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बुरांश में आग भी है और यौवन का फाग भी..!!

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देश के मैदानी इलाकों में इन दिनों जहां पलाश और गुलमोहर दहक रहे हैं, वहीं पहाड़ों पर बुरांश अपनी मुस्कराहट से लालिमा बिखेर रहा है। हिमाचल प्रदेश में पेड़ों पर झुंड के झुंड बुरांश पहाड़ों को खूबसूरत बना रहे हैं। देश के अन्य पर्वतीय राज्यों का हाल भी शायद ऐसा ही होगा। पहाड़ों पर वैसे तो देवदार का कब्जा है और वे अपनी ऊंचाई से कई बार पहाड़ों के शिखर को भी बोना साबित करते नजर आते हैं लेकिन देवदार के बीच से झांकता लाल रंग का बुरांश खूबसूरती से हमारे दिल में उतर जाता है। बुरांश पर कवियों ने खूब कलम चलाई है। सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत ने तो कुमाऊंनी में लिखा है: ‘सार जंगल में त्वे जस क्वे न्हां रे बुरांश,  खिलन क्ये छै जंगल  जस जलि जा, सल्ल छ, दयार छ,  पई छ, अयार छ,  सबन में पुंगनक भार छ,  पर त्वी में दिलै की आग छ,  त्वी में जवानिक फाग छ।’ इसका तात्पर्य है कि बुरांश तुझ सा सारे जंगल में कोई नहीं है। जब तू फूलता है, सारा जंगल मानो जल उठता है। जंगल में और भी कई तरह के वृक्ष हैं पर एकमात्र तुझमें ही दिल की आग और यौवन का फाग दोनों मौजूद हैं। पहाड़ी इलाकों की प्रकृत...

भारत में रेडियो की विकास यात्रा

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भारत में रेडियो का इतिहास एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प यात्रा है। इसकी शुरुआत करीब सौ साल पहले एक छोटे से प्रयोग से हुई थी ,  लेकिन समय के साथ यह देश के सांस्कृतिक ,  सामाजिक ,  और राजनीतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। रेडियो के माध्यम से न केवल सूचना और मनोरंजन प्रदान किया जाता है ,  बल्कि यह एक सशक्त माध्यम के रूप में समाज की जागरूकता बढ़ाने का कार्य भी करता है। भारत में रेडियो की विकास यात्रा के विभिन्न चरणों पर बात करें तो हम उन्हें कुछ इस प्रकार विभाजित कर सकते हैं: 1.  प्रारंभिक चरण ( 1920-1947) भारत में रेडियो की शुरुआत ब्रिटिश काल के दौरान हुई।  1920  में ,  भारत में पहली बार रेडियो प्रसारण का प्रयोग हुआ। यह प्रसारण भारत में पहली बार   कलकत्ता  ( अब कोलकाता) में हुआ था। इसका उद्देश्य संगीत ,  समाचार और जानकारी फैलाना था। ·    1927   में ,  भारत में  'Indian Broadcasting Company' (IBC)  की स्थापना की गई। हालांकि ,  यह कंपनी आर्थिक कारणों से अधिक समय तक नहीं चल पाई।   बॉम्बे प्रेसिडेंसी रेड...