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सिर ही सिर..हजारों से करोड़ों में बदलते सिर

प्रयागराज कुंभ: जैसा मैंने देखा (6)

10 लाख, 20 लाख,50 लाख,1 करोड़, 5 करोड़, 10 करोड़, 15 करोड़, 20 करोड़......हम-आप गिनते गए और यह संख्या बढती गयी...हमारी-आपकी कल्पना से परे,प्रशासन की गणना से बहुत आगे एवं बीते कुम्भों से अलहदा।..और जब 49 दिन का सफ़र पूरा हुआ तो यह संख्या बढ़कर 24 करोड़ हो गयी....चौबीस करोड़ का मतलब है दुनिया के तक़रीबन सवा दो सौ देशों में आधे से ज्यादा देशों की जनसँख्या से ज्यादा। स्विट्ज़रलैंड और सिंगापुर जैसे देशों से तीन गुना तथा श्रीलंका, सीरिया, रोमानिया, क्यूबा, स्वीडन और बेल्जियम जैसे देशों की जनसँख्या से कहीं ज्यादा। मकर संक्रांति से लेकर महाशिवरात्रि के बीच करोड़ों की इस संख्या का प्रबंधन वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं है। मैं आमतौर पर ‘महा’ विशेषण से परहेज करता हूँ लेकिन मैंने अपनी आँखों से अर्ध कुंभ को महाकुंभ में बदलते देखा....दिव्य-भव्य महाकुंभ और वह भी सबसे सुरक्षित और सबसे स्वच्छ।
महाकुंभ में जुटी भीड़ के लिए कोई शब्द तलाशा जाए तो ‘जनसैलाब’ शब्द भी प्रयागराज में उमड़ी भीड़ के सामने लाचार लगा। यदि इससे भी बड़ा कोई शब्द इस्तेमाल किया जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। चारों ओर बस सिर ही सिर नजर आते थे। सभी ओर बस जनसमूह था- प्रयाग आने वाली सभी ट्रेनों में,प्लेटफार्म पर, स्टेशन से आने वाली सड़क पर, बसों में,कार से,पैदल, बस सिर ही सिर ,पोटली लेकर चलते,बैग लादे,बच्चे संवारते, संगम की ओर बढ़ते, गंगा की तेज़ धार से,निर्मल-आस्थावान-सच्चे और सरल लोग। ऐसा लगता था जैसे प्रयाग की सारी सड़कें एक ही दिशा में मोड़ दी गयी हों। बूढ़े, बच्चे, महिलाएं और मोबाइल कैमरों से लैस नयी पीढ़ी, परिवार के परिवार। पूरा देश उमड़ आया था वह भी बिना किसी दबाव या लालच के, अपने आप, स्व-प्रेरणा से...और देश ही क्या विदेशी भी कहाँ पीछे थे। मैंने तो आज तक अपने जीवन में कभी किसी मेले में इतनी भीड़ नहीं देखी। इस कुम्भ का आकर्षण इतना जबरदस्त था कि दुनिया भर से 8 से 10 लाख विदेशी सैलानी भी खिंचे चले आए।इसमें लगभग सवा लाख तो सिर्फ अमेरिका और एक लाख आस्ट्रेलिया से थे।
यह कुंभ कई मायनों में अलग था-महाकुंभ था मसलन कुंभ के इतिहास में संभवतः पहली बार राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कई केंद्रीय मंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और विभिन्न राज्य सरकारों के मंत्रियों सहित देश में संवैधानिक पदों पर बैठे लगभग सभी प्रमुख लोगों ने न केवल कुंभ का दौरा किया, बल्कि संगम पर डुबकी भी लगाईं।
आमतौर पर कुंभ में स्नान के खास दिनों जैसे मकर संक्रांति, पौष पूर्णिमा, मौनी अमावस्या, वसंत पंचमी, माघी पूर्णिमा और महा शिवरात्रि पर ही भीड़ देखी जाती थी लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि आम दिनों में भी श्रद्धालुओं की भीड़ खास दिनों की तरह बनी रही। पहली बार किसी कुंभ ने तीन विश्व रिकार्ड अपने नाम दर्ज किये और स्वच्छता और सफाई, ट्रैफिक योजना और भीड़ प्रबंधन सहित तीन क्षेत्रों में सफलतापूर्वक अपना नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करवा लिया।
महाकुंभ तो था ही यह क्योंकि इसका दायरा पिछले कुम्भ के 1600 हेक्टेयर की तुलना में दोगुना यानी 3200 हेक्टेयर से अधिक था। कुंभ 20 क्षेत्रों में विभाजित तो 40 से ज्यादा स्नान घाट 8 किमी के दायरे में फैले थे। विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने और तीर्थयात्रियों को संगम तक पहुंचने के लिए गंगा नदी पर 20 पोंटून पुल अर्थात नाव के अस्थायी पुल बनाए गए थे। । केंद्र और राज्य सरकारों ने कुल मिलाकर महाकुंभ के आयोजन पर 7 हजार करोड़ रुपये खर्च किये थे।वैसे तो यह आंकड़ा भी कुम्भ को महाकुंभ बनाने की कहानी बयान कर देता है क्योंकि 2013 में पिछले कुम्भ पर करीबन 13 सौ करोड़ रुपये खर्च हुए थे।
प्रयाग कुम्भ वास्तव में इसलिए भी महाकुंभ था क्योंकि इसने 6 लाख से ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार दिया। भारतीय उद्योग परिसंघ के अध्ययन के मुताबिक प्रयाग कुम्भ से उप्र को लगभग 1.2 लाख करोड़ का राजस्व मिला जो उत्तरप्रदेश के सालाना बजट 4.28 लाख करोड़ का एक चौथाई है। सबसे ज्यादा कमाई होटल,खानपान,टूर आपरेटर और परिवहन के क्षेत्रों में हुई है...तो आइए इस सफल और सुरक्षित आयोजन के लिए आयोजकों से ज्यादा हम-आप जैसी आम जनता की पीठ थपथपाएं क्योंकि उसके अनुशासन, जिजीविषा, संयम और सहनशीलता ने कोई हादसे का कलंक इस महाकुंभ पर नहीं लगने दिया और तमाम रिकार्डों के बीच यह आयोजन वास्तव में अपने उद्देश्यों पर खरा उतरा।
इसे भी पढ़िए: फिल्मों की तरह नहीं होता कुंभ में बिछड़ना मिलना
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