अकेलापन..पैसे नहीं, समय मांगता है !!!


...शहर के एक व्यस्त इलाके में राहुल नाम का एक युवक डिलीवरी बॉय का काम करता था। ज्यादातर उसकी शाम की शिफ्ट होती। एक दिन रात नौ बजे उसने आखिरी ऑर्डर उठाया। रेस्टोरेंट से पैकेट लेते समय उसने देखा — बहुत छोटा ऑर्डर था। बस सादी खिचड़ी, दही और दो केले। पता पुराने शहर का था। एक जर्जर पुरानी इमारत, तीसरी मंजिल।

सीढ़ियाँ चढ़कर उसने घंटी बजाई। दरवाजा एक वृद्ध महिला ने खोला। सफेद बाल, काँपते हाथ, मोटे चश्मे। चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी, पर आवाज में मिठास थी —"बेटा, अंदर रख दो... मेरे हाथ काँपते हैं। "राहुल ने खाना टेबल पर रखा और लौटने लगा तो अम्मा ने कहा —"बेटा, दो मिनट बैठोगे? अकेले खाना खाने में मन नहीं लगता।" राहुल ने घड़ी देखी। शिफ्ट खत्म हो चुकी थी। थकान भी हो रही थी। फिर भी कुछ अनकहा भाव उसके मन में उठा और वह बैठ गया। 

कमरा सन्नाटे में डूबा था। दीवार पर पुरानी घड़ी टिक-टिक कर रही थी। एक कोने में भगवान की छोटी सी तस्वीर। दूसरी दीवार पर परिवार की दर्जनों फोटो लगी थीं। अम्मा ने प्लेट खोली। धीरे-धीरे खिचड़ी खाने लगीं। हर दो कौर के बाद वे राहुल की ओर देखकर मुस्कुरातीं। फिर बोलीं —"बेटा, रोज बाहर का खाना नहीं मँगाती। आज बस मन किया... किसी इंसानी आवाज को सुनने का। "राहुल चुप रहा। अम्मा ने दीवार पर एक फोटो की ओर इशारा किया —"ये मेरे पति जी। रेलवे में नौकरी करते थे। पाँच साल पहले चले गए। "फिर दूसरी तस्वीर —"ये मेरा बेटा। कनाडा में है। बहुत अच्छा कर रहा है... हर महीने पैसे भेजता है। "थोड़ी देर चुप रहकर उनकी आँखें भर आईं —"बस... समय नहीं भेज पाता।"

कमरे में घड़ी की टिक-टिक अचानक बहुत तेज सुनाई देने लगी। अम्मा ने एक और कौर लिया और बोलीं —"ये मेरी बेटी। बेंगलुरु में है। अपनी दुनिया में खुश है। होना भी चाहिए। बच्चों ने उड़ना न सीखा तो हमने उन्हें पाला ही क्यों था?" आवाज भर्रा गई, लेकिन चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी — सिर्फ सूना खालीपन था। उन्होंने राहुल से पूछा —"तुम्हारी माँ है बेटा? "हाँ अम्मा।" "हर दिन फोन करते हो?" राहुल खामोश हो गया। 

सच तो यह था कि वह भी कई-कई दिन घर को फोन नहीं करता। थकान, काम, भागदौड़... हर बार सोचता, कल कर लूँगा। उसकी चुप्पी पढ़कर अम्मा ने धीरे से कहा —"बेटा, माता-पिता पैसे नहीं गिनते... वे आवाजें गिनते हैं। "राहुल के अंदर कुछ टूट गया। खाना खत्म हुआ। अम्मा ने पानी पिया। फिर पर्स से पाँच सौ रुपये निकालकर आगे बढ़ाए —"ये टिप नहीं है बेटा। ये उस आधे घंटे की कीमत है, जब तुमने मुझे अकेले नहीं खाने दिया।" राहुल ने मना किया, "नहीं अम्मा, मैं नहीं ले सकता।" अम्मा मुस्कुराईं —"ले लो। आज तुमने खाना नहीं डिलीवर किया... साथ और समय दिया है।" राहुल ने रुपये लिए, लेकिन जेब में नहीं डाले — हाथ में ही थामे रखे। जाते समय अम्मा ने कहा —"और हाँ — आज घर जाकर अपनी माँ को जरूर फोन करना।"

