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तपस्या से भी कठिन है अंतरिक्ष में खाना,पीना और रहना !!

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भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स के मंगलवार को सकुशल वापस लौटने से सब मंगल हो गया और तमाम तरह के संशय के बादल छट गए ।  वे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर 9 महीने 14 दिन तक रहीं और 17 घंटे का सफर कर समंदर में उतरी और फिर सुरक्षित वहां पहुंच गईं जहां उन्हें नौ महीने पहले होना चाहिए था। इसके पहले का किस्सा हम सब जानते हैं कि सुनीता विलियम्स और उनके साथी बुच विल्मोर को  5 जून 2024 को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर एक टेस्ट मिशन के लिए भेजा गया था। यह मिशन मूल रूप से 8 दिनों का था, लेकिन यान में तकनीकी खराबी के कारण उनकी वापसी में देरी हुई। नतीजतन, उन्हें 9 महीने से ज्यादा समय तक अंतरिक्ष में रहना पड़ा, और वे 19 मार्च को धरती पर लौट पाईं।  इस सफलता के जश्न में आपके दिमाग में भी यह ख्याल आया होगा कि इस लंबे प्रवास के दौरान सुनीता और उनके साथी क्या खाते होंगे? कैसे खाते होंगे? उनकी दिनचर्या कैसे संचालित होती होंगी? सवाल वाकई गंभीर हैं क्योंकि जहां पैर जमीन पर नहीं टिकते हैं और सब कुछ हवा में उड़ता रहता है, वहां ये तो संभव नहीं है कि अंतरिक्ष यात्री हमारी त...

भारत के लिए भी सबक है पाकिस्तान का ट्रेन हाइजैक!!

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फिल्म ‘शोले’ का वह दृश्य याद करिए जब डाकू गब्बर सिंह और उसकी गैंग ट्रेन को चारों ओर से घेरकर लूटने का प्रयास करते हैं और फिर जांबाज पुलिस अफसर बने संजीव कुमार के साथ जय वीरू (अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र) की जोड़ी डकैती के प्रयास को असफल कर देती है। हाल ही में पाकिस्तान की यात्री ट्रेन जाफर एक्सप्रेस को हाइजैक करने वाले बलूचिस्तान के लड़ाकों के जेहन में कहीं न कहीं शोले का यह दृश्य भी रहा होगा। वैसे भी, फिल्म शोले में इस दृश्य को फिल्माने के लिए चुना गया इलाका और बलूचिस्तान का भौगोलिक क्षेत्र करीब करीब एक जैसा ही दिखता है। अभी तक इस ट्रेन हाइजैक की गुत्थियां और असल परते खुलना बाकी हैं। अभी पाकिस्तान की सेना और बलूचिस्तान के लड़ाकों के दावों प्रतिदावों की पुष्टि नहीं हो पाई है। शायद, समय के साथ तथ्य और खुलकर सामने आ पाएंगे और तभी दुनिया इस घटना की वास्तविक भयावहता से रूबरू हो पाएगी। खैर, हमारा विषय कौन सही और कौन गलत नहीं है तथा न ही हम तथ्यों की छानबीन में जुटना चाहते हैं। हमारा मकसद इस घटना से पूरी दुनिया के सामने मंडराने वाले खतरे के प्रति आगाह करना है। ट्रेन हाइजैक केवल पाकिस्तान भर के...

क्यों जरूरी है एक देश एक कानून

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भारत में विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं का संगम है। इसके बावजूद, भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान न्याय सुनिश्चित करने का प्रावधान किया है। फिर भी, व्यक्तिगत कानूनों का अस्तित्व एक विवादास्पद मुद्दा बना हुआ है। भारत में एक देश, एक कानून की अवधारणा का लक्ष्य इस विषमताओं को समाप्त करना और समग्र समाज में समानता को बढ़ावा देना है। व्यक्तिगत कानूनों का मुद्दा भारत में विभिन्न धर्मों के नागरिकों के लिए अलग-अलग कानून होते हैं। उदाहरण के तौर पर: हिंदुओं के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, और अन्य संबंधित कानून। मुसलमानों के लिए शरिया कानून और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून। ईसाई समुदाय के लिए ईसाई विवाह और तलाक अधिनियम। पारसी समुदाय के लिए पारसी विवाह और तलाक अधिनियम। इन अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण यह बहस उठती रही है कि क्या भारत में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून नहीं होना चाहिए?  एक देश, एक कानून की आवश्यकता  "एक देश, एक कानून" की अवधारणा को भारत में लागू करने का मुख्य उद्देश्य है: सामाजिक समानता: विभिन्न धार्मिक समुदाय...

पंकज जी,आपसे ज्यादा ‘हिट’ हैं भोपाल के दर्शक…!!

