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दूसरे मुल्क में भी भारतीय सेना ने चटाई पाकिस्तान को धूल

दुनिया भर के देशों से आयीं चुनिन्दा 121 टीमों के बीच हुए चपलता,सतर्कता,दम-ख़म,मानवीय पहल और मानसिक मजबूती के अंतरराष्ट्रीय कैम्ब्रियन पेट्रोलिंग मुक़ाबले में भारतीय सेना की 8 गोरखा राइफल्स की दूसरी बटालियन ने स्वर्ण पदक जीतकर देश का सिर गौरव से ऊँचा कर दिया. बोलचाल की भाषा में हम इसे सैन्य अभ्यास का ‘मिलिट्री ओलंपिक’ कह सकते हैं. खास बात यह है कि इस मुक़ाबले में पाकिस्तानी सेना ने भी हिस्सा लिया था. 
इस वर्ष कैम्ब्रियन पेट्रोलिंग में लातविया, मैक्सिको, नेपाल, कनाडा, इटली, जोर्जिया, जर्मनी, पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, चेकोस्लोवाकिया, आयरलैंड, बोस्निया, बेल्जियम, चिली, ब्राजील सहित दुनिया के कई जाने-माने देशों की सेनाओं ने हिस्सा लिया था. वैसे 2011 तथा 2014 में भी भारतीय सैनिक इस मुक़ाबले में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं. इसके अलावा 2015 में भी भारतीय टुकड़ी को रजत पदक मिला था.
दरअसल कैम्ब्रियन पेट्रोलिंग ब्रिटेन के वेल्स की कैम्ब्रियन पहाड़ियों में हर साल होने वाला अन्तरराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास है। इसकी शुरुआत 1959 में वेल्स प्रादेशिक सेना के सैनिकों के लिए की गयी थी. बाद में इसमें अन्य देशों की रूचि को देखते हुए इसे सालाना अभ्यास में बदलकर सभी देशों के खोल दिया गया. अब इसका आयोजन 160 इन्फैंट्री और मुख्यालय वेल्स द्वारा किया जा रहा है. इसे विश्व के सबसे कठिन सैन्य अभ्यासों में से एक माना जाता है। अभ्यास में कैम्ब्रियन पहाड़ियों सर्पीली घुमावदार पगडंडियों पर अनवरत पेट्रोलिंग करनी होती है। अभ्यास के दौरान सैनिकों को कई कठिन लक्ष्य भी दिए जाते हैं जिन्हें सैनिकों को निर्धारित समयावधि में पूरा करना पड़ता है।
इस प्रतियोगिता का उद्देश्य किसी भी सेना की नेतृत्व क्षमता, स्व-अनुशासन, शारीरिक दमखम, समर्पण, निर्णय लेने की क्षमता, सैन्य कौशल, मानवीय गुण, परस्पर सहयोग और सहायता की भावना तथा तत्परता जैसे विभिन्न पहलुओं को परखना है इसलिए आमतौर पर इसे प्रतियोगिता की बजाए अभ्यास कहा जाता है ताकि सभी सैन्य दल परस्पर मुक़ाबले में उलझाने के स्थान पर अपने अपने अभ्यास कौशल का परीक्षण करें.
इस दौरान टीम के पास भारी भरकम सैन्य किट और अन्य जरूरी सैन्य साजो-सामान होता है। इस अभ्यास का एक कठिन पहलू यह भी है कि यदि इनमें से कोर्इ सामान खो जाता है तो उसके लिए न केवल उस सैन्य टीम को मिलने वाले अंक काट लिए जाते हैं बल्कि खोए हुए सामान के बदले में समान वजन का दूसरा अनावश्यक सामान लाद दिया जाता है। इसका मतलब यह है कि सैन्य टीम को उतना सामान लेकर ही चलना होगा. इस मुक़ाबले में विजेताओं का निर्णय उस टीम द्वारा तमाम गतिविधियों में हासिल किए गए अंकों के आधार पर होता है और फिर उन्हें स्वर्ण,रजत और कांस्य पदकों से सम्मानित किया जाता  हैं।
सैन्य विशेषज्ञ भी इस बात को मानते हैं कि “ 30-35 किलो का वजन लादकर लगातार 48-72 घंटें तक घुप अँधेरे में अनजाने-अनदेखे दुर्गम पहाड़ी रास्तों और नदी-नालों के बर्फ़ जैसे ठंडे पानी को पार करते हुए महज आठ लोगों की टीम के साथ 55 किलोमीटर में फैले इलाक़े की चौकसी करना किसी भी देश की सेना के लिए आसान नहीं है. यही नहीं, जब आपके सामने यहाँ छिपे दुश्मन का मुकाबला करने की चुनौती हो और खुद के साथ साथ निर्दोष लोगों को भी बचाना हो तो यह काम असंभव सा हो जाता है.” भारतीय सेना तो इसतरह की चुनौतियों का पर्याय मानी जाती है और एक बार फिर उसने कैम्ब्रियन पेट्रोलिंग में यह साबित कर दिखाया है.






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