उस रात राहुल ने इमारत के नीचे बाइक स्टार्ट नहीं की। सबसे पहले उसने माँ को फोन लगाया। दूसरी तरफ से माँ की आवाज आई —"अरे! आज अचानक फोन? सब ठीक तो है ना?" बस इतना सुनकर राहुल का गला रुँध गया। वह बोला, "हाँ माँ... बस तुम्हारी आवाज सुननी थी।" कुछ पल खामोशी रही। फिर माँ ने पूछा, "तुमने खाना खाया?" सड़क किनारे खड़े होकर राहुल रो पड़ा। उस रात के बाद उसने रोज अपनी माँ को फोन करना शुरू कर दिया। और सिर्फ माँ को ही नहीं — अब हर डिलीवरी उसके लिए सिर्फ ऑर्डर नहीं रह गई थी। कुछ घरों को दवा चाहिए, कुछ को अकेलेपन से छुटकारा, कुछ को इंतजार का अंत, कुछ को बस एक आवाज चाहिए।

अब जब भी कोई दरवाजा खुलता, राहुल जल्दी में नहीं होता। चेहरे को देखता, आवाज सुनता और कभी-कभी पूछ लेता — "और सब ठीक है ना?"ज्यादातर लोग कह देते, "हाँ।"

कुछ मुस्कुरा देते। और कुछ चेहरे बता देते कि पूरे दिन किसी से बात ही नहीं हुई। 

दो महीने बाद उसी पते से फिर ऑर्डर आया।राहुल जल्दी से पहुँचा। इस बार पड़ोस की आंटी ने दरवाजा खोला। धीरे से बोलीं —"अम्मा पिछले हफ्ते चली गईं।" राहुल कुछ पल दरवाजे पर खड़ा रहा। हाथ खाली थे, लेकिन अंदर कुछ बहुत भारी टूट रहा था।आंटी ने अंदर से एक छोटा लिफाफा निकाला —"अम्मा ने ये तुम्हारे लिए छोड़ा था।" काँपते हाथों से राहुल ने लिफाफा खोला। अंदर पाँच सौ रुपये और एक छोटा सा नोट था। नोट पर लिखा था —"बेटा, जब यह पढ़ रहे हो, मैं चली गई हूँ। उस रात मेरे साथ खाने के लिए धन्यवाद। तुमने मुझे खाना नहीं — सम्मान दिया था। हाँ — अपनी माँ को फोन करते रहना— अम्मा।"

आज भी वे पाँच सौ रुपये राहुल के बैग के अंदर वाले पॉकेट में रखे हैं। उसने उन्हें खर्च नहीं किया क्योंकि उस रात उसे पहली बार समझ आया था —हर दरवाजे के पीछे सिर्फ ग्राहक नहीं होता।

कभी कोई माँ होती है।

कभी कोई इंतजार होता है।

कभी आखिरी मुलाकात होती है। हम सब अपनी-अपनी चाह लेकर जीते हैं —

किसी को रोटी चाहिए,

किसी को दवा,

और किसी को बस दो मिनट का साथ। इंसान को हमेशा सामान की डिलीवरी नहीं चाहिए...

कभी-कभी तो सिर्फ उपस्थिति की डिलीवरी चाहिए।

निष्कर्ष यह है कि बुढ़ापा और अकेलापन साथ आएँ तो बहुत भयानक होता है और अगर संसाधनों की कमी भी जुड़ जाए, तो यह अंतिम त्रासदी है। इसलिए, अपने माता-पिता को आज ही फोन कीजिए।

वे पैसे नहीं — आपकी आवाज गिनते हैं।

(मूल अंग्रेजी पोस्ट का हिंदी अनुवाद..पोस्ट सोशल मीडिया पर अलग अलग नामों के साथ दिख/मिल रही है।)


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