तेरा ज़िक्र है या इत्र है...महकता हूँ,बहकता हूँ...!!

इन दिनों, रात में आप यदि भोपाल की वीआईपी रोड, मुख्यमंत्री निवास से पॉलिटेक्निक कालेज या फिर तमाम नई बनी कालोनियों के आसपास की सड़कों से गुजरें तो एक भीनी भीनी और मादक सी सुगंध बरबस ध्यान खींचती है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने सड़क पर रूम स्प्रे कर दिया है..वाकई,यह रूम स्प्रे ही है लेकिन प्रकृति का। जैसे आम की बौर या मधुमलिती की बेल आसपास के इलाके को महका देती है बिल्कुल उसी तरह इस खास पेड़ की खुशबू हवा में घुलकर मन मोह लेती है..और इन दिनों भोपाल ही नहीं,शायद देश के किसी भी व्यवस्थित शहर में यह इत्र अपनी सुगंध से लोगों का ध्यान खींच रहा होगा। शायद,शीत ऋतु के स्वागत का प्रकृति का यह अपना खास अंदाज़ है।

अपूर्व सुंगध के साथ अपने आकार प्रकार में भी आकर्षक इस पेड़ को सप्तपर्णी कहा जाता है। सप्तपर्णी का अर्थ है सात पत्तियों वाला..इस पेड़ की लंबी पत्तियां सात की संख्या में परस्पर साथ होती है और यही इस पेड़ की सुंदरता का सबसे बड़ा कारण है। जहां तक,विशिष्ट सुगंध की बात है तो इन दिनों मतलब अक्तूबर नवंबर से जनवरी फरवरी तक सप्तपर्णी में विशेष प्रकार के छोटे छोटे सफेद फूल आते हैं जो अपनी महक से पूरे इलाक़े को महका देते हैं। सप्तपर्णी मूल रूप से अपना पेड़ है यानि यह दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश और भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है। हालांकि इसे चीन, अफ्रीकी देशों और ऑस्ट्रेलिया में भी देखा गया है। यह पश्चिम बंगाल का राजकीय पेड़ भी है।
सप्तपर्णी को डेविल्स ट्री, स्कॉलर ट्री, डीटा बार्क, ब्लैकबोर्ड ट्री, मिल्कवुड, सप्तपर्णा, सप्तचद, छत्रपर्ण, शारद, सातवीण, छितवन और छातिम जैसे तमाम नामों से भी जाना जाता है। वैसे वैज्ञानिक तौर पर इसे 'एल्स्टोनिया स्कोलैरिस' कहा जाता है। बताया जाता है कि वनस्पति विज्ञानी प्रोफ़ेसर सी. एल्स्टन ने सबसे पहले इस पर शोध किया था और इसलिए इसका वैज्ञानिक नाम एल्स्टोनिया स्कोलैरिस पड़ गया। एक और मजेदार बात यह है कि यह पेड़ केवल खुशबू ही नहीं बिखेरता बल्कि शिक्षा का जरिया भी है। दरअसल, सप्तपर्णी की लकड़ी से स्कूल कालेज में इस्तेमाल होने वाले ब्लैकबोर्ड भी बनते हैं। बच्चों की स्लेट बनाने में भी इसका भरपूर उपयोग होता है इसलिए इसे ‘ब्लैकबोर्ड ट्री’ भी कहा जाता है ।
दिलचस्प बात यह है कि सप्तपर्णी की अनूठी खुशबू ही इसकी जान की दुश्मन बन गई है …अपनी इसी अलग और मादक सुगंध के कारण कई लोग इस पेड़ को अशुभ और शैतान का रहवास भी कहते हैं इसलिए इसे डेविल्स ट्री के नाम से भी जाना जाता है। वे इसे दमा/अस्थमा और सांस की तमाम बीमारियों की जड़ भी मानते हैं। अखबारों की खबरों के मुताबिक़ इन्हीं बातों पर विश्वास करने की वजह से कई शहरों में लोग इसे कटवाने तक लगे हैं।
वास्तव में सप्तपर्णी एक ऐसा सदाबहार वृक्ष है जिसका उपयोग आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा जैसी तमाम देशी उपचार पद्धतियों में दुर्बलता, पीलिया और घाव ठीक करने सहित कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है। इसीतरह दाद, खाज और खुजली जैसे चर्म रोगों और मलेरिया के उपचार तक में यह उपयोगी है। बुखार,दस्त और दांत दर्द में भी यह बहुत कारगर है।
और अंत में सबसे खास बात.... सप्तपर्णी मेरी 'बैटर हाफ' का भी सबसे पसंदीदा पेड़ है इस लिहाज से यह हमारा पारिवारिक पेड़ हुआ। अब दुनिया इसे जिस भी नज़र से देखे, अपने लिए तो यह पेड़,इसकी खुशबू और इसका सौंदर्य सबसे प्रिय है। मुझे तो लगता है संजय लीला भंसाली की फिल्म 'गुज़ारिश' में गीतकार ए.एम.तुराज़ भी शायद कभी सप्तपर्णी के इस पेड़ के आसपास से गुज़रे होंगे तभी तो उन्होंने लिखा था:
के तेरा ज़िक्र है या इत्र है
जब-जब करता हूँ
महकता हूँ, बहकता हूँ, चहकता हूँ
शोलों की तरह
खुशबुओं में दहकता हूँ
बहकता हूँ, महकता हूँ
इसलिए, सप्तपर्णी को लेकर फैली अच्छी बुरी बातों को छोड़िए,बस इसकी भीनी भीनी खुशबू में मस्त हो जाइए क्योंकि ये समय निकल गया तो फिर अगले साल ही मदहोश होने का मौका मिल पाएगा।

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