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असम का नया कानून बदल सकता है देश में बुजुर्गों की स्थिति !!

               
 जाति-धर्म-सम्प्रदाय,बाबा,साध्वी और नेताओं के विवादित बोल से लेकर न जाने कैसे-कैसे फ़िजूल विषयों पर आँखें तरेरने वाला हमारा कथित ‘जन-सरोकारी मीडिया’ अमूमन ऐसे विषयों पर चुप्पी साध लेता है जो वास्तव में जन सामान्य के लिए उपयोगी होते हैं।  हाल ही  में मीडिया के एक बड़े तबके ने एक बार फिर एक ऐसे विषय की अनदेखी कर दी जिसे सरकारों और समाज के हर आम-ओ-खास को जानना चाहिए।  न तो किसी चैनल ने इसे ब्रेकिंग न्यूज़ के लायक समझा और न ही बड़ी बहस,हल्ला बोल या मुक़ाबला नुमा कार्यक्रमों के लिए जरुरी । किसी ने टिकर यानि टीवी स्क्रीन में नीचे की ओर चलने वाली ख़बरों में शामिल किया तो किसी ने 5 मिनट में 50 ख़बरों टाइप हड़बड़ी वाली न्यूज़ का हिस्सा बनाकर इतिश्री कर ली। टीवी स्क्रीन पर देश-समाज की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले तमाम सेलिब्रिटी एंकर भी इस विषय से कन्नी काट गए। हाँ, प्रिंट मीडिया ने ज़रूर जिम्मेदारी निभाई और कम से कम दो कालम की ख़बरें कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में देखने को मिली। पूर्वोत्तर में आतंकवाद को छोड़कर किसी और विषय को इतनी जगह मिलना भी कम उपलब्धि नहीं है।
          अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसी कौन सी खबर है जिसके लिए इतनी फ़िक्र करने की जरुरत पड़ रही है तो वह खबर है असम में बना वह कानून जिसमें अपने बुजुर्ग माँ-बाप की देखभाल नहीं करने वाले सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह काटने का प्रावधान है। इसतरह का कानून बनाने वाला असम देश में संभवतः पहला और एकमात्र राज्य है।
         हालाँकि तक़रीबन 10 साल पहले 2007 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने अभिभावक और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण पर केन्द्रित एक अधिनियम बनाया था जो अभिभावकों और वरिष्ठ नागरिक की जरूरत के मुताबिक उनका भरण-पोषण और कल्याण सुनिश्चित करता है। अधिनियम में अभिभावकों और वरिष्ठ नागरिकों को उनके बच्चों/संबंधियों द्वारा भरण-पोषण को अनिवार्य एवं कानूनी बनाया गया है। वरिष्ठ नागरिकों की उनके संबंधियों द्वारा अनदेखी करने पर उनकी संपत्ति का हस्तांतरण करा लिये जाने, निर्धन वरिष्ठ नागरिकों के लिए वृद्धा आश्रम बनाने, वरिष्ठ नागरिकों को उचित चिकित्सा सुविधा और सुरक्षा उपलब्ध कराने का भी प्रावधान इस अधिनियम में है। कुछ राज्यों ने इसे गंभीरता से लागू किया है तो किसी ने औपचारिक रूप से।
         लेकिन, असम सरकार द्वारा हाल ही बनाए गए नए कानून ने अपने बुजुर्ग अभिभावकों और दिव्यांग भाई-बहनों की देखभाल को अनिवार्य बना दिया है. इस कानून के मुताबिक बुजुर्ग मां-बाप की जिम्मेदारी उठाने से भागने वाले सरकारी कर्मचारियों के वेतन से पैसे काटे जाएंगे। ‘असम एम्पलॉयीज पैरंट्स रेस्पॉन्सिबिलिटी एंड नॉर्म्स फॉर अकाउंटैबिलिटी एंड मॉनिटरिंग बिल-2017 नाम के इस कानून को असम एम्पलॉयीज प्रणाम बिल के नाम से जाना जा रहा है। कानून के मुताबिक अगर राज्य सरकार का कोई कर्मचारी अपने माता-पिता की जिम्मेदारी उठाने से भागता है तो सरकार उसके वेतन का 10 प्रतिशत हिस्सा काट लेगी और उसे मां-बाप के खाते में जमा कर देगी। अगर कर्मचारी का कोई भाई या बहन दिव्यांग है तो फिर उस कर्मचारी के वेतन से 5 प्रतिशत अतिरिक्त कटौती होगी। राज्य के वित्त मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा का कहना है कि आगे चलकर प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों को भी इस कानून के दायरे में लाया जाएगा।
