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मध्यप्रदेश के दो अद्भुत और सबसे बड़े महादेव..!!

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महाशिवरात्रि पर आज मध्यप्रदेश के दो सबसे बड़े शिवलिंग की बात..भगवान शंकर के ये दोनों स्थान अपने शिवलिंग के बड़े आकार भर के कारण नहीं बल्कि महत्व के कारण भी प्रसिद्ध हैं इसलिए यहां महाशिवरात्रि पर आस्था का सैलाब उमड़ता है। इनमें से एक है रायसेन जिले में और भोपाल के करीब स्थित भोजपुर मंदिर। यह मंदिर भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। चार विशाल स्तंभों वाले इस मंदिर का शिवलिंग इतना बड़ा है कि पूजा के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह शिवलिंग एक ही विशाल चट्टान से तराशा गया है, जो दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक माना जाता है।  यहां शिवलिंग की ऊंचाई करीब 7.5 फीट और आधार सहित कुल ऊंचाई 40 फीट से अधिक है जबकि मंदिर 115 फीट लंबा, 82 फीट चौड़ा और लगभग 13 फीट ऊंचे चबूतरे पर बना है। यहां का विशाल द्वार और मंदिर का अधूरापन भी प्रमुख आकर्षण है। बताया जाता है कि 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान राजा भोज द्वारा इस मंदिर का निर्माण शुरू किया गया था, लेकिन उस समय मंदिर के मुख्य भाग और गर्भगृह का काम ही पूरा हुआ। इसे "उत्तर भारत का सोमनाथ" भी कहा जाता है। भोजपुर मंदिर भारतीय पुर...

धूप और बर्फीली हवाओं में कुश्ती!!

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  मैदानी शहरों में भले ही पारे ने 30 डिग्री तक छलांग लगाकर गर्मी की आमद की आहट दर्ज करा दी हो लेकिन पहाड़ों पर  सर्दी और गर्मी के बीच कुश्ती जारी है। जब धूप जोर मारती है तो सड़कों के किनारे जमा बर्फ की मोटी परत भी सिसकने लगती है और शरीर में लिपटी कपड़ों की लेयर चुभने लगती हैं। ..लेकिन जैसे ही बर्फीली हवाओं को मौका मिलता है वे धूप को दबोच लेती हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे कबड्डी में रेडर को दूसरी टीम के खिलाड़ी दबोचते हैं। फिर क्या है..बर्फीली हवाओं के आगोश में आकर धूप भी ठंडी हो जाती है और कपड़ों की लेयर हमारा सुरक्षा कवच।  अधिकतम 15 डिग्री से लेकर न्यूनतम 1 डिग्री सेल्सियस के बीच सर्दी गर्मी की इस धमा चौकड़ी में आपको हर वक्त तैयार रहना पड़ता है। दक्षिण भारत और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में आ रहे सैलानियों के लिए तो अभी भी शायद यह कड़ाके की ठंड है इसलिए वे पूरे जिरह बख्तर मतलब ऊनी कपड़ों के साथ आते हैं इसलिए पहाड़ी इलाके उनकी रंग बिरंगी ऊनी टोपियों, मफलर और स्वेटर से गुलजार हैं। ...जबकि हनीमून कपल के लिए शायद यह मौसम सबसे मुफीद है इसलिए शादी के बाद लगता है वे सीधे पहाड़ों प...

