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शिमलु, सैमला, शुमला और रोमला से कैसे बना शिमला

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भारत के प्रथम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत, पाकिस्तान के तख्ता पलट जनरल जिया-उल-हक,कांग्रेस के संस्थापक ए ओ ह्यूम,म्यांमार की लोकतांत्रिक नेता आंग सान सू की और अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई के बीच भारत के संबंध में क्या कॉमन है? इसी तरह, फिल्म अभिनेता अनुपम खेर, बलराज साहनी, प्राण, प्रिटी जिंटा, उस्ताद विलायत खां, राजिंदर कृष्ण और के एल सहगल में फिल्म के अलावा क्या कॉमन कनेक्शन है? चलिए, एक और पहेली.. गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर, अमृता शेरगिल, निर्मल वर्मा, रुडयार्ड किपलिंग और रस्किन बांड में लेखन के अलावा और क्या कॉमन है? नहीं पता..चलिए हम बताते हैं। इन सभी में शिमला कनेक्शन है। शिमला कनेक्शन मतलब या तो ये शिमला में पले बढ़े हैं या शिक्षित हुए हैं और यहीं से उनके व्यक्तित्व का विकास हुआ है। शिमला शहर वर्षों से नामचीन हस्तियों की जन्मभूमि/कर्मभूमि रहा है। मसलन म्यांमार की दिग्गज नेता आंग सान सू की का शिमला से गहरा संबंध है क्योंकि उन्होंने 1987 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्ट्डीज में फेलोशिप के दौरान अपने पति और बच्चों के साथ शिमला में काफी समय बिताया...

जाड़ों की ‘ठंडी’ धूप में,आँगन में लेट कर..

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फिल्म ‘आंधी’ का मशहूर गीत ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन…’, जरूर गुलज़ार साहब ने शिमला या इस जैसे किसी पहाड़ पर ठंड के दिनों में बैठकर लिखा होगा क्योंकि तभी वे लिख पाए कि ‘..जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर...’ या फिर ‘..बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर वादी में गूँजती हुई खामोशियाँ सुने..।’ दरअसल, ऐसी कल्पना वही कर सकता है जिसने पहाड़ों पर मौसम का अतरंगी मिजाज जिया हो और खासतौर पर जाड़ों की ठंडी धूप को महसूस किया हो। वैसे, गुलज़ार साहब ने काव्यात्मक रूप देने के लिए शायद नर्म धूप लिख दिया है लेकिन इसे नर्म नहीं बल्कि ठंडी धूप कहना ज्यादा बेहतर होगा।  इसकी वजह यह है कि शिमला जैसे पहाड़ी इलाकों में सर्दियों की जो धूप होती है, वह नर्म या गर्म नहीं बल्कि ठंडी होती है। यह धूप शरीर को उतना गर्म नहीं करती,जितना दिल को गुदगुदाती है। इसे हम ठंडी धूप कह सकते हैं…और यह बात भी उतनी ही सच है कि पहाड़ों के बाहर शायद ही कोई इसे समझ पाए। तमाम भूमंडलीय बदलावों, कम होते पेड़, जनसंख्या एवं वाहनों के बढ़ते बोझ तथा पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ के बाद भी सर्दियों में शिमला जैसे पहाड़ी इला...

बर्फ के बिना भी बर्फीला जश्न..!!

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क्वीन ऑफ हिल्स शिमला,हमेशा से सर्दियों की परी कथा सी लगती है और इस दौरान बर्फ़ से ढके पहाड़ों के बीच होने वाला विंटर कार्निवल यहां की जान है, लेकिन इस बार का विंटर कार्निवल कुछ खास है – प्रकृति ने बर्फ नहीं बरसाई, फिर भी शहर ने खुद को कृत्रिम बर्फ, चमकती लाइटों और रंग-बिरंगी झंडियों की सजावट से ऐसा सजाया कि लगता है पूरा शिमला बर्फ की चादर ओढ़े नाच रहा हो। कल 24 दिसंबर शुरू होकर 1 जनवरी तक चलने वाला यह विंटर कार्निवल नौ दिन का उत्सव भर नहीं, बल्कि हिमाचली संस्कृति, संगीत और जीवंतता का जीता-जागता प्रमाण है। आज क्रिसमस पर अलग ही रौनक है और दुनिया भर में मशहूर यहां का चर्च रंगों से नहाकर प्रार्थनाओं में डूबा है। विंटर कार्निवल के दौरान रिज मैदान (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर शाम ढलते ही हजारों लोग इकट्ठा होते हैं। इनमें स्थानीय लोगों से ज्यादा पर्यटक हैं। हवा में ठंडक है, लेकिन दिलों में गर्माहट। उत्सवी माहौल का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू खुद महानाटी में थिरकते दिखे। ढोल-नगाड़ों की थाप पर पूरा रिज मैदान एक साथ नाच उठता है।  यहां नाटी...

अरे बाप रे…40 हजार रुपए में एक किलो सब्जी !!