         असम सरकार ने यह भी साफ़ किया है कि यह कानून किसी के निजी जीवन में हस्तक्षेप नहीं है बल्कि इस कानून का मकसद घर में उपेक्षित बुजुर्गों को संबंधित कर्मचारी के खिलाफ शिकायत का अधिकार देना है।' कानून में कहा गया है कि किसी कर्मचारी के खिलाफ ऐसी शिकायत मिलने के बाद विभागीय प्रमुख दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद वेतन में कटौती का फैसला करेंगे।
      अक्सर देखा जाता है कि जब माता पिता उम्र के अंतिम पडाव पर पहुंच जाते हैं और इस समय उन्हें सबसे अधिक सहारे की जरूरत होती है उनकी संताने या उत्तराधिकारी देखभाल करने से कन्नी काटने लगते हैं कई लोग तो ऐसे होते हैं जो बुजुर्ग मां बाप को वृद्धाश्रम तक में छोड देते है। अब यह कोई अनजान तथ्य नहीं है कि हमारे देश में वृद्ध लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 1951 में 60 से ज्यादा उम्र के लोगों की जनसंख्या 20 मिलियन थी। तीन दशक बाद 1981 में यह संख्या 43 मिलियन तक पहुंच गई और वहीं आगे के दशकों, 1991 में यह 55.30 मिलियन तक पहुंच गई। 2001 में यह संख्या बढ़कर 76.5 मिलियन तक और वर्ष 2011 में 103.2 मिलियन तक पहुंच गयी।
      बुजुर्गों के लिए काम करने वाले संगठन 'हेल्पएज इंडिया' की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर तीन में से एक बुजुर्ग अपनी ही संतान की उपेक्षा व अत्याचारों का शिकार है। अत्याचार के ज्यादातर मामलों की जड़ में संपत्ति का विवाद होता है। ऐसे ज्यादातर मामलों में बेटियां नहीं बल्कि बेटे ही मां-बाप पर अत्याचार करते हैं। चिंता की बात यह है कि बुजुर्गों की उपेक्षा का यह सिलसिला महज शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है। देश के ग्रामीण इलाकों में भी ऐसे मामले बढ़ रहे हैं। ग्रामीण इलाके में अब युवक प्रायः अपने परिवार के साथ नौकरी या रोजगार के लिए शहरों में जाकर बसने लगे हैं। गांव में अकेले रह गए मां-बाप को उनकी किस्मत और दूरदराज के रिश्तेदारों के सहारे छोड़ दिया जाता है। ऐसे युवक कभी-कभार कुछ रुपये भेज कर ही अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं लेकिन वे इस बात से अनजान बने रहते हैं कि बुजुर्गों को पैसे के साथ मानसिक देखभाल की भी उतनी ही जरुरत है। वे चाहते हैं कि कोई उनसे बात करने वाला हो,उनकी भावनात्मक देखभाल करने वाला हो बिलकुल वैसे ही जैसे वे बचपन में अपने बच्चों की करते थे। पैसा आवश्यकताएं तो पूरी कर सकता है परन्तु मानसिक संबल नहीं बन सकता।ये काम तो अपने ही कर सकते हैं जो साथ रहें,साथ बैठे, बतियाएं और साथ खाएं।  
      उम्मीद है कि असम सरकार ने इस दिशा में जो पहल की है उसका दूसरे राज्य भी अनुसरण करेंगे और न केवल ऐसे कानून बनाएंगे बल्कि उनका अनुपालन भी सुनिश्चित करेंगे। हमारे अभिभावक या समाज के बुजुर्ग हमारा गौरव हैं, मान हैं और हमारी जिम्मेदारी हैं इनसे मुंह मोड़कर हम तात्कालिक तौर पर तो शायद स्वयं को सुखी दिखा सकते हैं लेकिन इससे हमें वह मानसिक सुख नहीं मिल सकता जो परिवार के साथ मिलता है।  हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यदि हम आज अपनी बुजुर्ग पीढ़ी को गड्ढे में ढकेल कर खुश हैं तो भविष्य में उससे भी ज्यादा गहरा गड्ढा हमारा इंतजार कर रहा है क्योंकि यदि ‘बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से पाएं’ ।  



टिप्पणियाँ

  1. बिकाऊ मीडिया को पैड न्यूज से ही फुर्सत कहाँ

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. धन्यवाद संदीप पंवार जी,आपकी प्रतिक्रिया के लिए

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