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क्या किसी समाज का इससे अधिक नैतिक पतन हो सकता है?


अभी हाल ही में दो परस्पर विरोधाभाषी खबरें पढ़ने को मिली. पहली यह कि केरल के कुछ  स्कूलों में पढाने वाली महिला शिक्षकों को प्रबंधन ने साडी या सलवार सूट के ऊपर कोट या एप्रिन नुमा कोई वस्त्र पहनने की हिदायत दी ताकि कक्षा में बच्चों का शिक्षिकाओं की शारीरिक संरचना को देखकर ध्यान भंग न हो, साथ ही वे कैमरे वाले मोबाइल का दुरूपयोग कर चोरी-छिपे महिला शिक्षकों को विभिन्न मुद्राओं में कैद कर उनकी छवि से खिलवाड़ न कर सकें. वहीं दूसरी खबर यह थी कि एक निजी संस्थान ने अपनी एक महिला कर्मचारी को केवल इसलिए नौकरी छोड़ने के निर्देश दे दिए क्योंकि वह यूनिफार्म में निर्धारित स्कर्ट पहनकर आने से इंकार कर रही थी. कितने आश्चर्य की बात है कि संस्कारों की बुनियाद रखने वाले शिक्षा के मंदिर की पुजारी अर्थात शिक्षिका के पारम्परिक भारतीय वस्त्रों के कारण बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा और दूसरी और निजी संस्थान अपनी महिला कर्मचारियों को आदेश दे रहा है कि वे छोटे से छोटे वस्त्र मसलन स्कर्ट पहनकर कार्यालय में आयें ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों का मन शोरूम में लग सके.
जिस पाठशाला में शील,संस्कार, सद्व्यवहार, शालीनता और सच्चाई की सीख दी जाती है वहां बच्चे अपनी आदरणीय शिक्षिकाओं की अशालीन तस्वीर उतारने के लिए बेताब हैं और इन अमर्यादित शिष्यों से बचने के लिए बच्चों को डांटने-डपटने के स्थान पर हम ज्यादा आसान तरीका अपनाकर महिला शिक्षकों को वस्त्रों की परतों में ढककर आने को कह रहे हैं और जहाँ ग्राहक का पूरा ध्यान उस उत्पाद पर होना चाहिए जिसे खरीदने का मन बनाकर वह किसी शोरूम तक आया है वहां की महिला कर्मचारियों को ग्राहकों को रिझाने वाले कपड़े पहनाए जा रहे हैं. क्या किसी समाज का इससे अधिक नैतिक पतन हो सकता है जब गुरु को अपने स्कूल स्तर के शिष्य की वासनात्मक नजरों से डर लगने लगे. क्या बतौर अभिभावक यह हमारा दायित्व नहीं है कि हम बच्चों को मोबाइल फोन की आकस्मिकता से जुडी अहमियत समझाए और किसी भी संभावित दुरूपयोग की स्थिति बनने से पहले ही बच्चे को उसके दुष्परिणामों के बारे में गंभीरता के साथ चेता दें. सबसे बड़ी बात तो यह है कि घर का वातावरण भी इसप्रकार का नहीं होने दें कि हमारा बच्चा स्कूल में पढ़ने की बजाए अपनी गुरुओं की ही अश्लील तस्वीर उतरने की हिम्मत करने लगे. कहां जा रहा है हमारा समाज और हम? ऐसे में तो माँ को अपने बेटे और बहन को अपने भाई के सामने भी बुरका नुमा वस्त्र पहनकर रहने की नौबत आ सकती है. वैसे भी चचेरे,ममेरे और फुफेरे रिश्ते तो कलंकित होने की खबरें आने लगी हैं बस अब शायद खून के रिश्तों की बारी है क्योंकि शिक्षिकाओं को तो हम कोट पहनाकर बचा सकते हैं लेकिन घर में माँ-बहनों,भाभी,बुआ,मामी,चाची और मौसी को घर के ही ‘लालों’ से कितना और कैसे ढककर रखेंगे. क्या ‘एकल परिवार’ में रहने का मतलब सारे रिश्ते-नातों को तिलांजलि दे देना है? देखा जाए तो निगाहों में अशालीनता का पर्दा अभी शुरूआती दौर में है इसलिए ज्यादा कुछ नहीं बिगडा है क्योंकि आज सोच-समझकर खीचीं गयी संस्कारों की लक्ष्मणरेखा भावी पीढी को कुसंस्कारों के रावण के पाले में जाने से रोक सकती है और यदि समय रहते और समाज से मिल रहे तमाम संकेतों को अनदेखा करने की गलती हम इसीतरह करते रहे तो फिर भविष्य में घर घर चीर हरण करने वाले दुर्योधन-दुशासन नजर आएंगे और बेटियों के शरीर पर कपड़ों की तह पर तह लगानी पड़ेगी.   