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दर्शक पल पल इंतजार कर रहे थे कि अब नाटक शुरू होगा..पंकज कपूर एक पेज,दो पेज पढ़ेंगे..शायद पांच पेज की भूमिका होगी और फिर कलाकार अपनी कला का जादू बिखेरेंगे। आमतौर पर पारंपरिक नाटक ऐसे ही तो होते हैं…लेकिन पंकज जी तो एक-एक कर पूरे 84 पन्नों का उपन्यास पढ़ गए। कुछ उतावले और उकताए दर्शकों ने उठना शुरू कर दिया..उनकी देखादेखी कुछ और भी उठे…लेकिन, फिर नाटक के संवाद,पंकज कपूर की संवादगी के उतार चढ़ाव और भाव धीरे धीरे मीठी शहद के समान कतरा-कतरा मन-मस्तिष्क में उतरने लगे…और दर्शक चुपचाप बूढ़ी अम्मा के एकाकीपन, जुम्मन की मसखरी, श्रीवास्तव साहब की संजीदगी के साथ चलने लगे। फिर क्या था..पंकज कपूर की इसएकल प्रस्तुति में कभी तालियां,कभी हंसी और कभी सन्नाटा पसरा रहा और एक घंटा 20 मिनट का ‘दोपहरी’ कब खत्म हो गया, पता ही नहीं चला। मेरे जैसे रंगमंच के तमाम अपरिपक्व दर्शकों के लिए यह नाटक की नई शैली थी इसलिए आत्मसात करने में, उससे जुड़ने और महसूस करने में समय लगा। मैं, अभी भी यह मानता हूं कि यदि इसे नाटक की बजाए ‘कहानी पाठ’ या ‘उपन्यास पाठन’ कहकर प्रचारित किया जाता तब भी शायद इतने ही दर्शक जुटते लेकिन तब वे...

बागों में फूलों के खिलने का मौसम आ गया..!!

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फिल्म ‘आराधना’ में गीतकार आनंद बक्शी निश्चित तौर फरवरी मार्च के इन्हीं दिनों को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए होंगे और तभी उनकी कलम से निकला होगा..’बागों में बहार है, कलियों पे निखार है..।’ आनंद बक्शी क्या, कोई भी मंत्रमुग्ध हो सकता है क्योंकि मौसम ही ऐसा है और तभी तो हर कोई कह रहा है बागों में फूलों के खिलने का मौसम आ गया। इसे फागुन कहें या फिर बसंत या फिर रूमानियत के दिन…प्रकृति खुद उत्साहित करती है और फिर हम हम आप क्या दिग्गज कवि भी प्रकृति के रंग में रंग जाते हैं। तभी तो सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को लिखना पड़ा:  “पेड़ों के साथ-साथ  हिलाता है सिर  यह मौसम अब  नहीं आएगा फिर।”  फाल्गुन माह अपनी प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक उत्सवों का संगम है, जो इसे विशेष रूप से खुबसूरत बनाता है। फाल्गुन माह के साथ ही बागों में फूलों के खिलने का मौसम आ जाता है। जैसे ही सर्दियों की सख्त ठंड पीछे छूटती है, बसंत ऋतु अपनी रंगीन छांव लेकर हमारे आसपास फैलने लगती है। यह समय होता है जब धरती पूरी तरह से जीवित हो उठती है और प्रकृति में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। बागों में रंग-...

अच्छे लगते हैं..।

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                              अच्छे लगते हैं..। झूमते पेड़ सुगंधित पुष्प इठलाती बूंदें कोलाहल करता दरिया और मुस्कराते दोस्त बड़े अच्छे लगते हैं..। बीमारी के बाद परेशानी के बाद लंबे अंतराल के बाद जब दोस्त मिलते हैं तो खूब हंसते हैं। अच्छे लगते हैं..। दोस्त के हंसने से  परिवार हंसता है पत्नी हंसती है बच्चे हंसते हैं और  दोस्त भी हंसते हैं और तब, सब बड़े अच्छे लगते हैं।।

कारगिल युद्ध: स्वर्णिम वीरता की रजत जयंती

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आज की ही सी बात लगती है जब कैप्टन विक्रम बत्रा के शब्द ‘ये दिल मांगे मोर’ देश के हर घर का प्रिय मंत्र बन गए थे और ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे, लेफ्टिनेंट बलवान सिंह, कैप्टन एन केंगुरुसे, कैप्टन अनुज नैयर और राइफलमैन संजय कुमार जैसे तमाम बहादुरों की वीरता के किस्से घर घर में कहानियों की तरह गूंजने लगे थे। इसी तरह तोलोलिंग, टाइगर हिल, द्रास,  मरपोला, काकसर, मुस्कोह और बटालिक जैसे अनजान नाम आम लोगों की जुबां पर चढ़ गए थे। दुनिया की सबसे कठिन जंग में युवा सैनिकों के जोश, होश, जज्बे,रणनीति, साहस और चट्टान की तरह बुलंद हौसलों के कारण सुरक्षित और मजबूती से किलेबंदी कर चुकी दुश्मन की सेना को एक बार फिर करारी पराजय की धूल चाटना पड़ा था। साथ ही, दुनिया भर में किरकिरी हुई वह अलग। भारत हमेशा ही शांति से किसी समस्या के समाधान का पक्षधर रहा है और पहले हमला नहीं करने की अपनी नीति पर देश आज भी कायम है लेकिन जब बात देश की अस्मिता, सुरक्षा और सम्प्रभुता पर आए जाए तो फिर देश के सम्मान और आन बान शान की खातिर युद्ध ही एकमात्र विकल्प शेष रह जाता है। इस साल हम भारतीय रण बां...