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महिला दिवस नहीं राष्ट्रीय शर्म दिवस मनाइए!

हर दिन होने वाले दर्ज़नों बलात्कार,तार-तार होते रिश्ते,बस से सड़क तक और घर से बाज़ार तक महिला की इज्ज़त से होता खिलवाड़,बढ़ती छेड़छाड़,दहेज के नाम पर प्रताड़ना,प्रेम के नाम पर यौन शोषण,अपनी नाक की खातिर माँ-बहन-बेटी की हत्या,कन्या जन्म के नाम पर पूरे परिवार में मातम और बूढी माँ को दर-दर की ठोकरे खाने के लिए छोड़ देना और यहाँ तक की आम बोलचाल में भी बात-बात पर महिलाओं के अंगों की लानत-मलानत हमारे रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा है तो फिर एक दिन के लिए महिला दिवस मनाकर महिलाओं के प्रति आदर का दिखावा क्यों?इसे अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस कहने की बजाए ‘राष्ट्रीय शर्म दिवस’ कहना ज़्यादा उचित होगा....क्योंकि हमें इस दिन को गर्व की बजाए “राष्ट्रीय शर्म” दिवस के रूप में मनाना चाहिए.आखिर हम गर्व किस बात पर करें?
क्या यह गर्व की बात है कि हमारे देश में आज भी 56 फीसदी लड़कियों में खून की कमी है और वे एनीमिया की शिकार हैं.इस मामले में हम दुनिया के सबसे पिछड़े देशों मसलन कांगो,बुर्किना फासो और गुएना के बराबर हैं.हमारे मुल्क में 15-19 साल की उम्र वाली 47 फीसदी लड़कियां औसत से कम वजन की हैं और इस मामले में हम दुनिया भर में सबसे निचले पायदान पर हैं.देश में 43 फीसदी लड़कियां विवाह के लिए सरकार द्वारा निर्धारित 18 बरस की आयु पूरी करने के पहले ही ब्याह दी जाती हैं और इनमें से 22 फीसदी तो इस उम्र में माँ तक बन जाती हैं.क्या यह गर्व की बात है?इस मामले में हम से बेहतर तो पाकिस्तान और बंगलादेश हैं जहाँ व्याप्त कुरीतियों को हम पानी पी-पीकर कोसते हैं.महिलाओं की सेहत के प्रति हमारी सजगता का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि आज भी 6000 महिलाएं हर साल बच्चे को जन्म देने के साथ ही मर जाती हैं.
क्या हम इस बात पर गर्व करे कि देश की 86 प्रतिशत बेटियां प्राइमरी स्तर पर ही स्कूल छोड़ देती हैं और 64 फीसदी सेकेण्डरी से आगे की पढ़ाई तक पूरी नहीं कर पाती.आधी आबादी कही जाने के बाद भी 77 फीसदी महिलाएं साक्षर हैं और मात्र 23 प्रतिशत को रोज़गार मिल पाया है.राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश में हर 30 मिनट में एक महिला बलात्कार का शिकार बन रही है,हर घंटे 18 महिलाएं यौन हिंसा का सामना कर रही हैं और बलात्कार के मामलों में अब तक 678 प्रतिशत का इजाफा हो चुका है.देश में आज भी महिलाओं को डायन और चुड़ैल बताकर पत्थरों से मार डाला जाता है.उन्हें ज़िंदा जलाकर ‘सती’ के नाम पर महिमा मंडित किया जाता हो,फिर भी यदि हम महिला दिवस मनाकर ये साबित करना चाहते हैं कि हम महिलाओं का बड़ा आदर करते हैं तो यह दिखावा ही होगा.
अब तो यह लगने लगा है कि साल में एक बार मनाए जाने वाले आधुनिक त्योहारों की श्रृंखला में अब महिला दिवस भी शामिल हो गया है.भारत की प्रेममयी और समरसता भरी संस्कृति के बाद भी साल में एक बार प्रेम दिवस यानि वैलेंटाइन्स डे तो हम धूमधाम से मना ही रहे हैं.इसीतरह रक्षा बंधन एवं भाईदूज की जगह मदर डे,फादर डे,सिस्टर-ब्रदर डे जैसे तमाम विदेशी सांचे में ढले पर्व हमारे समाज में जगह बनाने लगे हैं...और हम भी यही सोचकर इन्हें अपनाते जा रहे हैं कि चलो इसी बहाने रिश्तों का एक दिन तो सम्मान कर ले.इस सम्मान के नाम पर हम करते भी क्या है-उस रिश्ते के नाम एक बुके या ग्रीटिंग कार्ड देकर होटल में जाकर खाना खा लेते हैं और फिर दूसरे दिन से सब भूलकर बहन-बेटिओं को छेड़ने में जुट जाते हैं या इसीतरह फिर किसी नए ज़माने के त्यौहार की भावनात्मक की बजाय औपचारिक तैयारी करने लगते हैं ....बीते कुछ सालों से हम ऐसा ही करते आ रहे हैं और धीमे-धीमे रिश्तों का यह दिखावा हमारी वर्षों पुरानी और ह्रदय से जुडी परम्पराओं का स्थान लेता जा रहा है.फिर भी हम रिश्तों के नाम पर गर्व करने में पीछे नहीं हैं!





टिप्पणियाँ

  1. जीवन ही दिखावा बन गया है।ेक दिन मना कर अपने फर्ज को पूरा हुया मान लेते हैं। इस देश को ही सही दशा और दिशा की जरूरत है। शायद कहीं नारी भी अपनी दिशा और अपने आत्मसम्मान को भूलती जा रही है तो कोई और क्या उसे सम्मान देगा। सब से पहले नारी को सोचना होगा तब और लोग कुछ सोचेंगे। धन्यवाद।

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  2. विचारणीय हैं आपके दिए सारे आंकड़े और तथ्य .... सही मायने में महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा
    की शुरुआत घर से हो सकती है .......ताकि एक दिन पूरा समाज उनकी भूमिका के महत्व को समझे ..... और ऐसी अफसोसजनक घटनाएँ हों ही नहीं ...आभार सार्थक आलेख के लिए

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  3. बहुत सार्थक चिंतन ..

    मात्र दिखावा और औपचारिकता से क्या होने वाला है ?

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  4. बढ़िया लेखन.चिंताजनक वस्तुस्थिति से अवगत करता हुआ और चिंतन के लिए मजबूर करता हुआ.

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  5. आज पहली बार आपके ब्लॉग पे आया और बेहतरीन लेख पढने को मिले. भाई आप जब लिखें मुझे मेल कर दें. मैं आप की हर पोस्ट कीमती है

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