जादुई पिटारे की तरह है रेडियो

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रेडियो सुनना इन दिनों कितना आसान है न? मोबाइल पर ऐप डाउनलोड करो और मनचाहे गाने और कार्यक्रम सुनो, लेकिन कुछ दशक पहले तक रेडियो ‘लग्जरी’ था। रेडियो खरीदने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। ये पढ़कर आश्चर्य हो रहा है न? हकीकत यही है कि ऐसा भी दौर था जब घर में रेडियो रखने और सुनने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था? बिल्कुल वैसे ही जैसे आज कार चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए। तब रेडियो के लिए ब्रॉडकास्ट रिसीवर लाइसेंस जरूरी था। रेडियो सेट रखने वाले को पोस्ट ऑफिस से करीब 15 रुपए सालाना शुल्क देकर लाइसेंस लेना पड़ता था। हर साल इसको रिन्यू भी कराना पड़ता था और बिना लाइसेंस के रेडियो रखना गैर-कानूनी था। रेडियो को हम हमारे देश में सामान्य रूप से आकाशवाणी के नाम से जानते हैं। जेन ज़ी में यह एफएम, पॉडकास्ट, रेडियो ऐप्स जैसे तमाम नामों से लोकप्रिय है। यह एक जादुई पिटारा है । आप मोबाइल से, कार में, ईयर फोन के जरिए आसानी से रेडियो सुन सकते हैं लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब रेडियो एक बड़ा सा डिब्बा होता था, जिसमें एंटीना लगाकर दूर-दूर की आवाज़ें पकड़ी जाती थीं। आज वही रेडियो जेब के छोटे से स्मार्टफोन...

सरला माहेश्वरी: समाचार प्रसारण के एक युग का अंत..!!

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आज, 12 फरवरी 2026 को, भारतीय टेलीविजन इतिहास की एक चमकती हुई शख्सियत, दूरदर्शन की पूर्व समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी का निधन हो गया।  71 वर्ष की आयु में उनका यह अवसान न केवल मीडिया जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है, बल्कि उन लाखों दर्शकों के लिए भी है, जिनके घरों में उनकी शांत, मधुर और स्पष्ट आवाज़ ने समाचारों को विश्वसनीयता का पर्याय बना दिया था। सरला माहेश्वरी, एक ऐसी महिला जो सादगी, संयम और सटीकता की मिसाल बनीं; जिन्होंने काले-सफेद टेलीविजन से रंगीन युग तक का सफर तय किया और समाचार प्रसारण को गरिमा प्रदान की।  सरला माहेश्वरी  उस दौर की प्रतिनिधि थी जब महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और पेशेवर जीवन का संतुलन बनाना आसान नहीं था लेकिन सरला जी ने इसे न केवल संभाला, बल्कि एक मिसाल कायम की। उनकी सादगी और संयमपूर्ण व्यक्तित्व ने उन्हें हमेशा लोगों और अपनी जड़ों से जोड़े रखा । दूरदर्शन में उनकी शुरुआत बच्चों के कार्यक्रमों से हुई लेकिन जल्दी ही वे समाचार वाचिका बनकर उस स्थान पर आ गई जो शायद उन्हीं के लिए बना था। यह वह समय था जब भारत का टेलीविजन काले-सफेद से रंगीन युग में प्रवेश कर रहा ...

वाघा बार्डर से आंखों देखी:राष्ट्र गौरव की अमिट अभिव्यक्ति

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  ठंड की शामें उत्तर भारत में एक अनोखी रंगत भरी होती हैं। सूरज ढलते-ढलते आकाश में गुलाबी केसरिया आभा बिखेरता है, ठंडी हवाएँ हल्की सी कंपकंपी पैदा करती हैं और दूर से आती धुंध की चादर वातावरण को अपने आगोश में समेट लेती है। ऐसे में पाकिस्तान के लाहौर से महज 20 किमी और पंजाब के अमृतसर से 30 किलोमीटर दूर अटारी-वाघा बॉर्डर पर बीटिंग रिट्रीट समारोह देखना ठंड में भी गर्माहट ला देता है क्योंकि यहां प्रकृति की सर्दी देशभक्ति की गर्मी से टकराती है।  शाम के करीब साढ़े चार बज रहे हैं। ठंड से बचने के लिए हम भी सपरिवार शॉल, स्वेटर और जैकेट जैसे सुरक्षा कवच के साथ स्टेडियम में सबसे सामने वीआईपी सीट पर अपनी जगह ले लेते हैं। वैसे, यहां लोगों के आने का सिलसिला करीब तीन बजे से शुरू हो गया था और दर्शक दीर्घा धीरे धीरे भरने लगी है। स्टेडियम के बाहर तिरंगा ध्वज से लेकर तिरंगा कैप बेचने  एवं चेहरे पर राष्ट्रीय ध्वज की छाप छोड़ने वाले कलाकार मौजूद हैं। उनके लिए भी क्रिकेट मैच की तरह यही कमाई का अवसर है।  उधर, दर्शकों की भीड़ में बच्चे, बुजुर्ग, देशी विदेशी पर्यटक…सभी हैं और सबके चेहरे पर ग़ज़ब...