यह कि केरल शिक्षा समिति के अंतर्गत चलने वाले स्कूलों में पढाने वाली महिला शिक्षकों को प्रबंधन ने साडी या सलवार सूट के ऊपर कोट या एप्रिन नुमा कोई वस्त्र पहनने की हिदायत दी ताकि कक्षा में बच्चों का शिक्षिकाओं की शारीरिक संरचना को देखकर ध्यान भंग न हो, साथ ही वे कैमरे वाले मोबाइल का दुरूपयोग कर चोरी-छिपे महिला शिक्षकों को विभिन्न मुद्राओं में कैद कर उनकी छवि से खिलवाड़ न कर सकें. वहीं दूसरी खबर यह थी कि एक निजी संस्थान ने अपनी एक महिला कर्मचारी को केवल इसलिए नौकरी छोड़ने के निर्देश दे दिए क्योंकि वह यूनिफार्म में निर्धारित स्कर्ट पहनकर आने से इंकार कर रही थी. कितने आश्चर्य की बात है कि संस्कारों की बुनियाद रखने वाले शिक्षा के मंदिर की पुजारी अर्थात शिक्षिका के पारम्परिक भारतीय वस्त्रों के कारण बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा और दूसरी और निजी संस्थान अपनी महिला कर्मचारियों को आदेश दे रहा है कि वे छोटे से छोटे वस्त्र मसलन स्कर्ट पहनकर कार्यालय में आयें ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों का मन शोरूम में लग सके.
जिस पाठशाला में शील,संस्कार, सद्व्यवहार, शालीनता और सच्चाई की सीख दी जाती है वहां बच्चे अपनी आदरणीय शिक्षिकाओं की अशालीन तस्वीर उतारने के लिए बेताब हैं और इन अमर्यादित शिष्यों से बचने के लिए बच्चों को डांटने-डपटने के स्थान पर हम ज्यादा आसान तरीका अपनाकर महिला शिक्षकों को वस्त्रों की परतों में ढककर आने को कह रहे हैं और जहाँ ग्राहक का पूरा ध्यान उस उत्पाद पर होना चाहिए जिसे खरीदने का मन बनाकर वह किसी शोरूम तक आया है वहां की महिला कर्मचारियों को ग्राहकों को रिझाने वाले कपड़े पहनाए जा रहे हैं. क्या किसी समाज का इससे अधिक नैतिक पतन हो सकता है जब गुरु को अपने स्कूल स्तर के शिष्य की वासनात्मक नजरों से डर लगने लगे. क्या बतौर अभिभावक यह हमारा दायित्व नहीं है कि हम बच्चों को मोबाइल फोन की आकस्मिकता से जुडी अहमियत समझाए और किसी भी संभावित दुरूपयोग की स्थिति बनने से पहले ही बच्चे को उसके दुष्परिणामों के बारे में गंभीरता के साथ चेता दें. सबसे बड़ी बात तो यह है कि घर का वातावरण भी इसप्रकार का नहीं होने दें कि हमारा बच्चा स्कूल में पढ़ने की बजाए अपनी गुरुओं की ही अश्लील तस्वीर उतरने की हिम्मत करने लगे. कहां जा रहा है हमारा समाज और हम? ऐसे में तो माँ को अपने बेटे और बहन को अपने भाई के सामने भी बुरका नुमा वस्त्र पहनकर रहने की नौबत आ सकती है. वैसे भी चचेरे,ममेरे और फुफेरे रिश्ते तो कलंकित होने की खबरें आने लगी हैं बस अब शायद खून के रिश्तों की बारी है क्योंकि शिक्षिकाओं को तो हम कोट पहनाकर बचा सकते हैं लेकिन घर में माँ-बहनों,भाभी,बुआ,मामी,चाची और मौसी को घर के ही ‘लालों’ से कितना और कैसे ढककर रखेंगे. क्या ‘एकल परिवार’ में रहने का मतलब सारे रिश्ते-नातों को तिलांजलि दे देना है? देखा जाए तो निगाहों में अशालीनता का पर्दा अभी शुरूआती दौर में है इसलिए ज्यादा कुछ नहीं बिगडा है क्योंकि आज सोच-समझकर खीचीं गयी संस्कारों की लक्ष्मणरेखा भावी पीढी को कुसंस्कारों के रावण के पाले में जाने से रोक सकती है और यदि समय रहते और समाज से मिल रहे तमाम संकेतों को अनदेखा करने की गलती हम इसीतरह करते रहे तो फिर भविष्य में घर घर चीर हरण करने वाले दुर्योधन-दुशासन नजर आएंगे और बेटियों के शरीर पर कपड़ों की तह पर तह लगानी पड़ेगी.  

टिप्पणियाँ

  1. पतन की कोई सीमा नहीं होती बंधु। इसीलिए तो बंदा कह रहा है कि खुसदीप भाई, आप सफेद झूठ बोल रहे हो।

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  2. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - भारतीय रेल के गौरवमयी १६० वर्ष पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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