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यह हिमालय की राजकुमारी है.. नाज़ुक, दुर्लभतम एवं इतनी शर्मीली की लाख तलाशने पर भी नज़र नहीं आती..और कीमती इतनी की इसके सामने सोना चांदी भी शरमा जाएं। यह कोई धातु नहीं है फिर भी इसे पहाड़ों का सोना कहा जाता है..इंसान नहीं है फिर भी राजकुमारी है और दवा नहीं है फिर भी दुनिया के किसी भी बेशकीमती नुस्खे से कम नहीं है। बर्फीली चोटियों पर पूरी शान-ओ-शौकत से रहने वाली यह नाजुक सी राजकुमारी दरअसल सब्जियों की दुनिया की ‘रॉयल प्रिंसेस’ है और इसका नाम भी कुछ अलग सा है - गुच्छी।  मधुमक्खी के छत्ते (honeycomb) सा स्पंजी क्राउन पहने यह प्रिंसेस आमतौर पर जंगलों में छिपकर रहती है। जैसे ही हिमालय की बर्फ पिघलती है तो यह हौले से लजाते हुए बाहर झांकती है, जैसे शाही परिवार का कोई चश्म-ओ-चिराग अपने महल से निकल रहा हो। लेकिन राजकुमारी गुच्छी इतनी नखरेबाज है कि आसानी से नहीं मिलती बल्कि जंगलों में घंटों भटककर एवं जोखिम उठाकर ही इसे मनाना और लाना पड़ता है। अब रही कीमत की बात तो यह सब्जियों की सरताज है क्योंकि एक किलो सूखी गुच्छी की कीमत 30,000 से 40,000 रुपये है। इतनी कीमती कि, फाइव स्टार होटल में इसे डिश ...

मीठे राजमार्ग के माथे पर क्यों लगी हैं लाल बिंदी…!!

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इन दिनों यदि आप ‘मीठे राजमार्ग’ से गुजर रहे होंगे तो आपको ताजे गुड़ की मदहोश करने वाली मिठास के साथ सड़क पर कुछ अनूठा..कुछ अलग भी नजर आएगा। ऐसा लगता है जैसे किसी ने राजमार्ग के माथे पर सुंदर सी लाल बिंदी लगा दी है। यह अनूठापन आकर्षक भी है और आपकी सुरक्षा का पहरेदार भी। मीठे राजमार्ग के बारे में और विस्तार से जानना हो तो आप इस लिंक के जरिए पढ़ सकते हैं। मीठा राजमार्ग: जहां बन रहे मदहोश करने… https://jugaali.blogspot.com/2024/12/blog-post_59.html बहरहाल, अभी बात मीठे राजमार्ग के अनूठेपन की। दरअसल भोपाल से जबलपुर तक बिना किसी रुकावट के जाने के लिए बनाया गया नेशनल हाइवे क्रमांक 45 इन दिनों अपने रेड कार्पेट के कारण देश भर में चर्चा में है। ये टेबिल टॉप शैली में बने रेड कार्पेट पूरी सड़क की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे हैं। ये ऐसे लगते हैं जैसे महिलाएं माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगाती हैं। जैसे बिंदी सुहाग की सुरक्षा का प्रतीक मानी जाती है,इसी तरह यह रेड कार्पेट भी वाहन चालकों की सुरक्षा का प्रतीक है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एन एच ए आई) ने देश में संभवतः पहली बार यह अनूठा प्रयोग...

25 वें जन्मदिन पर पिता का पत्र बेटी के नाम

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 🌹जन्मदिन मुबारक प्रिंसेस..🌹 हमारी नन्ही सी परी…देखते ही देखते सजीली राजकुमारी बन गई है। आज जब घड़ी ने बारह बजाए और हमने आँखें बंद कीं तो पूरे 25 साल का गुजरा समय किसी मनभावन फिल्म की भांति आंखों के सामने आ गया…11 दिसंबर, 2000 को सोमवार का दिन था और उस दिन पूर्णिमा थी। पूरी  दुनिया को दूधिया रोशनी से जगमगाते हुए तुमने रात करीब 10 बजे हमारे जीवन में हौले से कदम रखा और फिर क्या था..हमारी दुनिया भी रोशन होती चली गई। तुमको शायद न पता हो कि 11 दिसम्बर का दिन पर्वतीय पर्यावरण के महत्व के लिए मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस के रूप में भी जाना जाता है और जन्म के बाद आज तुम्हारे 25वें जन्मदिन का जश्न भी हिमालय की गोद में पहाड़ों की रानी शिमला की बाहों में मनाने का अवसर मिला है। जब तुमने अपने नन्हे हाथ को मेरे हाथ में रखा था तो लगा कि चांद हथेली पर उतर आया हो। जब पहली बार तुमने मेरी अंगुली पकड़ी थी तो इतना जोर लगाया था कि आज तक उसकी गर्माहट महसूस होती है और लगा जैसे तुम कह रही हो, कि पापा इसी तरह अंगुली थामे रहना। उस पल से लेकर आज तक, सच में हम लोग बस तुम्हारे लिए, तुम्हारे स...

व्यंग्य: गो मूत्र से वोट कहते हैं

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आवश्यकता आविष्कार की जननी है और भारत आविष्कारों (पढ़िये चमत्कारों) का देश है। आविष्कार (चमत्कार) भी ऐसे-ऐसे कि अमेरिका-जापान जैसे 'आविष्कार केंद्रित' देश और नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक भी दांतों तले अंगुली दबा लें। हमें स्कूल के दिनों से रटाया जाता है कि शून्य का आविष्कार भारत ने ही किया था। इस खोज का कितना लाभ हम उठा पाए यह तो वैदिक, ज्योतिष एवं कर्मकांडों को स्कूल-कालेजों में अनिवार्य विषय बनवाने वाले 'शिक्षा शंकराचार्य' जाने, पर इस शून्य को एक से लेकर नौ अंकों के साथ मनचाही बार प्रयुक्त कर 'रिश्वत' का आविष्कार जरूर हमने कर दिखाया है क्योंकि 'रिश्वत हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इसे हम लेकर रहेंगे' की तर्ज पर 'रिश्वोत्री' (रिश्वत की गंगोत्री) को पूरे देश में समान गति से बहते देखकर इस आविष्कार की सार्थकता एवं कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है जैसी 'राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण' होता है। 'राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण' वाक्य का इस्तेमाल करने के लिए मैं हमारे हिन्दू मठाधीशों से माफी मांगता हूं। दरअसल इसका तो उन्हें पेटेंट करा...