हिमाचल में गंगा.. है न वाकई चमत्कार..!!

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  कल्पना कीजिए, जब चारों तरफ चमकती धूप खिली हो लेकिन इसके बाद भी एक स्थान ऐसा हो जहां पूरा पानी कांच की तरह मोटी परत में जमा हो.. पत्थर का बना फर्श इतना ठंडा हो कि पैर जम जाए, लेकिन हवा इतनी शुद्ध एवं साफ की अंतर्मन तक महसूस हो.. अकल्पनीय लगता है न..लेकिन यह हकीकत है और वह भी क्वीन ऑफ हिल्स शिमला से तकरीबन सौ सवा सौ किलोमीटर दूर।  यहां तक पहुंचने का रास्ता भी इतना मनमोहक और रोमांचक है कि आप देश के तमाम दुर्गम सफर को भूल जाएंगे। एक तरफ पहाड़ की चोटियों से ऊंचाई में मुकाबला करता चीड़ देवदार का घना जंगल है तो ऊंचाई से विपरीत दिशा में प्रतिस्पर्धा करतीं गहरी खाई और बीच बीच में आवाजाही करते सियार एवं उनके जंगली दोस्त भी। हम भी वापसी में सियार के जोड़े से रूबरू हुए और वह भी इतने दमदार जोड़े से जो बिना डरे आंखों में आंखें डालकर देख रहे थे। हम बात कर रहे हैं गिरी गंगा की.. हरिद्वार की तरह मां गंगा का एक पवित्र स्थान। शिमला जिले के कड़ापत्थर एरिया के पास स्थित यह स्थान अभी तक पर्यटकों की भीड़, वाहनों की चिल्लपों और शोरगुल से बचा हुआ है। हर तरफ सुकून बिखरा है और चारों ओर बिखरी है बर्फ। ...

सफेद बर्फ, काली बर्फ़..में छिपी हमारी कहानी!!

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ये न तो आपके हमारे घर के पुराने गद्दों की मैली हो चुकी रुई है और न ही सर्फ या साबुन का झाग..इन दिनों शिमला जैसे तमाम पर्वतीय इलाकों में ये नजारा आम है। ये बर्फ़ है, वही बर्फ जिसको देखने के लिए हजारों लाखों लोग पहाड़ों पर जमा होते हैं। पहाड़ों पर जब पहली बार बर्फ गिरती है, तो सब कुछ कितना सुंदर लगता है न...श्वेत चादर ओढ़े खड़े पहाड़, बिल्कुल निर्मल, चमकदार, किसी संत की तरह। लेकिन धीरे-धीरे... हवा में उड़ती धूल, धुआँ, ट्रकों की कालिख, और हमारी अपनी जिंदगी की भागदौड़—सब मिलकर उस सफेद बर्फ़ पर कालिख की परत चढ़ा देते हैं। इसके फलस्वरूप खूबसूरत सफेद बर्फ अब काली होकर बदसूरत दिखने लगती है.. गंदी और नकारात्मकता से भरपूर उदास सी। हम इसे ‘काली बर्फ़’ कह सकते हैं। वैसे पहाड़ों पर काली बर्फ़ के अंग्रेजी नाम ब्लैक आइस का अलग ही खौफ है।यह बर्फ इतनी पारदर्शी होती है कि काली सड़क पर बिल्कुल घुल मिल जाती है और इस पर चलना लगभग नामुमकिन होता है। इस पर लोग सटासट फिसलते हैं, बिल्कुल बच्चों वाली फिसल पट्टी की तरह। अनजाने में कई लोग अपनी कमर,हाथ पैर तक तुड़वा लेते हैं। अब बात पुनः काली गंदी बर्फ की, वैसे...