चुटकियों में जिंदगी का फ़लसफ़ा समझाती रोचक किस्सागोई

कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो बिना किसी गूढ़ और अलंकृत भाषा के भी जीवन के अहम फलसफे आसानी से समझा देती हैं। बिल्कुल परिवार के उस सदस्य की तरह  जो बच्चों से लेकर बड़ों तक के बीच हल्के फुल्के अंदाज में अपनी बात कह जाता है। वरिष्ठ लेखक एवं संचार विशेषज्ञ संजय सक्सेना एवं उनकी नई किताब ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ भी परिवार के सदस्य की तरह है जो बिना लाग लपेट के जरूरी संदेश दे जाती है लेकिन अंदाजे बयां ऐसा है कि आप मुस्कराते हुए उस संदेश को आत्मसात कर सकते हैं।

‘डायरी का आखिरी पन्ना’ न केवल बिना किसी बनावटीपन के आपको ज़िंदगी की सच्चाई से रूबरू कराती हैं बल्कि यह किताब आपको अपनी डायरी खोलकर कोई संदेश, कोई सबक या बस एक ईमानदार एहसास जैसा कुछ न कुछ लिखने के लिए प्रेरित भी करती है।

‘डायरी का आखिरी पन्ना’ वास्तव में रोज़मर्रा की ज़िंदगी के उन छोटे-छोटे किस्सों का संग्रह है, जो सतह पर साधारण लगते हैं, लेकिन गहराई में जीवन के गहरे संदेश छिपाए हुए हैं। यह किताब ठीक उसी तरह है जैसे हमारी अपनी डायरी का आखिरी पन्ना…जहाँ हम वे सभी बातें लिखते हैं जो कहीं और नहीं लिख पाते, जो सच्ची, ईमानदार और बिना किसी फिल्टर के होती हैं। 

लेखक संजय सक्सेना ने भी इस पुस्तक में आम आदमी की ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं को छुआ है। किताब ऐसे कई किस्सों का खजाना है जो हमारे आस-पास की हक़ीक़त को बिना अतिरंजना के और सरल शब्दों में पेश करते हैं। किताब की सबसे बड़ी खूबी इसकी भाषा और प्रस्तुति है। लेखक ने बड़े एहतियात और भावनात्मक आत्मीयता से हर किस्से को संवारा है। वाक्य छोटे, स्पष्ट और दिल को छूने वाले हैं। कोई भारी-भरकम दर्शन या उपदेश नहीं, बस जीवन के वे पल सफगोई से बयां किए हैं, जो हम सब जीते हैं लेकिन अक्सर अनदेखा कर देते हैं। 

किताब में हमारे आसपास के किस्सों में छिपे संदेश इतनी सहजता से उभरते हैं कि पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यह तो मेरी कहानी है, मेरे पड़ोसी की है या मेरे शहर की है। वास्तव में देखा जाए तो पाठकों के लिए यह पुस्तक भावी पीढ़ी के लिए एक दस्तावेज़ की तरह है, जो नई पीढ़ी को रोचक शैली में यह बताती है कि जिंदगी कैसे अपने अंदर बड़े संदेश छिपाए हुए है। लेखक का मकसद भी यही लगता है वे लिखना सिर्फ़ अपने लिए नहीं चाहते, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए लिख रहे हैं ताकि नई उम्र के पाठक भी समझ सकें कि जीवन के छोटे-छोटे पलों में कितनी गहराई छिपी होती है।

वैसे तो डेढ़ सौ पेज की इस किताब के अधिकतर किस्से रोचक एवं पठनीय हैं लेकिन ‘गुठली की यात्रा में जीवन का फलसफा’, ‘झुर्रियों से संवाद’, ‘एक चुटकी तसल्ली की कीमत’, ‘सवाल जो जलील करवा सकते हैं’, ‘कुछ सड़क छाप दोस्त भी जरूर होना चाहिए’, ‘कुचली उंगली फिर नहीं आती’.. जैसे कुछ किस्से इतने अच्छे बन पड़े हैं कि आप इन्हें बार बार पढ़ना चाहेंगे।

पुस्तक के कुछ अध्यायों एवं खास तौर पर अंतिम हिस्से के कुछ किस्सों को पढ़कर जरूर यह लगता है कि ये किस्से थोड़ा और विस्तार मांगते हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह भी डायरी श्रृंखला की इस दूसरी पुस्तक को संपूर्ण बनाने में अहम किरदार निभाते हैं। संजय सक्सेना इससे पहले ‘डायरी का मुड़ा हुआ पन्ना’ नामक पुस्तक भी लिख चुके हैं जो पाठकों में जबरदस्त लोकप्रिय हुई थी। 

किताब का कवर, प्रिटिंग, ले आउट, फ़ॉन्ट और उनकी साइज बहुत ही आकर्षक है जो आपको पढ़ने के लिए उत्साहित करती है। यदि आप चुटकियों में जिंदगी की गंभीर बातों को समझना चाहते हैं तो ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ आपके लिए ही है..जरूर पढ़िए। वाकई, यह एक संवेदनशील, विचारोत्तेजक और मानवीय मनोभावों को समेटे  हुए भावनात्मक संग्रह है।

पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:

पुस्तक का नाम: डायरी का आखिरी पन्ना 

लेखक: संजय सक्सेना 

कुल पृष्ठ: 154

मूल्य: 200 रुपए

प्रकाशक: लोक प्रकाशन, भोपाल

मेरी रेटिंग: 4.5/5


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