं है। पहले साइकिल से गिरकर चोट लगती थी, अब गलत तकिया चुनने भर से तीन दिन की छुट्टी हो जाती है।

चाय पी लूं तो रात को नींद नहीं आती। चाय न पीऊं तो सुबह आंखें तो खुलती हैं, लेकिन दिमाग ड्यूटी पर नहीं आता। मेरा शरीर भी अब पुरानी सरकारी गाड़ी जैसा हो गया है। स्टार्ट होने में वक्त लगता है और स्टार्ट होने के बाद कौन-सी आवाज कहां से आ रही है, किसी को पता नहीं चलता।

सुबह अब नींद से जागता नहीं हूं, मानो पुनर्जन्म लेता हूं। पहले आंखें खोलता हूं, फिर जांचता हूं कि शरीर के कौन-कौन से अंग आज साथ आए हैं। बिस्तर के किनारे बैठकर कुछ देर इंतजार करता हूं कि घुटने सिस्टम में लॉग-इन कर लें।

याददाश्त की बात मत पूछिए। याददाश्त तो बहुत अच्छी है, बस याद नहीं रहता कि याद क्या रखना था!

कल एक कमरे में किसी काम से गया। वहां पहुंचकर भूल गया कि आया किसलिए हूं। वापस लौटा तो भूल गया कि कहां से आया था। फिर सोचा, चलो जब उठ ही गया हूं तो बाथरूम ही हो आता हूं। कम से कम वहां जाने का कारण तो याद रहेगा!

लेकिन जिंदगी को इतना गंभीरता से भी नहीं लेना चाहिए। अकेले रहना और किसी से बात न करना सेहत के लिए ठीक नहीं है।

इसलिए अब सुबह चाय के साथ माइक्रोवेव और टोस्टर से बातचीत कर लेता हूं। दोनों मेरी बात ध्यान से सुनते हैं। टोस्टर तो इतना भावुक हो गया कि उसने तुरंत ब्रेड बाहर उछाल दी।

हां, वाशिंग मशीन से बात करना बंद कर दिया है। वह हर बात को घुमाती है, फिर उसी मुद्दे पर चक्कर काटने लगती है।

फ्रिज थोड़ा ठंडा मिजाज जरूर है, लेकिन एक बात अच्छी है। वही एक है जो मुझे देखते ही रोशनी से जगमगा उठता है।

इस्त्री का तो पूछिए ही मत। हर वक्त गर्म रहती है। ओवन भी कुछ कम नहीं। वैक्यूम क्लीनर तो सामने आते ही मेरी बची-खुची ऊर्जा भी खींच लेता है।

अब मेरा सबसे अच्छा दोस्त सोफा है। न कोई सवाल पूछता है, न कोई शिकायत करता है। बस बांहें फैलाकर स्वागत करता है। मुश्किल यह है कि एक बार बैठ जाओ तो फिर उठने नहीं देता।

इसलिए हंसते रहिए, मुस्कुराते रहिए। कम से कम जब तक याद है कि हंसना किस बात पर था!

वैसे उम्र के पड़ावों का मैंने एक नया वर्गीकरण तैयार किया है।

50 साल तक – जिंदगी में क्या-क्या करना है, इसकी योजनाएं बनाते हैं।

50 के बाद – डॉक्टरों के चक्कर लगाते हैं और जांचें करवाते हैं।

70 के बाद – अपनी रिपोर्ट की तुलना दोस्तों की रिपोर्ट से करते हैं। किसका कोलेस्ट्रॉल कितना है, किसका यूरिक एसिड कितना बढ़ा है और किसकी दवा कितने रुपये महंगी है!

90 के बाद – जो मन करे खाइए, जितना मन करे खाइए। पूरी मिठाई की प्लेट साफ कर दीजिए। अब शिकायत करने वाले को भी पहले 90 तक पहुंचना पड़ेगा!

और अब बस, इस लेख को यहीं विराम देता हूं। क्योंकि मैं कुछ जरूरी काम करने के लिए उठा था लेकिन वह काम क्या था... यह याद नहीं आ रहा।

हंसते रहिए, स्वस्थ रहिए और उम्र को सिर्फ कैलेंडर में बढ़ने दीजिए, चेहरे पर नहीं!

(लेखक : अज्ञात । मूल अंग्रेजी भाव पर आधारित स्वतंत्र हिंदी रूपांतरण)

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