ये दाल टिक्कड़ है

 

ये दाल टिक्कड़ है..देशी घी में लहालोट मतलब तरबतर गरमागरम टिक्कड़ और हरी मिर्च के साथ बघारी (फ्राई) गई दाल…इसकी खुशबू और स्वाद के आगे शाही पनीर और मलाई कोफ्ते की भी क्या बिसात।

हाल ही में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मप्र के श्योपुर जिले के कूनो नेशनल पार्क और कराहल आए तो उनकी यात्रा को आकाशवाणी भोपाल और #दिल्ली के जरिए देशभर के श्रोताओं तक पहुंचाने के लिए हम भी वहां पहुंचे। चूंकि, भोपाल से श्योपुर क़रीब साढ़े तीन सौ से चार सौ किमी दूर है इसलिए राष्ट्रीय राजमार्ग होने के बाद भी छह से आठ घंटे लग ही जाते हैं। ऐसे में खाने के लिए कुछ नया तलाशने की अपनी आदत के चलते हम गुना के आसपास जाट साहब के इस ढाबे पर पहुंच गए। यहां आए तो थे चाय की तलब लेकर लेकिन अनुशासित ढंग से सजे टिक्कड़ ने अपनी ओर ललचाया और हम भी इनसे मुलाकात करने से अपनी जीभ को नहीं रोक पाए ।
..अगर, अब तक न बूझ पाएं हों तो जान लीजिए कि ये गक्कड़ का करीबी रिश्तेदार और हमारी बाटी से अगली पीढ़ी का सदस्य है। दरअसल, पुराने जमाने मे जब यात्री पैदल ही सैकड़ों मील का सफर करते थे तब सीमित संसाधनों में रोटी/पूरी/पराठा या नान तो बन नहीं सकता था इसलिए शायद पेट भरने के लिए टिक्कड़/गक्कड़ का जन्म हुआ था । अब यह कुछ होटलों के महंगे मैन्यू में भी शान और मान सम्मान के साथ मौजूद है।
हमारी नई पीढ़ी की जानकारी के लिए टिक्कड़ गेहूं के मोटे पिसे आटे की छोटे आकार की मोटी रोटी है, जिसे सीधे बिना तवे का उपयोग किये कंडे/उपले की आंच पर सेंक कर बनाया जाता है। हालांकि जाट साहब के इस ढाबे पर इसे सेंकने के लिए मिट्टी के उल्टे तवे का इस्तेमाल हो रहा है। टिक्कड़ की जोड़ी बैगन के भरते या दाल के साथ ज्यादा जमती है । समझने के लिए लिट्टी चोखा और दाल बाटी भी टिक्कड़ के खानदान के ही हैं। दाल बाफले को भी इनका कुछ रईस टाइप का रिश्तेदार मान सकते हैं। नए दौर के बच्चे इसे बिना स्टफिंग वाला बटर पिज़्ज़ा या आटे का पिज़्ज़ा बेस भी मान सकते हैं। करीब सौ रुपए में चार टुकड़ों में विभाजित दो टिक्कड़ और कटोरी भर दाल आपका मन और पेट दोनों भरने के लिए पर्याप्त है।
तो,कभी घर में फुरसत में टिक्कड़ और दाल की जोड़ी बनाइए..खाइए और खिलाइए, लेकिन एक सलाह भी.. टिक्कड़ को अच्छे से सेंकिए वरना यह पेट में गुड़गुड़ का कारण भी बन सकता है।

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